लेख लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
लेख लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 14 अगस्त 2014

बराबरी के जश्न का त्यौहार बने रक्षा-बंधन

रक्षा बंधन से जुड़ी कई यादें हैं। उनमें से सबसे ख़ास है माँ के हाथ की दाल भरकर बनाई हुई पूड़ियाँ और खीर जो राखी बांधने के कार्यक्रम के बाद खाने को मिलती थी। इसके अलावा हथेली पर धर दिए जाने वाले वे पैसे भी ख़ास होते थे जो राखी के नाम पर हम बहनों को मिला करते थे। पूड़ियों और खीर पर कभी झगड़ा नहीं होता था, पैसों पर ज़रूर होता था। मेरे दोनों छोटे भाई कई सालों तक इस बात पर मुँह फुलाते रहे कि एक धागा बाँधने के नाम पर पैसे सिर्फ़ दीदी को मिलते हैं। अगर ऐसा ही है तो हम भी दीदी को राखी क्यों नहीं बाँध देते? बचपन की वो नासमझी अब बड़े होने पर तार्किक लगती है। बात पैसों की नहीं थी, बात उस बंधन की - उस वायदे की थी जो रक्षा बंधन के हवाले से भाई-बहन एक-दूसरे को करते हैं। बहन अगर भाई को दुआओं में याद रखने की कसम खाती है तो भाई बहन की हर हाल में रक्षा करने का वायदा करता है। राखी अगर रक्षा का वो बंधन, वो वायदा है जो एक भाई की कलाई पर बाँधते हुए बहन उससे लेती है, तो यही काम तो अब बहनें भी करने लगी हैं भाईयों की ख़ातिर। इसलिए पिछले दो सालों से हमारे घर में राखी बाँधने की परंपरा बदल गई, और इसकी शुरुआत की मेरे भाई ने। अब सिर्फ़ बहनें ही भाईयों को राखी नहीं बाँधतीं, बल्कि भाई भी बहनों की कलाई पर राखी बाँधते हैं, और बहनें भी एक-दूसरे को राखी-सूत्र बाँधती हैं। सुनकर अजीब लगता है, लेकिन इस बदली हुई परंपरा के पीछे कई वजहें, ज़िन्दगी के दिए हुए कई तजुर्बे हैं।   

रक्षा बंधन का त्यौहार दुनिया भर की बहनों की तरह मेरे लिए भी बहुत ख़ास है। इसलिए भी क्योंकि इस एक दिन हम उस एक रिश्ते का जश्न मनाते हैं जो परिवार की धुरी होता है। भाई और बहन (या बहन और बहन) का रिश्ता सिर्फ़ एक नहीं, कई परिवारों को जोड़ता है। सबसे पहले तो उस परिवार को, जिसमें दोनों पैदा हुए हैं। फिर उन परिवारों को, जो वे बसाते हैं। भाई और बहन के रिश्ते की नींव मज़बूत हो तो धीरे-धीरे उनके इर्द-गिर्द बनते और रिश्तों की दीवारें अपने-आप मज़बूत होने लगती हैं और रिश्तों को मज़बूत करने का काम सिर्फ़ रक्षा बंधन के बहाने नहीं होता। रिश्तों को मज़बूत करने की ज़िम्मेदारी जितनी बहन की होती है, उतनी ही भाई की भी होती है। 

दरअसल अब भाई और बहन के रिश्ते में - बल्कि परिवार में भी - ज़िम्मेदारियों की परिभाषाएँ बदलने लगी हैं। आज से कुछ साल पहले तक बेटे से उम्मीद की जाती थी कि वो परिवार की तमाम ज़िम्मेदारियाँ संभाले। बेटियों को पराया धन मानते हुए उन्हें ब्याह दिया जाना परिवार का इकलौता मकसद होता था। ससुराल से मायके आई बेटी को अतिथि समझा जाता था और बेटी के पति पाहुन होते थे - मेहमान। लेकिन पिछले कुछ सालों में हिंदुस्तानी समाज की ये धारणा कुछ ज़रूरत, और कुछ बदलते हुए सामाजिक परिवेश की वजह से बहुत बदली है। बेटियाँ न सिर्फ़ अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं बल्कि परिवार चलाने में, अपने बुज़ुर्ग माँ-बाप की सेवा करने में, अपने छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई-लिखाई और परिवार की तमाम ज़रूरतों को पूरी करने में वैसे ही मशगूल हैं जैसे उनके भाई होते हैं। जब परिवार में बेटियों की जगह और ज़िम्मेदारी बदली है तो रक्षा बंधन जैसे त्यौहार के मौके पर उस बदली हुई जगह और ज़िम्मेदारी को पूरा सम्मान क्यों न दिया जाए?

मेरी निजी राय ये भी है कि रक्षा बंधन को मनाने का तरीका बदलेगा तो बेटियों को इज्ज़त देने का तरीका भी बदलेगा। बहन की बेचारगी से जुड़ी जो दंतकथाएं सुनते हुए हम बड़े हुए, उन्हें बदलकर नई कहानियाँ लिखे जाने की अब सख़्त ज़रूरत है। इन कहानियों की नायिकाएं नरेन्द्र कोहली की जिज्जी जैसे किरदार हों तो कितना अच्छा हो! इन कहानियों में अपने भाई के हक़ के लिए लड़ती बहनों के किरदार हों तो कितना अच्छा हो! इन कहानियों में वैसी बेटियाँ हों तो कितना अच्छा हो कि जिन्हें पिता के प्यार के साथ-साथ उनकी संपत्ति में भी बराबर की हिस्सेदारी मिली। इन कहानियों में अपनी बहनों को स्कूल या कॉलेज भेजने के लिए लड़ते भाई और बहन हों तो कितना अच्छा हो! मेरी नज़र में रक्षा बंधन को नए तरीके से मनाए जाने की ज़रूरत इसलिए भी है क्योंकि समाज में बेटियों को बराबरी का अधिकार तबतक नहीं मिल सकता जबतक हमारी परंपराओं और संस्कारों में उन्हें वो अधिकार न दिया जाए। रक्षा बंधन के मौके पर भाई के हाथ पर राखी बाँधती आज की बहन कमज़ोर और निरीह बिल्कुल नहीं है। उस बहन को रक्षा के झूठे दिखावे की नहीं, बराबर के प्यार और अधिकार की सच्चे वायदे की ज़रूरत है। 

राखी हम अभी भी मनाते हैं और उतने ही प्यार से। लेकिन मुझे ये कहने में बिल्कुल हिचक नहीं कि मेरे भाई मुझसे बेहतर पूड़ियाँ और खीर बनाते हैं और मैं उनसे हथेली पर महंगे तोहफ़े रखने की उम्मीद बिल्कुल नहीं करती। परिवार और रिश्ते वो साझा ज़िम्मेदारी है जो हम सब आपसी समझ से आपस से बड़े प्यार से बाँटते और निभाते हैं। फिर हम सबने एक-दूसरे के हाथों पर राखी के धागे बाँधकर उस रिश्ते और ज़िम्मेदारी को और पुख़्ता बनाने की ओर एक क़दम ही तो बढ़ा लिया है। इसके अलावा, अगर मैं ये कोशिश करती हूँ कि मेरे बेटे और बेटी की परवरिश में मैं कोई अंतर नहीं करूँगी तो उनके दिए गए संस्कारों में, उनके साथ मनाए जा रहे त्यौहारों में ये बात परिलक्षित होनी चाहिए। अबकी साल राखी में जितना संजीदा और ईमानदारी वायदा मैं अपने भाई, अपने बेटे से अपने और अपनी बेटी के लिए लूँगी उतना ही ईमानदार वायदा उनकी ज़रूरतों में, उनके मुश्किल दिनों में, उनकी ज़िम्मेदारियों में उनके साथ खड़े होने का मैं भी करूँगी। अगर अधिकार बराबरी का होगा तो ज़िम्मेदारियाँ भी बराबरी की होंगी। आपकी क्या राय है इस बारे में?  

(१० अगस्त २०१४ को 'प्रभात ख़बर' की पत्रिका 'फ़ैमिली' में प्रकाशित। http://epaper.prabhatkhabar.com/318383/Faimly/Family#dual/2/1)

शुक्रवार, 11 जुलाई 2014

दोनों जहां से खोए, गए हम... दास्तान-ए-इंदिरा नूयी

इंदिरा नूयी का इंटरव्यू पढ़कर मैं बहुत देर तक ज़ोर-ज़ोर से हंसती रही थी। हंसी उस विडंबना पर आ रही थी जो सर्वव्यापी है, यूनिवर्सल। लेकिन है अकाट्य सत्य ही - आप चाहे दुनिया की सबसे बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी की सीईओ हों, या फिर दिन भर पत्थर तोड़कर शाम को घर लौट जाने वाली मजदूर, दुनिया के हर कोने में आपकी ज़िन्दगी की कहानी एक-सी ही सुनाई देगी बिल्कुल। 

अब मैं अपनी ही बात करते हुए इस लम्हे, बिल्कुल इस लम्हे का हाल बयां करूं तो सीन कुछ ऐसा है। मैं डायनिंग टेबल के एक कोने में बैठी ये लेख लिखने की कोशिश कर रही हूं और मेरे दोनों बच्चे मेज़ की दूसरी तरफ़ खाना खाते हुए लगातार मुझे टोकते जा रहे हैं। मम्मा, ऊंट अपनी नाक क्यों बंद कर सकता है? मम्मा, आद्या ने मेरे पैरे को छुआ। मम्मा, आदित ने अपना होमवर्क नहीं किया... मैं एक तरफ़ लिखने की नाकाम कोशिश कर रही हूं और दूसरी तरफ ध्यान झगड़ा सुलझाने में भी है। इसके अलावा फ़िक्र कल सुबह के नाश्ते की, बच्चों के यूनिफॉर्म साफ़ करवाने की, उनका होमवर्क कराने की, राशन के सामान की, घर की छत से लटकते जाले साफ़ कराने की भी है और ये सारे ख़्याल एक साथ ज़ेहन में चल रहे हैं। हफ़्ते के ख़त्म हो जाने का अफ़सोस भी है। सोमवार की सुबह तक डेडलाईन फिर से हावी होगी। 


अचानक मुझे ये ख़्याल बहुत सुकून देता है कि किसी इंदरा नूयी की, किसी शेरिल सैंडबर्ग या किसी टाइगर मॉम एमी चुआ की हालत रोज़-दर-रोज़ मुझसे अलग नहीं होती है। 

घर की दहलीज़ के भीतर एक औरत से जिस संजीदगी के साथ मां, बहू, बेटी, पत्नी और इस तरह की तमाम ज़िम्मेदारियों के निर्वहन की अपेक्षा की जाती है वो अपेक्षा एक पुरुष से नहीं रखी जाती। इंदिरा से उनकी मां ने कहा था कि वो अपने सीईओ होने का ताज या तो गैरेज में छोड़कर आए या फिर दफ़्तर में। घर में उसकी ज़िम्मेदारी दूध लाने की है, और अपना घर चलाने की। घर के पुरुष से ऐसी कोई अपेक्षा नहीं की जाती। दफ़्तर से लौटकर आने के बाद भी वो एक पुरुष ही होता है।
ऐसे में महिलाओं के लिए, ख़ासकर कामकाजी महिलाओं के लिए, दोनों जहां की ख़ुशियां मिल जाने का ख़्वाब किस कमबख़्त ने देखा था? दोनों जहां में परफेक्ट होने की कोशिश वो गफ़लत है जिससे जितनी जल्दी बाहर आया जाए, उतना अच्छा।

अगर यही सच है तो फिर क्या अपना सिर पीटा जाए या कई किस्मों के, कई वजहों के अपराध बोध से मर जाने का जुगाड़ कर लिया जाए? या फिर इस पुरुषप्रधान समाज के नाम को पचहत्तर बार कोसा जाए?
यकीन मानिए, जो औरत हर रोज़ की जंग लड़ रही होती है, हर रोज़ वक़्त का सही इस्तेमाल करते हुए हर लम्हा उपयोगी बनाने की कोशिश में जुटी होती है, उसके पास शिकायत करने का सबसे कम समय होता है। हम अपने हालातों के सबसे अच्छे पारखी और निर्णायक होते हैं। इंदिरा नूयी ने अपनी ज़िन्दगी के लिए निजी फ़ैसले लिए और ये बिल्कुल ज़रूरी नहीं कि वो मेरे हालात पर कारगर हों। हमारे फ़ैसले कई बातों पर निर्भर होते हैं - हमारे चुनाव, हमारी पृष्ठभूमि, हमारी ज़रूरतें, और सबसे अहम - हमारी फ़ितरत। अपनी फ़ितरत और अपने हालात के आधार पर दोनों जहां में कितना और कब-कब बने रहना है, इसकी समझ विकसित कर ली जाए तो किसी और को कोई फ़र्क पड़े न पड़े, आप ज़रूर सुकून में रहेंगी।


