मैं अक्सर इस बात से हैरान होती हूँ कि कैसे दिमाग़ की कोई एक ख़लल अदना-सी ख़्वाहिश रच लेती है, मन उस ख़्वाहिश को पालता-पोसता रहता है और फिर अचानक कुछ ऐसा होता है कि सारी वाह्य ताकत मिलकर उस ख़्वाहिश को पूरा करने में लग जाती है। अगर इसे लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन की कोई एक टूटी-फूटी थ्योरी ही मान लें तब भी मैंने अपनी ज़िन्दगी में कई बार इस थ्योरी को काम करते देखा है।
पिछले हफ़्ते मैं अपनी साइकोथेरेपिस्ट के पास बड़ी हैरान-परेशान गई थी। मेरे पास मेरी नाजायज़ दुश्चिताओं का पिटारा था। हाल ही में एक सहेली के पति का अचानक सफ़र से लौटते हुए देहांत हो गया। दोनों पति-पत्नी अपनी बच्ची को विदेश की एक यूनिवर्सिटी में छोड़कर वापस अपने शहर लौट रहे थे। हवाई जहाज़ में ही दिल का दौरा पड़ा और उतरते-उतरते तक, अस्पताल तक पहुँचते पहुँचते तक उस दिल के दौरे ने एक अच्छे-ख़ासे सेहतमंद इंसान की जान ले ली। इस हादसे के लिए कोई तैयार नहीं था। हादसे के लिए कब कहाँ कोई तैयार हो पाता है!
मैंने मौत को कई बार बहुत करीब से देखा है। आख़िरी हिचकी में साँस जाते हुए देखा है, और जानती हूँ कि जिससे आप बेइंतहा मोहब्बत करते हैं, जिसके इर्द-गिर्द आपकी दिनचर्या चलती है, जिसके होने से आपके वजूद का एक हिस्सा है उसके चले जाने का, और इस तरह अचानक बड़ी तकलीफ़ में चले जाने का अफ़सोस और उस अफ़सोस से पैदा हुई असहायता कितनी बड़ी होती है। रात को अपने बिस्तर पर लेटो तो वो अफ़सोस, वो हेल्पलेसनेस हज़ारों सूई की नोंक से पूरे बदन, पूरी सोच को छलनी किए रहता है।
और चिंता की फ़ितरत तो मालूम है न? चुंबक से भी ख़तरनाक तासीर है उसकी। एक पालो तो हज़ार लोहे के कील की तरह की शंकाएँ आकर्षित करती है अपनी ओर।
बहरहाल, मैं अपनी थेरेपिस्ट के सामने बैठी थी। एक हज़ार शिकायतों का पिटारा था। मेरी पीठ पिछले एक महीने से इस बुरी तरह तकलीफ़ में थी कि मेरा उठना-बैठना-चलना मुश्किल था। मेरे भीतर एक अजीब किस्म का डिटैचमेंट पैदा हो रहा था। दुनिया को छोड़-छाड़ कर किसी गुमनाम जगह भाग जाने की ख़्वाहिश सिर उठाने लगी थी। रात-रात भर ये ख़्याल आता था कि अगर हममें से कोई एक भी मर गया तो ज़िन्दगी में क्या थमेगा, क्या चलेगा। सवालों की शख़्सियत किसी लिहाज से ख़ुशमिजाज़ तो कतई नहीं थी। हम क्यों हैं, किसलिए हैं, ये भागदौड़ क्यों, जीवन का मकसद क्या, मरकर क्या और जीकर क्या। बेतुके। बेहद बेतुके सवाल।
हम भरे-पूरे भी कमाल हैं, और तन्हा भी कमाल हैं।
थेरेपिस्ट ने कहा, "आँखें बंद करो और उन तीन लम्हों के बारे में सोचो जब यू फ़ेल्ट लकी, रियली रियली लकी।" ऐसे तीन लम्हों के बारे में सोचना दुश्वार लगा। आँखें बंद किए सोचती रही। और बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के जवाब दिमाग़ में तोप से निकले गोलों की तरह गूँजने लगे।
मुझे जन्म देने का सुख मिला है - एक बार में दो हसीन बच्चों को। और मुझे याद आए मेरे ही अपने लोग, जिन्होंने अपनी आधी ज़िन्दगी और पूरी कमाई एक बच्चे की कोशिश में निकाल दी।
मेरी टूटी हुई पीठ और शरीर में बहुत सारी तकलीफ़ के बावजूद मेरे पास एक घर है जहाँ मैं सुकून से जी सकती हैं, परिवार है जो मेरी दुखती रग पर हर वक़्त पेनकिलर लगाने के लिए तैयार रहता है, और इतने तो पैसे हैं ही कि मैं एक सेशन के लिए थेरेपिस्ट की सर्विस लेने की क्षमता रखती हूँ।
मुझे कई वो लम्हे याद आए जब मुझे प्यार मिला, बेइंतहा प्यार - एकदम अनकंडिशनल। ये लोग जो अपने पहलू में मेरे लिए जगह बनाते रहे हैं, मेरे दोस्त हैं, मेरे परिचित हैं, और कई बार तो अजनबी भी रहे हैं। ये वो लोग हैं जिनसे में काम-बेकाम, वक्त-बेवक्त, कभी ख़ुदगर्ज़ी में और कभी बेहद निस्सवार्थ भाव से मिलती रही हूँ। जिनसे अपना कुछ न कुछ बाँटती रही हूँ। ये बाँटना हमेशा इन्टैन्जिबल रहा है - अमूर्त। वक्त के रूप में, दर्द के रूप में, डर के रूप में, ख़्वाब के रूप में, यकीन के रूप में और शंकाओं के रूप में। इनमें से कईयों ने मेरे सामने सरेंडर किया यकीन से, कुछ के सामने मैं अपने भरोसे समेटने के लिए बिखरी हूँ। ये लोग क्यों हैं? ये लोग क्यों थे? किस्मत ही थी न! ख़ुश-किस्मत! लक!
और फिर आँखें बंद किए-किए ही मुझे याद आया एक शब्द - सेरेन्डिपिटी!
"सो, अनु! ओपन योर आईज़ एंड टेल मी… व्हाट मेड यू फ़ील रियली रियली लकी?" थेरेपिस्ट ने पूछा।
"सेरेन्डिपिटी। इन्सिडेन्ट्स ऑफ़ सेरेन्डेपिटी हैव मेड मी फ़ील रियली रियली लकी," मैंने जवाब दिया।
मैं सेरेन्डिपिटी नाम की एक गोली लिए लौट आई, इस सलाह के साथ कि मैं तबतक किसी की कोई मदद नहीं कर सकती जबतक ख़ुद ठीक न रहूँ। ये भी सच लगा कि मेरा डर किसी के काम नहीं आनेवाला था, उस सहेली के काम भी नहीं जो वैसे भी अपनी ज़िन्दगी से जूझ रही थी। शायद सेरेन्डिपिटी मेरे काम आती, शायद उसके लिए सेरेन्डिपिटी का इंतज़ार काम आता।
शब्दकोश सेरेन्डिपिटी के लिए ये तर्जुमा देता है - आकस्मिक लाभ, या अकस्मात से कुछ खोज करना। मैं सेरेन्डिपिटी को सुखद संयोग से जोड़ती हूँ। सेरेन्डिपिटी मेरे लिए वो हसीन इत्तिफ़ाक़ है जो ज़िन्दगी में मेरा यकीन बचाए रखता है।
जितनी ही बार मैं अचानक कुछ छोटा-बड़ा खोजने निकली हूँ, उतनी ही बार मेरे हाथ कुछ न कुछ लगा ज़रूर है। थेरेपिस्ट के सामने मैं एक्ज़िटेंशियल क्राइसिस के जवाब ढूँढने गई थी, जवाब में मुझे अपनी ही ज़िन्दगी का सबसे बड़ा हसीन राज़ मिल गया! सेरेन्डिपिटी ही तो है।
एक मिसाल देती हूँ। पिछले हफ़्ते मुक्तेश्वर जाने से दो दिन पहले मेरे पब्लिशर शैलेश भारतवासी मुझसे मेरे घर पर मिलने आए, इसलिए क्योंकि मैंने अपनी ही कुछ किताबें मँगाई थीं उनसे। बातों बातों में अपने नए प्रोजेक्ट के बारे में बात करते हुए मैंने शैलेश से कहा कि मैं एक मेल सिंगर की तलाश कर रही हूँ। शैलेश ने मुझे एक युवा सिंगर का नाम बताया, और हम दोनों ने मिलकर यूट्यूब पर उस सिंगर को खोजने की बहुत कोशिश की लेकिन मेरे हाथ कुछ न आया। बस सिंगर का नाम रह गया ज़ेहन में - हरप्रीत।
दो दिन बाद मैं शताब्दी में थी। कोई प्लानिंग थी नहीं लेकिन उसी ट्रेन में शैलेश दिखे - अकस्मात। और शैलेश को देखते ही मेरे दिमाग़ में फिर वो नाम आया - हरप्रीत, और ये कि मुझे वापस दिल्ली लौटकर इस सिंगर का पता करना है।
फिर मैं मुक्तेश्वर में थी, बल्कि सोनापानी के एक रिसॉर्ट में, जहाँ हम इकलौते मेहमान थे। मेज़बानों से बात करते हुए पता चला कि सोनापानी एक म्यूज़िक फ़ेस्टिवल और फ़िल्म फ़ेस्टिवल ऑर्गनाइज़ करता है। कुछ फ़ितरत मिलती थी, और कुछ बातचीत में मज़ा आ रहा था इसलिए मैंने अपने मेज़बानों से अपने नए प्रोजेक्ट की बात की और उन्हें वो गाने भी सुनाए जो हमने कम्पोज़ करवाए थे।
मेरी मेज़बान दीपा ने कहा, "तुमने हरप्रीत को सुना है कभी?" मैं चौंक गई। ये वही नाम तो था जिसके बारे में मैं पता करने की कोशिश कर रही थी! दीपा अपना आईपैड ले आई और मैंने हरप्रीत के कुछ गीत वहीं बैठे-बैठे ही सुन लिए। अगले दो घंटे में मेरे पास न सिर्फ़ हरप्रीत की पूरी सीडी थी (जो मुझे दीपा ने तोहफ़े में दी) बल्कि तीन दिन के भीतर दिल्ली में हरप्रीत से मिलवाने का वायदा भी था (मैं आज हरप्रीत से मिल रही हूँ!)।
सोचा कहाँ, खोजा कहाँ और खोज पूरी कहाँ जाकर हुई!
ये है सेरेन्डिपिटी। अब सोच रही हूँ तो ध्यान में आ रहा है कि जिस प्रोजेक्ट के लिए मैं हरप्रीत से एक बार मिलना चाहती थी, वो पूरा का पूरा प्रोजेक्ट ही सेरेन्डिपिटी के दम पर निकला है (उस प्रोजेक्ट - द गुड गर्ल शो के बारे में बातें फिर कभी)। इतनी ही अहमियत रखते हैं ये हसीन इत्तिफ़ाक़ और हम बेकार में अपना रोना लेकर दुनिया भर में भटकते फिरते हैं। अपने ग़म, अपने दुख, अपने डर बचाए रखते हैं ताकि लोगों के हिस्से के प्यार हमें मिलता रहे। दुनिया को एक ग़मगीन इंसान ख़ूब प्यारा होता है। दुख में डूबे गीत सबसे हसीन होते हैं। टूटे हुए एक दिल के क़िस्से बटोरने वाला कहानीकार हम सबका अजीज़ होता है।
लेकिन फिर भी, सेरेन्डिपिटी भी एक चीज़ होती है यार जो बटोरती है, समेटती है, यकीन देती है। ये सेरेन्डिपिटी अकाट्य, अटल लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन का अकाट्य, अटल सत्य है।
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मंगलवार, 4 अक्टूबर 2016
शुक्रवार, 30 सितंबर 2016
नापना पहाड़, छूना गहराईयाँ!
आदित पहाड़ की एक चोटी पर खड़ा है। अभी-अभी ठीक दस मिनट पहले मैंने उस चोटी से नीचे झाँकने की ज़ुर्रत की थी। बड़े-बड़े नुकीले पत्थरों से बना हुआ पहाड़ का वो हिस्सा कई छोटी छोटी पहाड़ियों में बँटता हुआ नीचे मुक्तेश्वर की खाई में कहाँ जाकर मिलता है, चोटी से आप ये नहीं देख सकते। नीचे दूर तक पसरी मुक्तेश्वर की गहरी खाई है, गाँव हैं, घर है कहीं कहीं और हरियाली को चूमते बादल हैं। हमें यहाँ तक लेकर आए हमारे ड्राईवर खेमराज साब का दावा है कि मुक्तेश्वर वैली उत्तराखंड की सबसे बड़ी, सबसे खुली हुई वैली है। मैं एक बार फिर नीचे झाँककर देखती हूँ। वाकई, ये जगह खुलकर साँस लेती-सी लगती है! हालाँकि जिस तेज़ी से पर्यटन के व्यवसाय के लिए पहाड़ कट रहे हैं और गाँव गायब हो रहे हैं, उतनी ही तेज़ी से ये वैली सिकुड़ती जा रही है।
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| "हम कितना नीचे जा सकते हैं, माँ?" |
ध्यान वापस आदित की ओर है जो अभी भी पहाड़ की चोटी पर खड़ा अपने ट्रेनरों के निर्देश को ध्यान से सुन रहा है। नीचे की खाई और आदित के बीच का फ़ासला देखकर मेरा कलेजा मुँह को आ जाता है। धड़कनों की आवाज़ तेज़ होते-होते चेहरे पर पसरने लगती हैं। मेरे भीतर से कोई चीख-चीखकर कहने को बेताब है, "बेटा, उतर जाओ वहाँ से। कोई ज़रूरत नहीं है एडवेंचर करने की। रैपलिंग या रॉक क्लाइम्बिंग नहीं करोगे तो दुनिया इधर की उधर थोड़े न हो जाएगी?"
बेवकूफ़ी है, इस तरह पहाड़ नापने की कोशिश।
मुझे सुहैल शर्मा की याद आ जाती है जो 2015 के एवरेस्ट एवलांच में मौत को छूकर आया था, और फिर निकल गया था अगली ही टोली के साथ एवरेस्ट की चोटी छूकर आने की ख़ातिर। मैं सुहैल से काठमांडू में मिली थी, नेपाल भूकंप के दौरान। पूछा था मैंने उससे कि पहाड़ों से ख़तरे मोल लेने की ये कौन-सी आदत है? उसने मुझे एक सिर्फ़ एक जवाब दिया था, "मैं एवरेस्ट की चोटी पर खड़ा होकर एक हाथ में अपने पापा की तस्वीर और दूसरे में तिरंगा लिए एक फ़ोटो ऑप चाहता हूँ बस।" मैं जवाब की अगली कड़ियों का इंतज़ार करती रही थी। बड़ी देर से समझ आया था कि सुहैल का जवाब ख़त्म हो गया था। वो वाकई बस इसी एक लम्हे के लिए अपनी जान हथेली पर लिए एवरेस्ट को नापने निकला था। पागल कहीं का!
लेकिन आदित - दस साल का आदित - इस रॉक क्लाइम्बिंग के लिए क्यों निकला था? मैं क्यों बुत बैठे उसे वो करते हुए देख रही थी जो वो करना चाहता था? मैं चीख-चीखकर उसे मना क्यों नहीं कर रही थी? जहाँ मेरा बेटा खड़ा था वहाँ से नीचे जाने पर किसी इंसानी जिस्म का क्या हाल हो सकता था, मेरे लिए ये सोच भी वर्जित थी। लेकिन मन का क्या है?! वर्जनाएँ तोड़-तोड़कर शंकाओं के लिए नई-नई ज़मीनें तलाश करता रहता है ये मन!
आदित उतनी देर में रस्सियों में बँधा हुआ पहाड़ से नीचे उतरने लगा था। पत्थर पर पाँव रखकर नब्बे डिग्री पर अपने शरीर को झुलाता हुआ, संभल संभल कर हवा में लटके अपने शरीर के लिए पैरों से अपने लिए ज़मीन तलाश करता हुआ... पहाड़ की चोटी और सत्तर फीट नीचे तक के उसके सफ़र के बीच दो इंस्ट्रक्टर उसकी हौसला अफ़्ज़ाई कर रहे थे, एक ऊपर से और एक नीचे से। मैं वहाँ से अलग होकर बैठी थी, करीब पचास फीट दूर, चुपचाप उसके एक-एक कदम के साथ अपनी साँस-साँस गिनती हुई।
दूर कहीं से किसी के गाने की आवाज़ आ रही थी। जहाँ हम थे वहाँ सैलानी मुक्तेश्वर घाटी का 220डिग्री नज़ारा देखने के लिए आते हैं। खुले हुए दिनों में नंदादेवी भी दिखाई पड़ती हैं वहाँ से, लेकिन उस दिन घने बादलों और धूप के बीच की लुकाछिपी थी। सैलानियों का आना शुरू हो गया था। गानेवाला गाइड उनके मनोरंजन के लिए कभी मोहम्मद रफी तो कभी सुरेश वाडेकर की घटिया नकल उतार रहा था। कुमार सानू तक आते-आते उसको झेलना आसान हो गया था। जितनी बार वो होSSSओSSS का आलाप लेता, उतनी बार मुझे इस बात का डर लगने लगता कि कहीं आदित का ध्यान उसकी बेसुरी आवाज़ से तो नहीं भटक जाएगा।
लेकिन ऊपर बढ़ती सैलानियों की भीड़ से बेपरवाह आदित जितनी सहजता से धीरे-धीरे नीचे उतरता चला गया था, उतनी ही आसानी से ऊपर चढ़ने की शुरुआत भी कर दी थी उसने। उसके इंस्ट्रक्टर और ऊँची आवाज़ में उसे निर्देश देने लगे थे, मेरे बगल में बैठी आद्या की जकड़ मेरे हाथ पर मज़बूत होती चली गई थी। आदित के बाद इस एडवेंचर के लिए आद्या को उतरना था।
आदित के ऊपर पहुँचते ही बिना देर किए मैंने आद्या को पहाड़ की ओर धकेल दिया। अब जाओ, तुम भी कर लो अपनी ज़िद पूरी! भीड़ बढ़ती जा रही थी। पता नहीं कहाँ से गुजराती टूरिस्टों का एक पूरा जखीरा उस पहाड़ पर उतर आया था। जिन रस्सियों को दूर ले जाकर पेड़ों में बाँधा गया था, और जिनके सहारे बच्चे उतर रहे थे, उन रस्सियों को लोग आते-जाते उठा-उठाकर देखते। किनारे से चलने की ज़ेहमत किसी को गवारा नहीं थी। इंस्ट्रक्टर चिल्लाते रहे, लेकिन लोग उन्हीं रस्सियों के आर-पार आते-जाते रहे। मुझे डर था कि कहीं रस्सियाँ ढीली होकर बच्चों को नुकसान न पहुँचा दे। तबतक आद्या के कमर में रस्सियाँ बँध चुकी थी और अब पहाड़ की चोटी पर खड़ी होने की बारी उसकी थी।
मैं जहाँ थी, वहीं बैठी रही। बस दो बार चीखकर लोगों पर रस्सियाँ छूते ही बरसी थी। उससे ज़्यादा योगदान मेरा था नहीं। बच्चे अपना डर एडवेंचर करते हुए निकाल रहे थे, मेरे लिए उनको देखकर अपना जिगर संभाले रखने का काम ही बहुत था।
आद्या के पैर काँप रहे थे। चोटी से उतरते हुए उसके कदम डगमगाने लगे थे। उसके चेहरे पर डर साफ़ दिखाई दे रहा था। भीड़ बढ़ गई थी और आस-पास पहाड़ों से झाँकती हुई, आद्या को देखती हुई गुजराती पब्लिक की लाइव कमेन्ट्री भी चालू हो गई थी। "देख न, छोरी को देख... क्या कर रही है!" "अरे रस्सी बँधी हुई है।" "तो क्या हुआ?" "आप माँ हो उसकी?" मेरे बगल में एक अधेड़ अंकल आकर खड़े हो गए। मैंने कुछ कहा नहीं, सिर्फ़ सिर हिला दिया। "इसमें क्या मज़ा मिल रहा है आपको, हैं? बच्चों को ऐसे नीचे उतार दिया? कुछ हो-हवा गया तो?" मैं चुपचाप आद्या को देख रही थी। उसके पैर अभी भी काँप रहे थे। अपनी बहुमूल्य राय मुझसे बाँट लेने के बाद अंकल पहले आद्या का, और फिर मुक्तेश्वर घाटी का वीडियो लेने में मसरूफ़ हो गए। मेरे जी में एक बार को आया कि उनके हाथ से फ़ोन खींचकर नीचे पहाड़ों के बीच कहीं फेंक दूँ!
