आंसू रुकते ही नहीं। खिड़की से लगकर सुड़कती जाती है नाक वो, पोंछती रहती है आंसू। सुवर्णरेखा का कोई बांध टूट गया है जैसे। पहाड़ी नदी गीले मौसम में यूं भी वश से बाहर हो जाती है। किनारे को नहीं तोड़ती। लेकिन पत्थरों से उलझता उसका उफान जानलेवा हो सकता है। फिर जो नदी पत्थरों से यूं भिड़ जाती है वो किनारों का क्या करेगी?
वैसे सुवर्णरेखा किनारे नहीं तोड़ती। लड़की को भी नहीं तोड़ना कोई किनारा।
फिर ये कैसी बेचैनी है? बीस की उम्र तो बेफिक्री की होती है ना? तब क्या हो जाने का डर है? हर शाम भारीपन लिए क्यों आती है? लड़की को कोई तकलीफ़ नहीं। घर-परिवार अच्छा है। रुपए-पैसे की दिक्कत नहीं। करती वही है जो करना चाहती है। पढ़ती वही है जो पढ़ना चाहती है। तब? गुज़रे हुए लम्हों को रोती है, आनेवाले कल से डरती है।
लड़की को कुछ नहीं बदलना। सब वैसा का वैसा ही चाहिए जैसा है। दोस्तों के बिछड़ जाने का ख़ौफ़ है, नई जगह नए लोगों के बीच नई चुनौतियों के सामने डाल दिए जाने का अंदेशा है। लड़की का ग्रैजुएशन खत्म होने को है और वो घर लौट रही है, छुट्टियों के लिए या हमेशा के लिए, नहीं जानती। ट्रेन पलाश के जंगलों से होकर गुज़र रही है। गौतमधारा आ गई अब तो। घर पहुंचने में दो घंटे भी बाकी नहीं। लड़की के हॉस्टल का कमरा छूट गया, सहेलियां छूट गईं, सेन्ट्रल मार्केट से खरीदी हुई नीली बाल्टी छूट गई, लाल पर्दे रह गए कहीं और साथ आ गईं यादें। एक डर भी। अब क्या होगा? उन्मुक्तता के दिन लदे? अब? सब बदल जाएगा अब तो।
"लेकिन ज़िन्दगी इसी को तो कहते हैं, नहीं? सुना है कि ज़िन्दगी में एक ही चीज़ स्थायी होती है - बदलाव। फिर बदलने से कैसा डरना?"
"सुनो, मुझे फ़लसफ़े मत सिखाओ ज़िन्दगी के। किताबी फ़लसफ़े तो बिल्कुल नहीं। सेल्फ इम्प्रूवमेंट और काउंसिलिंग पर तुमसे ज़्यादा किताबें पढ़ीं हैं मैंने। तुमसे ज़्यादा पढ़ी-लिखी हूं, तुमसे ज्यादा इंटेलिजेंट।"
"वही तो, वही तो परेशानी है - तुम्हारा दिमाग। कुछ किताबों के कचरे ने इसका कचरा कर दिया, कुछ तुमने। जो बिना दिमाग का होता है ना उसको इस तरह की लाइलाज बीमारियां नहीं होती।"
"बड़ा खाली और बेरंग जीवन होता होगा उनका फिर तो, नहीं?"
"मुझे देखकर लगता है मेरी ज़िन्दगी रंगहीन होगी?"
"मतलब तुम्हारा दिल कभी नहीं डूबता? तुम्हें कभी कोई खलिश नहीं लगती? नोस्टालजिया... नोस्टालजिया जैसी फीलिंग को महसूस किया है कभी?"
"अरे बाप रे। अब नोस्टालजिया को महसूस करना कैसा होता है?"
"मतलब किसी ख़ुशबू से कोई उलझन? किसी गाने से जुडी कोई याद? कोई कविता? कोई मौसम? कोई फूल? कोई रंग? जिसे देखकर याद आए कुछ?"
"कभी सोचा नहीं इस तरह।"
"अब मुझे देख लो। यहां कॉफी खत्म हो रही है, घड़ी ग्यारह बजा रही है और मैं इस सफ़र के ख़त्म हो जाने को लेकर परेशान हूं। रुलाई आ रही है कि गया... ये लम्हा तो गया हाथ से। रात में सोचूंगी, रोऊंगी। कल सुबह सोचूंगी, रोऊंगी। फिर ऐसी कोई दोपहर आएगी, पलाश का मौसम आएगा, कॉफी का ऐसा स्वाद आएगा होठों पर तब सोचूंगी और मन उदास हो जाएगा।
"एक्जैक्टली। गया ये लम्हा तो हाथ से। क्या खूब होता कि जी लिया होता इसको इतना सोचने की बजाए।"
"हैलो? मेरे जीने का तरीका यही है।"
"तो भुगतो फिर। दे पेरेनियल परेशान आत्मा, तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता।"
"तुम्हारा भी नहीं। तुममें तो फीलिंग्स ही नहीं कोई। लूज़र।"
"एक मिनट। ये फीलिंग को कैसे डिफाईन करती हो, ज़रा सुनें..."
"फीलिंग मतलब कसक, मन में कोई गांठ बंधी हो जैसे। प्यार के खो जाने का डर हो जैसे। बेइंतहा खुशी का इंतज़ार हो, और रातें उसी इंतज़ार में कट जाए। किसी को देखकर हंसना आए, किसी को देखकर रोना। किसी को बेवजह गले लगाने की इच्छा हो, किसी की गर्दन दबा देना चाहें जैसे। फीलिंग्स मतलब कुछ ना कुछ ऐसा जो दौड़ता रहे रगों में। वरना ज़िन्दगी कितनी बेमानी हो जाएगी, नहीं?"
लड़के ने कुछ कहा नहीं। लड़की ने उसकी ओर देखा और फिर बिना बात को आगे बढ़ाए कान में वॉकमैन के ईयरप्लग्स लगा लिए। ट्रेन चलती रही, रास्ता कटता रहा। वैसे बहुत दिनों तक फीलिंग्स की उस परिभाषा का मज़ाक बनाता रहा - कभी फोन पर, कभी ई-मेल पर, कभी सामने, कभी पीछे।
सुनो लड़के, इतने सालों बाद भी नहीं बदली फीलिंग्स लड़की की। उसे अब भी वैसी ही घबराहट होती है, दिल डूबता है हर दूसरे दिन। बदलाव से डरती है अब भी, दोस्तों को खोना नहीं चाहती, डूबती हुई शामें उदास करती है तब भी जब वो दो बच्चों की मां है। तब भी जब उसने पार की है कई अड़चनें, हासिल किए हैं कई नामुमकिन मुकाम। उसे अब भी दिन के थोड़ा और रौशन हो जाने का इंतज़ार है। उसे अब भी यकीं है कि सितारों से आगे जहां और भी है...
अब भी ईयरप्लग्स लगाकर सुनती है गाने। तुम मत सुनना। तुम्हारे टाईप का नहीं है।
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सोमवार, 2 अप्रैल 2012
बुधवार, 21 मार्च 2012
ज़िन्दगी से वादा तो नहीं था
उससे बातें करने में डर लगता है कभी-कभी। किसी की निगाहें आर-पार देख पाती होंगी, ऐसा उसकी कोमल, तरल आंखों को देखकर लगता है। उसके सामने छुपाना मुश्किल, बताना मुश्किल। वो डॉक्टर ठहरी। पहले मर्ज़ के लक्षण पूछेगी, फिर नब्ज़ टटोलेगी, दिल का हाल बिना स्टेथोस्कोप के समझ जाएगी और रगों में दौड़ते लहू के प्रेशर का अंदाज़ा मेरे चेहरे का रंग देखकर पता कर लेगी। उसके बेलौस, बेबाक सवाल मुझे परेशान करते हैं। छुपाओ तो मुश्किल, बताओ तो आफ़त।
"क्या हुआ है तुझे, कोई मन का रोग है?" गुस्से में होती है तो उसकी पंजाबियत लहज़े में उतर ही आती है।
"मन के ही रोग तो होते हैं सारे। तुम तो डॉक्टर हो, साइकोसोमैटिक डिसॉडर के बारे में तुमसे बेहतर कौन जानेगा?"