ये सुकून, ये मानसिक शांति ही दरअसल असल वर्क-लाइफ बैलेंस होती है। वर्क-लाइफ बैलेंस का कोई फॉर्मूला नहीं होता। ये फॉर्मूले अपने लिए हम ख़ुद तय करते हैं और वक़्त के साथ-साथ इनपर काम लगातार चलता रहता है। तीन साल पहले बच्चों के साथ पार्क में खेलना मेरी प्राथमिकता में सबसे ऊपर था। अब नहीं है। मैं उन्हें दिन भर में दो घंटे का वक़्त देकर भी ख़ुश रहती हूं। लेकिन ये फ़ैसले मेरे अपने हैं, और इनके लिए ज़िम्मेदार भी मैं ही हूं। ऐसे कई फ़ैसले हर रोज़, हर बात पर लेने होते हैं और इंदिया भी ठीक यही कहती हैं। मुझे नहीं लगता कि इंदिरा के लहज़े में, बड़ी बेबाकी से किए हुए उनके बयान-ए-हकीकत में इस बात से कोई शिकायत है।

अपने बारे में बात करते हुए वे खुलकर हंस सकती हैं, और ये हंसी उनकी सबसे बड़ी सफलता है मेरे हिसाब से। वैसे इंदिरा की एक बात से मैं बिल्कुल सहमत नहीं हूं। मुझे इस बात का पक्का यकीन है कि उनकी बेटियों से कोई पूछे तो वे यही कहेंगी कि उन्हें अपनी मां पर बेइंतहा फ़ख्र है और एक दिन वे भी अपनी मां की तरह ही बनना चाहेंगी। और इस बात का उनकी मां के कामकाजी होने, या बेहद सफल होने से कोई रिश्ता नहीं है। इस बात का सीधे तौर पर रिश्ता इस बात से है कि वे दोनों बड़ी होकर कैसे महिलाएं, और किस तरह की मां बनना चाहेंगी। मुझे उम्मीद है कि जल्द ही हमें बेटियों की राय भी सुनने को मिलेगी। दोनों जहां के होने न होने की बहस को अंजाम तभी दिया जा सकेगा।

वैसे घर और काम - दोनों जहां में होने न होने की ये बहस हमारे बच्चों की पीढ़ियों तक आते-आते जेंडर की बहस से बाहर निकल सके तब जाकर कह सकेंगे कि मुमकिन है दोनों जहां हासिल करना। 

बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

निर्दोष दोशीज़ाओं के हज़ार दोष

किसी भी पब्लिक स्पेस में आकर ये किस्सा बताने के लिए बहुत हिम्मत जुटानी पड़ी है। लेकिन हम इसलिए अपने तजुर्बे बांटते हैं ताकि सुनने-पढ़ने वाला उन तजुर्बों से कुछ हासिल करे। चार साल पहले की बात है, घर के काम-काज और अपने बच्चों की देखभाल में मदद लिए रांची से मैं एक लड़की लेकर आयी थी। सोलह-सत्रह साल उम्र रही होगी उसकी, लेकिन वो लड़की दिल्ली में पहले भी काम कर चुकी थी। जैसा कि बड़े शहरों में अक्सर होता है, धीरे-धीरे आप अपनी कामवाली पर भरोसा करने लगते हैं, और फिर घर भी उसपर छोड़कर जाने लगते हैं। 

उस लड़की के लिए हमारे घर में एक अलग-से कमरा था - सर्वेंट क्वार्टर के तौर पर, जिसका दरवाज़ा अलग से बाहर की ओर खुलता था। सब ठीक ही चल रहा था, कि उस लड़की की बहन (कुछ महीनों बाद दोनों बहनें मेरे साथ रहने लगी थीं) ने मुझे बताया कि लड़की की तबीयत ठीक नहीं रहती और उसे बहुत ब्लीडिंग होती है। हम भी देख रहे थे कि लड़की धीरे-धीरे पीली पड़ने लगी थी। कई कई दिन तक वो अपने कमरे से नहीं निकलती थी, और घर लौट जाने की ज़िद करती रहती थी। मैं जितनी बार डॉक्टर को दिखाने की बात करती, उतनी बार वो कहती कि उसने अपने डॉक्टर को दिखा लिया है। दोनों लड़कियां महीने में दो दिन की छुट्टी लेकर अपने रिश्तेदारों से मिलने जाया करती थीं, और मुझे लगा कि शायद वाकई किसी डॉक्टर को दिखा ही लिया होगा। फिर एक दिन उसकी तबीयत इतनी ही बिगड़ गई कि मैं ज़िद करके अपनी एक डॉक्टर दोस्त को घर बुला लाई। जब मेरी दोस्त ने उसका चेक-अप किया तो मालूम हुआ कि लड़की ने अबॉर्शन की गोलियां खाई थीं, और बहुत ब्लीडिंग की वजह से उसे सीवियर अनीमिया हो गया था। उसका ब्लड प्रेशर बहुत कम होने लगा था, और अब इतनी कमज़ोरी हो गई थी कि चलना-फिरना भी मुश्किल।

मुझे लगा कि किसी ने मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन खींच ली हो! ये कब हो गया था? मेरे साथ ही तो रहती थी ये लड़की! क्या मेरे घर में...? लड़की ने ख़ुद ही 'बॉयफ्रेंड' के होने की बात क़ुबूल कर ली, और बहुत पूछने पर भी नहीं बताया कि वो लड़का कौन था। बाद में उसकी बहन ने मुझे बताया कि लड़का नहीं, दरअसल अधेड़ उम्र का एक रिश्तेदार था जिसने लड़की से शादी का वायदा किया था। मैं उस आदमी को पकड़कर पुलिस के हवाले कर देना चाहती थी, लेकिन इस लड़की की हालत देखकर सिर पीट लेने के अलावा कोई और चारा नहीं सूझा। वो पागल लड़की समझने को तैयार ही नहीं थी कि जिस प्यार में वो जान गंवाने चली है, और अपने शरीर की वो दुर्गति कर चुकी है उस "प्यार" को न लड़की की कद्र है न उसकी जान की। उस आदमी को एक शरीर मिल गया था, जिससे जीभर कर खेल लेने के बाद मरने के लिए छोड़ दिया था उसने। (उस आदमी ने किसी तरह के संबंध से साफ तौर पर इनकार कर दिया, और लड़की हमेशा के लिए घायल मन और शरीर लिए वापस गांव लौट गई)

राजस्थान में नाबालिग की गर्भपात के बाद मौत की ख़बर पढ़ने के बाद मन का फिर से विचलित हो जाना जायज़ था। इंटरनेट पर मौजूद एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर 1000 गर्भवती में 62 किशोरियां होती हैं और हर साल होने वाले गर्भपातों का 30 प्रतिशत 20 साल के कम उम्र की लड़कियों का होता है। ये कानूनी तौर पर होने वाले क्लिनिकल गर्भपातों का आंकड़ा है, और मुमकिन है कि इनमें से एक बड़ी संख्या शादी-शुदा किशोरियों की भी हो। लेकिन बिनब्याही किशोरियों के गर्भरातों की संख्या करने की ज़रूरत भी क्यों महसूस होगी भला?

14 से 20 साल की उम्र लड़के और लड़कियों, दोनों के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण होते हैं। लेकिन लड़कियां शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक, तीनों रूपों से कई तरह के बदलावों से होकर गुज़र रही होती हैं। शरीर को लेकर कई सारी जिज्ञासाएं होती हैं उस उम्र में, बहुत सारी भावनात्मक ज़रूरतें भी होती हैं। इसलिए जहां थोड़ी-सी भी चिकनाई दिखती है, वहां बहकावे में आने की गुंजाईश बन जाती है। उनकी इस कमसिन बेवकूफ़ियों का फ़ायदा उठाने वालों के किस्से मैंने, आपने - हम सबने अपने इर्द-गिर्द देखा है।

इसका फौरी तौर पर समाधान क्या हो सकता है, ये बताना मुश्किल है। लेकिन ये ज़रूर है कि सेक्स शिक्षा और अपने शरीर के बारे में बात किशोर-किशोरियों के लिए इसलिए ज़रूरी है क्योंकि उन्हें सही और ग़लत का 'इन्फॉर्म्ड' फ़ैसला लेना होगा। जिन मुद्दों पर मांएं बात नहीं करतीं, स्कूल में शिक्षिकाएं चुप्पी साधे रहती हैं, जिन मुद्दों पर फुसफुसाहटों और उठी हुई उंगलियों के अलावा कुछ सुनने-देखने को नहीं मिलता, उन मुद्दों पर किशोरियों से संवाद की सख़्त ज़रूरत है। उन्हें ये बताए जाने की ज़रूरत है कि जिस शरीर को हम 'प्यार' के नाम पर दूसरों के सामने खुला छोड़ देते हैं, उस शरीर के ज़ख़्मों पर मरहम लगाने कोई नहीं आता। 'प्यार' के नाम पर शरीर पुरुष के लिए अक्सर सिर्फ और सिर्फ एक ज़रूरत होती है, जिसे पूरा कर वो लड़की के शरीर से भी निजात पा लेता है, उस लम्हे के प्यार से भी। लेकिन एक लड़की के शरीर पर जो रह जाता है, वो 'गर्भ' के रूप में उसे तबाह न कर दे तो अपराधबोध के रूप में ज़िन्दगी भर थोड़ा-थोड़ा ज़रूर तबाह करता रहता है।

(डेली न्यूज़ के "खुशबू" में प्रकाशित)

मंगलवार, 28 जनवरी 2014

जेएलएफ डायरिज़ 3: एक दिग्गी पैलेस, कुल पांच दिन, 240 से ज़्यादा वक्ता, कुल 175 सत्र

अंतिम दिन सुबह की ज़ोरदार बारिश में सबकुछ धुल जाने का डर था - दिग्गी पैलेस में सजे मंच और कुर्सियां तो शायद बेअसर भीगती रहतींजेएलएफ में आनेवालों का उत्साह जनवरी की इस ठंड में पहले जम जाता। लेकिन मेरी आशंका निराधार रही। सुबह दस बजे अशोक वाजपेयी और यतीन्द्र मिश्र के साथ "कविता की कहानी" पर जो चर्चा होनी थीवो बिना एक मिनट की भी देरी सेअपने तय वक़्त पर दिग्गी पैलेस के एक छोटे से कमरे में शुरू हो चुकी थी। हम दस मिनट की देरी से पहुंचेऔर उतनी ही देर में पूरा कमरा ठसाठस भर गया था और बिना माइक्रोफोन और स्पीकरों के भी सुननेवाले बड़े ध्यान से अशोक वाजपेयी की "कविता की कहानी" पर कविता-सी चर्चा सुन रहे थे! 

थोड़ी ही दूर एक दूसरे कमरे में ग्लोरिया स्टेनेम अमेरिकी सिविल राइट्स मूवमेंट में महिलाओं की भूमिका को हिंदुस्तान के संदर्भ में देखने के लिए प्रेरित कर रही हैं। ठंड में उंगलियों ने हरकत करना बंद कर रखा है तो क्यादिमाग के लिए ढेरों काम है। आख़िरी दिन भी कीचड़ सने रास्तों से होकर दिग्गी पैलेस में आने वालों का तांता रुका नहीं। कहने वालों का कुछ नहीं जातासुनने वाले कमाल करते हैं! 

सुनने वालों और गुनने वालों की ये भीड़ हर साल जमा होती है यहां। मैं इस बार पांचों दिन रुककर देखना चाहती थी कि वो क्या चीज़ है कि जिसे देखो वही जयपुर जाने को बेताब रहता है। मैं देखना चाहती थी कि जयपुर के नाम का ये 'स्टेटस सिंबलहैया वाकई पांच दिनों तक यहां की हवा में कोई सुरूर होता है जिसकी कशिश से खिंचकर लोग जाने कहां-कहां से होते हुए जयपुर पहुंच जाते हैं। 

प्रोफेसर अमर्त्य सेन के ओपनिंग एड्रेस - उद्घाटन भाषण - में वो जवाब मिल गया। जब एक नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अपने देश के लिए सात ख़्वाहिशें बयां करते हुए ये कहे कि काशमेरा देश विज्ञान के ऊपर कला और समाजशास्त्र (आर्ट्स एंड ह्यूमैनिटिज़) को तरजीह दे तो जवाब वहीं मिल जाता है। जाने क्यों अमर्त्य सेन को सुनते हुए रामवृक्ष बेनीपुरी का लिखा स्कूल में पढ़ा हुआ निबंध 'गेहूं और गुलाबदिमाग में घूमता रहा। 

"गेहूं बड़ा या गुलाबहम क्या चाहते हैं - पुष्ट शरीर या तृप्त मानसया पुष्ट शरीर पर तृप्त मानस?"

