इंदिरा नूयी का इंटरव्यू पढ़कर मैं बहुत देर तक ज़ोर-ज़ोर से हंसती रही थी। हंसी उस विडंबना पर आ रही थी जो सर्वव्यापी है, यूनिवर्सल। लेकिन है अकाट्य सत्य ही - आप चाहे दुनिया की सबसे बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी की सीईओ हों, या फिर दिन भर पत्थर तोड़कर शाम को घर लौट जाने वाली मजदूर, दुनिया के हर कोने में आपकी ज़िन्दगी की कहानी एक-सी ही सुनाई देगी बिल्कुल।
अब मैं अपनी ही बात करते हुए इस लम्हे, बिल्कुल इस लम्हे का हाल बयां करूं तो सीन कुछ ऐसा है। मैं डायनिंग टेबल के एक कोने में बैठी ये लेख लिखने की कोशिश कर रही हूं और मेरे दोनों बच्चे मेज़ की दूसरी तरफ़ खाना खाते हुए लगातार मुझे टोकते जा रहे हैं। मम्मा, ऊंट अपनी नाक क्यों बंद कर सकता है? मम्मा, आद्या ने मेरे पैरे को छुआ। मम्मा, आदित ने अपना होमवर्क नहीं किया... मैं एक तरफ़ लिखने की नाकाम कोशिश कर रही हूं और दूसरी तरफ ध्यान झगड़ा सुलझाने में भी है। इसके अलावा फ़िक्र कल सुबह के नाश्ते की, बच्चों के यूनिफॉर्म साफ़ करवाने की, उनका होमवर्क कराने की, राशन के सामान की, घर की छत से लटकते जाले साफ़ कराने की भी है और ये सारे ख़्याल एक साथ ज़ेहन में चल रहे हैं। हफ़्ते के ख़त्म हो जाने का अफ़सोस भी है। सोमवार की सुबह तक डेडलाईन फिर से हावी होगी।
अचानक मुझे ये ख़्याल बहुत सुकून देता है कि किसी इंदरा नूयी की, किसी शेरिल सैंडबर्ग या किसी टाइगर मॉम एमी चुआ की हालत रोज़-दर-रोज़ मुझसे अलग नहीं होती है।
घर की दहलीज़ के भीतर एक औरत से जिस संजीदगी के साथ मां, बहू, बेटी, पत्नी और इस तरह की तमाम ज़िम्मेदारियों के निर्वहन की अपेक्षा की जाती है वो अपेक्षा एक पुरुष से नहीं रखी जाती। इंदिरा से उनकी मां ने कहा था कि वो अपने सीईओ होने का ताज या तो गैरेज में छोड़कर आए या फिर दफ़्तर में। घर में उसकी ज़िम्मेदारी दूध लाने की है, और अपना घर चलाने की। घर के पुरुष से ऐसी कोई अपेक्षा नहीं की जाती। दफ़्तर से लौटकर आने के बाद भी वो एक पुरुष ही होता है।
ऐसे में महिलाओं के लिए, ख़ासकर कामकाजी महिलाओं के लिए, दोनों जहां की ख़ुशियां मिल जाने का ख़्वाब किस कमबख़्त ने देखा था? दोनों जहां में परफेक्ट होने की कोशिश वो गफ़लत है जिससे जितनी जल्दी बाहर आया जाए, उतना अच्छा।
अगर यही सच है तो फिर क्या अपना सिर पीटा जाए या कई किस्मों के, कई वजहों के अपराध बोध से मर जाने का जुगाड़ कर लिया जाए? या फिर इस पुरुषप्रधान समाज के नाम को पचहत्तर बार कोसा जाए?
यकीन मानिए, जो औरत हर रोज़ की जंग लड़ रही होती है, हर रोज़ वक़्त का सही इस्तेमाल करते हुए हर लम्हा उपयोगी बनाने की कोशिश में जुटी होती है, उसके पास शिकायत करने का सबसे कम समय होता है। हम अपने हालातों के सबसे अच्छे पारखी और निर्णायक होते हैं। इंदिरा नूयी ने अपनी ज़िन्दगी के लिए निजी फ़ैसले लिए और ये बिल्कुल ज़रूरी नहीं कि वो मेरे हालात पर कारगर हों। हमारे फ़ैसले कई बातों पर निर्भर होते हैं - हमारे चुनाव, हमारी पृष्ठभूमि, हमारी ज़रूरतें, और सबसे अहम - हमारी फ़ितरत। अपनी फ़ितरत और अपने हालात के आधार पर दोनों जहां में कितना और कब-कब बने रहना है, इसकी समझ विकसित कर ली जाए तो किसी और को कोई फ़र्क पड़े न पड़े, आप ज़रूर सुकून में रहेंगी।
ये सुकून, ये मानसिक शांति ही दरअसल असल वर्क-लाइफ बैलेंस होती है। वर्क-लाइफ बैलेंस का कोई फॉर्मूला नहीं होता। ये फॉर्मूले अपने लिए हम ख़ुद तय करते हैं और वक़्त के साथ-साथ इनपर काम लगातार चलता रहता है। तीन साल पहले बच्चों के साथ पार्क में खेलना मेरी प्राथमिकता में सबसे ऊपर था। अब नहीं है। मैं उन्हें दिन भर में दो घंटे का वक़्त देकर भी ख़ुश रहती हूं। लेकिन ये फ़ैसले मेरे अपने हैं, और इनके लिए ज़िम्मेदार भी मैं ही हूं। ऐसे कई फ़ैसले हर रोज़, हर बात पर लेने होते हैं और इंदिया भी ठीक यही कहती हैं। मुझे नहीं लगता कि इंदिरा के लहज़े में, बड़ी बेबाकी से किए हुए उनके बयान-ए-हकीकत में इस बात से कोई शिकायत है।
अपने बारे में बात करते हुए वे खुलकर हंस सकती हैं, और ये हंसी उनकी सबसे बड़ी सफलता है मेरे हिसाब से। वैसे इंदिरा की एक बात से मैं बिल्कुल सहमत नहीं हूं। मुझे इस बात का पक्का यकीन है कि उनकी बेटियों से कोई पूछे तो वे यही कहेंगी कि उन्हें अपनी मां पर बेइंतहा फ़ख्र है और एक दिन वे भी अपनी मां की तरह ही बनना चाहेंगी। और इस बात का उनकी मां के कामकाजी होने, या बेहद सफल होने से कोई रिश्ता नहीं है। इस बात का सीधे तौर पर रिश्ता इस बात से है कि वे दोनों बड़ी होकर कैसे महिलाएं, और किस तरह की मां बनना चाहेंगी। मुझे उम्मीद है कि जल्द ही हमें बेटियों की राय भी सुनने को मिलेगी। दोनों जहां के होने न होने की बहस को अंजाम तभी दिया जा सकेगा।
वैसे घर और काम - दोनों जहां में होने न होने की ये बहस हमारे बच्चों की पीढ़ियों तक आते-आते जेंडर की बहस से बाहर निकल सके तब जाकर कह सकेंगे कि मुमकिन है दोनों जहां हासिल करना।
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शुक्रवार, 11 जुलाई 2014
मंगलवार, 31 दिसंबर 2013
एक 'ऑलमोस्ट सक्सेसफुल' मां की डायरी
इस शहर में सुबहें बड़ी खाली होती हैं। सड़कें खाली, रास्ते खाली, पार्क खाली, बसें खाली, लोकल ट्रेन खाली। खाली सड़कों पर बहुत देर तक तेज़-तेज़ चलते रहने के बाद भी आराम नहीं आता।
मैं इतनी बेचैन क्यों हूं?
जॉगिंग शूज़ पहनकर निकले इतनी सुबह निकले इतने सारे लोग बेचैनी कम करने के लिए बाहर निकले हैं या अपना वज़न कम करने के लिए?
ये शहर बेचैन लोगों का शहर है। सब बैचैन हैं। या मुझे ही बेचैन दिखते हैं लोग।
एक और बीमारी हो गई है आजकल। जिस औरत को काम पर जाते देखती हूं, उसके पीछे छूट गए घर के बारे में सोचती हूं। कब लौटती होगी वो? उसके बच्चे होंगे क्या? उनका होमवर्क कौन कराता होगा? सुबह कितने बजे उठकर खाना बनाया होगा? पार्क में बच्चों के साथ चलती मांओं को देखती रहती हूं। बच्चे को बड़ा करने के अलावा कोई और मकसद होगा क्या इनकी ज़िन्दगी का?
मैं पार्क के कोने में बेंच पर बैठने लगती हूं तो देखती हूं एक बुज़ुर्ग महिला अपने से भी कहीं ज़्यादा उम्रदराज़ शख़्स को धीरे-धीरे हाथ पकड़कर टहला रही हैं। जाने कौन किसको टहला रहे है, लेकिन इन दोनों को देखकर मैं बहुत बेचैन हो जाती हूं। इनका खाना कौन बनाता होगा? कैसे रहते होंगे इतने बड़े शहर में दोनों? दो लाचार लोग क्या साथ दे पाते होंगे एक-दूसरे का? इनका परिवार नहीं है? बच्चे होंगे या नहीं? इसी अकेलेपन और लाचारी से बचने के लिए तो हिंदुस्तान में लोग परिवार बनाते हैं, बच्चे पैदा करते हैं। बच्चे - बुढ़ापे का सहारा। बेटा - बुढ़ापे की लाठी। फिर भी अकेले रह जाते हैं लोग। बुढ़ापा किसी पर दया नहीं दिखाता। बीमारी किसी को नहीं बख़्शती। बेचारगी और अकेलापन अकाट्य सत्य है। अवश्यंभावी। किसी मां के लिए भी, और पिता के लिए भी।
गले में कुछ अटककर रह जाता है। ऐसे ही किसी लम्हे ने युवराज सिद्धार्थ को घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया होगा।
शाम की हवा भी सुकून नहीं लाती। मन है कि मधुमक्खियों का छत्ता हो गया है। कोई एक लम्हा फेंको नहीं इधर कि सवालों के झुंड डंक मारने को दौड़ते हैं।
हम किस तलाश में हैं?
ज़िन्दगी का हासिल क्या हो?
अगर यही लाचारी आख़िरी सच है तो फिर इतनी भागमभाग क्यों?
वक़्त मेरे नाम का बहीखाता खोलेगा तो क्या-क्या निकलेगा बाहर? बच्चों के बड़े होने जाने पर ऐसी ही तन्हाई मिलती है क्या? मैंने अपनी मां को कहां छोड़ दिया? मेरे बच्चे मुझे कहां छोड़ देंगे? मैं ंकिसके लिए कर रही हूं ये सब? ज़िन्दगी में आसानी चुनने से इतना परहेज़ क्यों?
मुझे इतनी घबराहट हो रही है कि लग रहा है कि जैसे पार्क की बेंच पर, यहीं बैठे-बैठे उल्टी हो जाएगी। अंदर कुछ है जो निकल पड़ने को व्याकुल है। ये नॉसिया उसी साइकोसोमैटिक डिसॉर्डर का नतीजा है। मैं इस लम्हे, ठीक इसी लम्हे, लौट जाना चाहती हूं। पता नहीं कहां, लेकिन लौट जाना चाहती हूं कहीं।
घबराकर फोन देखती हूं। किसको फोन करूं? किससे बात करूं? इन बेचैनियों को यूं भी शब्द नहीं दिए जा सकते। क्या कहूंगी, कि बच्चों को घर पर छोड़ आई और बाहर इसलिए भटक रही हूं क्योंकि सवालों की मधुमक्खियां पीछा कर रही हैं?
सोलह साल में ऐसी बेचैनी होती थी। इस उम्र में भी होगी? सोलह साल में भी इतने ही सवाल थे। बड़े होकर करना क्या है? ज़िन्दगी का मक़सद क्या हो? कमबख़्त ये सवाल ऐसा है कि अब भी पीछा नहीं छोड़ता। मेरी ज़िन्दगी का मक़सद क्या था? मैं कहां भटक गई?
फिर ताज़िन्दगी जवाब मिलते क्यों नहीं, कि हम किस चीज़ का पीछा कर रहे होते हैं। मर ही जाना है तो जीने के आरज़ू क्योंकर हो?
ये मैं नहीं, मेरे भीतर से कोई और बोल रहा है। मेरा उस आवाज़ पर कोई बस नहीं चलता और मेरी तमाम समझदारियों को वो एक आवाज़ अक्सर बेक़ाबू कर देती है।
फोन पर गूगल खुल गया है और मैं वर्किंग मदर्स गूगल करती हूं। पता नहीं क्यों? मेरे भीतर की सारी लड़ाई ही यही है। मां होने और प्रोफेशनल होने के बीच की। दोनों होने की कोशिश कई कुर्बानियां मांगती है। जब इतना ही मुश्किल है सबकुछ तो हार क्यों नहीं मान जाती मैं? आसानियों की राह चुन लेना मेरी भी ज़िन्दगी आसान कर देगा, और मेरे बच्चों की भी। शाम को उन्हें सुलाने के बाद देर रात तक लैपटॉप पर आंखें फोड़ने से मुझे निजात मिलेगा, और सुबह तक जलती बत्ती में सोने की मजबूरी से बच्चों को। उन्हें स्कूल से लौटते हुए ये डर नहीं सताएगा कि बस स्टॉप पर उन्हें लेने के लिए कोई होगा या नहीं। मुझे इस तनाव से छुट्टी मिल जाएगी कि बच्चे जिस दिन घर पर हों उस दिन मीटिंग के लिए कैसे जाऊंगी मैं?
मैं क्यों उलझ रही हूं इतना? क्यों ज़रूरी है काम करना?
जवाब ढूंढने के लिए मैं फोन पर फिर से सक्सेसफुल मदर्स टाईप करती हूं।
फिर पावर वूमैन।
मुझे आजकल उन तमाम औरतों की कहानियां आकर्षित करती हैं जो अपने-अपने स्तर पर अपनी-अपनी किस्मतों से अलग-अलग तरीके से संघर्ष कर रही हैं। अपने सपनों का पीछा करते हुए कड़ी आलोचनाओं और समाज के पूर्वाग्रहों को दरकिनार करते हुए कैसे बनाई जाती होंगी राहें? मां तो वो है न जो दूसरों के ख़्वाबों को पालती-पोसती हो - मेरी मां की तरह - ताकि उनके पति-बच्चे-परिवार अपनी ज़िन्दगियां, अपने ख़्वाब जी सकें।
अपनी मां के ज़रिए मैंने दूसरों का ख़्वाब जीने वालों को बहुत देखा है।
मैं औरतों के लिए गाली जैसा लगने वाला शब्द - 'ambitious' - महत्वाकांक्षी औरतों के बारे में जानना चाहती हूं।
कैसी औरतें होंगी जो घर और बाहर, सबपर काबिज़ दिखाई देती हैं? उनकी बेचैनियों के बारे में किसी ने तो लिखा होगा कहीं।
जवाब फिर भी नहीं मिलते, और नाम वही गिने-चुने - सिंडी क्रॉफर्ड, माधुरी दीक्षित, फराह खान, नैना लाल किदवई, लीला सेठ, सुष्मिता सेन, एंजेलिना जोली और बीच-बीच में कहीं मेरी कॉम, गीता गोपीनाथ...
मैं कई और बहुत सारी औरतों के बारे में सोचती हूं। अपनी मां के बारे में सोचती हूं।
गूगल ही मुझे टॉनी मॉरिसन के एक इंटरव्यू की ओर लेकर चला जाता है।
टोनी मॉरिसन। एक और मां। एक और वो मां, औरत, जिसने अपनी लेखनी के ज़रिए मदरहुड को नए सिरे से परिभाषित किया। टोनी की रची हुई मांएं मातृत्व के सारे स्टीरियोटाईप्स तोड़ती हैं। टोनी की रची हुई औरतें के परिवार समाज के तय किए हुए सभी मापदंडों की अ"द ब्लुएस्ट आई" टोनी मॉरिसन की पहली किताब थी जो मैंने आद्या और आदित के आने के दौरान पढ़ा था, जब मैटरनिटी लीव पर थी। फिर 'Beloved' पढ़ी, और फिर 'Sula'. दोनों नॉवेल्स के ज़रिए मातृत्व पर - मां होने पर - मां की भूमिका पर इन दोनों किताबों ने मेरे भीतर कई पैमाने तय किए थे।
टोनी मॉरिसन की रची हुई मांएं भी अलग-अलग किस्मों की होती हैं। उनमें सेथे जैसी मां होती है जो अपने बच्चों को इस हद तक प्यार करती है कि उन्हें अपनी निजी जागीर समझती है। उनमें बेबी जैसी मां भी होती है जो नाप-तौल कर अपने हिस्से के प्यार इस डर से अपने बच्चों को देती है कि कहीं उसके अपने ही बच्चे उसे बहुत कमज़ोर और बेचारी न बना दें। ये रंगभेद और नस्लभेद, गरीबी और गुलामी के बीच अपने बच्चों को पालने वाली मांएं हैं। ये वो मांएं हैं जो अपने बच्चों को बेचने की बजाए उन्हें मार डालना ज़्यादा उचित समझती हैं। ये वो मांएं हैं जो रचती भी हैं, विनाश भी करती हैं।
और इन सब किरदारों को रचनेवाली मां है टोनी मॉरिसन। टोनी ने जब अपनी पहली किताब - द ब्लुएस्ट आई - शुरू की, वो एक नौकरी करने के साथ-साथ दो बेटों को अकेले पाल रही थीं। नौकरी पर जाने से पहले हर सुबह चार बजे लिखने के लिए उठती थीं। बकौल टोनी, जब भी उनकी हिम्मत जवाब देने लगती, वो अपनी दादी के बारे में सोचतीं जो ग़ुलामी और बेइज़्जती की ज़िन्दगी से बचने के लिए एक दिन अपने सात बच्चों के साथ दक्षिण से भाग आई थी। तब पेट भरने का भी कोई साधन नहीं था उनके पास। लेकिन मां का एक रूप ये भी होता है कि वो हर हाल में अपने बच्चों के पेट भरने का इंतज़ाम कर ही लेती है, चाहे उसे कृपी की तरह दूध के नाम पर पानी में आटा ही घोलकर क्यों न पिलाना पड़े।
टोनी का इंटरव्यू पढ़ते हुए लगता है कि कोई तीसरी आंख है जो खुल गई है भीतर। मैं हर रोज़ तो देखती हूं ये, फिर इस बात का यकीन क्यों नहीं होता कि बच्चों की ज़रूरतें बहुत कम होती हैं। बच्चों की ज़रूरतों से ज़्यादा मां के ज़ेहन में उसे ही काट खाने को बैठा गिल्ट होता है। उससे भी बड़ी रोज़-रोज़ की जद्दोज़ेहद होती है।
जो मां कामकाजी या 'ambitious' होती है, उसके लिए ये संघर्ष और भी बड़ा हो जाता है क्योंकि मां के तौर पर आपके सिर पर रोल मॉडल बन जाने का दबाव भी होता है।
चाहे जो भी हो, मां हैं आप तो अपने बच्चों के सामने बिखर नहीं सकते। उनके सामने कमज़ोर नहीं पड़ सकते। आपको हारते-टूटते हुए देखना आपके बच्चों के लिए सबसे बड़ा सदमा होता है। आपके बच्चे आपको एक adult, एक समझदार adult के तौर पर देखना चाहते हैं। और बच्चों को याद नहीं रहता कि उनकी मां के बाल कैसे हुआ करते थे। उन्हें ये ज़रूर याद रहता है कि हर हाल में मां ने सेंस ऑफ ह्यूमर कैसे बचाए रखा था अपना। ये याद रहता है कि अपनी विपरीत परिस्थितियों से हंसते हुए कैसे जूझा करती थी मां।
बच्चे अगर मां की ज़िन्दगी के दिए हुए लम्हों का योग हैं, तो फिर उनकी ख़ातिर अपने सपनों को बचाए रखना और ज़रूरी हो जाता है। टुकड़ों-टुकड़ों में अपने सपने जीकर दिखाएंगे बच्चों को, तो उन्हें अपने नामुमकिन सपनों पर यकीन होगा। इसके एवज में कई छोटे-छोटे लम्हों की क़ुर्बानियां देनी होती हैं, जिनमें उनके लिए हर शाम ठीक पांच बजे आटे का हलवा बना पाने का संतोष भी होता है।
इसलिए, सारे सवाल बेमानी हैं।
मैं टोनी मॉरिसन को थैंक यू बोलने को उठने को ही हूं कि देखती हूं, वो बुज़ुर्ग महिला फोन पर हंस-हंसकर बात कर रही है। फिर वो फोन अपने साथ बैठे अपने पति की ओर बढ़ा देती है। उनके चेहरों पर आई चमक गौतम सिद्धार्थ ने देखी होती न, तो सिद्धि यहीं मिल गई होती। जरा, मरण और दुखों से मुक्ति दिलाने के लिए जिस मार्ग की खोज में सिद्धार्थ ने घर छोड़ा, उसी घर में अपने नवजात शिशु को बड़ा करते हुए, अपने वृद्ध सास-ससुर की सेवा करते हुए, अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए, अपनी परिस्थितियों के ठीक बीचों-बीच ज़िन्दगी से जूझते हुए साध्वी यशोधरा ने निर्वाण की राह ढूंढ ली। गृहत्याग तभी किया जब कर्तव्यों को पूरा कर लिया. अपने कर्मों को जी लिया।
अभी कुछ देर पहले तक जिसकी लाचारी ने भीतर तक परेशान किया था, उसी कर्मठ बुज़ुर्ग औरत के लिए बहुत सारा प्यार उमड़ आया मन में। बेचैनी और सुकून के बीच एक नैनोसेकेंड की दूरी होती है। सब खेल मन का है।
जवाब मिल गया है। अपने कर्मों को हर दिन जीने में। अपने हालातों को बदलने के लिए बेचैन होने से ज़्यादा उसी के बीच से रास्ता निकालने में।
अब मैं किसी सुपर सक्सेसफुल मदर के बारे में नहीं जानना चाहती।
ज़िन्दगी की जंग का फ़ैसला एक दिन, एक हफ्ते, एक महीने, एक साल में नहीं होता। ज़िन्दगी की जंग आख़िरी सांस तक लड़ी जाती है और ये जो जीत और हार का अहसास है न, वो व्यक्ति सापेक्ष होता है - सफलता की परिभाषा की तरह। और ये पैमाने हम तय करते हैं अपने लिए। कोई और नहीं करता।
मैं इतनी बेचैन क्यों हूं?
जॉगिंग शूज़ पहनकर निकले इतनी सुबह निकले इतने सारे लोग बेचैनी कम करने के लिए बाहर निकले हैं या अपना वज़न कम करने के लिए?
ये शहर बेचैन लोगों का शहर है। सब बैचैन हैं। या मुझे ही बेचैन दिखते हैं लोग।
एक और बीमारी हो गई है आजकल। जिस औरत को काम पर जाते देखती हूं, उसके पीछे छूट गए घर के बारे में सोचती हूं। कब लौटती होगी वो? उसके बच्चे होंगे क्या? उनका होमवर्क कौन कराता होगा? सुबह कितने बजे उठकर खाना बनाया होगा? पार्क में बच्चों के साथ चलती मांओं को देखती रहती हूं। बच्चे को बड़ा करने के अलावा कोई और मकसद होगा क्या इनकी ज़िन्दगी का?