"सायकियाट्रिस्ट, क्योंकि तेरा दिमाग खराब हो गया है।"
"दिमाग खराब नहीं, दुरुस्त हुआ है अब तो। पहले बेसबब गुज़र जाया करते थे दिन, अब उन्हें थामकर रखना चाहती हूं। अब होश में आई हूं कि ज़िन्दगी गुज़रती जा रही है और सपनों की टोकरी में से जादूगर ने खरगोश तो निकाले ही नहीं, रंग-बिरंगे प्लास्टिक के फूलों का गुलदस्ता हाथ में थामा नहीं, सिर पर लटकती छतरी ने रंग बदले नहीं। तो फिर ये कैसी माया थी? कैसा जादू था?"
"किसने सिखाया था कि ख़्वाबों में जादुई दुनिया बुनते रहो?"
"जाने किसने। बचपन से ही ऐसी हूं।"
"हम सब बुनते हैं जादू की दुनिया। हम सबको रंगों के बाज़ार से प्यार होता है। देख तो सही, आस-पास सब जादू ही तो है।"
"हां है ना। लेकिन मन बहलता क्यों नहीं?"
"चल उम्र के पहिए को उलटा घुमाते हैं। दस साल पीछे गए तो क्या-क्या बदलेगी तू?"
"कुछ भी नहीं। सब वैसा का वैसा ही चाहिए। मैंने ये कब कहा कि मुझे कोई शिकायत है ज़िन्दगी से?"
"शिकायत ना सही, मोहब्बत ही सही। लेकिन देख ना, हर हाल में तो हम जी ही लिया करते हैं, वक्त कट ही जाता है, साल निकल ही जाते हैं।"
"वही तो। दिन, महीने, साल तो निकल ही जाया करते हैं। मंथरचाल चलते इन लम्हों का बोझ नहीं ढोया जाता।"
"लम्हे नहीं कटते?"
"हां।"
"लम्हे ही भारी पड़ते हैं?"
"शायद।"
"फिर तो तुझे कोई परेशानी नहीं। धीरे-धीरे खिसकते लम्हों में जीना कितना आसान होता होगा। मुझे तो वक्त के तेज़ी से भागने का डर लगा रहता है।"
"अच्छा? डॉक्टर को भी डर लगता है?"
"क्यों नहीं लग सकता?"
"नहीं, मुझे लगता था डॉक्टर बड़े ज़हीन होते हैं, बड़े समझदार। उन्हें दर्द की समझ होती है, इलाज का शऊर होता है।"
"डॉक्टरों को अपना इलाज करना नहीं आता। तुझ जैसे मरीजों के मर्ज की भी कोई दवा नहीं उनके पास।"
"फिर? मैं और तुम एक ही नाव पर? हम ऐसे ही मर जाएंगे एक दिन, किसी भलमानस चारागर के इंतज़ार में?"
"ना, हम ऐसे ही जिए जाएंगे एक-एक दिन। ऐसे ही जादू भरे ख़्वाब देखते हुए। किसी को चारागरी नहीं आती, यहां कोई मसीहा नहीं बैठा।"
"ऐसा ना कहो मेरी जान। दिल डूबा जाता है।"
"तो संभालो उसको। आधी गुज़र गई और जो आधी बची है, उसे जीने का इंतज़ाम करो कोई। आउट ऑफ द बॉक्स करो कुछ, कुछ वाइल्ड, कुछ ऐसा कि मरते वक्त अफ़सोस ना बचे कोई।"
"मैं भाग जाना चाहती हूं। किसी ऐसी ट्रेन में बैठकर जिसकी मंज़िल का पता ना हो, जिसके स्टेशन्स पर लगे पतों की भाषा मुझे पढ़नी ना आए, जहां कोई मुझे जानता ना हो।"
"बैड आईडिया। तुझे अपने शहर की पगली की कहानी सुनाऊंगी कभी। फिलहाल कुछ और सोच।"
"फ्लिंग। लेट्स हैव अ फ्लिंग।"
"इवेन वर्स। कुल्हाड़ी पर जाकर पैर मारने की बात ना कर। कुछ और सोच।"
"नहीं सूझता। कुछ नहीं सूझता।"
"यू आर अ क्रिएटिव पर्सन। लुक फॉर ए क्रिएटिव सोल्यूशन।"
"माने?"
"माने अपने लिए तिलस्म रच। माया की एक दुनिया। ऑल्टर इगो तलाश कर। अपने नेमेसिस ढूंढ के ला। किरदारों में उन्हें रख और आउट ऑफ द बॉक्स एक ऐसी दुनिया रच जहां तू नहीं, लेकिन वो तेरी अपनी है। उस दुनिया में अपने प्यार के लिए अपनी शर्तें चुन। अपने दुखों पर छाती पीटने के अपने तरीकों का इजाद कर। अपने आंसुओं को जगह दे, लोट-पोट कर हंस और ऐसे जी कि जैसे कभी ना जिया हो कहीं। लुक एट वॉट पावर यू हैव गॉट वूमैन।"
"ये लो कर लो बात। कहां तो मैं जादू की दुनिया से निकलकर रियल वर्ल्ड में जीने की बात कर रही हूं, कहां तो तुम मुझे अंधेरे कुंए में ढकेल रही हो।"
"अंधेरे में ही दिखेगी रोशनी। जहां हम और तुम बैठे हैं वहां सब धुंधला-धुंधला है, ना उजला ना स्याह, ना शाम ना सुबह। अंधेरे में जाने की हिम्मत कर। वहीं से ख़ज़ाना हाथ आएगा।"
"ये क्या था? हमारे बीच ये कैसी बातचीत थी?"
"काउंसिलिंग सेशन था। बहुत सारा वक्त है, बहुत सारे लम्हे हैं। उनका कुछ तो हासिल हो।"
"तब भी जब ज़िन्दगी से ऐसा कोई वादा नहीं था?"
"तब भी जब ज़िन्दगी से ऐसा कोई वादा नहीं था?"
"और मायूसियों से शामें भरने का था?"
"नहीं था। ज़िन्दगी से कोई वादा नहीं था।"
"देन यू पुल थ्रू, गर्ल।"
"क्या हुआ है तुझे, कोई मन का रोग है?" गुस्से में होती है तो उसकी पंजाबियत लहज़े में उतर ही आती है।
"मन के ही रोग तो होते हैं सारे। तुम तो डॉक्टर हो, साइकोसोमैटिक डिसॉडर के बारे में तुमसे बेहतर कौन जानेगा?"
"सायकियाट्रिस्ट, क्योंकि तेरा दिमाग खराब हो गया है।"
"दिमाग खराब नहीं, दुरुस्त हुआ है अब तो। पहले बेसबब गुज़र जाया करते थे दिन, अब उन्हें थामकर रखना चाहती हूं। अब होश में आई हूं कि ज़िन्दगी गुज़रती जा रही है और सपनों की टोकरी में से जादूगर ने खरगोश तो निकाले ही नहीं, रंग-बिरंगे प्लास्टिक के फूलों का गुलदस्ता हाथ में थामा नहीं, सिर पर लटकती छतरी ने रंग बदले नहीं। तो फिर ये कैसी माया थी? कैसा जादू था?"
"किसने सिखाया था कि ख़्वाबों में जादुई दुनिया बुनते रहो?"
"जाने किसने। बचपन से ही ऐसी हूं।"
"हम सब बुनते हैं जादू की दुनिया। हम सबको रंगों के बाज़ार से प्यार होता है। देख तो सही, आस-पास सब जादू ही तो है।"
"हां है ना। लेकिन मन बहलता क्यों नहीं?"
"चल उम्र के पहिए को उलटा घुमाते हैं। दस साल पीछे गए तो क्या-क्या बदलेगी तू?"
"कुछ भी नहीं। सब वैसा का वैसा ही चाहिए। मैंने ये कब कहा कि मुझे कोई शिकायत है ज़िन्दगी से?"
"शिकायत ना सही, मोहब्बत ही सही। लेकिन देख ना, हर हाल में तो हम जी ही लिया करते हैं, वक्त कट ही जाता है, साल निकल ही जाते हैं।"
"वही तो। दिन, महीने, साल तो निकल ही जाया करते हैं। मंथरचाल चलते इन लम्हों का बोझ नहीं ढोया जाता।"
"लम्हे नहीं कटते?"