मानव को मानव बनाया गुलाब ने! उस गुलाब ने जो साहित्य और संस्कृति का प्रतीक है। उसी गुलाब की ख़ुशबू में खींचेथोड़ी देर के लिए अपनी जिज्ञासाओं को शांत करने के उद्देश्य सेअपने तंग समझ की गोल धरती को आकाश बनाने के लिए ऐसे साहित्योत्सवों में पहुंचते हैं लोग। इन लोगों में लिखने वाले या कभी लिखने की ख़्वाहिश रखने वाले ज़रूर होते होंगे शायद। लेकिन इन लोगों में ज़्यादातर जिज्ञासुन बुझनेवाली प्यास लिए चलनेवाले होते हैं। अपने भीतर की प्यास को बुझा पाने की थोड़ी-सी उम्मीद सुननेवालों को ऐसे महाआयोजन में खींच लाती है। 

और कहनेवालों के पास तो कई वजहें हैं। उनके पास कहनेअभिव्यक्त करने को इतना कुछ था,इसलिए उन्होंने किताबें लिखीं। फिल्में बनाईं। गीत और संगीत का ज़रिया चुना। अभिव्यक्त कर चुकने के बाद संवाद की कभी न मिट पाने वाली प्यास कहने वालों को मंच पर ले जाती हैउन लेखकों-कवियों-चिंतकों-दार्शनिकों के भीतर का वक्ता बाहर ले आती है। यूं भी अपनी कहानी सुनानेअपने अनुभव बांटने की कला में हम सब माहिर होते हैं। 

फिर एक बिज्जी पर बात करने के लिए इरफ़ान ख़ान की ज़रूरत क्यों पड़ती हैक्यों कोई स्टार ओमप्रकाश बाल्मिकी की पिछड़े हुए लोगों पर लिखी पिछड़ी हुई कविताएं पढ़ता है तभी कविता अचानक 'ग्लैमरसलगने लगती हैबेस्टसेलर कौन होता हैपॉपुलर को तवज्जो दी जाए लिटररी को

जवाब भी इरफान ख़ान की ओर से ही आता है। बिज्जी को शाहरुख या इरफ़ान की ज़रूरत नहीं। बॉलीवुड को बिज्जी की हैक्योंकि बिज्जी पारसमणि थे। तालियां नीरव पटेल के लिए भी बजती हैंऔर सीपी देवल के लिए भी। अगर सुननेवाले राज कुंद्रा के थ्रिलर की रचना-प्रेरणा के बारे में जानना चाहते हैंतो उतने ही सवाल जॉनथन फ्रैनज़न के लिए भी बचाकर रखे जाते हैं। 

आख़िर वो कौन सी कड़ी है जो इन सबको जोड़ती है?

एक दिग्गी पैलेस। कुल पांच दिन। 240 से ज़्यादा वक्ता। कुल 175 सत्र। छह अलग-अलग मंच। क्या सुनें और क्या छोड़ें। फिर समझने की शक्ति की भी तो अपनी सीमाएं हैं! 

लेकिन उस जगह का प्रताप है कि अपनी तमाम सीमाओं को थोड़ा और धक्का लगाते हुएखुद को थोड़ा और प्रोत्साहित करते हुए मेरे जैसे हज़ारों सुनने वाले कभी लोकतंत्र पर गहन चर्चा का हिस्सा बने हैं तो कहीं विलुप्त होती भाषाओं पर सिर धुन रहे हैं। हर ओर एक मुद्दा हैहर तरफ उठती,बाहर निकलती आवाज़ें हैं। और ये मलाल भीकि हर आवाज़ किसी निष्कर्ष पर पहुंचेये ज़रूरी नहीं। 

इसलिए बिना किसी अपेक्षा के किसी सत्र में बैठ जाने पर बाहर निकलते हुए झोली के भर जाने जैसा गुमां हुआ है। कभी मैंने ये नहीं सोचा था कि अंडमानी भाषा पर गूगल करके गीत सुनूंगी कभीलेकिन अन्विता अब्बी को उनके शोध के बारे में बोलते हुए सुनकर विलुप्त होती ऐसी भाषाओं की चिंता सताती है। थोड़ी देर के लिए ही सहीसमझ में आता है कि गुम होती भाषा कैसे एक समाज को गायब कर सकती है। प्रसून जोशी के बगल में बैठे शेखर पाठक को राग पहाड़ी गुनगुनाते देखकर अफ़सोस होता है कि नानी जो झूमर गाया करती थींउसको रिकॉर्ड नहीं किया। तब समझ में आता है कि गीत की एक कॉपी का गुम हो जाना एक परिवार का निजी नुकसान ही नहीं होताभाषा को भी उससे झटका लगता है। 

गूगल के इस दौर में पर्यावरण की चिंताओं पर बहस के लिए मुद्दे खोजने के लिए इंटरनेट बहुत है। लेकिन जब एक मंच पर सुमन सहाय और शेखर पाठक के साथ एक पाकिस्तानी पर्यावरणविद् अहमद रफी आलम को बोलते सुनते हैं तब समझ में आता है कि नदियोंजंगलोंज़मीनआसमानों से जुड़ी हुई चिंताएं न सरहदों में बांधी जा सकती हैं न किसी समाजविशेष की जागीर होती हैं। साहित्य के मंच पर पर्यारवरण जैसा मुद्दा क्योंइसलिए क्योंकि साहित्य रचना सिर्फ ख़ूबसूरत शब्दों में छंदोंकथाओं को बांधना नहीं होताअपने दौर के पुख़्ता और सटीक दस्तावेज़ तैयार करना भी होता है।    

अपने समय और समाज के दस्तावेज़ों के ज़रिए दुनिया भर में पहुंचनेवाले अंतरराष्ट्रीय लेखक 'द ग्लोबल नॉवेलपर बात करते हुए भी कई-कई समाजों को बांधने के लिए अनुवाद की ज़रूरत पर ज़ोर देते हैं तब समझ में आता है कि ग्लोबल नॉवेल भी दरअसल अंग्रेज़ी का मोहताज नहीं। एक नॉवेल तभी ग्लोबल होता हैजब वो 'यूनिवर्सलहोता है - अपने देशकालवातावरण और पात्रों में किसी समाज विशेष की परछाई होते हुए भी अपने कथानक और भावों में पूरी तरह 'यूनिवर्सल।

सरोकार कई हैंचिंताएं कईं। विषय कई हैंबोलनेवाले कई। पक्ष में कईविपक्ष में कई। लेकिन बहसविरोधविवादप्रलाप - ये सब एक स्वस्थ समाज की निशानियां हैं। जब कई सारी विचारधाराएं कई सारी भाषाओं और कई सारे विचारों से होती हुई किसी एक मंच पर पहुंचती हो तो उम्मीद बंधाती है कि हर आवाज़ के लिए वक़्त देने वाला ये समाज विकसित होता - इवॉल्व होता समाज है। जो समाज किताबें पढ़ता हैसोचता हैबिना विरोध या नतीजे की चिंता किए अभिव्यक्त करता हैउस समाज को देखकर उम्मीद बंधती है। और ये उम्मीद टोलियां बना-बनाकर घूम रहे स्कूली बच्चों को देखकर और पुख़्ता हो जाती है जो न सिर्फ झोले भर-भरकर किताबें खरीद रहे हैं बल्कि उन किताबों को लिखनेवालों से मुश्किल सवाल भी पूछ रहे हैं। जयपुर साहित्योत्सव का कोई और उद्देश्य हो न होइस महाआयोजन की सार्थकता इन बच्चों को देखकर सिद्ध हो जाती है। 

ज़रूरी नहीं कि हम हर बात से सहमत ही हों - वर्तिका नंदा की उन कविताओं से भीजो उन्होंने सुनंदा पुष्कर को श्रद्धांजलि देते हुए आख़िरी दिन के एक सत्र में पढ़ा। लेकिन इन सहमतियों और असहमति के बीच से जो निकलता हैएक बीच का रास्ता है। इस बीच के रास्ते का नाम साहित्य है।

प्रोफेसर अमर्त्य सेन की दुआओं के पूरा हो जाने की दुआ मांगने में मेरा भी एक स्वार्थ निहित है। "अब गुलाब गेहूं पर विजय प्राप्त करे! गेहूं पर गुलाब की विजय - चिर विजय!" और ये गुलाब सिर्फ सौंदर्यबोध का प्रतीक न हो। ये गुलाब सूक्ष्म भावनाओं का प्रतीक होसंतुलन का प्रतीक हो। ये गुलाब आज़ाद अभिव्यक्ति का प्रतीक हो। 

किसने कहा कि एक साहित्योत्सव समाज बदल देगा। लेकिन एक साहित्योत्सव अपने-अपने समाजों में बदलाव की कहानियां लिख रहे लोगों को ज़रूर जुटा देगा हमारे-आपके लिए!  

(ये पोस्ट मूलतः 'जानकी पुल' पर प्रकाशित हुई)

शनिवार, 18 जनवरी 2014

जेएलएफ डायरिज़ 2: पैनी हो, लेकिन टेढ़ी हो लिखनेवाले की नज़र

दिग्गी पैलेस में साहित्योत्सव की पहली सुबह माहौल कैसा था, मैं उससे शुरु करना चाहती थी अपनी बात। लेकिन अब मैं ख़ुद को पैलेस एन्ट्रेन्स पर लगी उलटी छतरियों में से एक महसूस करने लगी हूं, जो यूं तो इस्तेमाल में लाए जाएं तो बड़े काम के होते हैं, लेकिन भीड़ में सजावटी पीस के तौर पर टांग दिए जाएं तो उनकी ज़रूरत ख़त्म हो जाती है। :-) पहले ही दिन इतनी भीड़, कि भीड़ में लिखनेवाले भी लापता, सुननेवाले भी। फिर भी भीड़ में कुछ ख़ास आवाज़ें अपनी बात कानों और ज़ेहन में छोड़ जाती हैं।

यूं तो इस तरह के आयोजनों के उद्घाटन समारोहों में दीए जलाने के बाद मुख्य अतिथि की बात में ग़ौर करनेवाली कोई दमदार बात नहीं होती, लेकिन यदि मुख्य अतिथि महामहिम माग्रेट अल्वा जैसी कोई शख़्सियत हो, माफ़ कीजिएगा - कोई महिला शख़्सियत हो - तो लोकतंत्र (democracy), संवाद (dialogues), साहित्य (literature), लिंग समानता (gender equality), महिलाओं के ख़िलाफ़ अत्याचार (atrocities against women) और यौन शोषण (rape and molestation) जैसे शब्द एक ही सांस में, एक ही वाक्य में सुनने को मिलता है। जिस साहित्योत्सव में 'Women Interrupted' और 'Crime and Punishment' पर बा़क़ायदा सीरिज़ में बातचीत होनी हो, उस आयोजन के उद्घाटन मंच पर ही ये चर्चा खोलना लाज़िमी हो जाता है। तब ये उम्मीद बंधती है कि अगले पांच दिनों में इन विमर्शों और संवादों के ज़रिए सर्जनात्मक दिशा में बढ़ा जा सकता है।

प्रोफेसर अमर्त्य सेन की नोट अड्रेस के लिए मंच पर आते हैं तो तालियों की जैसी गड़गड़ाहट उनका स्वागत करती है, उससे अंदाज़ा लग जाता है कि intellect का अपने किस्म का स्टारडम, अपने किस्म का प्रभामंडल होता है।

"A wish a day a week for my country" - अपने देश के लिए हर रोज़ की एक ख़्वाहिश... एक प्रार्थना... कुछ ख़्वाहिशें सरहदों की मोहताज नहीं होतीं। कुछ ख़्वाहिशें सार्वलौकिक होती हैं, और इन्हीं निःस्वार्थ के दम पर तमाम नाउम्मिदियों के बीच दुनिया टिकी है शायद।

बहरहाल, गूगल करते ही आपको न सिर्फ प्रोफेसर सेन के भाषण का टेक्स्ट, बल्कि वीडियो भी मिल जाएगा, इसलिए मैं बहुत कुछ जोड़ना नहीं चाहती। लेकिन प्रोफेसर सेन ने अपनी ये सातों wishes जिस आसानी, विवेक और चातुर्य के साथ अपनी देवी 'जीएमटी'  के साथ श्रोताओं के सामने पेश की हैं, वो इस भाषण को मेरे ज़ेहन में इतना ही ख़ास बना देता है कि मैं भविष्य में अपने बच्चों को भी इसे सुनना चाहूंगी, ख़ासकर इसलिए क्योंकि पहली ही विश में उन्होंने अपने देश में कला, साहित्य और संस्कृति से जुड़ी शिक्षा की मज़बूती मांग ली। कमाल है कि जहां विज्ञान और तकनीक विकास की ज़रूरत कहा जाता है, वहां एक नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री और चिंतक ह्यूमैनिटिज़ पढ़ने की ज़रूरत पर ज़ोर दे रहा है। बाद में बच्चों को बताने के लिए मैंने ये बात ख़ासतौर पर अपने दिमाग में नोट कर ली है। बाकी के छह 'wishes' राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक सरोकारों से जुड़े हैं। आख़िरी विश मीडिया के ज़िम्मेदारी पर भी है। उम्मीद ये कि मीडिया ग्लैमर और चमक-दमक के अलावा वास्तविक भारत और असली मुद्दों को उठाए, और मकसद हंगामाख़ेज़ तरीके से नहीं। (आख़िर में जिस 'सोशल मीडिया' के प्रभाव की डॉ सेन ने बात की, उस सोशल मीडिया ने दुर्भाग्य से दिन ख़त्म होते-होते तक अपना असर दिखा दिया था - सुनंदा पुष्कर की मौत की ख़बर के रूप में।) ख़ैर, डॉ सेन की एक और बात मैंने अपने और अपने बच्चों के लिए गांठ बांध ली है - किताबें पढ़ने की ज़रूरत पर। शायद यही किताबें हमें बेहतर इंसान बना पाएं...