मैं पार्क के कोने में बेंच पर बैठने लगती हूं तो देखती हूं एक बुज़ुर्ग महिला अपने से भी कहीं ज़्यादा उम्रदराज़ शख़्स को धीरे-धीरे हाथ पकड़कर टहला रही हैं। जाने कौन किसको टहला रहे है, लेकिन इन दोनों को देखकर मैं बहुत बेचैन हो जाती हूं। इनका खाना कौन बनाता होगा? कैसे रहते होंगे इतने बड़े शहर में दोनों? दो लाचार लोग क्या साथ दे पाते होंगे एक-दूसरे का? इनका परिवार नहीं है? बच्चे होंगे या नहीं? इसी अकेलेपन और लाचारी से बचने के लिए तो हिंदुस्तान में लोग परिवार बनाते हैं, बच्चे पैदा करते हैं। बच्चे - बुढ़ापे का सहारा। बेटा - बुढ़ापे की लाठी। फिर भी अकेले रह जाते हैं लोग। बुढ़ापा किसी पर दया नहीं दिखाता। बीमारी किसी को नहीं बख़्शती। बेचारगी और अकेलापन अकाट्य सत्य है। अवश्यंभावी। किसी मां के लिए भी, और पिता के लिए भी।
गले में कुछ अटककर रह जाता है। ऐसे ही किसी लम्हे ने युवराज सिद्धार्थ को घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया होगा।
शाम की हवा भी सुकून नहीं लाती। मन है कि मधुमक्खियों का छत्ता हो गया है। कोई एक लम्हा फेंको नहीं इधर कि सवालों के झुंड डंक मारने को दौड़ते हैं।
हम किस तलाश में हैं?
ज़िन्दगी का हासिल क्या हो?
अगर यही लाचारी आख़िरी सच है तो फिर इतनी भागमभाग क्यों?
वक़्त मेरे नाम का बहीखाता खोलेगा तो क्या-क्या निकलेगा बाहर? बच्चों के बड़े होने जाने पर ऐसी ही तन्हाई मिलती है क्या? मैंने अपनी मां को कहां छोड़ दिया? मेरे बच्चे मुझे कहां छोड़ देंगे? मैं ंकिसके लिए कर रही हूं ये सब? ज़िन्दगी में आसानी चुनने से इतना परहेज़ क्यों?
मुझे इतनी घबराहट हो रही है कि लग रहा है कि जैसे पार्क की बेंच पर, यहीं बैठे-बैठे उल्टी हो जाएगी। अंदर कुछ है जो निकल पड़ने को व्याकुल है। ये नॉसिया उसी साइकोसोमैटिक डिसॉर्डर का नतीजा है। मैं इस लम्हे, ठीक इसी लम्हे, लौट जाना चाहती हूं। पता नहीं कहां, लेकिन लौट जाना चाहती हूं कहीं।
घबराकर फोन देखती हूं। किसको फोन करूं? किससे बात करूं? इन बेचैनियों को यूं भी शब्द नहीं दिए जा सकते। क्या कहूंगी, कि बच्चों को घर पर छोड़ आई और बाहर इसलिए भटक रही हूं क्योंकि सवालों की मधुमक्खियां पीछा कर रही हैं?
सोलह साल में ऐसी बेचैनी होती थी। इस उम्र में भी होगी? सोलह साल में भी इतने ही सवाल थे। बड़े होकर करना क्या है? ज़िन्दगी का मक़सद क्या हो? कमबख़्त ये सवाल ऐसा है कि अब भी पीछा नहीं छोड़ता। मेरी ज़िन्दगी का मक़सद क्या था? मैं कहां भटक गई?
फिर ताज़िन्दगी जवाब मिलते क्यों नहीं, कि हम किस चीज़ का पीछा कर रहे होते हैं। मर ही जाना है तो जीने के आरज़ू क्योंकर हो?
ये मैं नहीं, मेरे भीतर से कोई और बोल रहा है। मेरा उस आवाज़ पर कोई बस नहीं चलता और मेरी तमाम समझदारियों को वो एक आवाज़ अक्सर बेक़ाबू कर देती है।
फोन पर गूगल खुल गया है और मैं वर्किंग मदर्स गूगल करती हूं। पता नहीं क्यों? मेरे भीतर की सारी लड़ाई ही यही है। मां होने और प्रोफेशनल होने के बीच की। दोनों होने की कोशिश कई कुर्बानियां मांगती है। जब इतना ही मुश्किल है सबकुछ तो हार क्यों नहीं मान जाती मैं? आसानियों की राह चुन लेना मेरी भी ज़िन्दगी आसान कर देगा, और मेरे बच्चों की भी। शाम को उन्हें सुलाने के बाद देर रात तक लैपटॉप पर आंखें फोड़ने से मुझे निजात मिलेगा, और सुबह तक जलती बत्ती में सोने की मजबूरी से बच्चों को। उन्हें स्कूल से लौटते हुए ये डर नहीं सताएगा कि बस स्टॉप पर उन्हें लेने के लिए कोई होगा या नहीं। मुझे इस तनाव से छुट्टी मिल जाएगी कि बच्चे जिस दिन घर पर हों उस दिन मीटिंग के लिए कैसे जाऊंगी मैं?
मैं क्यों उलझ रही हूं इतना? क्यों ज़रूरी है काम करना?
जवाब ढूंढने के लिए मैं फोन पर फिर से सक्सेसफुल मदर्स टाईप करती हूं।
फिर पावर वूमैन।
मुझे आजकल उन तमाम औरतों की कहानियां आकर्षित करती हैं जो अपने-अपने स्तर पर अपनी-अपनी किस्मतों से अलग-अलग तरीके से संघर्ष कर रही हैं। अपने सपनों का पीछा करते हुए कड़ी आलोचनाओं और समाज के पूर्वाग्रहों को दरकिनार करते हुए कैसे बनाई जाती होंगी राहें? मां तो वो है न जो दूसरों के ख़्वाबों को पालती-पोसती हो - मेरी मां की तरह - ताकि उनके पति-बच्चे-परिवार अपनी ज़िन्दगियां, अपने ख़्वाब जी सकें।
अपनी मां के ज़रिए मैंने दूसरों का ख़्वाब जीने वालों को बहुत देखा है।
मैं औरतों के लिए गाली जैसा लगने वाला शब्द - 'ambitious' - महत्वाकांक्षी औरतों के बारे में जानना चाहती हूं।
कैसी औरतें होंगी जो घर और बाहर, सबपर काबिज़ दिखाई देती हैं? उनकी बेचैनियों के बारे में किसी ने तो लिखा होगा कहीं।
जवाब फिर भी नहीं मिलते, और नाम वही गिने-चुने - सिंडी क्रॉफर्ड, माधुरी दीक्षित, फराह खान, नैना लाल किदवई, लीला सेठ, सुष्मिता सेन, एंजेलिना जोली और बीच-बीच में कहीं मेरी कॉम, गीता गोपीनाथ...
मैं कई और बहुत सारी औरतों के बारे में सोचती हूं। अपनी मां के बारे में सोचती हूं।
गूगल ही मुझे टॉनी मॉरिसन के एक इंटरव्यू की ओर लेकर चला जाता है।
टोनी मॉरिसन। एक और मां। एक और वो मां, औरत, जिसने अपनी लेखनी के ज़रिए मदरहुड को नए सिरे से परिभाषित किया। टोनी की रची हुई मांएं मातृत्व के सारे स्टीरियोटाईप्स तोड़ती हैं। टोनी की रची हुई औरतें के परिवार समाज के तय किए हुए सभी मापदंडों की अ"द ब्लुएस्ट आई" टोनी मॉरिसन की पहली किताब थी जो मैंने आद्या और आदित के आने के दौरान पढ़ा था, जब मैटरनिटी लीव पर थी। फिर 'Beloved' पढ़ी, और फिर 'Sula'. दोनों नॉवेल्स के ज़रिए मातृत्व पर - मां होने पर - मां की भूमिका पर इन दोनों किताबों ने मेरे भीतर कई पैमाने तय किए थे।
टोनी मॉरिसन की रची हुई मांएं भी अलग-अलग किस्मों की होती हैं। उनमें सेथे जैसी मां होती है जो अपने बच्चों को इस हद तक प्यार करती है कि उन्हें अपनी निजी जागीर समझती है। उनमें बेबी जैसी मां भी होती है जो नाप-तौल कर अपने हिस्से के प्यार इस डर से अपने बच्चों को देती है कि कहीं उसके अपने ही बच्चे उसे बहुत कमज़ोर और बेचारी न बना दें। ये रंगभेद और नस्लभेद, गरीबी और गुलामी के बीच अपने बच्चों को पालने वाली मांएं हैं। ये वो मांएं हैं जो अपने बच्चों को बेचने की बजाए उन्हें मार डालना ज़्यादा उचित समझती हैं। ये वो मांएं हैं जो रचती भी हैं, विनाश भी करती हैं।
और इन सब किरदारों को रचनेवाली मां है टोनी मॉरिसन। टोनी ने जब अपनी पहली किताब - द ब्लुएस्ट आई - शुरू की, वो एक नौकरी करने के साथ-साथ दो बेटों को अकेले पाल रही थीं। नौकरी पर जाने से पहले हर सुबह चार बजे लिखने के लिए उठती थीं। बकौल टोनी, जब भी उनकी हिम्मत जवाब देने लगती, वो अपनी दादी के बारे में सोचतीं जो ग़ुलामी और बेइज़्जती की ज़िन्दगी से बचने के लिए एक दिन अपने सात बच्चों के साथ दक्षिण से भाग आई थी। तब पेट भरने का भी कोई साधन नहीं था उनके पास। लेकिन मां का एक रूप ये भी होता है कि वो हर हाल में अपने बच्चों के पेट भरने का इंतज़ाम कर ही लेती है, चाहे उसे कृपी की तरह दूध के नाम पर पानी में आटा ही घोलकर क्यों न पिलाना पड़े।
टोनी का इंटरव्यू पढ़ते हुए लगता है कि कोई तीसरी आंख है जो खुल गई है भीतर। मैं हर रोज़ तो देखती हूं ये, फिर इस बात का यकीन क्यों नहीं होता कि बच्चों की ज़रूरतें बहुत कम होती हैं। बच्चों की ज़रूरतों से ज़्यादा मां के ज़ेहन में उसे ही काट खाने को बैठा गिल्ट होता है। उससे भी बड़ी रोज़-रोज़ की जद्दोज़ेहद होती है।
जो मां कामकाजी या 'ambitious' होती है, उसके लिए ये संघर्ष और भी बड़ा हो जाता है क्योंकि मां के तौर पर आपके सिर पर रोल मॉडल बन जाने का दबाव भी होता है।
चाहे जो भी हो, मां हैं आप तो अपने बच्चों के सामने बिखर नहीं सकते। उनके सामने कमज़ोर नहीं पड़ सकते। आपको हारते-टूटते हुए देखना आपके बच्चों के लिए सबसे बड़ा सदमा होता है। आपके बच्चे आपको एक adult, एक समझदार adult के तौर पर देखना चाहते हैं। और बच्चों को याद नहीं रहता कि उनकी मां के बाल कैसे हुआ करते थे। उन्हें ये ज़रूर याद रहता है कि हर हाल में मां ने सेंस ऑफ ह्यूमर कैसे बचाए रखा था अपना। ये याद रहता है कि अपनी विपरीत परिस्थितियों से हंसते हुए कैसे जूझा करती थी मां।
बच्चे अगर मां की ज़िन्दगी के दिए हुए लम्हों का योग हैं, तो फिर उनकी ख़ातिर अपने सपनों को बचाए रखना और ज़रूरी हो जाता है। टुकड़ों-टुकड़ों में अपने सपने जीकर दिखाएंगे बच्चों को, तो उन्हें अपने नामुमकिन सपनों पर यकीन होगा। इसके एवज में कई छोटे-छोटे लम्हों की क़ुर्बानियां देनी होती हैं, जिनमें उनके लिए हर शाम ठीक पांच बजे आटे का हलवा बना पाने का संतोष भी होता है।
इसलिए, सारे सवाल बेमानी हैं।
मैं टोनी मॉरिसन को थैंक यू बोलने को उठने को ही हूं कि देखती हूं, वो बुज़ुर्ग महिला फोन पर हंस-हंसकर बात कर रही है। फिर वो फोन अपने साथ बैठे अपने पति की ओर बढ़ा देती है। उनके चेहरों पर आई चमक गौतम सिद्धार्थ ने देखी होती न, तो सिद्धि यहीं मिल गई होती। जरा, मरण और दुखों से मुक्ति दिलाने के लिए जिस मार्ग की खोज में सिद्धार्थ ने घर छोड़ा, उसी घर में अपने नवजात शिशु को बड़ा करते हुए, अपने वृद्ध सास-ससुर की सेवा करते हुए, अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए, अपनी परिस्थितियों के ठीक बीचों-बीच ज़िन्दगी से जूझते हुए साध्वी यशोधरा ने निर्वाण की राह ढूंढ ली। गृहत्याग तभी किया जब कर्तव्यों को पूरा कर लिया. अपने कर्मों को जी लिया।
अभी कुछ देर पहले तक जिसकी लाचारी ने भीतर तक परेशान किया था, उसी कर्मठ बुज़ुर्ग औरत के लिए बहुत सारा प्यार उमड़ आया मन में। बेचैनी और सुकून के बीच एक नैनोसेकेंड की दूरी होती है। सब खेल मन का है।
जवाब मिल गया है। अपने कर्मों को हर दिन जीने में। अपने हालातों को बदलने के लिए बेचैन होने से ज़्यादा उसी के बीच से रास्ता निकालने में।
अब मैं किसी सुपर सक्सेसफुल मदर के बारे में नहीं जानना चाहती।
ज़िन्दगी की जंग का फ़ैसला एक दिन, एक हफ्ते, एक महीने, एक साल में नहीं होता। ज़िन्दगी की जंग आख़िरी सांस तक लड़ी जाती है और ये जो जीत और हार का अहसास है न, वो व्यक्ति सापेक्ष होता है - सफलता की परिभाषा की तरह। और ये पैमाने हम तय करते हैं अपने लिए। कोई और नहीं करता।
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Motherhood
शुक्रवार, 15 नवंबर 2013
बच्चे नहीं, हम बिगड़े हुए हैं
कौटिल्य पंडित को
टीवी पर देखकर दिमाग में जो पहली बात आई थी, उसके बारे में सोचकर मझे कई बार
अफ़सोस हो चुका है। मैंने सोचा, “कौटिल्य नाम का ये
जीनियस मेरे बच्चों से तो सिर्फ एक साल छोटा है!” जितनी तेज़ी से ये ख़्याल मेरे मन में आया, उतनी
ही संजीदगी से ये बात भी ज़ेहन में आई कि ख़ुद को जागरुक और संवेदनशील बताने वाले
हम मां-बाप भी आख़िर किस हद तक ढोंगी हो सकते हैं! हम सब तमगे चाहते हैं, ट्रॉफी किड्स चाहते हैं –
उस तरह के बच्चे जिनका घर, बाहर, समाज और यहां तक कि सोशल मीडिया पर दिखावा करने
का मौका मिल सके।
बच्चों को लेकर
हमारी प्रतिस्पर्धा उनके पैदा होते ही शुरू हो जाती है। बच्चे किस अस्पताल में
पैदा हुए, और कितने बड़े पेडियाट्रिशियन के पास से हमने टीके लगवाए - यहां से शुरू
हुई ये स्पर्धा उनके बैठने, बोलने, चलने और कब कितना क्या-क्या कहा के हिसाब के
तौर पर स्क्रैप-बुक्स, एलबम्स और लाइव स्टेटस अपडेट्स में जमा होने लगी है। मैं
मानती हूं कि अपने बच्चों को बड़ा करना एक किस्म का सेलीब्रेशन होना चाहिए - एक
किस्म का जश्न-ए-बचपन - क्योंकि बच्चों को बड़ा करने के साथ-साथ हम भी न सिर्फ अपना
बचपन जी रहे होते हैं, बल्कि उनके साथ-साथ ख़ुद भी बड़े हो रहे होते हैं। बच्चे
हमें सब्र का पाठ पढ़ाते हैं। बच्चे हमें प्यार करना सीखाते हैं। बच्चे हमें जीने
का सलीका बताते हैं। लेकिन इसका मतलब बच्चों के साथ हमेशा परफेक्ट होने की
ज़्यादती करना कतई नहीं हो सकता।
लेकिन बदकिस्मती से हमने
एक ऐसा समाज बना लिया है जो बच्चों की मासूमियत और उनका बचपन छीनने का काम बख़ूबी
और सीना ठोक कर करता है। ये वो समाज है जहां हमारे बच्चों की आंखों पर पट्टियां
लगाकर उन्हें ज़िन्दगी की रेस में तभी छोड़ दिया जाता है जब उनकी उम्र अपनी सीधे
खड़े होने की भी नहीं हुई होती। इसके पीछे बड़ा कारण एक ही है – हमें पेरेन्ट्स या
अभिभावक के तौर पर खुद को अव्वल साबित करना है। इसलिए बच्चों की परवरिश हमारे लिए
वो प्रोजेक्ट हो जाती है जिसमें ए-प्लस हासिल करना ज़िन्दगी का सबसे बड़ा लक्ष्य
बन जाता है।
हमारे बच्चे किस
स्कूल में पढ़ते हैं, स्कूल से आने के बाद कितनी तरह की हॉबी क्लासेस में जाते
हैं, क्लासिकल संगीत के साथ-साथ टेनिस क्लासेस के लिए जाते हैं या नहीं, स्कूल में
ग्रेड्स कैसे लेकर आते हैं, उनका बर्ताव कैसा है, उनकी शख़्सियत कैसी है – इन सारी
बातों पर हमारी लम्हा-लम्हा नज़र होती है। हम अपने काम में चाहे कितने ही फिसड्डी
क्यों न हों, जाड़े की सुबह दफ़्तर जाने के लिए रजाई को छोड़ने से पहले बॉस को
कितनी ही गालियां क्यों न दे दें, ख़ुद दूसरों से किस तरह पेश आते हैं उसके बारे
में भले कभी न सोचा है, लेकिन बच्चे हमें परफेक्ट चाहिए। अपनी अपेक्षाओं का भार
अपने बच्चों को कोमल कंधों पर रखते हुए हमें ज़रा भी हिचक नहीं होती। क्यों भला?
मैं एक और वाकया
सुनाती हूं। गर्मी की छुट्टियां काटने के लिए दोपहर में अपने पांच साल के जुड़वां
बच्चों को मैंने ड्राईंग कॉपी और वॉटर कलर के डिब्बे पकड़ा दिए थे। बच्चों को भी
बड़ा ज़ा आ रहा था। जब तक बच्चे मेरे अपेक्षा के मुताबिक ब्रश को कलर में डुबो के
आराम से पेंटिंग करते रहे, मैं उनकी तस्वीरें खींचती रही, वीडियो लेती रही। इन
सभ्य और कलाकार बच्चों पर नाज़ करती रही। बच्चे तो बच्चे ठहरे। थोड़ी देर में उनका
मन ड्राईंग बुक से ऊब गया और उन्हें रंगों के साथ खेलने में इतना मज़ा आने लगा कि
उनके शरीर, चेहरे और हथेलियां पर देखते ही देखते मॉडर्न आर्ट के कई डिज़ाईन उतर
गए। पूरा रंग कमरे में और फर्श पर बिखर चुका था। खेल-खेल में सूरत ऐसी बिगड़ी कि
मुझे तेज़ गुस्सा आ गया। अभी दस मिनट पहले मैं जिन ‘सभ्य’ और ‘परिष्कृत’ बच्चों पर फ़ख्र कर रही थी, वही बच्चे अब मेरी
नाराज़गी की चपेट में आ चुके थे।
किसने तय किया कि
बच्चे कैसे पेंटिंग करेंगे? उनके हमेशा बच्चों के तरीके से काम करने की अपेक्षा
क्यों की जाती है? हम इतनी सारी बंदिशों में क्यों रखते हैं उनको? उन्हें उनके
तरीके से जीने देने में हमें इतनी तकलीफ़ क्यों होती है? सच तो ये है कि उन्हें
उनके तरीके से हम तभी जीने देते हैं जब हमारी सहूलियत की बात आती है। हमारे पास
वक़्त नहीं है तो उन्हें टीवी देखने दिया। हम शाम को वक्त पर घर नहीं लौट पाए तो
उनके लिए खिलौने ले आए। हमारे पास उनके दोस्तों से मिलने और उन्हें जानने का वक्त
नहीं है तो उन्हें मॉल ले गए। हमारे पास उनकी पसंद का खाना बनाने की फ़ुर्सत नहीं
है तो उन्हें पिज़्जा और बर्गर खिला दिया। अपनी सहूलियत के हिसाब से सब ठीक, लेकिन
जब बच्चों ने इनमें से कुछ भी अपनी मर्ज़ी से मांगा तो हमने बड़ी आसानी से कह
दिया, “आजकल के बच्चे ही बिगड़े हुए हैं।”
बच्चे बिगड़े हुए
नहीं हैं। हम बिगड़ चुके हैं। हमारे बच्चे हमारा ही प्रतिबिंब होते हैं। उनकी सोच,
उनके रहन-सहन, उनके तौर-तरीकों में हमारी शख़्सियत ही झलकती है और ये बात
वैज्ञानिक रूप से साबित भी हो चुकी है। एक बेहतर समाज बन सके, इसके लिए बहुत
ज़रूरी है कि हम बच्चों के लिए एक अच्छा माहौल बनाएं। इस गलाकाट और बेरहम दुनिया
में बच्चों का तो क्या, हमारा भी गुज़ारा मुश्किल से हो रहा है। बच्चों की
ज़रूरतें सुविधाएं, विलासिता, आईपैड और मोबाइल फोन नहीं, हमारा वक्त और हमारा
प्यार है। अपने बच्चों का प्यार से पालन-पोषण करना अपने भीतर प्यार और इंसानियत
बचाए रखने का सबसे कारगर तरीका है और बच्चों को उनके हिस्से का प्यार और सम्मान
मिले, इसके लिए हर बच्चे का कौटिल्य पंडित होना भी कतई ज़रूरी नहीं।
('खुशबू' में प्रकाशित कवर स्टोरी - लिंक है http://dailynewsnetwork.epapr.in/184374/khushboo/13-11-2013#page/1/1)
सोमवार, 17 जून 2013
गर्मी छुट्टी डायरिज़: जापानी कहानी और टूटा हुआ चांद
दिन भर हम क्या करते रहते हैं, एक यही सवाल बस न पूछो। दिन फिर भी कैसी-कैसी बेचैनियों में निकल जाता है। जेठ की दोपहर में एक ज़रूरी काम धूप की चाल के साथ-साथ अपने बैठने-सोने की जगह बदलना भी है। रात जिस कमरे में पुरवैया का इंतज़ार करते बीतती है, वो कमरा पौ फटते ही छूट जाता है। सुबह उमसभरी हैं इन दिनों और हवाएं सुबह-सुबह आती हैं हल्की-हल्की। इतनी ही हल्की, कि पूअर्स मैन दार्जिलिंग पूर्णियां में होने का भ्रम न टूटे। इसलिए बेचैनी में कभी आंगन में, कभी छत पर बाद-ए-सबा की पूंछ पकड़ने की कोशिश में सुबह के कोई एक घंटे को निकल ही जाते हैं।
बाकी के एकाध घंटे खिड़की पर लटके हुए आमों को गिनने में जाते हैं - कल दोपहर चौंतीस थे दाईं डाली पर। आज उनतीस हैं। उसमें भी एक को तोते ने जूठा कर दिया। फिर मां के पीछे-पीछे छत पर। मां कबूतरों को दाने डालती हैं और मैं देर तक देखती रहती हूं कि कौन-सा जोड़ा उड़कर किस ओर जा रहा है। अगली सुबह उनको पहचानने का खेल। सफ़ेद गर्दन वाले मटमैले कबूतर को तो यादव जी के घर की मुंडेर पर जाते देखा था, फिर आज मिथिलेश अंकल के घर की तरफ़? गहरी धारियों वाला सफ़ेद कबूतर रंगभूमि मैदान की तरह, बाएं पैर से उचक कर चलने वाला पीले वाले मकान की तरफ़... सबके अपने पते। सबके अपने घोंसले। सबका अपना काम।
बच्चों के उठने के बाद थोड़ी-सी हलचल नहीं। ब्रश करो, नहाओ, दूध पियो, आम खाओ की धाराप्रवाह हिदायतें। उसके बाद फिर लंबी ख़ामोशी। बच्चों को ख़ुद से ही फ़ुर्सत नहीं। उनके पास मसरूफ़ रहने के इतने तरीके हैं कि उनसे रश्क़ होता है। और नहीं तो रामजी के किसी तोते को पालतू बनाने लगेंगे। किसी बिरनी के पीछे आधे घंटे दौड़ लगाएंगे। कबूतरों को पानी देंगे। उन्हें रोटी के टुकड़े खिलाएंगे। काग़ज़ के हवाई जहाज़ बनाएंगे और उन्हें अपनी फ़ूकों से उड़ाएंगे। आम की टोलियां बनाएंगे और उनके बीच बिठाएंगे आमदेव महाराज। हर लम्हा एक नया फ़साना, हर घंटे एक नई कहानी। उनकी नज़रों से देखती रहती हूं तभी तक सबकुछ ठीक लगता है। उनकी कसौटी पर कसते हुए ख़ुद को सही-ग़लत का पाठ पढ़ाती रहती हूं। मैं उन्हें अनुशासित नहीं करती, वो मुझे करते हैं। मैं उन्हें बड़ा नहीं कर रही, वो मुझे कर रहे हैँ। सारी कोशिशें उन्हीं की ख़ातिर है। ज़िन्दगी के किताब का उनवान भी वही, अंजाम भी वही।
दोपहर होते-होते एक और खेल शुरू हो गया है। पुराने बक्सों से बच्चों के कपड़े निकल आए हैं। दोनों एक-एक करके उन कपड़ों को ला-लाकर डायनिंग टेबल पर रखते जाते हैं, जहां मैं बैठकर एक रिपोर्ट लिखने की नाकाम कोशिश कर रही हूं। मोज़े उंगलियों में आ जाते हैं, टोपियां सिर में बांध ली जाती हैं, पायजामे गले का हार बन गए हैं, एक पुराने दुपट्टे की आद्या ने साड़ी लपेट ली है, आदित ने शॉल की धोती बना ली है। खेल कई घंटे चलता है, और मैं काम छोड़कर उनके एक-एक कपड़े की याद ताज़ा करने में लग गई हूं। ये जंपसूट कोलकाता से लिया था, ये लाल टोपी चाची ने बनाई थी, ये नीली फ्रॉक लिंकिंग रोड से आई थी... फिर संभालती हूं खुद को। बच्चों को देखो - यादों को भी खेलने का सामान बना लिया। कितने मशगूल फिर कैसे उदासीन! और एक हम हैं कि जहां होते हैं, वहां होते नहीं और जहां होना नहीं चाहिए, अक्सर वहीं होते हैं।
खेल समेट लिया गया है और अब पूरी संजीदगी के साथ नया खेल शुरू हो गया है। एक बाबा के सिर की बनफूल से चंपी कर रहा है, दूसरा पीठ पर पाउडर मल रहा है। बाबा बच्चे हो गए हैं, बच्चे बाबा। हम दोनों पार्टियों के लिए चीयर कर रहे हैं। अचानक बच्चों को टीवी की याद आई है। डोरेमॉन, नोबिता, शुज़ुका, जियान और सुनियो के बग़ैर इतने दिन कट गए, यही कम है? फिर ढेर-सारा टीवी है और ममा की ढेरी-सारी कोफ़्त है। इतनी ही कि मैं उन्हें सज़ा सुना देती हूं - जो टीवी पर देखो वो मुझे कहानी लिखकर दिखाओ, पांच लाईन में। दोनों बच्चों ने हामी भर दी है।
अब शाम है, छत है और झूला है। आद्या मुझे आसमान पर टंगे टूटे हुए चांद की कहानी सुना रही है। चांद तारों के साथ आसमान में लुका-छिपी खेल रहा होता है, इसलिए कभी पूरा दिखता है कभी टूटा हुआ। राकासुर चांद को निगल जाना चाहता है ताकि उसकी दुल्हन को ले जा सके, लेकिन चांद की दुल्हन हर बार कूदकर ज़मीन पर आ जाती है और भाग जाती है। जिस रात राकासुर के आने का डर नहीं होता उस रात चांद अपनी पूरी शक्ल दिखा कर दुल्हन को वापस आसमान आने को कहता है...