"हां।"
"लम्हे ही भारी पड़ते हैं?"
"शायद।"
"फिर तो तुझे कोई परेशानी नहीं। धीरे-धीरे खिसकते लम्हों में जीना कितना आसान होता होगा। मुझे तो वक्त के तेज़ी से भागने का डर लगा रहता है।"
"अच्छा? डॉक्टर को भी डर लगता है?"
"क्यों नहीं लग सकता?"
"नहीं, मुझे लगता था डॉक्टर बड़े ज़हीन होते हैं, बड़े समझदार। उन्हें दर्द की समझ होती है, इलाज का शऊर होता है।"
"डॉक्टरों को अपना इलाज करना नहीं आता। तुझ जैसे मरीजों के मर्ज की भी कोई दवा नहीं उनके पास।"
"फिर? मैं और तुम एक ही नाव पर? हम ऐसे ही मर जाएंगे एक दिन, किसी भलमानस चारागर के इंतज़ार में?"
"ना, हम ऐसे ही जिए जाएंगे एक-एक दिन। ऐसे ही जादू भरे ख़्वाब देखते हुए। किसी को चारागरी नहीं आती, यहां कोई मसीहा नहीं बैठा।"
"ऐसा ना कहो मेरी जान। दिल डूबा जाता है।"
"तो संभालो उसको। आधी गुज़र गई और जो आधी बची है, उसे जीने का इंतज़ाम करो कोई। आउट ऑफ द बॉक्स करो कुछ, कुछ वाइल्ड, कुछ ऐसा कि मरते वक्त अफ़सोस ना बचे कोई।"
"मैं भाग जाना चाहती हूं। किसी ऐसी ट्रेन में बैठकर जिसकी मंज़िल का पता ना हो, जिसके स्टेशन्स पर लगे पतों की भाषा मुझे पढ़नी ना आए, जहां कोई मुझे जानता ना हो।"
"बैड आईडिया। तुझे अपने शहर की पगली की कहानी सुनाऊंगी कभी। फिलहाल कुछ और सोच।"
"फ्लिंग। लेट्स हैव अ फ्लिंग।"
"इवेन वर्स। कुल्हाड़ी पर जाकर पैर मारने की बात ना कर। कुछ और सोच।"
"नहीं सूझता। कुछ नहीं सूझता।"
"यू आर अ क्रिएटिव पर्सन। लुक फॉर ए क्रिएटिव सोल्यूशन।"
"माने?"
"माने अपने लिए तिलस्म रच। माया की एक दुनिया। ऑल्टर इगो तलाश कर। अपने नेमेसिस ढूंढ के ला। किरदारों में उन्हें रख और आउट ऑफ द बॉक्स एक ऐसी दुनिया रच जहां तू नहीं, लेकिन वो तेरी अपनी है। उस दुनिया में अपने प्यार के लिए अपनी शर्तें चुन। अपने दुखों पर छाती पीटने के अपने तरीकों का इजाद कर। अपने आंसुओं को जगह दे, लोट-पोट कर हंस और ऐसे जी कि जैसे कभी ना जिया हो कहीं। लुक एट वॉट पावर यू हैव गॉट वूमैन।"
"ये लो कर लो बात। कहां तो मैं जादू की दुनिया से निकलकर रियल वर्ल्ड में जीने की बात कर रही हूं, कहां तो तुम मुझे अंधेरे कुंए में ढकेल रही हो।"
"अंधेरे में ही दिखेगी रोशनी। जहां हम और तुम बैठे हैं वहां सब धुंधला-धुंधला है, ना उजला ना स्याह, ना शाम ना सुबह। अंधेरे में जाने की हिम्मत कर। वहीं से ख़ज़ाना हाथ आएगा।"
"ये क्या था? हमारे बीच ये कैसी बातचीत थी?"
"काउंसिलिंग सेशन था। बहुत सारा वक्त है, बहुत सारे लम्हे हैं। उनका कुछ तो हासिल हो।"
"तब भी जब ज़िन्दगी से ऐसा कोई वादा नहीं था?"
"तब भी जब ज़िन्दगी से ऐसा कोई वादा नहीं था?"
"और मायूसियों से शामें भरने का था?"
"नहीं था। ज़िन्दगी से कोई वादा नहीं था।"
"देन यू पुल थ्रू, गर्ल।"
रविवार, 8 जनवरी 2012
प्लीज़ डू नॉट डिस्टर्ब
"तू रोज़ इधर ही सोता है?"
ये पहला सवाल तो नहीं हो सकता जो कोई किसी से पूछता हो। लेकिन ये मुंबई है और यहां इतना वक्त नहीं कि लंबी-चौड़ी भूमिका के साथ कोई बातचीत शुरू की जाए।
स्टूडियो के रिसेप्शन पर कोने में लगे लाल रंग के सोफे पर करीब-करीब पसरती हुई रोहिणी ने अपनी आंखें बंद कर लीं, बिना जवाब का इंतज़ार किए। रोहित को सूझा नहीं कि क्या कहे। तंग जीन्स और आधी कटी बाजू वाली टॉप से झांकती रोहिणी की उम्र की ओर ठीक से ताका भी नहीं जा रहा था। बॉस ने उसे नाइट शिफ्ट लगाने की हिदायत दी थी, मंगल-बुध की डबल छुट्टी के वादे के साथ। वादा पूरा होना ना था, लेकिन स्टूडियो में रुके रहने का कोई मौका वो खोना नहीं चाहता था। एक तो जुलाई की उमस भरी गर्मी से निजात और दूसरा, नाइट शिफ्ट की आदत तो उसे पड़नी ही चाहिए। दो साल में एसिस्टेंट एडिटर बन जाना है और पांच साल में एडिटर। बिना दिन-रात स्टूडियो में मेहनत किए ये मुमकिन ना था।
"तू जाग रहा है अबतक?" रोहिणी फिर जाग गई थी। "मेरा एडिटर तो सो गया रे। अपन के पास कोई काम भी नहीं। चल लोखंडवाला क्रॉसिंग से और सिगरेट लेकर आते हैं।"
रोहित की नज़रें अपनेआप दूर दीवार पर टिक-टिक करती चौकोर घड़ी की ओर घूम गईं।
"नया है क्या इधर? जानता नहीं, इधर रात नहीं होती? तेरे को डर लगता है तो मैं लेकर आती है। तू इधर ही बैठ, डरपोक कहीं का। मेरा एडिटर उठ जाए तो उसको बोलना मैं पंद्रह मिनट में आएगी।"
"नहीं मैम, मैं चलता हूं ना साथ में। आप अकेले ऐसे कैसे जाएंगी?"
"तू कोई सलमान खान है जो मेरा बॉडीगार्ड बनेगा?"