हर साल की तरह साहित्योत्सव में वक्ताओं का पैनल इतनी ही विविध है कि काग़ज़-कलम लेकर बैठना पड़ा है - क्या सुनें, क्या छोड़ें। मैंने फिलहाल जहां क़दम ले जाएं, उस ओर चलने का फ़ैसला कर लिया है, और सबसे पहला सेशन हबीब तनवीर को श्रद्धांजलि है जिसमें महमूद फ़ारूख़ी, पीयूष दईया और गीतांजलि श्री बैठे हैं।

हबीब तनवीर की एक याद मेरे ज़ेहन में भी है। साल था 1998। मैं कॉलेज में थी अभी। बैकस्टेज होने की अपनी आदत से मजबूर मैं एक ख़ास कार्यक्रम में वॉलन्टियर कर रही थी। हबीब तनवीर अपना प्रोडक्शन लेकर लेडी श्रीराम कॉलेज आए थे, और मेरा काम उन्हें 'usher' करना था। नाटक बर्टोल्ट ब्रेख़्त के "The Caucasian Chalk Circle' का हिंदी रूपांतरण था, और ईमानदारी से कहूं तो मुझे याद नहीं कि नाटक का नाम क्या था (मैंने गूगल करके देखने की कोशिश भी नहीं की)। मेरी समझ इतनी विकसित नहीं हुई थी जो रंगमंच के शिखरपुरुष से कुछ 'intelligent' संवाद कर पाता। फिर मेरे मन में पूरा नाटक न देख पाने का अफ़सोस भी था, हालांकि शायद मैंने पूरा नाटक रन-थ्रू के दौरान देखा था। ख़ैर, तनवीर साब से बात करने की ख़ुशकिस्मती मिली, उसकी क़ीमत कई सालों के बाद समझ में आई। 'मुझे कम बोलनेवाले लोग पसंद नहीं हैं,' तनवीर साब ने कहा था। मैं उन्हें क्या बताती कि मैं चुप क्यों थी। डर था कि मेरी अज्ञानता पकड़ी जाएगी, (और ऐसी मुश्किल परिस्थिति में अपने काम से काम रखनी की ट्रेनिंग का ख़ामियाज़ा उस दिन के बाद कई और मौकों पर भुगतना पड़ा है मुझे।)

हबीब तनवीर की उम्र सत्तर के पार रही होगी शायद, लेकिन उनकी ऊर्जा सामनेवाले को थका देने के लिए काफी थी। मुझे याद है कि उनके साथ उनकी सहूलियत का ख्याल रखने का जो काम मुझे सौंपा गया था, उस काम ने मुझे इतना थका दिया था कि हॉस्टल में कॉम्बिफ्लैम खाकर सोना पड़ा था वापस जाकर। पल में स्टेज के पीछे, पल में मेकअप रूम में और पल में लाइट्स का मुआयना करने के लिए पहली मंज़िल पर...

उसी ऊर्जा को शायद महमूद फ़ारूखी ने उनके संस्मरण का उर्दू से अंग्रेज़ी में अनुवाद करते हुए महसूस किया होगा, क्योंकि किताब से एक हिस्सा पढ़ते हुए, हबीब तनवीर पर बात करते हुए उनमें भी उतनी ही ऊर्जा, उतना ही जोश था। तफ़्सील से कही हर बात को उतनी ही तफ़्सील से रिकॉर्ड करना मुमकिन नहीं होता, लेकिन  जिन संस्मरणों, यादों, किरदारों, बातों के ज़रिए हबीब तनवीर की शख़्सियत को और जानने का मौका मिला इस सत्र के दौरान, उन बातों ने हबीब तनवीर से मुलाक़ात के उस एक मौके को अपनी अज्ञानता में बेजां गंवा देने के अफ़सोस को ज़रूर और बढ़ा दिया।

बिज्जी को श्रद्धांजलि के अगले सत्र में बैठी मैं। इस सत्र में जाने भीड़ विजयदान देथा को नमन देने के लिए जमा हुई थी या इरफान ख़ान को देखने के लिए, लेकिन 'बीज जैसी पुरानी, फल जैसी नई' कहानियां लिखने वाले बिज्जी को और पढ़ने का कौहहातूहल मुझमें तो शायद न जागता अगर मैंने महमूद फ़ारूखी को उनकी कहानी 'चौबोली' सुनाते न सुना होता। कई बार अपनी अज्ञानता और तंग समझ को दूर करने के लिए ऐसे ही किसी catalyst की ज़रूरत पड़ती है।

मैं डॉ नरेन्द्र कोहली के साथ वर्तिका नंदा की 'महासमर' पर बातचीत के अगले सत्र की बातचीत से पहले डॉ कोहली से अपनी मुलाक़ात के बारे में लिखना चाहती थी, लेकिन कहीं मुझे pretentious और फेंकू न मान लिया जाए, इसलिए उसके बारे में फिर कभी लिखूंगी। :-)

मैं वर्तिका की बातचीत करने की शैली की कायल हूं। वे बहुत तैयारी के साथ मंच पर होती हैं, और बड़े आराम से, बहुत सोच-समझकर चुने गए शब्दों से सजे सवाल पेश करती हैं। जितना मज़ा वक्ता को सुनने में आता है, उतना ही मज़ा उनके सवालों को सुनने में आता है। वर्तिका के सवाल सवाल नहीं होते, अपने आप में मुकम्मल Insights और comments होते हैं। 'महासमर' की प्रासंगिकता पर सीधा सवाल पूछने की बजाए उन्होंने आज की राजनीति में कृष्ण और पांडवों की जिस ज़रूरत को जिस ख़ूबसूरती से पूछा उतनी सहजता से डॉ कोहली उस सवाल से बचकर निकल गए। हालांकि डॉ कोहली ने आख़िर में ये स्वीकार किया कि कोई भी लेखक अपने समय से स्वतंत्र नहीं होता। ये बात चर्चा में कई बार आई, इस सवाल के जवाब में भी कि उन्हें महाभारत या रामायण पर आधारित रचनाएं करने की प्रेरणा कहां से मिली? इसके जवाब में डॉ कोहली ने एक किस्सा उद्धृत किया, जो समाज में 'धर्म' और 'अनासक्त राजा' की वापसी की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

साहित्योत्सव के आख़िरी सत्रों में से एक 'आक्रोश' में हाशिए पर जीनेवाले लोगों से जुड़े साहित्य पर चर्चा के लिए नीरव पटेल और हरिराम मीणा के साथ महमूद फ़ारूखी और इरफान खान बैठे तो फ्रंट लॉन्स में खड़े होने की जगह तक नहीं थी। फ़ारूखी ने चुटकी लेते हुए कहा भी कि इरफान की मौजूदगी ने जिस भीड़ को यहां इकट्ठा किया है, वो भीड़ शायद इस सत्र से और enlightened होकर लौटे।

सच कहूं तो दलित और आदिवासी साहित्य पर मेरी अपनी समझ शून्य है (बल्कि आज पहले ही दिन मुझे अहसास हो गया कि मैं कितना कम जानती हूं, कितना कम पढ़ा है मैंने!) लेकिन हरिराम मीणा की इस बात से मैं पूरी तरह इत्तिफाक रखती हूं कि आदिवासियों को हम हमेशा एक रंगीन चश्मे से देखते हैं - या तो उन्हें बर्बर मान लिया जाता है, या फिर राज कपूर की फिल्मों में झींगालाला करते हुए प्रकृति की गोद में हंसते-गाते लोगों की रोमांटिक छवि में स्टीरियोटाईप कर दिया जाता है। मैं झारखंड में पली-बढ़ी, इसलिए मीणा साहब की बात शायद बेहतर तरीके से समझ पाई कि आदिवासियों को लेकर जो संकुचित दृष्टिकोण है, उसे बदलने की ज़रूरत है और उनपर सहूलियतें थोपने से पहले उनका विश्वास जीतना होगा। इरफान ने ओमप्रकाश बाल्मिकी दो कविताएं भी पढ़ीं - 'ठाकुर का कुंआ' और 'सदियों का संताप'। सिनेमा से गायब इन कहानियों पर बोलते हुए इरफान ने वो कड़वा सच बयां किया जो हम सब जानते हैं - सिनेमा सपनों का सिनेमा होता है, यथार्थ से दूर ले जाने का सिनेमा होता है।

आज का दिन ख़त्म हुआ लेकिन एक बात जो मेरी समझ में आई है वो ये है कि अपना नज़रिया single dimensional नहीं रखा जा सकता। रचनात्मकता का मतलब पैनी नज़र रखना तो है ही, लेकिन अपनी नज़र को टेढ़ी बनाए रखना भी है (ये बात दरअसल हबीब तनवीर के संदर्भ में किसी वक्ता ने भी कही थी, लेकिन फिलहाल याद नहीं आ रहा कि किसने कही थी - शायद महमूद फ़ारूखी ने।)

और जाते-जाते ये भी सुन जाईए कि कल कैसा faux pax, कितनी बड़ी बेवकूफी की है हमने। क्लार्क्स आमेर से होटल लौटते हुए हमें जो गाड़ी दी गई, उसमें सामने एक विदेशी बैठे थे। हम तीन महिलाएं पिछली सीट पर जा बैठीं, और महिलाओं के स्टीरियोटाईप्ड छवि को अकाट्य सत्य साबित करते हुए अपनी फुसफुसाहटों में लग गईं। होश तक न रहा कि सामने बैठे सज्जन से कुछ बात भी की जाए। हममें से कोई ख़ैर उन्हें वैसे भी नहीं पहचानता था। आज सुबह अख़बार देखा तो समझ में आया कि हमें आधे घंटे के लिए जोनथन फ्रान्ज़न के साथ सफ़र करने का मौका मिला, और अपनी बेवकूफी में हमने वो मौका गंवा दिया। (जोनथन इस सदी के सबसे बड़े अमरिकी उपन्यासकारों में एक गिने जाते हैं, और आपने बिल्कुल सही अंदाज़ा लगाया - इस कम पढ़ी-लिखी बदबख़्त औरत ने उन्हें भी नहीं पढ़ा, सिर्फ उनके interviews पढ़े हैं)।

कहने का मतलब कि हबीब तनवीर से लेकर डॉ कोहली, और अब जोनथन फ्रैन्ज़न - लेकिन चिकना घड़ा तो ख़ैर हर हाल में चिकना ही रहेगा न...। न टेढ़ी, न पैनी - मेरी सीधी और घोड़े की तरह पट्टियां (blinkers) लगी हुई नज़र मुझे कहीं नहीं ले जा सकती। ख़ैर, ये अफसोस फिर और कभी...