कहानी के बीच में मुझे कुछ याद आता है...
"ममा ने जो काम दिया वो किया?"
"किया ममा। पांच लाईन्स क्या, एक पेज लिख दिया। लेकिन आपको जापानी पढ़नी थोड़े आती है!"
मैं हंस देती हूं और सोचती हूं कि ऐसे दिन बहुत अच्छे होते हैं कि जिस दिन आप अपने बच्चों से टूटे हुए चांद की मनगढंत कहानियां सुनते हैं। उस दिन ख़ुद के किए कई बड़े फ़ैसलों पर यकीन पुख़्ता हो जाता है।
बाकी के एकाध घंटे खिड़की पर लटके हुए आमों को गिनने में जाते हैं - कल दोपहर चौंतीस थे दाईं डाली पर। आज उनतीस हैं। उसमें भी एक को तोते ने जूठा कर दिया। फिर मां के पीछे-पीछे छत पर। मां कबूतरों को दाने डालती हैं और मैं देर तक देखती रहती हूं कि कौन-सा जोड़ा उड़कर किस ओर जा रहा है। अगली सुबह उनको पहचानने का खेल। सफ़ेद गर्दन वाले मटमैले कबूतर को तो यादव जी के घर की मुंडेर पर जाते देखा था, फिर आज मिथिलेश अंकल के घर की तरफ़? गहरी धारियों वाला सफ़ेद कबूतर रंगभूमि मैदान की तरह, बाएं पैर से उचक कर चलने वाला पीले वाले मकान की तरफ़... सबके अपने पते। सबके अपने घोंसले। सबका अपना काम।
बच्चों के उठने के बाद थोड़ी-सी हलचल नहीं। ब्रश करो, नहाओ, दूध पियो, आम खाओ की धाराप्रवाह हिदायतें। उसके बाद फिर लंबी ख़ामोशी। बच्चों को ख़ुद से ही फ़ुर्सत नहीं। उनके पास मसरूफ़ रहने के इतने तरीके हैं कि उनसे रश्क़ होता है। और नहीं तो रामजी के किसी तोते को पालतू बनाने लगेंगे। किसी बिरनी के पीछे आधे घंटे दौड़ लगाएंगे। कबूतरों को पानी देंगे। उन्हें रोटी के टुकड़े खिलाएंगे। काग़ज़ के हवाई जहाज़ बनाएंगे और उन्हें अपनी फ़ूकों से उड़ाएंगे। आम की टोलियां बनाएंगे और उनके बीच बिठाएंगे आमदेव महाराज। हर लम्हा एक नया फ़साना, हर घंटे एक नई कहानी। उनकी नज़रों से देखती रहती हूं तभी तक सबकुछ ठीक लगता है। उनकी कसौटी पर कसते हुए ख़ुद को सही-ग़लत का पाठ पढ़ाती रहती हूं। मैं उन्हें अनुशासित नहीं करती, वो मुझे करते हैं। मैं उन्हें बड़ा नहीं कर रही, वो मुझे कर रहे हैँ। सारी कोशिशें उन्हीं की ख़ातिर है। ज़िन्दगी के किताब का उनवान भी वही, अंजाम भी वही।
दोपहर होते-होते एक और खेल शुरू हो गया है। पुराने बक्सों से बच्चों के कपड़े निकल आए हैं। दोनों एक-एक करके उन कपड़ों को ला-लाकर डायनिंग टेबल पर रखते जाते हैं, जहां मैं बैठकर एक रिपोर्ट लिखने की नाकाम कोशिश कर रही हूं। मोज़े उंगलियों में आ जाते हैं, टोपियां सिर में बांध ली जाती हैं, पायजामे गले का हार बन गए हैं, एक पुराने दुपट्टे की आद्या ने साड़ी लपेट ली है, आदित ने शॉल की धोती बना ली है। खेल कई घंटे चलता है, और मैं काम छोड़कर उनके एक-एक कपड़े की याद ताज़ा करने में लग गई हूं। ये जंपसूट कोलकाता से लिया था, ये लाल टोपी चाची ने बनाई थी, ये नीली फ्रॉक लिंकिंग रोड से आई थी... फिर संभालती हूं खुद को। बच्चों को देखो - यादों को भी खेलने का सामान बना लिया। कितने मशगूल फिर कैसे उदासीन! और एक हम हैं कि जहां होते हैं, वहां होते नहीं और जहां होना नहीं चाहिए, अक्सर वहीं होते हैं।
खेल समेट लिया गया है और अब पूरी संजीदगी के साथ नया खेल शुरू हो गया है। एक बाबा के सिर की बनफूल से चंपी कर रहा है, दूसरा पीठ पर पाउडर मल रहा है। बाबा बच्चे हो गए हैं, बच्चे बाबा। हम दोनों पार्टियों के लिए चीयर कर रहे हैं। अचानक बच्चों को टीवी की याद आई है। डोरेमॉन, नोबिता, शुज़ुका, जियान और सुनियो के बग़ैर इतने दिन कट गए, यही कम है? फिर ढेर-सारा टीवी है और ममा की ढेरी-सारी कोफ़्त है। इतनी ही कि मैं उन्हें सज़ा सुना देती हूं - जो टीवी पर देखो वो मुझे कहानी लिखकर दिखाओ, पांच लाईन में। दोनों बच्चों ने हामी भर दी है।
अब शाम है, छत है और झूला है। आद्या मुझे आसमान पर टंगे टूटे हुए चांद की कहानी सुना रही है। चांद तारों के साथ आसमान में लुका-छिपी खेल रहा होता है, इसलिए कभी पूरा दिखता है कभी टूटा हुआ। राकासुर चांद को निगल जाना चाहता है ताकि उसकी दुल्हन को ले जा सके, लेकिन चांद की दुल्हन हर बार कूदकर ज़मीन पर आ जाती है और भाग जाती है। जिस रात राकासुर के आने का डर नहीं होता उस रात चांद अपनी पूरी शक्ल दिखा कर दुल्हन को वापस आसमान आने को कहता है...
कहानी के बीच में मुझे कुछ याद आता है...
"ममा ने जो काम दिया वो किया?"
"किया ममा। पांच लाईन्स क्या, एक पेज लिख दिया। लेकिन आपको जापानी पढ़नी थोड़े आती है!"
मैं हंस देती हूं और सोचती हूं कि ऐसे दिन बहुत अच्छे होते हैं कि जिस दिन आप अपने बच्चों से टूटे हुए चांद की मनगढंत कहानियां सुनते हैं। उस दिन ख़ुद के किए कई बड़े फ़ैसलों पर यकीन पुख़्ता हो जाता है।
लेबल:
डायरी,
संस्मरण,
Motherhood
शनिवार, 15 जून 2013
गर्मी छुट्टी डायरिज़ - हमसे दीवाने भी दुनिया की ख़बर रखते हैं
मेरी एक दोस्त ने सुबह-सुबह मुझे व्हॉट्सएप्प पर एक लिंक भेजा। यहां पूर्णियां में अंग्रेज़ी का अख़बार नहीं आता। इसलिए क्योंकि कोई पढ़नेवाला नहीं, और दूसरे दिन अख़बार पढ़ने का कोई मतलब नहीं है। मैं यूं भी अख़बार ख़बर के लिए कम, बीच के पन्नों और कॉलमों के लिए अधिक पढ़ती हूं। अख़बार है नहीं, तो आज सुबह इंडियन एक्सप्रेस में छपा एक दिलचस्प कॉलम पढ़ने से रह गई। आप भी पढ़िए इसे - लहर काला ने ओवरशेयरिंग द स्टोरी ऑफ़ मी के नाम से लिखा है इसे।
हां, हम सब आजकल अपने बारे में लिख रहे हैं, पोस्ट कर रहे हैं, बात कर रहे हैं। हां, ये भी सच है कि हममें से कुछ लोग इसलिए यहां हैं क्योंकि हम लगातार अपने बच्चों के बारे में, उनकी परवरिश के बारे में लिख रहे हैं। हां, ये भी सच है कि हमारे फ़ेसबुक अपडेट्स, हमारे ब्लॉग्स तक इसी एक पेरेन्टिंग के इर्द-गिर्द घूमा करते हैं। और अगर प्रिंट मीडिया हमारे विचारों को छाप रहा है तो इसलिए नहीं क्योंकि पेरेन्टिंग अचानक 'द इन थिंग' हो गया, बल्कि इसलिए क्योंकि 'मदरहुड' या 'पेरेन्टिंग' को कभी तवज्जो दी नहीं गई, कभी इस बारे में बात भी नहीं की गई।
मैं आमतौर पर किसी पोस्ट या किसी कॉलम पर तीखी प्रतिक्रिया ज़ाहिर नहीं करती। मैं हर लिहाज़ से सबकी आवाज़ों के होने और सबकी अभिव्यक्ति के तरीकों की इज्ज़त करने में यकीन करती हूं। हम सबको अपनी-अपनी बात पब्लिक स्पेस में आकर रखने का हक़ है, और एक पाठक को उस विचार से इत्तिफ़ाक़ रखने या उसे सिरे से ख़ारिज़ कर देने का हक़ है।
मैं इस कॉलम को पढ़कर इसलिए परेशान हुई क्योंकि लेखिका ने उन सभी लिखने वालों की धज्जियां उड़ाई हैं जो मां हैं, या मदरहुड पर, ज़िन्दगी के, समाज के छोटे-बड़े मसलों पर अपनी राय लिख रही हैं, अपने विचार पेश कर रही हैं। मेरा सवाल इतना-सा है कि जर्नलिज़्म सिर्फ़ फ्रंटलाईन वॉर अनुभव के बारे में लिखना, सिर्फ़ राजनैतिक उठापटक की बेमानी ख़बरें परोसना और सिर्फ़ विदेश मामलों और स्पॉट फिक्सिंग पर अपनी 'ओरिजनल' राय रखना होता है?
चलिए समाज की बेसिक संरचना पर एक नज़र डालते हैं जिसे समझने के लिए न आपको समाजशास्त्री होने की ज़रूरत है न 'जर्नलिस्ट' या लेखक ही। दुनिया कैसे बनती है? कई देशों से। देश कैसे बने? कई तरह के समाजों से। समाज की धुरी क्या? परिवार। और परिवार की नींव कहां पर? हममें-आपमें। इसी मूलभूत संरचना के तहत अगर हम-आप अपने परिवार को बनाने-बचाए रखने, ख़ुश रखने, उनकी परवरिश करने और देखभाल करने में कोताही करेंगे तो फिर किस तरह के समाज का निर्माण करेंगे हम? हमने अपने बच्चों को एक ख़ुशमिज़ाज, आत्मविश्वासी, ईमानदार इंसान नहीं बनाया तो देश को क्या दिया? और अपना काम करते हुए हमने उस प्रक्रिया के बारे में पब्लिक स्पेस में आकर अपने अनुभव बांटे, अपनी चुनौतियों पर चर्चा की, पेरेन्टिंग के तरीकों की बात की, बच्चों के बारे में बताया तो इसे आत्म-श्लाघा का नाम दे दिया गया?
पब्लिक स्पेस में आकर अपनी ज़िन्दगियों के बारे में बात करने का मकसद सहानुभूति जुटाना कतई नहीं होता। यहां आकर अपने बारे में बात करने का मकसद उन गलत-सही सीखों को बांटना होता है जो ज़िन्दगी जीते हुए हमारे रास्ते में पड़ते हैं। ये छोटे-छोटे लम्हे विदेशी नीतियां तय नहीं करेंगे, लेकिन ये छोटे-छोटे लम्हे उस समाज के प्रतिरूप को रिकॉर्ड करने का, उन्हें डॉक्युमेंट करने का काम उतनी ही ईमानदारी से करेंगे जितनी ईमानदारी से एक मशहूर पत्रकार की किताब करती है।
हम लम्हों में जीने वाले लोग हैं। हम हर दिन कुछ नया देखने का जज्बा देखने वाले लोग हैं। हम बुद्धिजीवी या ज़हीन होने का दावा नहीं करते। हम तो वो औरतें, वो मांएं हैं जिनमें साधारण को, ऑर्डिनरी को ख़ास बना देने का हुनर है। हमने जो अपने नज़रिए से देखा, वो बांटा। हमारी रसोई, हमारा घर, हमारे बच्चे, हमारी दुनिया बेशक बेहद निजी हैं - लेकिन इस निजता में जो सार्वभौमिक हो सकता है, हम वो बांटने आते हैं। और यदि किसी को ये लगता है कि खलबली ही ग्रेट राइटिंग हो सकती है, ठहराव नहीं, तो फिर... आई रेस्ट माई केस योर ऑनर।
मगर जाते-जाते जांनिसार अख़्तर का ये शेर पढ़ते जाएं...
हम से इस दरजा तग़ाफुल भी न बरतो साहब
हम भी कुछ अपनी दुआओं में असर रखते हैं
हां, हम सब आजकल अपने बारे में लिख रहे हैं, पोस्ट कर रहे हैं, बात कर रहे हैं। हां, ये भी सच है कि हममें से कुछ लोग इसलिए यहां हैं क्योंकि हम लगातार अपने बच्चों के बारे में, उनकी परवरिश के बारे में लिख रहे हैं। हां, ये भी सच है कि हमारे फ़ेसबुक अपडेट्स, हमारे ब्लॉग्स तक इसी एक पेरेन्टिंग के इर्द-गिर्द घूमा करते हैं। और अगर प्रिंट मीडिया हमारे विचारों को छाप रहा है तो इसलिए नहीं क्योंकि पेरेन्टिंग अचानक 'द इन थिंग' हो गया, बल्कि इसलिए क्योंकि 'मदरहुड' या 'पेरेन्टिंग' को कभी तवज्जो दी नहीं गई, कभी इस बारे में बात भी नहीं की गई।
मैं आमतौर पर किसी पोस्ट या किसी कॉलम पर तीखी प्रतिक्रिया ज़ाहिर नहीं करती। मैं हर लिहाज़ से सबकी आवाज़ों के होने और सबकी अभिव्यक्ति के तरीकों की इज्ज़त करने में यकीन करती हूं। हम सबको अपनी-अपनी बात पब्लिक स्पेस में आकर रखने का हक़ है, और एक पाठक को उस विचार से इत्तिफ़ाक़ रखने या उसे सिरे से ख़ारिज़ कर देने का हक़ है।
मैं इस कॉलम को पढ़कर इसलिए परेशान हुई क्योंकि लेखिका ने उन सभी लिखने वालों की धज्जियां उड़ाई हैं जो मां हैं, या मदरहुड पर, ज़िन्दगी के, समाज के छोटे-बड़े मसलों पर अपनी राय लिख रही हैं, अपने विचार पेश कर रही हैं। मेरा सवाल इतना-सा है कि जर्नलिज़्म सिर्फ़ फ्रंटलाईन वॉर अनुभव के बारे में लिखना, सिर्फ़ राजनैतिक उठापटक की बेमानी ख़बरें परोसना और सिर्फ़ विदेश मामलों और स्पॉट फिक्सिंग पर अपनी 'ओरिजनल' राय रखना होता है?
चलिए समाज की बेसिक संरचना पर एक नज़र डालते हैं जिसे समझने के लिए न आपको समाजशास्त्री होने की ज़रूरत है न 'जर्नलिस्ट' या लेखक ही। दुनिया कैसे बनती है? कई देशों से। देश कैसे बने? कई तरह के समाजों से। समाज की धुरी क्या? परिवार। और परिवार की नींव कहां पर? हममें-आपमें। इसी मूलभूत संरचना के तहत अगर हम-आप अपने परिवार को बनाने-बचाए रखने, ख़ुश रखने, उनकी परवरिश करने और देखभाल करने में कोताही करेंगे तो फिर किस तरह के समाज का निर्माण करेंगे हम? हमने अपने बच्चों को एक ख़ुशमिज़ाज, आत्मविश्वासी, ईमानदार इंसान नहीं बनाया तो देश को क्या दिया? और अपना काम करते हुए हमने उस प्रक्रिया के बारे में पब्लिक स्पेस में आकर अपने अनुभव बांटे, अपनी चुनौतियों पर चर्चा की, पेरेन्टिंग के तरीकों की बात की, बच्चों के बारे में बताया तो इसे आत्म-श्लाघा का नाम दे दिया गया?
पब्लिक स्पेस में आकर अपनी ज़िन्दगियों के बारे में बात करने का मकसद सहानुभूति जुटाना कतई नहीं होता। यहां आकर अपने बारे में बात करने का मकसद उन गलत-सही सीखों को बांटना होता है जो ज़िन्दगी जीते हुए हमारे रास्ते में पड़ते हैं। ये छोटे-छोटे लम्हे विदेशी नीतियां तय नहीं करेंगे, लेकिन ये छोटे-छोटे लम्हे उस समाज के प्रतिरूप को रिकॉर्ड करने का, उन्हें डॉक्युमेंट करने का काम उतनी ही ईमानदारी से करेंगे जितनी ईमानदारी से एक मशहूर पत्रकार की किताब करती है।
हम लम्हों में जीने वाले लोग हैं। हम हर दिन कुछ नया देखने का जज्बा देखने वाले लोग हैं। हम बुद्धिजीवी या ज़हीन होने का दावा नहीं करते। हम तो वो औरतें, वो मांएं हैं जिनमें साधारण को, ऑर्डिनरी को ख़ास बना देने का हुनर है। हमने जो अपने नज़रिए से देखा, वो बांटा। हमारी रसोई, हमारा घर, हमारे बच्चे, हमारी दुनिया बेशक बेहद निजी हैं - लेकिन इस निजता में जो सार्वभौमिक हो सकता है, हम वो बांटने आते हैं। और यदि किसी को ये लगता है कि खलबली ही ग्रेट राइटिंग हो सकती है, ठहराव नहीं, तो फिर... आई रेस्ट माई केस योर ऑनर।
मगर जाते-जाते जांनिसार अख़्तर का ये शेर पढ़ते जाएं...