"नहीं मैम।"
"कुछ खाया कि ऐसे ही पड़ा है इधर? ढाई बज रहे हैं। भूख लगी हो तो नीचे वटाटा-पाव भी मिलेगा।"
"खाया मैम।"
"ऊपर जाकर उस घोड़े को बोलकर आ, हम दस मिनट में लौटेंगे। ये फालतू में नाईट लगाते हैं हम। काम तो होता नहीं कुछ, स्साली नींद की भी वाट लगती है।"
"जी।"
"तू क्या सीधा लखनऊ से आया इधर? ऐसे बात करेगा तो इधर सब तेरा कीमा बनाकर डीप फ्रीज़र में डाल देंगे और टाईम टाईम पर स्वाद ले-लेकर खाएंगे। चल अब, बोलकर आ ऊपर। फिर हम तफ़री मारकर आते हैं थोड़ी।" रोहिणी फिर सोफे पर लुढ़क गई थी।
सीढ़ियों से चढ़ते हुए उसने रोहिणी की ओर देखा, इतनी रात गए वाकई ये बाहर जाएगी? एडिटर अस्तबल के सारे घोड़े बेचने में लगा था। बोलियां ऐसी लग रही थीं कि खर्राटों की आवाज़ साउंडप्रूफ रूम के बाहर तक सुनाई दे। एफसीपी पर टाईमलाईन सुस्त लेटी पड़ी थी, जैसे उसे भी सिंकारा की ज़रूरत हो, या फिर शायद स्मोक की। ये फिल्म स्मोक पर जाएगी, ऐसा बॉस कल ही बोल रहे थे। ज़रूरत भी है, पहला ही शॉट कितना डल है। उसने टाईमलाईन को प्ले करके देखा। अभी तो चार सीन्स भी एडिट नहीं हुए थे कल के बाद। ये नाईट लगाकर करते क्या हैं आखिर? इतना टाईम एक सीन एडिट करने में लगता है? शॉट्स की बेतरतीबी देखकर वो कुछ देर उन्हें करीने से सजाने के लिए मचलता रहा, फिर किसी के काम में दखलअंदाज़ी ना करने की बॉस की हिदायत को याद करके वो वापस एक किनारे खड़ा हो गया। देर तक खड़े रहने के बाद भी वो तय नहीं कर पाया कि एडिटर को जगाए या वापस लौट जाए। वैसे स्टूडियो की चाभी निकाल कर बाहर से लॉक करने का भी एक विकल्प था। जो एडिटर उठ भी गया तो रोहिणी को फोन तो करेगा ही। वैसे उसकी नींद देखकर लगता नहीं था कि अगले दो घंटे गहरे शोरवाली सांसों को छोड़कर उसका बदन कोई और हरकत भी करता। जो यमराज भी आते तो डरकर लौट जाते।
स्टूडियो को बंद करके रोहित रोहिणी के पीछे-पीछे चलता रहा। एक तो सिगरेट के धुंए से परेशानी होती, फिर उसके साथ चलते हुए बातचीत करने की अतिरिक्त सज़ा कौन भुगतता। चौथे माले से सीढ़ियों से उतरकर दोनों लोखंडवाला क्रॉसिंग की ओर मु़ड़ते, उससे पहले रोहिणी सड़क के किनारे फुटपाथ पर बैठ गई। रोहित खड़ा रहा और उसके शरीर की हरकतों को अनिश्चित आंखों से पढ़ता रहा। पहले रोहिणी ने दाहिने हाथ से बाईं ओर का स्लीव खींचकर कंधे तक चढ़ाया, फिर बाएं हथेली में रखे सिगरेट के डिब्बे को देर तक देखती रही। दाहिने हाथ की उंगलियों से एक सिगरेट निकाला, डिब्बे पर उसे तीन बार ठोंका, जीन्स की जेब में हाथ डालकर लाइटर निकाली और एक गहरे कश के साथ सिगरेट जलाकर वापस बैठ गई... सिगरेट कम फूंकती हुई, किसी गहरे ख़्याल में डूबी हुई।
"तू कहां से आया रे इधर?" रोहिणी के अप्रत्याशित सवाल से रोहित की तंद्रा टूटी और वो घबराकर वापस सड़क की ओर देखने लगा।
"मैं पूछ रही हूं कि तू आया किधर से। बंबई का तो नहीं लगता।"
"जी, इलाहाबाद से।"
"भागकर आया?"
"जी? जी नहीं।"
"फिर लड़कर आया होगा।"
रोहित ने नज़रें झुका ली।
"अरे इसमें गिल्टी फील करने का क्या है। बंबई भागकर आओ तभी लाईफ बनती है इधर। सिगरेट पिएगा?"
रोहित ने सिर हिलाकर मना कर दिया। कोई लत लगे, इसके लिए चंद लम्हे बहुत होते हैं। खुद को बुरी आदतों से बचाया रखा जा सके, इसके लिए पूरी ज़िन्दगी भी कम पड़ जाती है।
"मैं भी भागकर आई। ज्यादा दूर से नहीं। इधर ही, रतलाम से। वेस्टर्न रेलवे की सीधी ट्रेन आती थी इधर। आई थी हीरोइन बनने, और देख क्या बन गई।"
"वैसे दीदी, आप करती क्या हैं?"
"तूने तो दस मिनट में रिश्ता भी बना लिया। बड़ी तेज़ चीज़ है। खाली रिश्ते गलत बनाता है," रोहिणी की बात सुनकर रोहित झेंप गया और दो कदम पीछे हटकर वापस सड़क किनारे पेट्रोल पंप पर खड़ी गाड़ियों के मॉडल पहचानने की कोशिश करने लगा।
"गर्लफ्रेंड है?"
"जी?"
"गर्लफ्रेंड? उधर इलाहाबाद में?"
"जी। है।"
"गुड। जीने की वजह है तेरे पास फिर तो। क्या पूछा तूने, क्या करती हूं? पूछ क्या नहीं करती।"
"जी?"
"सब स्साले कंगना रनाउत की किस्मत लेकर थोड़े आते हैं इधर? मैं देखने में कैसी लगती हूं रे?"
"जी?"
"एच... आई... जे... के... अंग्रेज़ी इतनी ही आती है तुझको?"
"जी नहीं। जी, मतलब... इससे ज्यादा आती है।"
"तो अंग्रेज़ी में बोल, कैसी दिखती हूं मैं?"
"जी, ब्यूटीफुल।"
"बस? दो-चार वर्ड और गिरा मार्केट में।"
"प्रीटी... अम्म... लवली... अम्म..."
"अबे, सेक्सी बोल सेक्सी। शर्म आती है बोलने में? बोल, सेक्सी दिखती हूं, बॉम टाईप।"
"जी, वही।"
"तेरा कुछ नहीं हो सकता। गर्लफ्रेंड को कैसे पटाया रे?"
"वो तो अपने आप प्यार हो गया," लतिका का सोचकर रोहित अपने आप मुस्कुराने लगता था।
रोहिणी के ठहाके ने उसे फिर एक बार लिंक रोड की सख़्त सड़क पर पटक दिया।
"नया मुर्गा है। तेरे हलाल होने में टाईम लगेगा अभी। एनीवे, मैं इधर हीरोईन बनने को आई लेकिन अब जो करा ले, सब करती हूं। प्री प्रोडक्शन, पोस्ट प्रोडक्शन, प्रोडक्शन कंट्रोल और ज़रूरत पड़ी तो कास्टिंग काउच की सेटिंग भी। ये प्रोडक्शन वालों ने इतना बेवकूफ बनाया कि सोच लिया, प्रोडक्शन करूंगी और सबकी मां-बहन करूंगी। अब पूरा बदला लेती हूं। तू मेरी गालियों से डरता तो नहीं?"
"जी नहीं। हमारे यहां भी बोलते हैं लोग ये सब। हमारे घर में अच्छा नहीं मानते।"
"मेरे यहां भी नहीं मानते थे। घर छोड़ा तो तमीज़ भी छोड़ आई। तू भी स्साला सुधर जाएगा। चल अभी, तेरे को बरिस्ता में कॉफी पिलाती है।"
"जी, मैं कॉफी नहीं पीता।"
"तो ज़िन्दगी में करता क्या है, प्यार करने के अलावा?"
"एडिटिंग सीख रहा हूं।"
"सीख ले। फिर बताना। काम दिलाऊंगी तेरे को। बिना किसी फेवर के। तू अच्छा लगा मुझे।"
"अभी तो टाईम लगेगा। बेसिक्स पर हाथ साफ कर रहा हूं।"
"कॉन्फिडेंस से बोल, सब कर लूंगा। तब काम मिलेगा। मेरे एडिटर को नहीं देखा? स्साला एक शॉट अपनी अक्ल से नहीं लगाता। छोड़ दो तो दो शिफ्ट की एडिट में पंद्रह दिन लगाएगा। माथे पर चढ़कर काम कराती हूं। कमबख्त शक्ल अच्छी है उसकी, वरना रात में नींद खराब करने का कोई और मतलब ही नहीं बनता था।"
"जी?"