गुरुवार, 16 जनवरी 2014

जेएलएफ डायरिज़ 1: दिग्गी पैलेस में दिग्गजों के बीच

मुझे पर्दे की पीछे की दुनिया हमेशा मंच पर चल रहे तमाशे से ज़्यादा रोमांचित करती है। अगर फिल्म बांधकर रखने वाली नहीं होती तो सीन-दर-सीन पर्दे के पीछे की दुनिया दिखाई दे रही होती है मुझे - ट्रॉली पर बैठा हुआ सिनेमैटोग्राफर, स्पूल लिए बैठा साउंड रिकॉर्डिस्ट, टंगस्टन-एचएमआई-एलईडी के पीछे कहीं छत ले लटकता कोई लाइट असिस्टेंट, कोने में थर्मस लिए खड़ा स्पॉट बॉय, डायलॉग्स बांटता सेकेंड असिस्टेंट डायरेक्टर...

फ्लोर पर कैमरे के पीछे मची अफरा-तफरी कैमरे के सामने दिखाई देने वाले बनावटी फ्रेम से कहीं ज़्यादा सजीव... कहीं ज़्यादा जानदार...

मैं प्रोडक्शन वाली रही हूं। बचपन से। स्टेज पर होने से ज़्यादा विंग्स में होने को आतुर। उस तैयारी का हिस्सा होने को आतुर जो एक फंक्शन को ग्रैंड बनाता है, लार्जर दैन लाइफ... बड़ा... बहुत बड़ा... और यादगार। मैं इस बात पर यकीन करती हूं कि स्टेज पर नहीं, किरदार तो विंग्स और मेक-अप रूम में मिलते हैं, कभी किसी की माइक ठीक करते हुए, कभी किसी का मेक-अप।

मेरा यही फितूर मेरी किस्मत से जुड़कर मेरे लिए मौके तलाश करता मुझे दिग्गी पैलेस ले आया है, जयपुर। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के ठीक एक शाम पहले। पिछले साल आई थी एक विज़िटर के तौर पर। इस साल आई हूं यात्रा बुक्स की टीम का हिस्सा बनकर। किसी हुनर से ज़्यादा मेरा कौतुहल मुझे खींच लाया है यहां, और खींच लाई है उस बेचैनी का हिस्सा बनने की ख़्वाहिश, जो महीनों पहले किसी की नींद हराम करने के लिए काफ़ी होती है।

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल अपने किस्म का दुनिया का सबसे बड़ा साहित्योत्सव है जहां प्रवेश निःशुल्क होता है। इस कार्यक्रम की तैयारी में कितने महीने लगते होंगे, इसका अंदाज़ा इसी से लगा लीजिए कि तकरीबन 15 देशों से कुल मिलाकर 240 वक्ता पहुंचेंगे यहां इस साल, बीस भाषाओं पर बातचीत होगी, और दो से ढाई लाख लोग दिग्गी पैलेस आकर किसी ने किसी रूप में इस बातचीत का हिस्सा बनेंगे। अंदाज़ा इसी बात से लगा लीजिए कि प्रशासन और प्रोडक्शन टीम के अलावा 500 से ज़्यादा volunteers आज की शाम दिग्गी पैलेस में अलग-अलग जगहों पर ब्रीफ ले रहे थे। स्केल का अंदाज़ा इसी बात से लगा लीजिए कि 21 जनवरी को 2014 का साहित्योत्सव ख़त्म होते ही तुरंत अगले साल की तैयारी शुरु हो जाती है, और शुरु हो जाती है स्पॉन्सरों को अगले साल के लिए मनाने की क़वायद। इतने बड़े स्तर पर लॉजिस्टिक्स संभालना ही अपने आप में एक विशालकाय प्रॉजेक्ट होता है, जो सिर्फ पांच दिन नहीं बल्कि पूरे साल चलता है।

और सुनिए कि ये वो आयोजन है जिसने अपने पहले साल में कुल मिलाकर 14 अतिथि देखे थे, और जो थोड़े-बहुत लोग दिग्गी पैलेस तक पहुंच भी गए थे, वो सैलानी थे जो रास्ता भूलकर एसएमएस अस्पताल के सामने की इस तंग गली में गलती से मुड़ गए थे। उसके अगले साल भी इतने ही मेहमान थे कि दरबार हॉल भी नहीं भरा था पूरी तरह। फिर सात-आठ सालों में क्या हो गया कि जेएलएफ में आना प्रतिष्ठा का सवाल बन गया - लिखनेवालों के लिए भी, पढ़नेवालों के लिए भी और मेरी तरह किताबें जमा करने का शौक पालनेवालों के लिए भी?

मुझे लगता है कि हम वाकई अच्छी बातचीत के भूखे होते हैं। जेएलएफ का विस्तार सिर्फ एक आयोजन के विस्तार से कहीं बढ़कर लिखने-पढ़नेवालों या लिखने-पढ़ने की ख़्वाहिश रखनेवालों (या ढोंग रचनेवालों) के मानस-पटल के विस्तार की उत्कट इच्छा का नतीजा है। ये उस जिज्ञासा का नतीजा है जो अपने सीमित दायरे से परे नई बातें, नए विचार, नई आवाज़ें सुनने का आकांक्षी होता है। मुमकिन है कि आनेवालों में एक फ़ीसदी ही इस मकसद के साथ आएं, लेकिन उसी एक फ़ीसदी दर्शक या श्रोतावर्ग की संजीदगी और समझ एक इतने बड़े साहित्यिक आयोजन को साल-दर-साल दोहराने की वजह देता है।

बात सत्रों में बैठे चंद बुद्धिजीवी लेखकों या विचारकों की नहीं है, बात उनके सामने बैठे उस ऑडिएंस की है जिनके पास मंच पर बैठे लोगों से सहमत या असहमत होने का अधिकार है और जिनकी जेबों में इतने पैसे हैं कि दरबार हॉल से निकलकर चार बाग़ की ओर लगे किताब के स्टॉल में जाकर वे किताबें खरीदेंगे, पढ़ेंगे या फिर किसी दिन पढ़ लेने की उम्मीद में उसे अपनी लाइब्रेरी में सजाएंगे। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल मुझे सिर्फ स्तब्ध नहीं करता क्योंकि यहां देश के ए-लिस्टर लेखक, बुद्धिजीवी और विचारक मौजूद होते हैं। ये जगह मुझे इसलिए स्तब्ध करती है क्योंकि उन लेखकों, बुद्धिजीवियों और विचारकों के विचारों को सुनने की ललक चंद सौ लोगों में तो होती ही है जो एक के बाद सेशन्स में बैठे-बैठे  अपने दिमाग के आवर्धक लेंस - मैग्निफाइंग ग्लास - का इस्तेमाल करते हुए समकालीन समाज को नए नज़रिए से देखने की कोशिश करते हैं। यही मुट्ठी भर लोग दिग्गी पैलेस में दिग्गजों के जमावड़े को एक उद्देश्य देते हैं। इन्हीं मुट्ठी भर लोगों की वजह से पूरे साल की मेहनत के बाद निकल कर आने वाला ये साहित्यिक आयोजन सार्थक होता है।

शाम को तैयारियों में आकंठ डूबा दिग्गी कल सुबह से पहचान में नहीं आएगा। गले में डाले हुए पट्टों से लोगों की पहचान होगी। बातों से बात निकलेगी और बहस के मुद्दे खुलेंगे। मुमकिन है कि अहं और ज्ञान कौतूहल पर भारी पड़े। लेकिन मेरे लिए जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल इस लिहाज़ से भी ख़ास होगा क्योंकि निजी तौर पर मेरे लिए जेएलएफ वो माइलस्टोन है जो दिल्ली से आते हुए एक पाठक, श्रोता और इंसान के रूप में मेरे विकास या पतन का पिछले एक साल का ग्राफ मुझे ही दिखाता आया है। पिछले जेएलएफ से अबतक गुज़रे एक साल में मैंने क्या कुछ खोया और क्या कुछ पाया - रास्ते भर सोचती आ रही थी मैं। अगर कुछ नए दोस्त और साथी मिले हैं तो कईयों का साथ छूटा भी है, (और मैंने खो दिए हैं पिस्ता ग्रीन रंग के झुमकों की जोड़ी का एक झुमका, जो बड़े शौक़ से पिछले ही साल पहना था मैंने, वो भी सिर्फ एक बार - एक दिन।) इस एक साल में मैंने अपनी बहुत सारी बेचैनी भी खो दी है, और खो दिए हैं कई सारे झूठे ग़म जिनकी वजह से मेरे हिस्से बहुत सारी प्यारी उदासियां आया करती थीं, और उनसे भी बढ़कर, मिला करती थीं बहुत सारी सांत्वनाएं, बहुत सारा प्यार। और एक साल में जो मैंने हासिल किया है वो अभी भी अमूर्त है, इनटैन्जिबल।

लेकिन इस एक साल में मैंने बहुत सारा कौतूहल हासिल किया है और इस बात की समझ हासिल की है कि मंच पर होने जितना ही ज़रूरी और गौरवशाली मंच के पीछे और मंच के सामने होना होता है - वो भी एक संजीदा और जिज्ञासु श्रोता के रूप में।

मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

एक 'ऑलमोस्ट सक्सेसफुल' मां की डायरी

इस शहर में सुबहें बड़ी खाली होती हैं। सड़कें खाली, रास्ते खाली, पार्क खाली, बसें खाली, लोकल ट्रेन खाली। खाली सड़कों पर बहुत देर तक तेज़-तेज़ चलते रहने के बाद भी आराम नहीं आता।

मैं इतनी बेचैन क्यों हूं?

जॉगिंग शूज़ पहनकर निकले इतनी सुबह निकले इतने सारे लोग बेचैनी कम करने के लिए बाहर निकले हैं या अपना वज़न कम करने के लिए?

ये शहर बेचैन लोगों का शहर है। सब बैचैन हैं। या मुझे ही बेचैन दिखते हैं लोग।

एक और बीमारी हो गई है आजकल। जिस औरत को काम पर जाते देखती हूं, उसके पीछे छूट गए घर के बारे में सोचती हूं। कब लौटती होगी वो? उसके बच्चे होंगे क्या? उनका होमवर्क कौन कराता होगा? सुबह कितने बजे उठकर खाना बनाया होगा? पार्क में बच्चों के साथ चलती मांओं को देखती रहती हूं। बच्चे को बड़ा करने के अलावा कोई और मकसद होगा क्या इनकी ज़िन्दगी का?

मैं पार्क के कोने में बेंच पर बैठने लगती हूं तो देखती हूं एक बुज़ुर्ग महिला अपने से भी कहीं ज़्यादा उम्रदराज़ शख़्स को धीरे-धीरे हाथ पकड़कर टहला रही हैं। जाने कौन किसको टहला रहे है, लेकिन इन दोनों को देखकर मैं बहुत बेचैन हो जाती हूं। इनका खाना कौन बनाता होगा? कैसे रहते होंगे इतने बड़े शहर में दोनों? दो लाचार लोग क्या साथ दे पाते होंगे एक-दूसरे का? इनका परिवार नहीं है? बच्चे होंगे या नहीं? इसी अकेलेपन और लाचारी से बचने के लिए तो हिंदुस्तान में लोग परिवार बनाते हैं, बच्चे पैदा करते हैं। बच्चे - बुढ़ापे का सहारा। बेटा - बुढ़ापे की लाठी। फिर भी अकेले रह जाते हैं लोग। बुढ़ापा किसी पर दया नहीं दिखाता। बीमारी किसी को नहीं बख़्शती। बेचारगी और अकेलापन अकाट्य सत्य है। अवश्यंभावी। किसी मां के लिए भी, और पिता के लिए भी।

गले में कुछ अटककर रह जाता है। ऐसे ही किसी लम्हे ने युवराज सिद्धार्थ को घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया होगा।

शाम की हवा भी सुकून नहीं लाती। मन है कि मधुमक्खियों का छत्ता हो गया है। कोई एक लम्हा फेंको नहीं इधर कि सवालों के झुंड डंक मारने को दौड़ते हैं।

हम किस तलाश में हैं?

ज़िन्दगी का हासिल क्या हो?

अगर यही लाचारी आख़िरी सच है तो फिर इतनी भागमभाग क्यों?

वक़्त मेरे नाम का बहीखाता खोलेगा तो क्या-क्या निकलेगा बाहर? बच्चों के बड़े होने जाने पर ऐसी ही तन्हाई मिलती है क्या? मैंने अपनी मां को कहां छोड़ दिया? मेरे बच्चे मुझे कहां छोड़ देंगे? मैं ंकिसके लिए कर रही हूं ये सब? ज़िन्दगी में आसानी चुनने से इतना परहेज़ क्यों?