हम से इस दरजा तग़ाफुल भी न बरतो साहब
हम भी कुछ अपनी दुआओं में असर रखते हैं
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शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013
चोट, स्टिच और कविता
किसने कहा था कि मेरी ज़ुबान काली है? किसने कहा था कि सपनों में आने वाले दिनों के संकेत छुपे होते हैं? जाने किसने कहा था, लेकिन दोनों बातें सौ फ़ीसद सही निकलीं - उन तमाम अंदेशों की तरह जो मेरे दोस्त, मेरे शुभचिंतक हमेशा मेरे लिए ज़ाहिर किया करते हैं और जिन्हें नज़रअंदाज़ करते हुए मैं अपनी धुन में चलती चली जाती हूं। ठोकर हर हाल में लगनी है। बेहतर है कि ख़ुद के चुने रास्ते पर ख़ुद की शर्तों के साथ ठोकरें खाई जाएं।
बहरहाल, भूमिका बहुत हुई और मैं मुद्दे पर आती हूं। तो सपना ख़ौफ़नाक तरीके से सच निकला। आदित को चोट लगी आज। बुरी तरह। मैं घर पर नहीं थी और मेरे पास आद्या का फ़ोन आया। "मम्मा, जल्दी आओ। आदित गिर गया और और उसको बहुत-बहुत सारा ख़ून निकल रहा है।"
मैं घर में मौजूद इकलौती वयस्क - बच्चों की मौसी रुचि से बात करना चाहती थी। "मौसी फ़ोन पर नहीं आ सकती। वो आदित को बाथरूम में लेकर खड़ी है। उसके मुंह से ख़ून निकलना बंद नहीं हो रहा।"
आनन-फ़ानन में दो-चार नसीहतें देकर मैं घर की ओर भागी। ऐसी भागी कि दो ट्रैफिक सिग्नल तोड़े, एक ट्रैफ़िक पुलिस के रोके जाने पर गाड़ी को और तेज़ कर दिया (जाने इसका नतीजा क्यो होगा) और उल्टे-सीधे तरीकों से ओवरटेक करते हुए हांफते-सांस फुलाते किसी तरह घर पहुंची।
अस्पताल, सूजा हुआ मुंह, निकलता हुआ ख़ून और उन सबके बीच धीर-गंभीर सा एक बच्चा।
"डॉक्टर अंकल सुई भी देंगे?"
"हां बेटा। टिटनस की।"
"अच्छा। मुंह में भी देंगे?"
"हो सकता है। अनीस्थिसिया। स्टिच लगाने से पहले, ताकि तुम्हें दर्द ना हो।"
"आप मेरे पास होगे मम्मा?"
"शायद। हो सकता है डॉक्टर अंकल मुझे थिएटर से बाहर भी कर दें। मैं बाहर वेट करूंगी।"
"अच्छा। मेरे दांत टूट जाएंगे तो मुझे दर्द भी होगा?"
मैंने दांतों को हिलाकर देखा। मसूढ़ों से और ख़ून निकल पड़ा। इस बच्चे ने किस बुरी तरह ज़ख़्मी किया है ख़ुद को।
मैं आदित के कटे हुए होंठे, बहता हुआ ख़ून, टूटे हुए दांत के बीच अपना काम करती रही - गाड़ी चलाना, एटीएम से पैसे निकालना, बिल भरना, दवाएं लेकर आना... ऐसे कि जैसे ये सब रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का हिस्सा हो। मुझे एमरजेंसी में और लोगों को देखकर घबराहट भी नहीं हुई। मुझे ख़ून सने कपड़े देखकर घिन नहीं आई। ना जी मिचला। मैं अपने-आप से हैरान थी। एक साल भी नहीं हुआ इस बात को... पिछली गर्मी छुट्टियों में हम पूर्णियां में थे और मनीष के पीठ पर एक घाव हो गया था। किसी किस्म का सिस्ट जिसमें बुरी तरह इन्फेक्शन हो गया था। उस सिस्ट की ड्रेसिंग का काम मां करती थीं - मेरी सासू मां, क्योंकि मुझसे ज़ख़्म देखे नहीं जाते। किसी को सुई पड़ते देखकर मरीज़ से ज़्यादा मेरे चिल्लाने का ख़तरा रहता है। तो हुआ यूं कि छत पर खड़ी होकर मां मनीष के ज़ख़्म की गर्म पानी से सफ़ाई कर रही थीं। उन्होंने मुझे ये देखने के लिए बुलाया कि घाव सूखा है या नहीं, एक बार छूकर देख लो। मैं डरते-डरते पहुंची। तबतक मां घाव को दबाकर उससे पस निकालने लगीं।
आपको मेरी बात का यकीन नहीं होगा, लेकिन सिर्फ़ इतने से ज़ख़्म को देखकर मैं वहीं छत पर खड़े-खड़े गश खाकर ज़मीन पर गिर गई। होश आया तो बेचारे मनीष अपनी तकलीफ़ छोड़कर मेरे मुंह पर पानी के छींटे मारने में लगे थे और मां मुझे संभाले बैठी थीं। कई दिनों तक इस बात को लेकर मेरा मज़ाक उड़ाया जाता रहा। हम भी बेशर्म होकर खुद को सुकुमारी डिक्लेयर कर बैठे।
सुकुमारी मां के रूप में आती है तो सब बर्दाश्त करना सीख जाती है। अलर्ट होना, एमरजेंसी सिचुएशन हैंडल करना, ऑपरेशन थिएटर की बदबू में खड़े रहना, पट्टियां बदलना, एंटिबायोटिक का ठीक-ठीक डोज़ देना, अपने करीबी दोस्तों से मदद मांग लेना, उन्हें आवाज़ देकर बुला लेना - सबकुछ। कमाल है कि स्टिच वाले मुंह में खाना डालने के तरीके भी आ जाते हैं और दर्द के बावजूद थपकी देकर सुला देना भी। कमाल है कि इस बारे में बेबाकी से लिखना भी आ जाता है, और सोते हुए बच्चे के सिरहाने बैठे हुए उसपर इतना प्यार भी आ जाता है कि टूटी-फूटी कविताएं तक निकल आती हैं।
१
कहां से लाएं
शब्दों की दौलत
कहने की मोहलत
सुनने की फ़ितरत
जो लाना ही है
तो मांग न लाएं
तुमसे हमारा गुज़रा हुआ वक़्त?
२
मुल्तानी मिट्टी
आंवला और रीठा
पपीते का पैक
संतरे का छिलका
नाख़ून पर रंग
बालों पर रोगन
चम्मच-भर नींबू
ज़र्रा भर शहद
ज़ुबां की मिठास
आंखों की प्यास
जिस्म की ख़ुशबू से
दुनियादारी का क्या वास्ता?
३
धीमे धीमे
आंच जलाओ
अब दिल का
एक डोंगा चढ़ाओ
भर दो उसमें
इश्क का पानी
अपने आप को
उसमें मिलाओ
पकने दो और
भूल भी जाओ
हाथ जलाओ
हाथ हटाओ
इस गाढ़ी चाशनी को
अब जहां चाहो, बांटकर आओ
बहरहाल, भूमिका बहुत हुई और मैं मुद्दे पर आती हूं। तो सपना ख़ौफ़नाक तरीके से सच निकला। आदित को चोट लगी आज। बुरी तरह। मैं घर पर नहीं थी और मेरे पास आद्या का फ़ोन आया। "मम्मा, जल्दी आओ। आदित गिर गया और और उसको बहुत-बहुत सारा ख़ून निकल रहा है।"
मैं घर में मौजूद इकलौती वयस्क - बच्चों की मौसी रुचि से बात करना चाहती थी। "मौसी फ़ोन पर नहीं आ सकती। वो आदित को बाथरूम में लेकर खड़ी है। उसके मुंह से ख़ून निकलना बंद नहीं हो रहा।"
आनन-फ़ानन में दो-चार नसीहतें देकर मैं घर की ओर भागी। ऐसी भागी कि दो ट्रैफिक सिग्नल तोड़े, एक ट्रैफ़िक पुलिस के रोके जाने पर गाड़ी को और तेज़ कर दिया (जाने इसका नतीजा क्यो होगा) और उल्टे-सीधे तरीकों से ओवरटेक करते हुए हांफते-सांस फुलाते किसी तरह घर पहुंची।
अस्पताल, सूजा हुआ मुंह, निकलता हुआ ख़ून और उन सबके बीच धीर-गंभीर सा एक बच्चा।
"डॉक्टर अंकल सुई भी देंगे?"
"हां बेटा। टिटनस की।"
"अच्छा। मुंह में भी देंगे?"
"हो सकता है। अनीस्थिसिया। स्टिच लगाने से पहले, ताकि तुम्हें दर्द ना हो।"
"आप मेरे पास होगे मम्मा?"
"शायद। हो सकता है डॉक्टर अंकल मुझे थिएटर से बाहर भी कर दें। मैं बाहर वेट करूंगी।"
"अच्छा। मेरे दांत टूट जाएंगे तो मुझे दर्द भी होगा?"
मैंने दांतों को हिलाकर देखा। मसूढ़ों से और ख़ून निकल पड़ा। इस बच्चे ने किस बुरी तरह ज़ख़्मी किया है ख़ुद को।
मैं आदित के कटे हुए होंठे, बहता हुआ ख़ून, टूटे हुए दांत के बीच अपना काम करती रही - गाड़ी चलाना, एटीएम से पैसे निकालना, बिल भरना, दवाएं लेकर आना... ऐसे कि जैसे ये सब रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का हिस्सा हो। मुझे एमरजेंसी में और लोगों को देखकर घबराहट भी नहीं हुई। मुझे ख़ून सने कपड़े देखकर घिन नहीं आई। ना जी मिचला। मैं अपने-आप से हैरान थी। एक साल भी नहीं हुआ इस बात को... पिछली गर्मी छुट्टियों में हम पूर्णियां में थे और मनीष के पीठ पर एक घाव हो गया था। किसी किस्म का सिस्ट जिसमें बुरी तरह इन्फेक्शन हो गया था। उस सिस्ट की ड्रेसिंग का काम मां करती थीं - मेरी सासू मां, क्योंकि मुझसे ज़ख़्म देखे नहीं जाते। किसी को सुई पड़ते देखकर मरीज़ से ज़्यादा मेरे चिल्लाने का ख़तरा रहता है। तो हुआ यूं कि छत पर खड़ी होकर मां मनीष के ज़ख़्म की गर्म पानी से सफ़ाई कर रही थीं। उन्होंने मुझे ये देखने के लिए बुलाया कि घाव सूखा है या नहीं, एक बार छूकर देख लो। मैं डरते-डरते पहुंची। तबतक मां घाव को दबाकर उससे पस निकालने लगीं।
आपको मेरी बात का यकीन नहीं होगा, लेकिन सिर्फ़ इतने से ज़ख़्म को देखकर मैं वहीं छत पर खड़े-खड़े गश खाकर ज़मीन पर गिर गई। होश आया तो बेचारे मनीष अपनी तकलीफ़ छोड़कर मेरे मुंह पर पानी के छींटे मारने में लगे थे और मां मुझे संभाले बैठी थीं। कई दिनों तक इस बात को लेकर मेरा मज़ाक उड़ाया जाता रहा। हम भी बेशर्म होकर खुद को सुकुमारी डिक्लेयर कर बैठे।
सुकुमारी मां के रूप में आती है तो सब बर्दाश्त करना सीख जाती है। अलर्ट होना, एमरजेंसी सिचुएशन हैंडल करना, ऑपरेशन थिएटर की बदबू में खड़े रहना, पट्टियां बदलना, एंटिबायोटिक का ठीक-ठीक डोज़ देना, अपने करीबी दोस्तों से मदद मांग लेना, उन्हें आवाज़ देकर बुला लेना - सबकुछ। कमाल है कि स्टिच वाले मुंह में खाना डालने के तरीके भी आ जाते हैं और दर्द के बावजूद थपकी देकर सुला देना भी। कमाल है कि इस बारे में बेबाकी से लिखना भी आ जाता है, और सोते हुए बच्चे के सिरहाने बैठे हुए उसपर इतना प्यार भी आ जाता है कि टूटी-फूटी कविताएं तक निकल आती हैं।
१
कहां से लाएं
शब्दों की दौलत
कहने की मोहलत
सुनने की फ़ितरत
जो लाना ही है
तो मांग न लाएं
तुमसे हमारा गुज़रा हुआ वक़्त?
२
मुल्तानी मिट्टी
आंवला और रीठा
पपीते का पैक
संतरे का छिलका
नाख़ून पर रंग
बालों पर रोगन
चम्मच-भर नींबू
ज़र्रा भर शहद
ज़ुबां की मिठास
आंखों की प्यास
जिस्म की ख़ुशबू से
दुनियादारी का क्या वास्ता?
३
धीमे धीमे
आंच जलाओ
अब दिल का
एक डोंगा चढ़ाओ
भर दो उसमें
इश्क का पानी
अपने आप को
उसमें मिलाओ
पकने दो और
भूल भी जाओ
हाथ जलाओ
हाथ हटाओ
इस गाढ़ी चाशनी को
अब जहां चाहो, बांटकर आओ
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कविता,
डायरी,
Motherhood
सोमवार, 31 दिसंबर 2012
साल की आख़िरी चिट्ठी, बच्चों के नाम
मेरे प्यारे बच्चों,
कल पहली बार तुम दोनों को साथ मिलकर आपस में जोड़-जोड़कर अख़बार की सुर्ख़ियां पढ़ते हुए देखा। मुझे खुश होना चाहिए था, लेकिन कोई गहरी उदासी अंदर तक उतर गई थी। मैं तुम दोनों के हाथों से अख़बार ले लेना चाहती थी क्योंकि मैं नहीं चाहती कि तुम एक-दूसरे को ज़ोर-ज़ोर से ये पढ़कर सुनाओ - 'कड़ी सुरक्षा में पीड़िता का अंतिम संस्कार'।
जिसका डर था, वही हुआ। मम्मा पीड़िता मतलब क्या? मम्मा अंतिम संस्कार क्या होता है? मम्मा, इतने सारे लोग खड़े होकर क्या कर रहे हैं? मम्मा आर-ए-पी-ई यानि रेप? इसका मतलब क्या?
ऐसे मुश्किल सवाल तुम दोनों को परिकथाओं और पंचतंत्र में उलझाए रखने की मेरी दिनभर की जद्दोजेहद पर पानी फेर दिया करते हैं। मैं तुम दोनों से कुछ छुपाना नहीं चाहती, लेकिन ये भी कैसे बताऊं कि जिस भरोसे की नींव पर तुम्हारे इर्द-गिर्द प्यार और इंसानियत की जो दुनिया खड़ी करने की कोशिश करती रहती हूं, वो सब दरअसल छलावा है।
तो सुनो बच्चों, इस साल की आख़िरी चिट्ठी में दुनिया के वो घिनौने और मुंह जला देनेवाले सच सुनो जिनसे एक-ना-एक दिन तुम्हारा पाला पड़ना ही था। मैं कबतक, आख़िर कबतक तुमको अपने पंखों में छुपाए सोचती रहूंगी कि आज नहीं, कल कहूंगी कि वो सामने दिखाई देनेवाले अंधेरे डरावाने जंगल में ही तुम्हें उड़ान भरनी होगी, वहीं अपने हिस्से का आसमान भी तलाश करना होगा। मैं कबतक नहीं बताऊंगी कि पीड़िता कौन और अंतिम संस्कार क्या?
आदित, पहले तुम सुनो बेटा।
हनी सिंह के गानों को हर एफएम, हर पार्टी में सुनोगे तुम। फिल्मी गाने तुम्हें सिखाएंगे कि लड़कियां चमेली और जलेबी होती हैं। कार्टून चैनलों पर दिखाई देनेवाले पॉपिन्स के विज्ञापन में तुमसे ज़रा-सा ही बड़ा बच्चा 'लेने' और बच्ची घूमकर 'देने' की बात करेगी। फिर और बड़े होगे तो तुम्हारे साथ के दोस्त लड़कियों के जोक्स बनाएंगे। मुमकिन है कि हर गांव, हर शहर, हर कस्बे की दीवारों पर तुम्हें मर्दानगी की चमत्कारी दवाओं के विज्ञापन नज़र आएं। मर्दानगी की जो परिभाषा मीडिया या बाहर की दुनिया तुम्हारे सामने परोसेगी, उसका बिल्कुल यकीन मत करना। तुम देखोगे कि हर समाज में अपनी शक्ति और पौरुष के प्रदर्शन का रास्ता औरत के जिस्म से होकर जाता है।
आओ एक वो बात बताती हूं तुमको जो तुम्हें बाद में तुम्हारी प्रेयसी या बीवी भी बताएगी शायद। लड़की या औरत के जिस्म को रौंदकर, ज़ख़्मी कर मर्दानगी कभी साबित नहीं होती, हैवानियत सिद्ध होती है। जिस्म को ज़ख्मी कर भले किसी शरीर पर काबिज हुआ जा सकता है, लेकिन रूह सिर्फ एक भाषा समझती है - प्यार की। मैं तुम्हें यही प्यार और सम्मान की भाषा सिखाना चाहती हूं, आदित। इंसानियत के पक्ष में खड़ा होना सिखाना चाहती हूं। हाथ जोड़कर अपनी परवरिश का वास्ता देते हुए कहना चाहती हूं कि कभी किसी ज़ख़्मी इंसान को सड़क पर पड़े हुए देखो तो अपनी गाड़ी से उतरने की ज़ेहमत उठाओ। मैं चाहती हूं कि तुम ख़ुद से ये वायदा करो कि लड़की को भोग की चीज़ नहीं समझोगे। उसे वही इज़्जत दोगे, जिस इज्ज़त की तुम्हें अपेक्षा होगी। उससे वैसे ही पेश आओगे जिस बर्ताव की तुम उम्मीद रखते हो।आदित, तुम अपने आस-पास की पांच लड़कियों और औरतों को मान दोगे तो अपने आस-पास जीने लायक माहौल तैयार कर सकोगे।
रही बात पीड़िता की, तो सुनो - एक लड़की थी जो अपने दोस्त के साथ फिल्म देखकर निकली थी, वैसे ही जैसे तुम्हारी मम्मा कई सालों से करती रही है। फिर उसने एक बस स्टैंड से अपने घर तक जाने के लिए बस ली, अपने उसी दोस्त के साथ, वैसे ही जैसे तुम्हारी मम्मा, तुम्हारी मौसी अपने दोस्तों के साथ कई सालों से करती रही हैं। उस बस में सवार कुछ लोगों ने लड़की के जिस्म को इस तरह छलनी किया कि शायद काग़ज़ की लुगदी को भी पिटते हुए थोड़ी-सी रहम दिखाई जाती होगी। मैं और कोई डिटेल नहीं दे सकती आदित, मुझमें हिम्मत नहीं है सोचने की। लेकिन ये बात ज़रूर बताना चाहती हूं तुमको कि जितने बड़े अपराधी और हैवान लड़की का बलात्कार करने वाले थे, उससे कम बड़े अपराधी वो लोग नहीं जो उस सड़क से गुज़रे होंगे लेकिन सड़क पर ज़ख़मी पड़े दो लोगों को देखकर रुकने की ज़रूरत नहीं समझी होगी।
आदित, हिम्मत सलमान खान और अक्षय कुमार की तरह एक्शन और स्टंट सीन्स करने में नहीं होती। हिम्मत अपने आस-पास हर रोज़, हर लम्हे लिए जाने वाले 'एक्शन' में होती है, जिसमें दूसरों की मदद करना, दूसरों का सम्मान करना और सही-गलत की पहचान करना होता है।
आद्या, तुम्हारे लिए ज़िन्दगी तो बहुत मुश्किल होगी बेटा।
लड़की होकर पैदा होना किसी दुनिया में, किसी देशकाल में, किसी तरह के वातावरण में आसान नहीं रहा। लेकिन अगर देश और समाज बदलाव की किसी गहरी और तेज़ प्रक्रिया से होकर गुज़र रहा होता है तो उसका सबसे बड़ा ख़ामियाज़ा लड़कियों को ही भुगतना पड़ता है। तुम जितनी तेज़ रफ़्तार से अपनी आज़ादी की ओर बढ़ोगी, अपने हक़ में आवाज़ उठाओगी उतनी ही तेज़ी से तुम्हें अपमानित किए जाने के रास्ते ईजाद किए जाएंगे। इनमें से सबसे आसान तरीका तुम्हारे जिस्म पर, तुम्हारी अस्मिता पर हमला करना होता है। कुछ ऐसा कर दो कि तुम्हारे आस-पास भी कोई तुम्हारी तरह हो पाने की हिम्मत ना कर सके।
फिर भी आद्या, अपना भरोसा बचाए रखना। हिम्मत रखना क्योंकि तुम्हारे घर में बैठ जाने से, बस में नहीं बैठने से कोई समस्या हल नहीं होगी। हमला होना ही होगा तो घर में भी तुम, मेरी बेटी, महफ़ूज़ हो, कहना मुश्किल है।
आद्या, फिर भी झूठा ही सही, यकीन रखना कि तुम्हारी गहरी सांसों की जुंबिश समझनेवाला कोई होगा कि दुनिया में हर दस दरिंदे पर एक इंसान है, मैं भी ऐसी ही किसी बात पर पुख़्ता यकीन करना चाहती हूं। यकीन रखना कि तुम्हें गले लगाने की ख़्वाहिश रखनेवाला हर वक्त नज़र से तुम्हारे शरीर को तौल रहा हो, ये ज़रूरी नहीं। यकीन रखना क्योंकि मेरे भीतर भी ये यकीन किसी ना किसी तरह फिर भी बाकी है, मेरी बेटी। दुनिया जो टिकी हुई है, उसकी कोई ना कोई वजह तो होगी ही, नहीं?
इसके साथ ही, आद्या, नज़र से जिस्म को तौलनेवालों की आंखें निकाल लेने का हुनर तुम्हें सिखा पाऊंगी, अभी इसका भरोसा नहीं है। लेकिन उनकी आंखों में वापस आंखें डालकर घूर देने का तरीका तो तुम्हें हम लोग सीखा ही देंगे।
वो 'पीड़िता' मर गई आद्या, इसलिए अंतिम संस्कार की ख़बर पढ़ रहे थे तुम दोनों। और अंतिम संस्कार का मतलब संस्कारों का वो अंतिम जनाज़ा है जिनपर हम ताज़िन्दगी अमल तो कर नहीं पाते, मरने के बाद मरनेवालों के लिए अंतिम संस्कार के नाम पर कुछ ढकोसले ज़रूर करते हैं। इस मामले में, बेटा, ये ढकोसला राजनीतिक और सार्वजनिक तौर पर हुआ है जिससे परिवारवालों का कोई वास्ता नहीं रहा।
आद्या और आदित, तुम्हारे लिए एक महफ़ूज़ दुनिया का दुआ मांगूंगी, लेकिन फिर भी इस दुनिया के सच को याद रखना कि वो महफ़ूज़ दुनिया भी एक छलावा ही होगी। ऐसी एक दुनिया में तुम जी सको और बिना रोज़-रोज़ तबाह हुए बच सको, इसके लिए वही तीन चीज़ें मांगूगी तुम्हारे लिए, जो अक्सर अपने लिए मांगा करती हूं - साहस (courage), समझदारी (wisdom) और संवेदना (compassion)। अगर कोई ईश्वर है कहीं तो वो तुम्हारी हिफ़ाज़त करे!
कल पहली बार तुम दोनों को साथ मिलकर आपस में जोड़-जोड़कर अख़बार की सुर्ख़ियां पढ़ते हुए देखा। मुझे खुश होना चाहिए था, लेकिन कोई गहरी उदासी अंदर तक उतर गई थी। मैं तुम दोनों के हाथों से अख़बार ले लेना चाहती थी क्योंकि मैं नहीं चाहती कि तुम एक-दूसरे को ज़ोर-ज़ोर से ये पढ़कर सुनाओ - 'कड़ी सुरक्षा में पीड़िता का अंतिम संस्कार'।
जिसका डर था, वही हुआ। मम्मा पीड़िता मतलब क्या? मम्मा अंतिम संस्कार क्या होता है? मम्मा, इतने सारे लोग खड़े होकर क्या कर रहे हैं? मम्मा आर-ए-पी-ई यानि रेप? इसका मतलब क्या?