आद्या मुश्किल से दस फीट भी नहीं उतर पाई थी। या तो वो डर गई थी, या फिर लोगों की इतनी बड़ी भीड़ देखकर इतनी नर्वस हो गई थी कि उसे इंस्ट्रक्टरों के निर्देश ठीक से समझ नहीं आ रहा था। वजह जो भी हो, वो डर के बार-बार रस्सी छोड़ देती थी और उसका शरीर पहाड़ से टकराते हुए झूल जाता था। मैं चीख भी नहीं सकती थी। तमाशा देखनेवालों की भीड़ ने वो ज़िम्मा उठा लिया था।
इतनी देर में आद्या को देखने की ख़ातिर आदित उसी बड़े से पत्थर के कोने से झाँकने लगा जहाँ से रैपलिंग की शुरुआत होती थी। मैंने दूर से देखा कि उसका आधा शरीर पहाड़ से लटका हुआ है और वो वहीं से अपनी बहन का हौसला बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। भीड़ की रनिंग कमेंट्री की झल्लाहट थी और आद्या की डर का डर भी था, मैं ज़ोर से आदित पर चिल्लाई। आदित ने सहमकर अपना शरीर पत्थर के पीछे खींच लिया और दूर कोने में जाकर बैठ गया। बिना आदित पर ध्यान दिए मैंने चिल्लाकर आद्या से कहा कि अगर उसका एडवेंचर करने का मन नहीं है तो वो वापस आ सकती है। "यू हैव ट्राइड वेल आदू। वापस आने का मन हो तो बोलो," मैंने कहा।
आद्या ने मेरी नहीं सुनी और धीरे-धीरे पहाड़ उतरती रही। नाराज़ होकर बैठ उसके भाई ने नहीं देखा कि कैसे अचानक आद्या के पैर बड़े भरोसे के साथ पत्थरों के कोने तलाशते हुए अपने लिए ग्रिप ढूंढ रहे हैं और फिर कैसे उन्हीं ग्रिप को खोजते हुए वो वापस ऊपर चढ़ने लगी है। बल्कि क्लाइम्बिंग का सफर उसने बड़ी तेज़ी से तय किया। चीखने-चिल्लाने वाली भीड़ अब आद्या के लिए तालियाँ बजा रही थी। लोग साँस रोके पत्थरों के पीछे से झुक-झुककर उसके ऊपर आने का इंतज़ार कर रहे थे। कुछ लोगों ने तो ऊपर से ही उसके लिए ग्रिप ढूँढने का काम शुरू कर दिया था। "बच्ची, बाएँ देखो बाएँ..." "तुम्हारे पैर के दस इंच नीचे… हाँ हाँ बस उधर ही उधर ही…" "अपना शरीर ऊपर खिसकाओ… न न… रस्सी दाएँ से नहीं, बाएँ से पकड़ो…!"
कुछ लोगों के शोरगुल का असर था, कुछ आद्या के भीतर लौट आया आत्मविश्वास था - आद्या बड़ी तेज़ी से ऊपर चढ़ते हुए वापस पहाड़ की चोटी पर जा खड़ी हुई। लोग उसके लिए तालियाँ बजा रहे थे, चियर कर रहे थे। कोने में आदित मुँह फुलाए आँसू बहा रहा था। मैं उसको चढ़ते देखते हुए इतनी मशगूल हो गई कि उसकी तस्वीरें लेना ही भूल गई!
आदित पहले उतरा था, डरा भी नहीं था, बहादुरी से एडवेंचर किया था उसने। जबकि आद्या डर रही थी। उसका पूरा शरीर काँप रहा था। वो तो आद्या से ज़्यादा बहादुर था। लेकिन इतने सारे लोगों ने उसके लिए तालियाँ तो बजाईं नहीं। ऊपर से मम्मा की डाँट पड़ी सो अलग।
मैंने दोनों बच्चों को गले लगाया। आदित को दो मिट्ठू ज़्यादा मिले - एक उसकी बहादुरी के लिए, और एक माफ़ी के तौर पर। गुजराती सैलानियों की टीम बिखरकर चौली की जाली की ओर बढ़ने लगी थी। लेकिन नाना-नानी, बाबा-दादी, काका-काकी की उम्र के लोग आते-जाते बच्चों के सिर पर हाथ फिरा रहे थे। आद्या के कंधों को ज़्यादा शाबाशियाँ मिलीं। आदित के सिर पर हाथ फिराने के लिए लोगों को मैं और बच्चों के इंस्ट्रक्टर, दोनों को याद दिलाना पड़ता था।
- हममें से अधिकांश लोग चोटी पर बैठे हुए खाई की ओर देख रहे होते हैँ। छलाँग लगाकर गहराई को नापने की हिम्मत जो रखता है, क़ायनात उसी के हिस्से में हैरानियाँ और चमत्कार रखती है।
- लीप एंड द नेट विल अपियर। कूदो और ये यकीन रखो आसमानों के पास तुम्हारी हिफ़ाज़त के लिए रस्सियों के जाल फेंकने का हुनर है। ऑल्वेज़ हैव फेथ।
- डर जीतना बड़ा होता है, उस पर जीत उतनी ही बड़ी होती है।
- तुम्हारी किस्मत कभी आदित की तरह होगी कि तुम्हारी बहादुरियों और जज्बे से ज़्यादा आद्या-सी कोशिशों पर तालियाँ बजेंगी, तारीफ़ें मिलेंगी। लेकिन पहाड़ नापने की हिम्मत न हम तालियों के लिए करते हैं न तारीफ़ों के लिए। वो हिम्मत हम अपने लिए करते हैं, ख़ुद गिरते संभलते हैं। तालियाँ और वाहवाहियाँ फ्रिंज बेनेफ़िट हो सकती हैं, लक्ष्य नहीं। लक्ष्य तो चिड़िया की आँख है। सॉरी, पहाड़ की वो चोटी, जिसपर सही सलामत लौट जाना है।
- तुम्हें गिरते-सँभलते देखकर किनारों पर से चीख-चीखकर सलाह देने वाले बहुत मिलेंगे। तुम्हारे गिरने पर वो कहेंगे, "हम न कहते थे?" तुम्हारी जीत पर कहेंगे, "हमें तो इसके दम-खम का पहले से अंदाज़ा था!" जहाँ खड़े हैं वहाँ से उनके वश में इतना ही है बस। उनकी परवाह न करना, उनसे ख़ुद को बचाए रखना इस दुनिया का सबसे दुरूह मेडिटेशन है।
- ज़िन्दगी की गहराईयों और ऊँचाईयों को नापने-पहचानने का काम हम अपने लिए करते हैं, किसी के सामने कुछ प्रूव करने के लिए नहीं। हम ख़तरे अपने लिए उठाते हैं। अपने डर अपने लिए बचाए रखते हैं और अपने लिए उनपर फ़तह हासिल करते हैं। (सुहैल मर के लौट आने के बाद भी एवरेस्ट पर चढ़ाई के लिए क्यों निकल पड़ा था, अचानक ये बात मुझे समझ आ गई थी!)
और आख़िरी बात - मुझे अब लगातार ब्लॉग लिखना शुरू कर देना चाहिए। यूँ लग रहा है कि जैसे मैंने अपनी किसी प्यारी सहेली से दिल की बात कह दी हो!
रविवार, 24 अगस्त 2014
Then as it was, then again it will be...
(It is uncanny how I was dreaming of my grandfather yet again.
Two years later... the same date... the same dream.
Here is a note I wrote on FB on August 23rd, 2012. Yet another proof of what writing a diary could do to us, and how writing helps us understand our lives, actions and ourselves better through months and years, and through our lifetime. Yet another proof of why we should often communicate with ourselves. Yet another proof of how our expressions help us in the moments of despair.)
I woke up really early today, having cried freely even in my dreams. It is really uncanny how I dream of my grandfather every time there is something I need to take a decision about.
I dreamt of him again last night. He was restless, and he was making me look for something I had lost. He was stading right behind me holding me by my shoulders, forcing me to duck down right under the bed.
"It's filthy out there. I am allergic to dust," I resisted.
"Get a broom and clean it", he said.
That couldn't be my grandfather, I thought to myself. This has to be someone else. Baba would have never asked me to pick up a broom, and do something THAT menial. I was too precious for him.
I couldn't find what I was looking for, but I have got your message Baba.
I need to clean up. I need to duck down in order to see where all this filth is lying, and I need to look for what I have lost, making my way through that clutter.
I need to find myself. I need to find patience. And I need to find time to indulge in meaningful conversations with myself in order to express better.
Now, THAT is what is bothering me. I am in such a hurry most of the time that I just need outlets to express - short conversations, a flash of thought, an idea, a sentence, a phrase, a line which is self-explanatory... All the mediums through which I am communicating are giving me such outlets.
But what happened to the more meaningful conversations? The result is here - endless day-to-day shallowness and a monotony that is making me wonder where all my time is going!
Is this what I wanted my expressions to be?
I don't deny that what starts here with a monologue sometimes results into very meaningful and quick dialogues, with ideas flowing in from all sides - sometimes inspirational, sometimes creative, intuitive, imaginative, but quick nevertheless. And if you come to think of it, these quick conversations are like quick lovemaking, which fulfills the desire but can never be passionate and meaningful.
An action doesn't necessarily proceed by laws or by reasons. An action proceeds by feelings, intuition and conscience. An action, I would like to believe, is a representation of thoughts and behaviour. Consider this action of mine a way of disciplinging myself. I need to stay quiet. I need to cry without feeling miserable. I need to laugh without having this obsessive compulsive disorder of sharing that joke with the world. I need to be with myself. I am hoping that it surely will bring some order to the chaos of mind and will help me make the unknown known. If not that, it will at least help me acknowledge the unknown, and sometimes help me accept it.
For now, I would like to measure "a meaningful talk" by the control it has managed to achieve over outbursts of emotions.
I will come back when I have something more meaningful and important to share that the mundane status updates and note-to-selfs. I will come back when I have found myself.
क्या कहूं कहां ग़ुम हूं मुद्दतों से,
मुझको तो ढूंढने निकला है अब घर मेरा।
And here is the famous Led Zeppelin song which has been on a loop since early morning. Melancholy has its own charm, I tell you!
"But the eagle leaves the nest, it's got so far to go
Changes fill my time, baby, that's alright with me
In the midst I think of you, and how it used to be"
In the midst I think of you, and how it used to be"
बुधवार, 20 अगस्त 2014
ख़ानाबदोशियों पे ही जाने क्यों, इलाही मेरा जी आए!
टूटा हुआ एक घोंसला, बिस्तर पर फुदकते दो चूजे, फ़र्श पर घूमती बेपरवाह निर्भीक मोटी छिपकली, बिखरा हुआ घर और बाथरूम का एक नल जो बंद ही नहीं हो रहा... रात कुछ ऐसे बिंबों से होकर गुज़री है।
शुक्र है, सुबहों का वजूद रातों से आज़ाद होता है।
साढ़े छह बज गए हैं, लेकिन मैं उठना नहीं चाहती। छह चालीस हो गए हैं, लेकिन मैं फिर भी उठना नहीं चाहती। अगले पैंतीस मिनट में बच्चों की बस आ जाएगी, लेकिन मैं फिर भी उठना नहीं चाहती।
जाने वजह क्या है। रात जल्दी सो गई थी। लेकिन फिर भी मैं उठना नहीं चाहती। मैं बच्चों के बहाने अपनी छुट्टी चाहती हूँ।
बच्चों का इंटर-हाउस कविता पाठ है आज, और दोनों ने बहुत तैयारी की है। आदित तो साढ़े नौ बजे तक होमवर्क करता रहा था, और अपने क्लास के नोटिस बोर्ड पर लगाने के लिए पुलिसवाले का एक स्केच बनाता रहा था। नींद में भी दोनों अपनी-अपनी रटी हुई कविताएं दोहराते रहे थे।
मुझे उठना ही होगा। मुझे दोनों को स्कूल भेजना ही होगा, वरना दिल टूट जाएगा दोनों का।
साढ़े सात से थोड़ा पहले ही घर एकदम खाली हो जाता है। यूं कि जैसे तूफ़ान गुज़र गया हो, और आपाधापियों की निशानियां चुनते हुए एक ही ख़्याल तारी रहता है - बिस्तर पर जाऊं और सो जाऊं बस। गहरी नींद। बहुत गहरी। मर जाने के माफ़िक। और जब उठूं तो किसी अनजान शहर में उठूं, जहां से बिस्तर से बाथरूम तक जाने तक का दरवाज़ा ढूंढना पड़े, रसोई खोजनी पड़े, घर से बाहर निकलने का दरवाज़ा ख़ुद ही बनाना पड़े।
हम सबसे ज़्यादा जो छुपाते हैं, अपनी थकान को छुपाते हैं। जिस्म से ज़्यादा मन की थकान को।
मन को थकान दूर करने का कोई तरीका चाहिए।
ऐसे थके हुए मन को रिजुवेनेट करने के लिए जुलिया कैमेरॉन आपको आर्टिस्ट डेट पर जाने की सलाह देती हैं। कहती हैं कि अपने 'इनर चाइल्ड', अपनी भीतर के 'आर्टिस्ट चाइल्ड' को घर से बाहर निकालिए। शहर में बेवजह घूमिए। सूखी हुई पत्तियाँ अपनी जेबों में भरिए। टूटे-फूटे पत्थर गली-मोहल्लों से लाकर अपनी मेज़ों पर सजाईए। हफ़्ते में एक घंटे का वक़्त अपने लिए, सिर्फ़ अपने लिए निकालिए। ये वक़्त आपके भीतर के 'आर्टिस्ट चाइल्ड' की ज़िद पूरी करने का है।
मैं सोचती हूं, जूलिया कैमरॉन हिंदुस्तान में - ख़ासकर - उत्तर भारत में नहीं रही होंगी। सितंबर की चिलचिलाती धूप और गंदी-सी उमस में भला कोई पत्ते-पत्थर चुनने घर से बाहर जाए? मेरे भीतर का आर्टिस्ट चाइल्ड कभी सोता, कभी रोता हुआ ही ठीक है। हमारे देश में बच्चे ऐसे ही पाल लिए जाते हैं। हमारा समाज बच्चों को नर्चर करने में यकीन नहीं करता, इस बात पर यकीन करता है कि बच्चे बड़े हो ही जाते हैं। रोज़़-रोज़ का संघर्ष जो है, वो बच्चों और बच्चों की तरह भीतर के आर्टिस्ट बच्चे की बात सुनने का वक़्त नहीं देता।
फिर क्या है कि मन ज़िद पर अड़ा है? फिर क्यों मैं बेवजह इंटरनेट पर दुनिया के सबसे तन्हां और अलहदा शहरों के नाम ढूंढ रही हूं? क्यों गूगल पर अचानक टाईप कर बैठी - the 25 most remote places in the world? वो कौन-सी हैरतें हैं जो मैं जीना चाहती हूं, महसूस करना चाहती हूं? रोज़मर्रा की ज़िन्दगी कम हैरतअंगेज़ है? आस-पास कम हैरानियां, कम सदमे हैं कि कहीं दूर जाकर डूबते हुए देखना है सूरज को?
वो कौन-सा शहर होता होगा जहाँ रात उगती नहीं होगी कभी?
वो कौन-सा पहाड़ होगी जिसके चिकने पत्थरों पर से फिसलकर सीधे प्लूटो पर लैंड किया जा सके?
वो कौन-सी नदी होगी जिससे निकलकर मछलियां रेत पर आराम फ़रमाती हों?
दुनिया का सबसे ऊंचा, और सबसे नीचा शहर कैसा होता होगा?
मछुआरों की बस्तियों में क्या वाकई समंदर से निकलकर नाचने के लिए आती होंगी रूहें?
जंगल की बीचोंबीच सड़क जब बल खाना भूल जाती होगी तो कहाँ ठहरती होगी?
एक ज़िन्दगी में ये सब देख लें और जान लें, क्या मुमकिन है ये भी?
दो किताबें और एक आर्टिकल दूसरी ज़ुबान की शक्ल में ढलने का इंतज़ार कर रहे हैं। टूृ-लिस्ट है कि ख़त्म नहीं होती। क्लायंट मीटिंग्स और कॉनकॉल्स आज की ज़िन्दगी का इकलौता सच है। ड्राफ्ट्स में अधूरी कहानियां पुकार पुकार कर थक चुकी हैं। बाज़ार के सौ काम हैं, और बाज़ार जाने के नाम पर आनेवाली उबकाई कम नहीं हुई। मेरा बस चले तो दूध और सब्जी भी ऑनलाइन खरीद लूं। दोस्तों को आवाज़ देना चाहती हूं, लेकिन शुक्र है कि मेरे पास किसी का फोन नंबर नहीं। एक ही रोना क्या रोना हर रोज़? काम के अलावा ख़ुद को बचाए रखने का कोई दूसरा रास्ता नहीं। डेडलाइन जिए जाने की इकलौती वजह है।
सब जानती हूं, लेकिन फिर भी...
ख़ानाबदोशियों पे ही जाने क्यों,
इलाही मेरा जी आए, आए।
इलाही मेरा जी आए...
बूंदों पे नहीं, गहरे समंदर पे
इलाही मेरा जी आए, आए
इलाही मेरा जी आए!!!
शुक्र है, सुबहों का वजूद रातों से आज़ाद होता है।
साढ़े छह बज गए हैं, लेकिन मैं उठना नहीं चाहती। छह चालीस हो गए हैं, लेकिन मैं फिर भी उठना नहीं चाहती। अगले पैंतीस मिनट में बच्चों की बस आ जाएगी, लेकिन मैं फिर भी उठना नहीं चाहती।
जाने वजह क्या है। रात जल्दी सो गई थी। लेकिन फिर भी मैं उठना नहीं चाहती। मैं बच्चों के बहाने अपनी छुट्टी चाहती हूँ।
बच्चों का इंटर-हाउस कविता पाठ है आज, और दोनों ने बहुत तैयारी की है। आदित तो साढ़े नौ बजे तक होमवर्क करता रहा था, और अपने क्लास के नोटिस बोर्ड पर लगाने के लिए पुलिसवाले का एक स्केच बनाता रहा था। नींद में भी दोनों अपनी-अपनी रटी हुई कविताएं दोहराते रहे थे।
मुझे उठना ही होगा। मुझे दोनों को स्कूल भेजना ही होगा, वरना दिल टूट जाएगा दोनों का।
साढ़े सात से थोड़ा पहले ही घर एकदम खाली हो जाता है। यूं कि जैसे तूफ़ान गुज़र गया हो, और आपाधापियों की निशानियां चुनते हुए एक ही ख़्याल तारी रहता है - बिस्तर पर जाऊं और सो जाऊं बस। गहरी नींद। बहुत गहरी। मर जाने के माफ़िक। और जब उठूं तो किसी अनजान शहर में उठूं, जहां से बिस्तर से बाथरूम तक जाने तक का दरवाज़ा ढूंढना पड़े, रसोई खोजनी पड़े, घर से बाहर निकलने का दरवाज़ा ख़ुद ही बनाना पड़े।
हम सबसे ज़्यादा जो छुपाते हैं, अपनी थकान को छुपाते हैं। जिस्म से ज़्यादा मन की थकान को।
मन को थकान दूर करने का कोई तरीका चाहिए।
ऐसे थके हुए मन को रिजुवेनेट करने के लिए जुलिया कैमेरॉन आपको आर्टिस्ट डेट पर जाने की सलाह देती हैं। कहती हैं कि अपने 'इनर चाइल्ड', अपनी भीतर के 'आर्टिस्ट चाइल्ड' को घर से बाहर निकालिए। शहर में बेवजह घूमिए। सूखी हुई पत्तियाँ अपनी जेबों में भरिए। टूटे-फूटे पत्थर गली-मोहल्लों से लाकर अपनी मेज़ों पर सजाईए। हफ़्ते में एक घंटे का वक़्त अपने लिए, सिर्फ़ अपने लिए निकालिए। ये वक़्त आपके भीतर के 'आर्टिस्ट चाइल्ड' की ज़िद पूरी करने का है।
मैं सोचती हूं, जूलिया कैमरॉन हिंदुस्तान में - ख़ासकर - उत्तर भारत में नहीं रही होंगी। सितंबर की चिलचिलाती धूप और गंदी-सी उमस में भला कोई पत्ते-पत्थर चुनने घर से बाहर जाए? मेरे भीतर का आर्टिस्ट चाइल्ड कभी सोता, कभी रोता हुआ ही ठीक है। हमारे देश में बच्चे ऐसे ही पाल लिए जाते हैं। हमारा समाज बच्चों को नर्चर करने में यकीन नहीं करता, इस बात पर यकीन करता है कि बच्चे बड़े हो ही जाते हैं। रोज़़-रोज़ का संघर्ष जो है, वो बच्चों और बच्चों की तरह भीतर के आर्टिस्ट बच्चे की बात सुनने का वक़्त नहीं देता।
फिर क्या है कि मन ज़िद पर अड़ा है? फिर क्यों मैं बेवजह इंटरनेट पर दुनिया के सबसे तन्हां और अलहदा शहरों के नाम ढूंढ रही हूं? क्यों गूगल पर अचानक टाईप कर बैठी - the 25 most remote places in the world? वो कौन-सी हैरतें हैं जो मैं जीना चाहती हूं, महसूस करना चाहती हूं? रोज़मर्रा की ज़िन्दगी कम हैरतअंगेज़ है? आस-पास कम हैरानियां, कम सदमे हैं कि कहीं दूर जाकर डूबते हुए देखना है सूरज को?