"जी क्या? नहीं जानता वो मेरा नया बॉयफ्रेंड है? प्रोडक्शनवालों को एडिट पर बैठे देखा कभी? तूझे वाकई टाईम लगेगा। तेरे तो बेसिक्स भी क्लियर नहीं रे।"
बॉयफ्रेंड की बात सुनकर रोहित के कानों में दमदार खर्राटों की आवाज़ लौट आई थी। वो अब ऐसे गहरे सदमे में था कि उसकी ज़ुबान तालू से चिपक गई थी शायद और उसकी आंखों के आगे एडिट सुईट के बाहर लटकता 'प्लीज़ डू नॉट डिस्टर्ब' का बोर्ड झूल गया था।
ये पहला सवाल तो नहीं हो सकता जो कोई किसी से पूछता हो। लेकिन ये मुंबई है और यहां इतना वक्त नहीं कि लंबी-चौड़ी भूमिका के साथ कोई बातचीत शुरू की जाए।
स्टूडियो के रिसेप्शन पर कोने में लगे लाल रंग के सोफे पर करीब-करीब पसरती हुई रोहिणी ने अपनी आंखें बंद कर लीं, बिना जवाब का इंतज़ार किए। रोहित को सूझा नहीं कि क्या कहे। तंग जीन्स और आधी कटी बाजू वाली टॉप से झांकती रोहिणी की उम्र की ओर ठीक से ताका भी नहीं जा रहा था। बॉस ने उसे नाइट शिफ्ट लगाने की हिदायत दी थी, मंगल-बुध की डबल छुट्टी के वादे के साथ। वादा पूरा होना ना था, लेकिन स्टूडियो में रुके रहने का कोई मौका वो खोना नहीं चाहता था। एक तो जुलाई की उमस भरी गर्मी से निजात और दूसरा, नाइट शिफ्ट की आदत तो उसे पड़नी ही चाहिए। दो साल में एसिस्टेंट एडिटर बन जाना है और पांच साल में एडिटर। बिना दिन-रात स्टूडियो में मेहनत किए ये मुमकिन ना था।
"तू जाग रहा है अबतक?" रोहिणी फिर जाग गई थी। "मेरा एडिटर तो सो गया रे। अपन के पास कोई काम भी नहीं। चल लोखंडवाला क्रॉसिंग से और सिगरेट लेकर आते हैं।"
रोहित की नज़रें अपनेआप दूर दीवार पर टिक-टिक करती चौकोर घड़ी की ओर घूम गईं।
"नया है क्या इधर? जानता नहीं, इधर रात नहीं होती? तेरे को डर लगता है तो मैं लेकर आती है। तू इधर ही बैठ, डरपोक कहीं का। मेरा एडिटर उठ जाए तो उसको बोलना मैं पंद्रह मिनट में आएगी।"
"नहीं मैम, मैं चलता हूं ना साथ में। आप अकेले ऐसे कैसे जाएंगी?"
"तू कोई सलमान खान है जो मेरा बॉडीगार्ड बनेगा?"
"नहीं मैम।"
"कुछ खाया कि ऐसे ही पड़ा है इधर? ढाई बज रहे हैं। भूख लगी हो तो नीचे वटाटा-पाव भी मिलेगा।"
"खाया मैम।"
"ऊपर जाकर उस घोड़े को बोलकर आ, हम दस मिनट में लौटेंगे। ये फालतू में नाईट लगाते हैं हम। काम तो होता नहीं कुछ, स्साली नींद की भी वाट लगती है।"
"जी।"
"तू क्या सीधा लखनऊ से आया इधर? ऐसे बात करेगा तो इधर सब तेरा कीमा बनाकर डीप फ्रीज़र में डाल देंगे और टाईम टाईम पर स्वाद ले-लेकर खाएंगे। चल अब, बोलकर आ ऊपर। फिर हम तफ़री मारकर आते हैं थोड़ी।" रोहिणी फिर सोफे पर लुढ़क गई थी।
सीढ़ियों से चढ़ते हुए उसने रोहिणी की ओर देखा, इतनी रात गए वाकई ये बाहर जाएगी? एडिटर अस्तबल के सारे घोड़े बेचने में लगा था। बोलियां ऐसी लग रही थीं कि खर्राटों की आवाज़ साउंडप्रूफ रूम के बाहर तक सुनाई दे। एफसीपी पर टाईमलाईन सुस्त लेटी पड़ी थी, जैसे उसे भी सिंकारा की ज़रूरत हो, या फिर शायद स्मोक की। ये फिल्म स्मोक पर जाएगी, ऐसा बॉस कल ही बोल रहे थे। ज़रूरत भी है, पहला ही शॉट कितना डल है। उसने टाईमलाईन को प्ले करके देखा। अभी तो चार सीन्स भी एडिट नहीं हुए थे कल के बाद। ये नाईट लगाकर करते क्या हैं आखिर? इतना टाईम एक सीन एडिट करने में लगता है? शॉट्स की बेतरतीबी देखकर वो कुछ देर उन्हें करीने से सजाने के लिए मचलता रहा, फिर किसी के काम में दखलअंदाज़ी ना करने की बॉस की हिदायत को याद करके वो वापस एक किनारे खड़ा हो गया। देर तक खड़े रहने के बाद भी वो तय नहीं कर पाया कि एडिटर को जगाए या वापस लौट जाए। वैसे स्टूडियो की चाभी निकाल कर बाहर से लॉक करने का भी एक विकल्प था। जो एडिटर उठ भी गया तो रोहिणी को फोन तो करेगा ही। वैसे उसकी नींद देखकर लगता नहीं था कि अगले दो घंटे गहरे शोरवाली सांसों को छोड़कर उसका बदन कोई और हरकत भी करता। जो यमराज भी आते तो डरकर लौट जाते।
स्टूडियो को बंद करके रोहित रोहिणी के पीछे-पीछे चलता रहा। एक तो सिगरेट के धुंए से परेशानी होती, फिर उसके साथ चलते हुए बातचीत करने की अतिरिक्त सज़ा कौन भुगतता। चौथे माले से सीढ़ियों से उतरकर दोनों लोखंडवाला क्रॉसिंग की ओर मु़ड़ते, उससे पहले रोहिणी सड़क के किनारे फुटपाथ पर बैठ गई। रोहित खड़ा रहा और उसके शरीर की हरकतों को अनिश्चित आंखों से पढ़ता रहा। पहले रोहिणी ने दाहिने हाथ से बाईं ओर का स्लीव खींचकर कंधे तक चढ़ाया, फिर बाएं हथेली में रखे सिगरेट के डिब्बे को देर तक देखती रही। दाहिने हाथ की उंगलियों से एक सिगरेट निकाला, डिब्बे पर उसे तीन बार ठोंका, जीन्स की जेब में हाथ डालकर लाइटर निकाली और एक गहरे कश के साथ सिगरेट जलाकर वापस बैठ गई... सिगरेट कम फूंकती हुई, किसी गहरे ख़्याल में डूबी हुई।
"तू कहां से आया रे इधर?" रोहिणी के अप्रत्याशित सवाल से रोहित की तंद्रा टूटी और वो घबराकर वापस सड़क की ओर देखने लगा।
"मैं पूछ रही हूं कि तू आया किधर से। बंबई का तो नहीं लगता।"
"जी, इलाहाबाद से।"
"भागकर आया?"
"जी? जी नहीं।"
"फिर लड़कर आया होगा।"
रोहित ने नज़रें झुका ली।
"अरे इसमें गिल्टी फील करने का क्या है। बंबई भागकर आओ तभी लाईफ बनती है इधर। सिगरेट पिएगा?"
रोहित ने सिर हिलाकर मना कर दिया। कोई लत लगे, इसके लिए चंद लम्हे बहुत होते हैं। खुद को बुरी आदतों से बचाया रखा जा सके, इसके लिए पूरी ज़िन्दगी भी कम पड़ जाती है।
"मैं भी भागकर आई। ज्यादा दूर से नहीं। इधर ही, रतलाम से। वेस्टर्न रेलवे की सीधी ट्रेन आती थी इधर। आई थी हीरोइन बनने, और देख क्या बन गई।"
"वैसे दीदी, आप करती क्या हैं?"
"तूने तो दस मिनट में रिश्ता भी बना लिया। बड़ी तेज़ चीज़ है। खाली रिश्ते गलत बनाता है," रोहिणी की बात सुनकर रोहित झेंप गया और दो कदम पीछे हटकर वापस सड़क किनारे पेट्रोल पंप पर खड़ी गाड़ियों के मॉडल पहचानने की कोशिश करने लगा।
"गर्लफ्रेंड है?"
"जी?"
"गर्लफ्रेंड? उधर इलाहाबाद में?"