ऐसे मुश्किल सवाल तुम दोनों को परिकथाओं और पंचतंत्र में उलझाए रखने की मेरी दिनभर की जद्दोजेहद पर पानी फेर दिया करते हैं। मैं तुम दोनों से कुछ छुपाना नहीं चाहती, लेकिन ये भी कैसे बताऊं कि जिस भरोसे की नींव पर तुम्हारे इर्द-गिर्द प्यार और इंसानियत की जो दुनिया खड़ी करने की कोशिश करती रहती हूं, वो सब दरअसल छलावा है।
तो सुनो बच्चों, इस साल की आख़िरी चिट्ठी में दुनिया के वो घिनौने और मुंह जला देनेवाले सच सुनो जिनसे एक-ना-एक दिन तुम्हारा पाला पड़ना ही था। मैं कबतक, आख़िर कबतक तुमको अपने पंखों में छुपाए सोचती रहूंगी कि आज नहीं, कल कहूंगी कि वो सामने दिखाई देनेवाले अंधेरे डरावाने जंगल में ही तुम्हें उड़ान भरनी होगी, वहीं अपने हिस्से का आसमान भी तलाश करना होगा। मैं कबतक नहीं बताऊंगी कि पीड़िता कौन और अंतिम संस्कार क्या?
आदित, पहले तुम सुनो बेटा।
हनी सिंह के गानों को हर एफएम, हर पार्टी में सुनोगे तुम। फिल्मी गाने तुम्हें सिखाएंगे कि लड़कियां चमेली और जलेबी होती हैं। कार्टून चैनलों पर दिखाई देनेवाले पॉपिन्स के विज्ञापन में तुमसे ज़रा-सा ही बड़ा बच्चा 'लेने' और बच्ची घूमकर 'देने' की बात करेगी। फिर और बड़े होगे तो तुम्हारे साथ के दोस्त लड़कियों के जोक्स बनाएंगे। मुमकिन है कि हर गांव, हर शहर, हर कस्बे की दीवारों पर तुम्हें मर्दानगी की चमत्कारी दवाओं के विज्ञापन नज़र आएं। मर्दानगी की जो परिभाषा मीडिया या बाहर की दुनिया तुम्हारे सामने परोसेगी, उसका बिल्कुल यकीन मत करना। तुम देखोगे कि हर समाज में अपनी शक्ति और पौरुष के प्रदर्शन का रास्ता औरत के जिस्म से होकर जाता है।
आओ एक वो बात बताती हूं तुमको जो तुम्हें बाद में तुम्हारी प्रेयसी या बीवी भी बताएगी शायद। लड़की या औरत के जिस्म को रौंदकर, ज़ख़्मी कर मर्दानगी कभी साबित नहीं होती, हैवानियत सिद्ध होती है। जिस्म को ज़ख्मी कर भले किसी शरीर पर काबिज हुआ जा सकता है, लेकिन रूह सिर्फ एक भाषा समझती है - प्यार की। मैं तुम्हें यही प्यार और सम्मान की भाषा सिखाना चाहती हूं, आदित। इंसानियत के पक्ष में खड़ा होना सिखाना चाहती हूं। हाथ जोड़कर अपनी परवरिश का वास्ता देते हुए कहना चाहती हूं कि कभी किसी ज़ख़्मी इंसान को सड़क पर पड़े हुए देखो तो अपनी गाड़ी से उतरने की ज़ेहमत उठाओ। मैं चाहती हूं कि तुम ख़ुद से ये वायदा करो कि लड़की को भोग की चीज़ नहीं समझोगे। उसे वही इज़्जत दोगे, जिस इज्ज़त की तुम्हें अपेक्षा होगी। उससे वैसे ही पेश आओगे जिस बर्ताव की तुम उम्मीद रखते हो।आदित, तुम अपने आस-पास की पांच लड़कियों और औरतों को मान दोगे तो अपने आस-पास जीने लायक माहौल तैयार कर सकोगे।
रही बात पीड़िता की, तो सुनो - एक लड़की थी जो अपने दोस्त के साथ फिल्म देखकर निकली थी, वैसे ही जैसे तुम्हारी मम्मा कई सालों से करती रही है। फिर उसने एक बस स्टैंड से अपने घर तक जाने के लिए बस ली, अपने उसी दोस्त के साथ, वैसे ही जैसे तुम्हारी मम्मा, तुम्हारी मौसी अपने दोस्तों के साथ कई सालों से करती रही हैं। उस बस में सवार कुछ लोगों ने लड़की के जिस्म को इस तरह छलनी किया कि शायद काग़ज़ की लुगदी को भी पिटते हुए थोड़ी-सी रहम दिखाई जाती होगी। मैं और कोई डिटेल नहीं दे सकती आदित, मुझमें हिम्मत नहीं है सोचने की। लेकिन ये बात ज़रूर बताना चाहती हूं तुमको कि जितने बड़े अपराधी और हैवान लड़की का बलात्कार करने वाले थे, उससे कम बड़े अपराधी वो लोग नहीं जो उस सड़क से गुज़रे होंगे लेकिन सड़क पर ज़ख़मी पड़े दो लोगों को देखकर रुकने की ज़रूरत नहीं समझी होगी।
आदित, हिम्मत सलमान खान और अक्षय कुमार की तरह एक्शन और स्टंट सीन्स करने में नहीं होती। हिम्मत अपने आस-पास हर रोज़, हर लम्हे लिए जाने वाले 'एक्शन' में होती है, जिसमें दूसरों की मदद करना, दूसरों का सम्मान करना और सही-गलत की पहचान करना होता है।
आद्या, तुम्हारे लिए ज़िन्दगी तो बहुत मुश्किल होगी बेटा।
लड़की होकर पैदा होना किसी दुनिया में, किसी देशकाल में, किसी तरह के वातावरण में आसान नहीं रहा। लेकिन अगर देश और समाज बदलाव की किसी गहरी और तेज़ प्रक्रिया से होकर गुज़र रहा होता है तो उसका सबसे बड़ा ख़ामियाज़ा लड़कियों को ही भुगतना पड़ता है। तुम जितनी तेज़ रफ़्तार से अपनी आज़ादी की ओर बढ़ोगी, अपने हक़ में आवाज़ उठाओगी उतनी ही तेज़ी से तुम्हें अपमानित किए जाने के रास्ते ईजाद किए जाएंगे। इनमें से सबसे आसान तरीका तुम्हारे जिस्म पर, तुम्हारी अस्मिता पर हमला करना होता है। कुछ ऐसा कर दो कि तुम्हारे आस-पास भी कोई तुम्हारी तरह हो पाने की हिम्मत ना कर सके।
फिर भी आद्या, अपना भरोसा बचाए रखना। हिम्मत रखना क्योंकि तुम्हारे घर में बैठ जाने से, बस में नहीं बैठने से कोई समस्या हल नहीं होगी। हमला होना ही होगा तो घर में भी तुम, मेरी बेटी, महफ़ूज़ हो, कहना मुश्किल है।
आद्या, फिर भी झूठा ही सही, यकीन रखना कि तुम्हारी गहरी सांसों की जुंबिश समझनेवाला कोई होगा कि दुनिया में हर दस दरिंदे पर एक इंसान है, मैं भी ऐसी ही किसी बात पर पुख़्ता यकीन करना चाहती हूं। यकीन रखना कि तुम्हें गले लगाने की ख़्वाहिश रखनेवाला हर वक्त नज़र से तुम्हारे शरीर को तौल रहा हो, ये ज़रूरी नहीं। यकीन रखना क्योंकि मेरे भीतर भी ये यकीन किसी ना किसी तरह फिर भी बाकी है, मेरी बेटी। दुनिया जो टिकी हुई है, उसकी कोई ना कोई वजह तो होगी ही, नहीं?
इसके साथ ही, आद्या, नज़र से जिस्म को तौलनेवालों की आंखें निकाल लेने का हुनर तुम्हें सिखा पाऊंगी, अभी इसका भरोसा नहीं है। लेकिन उनकी आंखों में वापस आंखें डालकर घूर देने का तरीका तो तुम्हें हम लोग सीखा ही देंगे।
वो 'पीड़िता' मर गई आद्या, इसलिए अंतिम संस्कार की ख़बर पढ़ रहे थे तुम दोनों। और अंतिम संस्कार का मतलब संस्कारों का वो अंतिम जनाज़ा है जिनपर हम ताज़िन्दगी अमल तो कर नहीं पाते, मरने के बाद मरनेवालों के लिए अंतिम संस्कार के नाम पर कुछ ढकोसले ज़रूर करते हैं। इस मामले में, बेटा, ये ढकोसला राजनीतिक और सार्वजनिक तौर पर हुआ है जिससे परिवारवालों का कोई वास्ता नहीं रहा।
आद्या और आदित, तुम्हारे लिए एक महफ़ूज़ दुनिया का दुआ मांगूंगी, लेकिन फिर भी इस दुनिया के सच को याद रखना कि वो महफ़ूज़ दुनिया भी एक छलावा ही होगी। ऐसी एक दुनिया में तुम जी सको और बिना रोज़-रोज़ तबाह हुए बच सको, इसके लिए वही तीन चीज़ें मांगूगी तुम्हारे लिए, जो अक्सर अपने लिए मांगा करती हूं - साहस (courage), समझदारी (wisdom) और संवेदना (compassion)। अगर कोई ईश्वर है कहीं तो वो तुम्हारी हिफ़ाज़त करे!
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डायरी,
Motherhood
सोमवार, 29 अक्टूबर 2012
मां ना होती तो मैं क्या होती?
मम्मा, भूलना मत कि आज बॉम्बे जाना है आपको।
स्कूल जाने से पहले आदित की इत्ती-सी बात पर चेहरे पर एक बड़ी-सी मुस्कुराहट आ गई है। हम सिर्फ अपने बच्चों से ही उम्मीदें पाले नहीं रखते। हमारे बच्चों को भी हमसे बड़ी-बडी़ उम्मीदें होती हैं। इन्हीं उम्मीदों के वास्ते आदित अपनी मां से दो रातों की जुदाई बर्दाश्त करने को तैयार हो गया है, बावजूद इसके कि उसे मां की उंगलियों को अपनी उंगलियों में फंसाए बग़ैर नींद नहीं आती।
इतनी सारी ज़िन्दगी जी लेने के बावजूद मैं ठीक-ठीक नहीं कह सकती कि मुझे ज़िन्दगी से आख़िर चाहिए क्या? दौलत, शोहरत, ताक़त या सिर्फ हिम्मत? या इनमें से कुछ भी नहीं और बेइंतहा मोहब्बत? या थोड़ा-थोड़ा सबकुछ?
मैं नहीं जानती मुझे क्या चाहिए। आदित और आद्या जानते हैं, उनकी मां को क्या चाहिए।
तेरह या चौदह साल की थी जब इंग्लिश टीचर ने एक लेख लिखने को दिया - व्हाट वुड आई लाईक टू बी वेन आई ग्रो अप। बड़ी होकर मैं क्या बनना चाहूंगी?
मैंने बड़े मन से साढ़े तीन सौ-चार सौ शब्दों में लिखा था - आई वुड वॉन्ट टू बी ए मदर।
मैं जानती थी कि मैं बच्चों को पैदा करने और उनको पालने का सुख तो चाहती ही थी। ऐसा क्यों था, इस बारे में कभी सोचा नहीं। बच्चों से इतना ही प्यार था तो मैं किसी किंडरगार्डन में टीचर भी तो हो सकती थी।
लेकिन अपनी मां को देखकर लगता था कि मुझे भी मां बनना है। अपनी मां जैसी, ये ठीक-ठीक नहीं बता सकती। या बताना नहीं चाहती, क्योंकि एक पीढ़ी के फ़ासले के बीच हम कई मायने में अलग-अलग हैं, कई मायनों में एक जैसे होते हुए भी।
हम एक संयुक्त परिवार में पले-बढे, जहां मेरी मां का दिन सुबह चार बजे शुरू हो जाता था। घर में मर्दों का ऐसा आधिपत्य था कि अब सोचती हूं तो सिहर जाती हूं। आख़िर ये औरतें इतना बर्दाश्त कैसे करती थीं? पुरुषों की इतनी ज़्यादती के बीच मेरी मां हम तीन भाई-बहन में ही अपने सुख तलाशती रहती थी। उसकी सुबह हमारे लिए होती थी, उसकी थकन में आराम के सिलसिले भी हम ही से आते थे। जिस परिवार में प्यार से बात करने, एक-दूसरे को गले लगाने, हाथ थामने, प्यार जताने, इज़्जत देने का चलन नहीं था वहां उस भीड़ में मेरी मां ने गोद में सिर रखना सिखाया, एक-दूसरे के बालों में तेल लगाना, एक-दूसरे के साथ गुनगुनाना, एक-दूसरे की पीठ पर हाथ रखकर मुस्कुराना और बिंदास एक-दूसरे को गले लगाना सिखाया। मां उस परिवार में रहते हुए भी खुलकर अपने प्यार का इज़हार करती थीं, जहां अपने बच्चों को गोद में लेना शान का विरूद्ध समझा जाता था। उसी का नतीजा है कि इतने बड़े हो जाने के बावजूद हम भाई-बहन एक-दूसरे को गले लगाने से बिल्कुल नहीं कतराते। हमारी संस्कृति में इसे उचित नहीं माना जाता, फिर भी।
मां ने अपने बेटों को बिस्तर लगाना, मच्छरदानी खोलना और घर की औरतों के दुख-सुख समझना सिखाया। उन्होंने कुछ कहा हो, ऐसा याद नहीं। हम कई बातें उन्हें देखकर समझ जाते थे। भाई के घर से लौटी हूं अभी-अभी, और इस बात का गुमान है कि उसमें मां की संवेदनशीलता और सहनशक्ति है। मां ने और कुछ सिखाया या नहीं, ज़िन्दगी को लेकर उदार बनना ज़रूर सिखाया।
जो मां ने सिखाया और जो मां ने नहीं सिखाया, वही अपनी बच्चों को सिखाना चाहती थी मैं। मैं अपनी ज़िन्दगी अपने बच्चों से बांटना चाहती थी, ऐसे कि जैसे किसी और का हक़ ना हो। मैं उनके साथ दुनिया को नई नज़र से देखना चाहती थी। इसलिए, मैं मां की तरह ना होते हुए भी मां की तरह की मां बनना चाहती थी।
मैं ये सही-सही जानती थी कि मुझे ज़िम्मेदारियां उठानी हैं और उन ज़िम्मेदारियों को बच्चे मुक़म्मल बनाते हैं। अपनी ज़िन्दगी का एक बड़ा हिस्सा अपने शरीर के हिस्से के नाम यूं कर देना कि उनसे बंधे भी रहें और उनसे जुदा भी, इंसानियत की क़िताब का उपसंहार होता है। हम जब अपने बच्चों के साथ जीना सीख जाते हैं तो बाहर की दुनिया से जूझ जाने का हुनर अपने-आप आ जाता है।
मैं कभी महत्वाकांक्षी नहीं थी। छोटे-छोटे ख़्वाब थे, और ये यकीन था कि उन्हें पूरा होते देखूंगी एक दिन। इन ख़्वाबों में इतनी ही आज़ादी थी कि किसी सेंकेंड हैंड गाड़ी की स्टीयरिंग व्हील पर बैठकर अपने तरीके से अपनी गाड़ी चला सकूं। इन ख़्वाबों में इतने ही पैसों का शौक़ था कि ट्रेन की टिकटें कराकर एक जगह से दूसरे जगह जा सकने की आज़ादी हो। मुझे कपड़ों, जूतों, गहनों का शौक़ नहीं। मैं अक्सर कहती हूं कि कमाती तो मैं दरअसल अपने लिए टिकटें खरीदने के लिए हूं, और उन टिकटों से किए जा सकने वाले सफ़र में अपनी खरीदी हुई किताबें पढ़ सकने के लिए।
इत्ती-सी ही है ख़्वाहिश। इत्ती-सी ही थी ख़्वाहिश ।
और उन ख़्वाहिशों को अचानक बच्चों ने पर दे दिया। उन्हें घर में रहनेवाली बेसलीका, बेतरतीब, बेढंगी मां रास नहीं आती। तीन साल की थी आद्या जब कहा था उसने, आप भी ऑफिस जाया करो मम्मा। हम नहीं रोएंगे आपके लिए।
मेरे बेसलीका काम का कितना हिस्सा समझ में आता है उन्हें, मैं नहीं जानती। लेकिन मेरे बच्चे अक्सर अजनबियों से बताते हैं, मेरी मम्मा राईटर है। कहानियां लिखती हैं।
राईटर? जाने राईटर होने का मतलब उन्हें क्या समझ में आता होगा? लेकिन मेरे लिए उनकी आवाज़ का फ़ख़्र मेरा सबसे बड़ा ईनाम है।
मेरे बच्चे जानते हैं कि उनकी मां और दूसरी मांओं से अलग है। इसलिए उन्होंने अपनी मां को अपने तरीके से स्पेस दिया है। मैं बच्चों को अपने साथ क्लायंट मीटिंग्स में ले गई हूं। ऐसा भी हुआ है कि एक बच्चे को सोफे पर सुलाकर दूसरे को गोद में लिए मैंने डॉक्युमेंट्री फिल्मों पर चर्चा की है। अपनी मजबूरी में उन्हें अपने काम का हिस्सा बना लेना और अपनी पर्सनल और प्रोफेशनल ज़िन्दगी में मची गड्डमड्ड का जो असर उनपर दिखाई दे रहा है, वो दिल को बहुत सुकून पहुंचाता है।
बच्चों ने सिखाया है मुझे कि नामुमकिन कुछ भी नहीं होता, और अगर आप मां हैं तब तो कुछ भी नहीं। मां बनते ही पांच गेंदों को एक साथ उछालकर उन्हें संतुलित करते हुए ज़िन्दगी के सर्कस में बने रहने की बाज़ीगरी अपने आप आ जाती है।
इसका ये मतलब कतई नहीं कि ये जगलिंग आसान होती होगी। कई-कई बार मुंह के बल गिरने-संभलने-चोट खाने के बाद आता है ये हुनर। मां से मां बनना सीखने के बाद अब अपने बच्चों से मां बनना सीख रही हूं। मेरी मां ने मुझे सोचने-समझने-जूझने-बर्दाश्त करने की शक्ति दी। मेरे बच्चों ने मुझे अभिव्यक्ति की ताक़त दी। मेरी मां ने मुझे दूसरों के लिए जीना सिखाया। मेरे बच्चे उनकी ख़ुशी के लिए ख़ुद को बचाए रखना सीखा रहे हैं। मेरी मां ने मुझे बांटना-देना-उदार होना सिखाया। मेरे बच्चों ने मुझे सहेजना-समेटना सिखाया है। मेरी मां ने मुझे जो पंख दिए उन्हें मेरे बच्चे परवाज़ देने में लगे हैं।
मां ना होती तो मैं क्या होती?
मैं मां ना होती तो क्या होती?
स्कूल जाने से पहले आदित की इत्ती-सी बात पर चेहरे पर एक बड़ी-सी मुस्कुराहट आ गई है। हम सिर्फ अपने बच्चों से ही उम्मीदें पाले नहीं रखते। हमारे बच्चों को भी हमसे बड़ी-बडी़ उम्मीदें होती हैं। इन्हीं उम्मीदों के वास्ते आदित अपनी मां से दो रातों की जुदाई बर्दाश्त करने को तैयार हो गया है, बावजूद इसके कि उसे मां की उंगलियों को अपनी उंगलियों में फंसाए बग़ैर नींद नहीं आती।
इतनी सारी ज़िन्दगी जी लेने के बावजूद मैं ठीक-ठीक नहीं कह सकती कि मुझे ज़िन्दगी से आख़िर चाहिए क्या? दौलत, शोहरत, ताक़त या सिर्फ हिम्मत? या इनमें से कुछ भी नहीं और बेइंतहा मोहब्बत? या थोड़ा-थोड़ा सबकुछ?
मैं नहीं जानती मुझे क्या चाहिए। आदित और आद्या जानते हैं, उनकी मां को क्या चाहिए।
तेरह या चौदह साल की थी जब इंग्लिश टीचर ने एक लेख लिखने को दिया - व्हाट वुड आई लाईक टू बी वेन आई ग्रो अप। बड़ी होकर मैं क्या बनना चाहूंगी?