वो कौन-सा शहर होता होगा जहाँ रात उगती नहीं होगी कभी?
वो कौन-सा पहाड़ होगी जिसके चिकने पत्थरों पर से फिसलकर सीधे प्लूटो पर लैंड किया जा सके?
वो कौन-सी नदी होगी जिससे निकलकर मछलियां रेत पर आराम फ़रमाती हों?
दुनिया का सबसे ऊंचा, और सबसे नीचा शहर कैसा होता होगा?
मछुआरों की बस्तियों में क्या वाकई समंदर से निकलकर नाचने के लिए आती होंगी रूहें?
जंगल की बीचोंबीच सड़क जब बल खाना भूल जाती होगी तो कहाँ ठहरती होगी?
एक ज़िन्दगी में ये सब देख लें और जान लें, क्या मुमकिन है ये भी?
दो किताबें और एक आर्टिकल दूसरी ज़ुबान की शक्ल में ढलने का इंतज़ार कर रहे हैं। टूृ-लिस्ट है कि ख़त्म नहीं होती। क्लायंट मीटिंग्स और कॉनकॉल्स आज की ज़िन्दगी का इकलौता सच है। ड्राफ्ट्स में अधूरी कहानियां पुकार पुकार कर थक चुकी हैं। बाज़ार के सौ काम हैं, और बाज़ार जाने के नाम पर आनेवाली उबकाई कम नहीं हुई। मेरा बस चले तो दूध और सब्जी भी ऑनलाइन खरीद लूं। दोस्तों को आवाज़ देना चाहती हूं, लेकिन शुक्र है कि मेरे पास किसी का फोन नंबर नहीं। एक ही रोना क्या रोना हर रोज़? काम के अलावा ख़ुद को बचाए रखने का कोई दूसरा रास्ता नहीं। डेडलाइन जिए जाने की इकलौती वजह है।
सब जानती हूं, लेकिन फिर भी...
ख़ानाबदोशियों पे ही जाने क्यों,
इलाही मेरा जी आए, आए।
इलाही मेरा जी आए...
बूंदों पे नहीं, गहरे समंदर पे
इलाही मेरा जी आए, आए
इलाही मेरा जी आए!!!
मंगलवार, 19 अगस्त 2014
एक चिट्ठी 'गुलज़ार' के नाम!
गुलज़ार साब,
उड़ीसा में एक इत्तू-सा स्टेशन है - इतना ही इत्तू-सा कि गूगल पर भी बड़ी मुश्किल से मिलता है। इंटरसिटी में बैठने के बाद मुझे कई बार स्टेशन का नाम मन ही मन कई बार रटना पड़ा था - राईराखोल... राईराखोल... राईराखोल... राईरोखोल। कुल दो मिनट ट्रेन रुकती थी वहाँ, और ग़लती से स्टेशन छूट जाता तो अगला स्टेशन कौन-सा होगा, ये भी नहीं मालूम था। उड़िया बोल पाती तो सूरमा बन जाती, लेकिन ज़ुबानों पर मेरी अपनी निर्भरता ने मेरे भीतर की भीरू लड़की के सारे पोल खोल दिए थे।
और ऊपर से ग़ज़ब बात ये कि जिस ड्राईवर को मुझे लेने आना था, वो पहुंचा नहीं वक़्त पर। एक अजनबी प्लैटफॉर्म पर गुम हो जाना फैंटैसी रही है मेरी, लेकिन वो प्लैटफॉर्म राईराखोल नहीं हो सकता था। What a disgrace it would have been!
स्टेशन पर उग आए पलाश के पेड़ों को गिनने में मुझे जितना वक़्त लगा, उतने ही लंबे थे ड्राईवर साब का 'दो मिनट'। गाड़ी में बैठते ही उस ड्राईवर के सात ख़ून माफ़ कर देने का फ़ैसला कर लिया था मैंने। एक तो अप्रैल में जलते उड़ीसा से झूठी राहत मिल गई थी, और दूसरा - गाड़ी में आपकी आवाज़ गूंज रही थी - याद है/मेरी मेज़ पर बैठे-बैठे/सिगरेट की डिबिया पर/छोटे-से एक पौधे का स्केच बनाया था...
मुझे मालूम नहीं था कि मैं किस शहर, किस क़स्बे में हूँ।
मुझे ये भी मालूम नहीं था कि मुझे जाना कहाँ है।
मैं ये भी नहीं जानती थी कि मुझे मंज़िल पर पहुँचाने का बीड़ा उठाने वाले इस ड्राईवर पर यकीन करना भी चाहिए या नहीं।
मुझे रास्ते का पता न था, जिन लोगों से मिलने जाना था उन लोगों के फोन नंबर के अलावा मेरे पास कोई और जानकारी न थी।
(मैं एक फ़ील्ड विज़िट पर थी, और गांवों में जाकर एक रिपोर्ट के लिए डेटा इकट्ठा कर रही थी। उड़ीसा के पांच ज़िलों के सफ़र पर थी, अकेली।)
लेकिन गाड़ी में आपकी आवाज़ सुनते ही सिक्स्थ सेंस ने कहा, इस अजनबी आदमी पर यकीन किया जा सकता है। जिस डाईवर की गाड़ी में गुलज़ार और जगजीत सिंह की आवाज़ मुसलसल बहती हो, वो ड्राईवर मेहमानों की सलामती अपनी ज़िम्मेदारी समझता होगा।
राईराखोल के जंगल-गांवों से निकलते हुए, महानदी के विशालकाय पुल से होकर, किसी नेशनल हाईवे के रास्ते हम सफ़र करते रहे, और गाड़ी में आपकी आवाज़ के पीछे-पीछे चलकर आपकी लिखी ग़ज़लें आती रहीं, गूंजती रहीं।
सारी वादी उदास बैठी है
मौसम-ए-ग़ुल ने ख़ुदकशी कर ली
किसने बारूद बोया बाग़ों में?
मैं नियमगिरि से कुछ ही दूर थी। मै कालाहांडी के रास्ते में थी। मैं उन जंगलों, पहाड़ों से होकर गुज़र रही थी जिनकी आवाज़ें तभी सुनाई देती हैं जब तरक्कीपरस्त लोग उनपर हमले बोलते हैं। हैरान थी कि हर जगह का अलग-अलग सच एक नज़्म में कैसे बयां हो सकता है? लेकिन ये नज़्मआपकी लिखी थी। जिसने ज़िन्दगी को भरपूर, और भरपूर ईमानदारी से जिया-बोया-काटा-धोया-खंगाला हो, उसका बयां किया हुआ सच यूनिर्वसल सच के बहुत करीब होता है।
आओ हम सब पहन लें आईने
सारे देखेंगे अपना ही चेहरा
सबको सारे हसीं लगेंगे यहां
हम सब ज़रूरतमंद लोग हैं। पेट और जिस्म की भूख से ज़्यादा बड़ी भूख दिल और ज़ेहन की होती है। किसी की छुअन, प्यार से थाम ली गई उंगलियां, दाएं गाल पर बेख़्याली में उतार दिया गया कोई बोसा, तारीफ़ में कहे गए चार सच्चे-झूठे अल्फ़ाज़, और किसी का दिलाया हुआ ये यकीन कि तुम्हारी ज़रूरत है - ये हर बार एक बड़ा फ़रेब होता है। लेकिन हर बार इस बड़े फ़रेब को सच मानने की बदगुमानी हर रोज़ जीना का हौसला देती है। हर शख़्स टूटा-फूटा है यहां।
और ये पहली बार नहीं था कि आपके अल्फ़ाज़ों में किसी कच्चे भरोसे को जोड़ने की पक्की कोशिश सुनाई दी थी फिर एक बार। मैं उन दिनों उलझनों में थी। कई सवाल के जवाब हम ज़िन्दगी भर ढूंढते रहते हैं। वैसे ही कुछ सवालों को बालों के क्लच में उलझाए हुए सिर पर बोझ-सा डाले घूम रही थी गांव-गांव, शहर-शहर।
अपना ही चेहरा देखना चाहते हैं हम गुलज़ार साब - हर रिश्ते में, हर दोस्ती में। हम सब थोड़े कम थोड़े ज़्यादा हैं तो नारसिस ही। हम सबको अपने-अपने एको... अपनी-अपनी ही परछाईयों से मोहब्बत है।
है नहीं जो दिखाई देता है
आईने पर छपा हुआ चेहरा
तर्जुमा आईने का ठीक नहीं!
और जो दिखता नहीं, वो ऐसा सच है जिसे रेत में सिर घुसाए शुतुमुर्ग की तरह हम देखना ही नहीं चाहते। दोष आईने के किए हुए तर्जुमे का है ही नहीं। दोष हमारी नज़रों का है, जो आईने में सिर्फ़ अपनी झूठी शक्लें देखना चाहती है। नज़रें सच को झुठलाती हैं। नज़रें अपने दोष छुपाती हैं। नज़रें अपने ही गुनाहों, ग़लतियों, बेवकूफ़ियों से आंखें चुराती हैं। नज़रें को नज़र में नज़र डालकर बात करने वाली परछाईयां अच्छी ही नहीं लगतीं।
इसलिए हम बदलते नहीं। इसलिए हम सुधरते नहीं।
ऐसे बिखरे हैं रात-दिन जैसे
मोतियों वाला हार टूट गया
तुमने मुझको पिरो के रखा था!
कई बार हुआ है कि भीतर के गर्द-ओ-गुबार को साफ़ करने की ज़रूरत होती है हमको। कई बार होता है कि रोने के लिए कोई अनजान रास्ता मंसूब होता है। जब कोई न देख रहा हो तो खुलकर रोना आसान होता है। जब कोई न सुन रहा हो तो अपनी रूह के कन्फेशन बॉक्स में बैठे-बैठे अपने भीतर के किसी पादरी के सामने अपने गुनाहों को क़ुबूल करना आसान हो जाता है।
जिस दिन रूह किसी अनजान रास्ते पर खुलकर ज़ेहन से बात करती है उस दिन गुलज़ार साब, उस सदी में पैदा होने के लिए यूनिवर्स को हज़ारों शुक्रिया भेजता है दिल कि पैदा हुए तो उसी ज़माने में जिस ज़माने ने आप जैसा कोई शायर देखा। चले उन्हीं सड़कों पर, जिए वही सरोकार, हासिल की वही तकलीफ़ें जो आपकी कलम से बरसती रहती है लगातार।
आपकी सालगिरह पर और क्या कहूं, सिवाए इसके कि
हमको ग़ालिब ने ये दुआ दी थी
तुम सलामत रहो हज़ार बरस
हमको ग़ालिब ने ये दुआ दी थी
तुम सलामत रहो हज़ार बरस
ये बरस तो फ़क़त दिनों में गया!
और ये जो दिन हों न, उनकी उम्र हज़ार बरसों की हो। है तो क्लिशे ही, फिर आपसे मुआफ़ी के साथ। आपके आगे आप ही की बात करने की ज़ुर्रत की मुआफ़ी भी दे दी जाए!
आप गुलज़ार रहें, सदियों तक।
अनु
उड़ीसा में एक इत्तू-सा स्टेशन है - इतना ही इत्तू-सा कि गूगल पर भी बड़ी मुश्किल से मिलता है। इंटरसिटी में बैठने के बाद मुझे कई बार स्टेशन का नाम मन ही मन कई बार रटना पड़ा था - राईराखोल... राईराखोल... राईराखोल... राईरोखोल। कुल दो मिनट ट्रेन रुकती थी वहाँ, और ग़लती से स्टेशन छूट जाता तो अगला स्टेशन कौन-सा होगा, ये भी नहीं मालूम था। उड़िया बोल पाती तो सूरमा बन जाती, लेकिन ज़ुबानों पर मेरी अपनी निर्भरता ने मेरे भीतर की भीरू लड़की के सारे पोल खोल दिए थे।
और ऊपर से ग़ज़ब बात ये कि जिस ड्राईवर को मुझे लेने आना था, वो पहुंचा नहीं वक़्त पर। एक अजनबी प्लैटफॉर्म पर गुम हो जाना फैंटैसी रही है मेरी, लेकिन वो प्लैटफॉर्म राईराखोल नहीं हो सकता था। What a disgrace it would have been!
स्टेशन पर उग आए पलाश के पेड़ों को गिनने में मुझे जितना वक़्त लगा, उतने ही लंबे थे ड्राईवर साब का 'दो मिनट'। गाड़ी में बैठते ही उस ड्राईवर के सात ख़ून माफ़ कर देने का फ़ैसला कर लिया था मैंने। एक तो अप्रैल में जलते उड़ीसा से झूठी राहत मिल गई थी, और दूसरा - गाड़ी में आपकी आवाज़ गूंज रही थी - याद है/मेरी मेज़ पर बैठे-बैठे/सिगरेट की डिबिया पर/छोटे-से एक पौधे का स्केच बनाया था...
मुझे मालूम नहीं था कि मैं किस शहर, किस क़स्बे में हूँ।
मुझे ये भी मालूम नहीं था कि मुझे जाना कहाँ है।
मैं ये भी नहीं जानती थी कि मुझे मंज़िल पर पहुँचाने का बीड़ा उठाने वाले इस ड्राईवर पर यकीन करना भी चाहिए या नहीं।
मुझे रास्ते का पता न था, जिन लोगों से मिलने जाना था उन लोगों के फोन नंबर के अलावा मेरे पास कोई और जानकारी न थी।
(मैं एक फ़ील्ड विज़िट पर थी, और गांवों में जाकर एक रिपोर्ट के लिए डेटा इकट्ठा कर रही थी। उड़ीसा के पांच ज़िलों के सफ़र पर थी, अकेली।)
लेकिन गाड़ी में आपकी आवाज़ सुनते ही सिक्स्थ सेंस ने कहा, इस अजनबी आदमी पर यकीन किया जा सकता है। जिस डाईवर की गाड़ी में गुलज़ार और जगजीत सिंह की आवाज़ मुसलसल बहती हो, वो ड्राईवर मेहमानों की सलामती अपनी ज़िम्मेदारी समझता होगा।
राईराखोल के जंगल-गांवों से निकलते हुए, महानदी के विशालकाय पुल से होकर, किसी नेशनल हाईवे के रास्ते हम सफ़र करते रहे, और गाड़ी में आपकी आवाज़ के पीछे-पीछे चलकर आपकी लिखी ग़ज़लें आती रहीं, गूंजती रहीं।
सारी वादी उदास बैठी है
मौसम-ए-ग़ुल ने ख़ुदकशी कर ली
किसने बारूद बोया बाग़ों में?
मैं नियमगिरि से कुछ ही दूर थी। मै कालाहांडी के रास्ते में थी। मैं उन जंगलों, पहाड़ों से होकर गुज़र रही थी जिनकी आवाज़ें तभी सुनाई देती हैं जब तरक्कीपरस्त लोग उनपर हमले बोलते हैं। हैरान थी कि हर जगह का अलग-अलग सच एक नज़्म में कैसे बयां हो सकता है? लेकिन ये नज़्मआपकी लिखी थी। जिसने ज़िन्दगी को भरपूर, और भरपूर ईमानदारी से जिया-बोया-काटा-धोया-खंगाला हो, उसका बयां किया हुआ सच यूनिर्वसल सच के बहुत करीब होता है।
आओ हम सब पहन लें आईने
सारे देखेंगे अपना ही चेहरा
सबको सारे हसीं लगेंगे यहां
हम सब ज़रूरतमंद लोग हैं। पेट और जिस्म की भूख से ज़्यादा बड़ी भूख दिल और ज़ेहन की होती है। किसी की छुअन, प्यार से थाम ली गई उंगलियां, दाएं गाल पर बेख़्याली में उतार दिया गया कोई बोसा, तारीफ़ में कहे गए चार सच्चे-झूठे अल्फ़ाज़, और किसी का दिलाया हुआ ये यकीन कि तुम्हारी ज़रूरत है - ये हर बार एक बड़ा फ़रेब होता है। लेकिन हर बार इस बड़े फ़रेब को सच मानने की बदगुमानी हर रोज़ जीना का हौसला देती है। हर शख़्स टूटा-फूटा है यहां।
और ये पहली बार नहीं था कि आपके अल्फ़ाज़ों में किसी कच्चे भरोसे को जोड़ने की पक्की कोशिश सुनाई दी थी फिर एक बार। मैं उन दिनों उलझनों में थी। कई सवाल के जवाब हम ज़िन्दगी भर ढूंढते रहते हैं। वैसे ही कुछ सवालों को बालों के क्लच में उलझाए हुए सिर पर बोझ-सा डाले घूम रही थी गांव-गांव, शहर-शहर।
अपना ही चेहरा देखना चाहते हैं हम गुलज़ार साब - हर रिश्ते में, हर दोस्ती में। हम सब थोड़े कम थोड़े ज़्यादा हैं तो नारसिस ही। हम सबको अपने-अपने एको... अपनी-अपनी ही परछाईयों से मोहब्बत है।
है नहीं जो दिखाई देता है
आईने पर छपा हुआ चेहरा
तर्जुमा आईने का ठीक नहीं!
और जो दिखता नहीं, वो ऐसा सच है जिसे रेत में सिर घुसाए शुतुमुर्ग की तरह हम देखना ही नहीं चाहते। दोष आईने के किए हुए तर्जुमे का है ही नहीं। दोष हमारी नज़रों का है, जो आईने में सिर्फ़ अपनी झूठी शक्लें देखना चाहती है। नज़रें सच को झुठलाती हैं। नज़रें अपने दोष छुपाती हैं। नज़रें अपने ही गुनाहों, ग़लतियों, बेवकूफ़ियों से आंखें चुराती हैं। नज़रें को नज़र में नज़र डालकर बात करने वाली परछाईयां अच्छी ही नहीं लगतीं।
इसलिए हम बदलते नहीं। इसलिए हम सुधरते नहीं।
ऐसे बिखरे हैं रात-दिन जैसे
मोतियों वाला हार टूट गया
तुमने मुझको पिरो के रखा था!
कई बार हुआ है कि भीतर के गर्द-ओ-गुबार को साफ़ करने की ज़रूरत होती है हमको। कई बार होता है कि रोने के लिए कोई अनजान रास्ता मंसूब होता है। जब कोई न देख रहा हो तो खुलकर रोना आसान होता है। जब कोई न सुन रहा हो तो अपनी रूह के कन्फेशन बॉक्स में बैठे-बैठे अपने भीतर के किसी पादरी के सामने अपने गुनाहों को क़ुबूल करना आसान हो जाता है।
जिस दिन रूह किसी अनजान रास्ते पर खुलकर ज़ेहन से बात करती है उस दिन गुलज़ार साब, उस सदी में पैदा होने के लिए यूनिवर्स को हज़ारों शुक्रिया भेजता है दिल कि पैदा हुए तो उसी ज़माने में जिस ज़माने ने आप जैसा कोई शायर देखा। चले उन्हीं सड़कों पर, जिए वही सरोकार, हासिल की वही तकलीफ़ें जो आपकी कलम से बरसती रहती है लगातार।
हमको ग़ालिब ने ये दुआ दी थी
तुम सलामत रहो हज़ार बरस
हमको ग़ालिब ने ये दुआ दी थी
तुम सलामत रहो हज़ार बरस
ये बरस तो फ़क़त दिनों में गया!