"जी। है।"
"गुड। जीने की वजह है तेरे पास फिर तो। क्या पूछा तूने, क्या करती हूं? पूछ क्या नहीं करती।"
"जी?"
"सब स्साले कंगना रनाउत की किस्मत लेकर थोड़े आते हैं इधर? मैं देखने में कैसी लगती हूं रे?"
"जी?"
"एच... आई... जे... के... अंग्रेज़ी इतनी ही आती है तुझको?"
"जी नहीं। जी, मतलब... इससे ज्यादा आती है।"
"तो अंग्रेज़ी में बोल, कैसी दिखती हूं मैं?"
"जी, ब्यूटीफुल।"
"बस? दो-चार वर्ड और गिरा मार्केट में।"
"प्रीटी... अम्म... लवली... अम्म..."
"अबे, सेक्सी बोल सेक्सी। शर्म आती है बोलने में? बोल, सेक्सी दिखती हूं, बॉम टाईप।"
"जी, वही।"
"तेरा कुछ नहीं हो सकता। गर्लफ्रेंड को कैसे पटाया रे?"
"वो तो अपने आप प्यार हो गया," लतिका का सोचकर रोहित अपने आप मुस्कुराने लगता था।
रोहिणी के ठहाके ने उसे फिर एक बार लिंक रोड की सख़्त सड़क पर पटक दिया।
"नया मुर्गा है। तेरे हलाल होने में टाईम लगेगा अभी। एनीवे, मैं इधर हीरोईन बनने को आई लेकिन अब जो करा ले, सब करती हूं। प्री प्रोडक्शन, पोस्ट प्रोडक्शन, प्रोडक्शन कंट्रोल और ज़रूरत पड़ी तो कास्टिंग काउच की सेटिंग भी। ये प्रोडक्शन वालों ने इतना बेवकूफ बनाया कि सोच लिया, प्रोडक्शन करूंगी और सबकी मां-बहन करूंगी। अब पूरा बदला लेती हूं। तू मेरी गालियों से डरता तो नहीं?"
"जी नहीं। हमारे यहां भी बोलते हैं लोग ये सब। हमारे घर में अच्छा नहीं मानते।"
"मेरे यहां भी नहीं मानते थे। घर छोड़ा तो तमीज़ भी छोड़ आई। तू भी स्साला सुधर जाएगा। चल अभी, तेरे को बरिस्ता में कॉफी पिलाती है।"
"जी, मैं कॉफी नहीं पीता।"
"तो ज़िन्दगी में करता क्या है, प्यार करने के अलावा?"
"एडिटिंग सीख रहा हूं।"
"सीख ले। फिर बताना। काम दिलाऊंगी तेरे को। बिना किसी फेवर के। तू अच्छा लगा मुझे।"
"अभी तो टाईम लगेगा। बेसिक्स पर हाथ साफ कर रहा हूं।"
"कॉन्फिडेंस से बोल, सब कर लूंगा। तब काम मिलेगा। मेरे एडिटर को नहीं देखा? स्साला एक शॉट अपनी अक्ल से नहीं लगाता। छोड़ दो तो दो शिफ्ट की एडिट में पंद्रह दिन लगाएगा। माथे पर चढ़कर काम कराती हूं। कमबख्त शक्ल अच्छी है उसकी, वरना रात में नींद खराब करने का कोई और मतलब ही नहीं बनता था।"
"जी?"
"जी क्या? नहीं जानता वो मेरा नया बॉयफ्रेंड है? प्रोडक्शनवालों को एडिट पर बैठे देखा कभी? तूझे वाकई टाईम लगेगा। तेरे तो बेसिक्स भी क्लियर नहीं रे।"
बॉयफ्रेंड की बात सुनकर रोहित के कानों में दमदार खर्राटों की आवाज़ लौट आई थी। वो अब ऐसे गहरे सदमे में था कि उसकी ज़ुबान तालू से चिपक गई थी शायद और उसकी आंखों के आगे एडिट सुईट के बाहर लटकता 'प्लीज़ डू नॉट डिस्टर्ब' का बोर्ड झूल गया था।
शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011
सिगरेट का आख़िरी कश
कमरे का कोना-कोना दुरुस्त कर दिया गया था। केन के लैंपशेड से ठीक उतनी ही रौशनी आ रही थी जितनी उसे पसंद थी - सिर्फ उसी कोने पर बिखरती हुई जहां कांच के एक फूलदान में नर्गिस के फूल बेतरतीबी से डाल दिए गए थे। फूलदान के नीचे मेज़पोश पर गिरती रौशनी में उसने जल्दी से उसपर बिखरे रंग गिन लिए - छह थे। एक रंग छूट गया था। खरीदते हुए उसने ध्यान क्यों नहीं दिया था? तैयार होते हुए लिली ऑफ द वैली
की शीशी देखी, जिसमें दम तोड़ती खुशबुओं की कुछ आखिरी बूंदें थी। कुछ स्थायी नहीं होता। एक दिन ये खुशबू भी अपनी-सी नहीं लगेगी। फ्रिज में पिछली पार्टी की बची हुए बियर की कुछ बोतलें थी जिनका नसीब तय किया जाना था। पार्टी में उसने अपने एक कॉलिग के सामने कहा था कि बियर और घोड़े की लीद की बदबू में कोई ख़ास अंतर नहीं होता। पार्टी में सब बीयर को छोड़कर ब्रीज़र पर भिड़ गए थे और किंगफिशर की ये बोतलें अभी भी वैसी ही पड़ी थीं, लावारिस।
"बालों की कंडिशनिंग में इस्तेमाल कर लेंगे," उसकी रूममेट ने कहा तो उसे सोनमर्ग की घाटियों पर पसरे आर्मी कैंप के अस्तबलों से आती बदबू याद आ गई।
''मिसमैच होगा, तुम्हारे बाल, ये बदबू... सोनमर्ग और कैंप्स की तरह'', और बोतलों में बची बीयर के इस्तेमाल की योजना फिर अनिश्चितकाल के लिए मुल्तवी हो गई।
जाने क्या सोचकर उसने बीयर के दो मग्स और बोतलें डाइनिंग टेबल पर रख दीं। बहुत ठंडी बीयर गले को नुकसान पहुंचाएगी और फिर कल प्राइमटाईम में उसी के शो के लिए कोई वॉयस ओवर करनेवाला नहीं मिलेगा।
रूममेट आज रात देर से आनेवाली थी, क्लायंट पार्टी में एप्पल जूस पर एक लंबी शाम काटने की सज़ा भुगतकर। लड़का कभी एक घंटे से ज्यादा वक्त के लिए नहीं आता था इन दिनों उसके पास। दूरी एक बहाना हो सकता था, लेकिन रोहिणी और जीके की दूरी से उसे ये ज़ेहन की दूरी ज्यादा लगती थी - मार्स और वीनस की दूरी जैसा कुछ। रोहिणी से आने में कम-से-कम डेढ़ घंटे लगते। यानि उसके पास बहुत सारा वक्त था। डिनर
के लिए राजमा-चावल बन सकता था, कपड़ों की अलमारी ठीक की जा सकती थी, रूममेट के किताबों के ख़ज़ाने में से कुछ मोती चुराए जा सकते थे, हर हफ्ते मंगाए जानेवाले न्यूज़वीक का एक आर्टिकल पढ़ कर अख़बारवाले पर अहसान किया जा सकता था... या ये तय किया जा सकता था कि अपने दिशाहीन रिलेशनशिप का क्या किया जाए। ये आख़िरी काम सबसे आसान था, क्योंकि तय करना बिल्कुल मुश्किल नहीं था। छोटे शहर से आई थी, लौटकर चली जाती। वहां सुकून था, कुशन था और पहचान बनाने की कोई जद्दोजेहद नहीं थी। फलां-फलां की बेटी अमुक साहब की बहू होती और पैरों के नीचे छह इंच मोटी गद्देदार लाल कालीन बिछाकर उसका स्वागत किया जाता। वहां कोई लड़ाई नहीं थी, एक आसान रास्ता था। बल्कि ज़िन्दगी भर की आसानी थी।
फिर ये ज़िद किसलिए? क्या बचाए रखना था? हासिल क्या करना था आख़िर?