मैंने बड़े मन से साढ़े तीन सौ-चार सौ शब्दों में लिखा था - आई वुड वॉन्ट टू बी ए मदर।
मैं जानती थी कि मैं बच्चों को पैदा करने और उनको पालने का सुख तो चाहती ही थी। ऐसा क्यों था, इस बारे में कभी सोचा नहीं। बच्चों से इतना ही प्यार था तो मैं किसी किंडरगार्डन में टीचर भी तो हो सकती थी।
लेकिन अपनी मां को देखकर लगता था कि मुझे भी मां बनना है। अपनी मां जैसी, ये ठीक-ठीक नहीं बता सकती। या बताना नहीं चाहती, क्योंकि एक पीढ़ी के फ़ासले के बीच हम कई मायने में अलग-अलग हैं, कई मायनों में एक जैसे होते हुए भी।
हम एक संयुक्त परिवार में पले-बढे, जहां मेरी मां का दिन सुबह चार बजे शुरू हो जाता था। घर में मर्दों का ऐसा आधिपत्य था कि अब सोचती हूं तो सिहर जाती हूं। आख़िर ये औरतें इतना बर्दाश्त कैसे करती थीं? पुरुषों की इतनी ज़्यादती के बीच मेरी मां हम तीन भाई-बहन में ही अपने सुख तलाशती रहती थी। उसकी सुबह हमारे लिए होती थी, उसकी थकन में आराम के सिलसिले भी हम ही से आते थे। जिस परिवार में प्यार से बात करने, एक-दूसरे को गले लगाने, हाथ थामने, प्यार जताने, इज़्जत देने का चलन नहीं था वहां उस भीड़ में मेरी मां ने गोद में सिर रखना सिखाया, एक-दूसरे के बालों में तेल लगाना, एक-दूसरे के साथ गुनगुनाना, एक-दूसरे की पीठ पर हाथ रखकर मुस्कुराना और बिंदास एक-दूसरे को गले लगाना सिखाया। मां उस परिवार में रहते हुए भी खुलकर अपने प्यार का इज़हार करती थीं, जहां अपने बच्चों को गोद में लेना शान का विरूद्ध समझा जाता था। उसी का नतीजा है कि इतने बड़े हो जाने के बावजूद हम भाई-बहन एक-दूसरे को गले लगाने से बिल्कुल नहीं कतराते। हमारी संस्कृति में इसे उचित नहीं माना जाता, फिर भी।
मां ने अपने बेटों को बिस्तर लगाना, मच्छरदानी खोलना और घर की औरतों के दुख-सुख समझना सिखाया। उन्होंने कुछ कहा हो, ऐसा याद नहीं। हम कई बातें उन्हें देखकर समझ जाते थे। भाई के घर से लौटी हूं अभी-अभी, और इस बात का गुमान है कि उसमें मां की संवेदनशीलता और सहनशक्ति है। मां ने और कुछ सिखाया या नहीं, ज़िन्दगी को लेकर उदार बनना ज़रूर सिखाया।
जो मां ने सिखाया और जो मां ने नहीं सिखाया, वही अपनी बच्चों को सिखाना चाहती थी मैं। मैं अपनी ज़िन्दगी अपने बच्चों से बांटना चाहती थी, ऐसे कि जैसे किसी और का हक़ ना हो। मैं उनके साथ दुनिया को नई नज़र से देखना चाहती थी। इसलिए, मैं मां की तरह ना होते हुए भी मां की तरह की मां बनना चाहती थी।
मैं ये सही-सही जानती थी कि मुझे ज़िम्मेदारियां उठानी हैं और उन ज़िम्मेदारियों को बच्चे मुक़म्मल बनाते हैं। अपनी ज़िन्दगी का एक बड़ा हिस्सा अपने शरीर के हिस्से के नाम यूं कर देना कि उनसे बंधे भी रहें और उनसे जुदा भी, इंसानियत की क़िताब का उपसंहार होता है। हम जब अपने बच्चों के साथ जीना सीख जाते हैं तो बाहर की दुनिया से जूझ जाने का हुनर अपने-आप आ जाता है।
मैं कभी महत्वाकांक्षी नहीं थी। छोटे-छोटे ख़्वाब थे, और ये यकीन था कि उन्हें पूरा होते देखूंगी एक दिन। इन ख़्वाबों में इतनी ही आज़ादी थी कि किसी सेंकेंड हैंड गाड़ी की स्टीयरिंग व्हील पर बैठकर अपने तरीके से अपनी गाड़ी चला सकूं। इन ख़्वाबों में इतने ही पैसों का शौक़ था कि ट्रेन की टिकटें कराकर एक जगह से दूसरे जगह जा सकने की आज़ादी हो। मुझे कपड़ों, जूतों, गहनों का शौक़ नहीं। मैं अक्सर कहती हूं कि कमाती तो मैं दरअसल अपने लिए टिकटें खरीदने के लिए हूं, और उन टिकटों से किए जा सकने वाले सफ़र में अपनी खरीदी हुई किताबें पढ़ सकने के लिए।
इत्ती-सी ही है ख़्वाहिश। इत्ती-सी ही थी ख़्वाहिश ।
और उन ख़्वाहिशों को अचानक बच्चों ने पर दे दिया। उन्हें घर में रहनेवाली बेसलीका, बेतरतीब, बेढंगी मां रास नहीं आती। तीन साल की थी आद्या जब कहा था उसने, आप भी ऑफिस जाया करो मम्मा। हम नहीं रोएंगे आपके लिए।
मेरे बेसलीका काम का कितना हिस्सा समझ में आता है उन्हें, मैं नहीं जानती। लेकिन मेरे बच्चे अक्सर अजनबियों से बताते हैं, मेरी मम्मा राईटर है। कहानियां लिखती हैं।
राईटर? जाने राईटर होने का मतलब उन्हें क्या समझ में आता होगा? लेकिन मेरे लिए उनकी आवाज़ का फ़ख़्र मेरा सबसे बड़ा ईनाम है।
मेरे बच्चे जानते हैं कि उनकी मां और दूसरी मांओं से अलग है। इसलिए उन्होंने अपनी मां को अपने तरीके से स्पेस दिया है। मैं बच्चों को अपने साथ क्लायंट मीटिंग्स में ले गई हूं। ऐसा भी हुआ है कि एक बच्चे को सोफे पर सुलाकर दूसरे को गोद में लिए मैंने डॉक्युमेंट्री फिल्मों पर चर्चा की है। अपनी मजबूरी में उन्हें अपने काम का हिस्सा बना लेना और अपनी पर्सनल और प्रोफेशनल ज़िन्दगी में मची गड्डमड्ड का जो असर उनपर दिखाई दे रहा है, वो दिल को बहुत सुकून पहुंचाता है।
बच्चों ने सिखाया है मुझे कि नामुमकिन कुछ भी नहीं होता, और अगर आप मां हैं तब तो कुछ भी नहीं। मां बनते ही पांच गेंदों को एक साथ उछालकर उन्हें संतुलित करते हुए ज़िन्दगी के सर्कस में बने रहने की बाज़ीगरी अपने आप आ जाती है।
इसका ये मतलब कतई नहीं कि ये जगलिंग आसान होती होगी। कई-कई बार मुंह के बल गिरने-संभलने-चोट खाने के बाद आता है ये हुनर। मां से मां बनना सीखने के बाद अब अपने बच्चों से मां बनना सीख रही हूं। मेरी मां ने मुझे सोचने-समझने-जूझने-बर्दाश्त करने की शक्ति दी। मेरे बच्चों ने मुझे अभिव्यक्ति की ताक़त दी। मेरी मां ने मुझे दूसरों के लिए जीना सिखाया। मेरे बच्चे उनकी ख़ुशी के लिए ख़ुद को बचाए रखना सीखा रहे हैं। मेरी मां ने मुझे बांटना-देना-उदार होना सिखाया। मेरे बच्चों ने मुझे सहेजना-समेटना सिखाया है। मेरी मां ने मुझे जो पंख दिए उन्हें मेरे बच्चे परवाज़ देने में लगे हैं।
मां ना होती तो मैं क्या होती?
मैं मां ना होती तो क्या होती?
लेबल:
डायरी,
Motherhood
मंगलवार, 24 जुलाई 2012
आओ बच्चों तुम्हें सिखाएं...
लिखना तो 13 नंबर की सवारी करते हुए अंकशास्त्रियों की दुकान के आगे लंबी भीड़ लगाते हुए 13 तालकटोरा रोड से 'रिटायरमेंट हाउस' जा पहुंचे 13वें राष्ट्रपति के बारे में था। लेकिन मेरे सामने उससे भी बड़ा मुद्दा था - खाली पेट्रोल टैंक को भरवाने में और कितने पैसे देने पड़ेंगे, उसकी चिंता से भी बड़ा; छह रुपए महंगे हो गए टूटा बासमती चावल से भी बड़ा; सूखे की चेतावनी से भी बड़ा; कोपभवन में लंबी छुट्टी के लिए जा बैठे कृषि मंत्री की डिमांड लिस्ट से भी बड़ा; महंगाई, मुद्रास्फीति, राजकोषीय घाटे से भी बड़ा...
मुद्दा ये है कि मेरे बच्चों की शब्दावली में एक नया वाक्यांश जुड़ गया है। सुबह-सुबह उन्होंने एक-दूसरे की चुगली की।
"मम्मा, आपको पता है आद्या ने कल बस में एक बच्चे को 'उल्लू का बच्चा' कहा।"
इतना सुनना था कि मुझे लगा, मेरे इर्द-गिर्द की दुनिया ठीक मेरे आंखों के सामने धराशयी होने लगी है जैसे। ये कैसे हो गया? ये मेरी परवरिश तो हो ही नहीं सकती। लंबी गहरी सांसें लेकर दिमाग स्थिर करते हुए मैं कोई फ़ैसला सुना पाती, इससे पहले ही अपराधी ने ना सिर्फ़ गुनाह क़बूल कर लिया, बल्कि मौका-ए-वारदात का अक्षरशः विवरण भी दे दिया।
"मम्मा, अयान ने मुझे बस में धक्का दिया। अपने स्कूल बैग से मुझे पुश किया। और मैंने ये जो बोला... ये... ये मैंने आदित के फ्रेंड अयान से ही सीखा है। वही खेलता रहता है ऐसे बच्चों को साथ... आप आदित को बोलो ऐसे फ्रेन्ड्स नहीं बनाएगा। आदित ने भी रुचि मौसी को कहा था - वही - वही मम्मा - उल्लू का बच्चा... मुझे भी कहा था... उल्लू का बच्चा..."
मेरी पहल समय का तकाज़ा था।
"उल्लू देखा है आपने?"
"हां..."
"जैसा दिखता है उल्लू, मैं वैसी दिखती हूं? मेरी शक्ल... मेरी नाक... मेरी आंखें...?"
"नहीं मम्मा..."
"फिर रुचि मौसी दिखती होगी बेबी उल्लू के जैसी, नहीं?"
"नहीं मम्मा..."
"फिर हम एक-दूसरे को ऐसे नामों से क्या बुलाते हैं?"
"लेकिन आप भी तो हमको कहते हो मम्मा... सोनचिरैया, तोता, कोयल, बिलोरी..."
मम्मा की एमटीवी बोलती बंद! जल्दी से तर्क ढूंढो कोई नया। अल्लाह, मैंने वकालत ही पढ़ ली होती... या थोड़ा और होता प्रेसेंस ऑफ़ माइंड। बच्चों के साथ जिरह करना भी सीख गई हूं।
"तो आपको ये नाम बुरे लगते हैं?"
"नहीं मम्मा..."
"और उल्लू का बच्चा?"
"गुस्सा आता है सुनकर।"
"तो बस... जवाब मिल गया... हम ऐसी बात क्यों कहें जो हमें ख़ुद अच्छी नहीं लगती? जो सुनकर गुस्सा आता है?"
कितनी आसानी से कह गई हूं ये। बस स्टॉप पर हुई ये बातचीत दो घंटे बाद भी परेशान कर रही है। बच्चों को बड़ा करने के क्रम में आप कई समझौते करते हैं खुद से - पैसे के साथ, काम के साथ और सबसे बड़ी बात, वक्त के साथ। उससे भी बड़ा समझौता अपने व्यक्तित्व के साथ होता है, क्योंकि यही एक चीज़ आपके बच्चों को सबसे ज़्यादा प्रभावित करती है। जो बच्चे देख रहे होते हैं, वही सीख रहे होते हैं।
मैं फिर भी साध्वी नहीं बन सकती, ना आर्ष स्वभाव एक रात में जीना आ गया है। फिर भी, भाषा और लहज़े में कई बदलाव तो लाना ज़रूरी है। बड़ी मुश्किल से अपने शब्दकोष से 'बेवकूफ़', 'बदतमीज़', 'पाजी', 'कमीना' और ऐसे ही कई शब्द निकाले गए। 'ओह शिट' तब जाकर बोलना बंद किया जब ढाई साल का आदित मेरी ही तरह सिर पर हाथ मारकर वही शब्द दुहराने लगा।
ये भी सच है कि बच्चों को कहां-कहां बचाएंगे? पार्क में साथ खेलनेवाला कबीर 'अबे ओय' कहकर आदित को बुलाता है तो मुझे अपने गुस्से पर नियंत्रण के लिए दस तक की गिनती गिननी होती है। छोटा भीम बच्चों को 'बुली बच्चों' को धराशायी कर देने के गुर सिखाता है और तरह-तरह के स्टंट्स दिखाता है तो मैं टीवी बंद कर देना चाहती हूं। स्कूल बस पर उन्हें चढ़ाते हुए बस में गूंजती जलेबी बाई की मटकती-झटकती आवाज़ सुनाई देती है तो मैं ड्राईवर से चैनल बदल देने की गुज़ारिश ही कर सकती हूं। सुबह के अख़बार को लेकर बैठने के क्रम में 'प्लेबॉय' के कवर शूट से लौटी शर्लीन चोपड़ा बत्तीसी के साथ और सबकुछ निपोड़ती दिखाई देती है तो मेरे साथ-साथ मेरे बच्चे भी देख रहे होते हैं।
हम अपने आस-पास और माहौल को कितना बदल सकते हैं, ना बच्चों को सौ पर्दों के पीछे छुपाकर रखा जा सकता है। स्कूल जाएंगे ही, बाहर निकलेंगे ही, मीडिया से बचाया नहीं जा सकता और श्लील-अश्लील सब दिखाई देगा उनको।
ऐसे में हम बड़ों की ज़िम्मेदारी क्या बनती है? सही-गलत का पाठ पढ़ाने का हक़ हमें कितना है, या उन्हीं पर छोड़ दिया जाए दारोमदार? जैसे हमारे भीतर नैतिकता का कस्टमाइज्ड फिल्टर लगा है, उनके भीतर भी होगा शायद। ना, मुझे तो लगता है ये फिल्टर इन्सटॉल करने की ज़िम्मेदारी मेरी है।
मेरे दोस्त मुझे हेलीकॉपटर मदर कहते हैं तो गलत नहीं कहते। मैं वाकई उल्लू हूं।
मुद्दा ये है कि मेरे बच्चों की शब्दावली में एक नया वाक्यांश जुड़ गया है। सुबह-सुबह उन्होंने एक-दूसरे की चुगली की।
"मम्मा, आपको पता है आद्या ने कल बस में एक बच्चे को 'उल्लू का बच्चा' कहा।"
इतना सुनना था कि मुझे लगा, मेरे इर्द-गिर्द की दुनिया ठीक मेरे आंखों के सामने धराशयी होने लगी है जैसे। ये कैसे हो गया? ये मेरी परवरिश तो हो ही नहीं सकती। लंबी गहरी सांसें लेकर दिमाग स्थिर करते हुए मैं कोई फ़ैसला सुना पाती, इससे पहले ही अपराधी ने ना सिर्फ़ गुनाह क़बूल कर लिया, बल्कि मौका-ए-वारदात का अक्षरशः विवरण भी दे दिया।
"मम्मा, अयान ने मुझे बस में धक्का दिया। अपने स्कूल बैग से मुझे पुश किया। और मैंने ये जो बोला... ये... ये मैंने आदित के फ्रेंड अयान से ही सीखा है। वही खेलता रहता है ऐसे बच्चों को साथ... आप आदित को बोलो ऐसे फ्रेन्ड्स नहीं बनाएगा। आदित ने भी रुचि मौसी को कहा था - वही - वही मम्मा - उल्लू का बच्चा... मुझे भी कहा था... उल्लू का बच्चा..."
मेरी पहल समय का तकाज़ा था।
"उल्लू देखा है आपने?"
"हां..."
"जैसा दिखता है उल्लू, मैं वैसी दिखती हूं? मेरी शक्ल... मेरी नाक... मेरी आंखें...?"
"नहीं मम्मा..."
"फिर रुचि मौसी दिखती होगी बेबी उल्लू के जैसी, नहीं?"
"नहीं मम्मा..."
"फिर हम एक-दूसरे को ऐसे नामों से क्या बुलाते हैं?"
"लेकिन आप भी तो हमको कहते हो मम्मा... सोनचिरैया, तोता, कोयल, बिलोरी..."
मम्मा की एमटीवी बोलती बंद! जल्दी से तर्क ढूंढो कोई नया। अल्लाह, मैंने वकालत ही पढ़ ली होती... या थोड़ा और होता प्रेसेंस ऑफ़ माइंड। बच्चों के साथ जिरह करना भी सीख गई हूं।
"तो आपको ये नाम बुरे लगते हैं?"
"नहीं मम्मा..."
"और उल्लू का बच्चा?"
"गुस्सा आता है सुनकर।"
"तो बस... जवाब मिल गया... हम ऐसी बात क्यों कहें जो हमें ख़ुद अच्छी नहीं लगती? जो सुनकर गुस्सा आता है?"
कितनी आसानी से कह गई हूं ये। बस स्टॉप पर हुई ये बातचीत दो घंटे बाद भी परेशान कर रही है। बच्चों को बड़ा करने के क्रम में आप कई समझौते करते हैं खुद से - पैसे के साथ, काम के साथ और सबसे बड़ी बात, वक्त के साथ। उससे भी बड़ा समझौता अपने व्यक्तित्व के साथ होता है, क्योंकि यही एक चीज़ आपके बच्चों को सबसे ज़्यादा प्रभावित करती है। जो बच्चे देख रहे होते हैं, वही सीख रहे होते हैं।
मैं फिर भी साध्वी नहीं बन सकती, ना आर्ष स्वभाव एक रात में जीना आ गया है। फिर भी, भाषा और लहज़े में कई बदलाव तो लाना ज़रूरी है। बड़ी मुश्किल से अपने शब्दकोष से 'बेवकूफ़', 'बदतमीज़', 'पाजी', 'कमीना' और ऐसे ही कई शब्द निकाले गए। 'ओह शिट' तब जाकर बोलना बंद किया जब ढाई साल का आदित मेरी ही तरह सिर पर हाथ मारकर वही शब्द दुहराने लगा।
ये भी सच है कि बच्चों को कहां-कहां बचाएंगे? पार्क में साथ खेलनेवाला कबीर 'अबे ओय' कहकर आदित को बुलाता है तो मुझे अपने गुस्से पर नियंत्रण के लिए दस तक की गिनती गिननी होती है। छोटा भीम बच्चों को 'बुली बच्चों' को धराशायी कर देने के गुर सिखाता है और तरह-तरह के स्टंट्स दिखाता है तो मैं टीवी बंद कर देना चाहती हूं। स्कूल बस पर उन्हें चढ़ाते हुए बस में गूंजती जलेबी बाई की मटकती-झटकती आवाज़ सुनाई देती है तो मैं ड्राईवर से चैनल बदल देने की गुज़ारिश ही कर सकती हूं। सुबह के अख़बार को लेकर बैठने के क्रम में 'प्लेबॉय' के कवर शूट से लौटी शर्लीन चोपड़ा बत्तीसी के साथ और सबकुछ निपोड़ती दिखाई देती है तो मेरे साथ-साथ मेरे बच्चे भी देख रहे होते हैं।
हम अपने आस-पास और माहौल को कितना बदल सकते हैं, ना बच्चों को सौ पर्दों के पीछे छुपाकर रखा जा सकता है। स्कूल जाएंगे ही, बाहर निकलेंगे ही, मीडिया से बचाया नहीं जा सकता और श्लील-अश्लील सब दिखाई देगा उनको।
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| और ये हैं मेरे दो 'शरीफ़' बच्चे! |
मेरे दोस्त मुझे हेलीकॉपटर मदर कहते हैं तो गलत नहीं कहते। मैं वाकई उल्लू हूं।
गुरुवार, 14 जून 2012
गर्मी छुट्टी डायरीज़ 11:फिर भी मुश्किल है कहना, बाय बेटा
मेरी एक रिश्ते की
ननद आई हैं हमसे मिलने। नोएडा में ही रहती हैं, मेरे घर से कुछ तीन किलोमीटर दूर। लेकिन हम वहां कम मिल
पाते हैं, छुट्टियों में यहीं पूर्णियां में ही मिल
लिया करते हैं। कुछ दफ्तर जाने की मजबूरी, कुछ बच्चों और परिवार के बाद छुट्टियों के दिन भी फुर्सत ना
मिल पाने का रोना। सोनी मेरे पसंदीदा लोगों में एक हैं - बातचीत में साफगोई और
ईमानदारी, कहीं कोई लाग-लपेट नहीं। महारानी गायत्री
देवी गर्ल्स स्कूल की पढ़ी हुई, एमबीए और एक बड़ी
कंपनी में सालों से काम कर रही हैं। हर रोज़ गुड़गांव से नोएडा तक का वो थका
देनेवाला सफ़र बिना किसी शिकन के तय करती हैं, जिके बारे में सोचकर ही मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
सुबह चार बजे से लेकर आधी रात तक सुकून नहीं। दो बच्चों की मां हैं, लेकिन फिर भी काम करती रहीं लगातार।
हंसकर कहती हैं, भाभी, सब कहते हैं कि नौकरी छोड़ क्यों नहीं देती? कैसे छोड़ दें? इतनी मेहनत लगी है यहां तक पहुंचने में।
सही बात है। मैं सोनी की हिम्मत से इतनी ही प्रभावित हूं कि उठकर गले लगा लेना चाहती हूं और पूछना
चाहती हूं, कैसे करती हो ये सब? सोनी बच्चों को बोर्डिंग में भेजने की
हिमायती हैं। उनके लिए एक्सपोज़र ज़रूरी है, वैसा माहौल जो मुझे मिला, कहती हैं, तो मैं अपनी
परवरिश के बारे में सोचने लगती हूं - जो मिली, उसके बारे में भी, जो बच्चों को दे रही हूं, उसके बारे में भी।
घर की एक और बहू
के बारे में चर्चा होती है, जिनसे मैं एक ही बार मिली हूं। भाभी
इंग्लैंड में डॉक्टर हैं। मां बताती हैं कि उन्होंने दस दिन के बेटे को बाबा-दादी
के पास छोड़ दिया क्योंकि उन्हें एमडी करना था। भाभी ने एमडी भी किया, अस्पताल में नौकरी भी की, बेटे को अपने साथ भी ले गईं और उसे अकेले
पाला भी। जब दिन की ड्यूटी होती तो बेटे को केयरटेकर के साथ छोड़कर जाया करतीं और
जब नाइट ड्यूटी होती तो उसे अपने साथ अस्पताल ले जाया करतीं। उनका बेटा अब इंग्लैंड के सबसे मशहूर रेसिडेंशियल स्कूल में दसवीं में पढ़ रहा
है, और वर्ल्ड थिएटर मीट में इंग्लैंड को रेप्रेज़ेन्ट करनेवाले छह बच्चों में से
एक है। बल्कि इकलौता हिंदुस्तानी बच्चा है जो बुडापेस्ट में शेक्सपियर के नाटक का
मंचन कर रहा होगा। मां काम करती रही तो बच्चा उपेक्षित रहा या बिगड़ गया?
मैं ऐसी कई
दोस्तों को जानती हूं जो बच्चों को पालते हुए दफ्तर और घर के बीच कमाल की जगलिंग
करती हैं, ऐसी कि पेशेवर नटों को भी उनका टाइट
रोपवॉक देखकर शर्मिंदगी हो जाए। मैं खुद बच्चों को क्लायंट मीटिंग्स में ले गई हूं, शूट पर गई हूं तो एक को नानी के पास
छोड़ने के लिए रांची गई हूं, दूसरे को दादी के
पास छोड़ने के लिए पूर्णिया। ऐसा भी हुआ है कि एक हफ्ते में सात शहरों और तीन
राज्यों की यात्राएं की हैं, क्योंकि सपोर्ट
सिस्टम उतने ही दिनों के लिए मौजूद था।
हम जैसों में इतनी बेचैनी क्यों है फिर? ये कौन-सा जुनून है जो हमें चैन से बैठने
नहीं देता। काम करना मजबूरी है या वाकई कोई जुनून ही? आसान नहीं होता अगर चुन लिया होता घर में
शांति से बैठ जाना? मैं जेंडर बैलेंस की बहस में नहीं पड़ना
चाहती, लेकिन इस बात से पूरी तरह इत्तिफाक रखती
हूं कि हुनर और क्षमता किसी एक जेंडर की जागीर नहीं होती। जिस तेज़ी से पुरुषों के
दिल-ओ-दिमाग काम किया करते हैं, उतना ही शार्प
औरतों की सोच और ज़हानत होती है। ऐसा नहीं कि मैं घर में बैठ जाने के ख़िलाफ़ हूं।
बल्कि वैसी महिलाएं तो बड़ी वाहवाहियों की हकदार हैं। मेरी मां भी वैसी महिलाओं
में शामिल हैं, और मैं मां की तरह नहीं होना चाहती थी, इसलिए बेचैन रहती हूं इन दिनों।
लेकिन आसान नहीं है दोनों जहान की ज़िम्मेदारियां उठाए
चलना। कोफ्त होती है, थकान होती है और लगता है कि इतनी मुश्किलें क्यों पैदा कर
रहे हैं अपने लिए? अब आज की ही बात ले लीजिए। मैं गर्मी छुट्टियां आराम से घर पर
रहकर काट सकती थी। लेकिन लखनऊ जा रही हूं, इसलिए, क्योंकि एक सपने में यकीन है।
यकीन है कि नामुमकिन-सा दिखने वाला ये काम दरअसल एक नई मिसाल कायम करेगा। यकीन है
कि ऐसी ही छोटी-छोटी पहल से एक बड़ा बदलाव आता है। और इस बात का पुख़्ता यकीन है
कि मुझे अपनी भूमिका अदा करनी चाहिए, अपना स्किल-सेट बांटना चाहिए, चाहे इसके लिए
ख़ुद के साथ कितनी ही ज़्यादतियां क्यों ना करनी पडें?