और ये जो दिन हों न, उनकी उम्र हज़ार बरसों की हो। है तो क्लिशे ही, फिर आपसे मुआफ़ी के साथ। आपके आगे आप ही की बात करने की ज़ुर्रत की मुआफ़ी भी दे दी जाए!
आप गुलज़ार रहें, सदियों तक।
अनु
रविवार, 17 अगस्त 2014
चले हैं दूर हम दीवाने... और मैं घुमन्तू!
सुबह-सुबह उठकर मुझे योगा करना चाहिए। टहलना चाहिए। अपने मोटापे को कम करने के तरीके ढूंढने चाहिए।
लेकिन सुबह-सुबह उठकर मैं कर क्या रही हूँ? गूगल पर पहाड़ों और पहाड़ी शहरों के नाम-पते ढूंढ रही हूं, कि जहाँ जाकर फ़ितूरी मन का चैन ढूंढा जा सके। आईआरसीटीसी पर टिकटें हैं, और छोटे-छोटे होमस्टे की कीमतें इतनी ही हैं कि अपने और अपने बच्चों के लिए ज़िन्दगी की थोड़ी-सी कामचलाऊ सहूलियतें और बहुत-सारी तस्वीरें, अल्फ़ाज़ी तस्वीरें, बिंब, प्रतीक, उपमाएं और ज़िन्दगी के ख़ूबसूरत होने का यकीन खरीद सकूं।
ये मेरी सबसे बड़ी फैंटेसी थी कि किसी दिन गाड़ी में बैठकर पूरा देश धांग मारूंगी। ये मेरा सबसे बड़ा ख़्वाब था - अब भी है - कि डायरी में नई जगहों, नए लोगों के नाम-पते होंगे। मैं हर सुबह किसी नए गांव, किसी नए शहर में उठूंगी और हर शाम शफ़क़ पर गिरते रंगों पर लिखी जानेवाली कविताओं और अफ़सानों की चिंदियाँ उसी गांव, उसी शहर में उड़ा आऊंगी।
मुझे घुमंतू पहाड़ों ने बनाया। दरअसल ईमानदारी से कहूं तो मैं घुमन्तू तो हूँ भी नहीं। गुमां पाल रखा है बस, घुमंतू होने का। याद नहीं कि सड़कों से, और रास्तों से कब प्यार हो गया था। जब से मुझे याद है, मुझे बेमतलब घूमना अच्छा लगता था। हम छोटे थे तो हमारे रास्ते भी बहुत छोटे हुए करते थे। बहुत हुआ तो रांची से ओरमांझी, गुमला, खूंटी, तोरपा, चांडिल, घाटशिला। थोड़े और खुश हुए तो रांची से पटना, सिवान। थोड़े और खुश हो गए तो जमशेदपुर, कोलकाता, पुरी, भुवनेश्वर।
खुशियों का दायरा इतना सा ही था, लेकिन हर बार खाली सड़क पर, खुले आसमान के नीचे, दरख़्तों की छांव के बीच से, उगती-कटती फ़सलों से होकर अजान गांवों, कस्बों, शहरों की जो तस्वीरें चलती हुई गाड़ी से फास्ट-फॉरवर्ड मोशन में गुज़रतीं, उन्हीं से ज़ेहन में कल्पनाओं के रंग भरे जाते। सड़कों पर होना, रास्तों पर होना मेरे लिए अपने निज के सबसे करीब होने की तरह होता था, एक किस्म के मेडिटेशन की तरह। बचपन से।
फौज में रहे मेरे नानाजी अक्सर कहा करते थे, “यात्रा का मतलब ही है कष्टों की शुरुआत।“ मुझे उन कष्टों से मोहब्बत थी। सहूलियतें और आसानियां, ठहराव और स्टेटस को मुझे बहुत दुखी और परेशान करती हैं। मेरा फ़लसफ़ा ही है कि जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह-ओ-शाम...
नानी जी की बात समझ में आती है क्योंकि वे जिस पीढ़ी के थे, उस पीढ़ी के लिए गांव की सरहदें पार करना दुश्वार हुआ करता था। शहर के लिए सुबह चार बजे की इकलौती ट्रेन दस-बारह किलोमीटर दूर दरौंदा स्टेशन से जाया करती, जिसको पकड़ लेना वर्जिश से कम नहीं था। फुटबोर्ड पर अख़बार बिछाकर बैठने में कोई शर्म नहीं थी। दूसरे दर्जे में रिज़र्वेशन लेकर चढ़ना संपन्नता का प्रतीक माना जाता था।
फिर उनके बाद की पीढ़ी नौकरी और बेहतर ज़िन्दगी की तलाश में शहर आकर बसने लगी। यात्रा का मतलब हर साल शहर से गांव लौटना होता था। गर्मी छुट्टियों में घूमना 'घर जाना' होता था। हम भी कई सालों तक 'घर' गए - रांची से सिवान होते हुए अपने गांव मोरवन, और अपनी ननिहाल मुबारकपुर।
दुनिया इतनी-सी ही थी। घूमना इतना-सा ही था। बाबा थोड़े घुमक्कड़ थे, इसलिए पिकनिक के नाम पर पुरी तक जा आए थे हमलोग। पापा बहुत बड़े घुमक्कड़ थे, लेकिन पूरी ज़िन्दगी जंगलों और गांवों में अकेले घूमते रहे। कुछ पेशे की मजबूरी थी, और कुछ फ़ितरत की। और कुछ ये भी डर रहा होगा कि सुकुमार बच्चे मलेरिया के मच्छर झेल पाएंगे या नहीं।
मैं जिस पीढ़ी की हूं, उसका अपना कोई गांव, कोई शहर नहीं है। गांव और शहर - घर - के नाम पर जो भी बचा-खुचा रह गया है, वो नोस्टालजिया में जाकर बस गया है। मैं जिस पीढ़ी की हूं, वो जड़ों से उखड़ी हुई पीढ़ी है। उसे किसी गांव, किसी शहर से कोई ख़ास लगाव नहीं। हमारे लिए घर वहां बसता जहां मां-बाप की पोस्टिंग होती। घर और पते, शहर और गांव अक्सर बदलते रहे।
इसलिए पूरी दुनिया हमारा घर थी, और कहीं किसी मोड़ पर चार कदम से थोड़ी सी ही और दूर साथ चल लेने वाला हमराही हमारे लिए हमारे परिवार का सदस्य बन जाता था। हमने घर महानगरों में बनाया, कटवारिया सराय की किसी बरसाती में, मुंबई के चार बंगला में किसी वन-रूम फ्लैट की पीजी में। हमारे लिए दुख-सुख में साथ रहनेवाले हमारे रूममेट्स, हमारे दोस्त थे। हमारे लिए परिवार का मतलब भी वही थी, और उन्हीं दोस्तों से हमारे बच्चे अब मामा-मौसी-बुआ-चाचा का रिश्ता निभा रहे हैं।
मुझे ठीक-ठीक याद है कि मैंने अकेले घूमना कब शुरु कर दिया था। वो ज़िन्दगी की उदासियों और नाकामियों से बचने के लिए ढूंढे जानेवाले रास्तों के दिन थे। घुमक्कड़ी के मेरे शौक (और मेरी मजबूरी) को कम उम्र में हाथ आ जाने वाली ढेर सारी सैलरी ने हवा दे दी। पांच दिन हम जम कर मेहनत किया करते और बाकी के दो दिन आस-पास के पहाड़ों की खाक छानने में गुज़ारते।
मैं कभी अकेले घूमती, कभी अपने जैसी पागल दोस्तों के साथ घूमती। उस अजनबी ग्रुप के साथ घूमती जिसे ट्रेकिंग का शौक था, और जिससे दोस्ती हो जाने की कई वजहें हुआ करती थी। पता नहीं कब ऐसा हो गया कि अपने वजूद में मौजूद घर से लगाव को नई-नई जगहों को देखने के रोमांच ने रिप्लेस कर दिया।
वो घुमक्कड़ी अलग किस्म की थी। ट्रेन के स्लीपर क्लास में बैठकर नए शहरों की तलाश, शहर में कैंपनुमा ठिकानों की खोज और पैदल या रिक्शे या तांगे पर बैठकर नई गलियों की खोज। सफ़र करने का मतलब दस-बारह किलोमीटर ट्रेक करके किसी दुरूह पहाड़ी की बर्फीली चोटी देख आना होता था, सफ़र करने का मतलब अंधेरे जंगलों में ट्रेकिंग और रियल ट्रेज़र-हंट, रॉक-क्लाइम्बिंग, रैपलिंग, कयाकिंग, बोटिंग जैसी फिज़िकल और बेहद थका देनेवाली एक्टिविटिज़ होतीं।
सफ़र करने का मतलब कम बजट में मिलनेवाला ढेर सारा थ्रिल होता। सफ़र करने का मतलब अजमेर शरीफ़ की दरगाह पर अकेले बैठकर कव्वाली सुनना होता, श्रीनगर के लाल चौक पर खड़े होकर जली हुई इमारतों से झांकती खिड़कियों के पीछे की ज़िन्दगियों की कल्पना करना होता।
ऐसे खूब घुमक्कड़ी की मैंने। खूब दोस्त बनाए। वेलेंक्कनी चर्च के बाहर मिल गई स्टीफेन आंटी को सालों तक ख़त लिखे, मुक्तेश्वर के पास के एक गांव में प्रकाश के घर खाए राजमा-चावल का स्वाद महीनों तक याद रखा। बुरूस के सूखे फूलों और गोआ की रेत को छोट-छोटे बक्सों में बचाए रखा।
ऐसा नहीं कि सिर्फ मधुर स्मृतियों ही मिलीं, लेकिन रास्ते में मिलनेवाली चुनौतियों और लोगों की हैरानी भरी नज़रों को अनदेखा करना कम उम्र में ही सीख लिया। मेरी घुमक्कड़ी ने मुझे आज़ाद बनाया और वो हिम्मत दी जो एक मध्यवर्गीय परिवार की छोटे शहर की लड़की को आमतौर पर संस्कारों में नहीं दिया जाता।
फिर शादी और जीवन साथी ने घुमक्कड़ी थोड़ी सोफिस्टिकेटेड कर दी। बिना किसी प्लानिंग के दो कदम न चलने वाले पति घूमने भी जाते तो पूरी तैयारी के साथ। अच्छे रिसॉर्ट में रहना, अच्छा खाना और ढंग की गाड़ी। मेरी किसी आउटडोर एक्टिविटी और नई-नई जगहों को देख लेने के शौक में उनकी दिलचस्पी नहीं थी। हममें एक ही चीज़ कॉमन थी, हम खूब पैदल चलते थे, हालांकि हमारी चाल, रास्ते और मंज़िल तीनों अलग-अलग होते।धीरे-धीरे हमने एक-दूसरे की घुमक्कड़ी के तरीकों के साथ समझौता करना सीख लिया, और अलग-अलग घूमने की वजहें और मौके तलाशने लगे - बिना किसी दुविधा या शिकायत के, बहुत सारी आपसी समझ और हामियों के साथ।
बच्चों ने मेरी घुमक्कड़ी को एक नया आयाम दिया है। छोटे बच्चों को लेकर भी मैं ख़ूब घूमी हूं। साथ में बारह-चौदह बोतलें, एक छोटा स्टेरेलाइज़र, सेरेलैक और दूध का डिब्बा, गर्म पानी की थर्मस, डायपर्स, बेबी वाइप्स और पुराने अख़बार होते। और साथ में कोई एक सहयात्री, जो पति से लेकर बच्चों के नाना-नानी, दादी-दादी और उनकी आया तक में से कोई भी हो सकता था।
बच्चे बड़े हो गए हैं और घुमक्कड़ी और बढ़ गई है। पहले थ्रिल मकसद था, अब बच्चों को देश-दुनिया दिखाना है। लोग दो बच्चों के साथ सफ़र पर निकली एक मां को देखकर अभी भी हैरान होते हैं। लेकिन उनकी इस हैरानी को मैं अपनी उपलब्धि ही मानती हूं। मैं और बच्चे सफ़र पर अपने मनमुताबिक साथी भी खोज लेते हैं – कोई हमउम्र दोस्त, कोई हमउम्र मां, कोई भलमानस ऑटोवाला, कोई अच्छा रिसॉर्ट मैनेजर...
मुझे इस बात का पक्का यकीन है कि हम सफ़र पर ही अपने असली रूप में होते हैं, बिना किसी दिखावे और मिलावट के। हमारा सब्र, हमारा असली स्वभाव और हमारी अनुकूलनशीलता का पता दरअसल सफ़र पर ही चलता है। जब हम घूम रहे होते हैं तो हम आंखें खुली रखते हैं और सफ़र ज़िन्दगी को लेकर हमारे कई मुगालते दूर करता है, हमें बेहतर इंसान बनाता है।
सफ़र करना हमें अपने इन्सटिन्क्ट पर, हमारे सिक्स्थ सेंस पर हमें भरोसा करना सिखाता है। सफ़र हमें दूसरों पर, यूनिवर्स की अदृश्य ताकतों पर भी यकीन करना सिखाता है। मैं नहीं जानती कि बड़े होने पर बच्चों के लिए घर लौटने का मतलब क्या होगा। मैं ये ज़रूर जानती हूं कि उनके लिए घुमक्ड़ी और सफ़र का मतलब ढेर सारी हैरत, हिम्मत, धैर्य और बाहर की दुनिया को खुद में आत्मसात करने की ताक़त होगा।
कुछ भी कर सकने का मेरा ये जज्बा मेरी घुमक्कड़ी की देन है, और अगर कोई दो चीज़ें हों जो मैं अपने बच्चों को दे सकूं तो वो घुमक्कड़ी का शौक और ये जज्बा है।
In other news, घुमंतू मां की प्लानिंग पूरी हो गई है। हम अगस्त का एक वीकेंड हिमाचल के एक छोटे से पहाड़ पर, सितंबर का एक वीकेंड उत्तरांचल के एक छोटे से पहाड़ पर, अक्टूबर का एक वीकेंड पूर्णिया और दूसरा वीकेंड सिवान में, नवंबर का एक वीकेंड रामेश्वरम और पॉन्डिचेरी में और दिसंबर की छुट्टियां बंगाल और उड़ीसा में काटने की ख़्वाहिश रखते हैं।
डियर यूनिवर्स, हमारी इन ख़्वाहिशों को आपकी डायरी में दर्ज किया जाए!
वैसे एक और फैंटेसी भी है - ज़मीर फ़िल्म में अमिताभ बच्चन के स्टाईल में गिटार लेकर घूमते हुए गाना -
चले हैं दूर हम दीवाने कोई रसीला सा, बांका सजीला सा यार मिले तो रुक जाएं
ध्यान से सुनिए तो साहिर लुधियानवी के बोलों के मानी घुमक्कड़ी के सबसे दिलचस्प फ़लसफ़े के कम नहीं।
बुधवार, 13 अगस्त 2014
स्मार्ट फ़ोन के बग़ैर ज़िन्दगी के जलवे
ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं...
मेरी हथेलियों पर मेरा नोकिया लुमिया सूरजमुखी-सा खिला हुआ था उस दिन। इतवार की सुबह थी, रक्षा बंधन की, और मैं व्हॉट्सऐप्प पर कहीं दूर से आई अपनी तारीफ़ पढ़कर मुस्कुरा रही थी।
फिर पता नहीं क्या हो गया!
तारीफ़ें शायद इस क़दर फ़रेबी और झूठी थीं कि फ़ोन उस गुनाह को झेल न पाया और बेहोश हो बैठा। मैं अक्सर मज़ाक में कहती थी कि मेरा स्मार्टफ़ोन मेरे हाथ में आकर सिर्फ़ सेन्सिटिव रह गया है, स्मार्टनेस का तो अता-पता नहीं है।
कौन जानता था कि मेरा अपना मज़ाक मुझी पर भारी पड़ेगा!
फिर पूरा अट्टा छान मारा। राखियाँ बाँधने-बँधवाने के लिए जाना था फ़रीदाबाद, और वक़्त हाथ से निकलता जा रहा था। लेकिन संडे की उस बेरहम सुबह किसी भलमानस ने मेरे फ़ोन को रिवाईव करने का बीड़ा न उठाया। ज़ाहिर है, कोमा में पड़े मेरे बिचारे फ़ोन ने उस सुबह उम्र से पहले दम तोड़ दिया।
ये वो सदमा था जिसे बर्दाश्त करना मेरे बस के बाहर की बात हो सकती थी।
अपने फ़ोन को लेकर ओसीडी है मुझे। मैं रास्ते पर चलते-चलते, सब्ज़ियाँ खरीदते-खरीदते, गाड़ी चलाते-चलाते, आधी नींद में सोते-जागते, अस्पताल के बाहर इंतज़ार करते, मेट्रो में शहर के दूसरे छोर जाते, बर्तन और कपड़े धोते-धोते भी फ़ोन चेक करती रहती हूँ। मैं बातचीत का कोई सिरा ज़ाया नहीं होने देती। हर मुमकिन कोशिश करती हूँ कि जवाब दूँ। चाहे उसमें मेरी ऊर्जा का क्षय ही क्यों न हो रहा हो।
जो फ़ोन लाइफ़लाइन था, उस फ़ोन के बिना जी लगता कैसे? फ़ोन का गुज़र जाना किसी प्यार के हमेशा के लिए छूट जाने से कम तकलीफ़देह नहीं था। उस दिन तो बहकी-बहकी परेशान से घूमती रही मैं। लगा कि जैसे कुछ लुट गया है, कुछ छिन गया है।
राखी की तस्वीरें नहीं खींची गईं।
यहाँ से फ़रीदाबाद जाते हुए सड़क के ट्रैफ़िक के हाल पर कोई फ़ेसबुक पोस्ट नहीं लिखा गया।
कोई आड़ी-तिरछी कविता नोट्स में सेव नहीं हुई।
किसी दोस्त से झूठ कहा नहीं व्हॉट्सऐप्प पर कि ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं...
याद ही नहीं कि उस एक इतवार जाने कैसे शब ढली, जाने कैसे दिन ढला... मुद्दतों बाद ऐसा हुआ था कि मैं जहाँ थी, वहीं थी - कहीं और नहीं। मुद्दतों बाद ऐसा हुआ था कि मेरी फ़ितरती गुमख़्याली को कहीं कोई वर्चुअल दुनिया नहीं मिली थी।
भीतर से कोई और आवाज़ देता रहा, झूठ था... सरासर झूठ था वो सब जो दुनिया से जुड़े रहने के ख़्याल से जोड़ रखा था तुमने।
फ़ोन सबकुछ नहीं ज़िन्दगी के लिए!
मुझे लगता था कि दुनिया में कुछ चीज़ें (और कुछ लोग) ऐसी हैं जिनके बिना मेरा वजूद बेमानी है, और जीना नामुमकिन। इंटरनेट और स्मार्टफ़ोन उन्हीं दो हासिल चीज़ों में से था। फ़ोन मेरे लिए चलता-फ़िरता दफ़्तर था - आप सबकी तरह। अपनी तमाम तन्हाईयों और सुख-दुख के बीच फ़ोन मेरे लिए रियल और वर्चुअल दुनिया से जुड़े रहने का इकलौता ज़रिया था। जो जी में आए, तब के तब बोल देना... उसे पोस्ट कर देना... किसी दोस्त को व्हॉटसऐप्प कर देना... रात-दिन, सुबह-शाम बातचीत के उन सिरों को थामे रहने की कोशिश करना जो कभी अंजाम तक नहीं पहुँचतीं... मेरी ज़िन्दगी ऐसी ही होने लगी थी पिछले दो-ढाई सालों से। ज़िन्दगी जिस रस्ते को अख़्तियार कर चुकी थी वहाँ बेमतलब की वर्चुअल स्माइली, दिल, टूटा हुआ दिल, फूल के गुच्छे, तोहफ़ों के बक्से और बिना सोचे-समझे किसी की ओर भी उछाल दिए जानेवाले बोसे थे।
और अचानक एक फ़ोन के न होने से वो सब ख़त्म हो गया!