मुझे इतनी घबराहट हो रही है कि लग रहा है कि जैसे पार्क की बेंच पर, यहीं बैठे-बैठे उल्टी हो जाएगी। अंदर कुछ है जो निकल पड़ने को व्याकुल है। ये नॉसिया उसी साइकोसोमैटिक डिसॉर्डर का नतीजा है। मैं इस लम्हे, ठीक इसी लम्हे, लौट जाना चाहती हूं। पता नहीं कहां, लेकिन लौट जाना चाहती हूं कहीं।

घबराकर फोन देखती हूं। किसको फोन करूं? किससे बात करूं? इन बेचैनियों को यूं भी शब्द नहीं दिए जा सकते। क्या कहूंगी, कि बच्चों को घर पर छोड़ आई और बाहर इसलिए भटक रही हूं क्योंकि सवालों की मधुमक्खियां पीछा कर रही हैं?

सोलह साल में ऐसी बेचैनी होती थी। इस उम्र में भी होगी? सोलह साल में भी इतने ही सवाल थे। बड़े होकर करना क्या है? ज़िन्दगी का मक़सद क्या हो? कमबख़्त ये सवाल ऐसा है कि अब भी पीछा नहीं छोड़ता। मेरी ज़िन्दगी का मक़सद क्या था? मैं कहां भटक गई?

फिर ताज़िन्दगी जवाब मिलते क्यों नहीं, कि हम किस चीज़ का पीछा कर रहे होते हैं। मर ही जाना है तो जीने के आरज़ू क्योंकर हो?

ये मैं नहीं, मेरे भीतर से कोई और बोल रहा है। मेरा उस आवाज़ पर कोई बस नहीं चलता और मेरी तमाम समझदारियों को वो एक आवाज़ अक्सर बेक़ाबू कर देती है।

फोन पर गूगल खुल गया है और मैं वर्किंग मदर्स गूगल करती हूं। पता नहीं क्यों? मेरे भीतर की सारी लड़ाई ही यही है। मां होने और प्रोफेशनल होने के बीच की। दोनों होने की कोशिश कई कुर्बानियां मांगती है। जब इतना ही मुश्किल है सबकुछ तो हार क्यों नहीं मान जाती मैं? आसानियों की राह चुन लेना मेरी भी ज़िन्दगी आसान कर देगा, और मेरे बच्चों की भी। शाम को उन्हें सुलाने के बाद देर रात तक लैपटॉप पर आंखें फोड़ने से मुझे निजात मिलेगा, और सुबह तक जलती बत्ती में सोने की मजबूरी से बच्चों को। उन्हें स्कूल से लौटते हुए ये डर नहीं सताएगा कि बस स्टॉप पर उन्हें लेने के लिए कोई होगा या नहीं। मुझे इस तनाव से छुट्टी मिल जाएगी कि बच्चे जिस दिन घर पर हों उस दिन मीटिंग के लिए कैसे जाऊंगी मैं?

मैं क्यों उलझ रही हूं इतना? क्यों ज़रूरी है काम करना?

जवाब ढूंढने के लिए मैं फोन पर फिर से सक्सेसफुल मदर्स टाईप करती हूं।

फिर पावर वूमैन।

मुझे आजकल उन तमाम औरतों की कहानियां आकर्षित करती हैं जो अपने-अपने स्तर पर अपनी-अपनी किस्मतों से अलग-अलग तरीके से संघर्ष कर रही हैं। अपने सपनों का पीछा करते हुए कड़ी आलोचनाओं और समाज के पूर्वाग्रहों को दरकिनार करते हुए कैसे बनाई जाती होंगी राहें? मां तो वो है न जो दूसरों के ख़्वाबों को पालती-पोसती हो - मेरी मां की तरह - ताकि उनके पति-बच्चे-परिवार अपनी ज़िन्दगियां, अपने ख़्वाब जी सकें।

अपनी मां के ज़रिए मैंने दूसरों का ख़्वाब जीने वालों को बहुत देखा है।

मैं औरतों के लिए गाली जैसा लगने वाला शब्द - 'ambitious' - महत्वाकांक्षी औरतों के बारे में जानना चाहती हूं।

कैसी औरतें होंगी जो घर और बाहर, सबपर काबिज़ दिखाई देती हैं? उनकी बेचैनियों के बारे में किसी ने तो लिखा होगा कहीं।

जवाब फिर भी नहीं मिलते, और नाम वही गिने-चुने - सिंडी क्रॉफर्ड, माधुरी दीक्षित, फराह खान, नैना लाल किदवई, लीला सेठ, सुष्मिता सेन, एंजेलिना जोली और बीच-बीच में कहीं मेरी कॉम, गीता गोपीनाथ...

मैं कई और बहुत सारी औरतों के बारे में सोचती हूं। अपनी मां के बारे में सोचती हूं।

गूगल ही मुझे टॉनी मॉरिसन के एक इंटरव्यू की ओर लेकर चला जाता है।

टोनी मॉरिसन। एक और मां। एक और वो मां, औरत, जिसने अपनी लेखनी के ज़रिए मदरहुड को नए सिरे से परिभाषित किया। टोनी की रची हुई मांएं मातृत्व के सारे स्टीरियोटाईप्स तोड़ती हैं। टोनी की रची हुई औरतें के परिवार समाज के तय किए हुए सभी मापदंडों की अ"द ब्लुएस्ट आई" टोनी मॉरिसन की पहली किताब थी जो मैंने आद्या और आदित के आने के दौरान पढ़ा था, जब मैटरनिटी लीव पर थी। फिर 'Beloved' पढ़ी, और फिर 'Sula'. दोनों नॉवेल्स के ज़रिए मातृत्व पर - मां होने पर - मां की भूमिका पर इन दोनों किताबों ने मेरे भीतर कई पैमाने तय किए थे।

टोनी मॉरिसन की रची हुई मांएं भी अलग-अलग किस्मों की होती हैं। उनमें सेथे जैसी मां होती है जो अपने बच्चों को इस हद तक प्यार करती है कि उन्हें अपनी निजी जागीर समझती है। उनमें बेबी जैसी मां भी होती है जो नाप-तौल कर अपने हिस्से के प्यार इस डर से अपने बच्चों को देती है कि कहीं उसके अपने ही बच्चे उसे बहुत कमज़ोर और बेचारी न बना दें। ये रंगभेद और नस्लभेद, गरीबी और गुलामी के बीच अपने बच्चों को पालने वाली मांएं हैं। ये वो मांएं हैं जो अपने बच्चों को बेचने की बजाए उन्हें मार डालना ज़्यादा उचित समझती हैं। ये वो मांएं हैं जो रचती भी हैं, विनाश भी करती हैं।

और इन सब किरदारों को रचनेवाली मां है टोनी मॉरिसन। टोनी ने जब अपनी पहली किताब - द ब्लुएस्ट आई - शुरू की, वो एक नौकरी करने के साथ-साथ दो बेटों को अकेले पाल रही थीं। नौकरी पर जाने से पहले हर सुबह चार बजे लिखने के लिए उठती थीं। बकौल टोनी, जब भी उनकी हिम्मत जवाब देने लगती, वो अपनी दादी के बारे में सोचतीं जो ग़ुलामी और बेइज़्जती की ज़िन्दगी से बचने के लिए एक दिन अपने सात बच्चों के साथ दक्षिण से भाग आई थी। तब पेट भरने का भी कोई साधन नहीं था उनके पास। लेकिन मां का एक रूप ये भी होता है कि वो हर हाल में अपने बच्चों के पेट भरने का इंतज़ाम कर ही लेती है, चाहे उसे कृपी की तरह दूध के नाम पर पानी में आटा ही घोलकर क्यों न पिलाना पड़े।

टोनी का इंटरव्यू पढ़ते हुए लगता है कि कोई तीसरी आंख है जो खुल गई है भीतर। मैं हर रोज़ तो देखती हूं ये, फिर इस बात का यकीन क्यों नहीं होता कि बच्चों की ज़रूरतें बहुत कम होती हैं। बच्चों की ज़रूरतों से ज़्यादा मां के ज़ेहन में उसे ही काट खाने को बैठा गिल्ट होता है। उससे भी बड़ी रोज़-रोज़ की जद्दोज़ेहद होती है।

जो मां कामकाजी या 'ambitious' होती है, उसके लिए ये संघर्ष और भी बड़ा हो जाता है क्योंकि मां के तौर पर आपके सिर पर रोल मॉडल बन जाने का दबाव भी होता है।

चाहे जो भी हो, मां हैं आप तो अपने बच्चों के सामने बिखर नहीं सकते। उनके सामने कमज़ोर नहीं पड़ सकते। आपको हारते-टूटते हुए देखना आपके बच्चों के लिए सबसे बड़ा सदमा होता है। आपके बच्चे आपको एक adult, एक समझदार adult के तौर पर देखना चाहते हैं। और बच्चों को याद नहीं रहता कि उनकी मां के बाल कैसे हुआ करते थे। उन्हें ये ज़रूर याद रहता है कि हर हाल में मां ने सेंस ऑफ ह्यूमर कैसे बचाए रखा था अपना। ये याद रहता है कि अपनी विपरीत परिस्थितियों से हंसते हुए कैसे जूझा करती थी मां।

बच्चे अगर मां की ज़िन्दगी के दिए हुए लम्हों का योग हैं, तो फिर उनकी ख़ातिर अपने सपनों को बचाए रखना और ज़रूरी हो जाता है। टुकड़ों-टुकड़ों में अपने सपने जीकर दिखाएंगे बच्चों को, तो उन्हें अपने नामुमकिन सपनों पर यकीन होगा। इसके एवज में कई छोटे-छोटे लम्हों की क़ुर्बानियां देनी होती हैं, जिनमें उनके लिए हर शाम ठीक पांच बजे आटे का हलवा बना पाने का संतोष भी होता है।

इसलिए, सारे सवाल बेमानी हैं।

मैं टोनी मॉरिसन को थैंक यू बोलने को उठने को ही हूं कि देखती हूं, वो बुज़ुर्ग महिला फोन पर हंस-हंसकर बात कर रही है। फिर वो फोन अपने साथ बैठे अपने पति की ओर बढ़ा देती है। उनके चेहरों पर आई चमक गौतम सिद्धार्थ ने देखी होती न, तो सिद्धि यहीं मिल गई होती। जरा, मरण और दुखों से मुक्ति दिलाने के लिए जिस मार्ग की खोज में सिद्धार्थ ने घर छोड़ा, उसी घर में अपने नवजात शिशु को बड़ा करते हुए, अपने वृद्ध सास-ससुर की सेवा करते हुए, अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए, अपनी परिस्थितियों के ठीक बीचों-बीच ज़िन्दगी से जूझते हुए साध्वी यशोधरा ने निर्वाण की राह ढूंढ ली। गृहत्याग तभी किया जब कर्तव्यों को पूरा कर लिया. अपने कर्मों को जी लिया।

अभी कुछ देर पहले तक जिसकी लाचारी ने भीतर तक परेशान किया था, उसी कर्मठ बुज़ुर्ग औरत के लिए बहुत सारा प्यार उमड़ आया मन में। बेचैनी और सुकून के बीच एक नैनोसेकेंड की दूरी होती है। सब खेल मन का है।

जवाब मिल गया है। अपने कर्मों को हर दिन जीने में। अपने हालातों को बदलने के लिए बेचैन होने से ज़्यादा उसी के बीच से रास्ता निकालने में।

अब मैं किसी सुपर सक्सेसफुल मदर के बारे में नहीं जानना चाहती।

ज़िन्दगी की जंग का फ़ैसला एक दिन, एक हफ्ते, एक महीने, एक साल में नहीं होता। ज़िन्दगी की जंग आख़िरी सांस तक लड़ी जाती है और ये जो जीत और हार का अहसास है न, वो व्यक्ति सापेक्ष होता है - सफलता की परिभाषा की तरह। और ये पैमाने हम तय करते हैं अपने लिए। कोई और नहीं करता।

शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

बच्चे नहीं, हम बिगड़े हुए हैं


कौटिल्य पंडित को टीवी पर देखकर दिमाग में जो पहली बात आई थी, उसके बारे में सोचकर मझे कई बार अफ़सोस हो चुका है। मैंने सोचा, कौटिल्य नाम का ये जीनियस मेरे बच्चों से तो सिर्फ एक साल छोटा है!” जितनी तेज़ी से ये ख़्याल मेरे मन में आया, उतनी ही संजीदगी से ये बात भी ज़ेहन में आई कि ख़ुद को जागरुक और संवेदनशील बताने वाले हम मां-बाप भी आख़िर किस हद तक ढोंगी हो सकते हैं! हम सब तमगे चाहते हैं, ट्रॉफी किड्स चाहते हैं – उस तरह के बच्चे जिनका घर, बाहर, समाज और यहां तक कि सोशल मीडिया पर दिखावा करने का मौका मिल सके।