मुश्किल बढ़ जाती है जब गर्दन से लिपटकर बेटी फूट-फूटकर
रोती है। मत जाओ मम्मा। इतना काम क्यों करती हो? मैं कहती हूं, आप भी तो करते हो
ना कितना काम आद्या। स्कूल जाती हो तो मम्मा कहां रोकती है आपको रोकर? तो क्यों
नहीं रोकते मम्मा? मैं तो जाना भी नहीं चाहती स्कूल। मैं लाजवाब हो गई हूं और उसका
रोना बंद नहीं हो रहा। मैं जेंडर बैलेंस का फंडा देती हूं फिर से, जस्ट ऐज़
आद्या-आदित दोनों स्कूल जाते हैं वैसे ही पापा को काम के लिए बाहर जाना होता है और
मम्मा को भी। नहीं... आप तो मम्मा हो ना? आपको नहीं जाना चाहिए। ये मेरा दूसरा तीर
निशाने से बहुत दूर जाकर गिरा है, लाचार और हारा हुआ।
अगले एक घंटे में मेरी ट्रेन है, वो भी कटिहार से, जो घर से
तीस किलोमीटर दूर है। समझाने की सारी कोशिशें नाकाम हो जाती हैं, वो मुझसे लिपटी
खड़ी रोती रहती है। जी में आता है, सब छोड़ दूं। कहीं नहीं जाऊं। सारे सपनों को आग
लगा दूं। कोई मजबूरी नहीं। कोई ज़रूरत नहीं। लेकिन एक ज़िन्दगी है और ख्वाहिशें
कमबख्त पापी होती हैं। मैं महत्वाकांक्षी हूं? नहीं जानती। फिर भी चचा ग़ालिब याद
आए हैं - ईमान मुझे रोके है तो खींचे है मुझे कुफ्र... मैं काम करने की मजबूरी से
मजबूर काफ़़िर मां हूं, और मुश्किल है घर से निकलते हुए तुम्हें बाय कहना, बेटा।
पोस्टस्क्रिप्ट – पोस्ट लिखते हुए बेटी का फोन आया। मम्मा,
आपको मुंबई भी जाना है। मैं कहती हूं, हां बेटा, काम तो है लेकिन तभी जाऊंगी जब आप
कहोगे। सोचकर थोड़ी देर में फोन करती हूं मम्मा, फिर हम डिसाईड कर लेंगे कि आपको
जाना चाहिए या नहीं। आद्या ने इतना कहा है और मेरा जीना आसान हो गया है आज के लिए।
मंगलवार, 5 जून 2012
Garmi Chutti Diaries 6: With love, from Mamma
“Aapne
Naani Maa ko kab bataaya ki aapko writer banna hai, Mamma? (How old were
you when you told Naani Maa that you wanted to be a writer, Mamma?)”, you asked
one night while I continued to stare at the screen, re-reading a pathetic story I had
just finished writing.
“Hmmm… I didn’t even know I was going to be
one, Aadu”, I say, gaze still fixed on the screen.
“But I know that I want to be a writer like
you one day. Should I tell you now or later?” You say and I turn to look into
your beautiful black eyes. Your smiling eyes are the best thing that I have
been gifted with, Adya. They talk, and how!
It takes a few seconds for me to realize what
you mean. I am not sure if it is the ‘want-to-be-a-writer’ part or ‘like-you’
part that I should worry about more, but I suddenly feel a tight knot form
inside my heart.
I had started writing this letter in my head
while trying to put you to sleep, and I may have lost some important points in
the process. But I will still try to tell you what it means to have a desire
like that, so you make an informed decision when you have to take one. This
letter should help you understand what it really means to have an unusual
ambition of ‘being a writer’.
I didn’t want to be a writer, to begin with. Or
at least didn’t want to be called one. It sounded too pretentious, too
difficult to believe. I would give credit to Natasha Maasi and Bhaiya Maamu for
making me believe that it was alright to call oneself a writer. It was alright
to write through most part of the day, and it was alright not to get paid for
that. And it was perfectly alright to remain unemployable with your musings and
idiosyncrasies. So, you see, writing isn’t such a fancy job after all. There is
no money, and there is hardly any fame, at least for a long long time. And
then, it is hardly considered respectable in our society. Writers are known to
be self-destructive, mad, unsocial, promiscuous and broke. Does it sound
terrifying? It is meant to be.
Do you know what I am getting in the bargain
out of this whole writing business? More and more heart breaks, while what I
write seems like a piece of junk, something you would conveniently want to tear
and toss into the dustbin. More and more sleepless nights, as I can’t get a
damn story out of my head. I have got this compulsive disorder of eavesdropping
and observing intently, when all it gives me is a terrible headache and
restlessness. Mamma seems to be lost in her own world lately, staring at faces,
trying to guess their stories or weave one for them. Nowadays I have been overwhelmed
by this strong urge of writing about things I have never talked about – even when
I am well aware of the consequences.
And then it fills me with immense peace when
I realize that this whole writing thing is taking me away from the kitchen more
and more. I care less about appeasing others now. It is taking me away from the unnecessary hours spent in fixing your
opinions about everyone else around you other than yourself. Mamma, however,
still has to learn to handle the contempt in everyone else’s eyes when she
walks into a room full of people after a long day spent on the laptop. “So,
writing again, huh?” Well, yes. Sigh. I
still haven’t found an answer to “itna kya likhti rahti ho”? So, a writer will have to be prepared to destroy
comfort zones while creating her own fantasy world. She will have to handle contempt and disdain which will come in abundance.
Do you want your characters
to be what you could never be? Do you
really want to go through the pain which isn't even yours? Especially when you don't even know if you will succeed at narrating that pain? I would rather want you to be carefree and
untouched by what was going around you. You have one life, and you should live
it well. Although I have no control over your destiny,
and I have no idea what’s in store for you, I somehow dread this thought of you writing
relentlessly.
You learn to write by trial and error. You learn to write by
walking into the walls. You learn to write by bringing forth your pain and
sufferings. You learn to write only if you are willing to go through this self-inflicted
bitterness and loss. You learn to write only when you believe that what’s
happening around you is not right, and you better talk about it in your own
way!
So, my darling, writing can get extremely
volatile for you, going against ideas of morality and righteousness that you
were raised to believe in; conjuring unpleasant or simply unbelievable notions
about life around you. If you really want to be a writer, be
open-minded, for there is nothing that’s right or wrong. We are our best
judges. And take a plunge only when you have the conviction of seeing through the
layers that we are taught to ignore.
Do not pretend to believe when you do not. It
is alright to question, debate and argue. Look for your own explanations. That’s
again something you won’t be taught, especially with a mother like me around
you, who so strongly believes in harmony that she will forego her convictions
just to maintain peace in her surroundings. That, my girl, is not a good state
to be in for a writer, or even for a woman. So, I would rather say you change
the ‘like-Mamma’ bit to ‘unlike-Mamma’. Or at least make some amendments while
you are trying to be like Mamma.
So, Adya, decide to be
a writer only when you are sure of being able to handle extreme
emotions like love and hatred. Be a writer only when you can do well
with your failures. Be a writer only when you have questions worth
thinking about.
I know in my hearts of heart that the
daughter I feel proud of everyday will make me feel proud one day. Here is what
I wish for you… May you be the creative being Mamma could hardly be and may your
life become your work of art, just the way you want it to be.
For now, Mamma will write because she wants to live life twice over - one in the moment, and the other in retrospection.
With love,
Mamma
Mamma
लेबल:
डायरी,
English,
Motherhood
शुक्रवार, 1 जून 2012
गर्मी छुट्टी डायरीज़ ३: मैं भी करती हूं... जेन्डर डिस्क्रिमिनेशन
मैं जानती थी कि आद्या तो आएगी ही। बेटी के बिना मैंने अपने मां बनने की कल्पना की ही नहीं थी। अल्ट्रासाउंड में पता चला कि जुड़वां बच्चे है, तो मैंने मां से कहा, एक तो आद्या है। दूसरा अदिति है या आदित, ये बताना मुश्किल है। हालांकि सातवें महीने से गट फीलिंग कहने लगी थी कि शांत, बिना उछल-कूद किए, बिना अपनी उंगलियां से गुदगुदी किए भीतर से चुपचाप मां को महसूस करती आद्या रही होगी और शरारती, हाइपरएक्टिव, डिमांडिंग बच्चा आदित रहा होगा। इसलिए बच्चे बाहर आए तो मुझे कोई हैरत नहीं हुई - इन्हें आद्या और आदित ही होना था, मैं पिछले कई हफ्तों से जानती थी।
सी-सेक्शन के बाद होश आया तो मुझे आईसीयू में ले जाया गया जहां दोनों बच्चे थे। आदित को इन्फेक्शन था, इसलिए उसके मुंह पर ऑक्सीज़न मास्क था, जाने कितनी नसों से जाने क्या क्या एंटिबायोटिक्स दिए जा रहे थे। पैदा होने से पहले आदित डिस्ट्रेस में आ गया था जिसकी वजह से मैं लेबर में चली गई और बत्तीसवें हफ्ते में ही बच्चों को बाहर निकालना पड़ा। आदित को देखकर कलेजा मुंह को हो आया था। पैदा होते ही इतनी तकलीफ़? बच्चे को किस बात की सज़ा मिली है, या ख़ुदा?
आदित के पालने से दूर आद्या लेटी थी। मैंने उसका नाम भी नहीं देखा था, ना नर्स ने अभी बताया ही था कि इन तीस बच्चों में मेरा दूसरा बच्चा कौन-सा है? लेकिन उसकी गहरी, काली, गोल-गोल आंखें और गोल चेहरा देखते ही मैं दूर से ही जान गई थी कि वही है आद्या। पैदा होने के तीसरे दिन ही आद्या की आंखों को बोलते सुना था। उसे पहली बार गोद में लेना और उसका टुकुर-टुकुर ताकना, फिर धीरे से मुंह सीने में छुपा लेना याद आता है तो लगता है, मां बनने का पहला एहसास ऐसा ही होता होगा - निर्मल, अनिर्वचनीय, अद्भुत, अविश्वसनीय।
मेरी बेटी शुरू से फाईटर है। खुद की बेहतरी और सुरक्षा की समझ उसे पैदा होने से पहले से है। उसे बचपन से ही ये भी मालूम है कि कब कितनी ज़िद करनी होगी और कितनी ऊंची आवाज़ में क्या मांगना होगा, कब स्पेस देना होगा, कब रोना होगा और कब चुप हो जाना होगा। आदित कमज़ोर था, इसलिए ज़ाहिर है उसके लिए हम सब को बहुत सावधानी बरतनी होती थी। दो महीने की ही थी आद्या, जब उसे समझ में आ गया था कि मां के पास होने की उससे ज्यादा उसके भाई को ज़रूरत है। बिना किसी नखरे के आद्या ने बोतल से दूध लेना शुरू कर दिया और रात में नानी के पास सोने लगी। सोचकर रुलाई आती है कि मम्मी ने आद्या को पहली बार अपने कमरे में सुलाने के लिए ले जाते हुए कहा था, बेटी है ना, अभी से त्याग करना जानती है। भाई के लिए उसने मां को छोड़ दिया।
फिर तो वो अपने-आप मुझसे दूर होती चली गई। आदित मां को नहीं छोड़ता था और आद्या कभी नानी, कभी दादी, कभी बुआ, कभी मौसी के साथ सोती रही, उनकी कहानियां सुनती रही। मेरे पास दिन में जो थोड़ा-बहुत वक्त होता था, आद्या को देना चाहती थी। लेकिन उसे तब भी मुझसे दूर होना ही रास आता था। जिस बेटी के लिए बचपन से मन्नतें मांगीं, वही बेटी जुदा-जुदा रहने लगी थी।
फिर आद्या की फितरत, उसके तेवर हैं भी मुझसे बिल्कुल अलग। मुझमें कोई फेमिनिन खूबियां नहीं। मैं बिंदी भी बड़ी मुश्किल से लगाती हूं और पांच सालों में कितनी बार तैयार हुई होऊंगी, मेकअप किया होगा, छोटी उंगली पर गिन सकती हूं। ठीक इसके विपरीत मेरी बेटी को अच्छे कपड़ों, गहनों, अच्छी खुशबूओं का शौक था। मैं क्रीम, शैंपू, लिपस्टिक, काजल छुपाती रहती और आद्या उन्हें ढूंढ-ढूंढकर अपने बार्बी बैग में सजाती रहती थी। दोनों बच्चों के लिए एक-से खिलौने लाने, इंटेलिजेंट गेम्स खिलाने की मेरी तमाम कोशिशें बेकार रहीं। आद्या जितना बार्बी की दुनिया में रहती, मुझे उतनी ही कोफ्त होती। मैं उसको जितना टॉमबॉयिश बनाना चाहती, वो उतनी ही तेज़ी से लड़कियों वाले सारे शौक पालती चली जा रही थी। मैं कहीं से लौटती तो देखती कि बिटिया रानी ने दुल्हन जैसा श्रृंगार कर रखा है अपना, और मेरा पारा चढ़ जाया करता। ये घर में चीखने-चिल्लाने और कॉन्फ्लिक्ट पैदा करने का सबब बनता जा रहा था। मैं और आद्या दूर होते चले जा रहे थे एक-दूसरे से। इतना कि वो मेरे पास होमवर्क करवाने के लिए भी नहीं बैठा करती थी। उसे मौसी चाहिए होती थी। स्कूल के लिए या तो कामवाली दीदी तैयार कराती या मौसी। मम्मा के लिए जगह नहीं थी। वक्त भी नहीं था। आदित ना चाहते हुए भी मुझे घेरे रहता था।
मैं क्यों अपनी बेटी को वक्त नहीं दे पा रही थी? हममें इतना तनाव क्यों था? पांच साल की आद्या में इतना विद्रोह, कि मां की हर बात को काटना उसका जन्मसिद्ध अधिकार हो जैसे? कहां तो मैं अपनी बेटी को उन तमाम बंदिशों से परे पालना चाहती थी जो बचपन में या अब भी जाने-अनजाने मुझपर डाली गई हों, और कहां हम एक-दूसरे से उलझते जा रहे थे। आद्या में विद्रोह के वो सारे लक्षण थे जिन्हें मैं अपने-आप में खूब मज़े में दबाती रही हूं। समस्या कहां थी? क्या मैं भी जेन्डर डिस्क्रिमिनेशन कर रही थी? या ये एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जिससे एक बेटी और एक बेटे को बड़ा करते हुए आप बच नहीं सकते?
फिर एक दिन मेरी बेटी मेरी बांहों में लौट आई। जाने वजह क्या थी, लेकिन दस दिनों तक बाबा-दादी के पास मां के बगैर रहते हुए आद्या ने मुझे जितनी शिद्दत से याद किया और जिस बेकली से मेरा इंतज़ार करती रही, उस बेचैनी की उम्मीद मुझे आद्या से नहीं, आदित से थी। लेकिन दस दिनों के बाद बच्चे पूर्णियां में मिले तो मैं उनमें आया बदलाव देखकर हैरान थी। आदित अपने पैतृक घर में ठीक उसी आत्मविश्वास और गुरूर के साथ घूम रहा है जो घर के बाकी पुरुषों में होना स्वाभाविक माना जाता है। मेरी बेटी मुझसे पूछती है कि आदित यहीं रह जाएगा और मैं कहां चली जाऊंगी मम्मा? ये सब आदित का है तो मेरा क्या है? उसके चेहरे पर परेशानी की लकीरें हैं और मैं उसका माथा चूम लेना चाहती हूं। अब समझ में आया है कि नताशा क्यों शुक्र मनाती है कि तीन बेटियां ही हुईं उसको। बेटे और बेटी को साथ बड़ा करते हुए उन्हें ये अहसास दिलाते रहना कितनी बड़ी चुनौती है कि कुछ भी नहीं ऐसा कि तुम दोनों को अलग-अलग कर सके। कोई अंतर नहीं तुम दोनों में, फिर भी एक कहलाएगा वारिस और एक को लेनी होगी इस घर से विदाई।
हम एक बिस्तर पर बैठे हैं - सासू मां, दोनों बच्चे और मैं। पतिदेव थोड़ी दूर कुर्सी पर हैं। चर्चा किसी ज़मीन की हो रही है, वैसी एकड़ों ज़मीन में से कोई एक टुकड़ा जो मैंने देखा तक नहीं। बच्चों की दादी आदित को अपनी ओर ओर खींचते हुए गले से लगाती हैं और कहती हैं, उत्तराधिकारी, ओ उत्तराधिकारी। आद्या खिसककर मेरी ओर चली आती है। मैं दादी की गोद में लेटे आदित को देखती हूं, फिर आद्या को अपनी ओर खींचकर गले से लगा लेती हूं और उसके कान में धीरे से फुसफुसाती हूं, यू विल इन्हेरिट माई मैडनेस, माई इनसैनिटी। तुम्हें मम्मा का पागलपन, मम्मा का जुनून मिलेगा विरासत में।
नहीं करना चाहती जेन्डर डिस्क्रिमिनेशन, फिर भी....
सी-सेक्शन के बाद होश आया तो मुझे आईसीयू में ले जाया गया जहां दोनों बच्चे थे। आदित को इन्फेक्शन था, इसलिए उसके मुंह पर ऑक्सीज़न मास्क था, जाने कितनी नसों से जाने क्या क्या एंटिबायोटिक्स दिए जा रहे थे। पैदा होने से पहले आदित डिस्ट्रेस में आ गया था जिसकी वजह से मैं लेबर में चली गई और बत्तीसवें हफ्ते में ही बच्चों को बाहर निकालना पड़ा। आदित को देखकर कलेजा मुंह को हो आया था। पैदा होते ही इतनी तकलीफ़? बच्चे को किस बात की सज़ा मिली है, या ख़ुदा?
आदित के पालने से दूर आद्या लेटी थी। मैंने उसका नाम भी नहीं देखा था, ना नर्स ने अभी बताया ही था कि इन तीस बच्चों में मेरा दूसरा बच्चा कौन-सा है? लेकिन उसकी गहरी, काली, गोल-गोल आंखें और गोल चेहरा देखते ही मैं दूर से ही जान गई थी कि वही है आद्या। पैदा होने के तीसरे दिन ही आद्या की आंखों को बोलते सुना था। उसे पहली बार गोद में लेना और उसका टुकुर-टुकुर ताकना, फिर धीरे से मुंह सीने में छुपा लेना याद आता है तो लगता है, मां बनने का पहला एहसास ऐसा ही होता होगा - निर्मल, अनिर्वचनीय, अद्भुत, अविश्वसनीय।
मेरी बेटी शुरू से फाईटर है। खुद की बेहतरी और सुरक्षा की समझ उसे पैदा होने से पहले से है। उसे बचपन से ही ये भी मालूम है कि कब कितनी ज़िद करनी होगी और कितनी ऊंची आवाज़ में क्या मांगना होगा, कब स्पेस देना होगा, कब रोना होगा और कब चुप हो जाना होगा। आदित कमज़ोर था, इसलिए ज़ाहिर है उसके लिए हम सब को बहुत सावधानी बरतनी होती थी। दो महीने की ही थी आद्या, जब उसे समझ में आ गया था कि मां के पास होने की उससे ज्यादा उसके भाई को ज़रूरत है। बिना किसी नखरे के आद्या ने बोतल से दूध लेना शुरू कर दिया और रात में नानी के पास सोने लगी। सोचकर रुलाई आती है कि मम्मी ने आद्या को पहली बार अपने कमरे में सुलाने के लिए ले जाते हुए कहा था, बेटी है ना, अभी से त्याग करना जानती है। भाई के लिए उसने मां को छोड़ दिया।
फिर तो वो अपने-आप मुझसे दूर होती चली गई। आदित मां को नहीं छोड़ता था और आद्या कभी नानी, कभी दादी, कभी बुआ, कभी मौसी के साथ सोती रही, उनकी कहानियां सुनती रही। मेरे पास दिन में जो थोड़ा-बहुत वक्त होता था, आद्या को देना चाहती थी। लेकिन उसे तब भी मुझसे दूर होना ही रास आता था। जिस बेटी के लिए बचपन से मन्नतें मांगीं, वही बेटी जुदा-जुदा रहने लगी थी।
फिर आद्या की फितरत, उसके तेवर हैं भी मुझसे बिल्कुल अलग। मुझमें कोई फेमिनिन खूबियां नहीं। मैं बिंदी भी बड़ी मुश्किल से लगाती हूं और पांच सालों में कितनी बार तैयार हुई होऊंगी, मेकअप किया होगा, छोटी उंगली पर गिन सकती हूं। ठीक इसके विपरीत मेरी बेटी को अच्छे कपड़ों, गहनों, अच्छी खुशबूओं का शौक था। मैं क्रीम, शैंपू, लिपस्टिक, काजल छुपाती रहती और आद्या उन्हें ढूंढ-ढूंढकर अपने बार्बी बैग में सजाती रहती थी। दोनों बच्चों के लिए एक-से खिलौने लाने, इंटेलिजेंट गेम्स खिलाने की मेरी तमाम कोशिशें बेकार रहीं। आद्या जितना बार्बी की दुनिया में रहती, मुझे उतनी ही कोफ्त होती। मैं उसको जितना टॉमबॉयिश बनाना चाहती, वो उतनी ही तेज़ी से लड़कियों वाले सारे शौक पालती चली जा रही थी। मैं कहीं से लौटती तो देखती कि बिटिया रानी ने दुल्हन जैसा श्रृंगार कर रखा है अपना, और मेरा पारा चढ़ जाया करता। ये घर में चीखने-चिल्लाने और कॉन्फ्लिक्ट पैदा करने का सबब बनता जा रहा था। मैं और आद्या दूर होते चले जा रहे थे एक-दूसरे से। इतना कि वो मेरे पास होमवर्क करवाने के लिए भी नहीं बैठा करती थी। उसे मौसी चाहिए होती थी। स्कूल के लिए या तो कामवाली दीदी तैयार कराती या मौसी। मम्मा के लिए जगह नहीं थी। वक्त भी नहीं था। आदित ना चाहते हुए भी मुझे घेरे रहता था।
मैं क्यों अपनी बेटी को वक्त नहीं दे पा रही थी? हममें इतना तनाव क्यों था? पांच साल की आद्या में इतना विद्रोह, कि मां की हर बात को काटना उसका जन्मसिद्ध अधिकार हो जैसे? कहां तो मैं अपनी बेटी को उन तमाम बंदिशों से परे पालना चाहती थी जो बचपन में या अब भी जाने-अनजाने मुझपर डाली गई हों, और कहां हम एक-दूसरे से उलझते जा रहे थे। आद्या में विद्रोह के वो सारे लक्षण थे जिन्हें मैं अपने-आप में खूब मज़े में दबाती रही हूं। समस्या कहां थी? क्या मैं भी जेन्डर डिस्क्रिमिनेशन कर रही थी? या ये एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जिससे एक बेटी और एक बेटे को बड़ा करते हुए आप बच नहीं सकते?