वो सारे वर्चुअल रिश्ते ख़त्म हो गए!
वो सारे संपर्क और नंबर (कुल सत्रह सौ) ख़त्म हो गए जो मैंने इन दो-चार सालों में अर्जित किए होंगे!
हाथ में आया एक बेसिक फ़ोन, और ठहर जाने का गुमां।
कुल साढ़े चौदह फ़ोन नंबर मुझे मुँहज़ुबानी याद थे। मम्मी-पापा, पतिदेव, सासू माँ, ससुराल का लैंड-लाईन नंबर, भाई-भौजाई के, और कुल मिलाकर साढ़े पाँच दोस्तों के, जो पिछले सालों की सबसे बड़ी कमाई हैं... जिन्हें बचाए रखने में दस साल से ज़्यादा लंबी उम्र लगी है।
स्मार्टफ़ोन के न होने ने मेरी ज़िन्दगी में सबकी अहमियत और जगह भी मुक़र्रर हो गई थी। ये तय हो गया था कि ये वही साढ़े चौदह लोग हैं जो आपको आपकी तमाम ख़ामियों और ख़ूबियों के साथ स्वीकार करेंगे। जो एक आवाज़ पर आपके साथ होंगे, और जिन्हें आपने अच्छे-बुरे दिनों में मुलससल आवाज़ें दी हैं इसलिए इनके नंबर आपको मुँहज़ुबानी याद हैं।
(एक और एपिफ़ैनी - आत्मबोध - ये भी है कि किसी और की ओर से आनेवाला भरोसा हमारे भीतर के भरोसे का रिफ्लेक्शन, उसी का अक्स होता है। हम वही हासिल करते हैं जो हम बाँट रहे होते हैं।)
दिल जज़्बाती है, मजबूर नहीं है
अपने आस-पास क्या होना चाहिए, और किस रिश्ते पर कितना भरोसा किया जाना चाहिए - ये आत्मबोध अपने आप में मोक्ष का दरवाज़ा है। हम कई भ्रांतियों और ग़लतफ़हमियों के साथ जीते हैं। सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी इस भंगुर दुनिया में अपनी जगह को लेकर पालते हैं हम। हमें कितने लोग जानते हैं... कितने लोगों को हम पहचानते हैं... हमारा वजूद इससे मुक़र्रर होता है, यही बताया जाता है हमें। बड़े होकर ख़ूब नाम और पैसे कमाओ - यही आशीर्वाद मिलता है न हमें बचपन से? अपने बच्चों को 'बडे होना' सिखाते हुए सही मायने में बड़े होने की परिभाषा क्या होती है, ये बताना भूल जाते हैं हम।
जिसे नापा जा सकता है, जो टैंजिबल है - परिणाम के तौर पर देखा जा सकता है, उसे ही हासिल समझ लिया जाता है। इन्टैंजिबल माइलस्टोन्स - अपने स्वभाव और शख़्सियत में जीते गए बदलावों की क़ीमत नहीं समझी जाती।
अभी हाल ही में एक फ़िल्म आई थी - फॉल्ट इन आवर स्टार्स। दो टीनएजर्स की कहानी है - कैंसर के आगे इनकी उम्र की रेखाओं ने हार मार लिया है, लेकिन इनकी जिजीविषा ने नहीं। मौत का इंतज़ार करते हुए जीने की उत्कट इच्छा रखने वाली सत्रह साल की हेज़ल ग्रेस अठारह साल के अपने कैंसरपीड़ित बॉयफ्रेंड से कहती है - ऑब्लिवियन इज़ इनएविटेबल - गुमनामी लाज़िमी है।
जब गुमनामी लाज़िमी है तो फिर इतनी हाय-हाय क्यों?
गुमनामियों के इन ख़तरों के बीच हेज़ल ग्रेस को एक और टीनेजर एन्न फ्रैंक की याद में बने म्यूज़ियम में गुमनामी के बीच की शोहरत सेलीब्रेट करने से ज़्यादा ज़रूरी मौत के मुहाने पर खड़े अपने बॉयफ्रेंड को पहली बार किस करना लगा।
हेज़ल के लिए वो लम्हा गुमनामियों के अंधेरों में इकलौती रौशनी रहा होगा। वो लम्हा उसके भीतर के किसी डर पर हासिल की गई जीत का लम्हा था।
मुझे फिल्म देखते हुए वो बात इतनी स्पष्टता से समझ में नहीं आई थी जितनी अब आई है - अपरिहार्य गुमनामी के बीच जो शोहरत का इकलौता शाश्वत कारण होता है, वो किसी इंसान का जज्बा होता है। वही जज्बा डर पर जीत हासिल करने की हिम्मत देता है।
एन्न फ्रैंक का जज्बा था कि चौदह साल की उम्र में गुज़र गई लड़की को पचासी साल बाद भी दुनिया भूल नहीं पाई है।
हेज़ल ग्रेस का जज्बा था कि मरते-मरते भी उसने किसी एक ज़िन्दगी को इस बेरहम, बेवफ़ा, मतलबी दुनिया में वापस आने की वजह दे दी... अपनी बची हुई ज़िन्दगी की सारी तकलीफ़ों और छूटती हुई साँसों के बीच तारों से भरी एक रौशन रात के शामियाने तले गीली आँखों से मुस्कुराना सीख लिया।
ये जज्बा भीड़ पैदा नहीं करती। ये जज्बा हम अकेले अंधेरे कमरे में ख़ुद से जूझते हुए, अपनी हार और नाकामियों के बीच अपने हालातों को अपने हिसाब से ढालते हुए पैदा करते हैं। इस जज्बे का इससे कोई वास्ता नहीं होता कि हम दुनिया से कितने जुड़े हुए हैं और हमारी बातों पर कितनी वाहवाहियाँ मिल रही हैं। इस जज्बे को फोन-बुक में मौजूद हज़ारों नंबरों से भी कोई वास्ता नहीं होता।
हम हर रिश्ते को अपनी वजह से ढोते हैं, झेलते हैं या उन्हें पालते-पोसते हैं। उनकी ज़रूरत हमें होती है क्योंकि हमारे जज्बात उन रिश्तों पर फ़ीड कर रहे होते हैं। उन रिश्तों से हासिल हमदर्दी (और कई बार तरसते हुए बोलों के जवाब भी, जो हम सुनना चाहते हैं), उन रिश्तों से हासिल भरोसा (कभी झूठा, कभी सच्चा) और उन रिश्तों से हासिल ऊर्जा हमें ज़िन्दगी की नीरस और अरुचिकर जद्दोजेहद को झेलने का माद्दा देती है।
हम उस ग़लतगुमानी में ख़ुश रहते हैं कि हमारी ज़रूरत है - हमारे घर-परिवार में, हमारे वर्क प्लेस पर, हमारे सहकर्मियों को, हमारे बॉस को, हमारे जान-पहचान वालों को, हमारे क्लायंट्स को... हम इस बदगुमानी में होते हैं कि जो जब भी, जिस भी तरह आवाज़ लगाए, हमें उसका जवाब देना ही चाहिए क्योंकि अपनी ज़रूरत बचाए रखने का ये इकलौता रास्ता है।
बेताबियों में खुशी ढूंढने वाले बेताबियां भी ढूंढ-ढूंढकर लाते हैं। ये बेताबियां रिश्तों की शक्लों में होती हैं जो हर रोज़ किसी न किसी से बना रहे होते हैं हम। अक्सर क्षणभंगुर। अक्सर छोटी मियाद वाले। अक्सर ज़रूरतपरस्ती।
कितना बड़ा फ़रेब है ये!
फ़ोन नहीं है तो समझ में आया कि इस फ़रेब को जीना मजबूरी नहीं है। हमारे जज़्बातों का सबब भी हम ही, मरहम भी हम ही। हमारी ज़रूरत अगर किसी को सबसे ज़्यादा है, तो वो हम हैं।
मेरे फ़साने पे न जा...
डिस्क्लेमर ये भी है कि ये मेरे अपने तजुर्बे हैं। ये मेरी अपनी राय है। तजुर्बों के आधार पर राय भी बनती-बिगड़ती-बदलती रहती है। मेरा मकसद फ़ोन के बहाने बाहर की दुनिया से जुड़ाव को लेकर अपने हालात और अनुभवों का लेखा-जोखा करना है। मेरा मकसद अपने लिए कुछ फ़ैसले लेना है। ख़ुद को याद दिलाना है कि वेलॉसिटी यदि डिस्प्लेसमेंट और टाईम टेकेन का अनुपात है कि डिस्प्लेसमेंट की वैल्यू को कम करके वेलॉसिटी यानी गति पर काबू पाया जा सकता है।
सारे फ़ैसले अपने हैं - दिल-ओ-दिमाग पर हर लम्हा लगती खरोंचों की तरह। वजह भी मैं ही, मरहम भी मैं ही।
नोकिया लूमिया उर्फ़ डियर सूरजमुखी, तेरा प्यार अनोखा है!
मेरी हथेलियों पर मेरा नोकिया लुमिया सूरजमुखी-सा खिला हुआ था उस दिन। इतवार की सुबह थी, रक्षा बंधन की, और मैं व्हॉट्सऐप्प पर कहीं दूर से आई अपनी तारीफ़ पढ़कर मुस्कुरा रही थी।
फिर पता नहीं क्या हो गया!
तारीफ़ें शायद इस क़दर फ़रेबी और झूठी थीं कि फ़ोन उस गुनाह को झेल न पाया और बेहोश हो बैठा। मैं अक्सर मज़ाक में कहती थी कि मेरा स्मार्टफ़ोन मेरे हाथ में आकर सिर्फ़ सेन्सिटिव रह गया है, स्मार्टनेस का तो अता-पता नहीं है।
कौन जानता था कि मेरा अपना मज़ाक मुझी पर भारी पड़ेगा!
फिर पूरा अट्टा छान मारा। राखियाँ बाँधने-बँधवाने के लिए जाना था फ़रीदाबाद, और वक़्त हाथ से निकलता जा रहा था। लेकिन संडे की उस बेरहम सुबह किसी भलमानस ने मेरे फ़ोन को रिवाईव करने का बीड़ा न उठाया। ज़ाहिर है, कोमा में पड़े मेरे बिचारे फ़ोन ने उस सुबह उम्र से पहले दम तोड़ दिया।
ये वो सदमा था जिसे बर्दाश्त करना मेरे बस के बाहर की बात हो सकती थी।
अपने फ़ोन को लेकर ओसीडी है मुझे। मैं रास्ते पर चलते-चलते, सब्ज़ियाँ खरीदते-खरीदते, गाड़ी चलाते-चलाते, आधी नींद में सोते-जागते, अस्पताल के बाहर इंतज़ार करते, मेट्रो में शहर के दूसरे छोर जाते, बर्तन और कपड़े धोते-धोते भी फ़ोन चेक करती रहती हूँ। मैं बातचीत का कोई सिरा ज़ाया नहीं होने देती। हर मुमकिन कोशिश करती हूँ कि जवाब दूँ। चाहे उसमें मेरी ऊर्जा का क्षय ही क्यों न हो रहा हो।
जो फ़ोन लाइफ़लाइन था, उस फ़ोन के बिना जी लगता कैसे? फ़ोन का गुज़र जाना किसी प्यार के हमेशा के लिए छूट जाने से कम तकलीफ़देह नहीं था। उस दिन तो बहकी-बहकी परेशान से घूमती रही मैं। लगा कि जैसे कुछ लुट गया है, कुछ छिन गया है।
राखी की तस्वीरें नहीं खींची गईं।
यहाँ से फ़रीदाबाद जाते हुए सड़क के ट्रैफ़िक के हाल पर कोई फ़ेसबुक पोस्ट नहीं लिखा गया।
कोई आड़ी-तिरछी कविता नोट्स में सेव नहीं हुई।
किसी दोस्त से झूठ कहा नहीं व्हॉट्सऐप्प पर कि ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं...
याद ही नहीं कि उस एक इतवार जाने कैसे शब ढली, जाने कैसे दिन ढला... मुद्दतों बाद ऐसा हुआ था कि मैं जहाँ थी, वहीं थी - कहीं और नहीं। मुद्दतों बाद ऐसा हुआ था कि मेरी फ़ितरती गुमख़्याली को कहीं कोई वर्चुअल दुनिया नहीं मिली थी।
भीतर से कोई और आवाज़ देता रहा, झूठ था... सरासर झूठ था वो सब जो दुनिया से जुड़े रहने के ख़्याल से जोड़ रखा था तुमने।
मुझे लगता था कि दुनिया में कुछ चीज़ें (और कुछ लोग) ऐसी हैं जिनके बिना मेरा वजूद बेमानी है, और जीना नामुमकिन। इंटरनेट और स्मार्टफ़ोन उन्हीं दो हासिल चीज़ों में से था। फ़ोन मेरे लिए चलता-फ़िरता दफ़्तर था - आप सबकी तरह। अपनी तमाम तन्हाईयों और सुख-दुख के बीच फ़ोन मेरे लिए रियल और वर्चुअल दुनिया से जुड़े रहने का इकलौता ज़रिया था। जो जी में आए, तब के तब बोल देना... उसे पोस्ट कर देना... किसी दोस्त को व्हॉटसऐप्प कर देना... रात-दिन, सुबह-शाम बातचीत के उन सिरों को थामे रहने की कोशिश करना जो कभी अंजाम तक नहीं पहुँचतीं... मेरी ज़िन्दगी ऐसी ही होने लगी थी पिछले दो-ढाई सालों से। ज़िन्दगी जिस रस्ते को अख़्तियार कर चुकी थी वहाँ बेमतलब की वर्चुअल स्माइली, दिल, टूटा हुआ दिल, फूल के गुच्छे, तोहफ़ों के बक्से और बिना सोचे-समझे किसी की ओर भी उछाल दिए जानेवाले बोसे थे।
और अचानक एक फ़ोन के न होने से वो सब ख़त्म हो गया!
वो सारे वर्चुअल रिश्ते ख़त्म हो गए!
वो सारे संपर्क और नंबर (कुल सत्रह सौ) ख़त्म हो गए जो मैंने इन दो-चार सालों में अर्जित किए होंगे!
हाथ में आया एक बेसिक फ़ोन, और ठहर जाने का गुमां।
कुल साढ़े चौदह फ़ोन नंबर मुझे मुँहज़ुबानी याद थे। मम्मी-पापा, पतिदेव, सासू माँ, ससुराल का लैंड-लाईन नंबर, भाई-भौजाई के, और कुल मिलाकर साढ़े पाँच दोस्तों के, जो पिछले सालों की सबसे बड़ी कमाई हैं... जिन्हें बचाए रखने में दस साल से ज़्यादा लंबी उम्र लगी है।
स्मार्टफ़ोन के न होने ने मेरी ज़िन्दगी में सबकी अहमियत और जगह भी मुक़र्रर हो गई थी। ये तय हो गया था कि ये वही साढ़े चौदह लोग हैं जो आपको आपकी तमाम ख़ामियों और ख़ूबियों के साथ स्वीकार करेंगे। जो एक आवाज़ पर आपके साथ होंगे, और जिन्हें आपने अच्छे-बुरे दिनों में मुलससल आवाज़ें दी हैं इसलिए इनके नंबर आपको मुँहज़ुबानी याद हैं।
(एक और एपिफ़ैनी - आत्मबोध - ये भी है कि किसी और की ओर से आनेवाला भरोसा हमारे भीतर के भरोसे का रिफ्लेक्शन, उसी का अक्स होता है। हम वही हासिल करते हैं जो हम बाँट रहे होते हैं।)
दिल जज़्बाती है, मजबूर नहीं है
अपने आस-पास क्या होना चाहिए, और किस रिश्ते पर कितना भरोसा किया जाना चाहिए - ये आत्मबोध अपने आप में मोक्ष का दरवाज़ा है। हम कई भ्रांतियों और ग़लतफ़हमियों के साथ जीते हैं। सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी इस भंगुर दुनिया में अपनी जगह को लेकर पालते हैं हम। हमें कितने लोग जानते हैं... कितने लोगों को हम पहचानते हैं... हमारा वजूद इससे मुक़र्रर होता है, यही बताया जाता है हमें। बड़े होकर ख़ूब नाम और पैसे कमाओ - यही आशीर्वाद मिलता है न हमें बचपन से? अपने बच्चों को 'बडे होना' सिखाते हुए सही मायने में बड़े होने की परिभाषा क्या होती है, ये बताना भूल जाते हैं हम।
जिसे नापा जा सकता है, जो टैंजिबल है - परिणाम के तौर पर देखा जा सकता है, उसे ही हासिल समझ लिया जाता है। इन्टैंजिबल माइलस्टोन्स - अपने स्वभाव और शख़्सियत में जीते गए बदलावों की क़ीमत नहीं समझी जाती।
अभी हाल ही में एक फ़िल्म आई थी - फॉल्ट इन आवर स्टार्स। दो टीनएजर्स की कहानी है - कैंसर के आगे इनकी उम्र की रेखाओं ने हार मार लिया है, लेकिन इनकी जिजीविषा ने नहीं। मौत का इंतज़ार करते हुए जीने की उत्कट इच्छा रखने वाली सत्रह साल की हेज़ल ग्रेस अठारह साल के अपने कैंसरपीड़ित बॉयफ्रेंड से कहती है - ऑब्लिवियन इज़ इनएविटेबल - गुमनामी लाज़िमी है।
जब गुमनामी लाज़िमी है तो फिर इतनी हाय-हाय क्यों?
गुमनामियों के इन ख़तरों के बीच हेज़ल ग्रेस को एक और टीनेजर एन्न फ्रैंक की याद में बने म्यूज़ियम में गुमनामी के बीच की शोहरत सेलीब्रेट करने से ज़्यादा ज़रूरी मौत के मुहाने पर खड़े अपने बॉयफ्रेंड को पहली बार किस करना लगा।
हेज़ल के लिए वो लम्हा गुमनामियों के अंधेरों में इकलौती रौशनी रहा होगा। वो लम्हा उसके भीतर के किसी डर पर हासिल की गई जीत का लम्हा था।
मुझे फिल्म देखते हुए वो बात इतनी स्पष्टता से समझ में नहीं आई थी जितनी अब आई है - अपरिहार्य गुमनामी के बीच जो शोहरत का इकलौता शाश्वत कारण होता है, वो किसी इंसान का जज्बा होता है। वही जज्बा डर पर जीत हासिल करने की हिम्मत देता है।
एन्न फ्रैंक का जज्बा था कि चौदह साल की उम्र में गुज़र गई लड़की को पचासी साल बाद भी दुनिया भूल नहीं पाई है।
हेज़ल ग्रेस का जज्बा था कि मरते-मरते भी उसने किसी एक ज़िन्दगी को इस बेरहम, बेवफ़ा, मतलबी दुनिया में वापस आने की वजह दे दी... अपनी बची हुई ज़िन्दगी की सारी तकलीफ़ों और छूटती हुई साँसों के बीच तारों से भरी एक रौशन रात के शामियाने तले गीली आँखों से मुस्कुराना सीख लिया।
ये जज्बा भीड़ पैदा नहीं करती। ये जज्बा हम अकेले अंधेरे कमरे में ख़ुद से जूझते हुए, अपनी हार और नाकामियों के बीच अपने हालातों को अपने हिसाब से ढालते हुए पैदा करते हैं। इस जज्बे का इससे कोई वास्ता नहीं होता कि हम दुनिया से कितने जुड़े हुए हैं और हमारी बातों पर कितनी वाहवाहियाँ मिल रही हैं। इस जज्बे को फोन-बुक में मौजूद हज़ारों नंबरों से भी कोई वास्ता नहीं होता।
हम हर रिश्ते को अपनी वजह से ढोते हैं, झेलते हैं या उन्हें पालते-पोसते हैं। उनकी ज़रूरत हमें होती है क्योंकि हमारे जज्बात उन रिश्तों पर फ़ीड कर रहे होते हैं। उन रिश्तों से हासिल हमदर्दी (और कई बार तरसते हुए बोलों के जवाब भी, जो हम सुनना चाहते हैं), उन रिश्तों से हासिल भरोसा (कभी झूठा, कभी सच्चा) और उन रिश्तों से हासिल ऊर्जा हमें ज़िन्दगी की नीरस और अरुचिकर जद्दोजेहद को झेलने का माद्दा देती है।
हम उस ग़लतगुमानी में ख़ुश रहते हैं कि हमारी ज़रूरत है - हमारे घर-परिवार में, हमारे वर्क प्लेस पर, हमारे सहकर्मियों को, हमारे बॉस को, हमारे जान-पहचान वालों को, हमारे क्लायंट्स को... हम इस बदगुमानी में होते हैं कि जो जब भी, जिस भी तरह आवाज़ लगाए, हमें उसका जवाब देना ही चाहिए क्योंकि अपनी ज़रूरत बचाए रखने का ये इकलौता रास्ता है।
बेताबियों में खुशी ढूंढने वाले बेताबियां भी ढूंढ-ढूंढकर लाते हैं। ये बेताबियां रिश्तों की शक्लों में होती हैं जो हर रोज़ किसी न किसी से बना रहे होते हैं हम। अक्सर क्षणभंगुर। अक्सर छोटी मियाद वाले। अक्सर ज़रूरतपरस्ती।
कितना बड़ा फ़रेब है ये!