सिगरेट, सिगरेट हासिल करना था फिलहाल। आदत ना सही, तलब सही। तलब ना सही, ज़रूरत सही। उसने लड़के को फोन करके उसे क्लासिक माइल्ड्स लाने की हिदायत दे दी। लड़के के आने में अब भी एक घंटे का वक्त था। 60 मिनट, 3600 सेकेंड। ज़रूरत इतना लंबा इंतज़ार क्यों करती? सो, उसने नीचे जाकर सिगरेट खरीदने का फ़ैसला किया। लाल रंग के चमकी चप्पलों में चमकते लाल रंग के नाखूनों पर नज़र गई तो रूममेट की एक और ज़िद का जीत जाना याद आया। वो इतनी जल्दी क्यों हार मान लेती है? अब घर जाकर नेलपॉलिश रिमूवर ढूंढने का अलग काम करना होगा। वैसे हर नाखून पर बीस सेकेंड के हिसाब से वक्त लगाया जाए तो 200 सेकेंड कम किए जा सकते हैं। रिमूवर ढूंढने में कम-से-कम 600 सेकेंड।
जीके में लड़कियों को सिगरेट खरीदते देखकर किसी की भौंहें नहीं चढ़ती और यहां सुपरमार्केट में आसानी से एल्कोहोल मिल जाया करता है। सिगरेट भी खरीद ली गई और ग्रीन एप्पल फ्लेवर वाले वोदका की बोतल भी। वो 600 सेकेंड का सौदा भी कर आई थी। वक्त का सौदा इतना भी मुश्किल नहीं होता।
इंटरनेट नहीं था, वरना कोई अच्छी सी कॉकटेल बनाई जा सकती थी। वोदका नीट पिया जा सकता है या नहीं, ये जानने के लिए उसके फिर लड़के को फोन किया। आखिरी ट्रैफिक सिग्नल पर हूं, जवाब में सवाल के जवाब जैसा कुछ नहीं था। नीट सही, ये सोचते हुए उसने एक ग्लास में वोदका डाल ली और क्लासिक माइल्ड्स के डिब्बे से सिगरेट निकाल ली, जलाने के लिए। "तुम्हें सिगरेट पीना कभी नहीं आएगा लड़की," रूममेट का
ताना याद आ गया। बाएं हाथ में सिगरेट थी और दाहिने में माचिस की जलती हुई तीली। ''मुंह में लेकर जलाओ और गहरा कश लो,'' दिमाग में रूममेट का निर्देश फॉलो करती रही और वॉयला! जलती हुए एक सिगरेट उसके हाथ में थी। 240 सेकेंड...
फोन की घंटी बजी। मां थी। 1200 सेकेंड, कम-से-कम। वक्त पर शादी और बच्चे हो जाने चाहिए, लोग बातें बनाते हैं... 200 सेकेंड... मोहल्ले में चिंकी-पिंकी-बिट्टू-गुड़िया की शादियां तय हो गई, लड़कों के खानदान का विवरण और दहेज की तैयारी... 600 सेकेंड... तुम्हारी नालायकी और सिरफिरेपन पर हमले... 600 सेकेंड... यहां तो बोनस था! दरवाज़े की घंटी बजी और फोन से सुबह तक के लिए निजात मिल गया।
"सिगरेट नहीं मिली। गाड़ी नहीं रोक सका कहीं।"
"मुझे मिल गई, पियोगे?"
"ओह! नो थैंक्स।"
''वोदका या बीयर?''
''कुछ ख़ास है?''
"नौकरी की सालगिरह है। अगले पच्चीस साल वहीं टिके रहने का वायदा कर आई हूं।"
''क्या चाहती हो?''
''पूछो क्या नहीं चाहती। जवाब देना आसान होगा।''
''तुम्हें उलझने की बीमारी है?''
''इतने सालों में आज पता चला है?''
''कुछ खाओगी? बाहर चलना है?''
''ग्रीन एप्पल के साथ काला नमक मस्त लगता है।''
''आई गिव अप।''
''बचपन से जानती हूं, तुम लूज़र हो।''
''व्हॉट्स रॉन्ग विथ यू? आई फील लाइक शेकिंग यू अप।''
''यू वोन्ट बिकॉज़ आई डोन्ट परमिट। तुम तो मुझे छूने के लिए इजाज़त मांगते हो।''
''आर यू ड्रंक?''
''देखकर क्या लगता है?''
''लगता है कि कोई फायदा नहीं। हम बेवजह कोशिश कर रहे हैं। मुझे वापस लौट जाना चाहिए।''
''दरवाज़ा तुम्हारे पीछे है। जाते-जाते मुझे सिगरेट की एक और डिब्बी देते जाना। रूममेट को चाहिए हो शायद। हम आधी रात को कहां खोजते फिरेंगे? हां, यू कैन वॉक डाउन टू द मार्केट। गाड़ी नीचे ही रहने दो।''
''यही होता है जब छोटे शहरों से लड़कियां आती हैं दिल्ली पढ़ने। बिगड़ जाती हैं। कुछ तो अपने वैल्युज़ याद रखा करो। यही करने के लिए आई थी यहां?''
''ये अगर तुम्हारा आख़िरी वार था तो खाली गया। अगली कोई कोशिश मत करना।''
''आई गिव अप।''
"ये वोदका लेते जाओ। यू मे नीड इट। सिगरेट भी एक्स्ट्रा खरीद लेना। तुम्हारे सारे गुनाह माफ़ हैं। वैल्युज़ मुझे ही गठरी में बांधकर दी गईं थीं दिल्ली आते हुए। लेते जाओ। मेरे घर वापस कर आना।"
लड़के ने उसकी तरफ बहुत उदास होकर देखा और कहा, 'मुझे क्यों लग रहा है कि तु्म्हें आखिरी बार देख रहा हूं?'
'फिर तो ठीक से देख लो। मैं इतनी खूबसूरत दुबारा नहीं लगूंगी।'
लड़का चला गया। थोड़ी देर बाद वॉचमैन क्लासिक माइल्ड्स के पांच डिब्बे पहुंचा गया था।
रूममेट के इंतज़ार में वो बालकनी में बैठकर एक डिब्बा फूंक चुकी थी। नया डिब्बा उसने रूममेट के आने पर ही खोला।
"मेरी कोशिश कामयाब रही। वो अब वापस नहीं लौटेगा।"
"तुमने ऐसा किया क्यों आखिर?"
''उसे अपने घर पर होना चाहिए, अपने मां-बाप के साथ। ही ओज़ देम हिज़ लाइफ। ही डिडन्ट ओ मी एनीथिंग।"
''तुम उसके साथ भी तो जा सकती थी। प्यार नहीं करती थी उससे?''