फिर एक दिन मेरी बेटी मेरी बांहों में लौट आई। जाने वजह क्या थी, लेकिन दस दिनों तक बाबा-दादी के पास मां के बगैर रहते हुए आद्या ने मुझे जितनी शिद्दत से याद किया और जिस बेकली से मेरा इंतज़ार करती रही, उस बेचैनी की उम्मीद मुझे आद्या से नहीं, आदित से थी। लेकिन दस दिनों के बाद बच्चे पूर्णियां में मिले तो मैं उनमें आया बदलाव देखकर हैरान थी। आदित अपने पैतृक घर में ठीक उसी आत्मविश्वास और गुरूर के साथ घूम रहा है जो घर के बाकी पुरुषों में होना स्वाभाविक माना जाता है। मेरी बेटी मुझसे पूछती है कि आदित यहीं रह जाएगा और मैं कहां चली जाऊंगी मम्मा? ये सब आदित का है तो मेरा क्या है? उसके चेहरे पर परेशानी की लकीरें हैं और मैं उसका माथा चूम लेना चाहती हूं। अब समझ में आया है कि नताशा क्यों शुक्र मनाती है कि तीन बेटियां ही हुईं उसको। बेटे और बेटी को साथ बड़ा करते हुए उन्हें ये अहसास दिलाते रहना कितनी बड़ी चुनौती है कि कुछ भी नहीं ऐसा कि तुम दोनों को अलग-अलग कर सके। कोई अंतर नहीं तुम दोनों में, फिर भी एक कहलाएगा वारिस और एक को लेनी होगी इस घर से विदाई।
हम एक बिस्तर पर बैठे हैं - सासू मां, दोनों बच्चे और मैं। पतिदेव थोड़ी दूर कुर्सी पर हैं। चर्चा किसी ज़मीन की हो रही है, वैसी एकड़ों ज़मीन में से कोई एक टुकड़ा जो मैंने देखा तक नहीं। बच्चों की दादी आदित को अपनी ओर ओर खींचते हुए गले से लगाती हैं और कहती हैं, उत्तराधिकारी, ओ उत्तराधिकारी। आद्या खिसककर मेरी ओर चली आती है। मैं दादी की गोद में लेटे आदित को देखती हूं, फिर आद्या को अपनी ओर खींचकर गले से लगा लेती हूं और उसके कान में धीरे से फुसफुसाती हूं, यू विल इन्हेरिट माई मैडनेस, माई इनसैनिटी। तुम्हें मम्मा का पागलपन, मम्मा का जुनून मिलेगा विरासत में।
नहीं करना चाहती जेन्डर डिस्क्रिमिनेशन, फिर भी....
मंगलवार, 8 मई 2012
तेरे सिरहाने गुज़रे जो रात और दिन
सुघड़ मां? मैं? तीर-ए-नीमकश-सा कुछ गया है दिल के आर-पार। छह साल मैंने गुज़ार दिए तुम दोनों के बहाने। इरादा ये नहीं था कि सुघड़ मां का तमगा हासिल कर लेना है। लेकिन मां होने की आड़ में खुद से बड़ी ज्यादतियां की हैं, तुमलोगों से भी, आस-पास से भी।
छह साल बर्बाद होने दिए, आबाद होने दिए। जब औंधे मुंह गिरी, मातृत्व के माथे फोड़ दिया ठीकरा। ट्विन् यू सी, वेरी डिफिकल्ट टू डू द जगलिंग। सफल हो गई तो वाहवाहियां भी इन्हीं के नाम। दोनों मेरी प्रेरणा हैं, म्यूज़ हैं, बचाए-जिलाए रखते हैं मुझे। इनसे ही तो सीखती हूं सबकुछ।
मुमकिन हो आधी हक़ीकत, आधा फ़साना जैसा कुछ आलम यहां भी हो। थोड़ा-बहुत लिखने का शऊर है तो किसी भी बात को अपने तरीके से तोड़-मरोड़ ही डालूंगी। इसलिए एक कन्फेशन करना चाहती हूं। मेरे होने-ना होने में तुम दोनों का उतना ही हाथ है, जितना मेरी मां ने मुझे बनाया-बिगाड़ा होगा। मां के ना चाहते हुए भी मैं भीतर की घुन्नी, विद्रोहिणी, अव्वल दर्ज़े की पाखंडी और बहानेबाज़ निकली। मेरे पास मेरी हर असफलता का बहाना था, मेरी हर नाकामियों के लिए जस्टिफिकेशन।
अब ये जस्टिफिकेशन तुम लोगों के नाम कर दिया है। बच्चों को स्कूल भेजना है, इसलिए जल्दी सोना पड़ता है। उन्हें सुबह तैयार करना होता है इसलिए मॉर्निंग वॉक के लिए कैसे जाऊं? उनके लिए घर में होना होता है, तो काम कैसे करूं? बच्चे बीमार हैं तो डेडलाईन गई भाड़ में। सिरहाने बीस-बाईस किताबें रखी हैं सजाकर। हर दूसरे दिन मैगज़ीनवाला नई मैगज़ीन दे जाता है और मैं बिना पढ़े उसको पत्रिकाएं लौटा दिया करती हूं। बच्चों के साथ वक्त कहां मिलता है? नालायकी और आलस्य की हद है।
सुघड़ मां का एक किस्सा सुनाऊं? पिछले हफ्ते की बात है। आदित बीमार था, और घर पर था। याद नहीं ठीक-ठीक कि मैं लैपटॉप पर क्यों थी? फेसबुक पर थी या जीटॉक पर, असाईनमेंट लिखकर रही थी या कॉन्सेप्ट नोट, इससे फर्क नहीं पड़ता। बच्चा बगल में लेटा हुआ था, और मैं कीबोर्ड पर लगी हुई थी।
"मैं टेन तक गिनूं तो आपका काम हो जाएगा, मम्मा?"
"हूं? हूं।"
"वन, टू, थ्री, फोर.... टेन। मम्मा हो गया। आपका हुआ?"
"हूं? नहीं हुआ।"
"हन्ड्रेड तक गिनूं, मम्मा?"
बिना उसकी तरफ देखे मैं स्क्रीन पर आंखें गड़ाए बैठी रही।
"गिन लो।" मकसद टालना था।
"ट्वेन्टी... थर्टी एट... सिक्सटी सेवेन.... नाईन्टी वन... हन्ड्रेड.... मम्मा, हो गया।"
"अच्छा।"
मेरा काम अब भी खत्म नहीं हुआ था। जाने कौन-सा महाकाव्य लिखने में लगी थी।
"मम्मा... हो गया..."
"हूं..."
"मम्मा, प्लीज़... हो गया... मेरी तरफ देखो न।"
"एक मिनट, बेटा... ये कर लूं?"
"मम्मा, वॉशरूम।"
"क्या?"
"वॉशरूम, मम्मा।"
"तो चले जाओ ना आदित।"
"ठीक है।" बच्चा बुखार में उठा, और लड़खड़ाते हुए बिस्तर से नीचे उतरने लगा। तब होश आया कि मेरा बेटा बीमार है। गिल्ट मिटाने के लिए इतना ही कहा मैंने, "मम्मा चले साथ?"
"हां, प्लीज़ मम्मा। चक्कर आ रहा है।"
मुझे होश तब आया और मैंने उसे गोद में उठाया।
मेरी गर्दन के दोनों ओर हाथ बांधकर उसने धीरे-से कान में कहा, "उतार दो मम्मा। डॉक्टर ने आपको भारी चीज़ उठाने से मना किया है। पीठ में दर्द होगा।"
"तुम इतने भी भारी नहीं हो आदित", हम फिर से एक-दूसरे में मसरूफ हो गए। आदित भी मुस्कुरा उठा। वॉशरूम से लौटने के ठीक पांच मिनट बाद तक मैं उसके माथे पर हाथ फेरती रही। फोन की घंटी बजी। क्लायंट। जिसका डर था, वही हुआ।
"आर यू डन, अनु? आधे घंटे में मेल कर सकोगी?"
"नहीं यार। हैव जस्ट बीन सो टेरिबली कॉट अप। माई सन इज़ नॉट वेल।"
"ओ हो। टेक योर टाईम देन। शाम को बात करते हैं।"
हां, लेकिन बेटे ने मुझे काम करने से कब रोक लिया था? मैं रात में जाग सकती थी। सुबह काम कर सकती थी। उसे वक्त देते हुए चार पन्ने लिखने में कितना वक्त लगता है?
हेन्स प्रूव्ड, मां सुघड़ नहीं, निहायत ही डिसऑर्गनाइज़्ड और बेसलीका है। उसका वक्त कहां किसी का हो पाता है? उसका वक्त अपना भी नहीं होता।
बच्चों के सिरहाने गुज़ारनेवाले रात और दिन के नाम मां ने अपनी तमाम नाकामियां कर दी हैं। दस साल बाद कहना शुरू कर दूंगी, मैं दुनिया की सबसे बेहतरीन प्रोफेशनल होती मगर... आई कुडन्ट बिकॉज़ ऑफ यू। ये मेरे बच्चों के लिए सबसे बड़ी सज़ा हो शायद और मेरे लिए अपना आलस छुपाने का सबसे बड़ा कवच।
हैप्पी मदर्स डे, मम्मा!
छह साल बर्बाद होने दिए, आबाद होने दिए। जब औंधे मुंह गिरी, मातृत्व के माथे फोड़ दिया ठीकरा। ट्विन् यू सी, वेरी डिफिकल्ट टू डू द जगलिंग। सफल हो गई तो वाहवाहियां भी इन्हीं के नाम। दोनों मेरी प्रेरणा हैं, म्यूज़ हैं, बचाए-जिलाए रखते हैं मुझे। इनसे ही तो सीखती हूं सबकुछ।
मुमकिन हो आधी हक़ीकत, आधा फ़साना जैसा कुछ आलम यहां भी हो। थोड़ा-बहुत लिखने का शऊर है तो किसी भी बात को अपने तरीके से तोड़-मरोड़ ही डालूंगी। इसलिए एक कन्फेशन करना चाहती हूं। मेरे होने-ना होने में तुम दोनों का उतना ही हाथ है, जितना मेरी मां ने मुझे बनाया-बिगाड़ा होगा। मां के ना चाहते हुए भी मैं भीतर की घुन्नी, विद्रोहिणी, अव्वल दर्ज़े की पाखंडी और बहानेबाज़ निकली। मेरे पास मेरी हर असफलता का बहाना था, मेरी हर नाकामियों के लिए जस्टिफिकेशन।
अब ये जस्टिफिकेशन तुम लोगों के नाम कर दिया है। बच्चों को स्कूल भेजना है, इसलिए जल्दी सोना पड़ता है। उन्हें सुबह तैयार करना होता है इसलिए मॉर्निंग वॉक के लिए कैसे जाऊं? उनके लिए घर में होना होता है, तो काम कैसे करूं? बच्चे बीमार हैं तो डेडलाईन गई भाड़ में। सिरहाने बीस-बाईस किताबें रखी हैं सजाकर। हर दूसरे दिन मैगज़ीनवाला नई मैगज़ीन दे जाता है और मैं बिना पढ़े उसको पत्रिकाएं लौटा दिया करती हूं। बच्चों के साथ वक्त कहां मिलता है? नालायकी और आलस्य की हद है।
सुघड़ मां का एक किस्सा सुनाऊं? पिछले हफ्ते की बात है। आदित बीमार था, और घर पर था। याद नहीं ठीक-ठीक कि मैं लैपटॉप पर क्यों थी? फेसबुक पर थी या जीटॉक पर, असाईनमेंट लिखकर रही थी या कॉन्सेप्ट नोट, इससे फर्क नहीं पड़ता। बच्चा बगल में लेटा हुआ था, और मैं कीबोर्ड पर लगी हुई थी।
"मैं टेन तक गिनूं तो आपका काम हो जाएगा, मम्मा?"
"हूं? हूं।"
"वन, टू, थ्री, फोर.... टेन। मम्मा हो गया। आपका हुआ?"
"हूं? नहीं हुआ।"
"हन्ड्रेड तक गिनूं, मम्मा?"
बिना उसकी तरफ देखे मैं स्क्रीन पर आंखें गड़ाए बैठी रही।
"गिन लो।" मकसद टालना था।
"ट्वेन्टी... थर्टी एट... सिक्सटी सेवेन.... नाईन्टी वन... हन्ड्रेड.... मम्मा, हो गया।"
"अच्छा।"
मेरा काम अब भी खत्म नहीं हुआ था। जाने कौन-सा महाकाव्य लिखने में लगी थी।
"मम्मा... हो गया..."
"हूं..."
"मम्मा, प्लीज़... हो गया... मेरी तरफ देखो न।"
"एक मिनट, बेटा... ये कर लूं?"
"मम्मा, वॉशरूम।"
"क्या?"
"वॉशरूम, मम्मा।"
"तो चले जाओ ना आदित।"
"ठीक है।" बच्चा बुखार में उठा, और लड़खड़ाते हुए बिस्तर से नीचे उतरने लगा। तब होश आया कि मेरा बेटा बीमार है। गिल्ट मिटाने के लिए इतना ही कहा मैंने, "मम्मा चले साथ?"
"हां, प्लीज़ मम्मा। चक्कर आ रहा है।"
मुझे होश तब आया और मैंने उसे गोद में उठाया।
मेरी गर्दन के दोनों ओर हाथ बांधकर उसने धीरे-से कान में कहा, "उतार दो मम्मा। डॉक्टर ने आपको भारी चीज़ उठाने से मना किया है। पीठ में दर्द होगा।"
"तुम इतने भी भारी नहीं हो आदित", हम फिर से एक-दूसरे में मसरूफ हो गए। आदित भी मुस्कुरा उठा। वॉशरूम से लौटने के ठीक पांच मिनट बाद तक मैं उसके माथे पर हाथ फेरती रही। फोन की घंटी बजी। क्लायंट। जिसका डर था, वही हुआ।
"आर यू डन, अनु? आधे घंटे में मेल कर सकोगी?"
"नहीं यार। हैव जस्ट बीन सो टेरिबली कॉट अप। माई सन इज़ नॉट वेल।"
"ओ हो। टेक योर टाईम देन। शाम को बात करते हैं।"
हां, लेकिन बेटे ने मुझे काम करने से कब रोक लिया था? मैं रात में जाग सकती थी। सुबह काम कर सकती थी। उसे वक्त देते हुए चार पन्ने लिखने में कितना वक्त लगता है?
हेन्स प्रूव्ड, मां सुघड़ नहीं, निहायत ही डिसऑर्गनाइज़्ड और बेसलीका है। उसका वक्त कहां किसी का हो पाता है? उसका वक्त अपना भी नहीं होता।
बच्चों के सिरहाने गुज़ारनेवाले रात और दिन के नाम मां ने अपनी तमाम नाकामियां कर दी हैं। दस साल बाद कहना शुरू कर दूंगी, मैं दुनिया की सबसे बेहतरीन प्रोफेशनल होती मगर... आई कुडन्ट बिकॉज़ ऑफ यू। ये मेरे बच्चों के लिए सबसे बड़ी सज़ा हो शायद और मेरे लिए अपना आलस छुपाने का सबसे बड़ा कवच।
हैप्पी मदर्स डे, मम्मा!
शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012
फूल ये कहां से आए हैं, बोलूं?
बिस्तर पर चित्त लेटते ही उनके सवालों का पिटारा खुल जाता है। कहानियों की फरमाईश होती है, गीतों के मुखड़े सो जाने के बदले मांगे जाते हैं रिश्वत में। मैं दिनभर की थकान मच्छरदानी की तरह बाहर टांगकर सुकून से सोना चाहती हूं, लेकिन दोनों तरफ से धाराप्रवाह सवाल ऊंघती आंखों पर पानी के ठंडे छींटे मारते हैं।
मौसम कैसे बदलता है? बारिश कहां से आती है? आपके बाबा कहां चले गए? मर जाना किसको कहते हैं? हम सपने कैसे देखते हैं? नींद में धड़कन कैसे चलती है? सोने के लिए आंखें बंद क्यों करनी पड़ती है? कबूतर के बच्चे अंडे से ही क्यों निकलते हैं? बिजली कहां से आती है? आटा कैसे बनता है? रोटी गोल ही क्यों होती है?
थककर मैं अपनी दोनों हथेलियों से उनके मुंह बंद कर देती हूं। अंधेरे में भी उनकी गोल-गोल आंखें सवाल करती नज़र आती हैं।
ये मेरी ज़िन्दगी का सबसे ख़ूबसूरत लम्हा होना चाहिए। मुझपर दो ज़िन्दगियों की जड़ें मज़बूत करने का दारोमदार है। मुझे चुना गया उस वरदान के लिए जिसके लिए कई-कई सालों तक लोग पीर-फकीरों के दरवाज़े चूमते हैं। फिर ये थकान क्यों? क्यों है बंध जाने की शिकायतें? किस बात का मलाल है? क्या नहीं जी पाने का अफ़सोस है?
मातृत्व बंधन लेकर आता है। आप कई फ़ैसले खुद से परे लेते हैं। कॉफी के मग में उडेलकर पी ली जानेवाली बेपरवाह शामें छिन जाया करती हैं, घड़ी की सुईयों की गुलामी बख्श दी जाती है और अपने कपड़ों की सिलवटों में बच्चों के स्कूल ड्रेस के आयरन ना होने की फिक्र दिखाई देती है। घर को कला संग्रहालय बनाने के ख्वाब को दीवारों की लिखे ककहरे में तब्दील करना होता है, सवालों के जवाब ढूंढने के लिए विकीपीडिया की भाषा को सरल बनाने का अतिरिक्त काम (बिना किसी इन्सेन्टिव के) भी करना होता है। घुमन्तू को पैरों के पहिए निकालकर रबर की चप्पलें डालनी होती हैं, और उनके घिस जाने की परवाह दिमाग के आखिरी कोने में ढकेलनी होती है।
ऐसा नहीं कि मैं भाग जाना नहीं चाहती। ऐसा नहीं कि पैरों पर पैर चढ़ाए एक के बाद एक कविताओं की किताबों के पन्ने पलेटने का मन नहीं होता। ऐसा भी नहीं कि शामें बच्चों के होमवर्क के नाम नहीं, एक तन्हा सफर के नाम करने की इच्छा नहीं होती। अपने वजूद का हिस्सा-हिस्सा बंटता है और अपनी क्षमताओं के कहीं आगे जाकर हर वो नामुमकिन काम करना सीखाता है मां बन जाना, जो आपको कोई और रोल नहीं सिखा सकता। कुक, मैनेजर, वकील, जज, टीचर, ड्राईवर, धोबी, आया - ऑल रोल्ड इनटू वन।
चलो सो जाते हैं कि कल भी एक दर्ज़न रोलप्ले करने हैं। वैसे ऊपरवाला ऊब जाता है तो मौसम बदल जाता है, बारिश एक निश्चित चक्र में चलती है, मेरे बाबा आसमान में सबसे ज्यादा चमकनेवाला सितारा बन गए,
मर जाना हमेशा के लिए सुकून में चले जाना होता है, सपने दिनभर मंडराया करते हैं हमारे आस-पास और रात को चुपके से आ जाते हैं आंखों में, नींद में धड़कन भी धीमी चलती है, आंखों को भी आराम चाहिए इसलिए बंद करनी होती है पलकें, कबूतर के बच्चों को अंडों का कवच चाहिए कुछ दिनों के लिए, बिजली का एक घर होता है जहां से तारों का सहारा लेकर हमारे घर आती है रौशनी, आटा गेहूं से बनता है और कल से तिकोनी रोटी खिलाऊंगी तुम लोगों को... कि आज की रात के लिए इतने जवाब काफी हैं।
जो फिर भी तसल्ली ना हो तो वो गाना सुन लो, जो मम्मा बचपन में सुना करती थी कभी-कभी चित्रहार में।
मौसम कैसे बदलता है? बारिश कहां से आती है? आपके बाबा कहां चले गए? मर जाना किसको कहते हैं? हम सपने कैसे देखते हैं? नींद में धड़कन कैसे चलती है? सोने के लिए आंखें बंद क्यों करनी पड़ती है? कबूतर के बच्चे अंडे से ही क्यों निकलते हैं? बिजली कहां से आती है? आटा कैसे बनता है? रोटी गोल ही क्यों होती है?
थककर मैं अपनी दोनों हथेलियों से उनके मुंह बंद कर देती हूं। अंधेरे में भी उनकी गोल-गोल आंखें सवाल करती नज़र आती हैं।
ये मेरी ज़िन्दगी का सबसे ख़ूबसूरत लम्हा होना चाहिए। मुझपर दो ज़िन्दगियों की जड़ें मज़बूत करने का दारोमदार है। मुझे चुना गया उस वरदान के लिए जिसके लिए कई-कई सालों तक लोग पीर-फकीरों के दरवाज़े चूमते हैं। फिर ये थकान क्यों? क्यों है बंध जाने की शिकायतें? किस बात का मलाल है? क्या नहीं जी पाने का अफ़सोस है?
मातृत्व बंधन लेकर आता है। आप कई फ़ैसले खुद से परे लेते हैं। कॉफी के मग में उडेलकर पी ली जानेवाली बेपरवाह शामें छिन जाया करती हैं, घड़ी की सुईयों की गुलामी बख्श दी जाती है और अपने कपड़ों की सिलवटों में बच्चों के स्कूल ड्रेस के आयरन ना होने की फिक्र दिखाई देती है। घर को कला संग्रहालय बनाने के ख्वाब को दीवारों की लिखे ककहरे में तब्दील करना होता है, सवालों के जवाब ढूंढने के लिए विकीपीडिया की भाषा को सरल बनाने का अतिरिक्त काम (बिना किसी इन्सेन्टिव के) भी करना होता है। घुमन्तू को पैरों के पहिए निकालकर रबर की चप्पलें डालनी होती हैं, और उनके घिस जाने की परवाह दिमाग के आखिरी कोने में ढकेलनी होती है।
ऐसा नहीं कि मैं भाग जाना नहीं चाहती। ऐसा नहीं कि पैरों पर पैर चढ़ाए एक के बाद एक कविताओं की किताबों के पन्ने पलेटने का मन नहीं होता। ऐसा भी नहीं कि शामें बच्चों के होमवर्क के नाम नहीं, एक तन्हा सफर के नाम करने की इच्छा नहीं होती। अपने वजूद का हिस्सा-हिस्सा बंटता है और अपनी क्षमताओं के कहीं आगे जाकर हर वो नामुमकिन काम करना सीखाता है मां बन जाना, जो आपको कोई और रोल नहीं सिखा सकता। कुक, मैनेजर, वकील, जज, टीचर, ड्राईवर, धोबी, आया - ऑल रोल्ड इनटू वन।
चलो सो जाते हैं कि कल भी एक दर्ज़न रोलप्ले करने हैं। वैसे ऊपरवाला ऊब जाता है तो मौसम बदल जाता है, बारिश एक निश्चित चक्र में चलती है, मेरे बाबा आसमान में सबसे ज्यादा चमकनेवाला सितारा बन गए,
मर जाना हमेशा के लिए सुकून में चले जाना होता है, सपने दिनभर मंडराया करते हैं हमारे आस-पास और रात को चुपके से आ जाते हैं आंखों में, नींद में धड़कन भी धीमी चलती है, आंखों को भी आराम चाहिए इसलिए बंद करनी होती है पलकें, कबूतर के बच्चों को अंडों का कवच चाहिए कुछ दिनों के लिए, बिजली का एक घर होता है जहां से तारों का सहारा लेकर हमारे घर आती है रौशनी, आटा गेहूं से बनता है और कल से तिकोनी रोटी खिलाऊंगी तुम लोगों को... कि आज की रात के लिए इतने जवाब काफी हैं।
जो फिर भी तसल्ली ना हो तो वो गाना सुन लो, जो मम्मा बचपन में सुना करती थी कभी-कभी चित्रहार में।
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