फ़ोन नहीं है तो समझ में आया कि इस फ़रेब को जीना मजबूरी नहीं है। हमारे जज़्बातों का सबब भी हम ही, मरहम भी हम ही। हमारी ज़रूरत अगर किसी को सबसे ज़्यादा है, तो वो हम हैं।
मेरे फ़साने पे न जा...
डिस्क्लेमर ये भी है कि ये मेरे अपने तजुर्बे हैं। ये मेरी अपनी राय है। तजुर्बों के आधार पर राय भी बनती-बिगड़ती-बदलती रहती है। मेरा मकसद फ़ोन के बहाने बाहर की दुनिया से जुड़ाव को लेकर अपने हालात और अनुभवों का लेखा-जोखा करना है। मेरा मकसद अपने लिए कुछ फ़ैसले लेना है। ख़ुद को याद दिलाना है कि वेलॉसिटी यदि डिस्प्लेसमेंट और टाईम टेकेन का अनुपात है कि डिस्प्लेसमेंट की वैल्यू को कम करके वेलॉसिटी यानी गति पर काबू पाया जा सकता है।
सारे फ़ैसले अपने हैं - दिल-ओ-दिमाग पर हर लम्हा लगती खरोंचों की तरह। वजह भी मैं ही, मरहम भी मैं ही।
नोकिया लूमिया उर्फ़ डियर सूरजमुखी, तेरा प्यार अनोखा है!
बुधवार, 6 अगस्त 2014
मत लिखो। मत लिखो। मत लिखो!!!
यूँ लगा कि जैसे अगर ठीक इसी वक़्त इस पन्ने पर अनाप-शनाप लिखा नहीं तो सुबह से आगे बढ़ने की गुज़ारिश करना नामुमकिन हो जाएगा। कई बार गिरहों को खोलकर बंदिशों के बग़ैर अपने भीतर का गर्द-ओ-गुबार निकलने देने की ज़रूरत ज़िन्दगी की तमाम ज़रूरतों से बड़ी बन जाती है।
मैं उसी मुकाम पर आ पहुँची हूँ जहाँ खुलकर बेमकसद लिख पाना किसी और ज़रूरत से ज़्यादा बड़ी ज़रूरत बन गया है।
मैं लिखने का काम करती हूँ। महीने (या तीन महीने) के आख़िर में आने वाले पैसे उसी लिखाई (या लिखने से जुड़े और कामों) से आते हैं। दिन के आठ-दस घंटे अलग-अलग फॉर्मैट्स में लिखना, अनुवाद करना या एडिट करना ही मेरा काम है, और मैंने ऐसी ही किसी ज़िन्दगी की ख़्वाहिश की होगी क्योंकि मेरी ख़्वाहिशें पूरी करने के मामले में ख़ुदा उस्ताद है। मेरी कोई दुआ अनसुनी नहीं छोड़ता। इसलिए ये दुआ कि दिन भर लिखती रहूँ, बड़े प्यार से क़ुबूल हो गई।
ये और बात है कि मैं अब उकताने लगी हूँ। फ़ितरत ही कहिए कि उकता जाना सबसे आसान लगता है।
लिखती तो हूँ, लेकिन क्या... ये मालूम नहीं। इस लिखे हुए का हासिल भी क्या, ये मालूम नहीं।
लोग कहते थे कि पोर्टफोलियो बड़ा करने के लिए लिखो। तो किया।
फिर लगा कि लिखना ही काम है, और काम मन लगाकर करना चाहिए। इसलिए भी किया।
फिर लगा कि काम करने से ही गुज़ारा चलता है, इसलिए लिखती रही।
लेकिन अब ऊब होने लगी है।
इसी ब्लॉग पर बेख़्याली में भरे गए पन्ने - अपना ही लिखा हुआ - देखती हूँ तो यकीन नहीं होता। उन दिनों मैं क्या खा-पी रही थी? उन दिनों के कैसे दुख थे कि इतना लिखा, और बिना किसी हासिल की उम्मीद के लिखा? मुझे तब किसी असाइनमेंट की उम्मीद नहीं थी। मैं मशहूर होने के लिए भी नहीं लिख रही थी। तब लिखने का मक़सद किसी को इम्प्रेस करना भी नहीं था। मेरे लिखे हुए के बारे में दुनिया क्या सोचती है, लोग मुझे किस निगाह से देखते हैं, लिखकर मैं कितने दोस्त बनाऊँगी और कितने दुश्मन - ये भी नहीं सोच रही थी तब। लिखने का मकसद अपना गुज़ारा चलाना भी नहीं था। लिखने का मकसद कहीं छपना, किसी दिन किताब या फिल्म लिख देना - कुछ भी नहीं था।
जब कोई मकसद ही नहीं था तो मैं क्यों लिख रही थी तब?
चार्ल्स बुकोस्की की कविता का वरुण ग्रोवर का किया अनुवाद याद आ रहा है -
अगर फूट के ना निकले
बिना किसी वजह के
मत लिखो।
अगर बिना पूछे-बताये ना बरस पड़े,
तुम्हारे दिल और दिमाग़
और जुबां और पेट से
मत लिखो।
वो दिन कुछ ऐसे ही थे कि लिखना ही ख़ुद को बचाए रखने का इकलौता रास्ता था। इसलिए लिखना ज़रूरी था, और जब लिखना शुरु किया तो अंदर का सोता ऐसे खुला था कि जैसे सबकुछ बहा ले जाने पर आमादा हो।
अब ऐसा लगने लगा है कि बहुत बह चुकी हूँ, और बहते-बहते ठहर गई हूँ। कहाँ गई वो भीतर की पहाड़ी नदी जो पत्थरों को चूमती हुई निकलती थी तो भी ज़ोर-ज़ोर से गीत गाती थी? कहाँ गया वो भीतर का रेगिस्तान जिसके धोरों पर अपनी ही बारिशें गिरा करती थीं मुसलसल? कहाँ गए वो लोग जो एक बाएं हाथ की उंगलियों पर गिने जा सकते थे, लेकिन जिनकी चिट्ठियों से अपने ही बेचैन शब्दों की ख़ुशबूएँ आया करती थीं?
सुनो कि कोई बात है नहीं कहने को, इसलिए मत लिखो।
अपनी ही ग़ुमख़्याली की वजहें मालूम नहीं, न उनके इलाज का सबब है कोई। इसलिए, मत लिखो।
यहाँ से उठते ही तुम्हारा ध्यान टू-डू लिस्ट की लिखाई और उसकी ज़रूरतों पर जाएगा, इसलिए जाने दो। मत लिखो।
तुम्हारे ब्लॉग पर आने वालों की ट्रैफ़िक तुम्हारे बारे में अब एक मुक़म्मल राय बना चुकी है, इसलिए मत लिखो।
तुम्हारी एक किताब आ चुकी है, इसलिए अब आगे बिल्कुल मत लिखो।
तुम एक सेल्फ-प्रोक्लेम्ड राईटर हो चुकी है, इसलिए अब तो बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल मत लिखो।
मत लिखो अनु सिंह। अब बिल्कुल मत लिखो।
****
इस सुबह के मुहाने से निकलकर दिन के समंदर में मिलने के लिए बना जो रास्ता मुझे दिखाई दे रहा है वो यहाँ से बहुत ठहरा हुआ दिखता है।
अच्छा है कि सफ़ीनों की मंज़िलें दरिया हुआ करती है, एक ठहरी हुई उदास नदी नहीं।
मैं उसी मुकाम पर आ पहुँची हूँ जहाँ खुलकर बेमकसद लिख पाना किसी और ज़रूरत से ज़्यादा बड़ी ज़रूरत बन गया है।
मैं लिखने का काम करती हूँ। महीने (या तीन महीने) के आख़िर में आने वाले पैसे उसी लिखाई (या लिखने से जुड़े और कामों) से आते हैं। दिन के आठ-दस घंटे अलग-अलग फॉर्मैट्स में लिखना, अनुवाद करना या एडिट करना ही मेरा काम है, और मैंने ऐसी ही किसी ज़िन्दगी की ख़्वाहिश की होगी क्योंकि मेरी ख़्वाहिशें पूरी करने के मामले में ख़ुदा उस्ताद है। मेरी कोई दुआ अनसुनी नहीं छोड़ता। इसलिए ये दुआ कि दिन भर लिखती रहूँ, बड़े प्यार से क़ुबूल हो गई।
ये और बात है कि मैं अब उकताने लगी हूँ। फ़ितरत ही कहिए कि उकता जाना सबसे आसान लगता है।
लिखती तो हूँ, लेकिन क्या... ये मालूम नहीं। इस लिखे हुए का हासिल भी क्या, ये मालूम नहीं।
लोग कहते थे कि पोर्टफोलियो बड़ा करने के लिए लिखो। तो किया।
फिर लगा कि लिखना ही काम है, और काम मन लगाकर करना चाहिए। इसलिए भी किया।
फिर लगा कि काम करने से ही गुज़ारा चलता है, इसलिए लिखती रही।
लेकिन अब ऊब होने लगी है।
इसी ब्लॉग पर बेख़्याली में भरे गए पन्ने - अपना ही लिखा हुआ - देखती हूँ तो यकीन नहीं होता। उन दिनों मैं क्या खा-पी रही थी? उन दिनों के कैसे दुख थे कि इतना लिखा, और बिना किसी हासिल की उम्मीद के लिखा? मुझे तब किसी असाइनमेंट की उम्मीद नहीं थी। मैं मशहूर होने के लिए भी नहीं लिख रही थी। तब लिखने का मक़सद किसी को इम्प्रेस करना भी नहीं था। मेरे लिखे हुए के बारे में दुनिया क्या सोचती है, लोग मुझे किस निगाह से देखते हैं, लिखकर मैं कितने दोस्त बनाऊँगी और कितने दुश्मन - ये भी नहीं सोच रही थी तब। लिखने का मकसद अपना गुज़ारा चलाना भी नहीं था। लिखने का मकसद कहीं छपना, किसी दिन किताब या फिल्म लिख देना - कुछ भी नहीं था।
जब कोई मकसद ही नहीं था तो मैं क्यों लिख रही थी तब?
चार्ल्स बुकोस्की की कविता का वरुण ग्रोवर का किया अनुवाद याद आ रहा है -
अगर फूट के ना निकले
बिना किसी वजह के
मत लिखो।
अगर बिना पूछे-बताये ना बरस पड़े,
तुम्हारे दिल और दिमाग़
और जुबां और पेट से
मत लिखो।
वो दिन कुछ ऐसे ही थे कि लिखना ही ख़ुद को बचाए रखने का इकलौता रास्ता था। इसलिए लिखना ज़रूरी था, और जब लिखना शुरु किया तो अंदर का सोता ऐसे खुला था कि जैसे सबकुछ बहा ले जाने पर आमादा हो।
अब ऐसा लगने लगा है कि बहुत बह चुकी हूँ, और बहते-बहते ठहर गई हूँ। कहाँ गई वो भीतर की पहाड़ी नदी जो पत्थरों को चूमती हुई निकलती थी तो भी ज़ोर-ज़ोर से गीत गाती थी? कहाँ गया वो भीतर का रेगिस्तान जिसके धोरों पर अपनी ही बारिशें गिरा करती थीं मुसलसल? कहाँ गए वो लोग जो एक बाएं हाथ की उंगलियों पर गिने जा सकते थे, लेकिन जिनकी चिट्ठियों से अपने ही बेचैन शब्दों की ख़ुशबूएँ आया करती थीं?
सुनो कि कोई बात है नहीं कहने को, इसलिए मत लिखो।
अपनी ही ग़ुमख़्याली की वजहें मालूम नहीं, न उनके इलाज का सबब है कोई। इसलिए, मत लिखो।
यहाँ से उठते ही तुम्हारा ध्यान टू-डू लिस्ट की लिखाई और उसकी ज़रूरतों पर जाएगा, इसलिए जाने दो। मत लिखो।
तुम्हारे ब्लॉग पर आने वालों की ट्रैफ़िक तुम्हारे बारे में अब एक मुक़म्मल राय बना चुकी है, इसलिए मत लिखो।
तुम्हारी एक किताब आ चुकी है, इसलिए अब आगे बिल्कुल मत लिखो।
तुम एक सेल्फ-प्रोक्लेम्ड राईटर हो चुकी है, इसलिए अब तो बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल मत लिखो।
मत लिखो अनु सिंह। अब बिल्कुल मत लिखो।
****
इस सुबह के मुहाने से निकलकर दिन के समंदर में मिलने के लिए बना जो रास्ता मुझे दिखाई दे रहा है वो यहाँ से बहुत ठहरा हुआ दिखता है।
अच्छा है कि सफ़ीनों की मंज़िलें दरिया हुआ करती है, एक ठहरी हुई उदास नदी नहीं।
मंगलवार, 8 जुलाई 2014
कई फ़ितूर और 'नीला स्कार्फ'
मैं भुवनेश्वर से पुरी के रास्ते में थी जब नताशा का मेसेज आया था – व्हॉट्सऐप्प पर। कुछ तस्वीरें थीं – उस अनारकली की, जो मैं बनवाना चाहती थी। एक के बाद एक कई मेसेज आए – उसके आईफोन से ली हुई तस्वीरों के। एक तस्वीर मेरे ज़ेहन में अटक ही गई बस, उस तस्वीर में मैनेक्वीन की गर्दन में बेतरतीबी से पड़े दोरंगी नीले दुपट्टे की तरह।
मैंने नताशा को वापस जवाब भेजा, "ये अनारकली चाहिए और ये तस्वीर भी। अपनी पहली किताब की कवर पेज के लिए।"
बात मार्च की है, और मेरे दिमाग में कहानी-संग्रह को पूरा करने का ख़्याल खलबली मचाए थे। मैं जहाँ-जहाँ जाती थी, वो ख़्याल साथ जाया करता था। एक किस्म के फ़ितूर की तरह। बेशक काम नहीं किया करती थी इस ख़्याल पर, लेकिन फ़ितूर तो था।
उम्र के पैंतीस गर्मी-जाड़ा, सूखा-बाढ़ और सूनामी देख लेने के बाद मैं एक बात पूरे यकीन के साथ कह सकती हूँ – एक फ़ितूर न होता तो दुनिया में क्रांतियां न आया करतीं। वक़्त फ़िसलता रहता किसी चिकने से रास्ते पर घूमते पहिए की तरह, और हमारे पास जानने-सुनने को किसी किस्म का इतिहास न होता।
ये कमबख़्त फ़ितूर कई चीज़ें करा लेता है इंसानों से।
मुझसे कहानियाँ लिखवा लीं इसी फ़ितूर ने। इसी फ़ितूर ने मेरी अच्छी-खासी आर्टिस्ट-राईटर दोस्त को ऑन्ट्रप्रॉन्योर और बिज़नेसवूमैन बना दिया। इसी फ़ितूर ने व्हॉट्सऐप्प पर आई उस तस्वीर को किताब के कवर पेज तक पहुंचा दिया जो दरअसल मेरे ही एक कुर्ते, मेरे ही एक दुपट्टे की तस्वीर है। 'नीला स्कार्फ' भी तो उस तस्वीर, उन कपड़ों की तरह आख़िर मेरे ही वजूद के जिए हुए अनुभवों का कई टुकड़ा है।
'नीला स्कार्फ' कई मायने में ख़ास है। ख़ास इसलिए कि इसे बनाते हुए हमने अनजाने में कई अनकन्वेंशनल रास्ते अख़्तियार किए। 'नीला स्कार्फ' का इस मुकाम तक पहुंचना एक लिहाज़ से आउट ऑफ द बॉक्स सोचकर ख़तरे उठाने वाले चार अजूबा फ़ितूरियों की सच्ची कहानियां भी है।
मिलिए अजूबा नंबर एक से। अनु सिंह। लिखने का शऊर नहीं था, गलतफ़हमियां थी कईं। लिखना ज़रूरत से ज़्यादा मजबूरी बनता गया एक वक़्त के बाद, और फिर जेबखर्च का ज़रिया भी। लिखने के फ़ितूर ने ब्लॉग दिया, ब्लॉग ने दोस्त दिए, दोस्तों ने काम के ज़रिए दिए, काम के ज़रिए मिले तो ठीक-ठीक समझ में आया कि कैसे, कब और कहां, किन लोगों के साथ काम करना चाहती हूं। लोग मिले तो भरोसा आया। भरोसा आया तो रास्ते पता नहीं किस-किस मोड़ से होते हुए निकलते चले गए। अनु सिंह इस लिहाज़ से अनकन्वेंशनल है क्योंकि वो कहीं भी किसी एक रूप में मुकम्मल नहीं। अनु सिंह का लिखना भी मुकम्मल नहीं। टुकड़ों-टुकड़ों में कई वजूदों के बीच कई कामों के साथ बिखरी-बिखरी ज़िन्दगी समेटना, और उस बीच लिखते रहना, हर रोज़ का रोज़गार है। रोज़गार भी यही है, और ज़िन्दगी से भिड़ने का हथियार भी यही।
मिलिए अजूबा नंबर टू से। शैलेश भारतवासी। अव्वल दर्ज़े के फ़ितूरी। एक फ्लिपकार्ट, एक इंफीबीम के सहारे एक टाइटल की पाँच सौ प्रतियाँ छापकर हिंदी के बेस्टसेलर लेखक तैयार करने चले हैं। ढूंढ-ढूंढकर लेखक निकालते हैं। रेगिस्तान-नखलिस्तान, समंदर-मैदान, पहाड़-पठार, महागनर-देहात – कुछ भी नहीं बख़्शा इन्होंने। जहाँ किसी के लेखक होने का एक आना भरोसा भी हुआ नहीं कि जी-जान लगा बैठे। महाराज, ऐसे पब्लिशर का बेड़ा गर्क होगा, ये चित्रगुप्त महाराज ने अपनी कलम को अपने ही ख़ून में डुबो-डुबोकर बड़े-बड़े अक्षरों में लिख दिया है। सातवें आसमां पर जब इनके कर्मों का लेखा-जोखा प्रस्तुत होगा तो नर्क की सज़ा सुनाई जाएगी इनको। हिंदी पठन-पाठन की अलौकिक शांति में व्यवधान डालने का अक्षम्य अपराध जो किया है इन्होंने।
मिलिए अजूबा नंबर थ्री से। नताशा बधवार। इस औरत से बड़ा फ़ितूरी मैंने अपनी पूरी लाईफ़ में नहीं देखा, बाई गॉड। मैं टीवी चैनल में जब एक टुच्ची-सी रिपोर्टर/प्रोड्युसर थी तो मैडम कुछ तो टॉप टाईप पोस्ट पर थीं। इक्कीस साल की थी तब मैं, और नताशा बधवार के बारे में सुनते-सुनते उसके टाईप बन जाने का वो जुनून था कि जो आज तक कमबख़्त ख़त्म नहीं हुआ है। वैसे इतने सालों में ये भी नताशा से ही सीखा है कि कोई किसी की तरह होता नहीं है, और फिर भी हम सब अपने आस-पास के अजीज़ लोगों के आईने हुआ करते हैं। बहरहाल, फ़ितूरी नंबर थ्री ने ज़िन्दगी में कई फ़ितूर पाले और उन्हें अंजाम तक पहुंचाया। (हाथ कंगन को आरसी क्या, मुझपर यकीन हो न हो गूगल पर तो है)। नताशा का सबसे बड़ा और ख़तरनाक फ़ितूर आजकल 'ऑकर स्काई' नाम के ब्रांड के रूप में फेसबुक पर दिखाई दे रहा है। कसम से कह रही हूं, इस फ़ितूर की पहली ख़बर मिली थी तो मैंने अपना सिर पीट लिया था। अब मैं ही इस फ़ितूर की सबसे बड़ी कायल (और ख़रीददार) हूं। नताशा के फ़ितूर ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि हर फ़ितूर के साथ हम ख़ुद को बेहतर पहचान रहे होते हैं, और ये अपने किस्म की अलग साधना है – एक अलग किस्म का मे़डिेटेशन। ये अपने-अपने आसमान के टुकड़ों को ढूंढ लाने की कोशिश है, जो ताउम्र चलती रहे तो अच्छा।
और आख़िर में, मिलिए अजूबा नंबर फ़ोर से। रोहित भाटिया। मैं डिज़ाईनर-विज़ाईनर, आर्टी टाईप लोगों से ज़रा दूर ही रहती हूं और नताशा के घर रोहित से दो-चार बार मिली तो उसे भी दूर से सलाम किया था। मतलब वो कितना पागल शख़्स होगा जो बच्चों के साथ कमरे की दीवारें पेंट करते हुए पूरा वीकेंड गुज़ार सकता है? जिसे चांदनी चौक टाईप की जगहों पर सुकून मिलता है? जो चाय बनाकर पिलाता है तो दूसरों की जूठी चाय की प्यालियां धोने से भी नहीं हिचकता? जिसका कारोबार वेडिंग ट्रूज़ो पर चलता है? जिसका बस चले तो कुशन कवर्स और पर्दों पर भी ब्रॉकेड की पट्टियां और सलमा-सितारा लगा दे। आई मीन, वियर्ड, रियली। और इसी रियली वियर्ड टाईप के डिज़ाईनर के भीतर के कई रंगों से वाकिफ़ हुई तो चार बार कान खींचे ख़ुद के। हम कितनी आसानी से लोगों को जज कर लेते हैं। स्टीरोटाईपिंग दुनिया का सबसे आसान और ख़तरनाक काम है। इस फ़ितूरी के डिजाईन किए हुए कपड़े मेरा नया फ़ितूर है आजकल - एक किस्म के ऑबसेसिव कम्पलसिव डिसॉर्डर की तरह। जिस डिज़ाईनर की बनाई सलमा-सितारा, कढ़ाई वाली साड़ियों को देखकर दिल घबराता था, उसी का तैयार किया हुआ डिज़ाईन मेरी सबसे अहम कहानी की सबसे अहम किरदार का आईना बन गया! उसकी पहचान बन गया! अपनी पहली किताब के कवर पर उसे जगह देकर ज़िन्दगी भर के लिए उस डिज़ाईन को न भूलने लायक बना दूंगी, ये मैंने अपने वियर्डेस्ट ख़्याल में भी नहीं सोचा था।
चार फ़ितूरियों के इस साझा नतीजे – 'नीला स्कार्फ' ने कई चीज़ें साबित की हैं। पहला, दिल अपनी शक्ल के दिल खोज लेता है।
दूसरा, दिल अपने फ़ितूर को पूरा करने के रास्ते भी खोज लेता है।
तीसरा, ज़िन्दगी में कभी भी ‘I will never do it (or I will never be able to do it)’ नहीं बोलना चाहिए। कुछ भी हो सकता है। कुछ भी!!!