बच्चों को लेकर हमारी प्रतिस्पर्धा उनके पैदा होते ही शुरू हो जाती है। बच्चे किस अस्पताल में पैदा हुए, और कितने बड़े पेडियाट्रिशियन के पास से हमने टीके लगवाए - यहां से शुरू हुई ये स्पर्धा उनके बैठने, बोलने, चलने और कब कितना क्या-क्या कहा के हिसाब के तौर पर स्क्रैप-बुक्स, एलबम्स और लाइव स्टेटस अपडेट्स में जमा होने लगी है। मैं मानती हूं कि अपने बच्चों को बड़ा करना एक किस्म का सेलीब्रेशन होना चाहिए - एक किस्म का जश्न-ए-बचपन - क्योंकि बच्चों को बड़ा करने के साथ-साथ हम भी न सिर्फ अपना बचपन जी रहे होते हैं, बल्कि उनके साथ-साथ ख़ुद भी बड़े हो रहे होते हैं। बच्चे हमें सब्र का पाठ पढ़ाते हैं। बच्चे हमें प्यार करना सीखाते हैं। बच्चे हमें जीने का सलीका बताते हैं। लेकिन इसका मतलब बच्चों के साथ हमेशा परफेक्ट होने की ज़्यादती करना कतई नहीं हो सकता।

लेकिन बदकिस्मती से हमने एक ऐसा समाज बना लिया है जो बच्चों की मासूमियत और उनका बचपन छीनने का काम बख़ूबी और सीना ठोक कर करता है। ये वो समाज है जहां हमारे बच्चों की आंखों पर पट्टियां लगाकर उन्हें ज़िन्दगी की रेस में तभी छोड़ दिया जाता है जब उनकी उम्र अपनी सीधे खड़े होने की भी नहीं हुई होती। इसके पीछे बड़ा कारण एक ही है – हमें पेरेन्ट्स या अभिभावक के तौर पर खुद को अव्वल साबित करना है। इसलिए बच्चों की परवरिश हमारे लिए वो प्रोजेक्ट हो जाती है जिसमें ए-प्लस हासिल करना ज़िन्दगी का सबसे बड़ा लक्ष्य बन जाता है। 

हमारे बच्चे किस स्कूल में पढ़ते हैं, स्कूल से आने के बाद कितनी तरह की हॉबी क्लासेस में जाते हैं, क्लासिकल संगीत के साथ-साथ टेनिस क्लासेस के लिए जाते हैं या नहीं, स्कूल में ग्रेड्स कैसे लेकर आते हैं, उनका बर्ताव कैसा है, उनकी शख़्सियत कैसी है – इन सारी बातों पर हमारी लम्हा-लम्हा नज़र होती है। हम अपने काम में चाहे कितने ही फिसड्डी क्यों न हों, जाड़े की सुबह दफ़्तर जाने के लिए रजाई को छोड़ने से पहले बॉस को कितनी ही गालियां क्यों न दे दें, ख़ुद दूसरों से किस तरह पेश आते हैं उसके बारे में भले कभी न सोचा है, लेकिन बच्चे हमें परफेक्ट चाहिए। अपनी अपेक्षाओं का भार अपने बच्चों को कोमल कंधों पर रखते हुए हमें ज़रा भी हिचक नहीं होती। क्यों भला?

मैं एक और वाकया सुनाती हूं। गर्मी की छुट्टियां काटने के लिए दोपहर में अपने पांच साल के जुड़वां बच्चों को मैंने ड्राईंग कॉपी और वॉटर कलर के डिब्बे पकड़ा दिए थे। बच्चों को भी बड़ा ज़ा आ रहा था। जब तक बच्चे मेरे अपेक्षा के मुताबिक ब्रश को कलर में डुबो के आराम से पेंटिंग करते रहे, मैं उनकी तस्वीरें खींचती रही, वीडियो लेती रही। इन सभ्य और कलाकार बच्चों पर नाज़ करती रही। बच्चे तो बच्चे ठहरे। थोड़ी देर में उनका मन ड्राईंग बुक से ऊब गया और उन्हें रंगों के साथ खेलने में इतना मज़ा आने लगा कि उनके शरीर, चेहरे और हथेलियां पर देखते ही देखते मॉडर्न आर्ट के कई डिज़ाईन उतर गए। पूरा रंग कमरे में और फर्श पर बिखर चुका था। खेल-खेल में सूरत ऐसी बिगड़ी कि मुझे तेज़ गुस्सा आ गया। अभी दस मिनट पहले मैं जिन सभ्य और परिष्कृत बच्चों पर फ़ख्र कर रही थी, वही बच्चे अब मेरी नाराज़गी की चपेट में आ चुके थे।

किसने तय किया कि बच्चे कैसे पेंटिंग करेंगे? उनके हमेशा बच्चों के तरीके से काम करने की अपेक्षा क्यों की जाती है? हम इतनी सारी बंदिशों में क्यों रखते हैं उनको? उन्हें उनके तरीके से जीने देने में हमें इतनी तकलीफ़ क्यों होती है? सच तो ये है कि उन्हें उनके तरीके से हम तभी जीने देते हैं जब हमारी सहूलियत की बात आती है। हमारे पास वक़्त नहीं है तो उन्हें टीवी देखने दिया। हम शाम को वक्त पर घर नहीं लौट पाए तो उनके लिए खिलौने ले आए। हमारे पास उनके दोस्तों से मिलने और उन्हें जानने का वक्त नहीं है तो उन्हें मॉल ले गए। हमारे पास उनकी पसंद का खाना बनाने की फ़ुर्सत नहीं है तो उन्हें पिज़्जा और बर्गर खिला दिया। अपनी सहूलियत के हिसाब से सब ठीक, लेकिन जब बच्चों ने इनमें से कुछ भी अपनी मर्ज़ी से मांगा तो हमने बड़ी आसानी से कह दिया, आजकल के बच्चे ही बिगड़े हुए हैं।

बच्चे बिगड़े हुए नहीं हैं। हम बिगड़ चुके हैं। हमारे बच्चे हमारा ही प्रतिबिंब होते हैं। उनकी सोच, उनके रहन-सहन, उनके तौर-तरीकों में हमारी शख़्सियत ही झलकती है और ये बात वैज्ञानिक रूप से साबित भी हो चुकी है। एक बेहतर समाज बन सके, इसके लिए बहुत ज़रूरी है कि हम बच्चों के लिए एक अच्छा माहौल बनाएं। इस गलाकाट और बेरहम दुनिया में बच्चों का तो क्या, हमारा भी गुज़ारा मुश्किल से हो रहा है। बच्चों की ज़रूरतें सुविधाएं, विलासिता, आईपैड और मोबाइल फोन नहीं, हमारा वक्त और हमारा प्यार है। अपने बच्चों का प्यार से पालन-पोषण करना अपने भीतर प्यार और इंसानियत बचाए रखने का सबसे कारगर तरीका है और बच्चों को उनके हिस्से का प्यार और सम्मान मिले, इसके लिए हर बच्चे का कौटिल्य पंडित होना भी कतई ज़रूरी नहीं।          

('खुशबू' में प्रकाशित कवर स्टोरी - लिंक है http://dailynewsnetwork.epapr.in/184374/khushboo/13-11-2013#page/1/1)

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

इस कहानी को कौन रोकेगा?

दो हफ्ते भी नहीं हुए इस बात को। आपको सुनाती हूं ये वाकया। मैं अलवर में थी, दो दिनों के एक फील्ड विज़िट के लिए। मैं फील्ड विज़िट के दौरान गांवों में किसी महिला के घर में, किसी महिला छात्रावास में या किसी महिला सहयोगी के घर पर रहना ज़्यादा पसंद करती हूं। वजहें कई हैं। शहर से आने-जाने में वक़्त बचता है और आप अपने काम और प्रोजेक्ट को बेहतर तरीके से समझ पाते हैं - ये एक बात है। दूसरी बड़ी बात है कि आप किसी महिला के घर में और जगहों की अपेक्षा ख़ुद को ज़्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं। मेरी उम्र चौतीस साल है और मैं दो बच्चों की मां हूं। बाहर से निडर हूं और कहीं जाने में नहीं डरती। डरती हूं, लेकिन फिर भी निकलती हूं। रात में कई बार अकेले स्टूडियो लौटी हूं। देर रात की ट्रेनें, बसें या फ्लाइट्स ली हैं। कई बार मेरे पास कोई विकल्प नहीं होता, कई बार ख़ुद को याद दिलाना पड़ा है कि डर कर कैसे जीएंगे।

लेकिन यकीन मानिए, अंदर का डर वही है जो छह साल की एक बच्ची के भीतर होता होगा।

ख़ैर, इस बार अलवर में मेरे लिए एक होटल में रुकने का इंतज़ाम किया गया। मैं दिल्ली से अकेली गई थी, एक टैक्सी में। (यूं तो मैं पब्लिक ट्रांसपोर्ट लेने में यकीन करती हूं, लेकिन यहां पब्लिक ट्रांसपोर्ट में भी 'safety' है?) दिन का काम खत्म करने के बाद बेमन से होटल में चेक-इन किया। मुझे अकेले होटलों में रहने से सख़्त नफ़रत है। फैंसी होटल था - सुना कि अलवर के सबसे बड़े होटलों में से एक। कार्ड लेकर कमरे में गई। पीछे से एक हेल्पर ने आकर मेरा सामान रखा। मैंने दरवाज़ा खोला और दरवाज़े पर ही खड़ी रही, तब तक जब तक वो हेल्पर मेरा सामान और टिप लेकर बाहर नहीं चला गया (मैं कमरे में अंदर किसी अनजान इंसान के साथ खड़ी होने का ख़तरा भी नहीं मोल लेती)। तब तक सहायक कार्ड लेकर उसे जैक में डालकर कमरे की बत्तियां जला चुका था।

अंदर आई। सबसे पहले दरवाज़ा देखा। दरवाज़े में भीतर कोई कुंडी, कोई चिटकनी नहीं थी। लोहे की एक ज़ंजीर थी बस, जिसके ज़रिए आप दरवाज़े को हल्का-सा खोलकर बाहर देख सकते थे। सेफ्टी के नाम पर बस इतना ही। वो ज़ंजीर भी बाहर से खोली जा सकती थी। वैसा दरवाज़ा बाहर से किसी भी डुप्लीकेट कार्ड से खोला जा सकता था।

मैंने रिसेप्शन पर फोन किया। पूछा, "भीतर से दरवाज़ा बंद कैसे होता है?" एक आदमी आया और कमरे में घुसते ही उसने सबसे पहले कार्ड निकाल लिया, "इसी कार्ड से बंद होगा कमरा", उसने कहा और कार्ड निकालकर मोबाइल की रौशनी में दरवाज़ा बंद करने का तरीका बताने लगा। कमरे में घुप्प अंधेरा, मोबाइल की हल्की रौशनी के अलावा। मैं इतनी ज़ोर से डर गई थी कि मुझे पक्का यकीन है, उस आदमी को मेरे मुंह में आ गई जान और मेरी धड़कनें साफ़ सुनाई दे गई होंगी। (विडंबना ये कि मैं अभी-अभी गांव में लड़कियों के स्कूल में सेल्फ-डिफेंस की ज़रूरत पर बक-बक करके आई थी)

मैंने ज़ोर से चिल्लाकर कहा, "लाइट जलाइए आप पहले।"

उसने मुझे घूमकर देखा और कहा, "मैडम मैं तो..."

