गुरुवार, 14 अक्तूबर 2010

ये सपनों का घर है

बिखरी-बिखरी चीजों में
कुछ ख्वाब संजोए रहते हैं,
एक खिड़की बाहर खुलती है,
और पत्ते बातें करते हैं।

दीवारों पर रंग भी है
और बच्चों की रंगोली भी,
इस घर में अपनी चाहत के
ऐसे कई रंग भी रहते हैं।

ये घर लोगों से सजता है
और बातें यहां बिखरती हैं,
इस घर में हम सबसे ज्यादा
खामोशी से ही डरते हैं।

हमको चंदा की चाह नहीं,
ना आसमान की ख्वाहिश है,
हम फर्श पर लेटे-लेटे ही
तारों की बातें करते हैं।

रोज़-रोज़ की दौड़ नहीं,
हम वक्त के साथ ही बहते हैं,
ये अपने सपनों का घर है,
इसको 1149 कहते हैं!