और चौथा, एक फ़ितूर ही है जो आपको भी आपके अंजाम तक पहुंचाएगा। इसलिए अपने भीतर के फ़ितूर शिद्दत से पालिए दोस्तों।
(पोस्टस्क्रिप्ट - मेरे बाबा चीन से मेरे लिए सिल्क का स्कार्फ लेकर आए थे - नीले रंग का स्कार्फ, मेरी सोलहवीं सालगिरह पर। वो स्कार्फ इतना ख़ूबसूरत था कि उसे गले में लटकना दुश्वार हो जाया करता। एकदम अजनबी लोग मुझे रोक कर उस स्कार्फ के बारे में पूछा करते। वो स्कार्फ गुम हो गया कहीं। मैं इस सदमे से कई महीनों तक उबर नहीं पाई। आज भी उस स्कार्फ की बड़ी शिद्दत से याद आती है। गुम हो गए उस नीले स्कार्फ का ग़म मेरे लिए किसी बेहद अजीज़ दोस्त के गुम हो जाने जैसा है। वैसे सच तो ये है कि हम नीले स्कार्फ की तरह कई रिश्ते भी अपनी गर्दन में टांगे फिरते हैं, जिनकी कोई अहमियत नहीं होती - जो एक महंगी एक्सेसरी से ज़्यादा कुछ भी नहीं। जो न शरीर ढंकने का काम करता है, न गर्मी-सर्दी से बचाने का। लेकिन फिर भी गर्दन में शो-पीस की तरह लटकता रहता है, सिर्फ एक मकसद से - हमारे सौंदर्य और दिखावे में इज़ाफ़े के लिए। नीला स्कार्फ कहानी ऐसे ही एक रिश्ते की पड़ताल करती है।
एक और बात - ऑकर मटमैला भूरा रंग होता है। नीले आसमान पर चढ़े गहरे मटमैले बादलों के नीचे गर्दन में नीला स्कार्फ लटकाए बेवजह भटकती किसी लड़की को देखिएगा तो हम फ़ितूरियों के बारे में सोचिएगा ज़रूर।)
http://bit.ly/nsflipkart
http://bit.ly/nshomeshop18
http://bit.ly/nsinfibeam
शनिवार, 21 जून 2014
न छोटे ख़्वाब आएं इस दरवाज़े न बड़े
सब अपने छोटे छोटे ख़्वाब देखेंगे और उन्हें पूरा करने में लग जाएंगे तो किसी एक बड़े ख़्वाब को पूरा करने के लिए लोग कहां से जुटेंगे?
जाने क्यों बाबा की कही हुई ये बात बड़ी ज़ोर से याद आ रही है। बाबा यानी मेरे दादाजी। पूरी ज़िन्दगी एक कंपनी की नौकरी खटते रहे, एक मालिक के लिए काम करते रहे, एक टीम का ख़्वाब बुनते रहे - पूरी एकनिष्ठता के साथ। चालीस सालों तक। या शायद पैंतालीस सालों तक। ठीक-ठीक मालूम नहीं और फ़र्क भी क्या पड़ता है?
बाबा ऑन्ट्रोप्रॉन्योर नहीं थे, लेकिन उद्यमी थे। बाबा बिज़नेस मैन नहीं थे, लेकिन जिस कंपनी के लिए काम किया उसका बिज़नेस पांच गुना बढ़ाया। बाबा इनोवेटर - आविष्कारक - नहीं थे। लेकिन हर जगह नई पहल को शुरु करते देखा है हमने उन्हें। बाबा मशहूर भी नहीं थे। बड़े आदमी भी नहीं थे। लेजेंड भी नहीं थे। महान भी नहीं थे। कालजयी भी नहीं थे। उनके नाम पर कोई सम्मान, कोई पुरस्कार, कोई सड़क, कोई मोहल्ला नहीं है। लेकिन बाबा ने जिसकी ज़िन्दगी को थोड़ा सा भी छुआ, वो उनके गुज़र जाने के कई साल बाद भी उन्हें हर रोज़ याद करता है। बाबा पर्स में रखी जानेवाली तस्वीर हैं। बाबा किसी किताब के बीच से झांकते ज़िन्दगी के फ़लसफ़े हैं। बाबा सपनों में आकर रास्ता बतानेवाले फ़कीर हैैं।
हम बेशक उन्हें बात-बात पर याद न करते हों, लेकिन उनके बारे में जो बात हममें से कोई नहीं भूलता वो उनका वर्क एथिक्स है। काम में कोई कोताही उन्हें मंज़ूर न थी और अपने काम, अपनी प्रोफेशनल ज़िम्मेदारियों के लिए उस स्तर का कमिटमेंट मैंने तो क्या, उन्हें जो भी जानता होगा, उसने कभी नहीं देखा होगा, ये बात मैं दावे के साथ कह सकती हूं। अब सोचती हूं कि बाबा को इसके बदले मिला क्या?
घर की छत पर खड़े खड़े एक दिन मैंने पूछा था उनसे - आपकी पहचान क्या?
बाबा ने कहा था, मेरा काम। मेरी ड्यूटी। मेरी ज़िम्मेदारियां।
मैंने पूछा कि आपका नाम कहां? बाबा ने कहा था, हर उस शख़्स की ज़ुबान पर जिसने मेरे साथ काम किया है। जो मुझे थोड़ा भी जानता है।
मैंने पूछा था कि आपका हासिल क्या? बाबा कहते थे, इज्ज़त, भरोसा और प्यार।
मैंने पूछा था कि आपकी कमाई क्या? बाबा कहते थे, सिर पर तीन पीढ़ियों के लिए अदद-सी छत और सुकून कि जो किया, ईमानदारी से किया। मेरी शोहरत मेरी वाहवाहियों में नहीं, बल्कि इसमें है कि कितने लोग मेरे जाने के बाद मुझे याद करेंगे।
ये सब उल्टे-सीधे पाठ पढ़ाकर आप किस दुनिया में चले गए बाबा?
अब जब अपने आस-पास इतनी स्पर्द्धा और गला-काट प्रतियोगिता देखती हूं तो दिल बैठने लगता है। ये तो आपने सिखाया नहीं था। ये कैसी दुनिया है जिसमें इतनी घबराहट होती है? हर चीज़ बेचनी क्यों पड़ती है यहां? हर चीज़ की क़ीमत क्यों है? हर बात का पिच नोट क्यों?
मुझे तो सिर्फ काम करना था न। हम सबको करना चाहिए था। फिर हर चीज़ ख़ुदगर्ज़ी के तराजू पर क्यों तौली जाती है? सबकुछ गिव एंड टेक क्यों है? हम सबकी क़ीमत क्यों लगाना चाहते हैं? हर 'मौके' का 'फ़ायदा' उठाना हमें क्यों सिखाया जाता है? सबकुछ 'opportunity' ही क्यों? रिश्ते भी? सबकुछ एक्सपायरी डेट के साथ क्यों आता है?
ये दुनिया मेरे लिए नहीं है बाबा। इस अंधदौड़ में हम कहां होना चाहते हैं? हमारा वजूद क्या है और सपनों का रूप क्या? उनकी क़ीमत क्या? मेरे सपनों की क़ीमत पैसे-शोहरत-बैंक बैलेंस में कैसे नापी जाए? इनमें से कुछ भी तो नहीं बचता बाबा। आपने क्या छोड़ा था हमारे लिए? इन ऊटपटांग सीखों, वर्क एथिक्स और बेमानी मूल्यों के अलावा? पैसे छोडे होते। घर छोड़ा होता। संपत्ति छोड़ी होती। तो हम इस दुनिया में जीने का शऊर सीख पाते।
सिखाया भी तो क्या - देना? प्यार करना? ईमानदार होना? काम करना - हर रोज़, बेशुमार?
दिया भी तो क्या दिया कि देख लीजिए, आज बैरागी हो जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं सूझता। छोटे-छोटे और बड़े-बड़े ख़्वाबों की इस भीड़ में मेरा जी डूब रहा है। मुझे नहीं देखने ख़्वाब।
इसलिए क्योंकि ख़्वाब का मालूम नहीं और पता नहीं कि इनकी अहमियत क्या? लेकिन मुझसे फिलहाल जो हो सकता है वो रोज़-रोज़ का जीना है। रोज़-रोज़ के तय किए हुए रास्ते हैं। रोज़-रोज़ का कमाया हुआ यकीन है। रोज़-रोज़ की इस दिहाड़ी मजदूरी में आज का दिन कमाए हुए को एक साथ जमा करके किसी शीशे में उतारकर पी जाने का है।
मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014
'हाईवे' के बहाने प्रेम और यायावरी
सिर दर्द से फटा जा रहा हो तो क्या करना चाहिए?
सिर दर्द से फटा जा रहा हो तो कोई फिल्म देख आना चाहिए। फिर दो ही संभावनाएं बचेंगी - या तो दर्द इस हद तक बढ़ जाएगा कि अस्पताल जाना पड़ जाए, या फिर कुछ देर के लिए सही, दर्द से बढ़कर कोई और दर्द जी रहे होंगे हम।
ये बेतुका ख़्याल साइनस का इलाज करते हुए स्टीमर में चेहरा घुसाए अचानक से कौंधा था, बिजली की तरह। फिर कब ख़्याल फितूर बन गया, और कब बिजली की रफ़्तार से तैयार होकर मैं घर से बाहर निकल गई, मालूम ही न चला। होश तब आया जब मेरे पीछे ऑटो-लॉक दरवाज़ा बंद हो चुका था, और घर की चाभी भीतर रह गई थी।
अब मेरे पास 'पिच्चर' देखकर वक्त काटने के अलावा कोई चारा नहीं था।
लेकिन अपनी जल्दबाज़ी के फल मिलने बाकी थे अभी।
गाड़ी में बैठकर कुछ दूर आ गई तो होश आया कि पर्स तो घर पर ही छूट गया। पर्स माने छोटा वाला बटुआ। हम दो पर्स लेकर चलते हैं - एक झोलानुमा पर्स और एक पर्सनुमा बटुआ।
तो पैसों वाला बटुआ रह गया उस घर में, जिसकी चाभी मेरे पास नहीं थी और झोलानुमा पर्स झाड़-झुड़ कर लेने के बाद उससे निकल आए ठीक दो सौ तीस रुपए - जिससे फिल्म देखने का इंतज़ाम पूरा हो गया। दो सौ रुपए की टिकट, और तीस रुपए की पार्किंग। पिच्चर तो हम देखकर ही रहेंगे आज, चाहे पॉपकॉर्न से समझौता क्यों न करना पड़े।
तो दोपहर के शो के लिए नाक सुड़काते, छींक मारते, अपने बढ़े हुए साइनस को कोसते हुए हम पहुंच गए स्पाईस मॉल। पूरा टिकट काउंटर खचाखच भरा हुआ। 'हाईवे' देखने के लिए अंकल-आंटी, मम्मी-पापा-बेबी सब पहुंचे हुए थे। टिकट ले चुके थे तो मालूम पड़ा किसी की बर्थडे ट्रीट है। ये लो! जिस अकेलेपन का मज़ा उठाने के लिए हम अकेले पिच्चर देखने आए थे, उस अकेलेपन के मुंह पर तो लोगों ने बटर स्कॉच केक थोप दिया!
हम भी ज़िद्दी! बर्थडे पार्टी से दस कतार छोड़कर आगे जा बैठे। शोर-शराबे से जितना दूर रहेंगे, सिर दर्द का इलाज उतना जल्दी हो सकेगा। हाईवे में साउंड डिज़ाईन रेसुल पुकुट्टी का है, इसलिए साउंड के सेन्सिबल बने रहने की उम्मीद तो की ही जा सकती है।
फिल्म शुरू होती है तो लगता है कि जैसे एडिटर टाईमलाईन पर भारत दर्शन के शॉट्स डालकर एडिट करना भूल गई हो। जाने क्यों मुझे खटका लगता है। कुछ है जो कहीं से टूटने वाला है, कुछ लंबी-बड़ी उम्मीदें।
लेकिन जो बिल्कुल नहीं टूटता, एक किस्म का अंतर्ध्यान है जो हाईवे के साथ-साथ चलता रहता है। फिल्म का इंटरवल कब आता है, मालूम भी नहीं चलता। बल्कि इंटरवल आता है तो लगता है कि इस पहले हिस्से की तो फिल्म में ज़रूरत ही नहीं थी। Prelude के नाम पर फिल्मकार ने बहुत लंबा वक्त ले लिया हमारा। लेकिन कहानी भी इंटरवल के पहले हिस्से में ही है। फिल्म का दूसरा हिस्सा एक सफ़र है, एक अंतहीन सफ़र। एक ऐसा अंतहीन सफ़र जिसपर मैं और आप होने की कामना करते हैं, लेकिन उसे जीता शायद इम्तियाज़ अली जैसा ही सनकी, पागल, eccentric फिल्मकार है।
'हाईवे' सिर्फ एक रईस बाप की इकलौती बेटी वीरा के उठा लिए जाने की कहानी नहीं है।
'हाईवे' एक अक्खड़ गुज्जर महादेव भाटी की ज़िद, उसके अमीरों के प्रति नफरत से उपजनेवाले नतीजों की कहानी भी नहीं है।
हाईवे प्रेम कहानी भी नहीं है।
हाईवे स्टॉकहोम सिंड्रोम तो बिल्कुल नहीं है।
हाईवे इन सबसे बढ़कर कुछ है।
जिस साउंड डिज़ाईन से बहुत उम्मीदें थी, वही साउंड डिज़ाईन फिल्म से बांधे रखती है हमको। दूर निकलती ट्रेन, घुप्प अंधेरे में आती झींगुरों की आवाज़, गाड़ियों के पहिए, गलती से कहीं किसी बर्तन के गिरने की आवाज़ और इन थोड़ी सी आवाज़ों के बीच ढेर सारा सन्नाटा। इस साउंड डिज़ाईन में ए.आर. रहमान का बैकग्राउंड स्कोर क्या कर रहा है, कहीं समझ में नहीं आता। बल्कि 'माही वे' और 'पटाका कुड़ी' अलग से न सुना होता, तो शायद फिल्म में ए.आर.रहमान की भूमिका को लेकर बहुत देर तक पिच्चर हॉल में बैेठे-बैठे सिर खुजा सकती थी।
कहने को तो सिनेमैटोग्राफी पर भी कुछ कहा जा सकता है, लेकिन वो मेरी विशेषज्ञता का दायरा नहीं है। हालांकि फिर भी इस बात पर हैरानी होती है कि जो फिल्म पूरी तरह आउटडोर है, जहां लोकेशन्स अपना काम खुद कर रहे हैं वहां भी कुछ ऐसे शॉट्स क्यों नहीं लिए जा सके जो याद में ठहर जाने के काबिल हों?
लेकिन 'हाईवे' सिनेमैटोग्राफर की फिल्म भी नहीं है। बल्कि हाईवे किसी टेक्नीशियन की फिल्म तो है ही नहीं। हाईवे पूरी तरह इम्तियाज़ अली की फिल्म है, या फिर आलिया भट्ट और रणदीप हुड्डा की।
वैसे मैंने ये पोस्ट फिल्म की आलोचना या रिव्यू के लिए लिखना शुरू नहीं किया था। मैं तो फिल्म देखने के बाद पैदा हुई बेचैनी को कम करने के लिए ये पोस्ट लिखना चाहती थी।
तकनीकी तौर पर फिल्म कैसी भी रही हो, मेरे लिए 'हाईवे' बचपन के ज़ख्मों से समझौता करके जीने, उन्हें भूलने और भूलने के लिए कुछ ऊटपटांग करने की हिम्मत रखने की कहानी है।
हम सब अपने सीने पर अपने गुज़रे दिनों के भारी पत्थर लिए चलते हैं। उन पत्थरों को पिघलाने का रास्ता किसी ऐसे ही हाईवे से होकर जाता है शायद, जिसपर हम कभी चले नहीं। जिसे कभी देखा नहीं। जिसे देखने की, जीने की हिम्मत नहीं रखते हम। हम तो प्लानिंग में जीते हैं। कम्पार्टमेंट्स में। इतने पैसे हो जाएंगे, तो इतने दर्शनीय स्थल, इतने टूरिस्ट प्लेस देख लेंगे हम। बच्चे इतने बड़े हो जाएंगे तो ये-ये देख लेंगे।
लेकिन एक ज़िन्दगी वैसी भी होती है जिसमें कोई प्लानिंग नहीं होती। जो अपने-आप चलती रहती है। जेब के बचे-खुचे दो सौ तीस रुपए ख़त्म भी हो जाएं तो क्या रुकता है? लेकिन एडवेंचर हमारे लिए पैकेज टूअर के साथ मिलने वाला पैम्फलेट है जिसपर टिक मार्क लगाकर हम खुद को बहुत एडवेंचरस, बहुत बड़े घुमक्कड़ मान लेते हैं।
मेरे लिए 'हाईवे' अपने घुमंतूपन से बेइंतहा प्यार करने, अपने भीतर का यायावर बचाए रखने का यकीन दिलाने वाली फिल्म है, जो प्लानिंग नहीं करता, जो इम्पलसिव है, एक छोटे बच्चे की तरह ज़िद्दी भी।
यूं भी जो इंसान किसी मंज़िल का नहीं होता, वो इंसान सबका होता है - उसी शुद्धता, उसी ईमानदारी के साथ, जिस ईमानदारी के साथ वो रास्ते का होता है।
मंज़िलें हमें सीमाओं में जकड़ती हैं। रास्ते हमें स्वच्छंद छोड़ते हैं। मंज़िलें अनुरक्ति का ज़रिया हैं, अटैचमेंट हैं। रास्ते हमें अनासक्त रखते हैं। रास्ते हमें विरक्त रखते हैं, बिल्कुल डिटैच्ड। बौद्ध भिक्षुएं के यायावर होने के पीछे का राज़ अब समझ में आया है। रास्ते हमें ईश्वर के क़रीब रखते हैं। रास्ते हमारे भीतर का प्रेम बचाए रखते हैं।
मेरे लिए 'हाईवे' उस एक लम्हे को समझने की राह खोलने वाली फिल्म है जिसमें प्रेम अपने शुद्ध रूप में होता है - अपेक्षाओं के परे, उम्मीदों से दूर। वीरा से महावीर पूछता है कि तुम आख़िर चाहती क्या हो? मेरे साथ शादी करोगी? बच्चे पालोगी? वीरा बहुत मासूमियत से कहती है, ऐसा कोई प्लान तो नहीं है।
ये वो प्रेम है जो उदार है, सिर्फ समर्पण जानता है। ये प्रेम बांधता नहीं है। सामने वाले से कोई उम्मीद नहीं करता, सिवाय इसके कि जितना हासिल हो, वो सांस-सांस जी लिया जाए। इस प्रेम में भी कहीं कोई प्लानिंग नहीं है। लेकिन हममें से कितने लोग कर पाते हैं इस तरह अपने घर-परिवार-बच्चों से प्यार? हमारा प्यार कितना अनुरक्त होता है, कितना डरपोक, किस हद तक असुरक्षित!