"मैं समझ गई हूं कि दरवाज़ा कैसे बंद होता है। पुट द डैम थिंग बैक एंड स्विच ऑन द लाईट्स", मैंने चिल्लाकर कहा, उस आदमी को कमरे के बाहर भेजा, रिसेप्शन पर फोन करके उन्हें कमरे में चिटकनियों की ज़रूरत पर भाषण दिया (जो महिला रिसेप्शनिस्ट को समझ में आया हो, इसपर मुझे शक़ है) और फिर दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया। उसके बाद मैंने जो किया वो हर उस कमरे और नई जगह पर करती हूं जहां सोने में मुझे घबड़ाहट होती है। मैंने कमरे के स्टडी टेबल को खींचकर दरवाज़े के पीछे लगाया। फिर उसके ऊपर भारी-भरकम बेडसाईड टेबल रखा। फिर उसके ऊपर अपना सूटकेस रखा।

नहीं, उस रात मुझे नींद नहीं आई थी और वो रात कई उन रातों में से थी जिस रात मुझे अकेले (या अपने बच्चों के साथ अकेले) सफ़र करते हुए नींद नहीं आती। क्यों? मैंने ट्रेन में अपनी बर्थ पर सो रही एक अकेली लड़की के साथ रात में बदतमीज़ी होते देखा है। वो लड़की डर के मारे नहीं चिल्लाई थी। मैं चिल्लाई थी। हर हिंदुस्तानी लड़की की तरह मैंने अपने बचपन में एक भरे-पूरे घर में छोटी बच्चियों तो क्या, बड़ी लड़कियों और छोटे लड़कों के साथ होती गंदी हरकतें देखी हैं जिसे सेक्सुअल अस़ल्ट कहा जाता है। देखा है कि उन्हें कहां-कहां और कैसे छुआ जाता है। ये भी बताती हूं आपको कि इनमें से कई बातें मुझे आजतक किसी को भी बताने की हिम्मत नहीं हुई, मां को भी नहीं और मुझे पक्का यकीन है कि उन लड़कियों ने भी किसी से कहा नहीं होगा। चुप रह गई होंगी। क्यों, वो एक अलग बहस और विमर्श का मुद्दा है। उस दिन भी मैंने गांव के स्कूल की बच्चियों की ज़ुबान में उनके अनुभव सुने थे। आप सुनेंगे तो आपको शर्म आ जाएगी।

उस दिन मेरा हौसला पूरी तरह पस्त हो गया जिस दिन मेरी साढ़े छह साल की बेटी ने स्कूल ड्रेस पहनते हुए कहा, "मम्मा, स्कर्ट के नीचे साइकलिंग शॉर्ट्स पहना दो।" "क्यों", मैंने उसे तैयार करते हुए एक किस्म की बेफ़िक्री के साथ पूछा, "आज हॉर्स-राइडिंग है?" "नहीं मम्मा। कुछ भी नहीं है। स्कूल में लड़के नीचे से देखते हैं। सीढ़ी चढ़ते हुए, चेयर पर बैठते हुए। मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता।"

मैं शब्दों में अपना शॉक बयां नहीं कर सकती। मैंने उसे मैम और मम्मा को बताने की दो-चार बेतुकी हिदायतों के बाद साइकलिंग शॉर्ट्स पहना दिया और पूरे दिन परेशान होकर सोचती रही। छह साल की बच्ची को अच्छी और बुरी नज़र का अंदाज़ा लग गया। हम अपनी बेटियों की कैसे समाज में परवरिश कर रहे  हैं! उसे विरासत में क्या सौंप रहे हैं? डर?

आद्या अभी भी पार्क में साइकलिंग शॉर्ट्स में जाती है, या फिर वैसे कपड़ों में जिससे उसकी टांगें ढंकी रहें। यकीन मानिए, मैंने उसे कभी नहीं बताया कि उसे क्या पहनना चाहिए। इस एक घटना ने मुझपर एक बेटे की मां होने के नाते भी ज़िम्मेदारी कई गुणा बढ़ा दी है। मैं रिवर्स जेंडर डिस्क्रिमिनेशन करने लगती हूं कभी-कभी, न चाहते हुए भी। बेटे को संवेदनशील बनाने की ज़िम्मेदारी बहुत बड़ी है। बेटा पालना ज़्यादा मुश्किल है, ज़्यादा बड़ी ज़िम्मेदारी है।

फिर भी 'रेप' या यौन हिंसा को रोकने के लिए ये काफ़ी नहीं है। जब तक छोटे से छोटे यौन अपराधों (ईवटीज़िंग, छेड़छाड़) को लेकर कानून को अमल करने के स्तर पर ज़ीरो टॉलेरेन्स यानी पूर्ण असहिष्णुता का रास्ता अख़्तियार नहीं किया जाएगा, महिलाओं, लड़कियों, बच्चियों के ख़िलाफ़ हिंसा को लेकर बड़े बदलाव की उम्मीद बेकार है। दरअसल, इतना भी काफ़ी नहीं। जब तक ज़्यादा से ज़्यादा लड़कियां और औरतें पब्लिक स्पेस में नहीं आएंगी, डिस्क्रिमिनेशन कम नहीं होगा। समस्या ये है कि एक समाज के तौर पर हम अभी भी लड़कियों और औरतों से घरों में रहने की अपेक्षा करते हैं। सार्वजनिक जगहों पर उनकी संख्या को लेकर हम कितने पूर्वाग्रह लिए चलते हैं, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मेट्रो में, लोकल ट्रेनों में महिलाओं के नाम के एक ही कोच होते हैं। बाकी जनरल कोचों में गिनी-चुनी महिलाएं। अपने दफ्तरों, बाज़ारों, दुकानों, सड़कों, गलियों में देख लीजिए। क्या अनुपात होता है पुरुष और महिला का? को-एड स्कूलों में? कॉलेजों में? डीटीसी की बसों में महिलाओं के लिए कितनी सीटें आरक्षित होती हैं? शहर की सड़कों पर कितनी महिलाओं को गाड़ी चलाते देखा है आपने? ६६ सालों में सोलह राष्ट्रीय आम चुनाव, लेकिन देश की ४८ फ़ीसदी आबादी के प्रतिनिधित्व के लिए ३३ फ़ीसदी सीटों के आरक्षण को लेकर बहस ख़त्म ही नहीं होती। जो पुरुष औरतों को बराबरी का हक़दार मानते ही नहीं, वे उसे अपमानित, शोषित और पीड़ित करने का कोई मौका नहीं छोड़ेंगे। फिर हमारे यहां तो यूं भी पुरुषों के इस बर्ताव को मर्दानगी समझा जाता है। जब तक मर्दानगी की परिभाषा बदलेगी नहीं, मर्द नहीं बदलेंगे, बराबरी की बात फ़िज़ूल है। हम हर बलात्कार का मातम ही मना सकते हैं बस।   

रह गईं औरतें और लड़कियां तो सदमे में होते हुए भी, अपने डर से लड़ते हुए भी बाहर जाने और काम करने का हौसला रखेंगी ये। हमारे पास चारा क्या है? फिर भी मैं अकेले अनजान जगहों पर सफ़र करने की हिम्मत रखूंगी, चाहे इसके एवज़ में मुझे कमरे को भीतर से कई सारे फर्नीचर लगाकर ही क्यों न बंद करना पड़े। फिर भी मैं मर्दों पर, लड़कों पर भरोसा करती रहूंगी। पूरी ईमानदारी से इस भरोसे को बचाए रखने की कोशिश करूंगी और इसके ख़िलाफ़ उठने वाले हर शक़ का इलाज ढूंढने की कोशिश करूंगी।  मैं फिर भी अपने बच्चों को एहतियात बरतने के साथ-साथ भरोसा करना ही सिखाऊंगी। बेटी नज़र और 'टच' पहचानने ही लगी है। बेटा भी शायद धीरे-धीरे अपनी बहन की ख़ातिर और उसके जैसी कई लड़कियों की ख़ातिर ख़ुद को बदलना सीख जाए, मर्दानगी की परिभाषा बदलना सीख जाए। आमीन! 

सोमवार, 22 जुलाई 2013

कभी खाना खाकर मरेंगे, कभी भूखे

मेरे सामने जो प्लेट परोसी गई थी उसमें खिचड़ी थी और आधा अंडा था। पनियल खिचड़ी में हल्दी के रंग की बहार ज़्यादा थी, दाल की कम। अंडा शायद आख़िरी लम्हे में मांग दिए गए खाने की वजह से मेज़बान को हुई शर्मिंदगी से बचाने के लिए दिया गया था। ये भी मुमकिन है कि बच्चों को अंडा दिया ही जाता हो। रोज़ न सही, साप्ताहिक तालिका के हिसाब से हफ्ते में दो दिन ही सही। बावजूद इसके वो खाना देखकर मेरे हौसले पस्त हो गए और मैंने खाना लौटा दिया। बच्चों के मिडे डे मील में से पहले खाना मांगने, और बाद में उसे लौटा देने की शर्मिंदगी काफी दिनों तक सालती रही थी। लेकिन वो खाना खाने की हिम्मत मैं जुटा नहीं पाई।

मैं टीचर नहीं हूं। मैं कोई जांच अधिकारी भी नहीं हूं। मैं सामाजिक कार्यकर्ता भी नहीं। एक पत्रकार हूं, और लिखने-पढ़ने की ख़्वाहिश सामाजिक सरोकारों के क़रीब ले जाया करती है। सतहों को खुरचकर मुश्किल सवाल पूछने और फिर उन सवालों के जवाब सुनकर तकलीफ़ में बने रहने की बुरी आदत है। एक मुश्किल सवाल झारखंड में एक स्कूल का दौरा करते हुए पूछा था, स्कूल का खाना ठीक लगता है? उलझे बालों, लंबे नाखूनों और दो बटन के बग़ैर मटमैली कमीज़ में किसी तरह स्कूल चले आए दस-ग्यारह साल के उस आदिवासी बच्चे ने इतनी ही धीमी आवाज़ में जवाब दिया कि सुनने के लिए उसकी ज़ुबान के पास कान लगाना पड़ा। बाद में लगा कि जवाब न ही सुना होता तो अच्छा था। उसने कहा था, हमन मन के कम-स-कम खाना त मिलत है।

मिडे डे मील एक बड़ी वजह थी कि पिछड़े हुए गांवों और शहर के पिछड़े इलाकों के सरकारी स्कूलों के गरीब बच्चों को बाल मज़दूरी के दुष्चक्र से निकाल कर स्कूलों में वापस लाया जा सका। भुखमरी और कुपोषण का शिकार बच्चे और उनके मां-बाप बच्चों को मिलने वाले इसी एक वक्त के खाने के नाम पर आंगनबाड़ी या स्कूल भेज दिया करते हैं। लेकिन हमारे यहां किसी भी व्यवस्था में भ्रष्टाचार और लालच का ज़हर घुलते देर नहीं लगती। बच्चों का खाना बनाने वाले, उन्हें अनाज सप्लाई करने वाले, उन्हें पढ़ाने का ज़िम्मा उठाने वाले उनके अपने लोग ज़हरखुरान बन गए। किस गांव, किस स्कूल का उदाहरण लूं कि एक नहीं, ऐसा हर गांव के हर सरकारी स्कूल का हाल है। 

मिड डे मील ने नाम पर सबसे ज़्यादा भ्रष्टाचार होता है। खाद्यान्न वितरण का टेंडर निकले तो काम नेता जी या रसूखदारों के रिश्तेदारों को जाता है। पहली चोरी वहीं से शुरू हो जाती है। दाल अरहर की आनी है, खरीद ली जाएगी खेसारी (उत्तर प्रदेश में तो खेसारी दाल की बिक्री पर भी प्रतिबंध था)। चावल बासमाती आना हो तो आएगा ज़रूर, लेकिन लंबे दानों वाला अच्छा चावल आंगनबाड़ी वाली मैडम या फिर स्कूल में आपूर्ति का ज़िम्मा संभालने वाले टीचर के घरों में बोरों में मिलेगा। स्कूल में तो सस्ते से सस्ता उसना चावल ही मिलेगा। जाने तेल और रिफाइंड में क्या मिला होता है कि मधुबनी के बीमार बच्चों के आमाशय में ज़हरीले रसायन ऑर्गेनिक फॉस्फोरस के अंश मिले।

बच्चों की हाज़िरी और खाने की मात्रा का घालमेल कर हर रोज़ घोटाला होता है। हो सकता है, स्कूल के स्तर पर होने वाला ये घोटाले बहुत छोटे घोटाले हों। लेकिन अगर एक ही राज्य में एक ही दिन के भीतर दो अलग-अलग शहरों के दो अलग-अलग स्कूलों में मिड डे मील खाकर बच्चों की मौत हो जाए या बच्चे बीमार पड़ जाएं तो मामला कहीं ज़्यादा सरकश और गंभीर है। यानी ज़हरखुरान स्कूलों में ही नहीं, उससे भी कहीं ऊपर बैठे हैं जिन्हें बड़े-बड़ों का वरदहस्त प्राप्त है। जाने वो कैसे लोग होंगे जो इतने सारे बच्चों की जानों पर खेलकर अपनी तिजोरियां भर रहे हैं, बड़ी-छोटी चोरियां कर रहे हैं। जाने वो कैसे लोग होंगे जिन्हें बच्चों की जानों के साथ लापरवाही बरतते हुए अपने घर के बच्चों का ख़्याल भी नहीं आता। रही आंकड़ों की बात तो सुनिए – हमारे देश में हर साल सात से साढ़े सात लाख बच्चे कुपोषण की वजह से होने वाली अलग-अलग बीमारियों से मर जाते हैं। जो बच जाएंगे, उन्हें हम स्कूलों में मिड डे मील खिला दिया करेंगे।

(गांव कनेक्शन में मेरा कॉलम - 'मन की बात')