'हाईवे' मेरे इस यकीन को बचाए रखता है कि हर प्रेम कहानी का अंत सुखांत ही नहीं होना चाहिए। जो अधूरा है, वही सुन्दर है। दैवीय। कभी न ख़त्म होने वाले रास्ते की तरह। उन रास्तों की तरह, जिनपर मैपरीडिंग करते हुए नहीं चला जा सकता। उन रास्तों की तरह, जिनकी अहमियत सिर्फ और सिर्फ आप समझते हैं, या फिर आपकी ये आत्मा। 'हाईवे' पर चलना उसी रूहानियत को बचाए रखना है।
एक पहाड़ी नदी की तेज़ धार के ठीक बीच पत्थर पर बैठी हुई वीरा जब पहले हंसती है, और फिर रो पड़ती है तो उसके साथ-साथ उतनी ही ज़ोर-ज़ोर से रोने को जी चाहता है। अपनी ज़िन्दगी की आपाधापी में हम कैसे ख़ुद को खो देते हैं! और ख़ुद से मिलते भी हैं तो कहां! वो तेज़ धारा वीरा को बहाकर ले ही गई होती तो क्या अफ़सोस होता। किसके लिए जीना है, और किस जीवन के लिए इतनी हाय-तौबा!
पहाड़ पर का घर एक वीरा का ही सपना नहीं, हममें से जाने कितनों का सपना है वो। लेकिन सपने सपने ही रहे तो अच्छा। सच होते ही उनका रोमांस भी खत्म हो जाता है, रोमांच भी।
मैं इम्तियाज़ अली की बड़ी फैन नहीं हूं। बड़ी तो क्या, छोटी-मोटी भी नहीं हूं। लेकिन जाने क्यों भीतर से ये इच्छा होती रही कि 'हाईवे' इम्तियाज़ की पहली फिल्म होनी चाहिए थी, या फिर आख़िरी। इसके पहले, या इसके बाद का सफ़र कुदरत से दूर करने की हरसंभव कोशिश करता हो शायद। लेकिन हाईवे कुदरती तौर पर imperfect है, और यही imperfection इस फिल्म की ख़ूबी है।
फिल्म खत्म होने के बाद मैं बहुत देर तक बैठी सोचती रही हूं कि जो जिया उसमें सबसे ख़ूबसूरत यायावरी थी - अजमेर से पुष्कर तक अकेले एक बस में किया गया सफ़र, मुक्तेश्वर के एक कैंप से दिखाई देने वाला खुला आसमान, सातताल के पास के किसी अनाम गांव में किसी अनजान घर में परोसा गया राजमा-चावल, अलवर के एक गांव से दूसरे गांव की धूल खाती जीपयात्रा, नगापट्टिनम के प्लेटफॉर्म पर किया गया इडली-चटनी का नाश्ता, आणंद की किसी सड़क पर गिरती हुई दोपहर का सुकून, गोड्डा के किसी पहाड़ी गांव में गुज़री कोई रात, कॉर्बेट के किसी गांव में मनाई गई भांग में डूबी कोई एक अलमस्त होली...
ये हाईवे है। कीकर, पीपल, साल, बांस, टेसू, अमलतास, गेहूं, मक्का, सरसों, गोभी, बाजरा, चीड़, देवदार और जाने कौन से नामी-बेनामी खेतों, जंगलों, रास्तों के बगल से होकर गुज़रने वाला हाईवे। फिल्म देखिए न देखिए, अपने आप को बचाए रखने के लिए साल में दो-चार बार हाईवे पर ज़रूर उतरते रहिए। बिना मैप, बिना प्लान के। ख़ुद से मिलने का इससे बेहतर और कोई रास्ता नहीं होगा।
अपनी ज़िन्दगी में जिए गए हाईवे के बारे में सोच-सोचकर अब सिर तो क्या, ऊपर की छत भी घूम रही है। इसलिए कई विरोधाभासों की उंगलियां थामे मैं अपनी मंज़िल की ओर रूख कर चुकी हूं।
सिर दर्द से फटा जा रहा हो तो कोई फिल्म देख आना चाहिए। फिर दो ही संभावनाएं बचेंगी - या तो दर्द इस हद तक बढ़ जाएगा कि अस्पताल जाना पड़ जाए, या फिर कुछ देर के लिए सही, दर्द से बढ़कर कोई और दर्द जी रहे होंगे हम।
ये बेतुका ख़्याल साइनस का इलाज करते हुए स्टीमर में चेहरा घुसाए अचानक से कौंधा था, बिजली की तरह। फिर कब ख़्याल फितूर बन गया, और कब बिजली की रफ़्तार से तैयार होकर मैं घर से बाहर निकल गई, मालूम ही न चला। होश तब आया जब मेरे पीछे ऑटो-लॉक दरवाज़ा बंद हो चुका था, और घर की चाभी भीतर रह गई थी।
अब मेरे पास 'पिच्चर' देखकर वक्त काटने के अलावा कोई चारा नहीं था।
लेकिन अपनी जल्दबाज़ी के फल मिलने बाकी थे अभी।
गाड़ी में बैठकर कुछ दूर आ गई तो होश आया कि पर्स तो घर पर ही छूट गया। पर्स माने छोटा वाला बटुआ। हम दो पर्स लेकर चलते हैं - एक झोलानुमा पर्स और एक पर्सनुमा बटुआ।
तो पैसों वाला बटुआ रह गया उस घर में, जिसकी चाभी मेरे पास नहीं थी और झोलानुमा पर्स झाड़-झुड़ कर लेने के बाद उससे निकल आए ठीक दो सौ तीस रुपए - जिससे फिल्म देखने का इंतज़ाम पूरा हो गया। दो सौ रुपए की टिकट, और तीस रुपए की पार्किंग। पिच्चर तो हम देखकर ही रहेंगे आज, चाहे पॉपकॉर्न से समझौता क्यों न करना पड़े।
तो दोपहर के शो के लिए नाक सुड़काते, छींक मारते, अपने बढ़े हुए साइनस को कोसते हुए हम पहुंच गए स्पाईस मॉल। पूरा टिकट काउंटर खचाखच भरा हुआ। 'हाईवे' देखने के लिए अंकल-आंटी, मम्मी-पापा-बेबी सब पहुंचे हुए थे। टिकट ले चुके थे तो मालूम पड़ा किसी की बर्थडे ट्रीट है। ये लो! जिस अकेलेपन का मज़ा उठाने के लिए हम अकेले पिच्चर देखने आए थे, उस अकेलेपन के मुंह पर तो लोगों ने बटर स्कॉच केक थोप दिया!
हम भी ज़िद्दी! बर्थडे पार्टी से दस कतार छोड़कर आगे जा बैठे। शोर-शराबे से जितना दूर रहेंगे, सिर दर्द का इलाज उतना जल्दी हो सकेगा। हाईवे में साउंड डिज़ाईन रेसुल पुकुट्टी का है, इसलिए साउंड के सेन्सिबल बने रहने की उम्मीद तो की ही जा सकती है।
फिल्म शुरू होती है तो लगता है कि जैसे एडिटर टाईमलाईन पर भारत दर्शन के शॉट्स डालकर एडिट करना भूल गई हो। जाने क्यों मुझे खटका लगता है। कुछ है जो कहीं से टूटने वाला है, कुछ लंबी-बड़ी उम्मीदें।
लेकिन जो बिल्कुल नहीं टूटता, एक किस्म का अंतर्ध्यान है जो हाईवे के साथ-साथ चलता रहता है। फिल्म का इंटरवल कब आता है, मालूम भी नहीं चलता। बल्कि इंटरवल आता है तो लगता है कि इस पहले हिस्से की तो फिल्म में ज़रूरत ही नहीं थी। Prelude के नाम पर फिल्मकार ने बहुत लंबा वक्त ले लिया हमारा। लेकिन कहानी भी इंटरवल के पहले हिस्से में ही है। फिल्म का दूसरा हिस्सा एक सफ़र है, एक अंतहीन सफ़र। एक ऐसा अंतहीन सफ़र जिसपर मैं और आप होने की कामना करते हैं, लेकिन उसे जीता शायद इम्तियाज़ अली जैसा ही सनकी, पागल, eccentric फिल्मकार है।
'हाईवे' सिर्फ एक रईस बाप की इकलौती बेटी वीरा के उठा लिए जाने की कहानी नहीं है।
'हाईवे' एक अक्खड़ गुज्जर महादेव भाटी की ज़िद, उसके अमीरों के प्रति नफरत से उपजनेवाले नतीजों की कहानी भी नहीं है।
हाईवे प्रेम कहानी भी नहीं है।
हाईवे स्टॉकहोम सिंड्रोम तो बिल्कुल नहीं है।
हाईवे इन सबसे बढ़कर कुछ है।
जिस साउंड डिज़ाईन से बहुत उम्मीदें थी, वही साउंड डिज़ाईन फिल्म से बांधे रखती है हमको। दूर निकलती ट्रेन, घुप्प अंधेरे में आती झींगुरों की आवाज़, गाड़ियों के पहिए, गलती से कहीं किसी बर्तन के गिरने की आवाज़ और इन थोड़ी सी आवाज़ों के बीच ढेर सारा सन्नाटा। इस साउंड डिज़ाईन में ए.आर. रहमान का बैकग्राउंड स्कोर क्या कर रहा है, कहीं समझ में नहीं आता। बल्कि 'माही वे' और 'पटाका कुड़ी' अलग से न सुना होता, तो शायद फिल्म में ए.आर.रहमान की भूमिका को लेकर बहुत देर तक पिच्चर हॉल में बैेठे-बैठे सिर खुजा सकती थी।
कहने को तो सिनेमैटोग्राफी पर भी कुछ कहा जा सकता है, लेकिन वो मेरी विशेषज्ञता का दायरा नहीं है। हालांकि फिर भी इस बात पर हैरानी होती है कि जो फिल्म पूरी तरह आउटडोर है, जहां लोकेशन्स अपना काम खुद कर रहे हैं वहां भी कुछ ऐसे शॉट्स क्यों नहीं लिए जा सके जो याद में ठहर जाने के काबिल हों?
लेकिन 'हाईवे' सिनेमैटोग्राफर की फिल्म भी नहीं है। बल्कि हाईवे किसी टेक्नीशियन की फिल्म तो है ही नहीं। हाईवे पूरी तरह इम्तियाज़ अली की फिल्म है, या फिर आलिया भट्ट और रणदीप हुड्डा की।
वैसे मैंने ये पोस्ट फिल्म की आलोचना या रिव्यू के लिए लिखना शुरू नहीं किया था। मैं तो फिल्म देखने के बाद पैदा हुई बेचैनी को कम करने के लिए ये पोस्ट लिखना चाहती थी।
तकनीकी तौर पर फिल्म कैसी भी रही हो, मेरे लिए 'हाईवे' बचपन के ज़ख्मों से समझौता करके जीने, उन्हें भूलने और भूलने के लिए कुछ ऊटपटांग करने की हिम्मत रखने की कहानी है।
हम सब अपने सीने पर अपने गुज़रे दिनों के भारी पत्थर लिए चलते हैं। उन पत्थरों को पिघलाने का रास्ता किसी ऐसे ही हाईवे से होकर जाता है शायद, जिसपर हम कभी चले नहीं। जिसे कभी देखा नहीं। जिसे देखने की, जीने की हिम्मत नहीं रखते हम। हम तो प्लानिंग में जीते हैं। कम्पार्टमेंट्स में। इतने पैसे हो जाएंगे, तो इतने दर्शनीय स्थल, इतने टूरिस्ट प्लेस देख लेंगे हम। बच्चे इतने बड़े हो जाएंगे तो ये-ये देख लेंगे।
लेकिन एक ज़िन्दगी वैसी भी होती है जिसमें कोई प्लानिंग नहीं होती। जो अपने-आप चलती रहती है। जेब के बचे-खुचे दो सौ तीस रुपए ख़त्म भी हो जाएं तो क्या रुकता है? लेकिन एडवेंचर हमारे लिए पैकेज टूअर के साथ मिलने वाला पैम्फलेट है जिसपर टिक मार्क लगाकर हम खुद को बहुत एडवेंचरस, बहुत बड़े घुमक्कड़ मान लेते हैं।
मेरे लिए 'हाईवे' अपने घुमंतूपन से बेइंतहा प्यार करने, अपने भीतर का यायावर बचाए रखने का यकीन दिलाने वाली फिल्म है, जो प्लानिंग नहीं करता, जो इम्पलसिव है, एक छोटे बच्चे की तरह ज़िद्दी भी।
यूं भी जो इंसान किसी मंज़िल का नहीं होता, वो इंसान सबका होता है - उसी शुद्धता, उसी ईमानदारी के साथ, जिस ईमानदारी के साथ वो रास्ते का होता है।
मंज़िलें हमें सीमाओं में जकड़ती हैं। रास्ते हमें स्वच्छंद छोड़ते हैं। मंज़िलें अनुरक्ति का ज़रिया हैं, अटैचमेंट हैं। रास्ते हमें अनासक्त रखते हैं। रास्ते हमें विरक्त रखते हैं, बिल्कुल डिटैच्ड। बौद्ध भिक्षुएं के यायावर होने के पीछे का राज़ अब समझ में आया है। रास्ते हमें ईश्वर के क़रीब रखते हैं। रास्ते हमारे भीतर का प्रेम बचाए रखते हैं।
मेरे लिए 'हाईवे' उस एक लम्हे को समझने की राह खोलने वाली फिल्म है जिसमें प्रेम अपने शुद्ध रूप में होता है - अपेक्षाओं के परे, उम्मीदों से दूर। वीरा से महावीर पूछता है कि तुम आख़िर चाहती क्या हो? मेरे साथ शादी करोगी? बच्चे पालोगी? वीरा बहुत मासूमियत से कहती है, ऐसा कोई प्लान तो नहीं है।
ये वो प्रेम है जो उदार है, सिर्फ समर्पण जानता है। ये प्रेम बांधता नहीं है। सामने वाले से कोई उम्मीद नहीं करता, सिवाय इसके कि जितना हासिल हो, वो सांस-सांस जी लिया जाए। इस प्रेम में भी कहीं कोई प्लानिंग नहीं है। लेकिन हममें से कितने लोग कर पाते हैं इस तरह अपने घर-परिवार-बच्चों से प्यार? हमारा प्यार कितना अनुरक्त होता है, कितना डरपोक, किस हद तक असुरक्षित!
'हाईवे' मेरे इस यकीन को बचाए रखता है कि हर प्रेम कहानी का अंत सुखांत ही नहीं होना चाहिए। जो अधूरा है, वही सुन्दर है। दैवीय। कभी न ख़त्म होने वाले रास्ते की तरह। उन रास्तों की तरह, जिनपर मैपरीडिंग करते हुए नहीं चला जा सकता। उन रास्तों की तरह, जिनकी अहमियत सिर्फ और सिर्फ आप समझते हैं, या फिर आपकी ये आत्मा। 'हाईवे' पर चलना उसी रूहानियत को बचाए रखना है।
एक पहाड़ी नदी की तेज़ धार के ठीक बीच पत्थर पर बैठी हुई वीरा जब पहले हंसती है, और फिर रो पड़ती है तो उसके साथ-साथ उतनी ही ज़ोर-ज़ोर से रोने को जी चाहता है। अपनी ज़िन्दगी की आपाधापी में हम कैसे ख़ुद को खो देते हैं! और ख़ुद से मिलते भी हैं तो कहां! वो तेज़ धारा वीरा को बहाकर ले ही गई होती तो क्या अफ़सोस होता। किसके लिए जीना है, और किस जीवन के लिए इतनी हाय-तौबा!
पहाड़ पर का घर एक वीरा का ही सपना नहीं, हममें से जाने कितनों का सपना है वो। लेकिन सपने सपने ही रहे तो अच्छा। सच होते ही उनका रोमांस भी खत्म हो जाता है, रोमांच भी।
मैं इम्तियाज़ अली की बड़ी फैन नहीं हूं। बड़ी तो क्या, छोटी-मोटी भी नहीं हूं। लेकिन जाने क्यों भीतर से ये इच्छा होती रही कि 'हाईवे' इम्तियाज़ की पहली फिल्म होनी चाहिए थी, या फिर आख़िरी। इसके पहले, या इसके बाद का सफ़र कुदरत से दूर करने की हरसंभव कोशिश करता हो शायद। लेकिन हाईवे कुदरती तौर पर imperfect है, और यही imperfection इस फिल्म की ख़ूबी है।
फिल्म खत्म होने के बाद मैं बहुत देर तक बैठी सोचती रही हूं कि जो जिया उसमें सबसे ख़ूबसूरत यायावरी थी - अजमेर से पुष्कर तक अकेले एक बस में किया गया सफ़र, मुक्तेश्वर के एक कैंप से दिखाई देने वाला खुला आसमान, सातताल के पास के किसी अनाम गांव में किसी अनजान घर में परोसा गया राजमा-चावल, अलवर के एक गांव से दूसरे गांव की धूल खाती जीपयात्रा, नगापट्टिनम के प्लेटफॉर्म पर किया गया इडली-चटनी का नाश्ता, आणंद की किसी सड़क पर गिरती हुई दोपहर का सुकून, गोड्डा के किसी पहाड़ी गांव में गुज़री कोई रात, कॉर्बेट के किसी गांव में मनाई गई भांग में डूबी कोई एक अलमस्त होली...
ये हाईवे है। कीकर, पीपल, साल, बांस, टेसू, अमलतास, गेहूं, मक्का, सरसों, गोभी, बाजरा, चीड़, देवदार और जाने कौन से नामी-बेनामी खेतों, जंगलों, रास्तों के बगल से होकर गुज़रने वाला हाईवे। फिल्म देखिए न देखिए, अपने आप को बचाए रखने के लिए साल में दो-चार बार हाईवे पर ज़रूर उतरते रहिए। बिना मैप, बिना प्लान के। ख़ुद से मिलने का इससे बेहतर और कोई रास्ता नहीं होगा।
अपनी ज़िन्दगी में जिए गए हाईवे के बारे में सोच-सोचकर अब सिर तो क्या, ऊपर की छत भी घूम रही है। इसलिए कई विरोधाभासों की उंगलियां थामे मैं अपनी मंज़िल की ओर रूख कर चुकी हूं।
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