'करती थी। करती हूं। इसीलिए तो उसके साथ नहीं गई,' ये कहते हुए उसने सिगरेट का एक आखिरी गहरा कश लिया और उठकर बीयर से बालों की कंडिशनिंग करने के लिए बाथरूम में घुस गई।
की शीशी देखी, जिसमें दम तोड़ती खुशबुओं की कुछ आखिरी बूंदें थी। कुछ स्थायी नहीं होता। एक दिन ये खुशबू भी अपनी-सी नहीं लगेगी। फ्रिज में पिछली पार्टी की बची हुए बियर की कुछ बोतलें थी जिनका नसीब तय किया जाना था। पार्टी में उसने अपने एक कॉलिग के सामने कहा था कि बियर और घोड़े की लीद की बदबू में कोई ख़ास अंतर नहीं होता। पार्टी में सब बीयर को छोड़कर ब्रीज़र पर भिड़ गए थे और किंगफिशर की ये बोतलें अभी भी वैसी ही पड़ी थीं, लावारिस।
"बालों की कंडिशनिंग में इस्तेमाल कर लेंगे," उसकी रूममेट ने कहा तो उसे सोनमर्ग की घाटियों पर पसरे आर्मी कैंप के अस्तबलों से आती बदबू याद आ गई।
''मिसमैच होगा, तुम्हारे बाल, ये बदबू... सोनमर्ग और कैंप्स की तरह'', और बोतलों में बची बीयर के इस्तेमाल की योजना फिर अनिश्चितकाल के लिए मुल्तवी हो गई।
जाने क्या सोचकर उसने बीयर के दो मग्स और बोतलें डाइनिंग टेबल पर रख दीं। बहुत ठंडी बीयर गले को नुकसान पहुंचाएगी और फिर कल प्राइमटाईम में उसी के शो के लिए कोई वॉयस ओवर करनेवाला नहीं मिलेगा।
रूममेट आज रात देर से आनेवाली थी, क्लायंट पार्टी में एप्पल जूस पर एक लंबी शाम काटने की सज़ा भुगतकर। लड़का कभी एक घंटे से ज्यादा वक्त के लिए नहीं आता था इन दिनों उसके पास। दूरी एक बहाना हो सकता था, लेकिन रोहिणी और जीके की दूरी से उसे ये ज़ेहन की दूरी ज्यादा लगती थी - मार्स और वीनस की दूरी जैसा कुछ। रोहिणी से आने में कम-से-कम डेढ़ घंटे लगते। यानि उसके पास बहुत सारा वक्त था। डिनर
के लिए राजमा-चावल बन सकता था, कपड़ों की अलमारी ठीक की जा सकती थी, रूममेट के किताबों के ख़ज़ाने में से कुछ मोती चुराए जा सकते थे, हर हफ्ते मंगाए जानेवाले न्यूज़वीक का एक आर्टिकल पढ़ कर अख़बारवाले पर अहसान किया जा सकता था... या ये तय किया जा सकता था कि अपने दिशाहीन रिलेशनशिप का क्या किया जाए। ये आख़िरी काम सबसे आसान था, क्योंकि तय करना बिल्कुल मुश्किल नहीं था। छोटे शहर से आई थी, लौटकर चली जाती। वहां सुकून था, कुशन था और पहचान बनाने की कोई जद्दोजेहद नहीं थी। फलां-फलां की बेटी अमुक साहब की बहू होती और पैरों के नीचे छह इंच मोटी गद्देदार लाल कालीन बिछाकर उसका स्वागत किया जाता। वहां कोई लड़ाई नहीं थी, एक आसान रास्ता था। बल्कि ज़िन्दगी भर की आसानी थी।
फिर ये ज़िद किसलिए? क्या बचाए रखना था? हासिल क्या करना था आख़िर?
सिगरेट, सिगरेट हासिल करना था फिलहाल। आदत ना सही, तलब सही। तलब ना सही, ज़रूरत सही। उसने लड़के को फोन करके उसे क्लासिक माइल्ड्स लाने की हिदायत दे दी। लड़के के आने में अब भी एक घंटे का वक्त था। 60 मिनट, 3600 सेकेंड। ज़रूरत इतना लंबा इंतज़ार क्यों करती? सो, उसने नीचे जाकर सिगरेट खरीदने का फ़ैसला किया। लाल रंग के चमकी चप्पलों में चमकते लाल रंग के नाखूनों पर नज़र गई तो रूममेट की एक और ज़िद का जीत जाना याद आया। वो इतनी जल्दी क्यों हार मान लेती है? अब घर जाकर नेलपॉलिश रिमूवर ढूंढने का अलग काम करना होगा। वैसे हर नाखून पर बीस सेकेंड के हिसाब से वक्त लगाया जाए तो 200 सेकेंड कम किए जा सकते हैं। रिमूवर ढूंढने में कम-से-कम 600 सेकेंड।
जीके में लड़कियों को सिगरेट खरीदते देखकर किसी की भौंहें नहीं चढ़ती और यहां सुपरमार्केट में आसानी से एल्कोहोल मिल जाया करता है। सिगरेट भी खरीद ली गई और ग्रीन एप्पल फ्लेवर वाले वोदका की बोतल भी। वो 600 सेकेंड का सौदा भी कर आई थी। वक्त का सौदा इतना भी मुश्किल नहीं होता।
इंटरनेट नहीं था, वरना कोई अच्छी सी कॉकटेल बनाई जा सकती थी। वोदका नीट पिया जा सकता है या नहीं, ये जानने के लिए उसके फिर लड़के को फोन किया। आखिरी ट्रैफिक सिग्नल पर हूं, जवाब में सवाल के जवाब जैसा कुछ नहीं था। नीट सही, ये सोचते हुए उसने एक ग्लास में वोदका डाल ली और क्लासिक माइल्ड्स के डिब्बे से सिगरेट निकाल ली, जलाने के लिए। "तुम्हें सिगरेट पीना कभी नहीं आएगा लड़की," रूममेट का
ताना याद आ गया। बाएं हाथ में सिगरेट थी और दाहिने में माचिस की जलती हुई तीली। ''मुंह में लेकर जलाओ और गहरा कश लो,'' दिमाग में रूममेट का निर्देश फॉलो करती रही और वॉयला! जलती हुए एक सिगरेट उसके हाथ में थी। 240 सेकेंड...
फोन की घंटी बजी। मां थी। 1200 सेकेंड, कम-से-कम। वक्त पर शादी और बच्चे हो जाने चाहिए, लोग बातें बनाते हैं... 200 सेकेंड... मोहल्ले में चिंकी-पिंकी-बिट्टू-गुड़िया की शादियां तय हो गई, लड़कों के खानदान का विवरण और दहेज की तैयारी... 600 सेकेंड... तुम्हारी नालायकी और सिरफिरेपन पर हमले... 600 सेकेंड... यहां तो बोनस था! दरवाज़े की घंटी बजी और फोन से सुबह तक के लिए निजात मिल गया।
"सिगरेट नहीं मिली। गाड़ी नहीं रोक सका कहीं।"
"मुझे मिल गई, पियोगे?"
"ओह! नो थैंक्स।"
''वोदका या बीयर?''
''कुछ ख़ास है?''
"नौकरी की सालगिरह है। अगले पच्चीस साल वहीं टिके रहने का वायदा कर आई हूं।"
''क्या चाहती हो?''
''पूछो क्या नहीं चाहती। जवाब देना आसान होगा।''
''तुम्हें उलझने की बीमारी है?''
''इतने सालों में आज पता चला है?''
''कुछ खाओगी? बाहर चलना है?''
''ग्रीन एप्पल के साथ काला नमक मस्त लगता है।''
''आई गिव अप।''
''बचपन से जानती हूं, तुम लूज़र हो।''
''व्हॉट्स रॉन्ग विथ यू? आई फील लाइक शेकिंग यू अप।''
''यू वोन्ट बिकॉज़ आई डोन्ट परमिट। तुम तो मुझे छूने के लिए इजाज़त मांगते हो।''
''आर यू ड्रंक?''
''देखकर क्या लगता है?''
''लगता है कि कोई फायदा नहीं। हम बेवजह कोशिश कर रहे हैं। मुझे वापस लौट जाना चाहिए।''
''दरवाज़ा तुम्हारे पीछे है। जाते-जाते मुझे सिगरेट की एक और डिब्बी देते जाना। रूममेट को चाहिए हो शायद। हम आधी रात को कहां खोजते फिरेंगे? हां, यू कैन वॉक डाउन टू द मार्केट। गाड़ी नीचे ही रहने दो।''
''यही होता है जब छोटे शहरों से लड़कियां आती हैं दिल्ली पढ़ने। बिगड़ जाती हैं। कुछ तो अपने वैल्युज़ याद रखा करो। यही करने के लिए आई थी यहां?''
''ये अगर तुम्हारा आख़िरी वार था तो खाली गया। अगली कोई कोशिश मत करना।''
''आई गिव अप।''
"ये वोदका लेते जाओ। यू मे नीड इट। सिगरेट भी एक्स्ट्रा खरीद लेना। तुम्हारे सारे गुनाह माफ़ हैं। वैल्युज़ मुझे ही गठरी में बांधकर दी गईं थीं दिल्ली आते हुए। लेते जाओ। मेरे घर वापस कर आना।"
लड़के ने उसकी तरफ बहुत उदास होकर देखा और कहा, 'मुझे क्यों लग रहा है कि तु्म्हें आखिरी बार देख रहा हूं?'
'फिर तो ठीक से देख लो। मैं इतनी खूबसूरत दुबारा नहीं लगूंगी।'
लड़का चला गया। थोड़ी देर बाद वॉचमैन क्लासिक माइल्ड्स के पांच डिब्बे पहुंचा गया था।
रूममेट के इंतज़ार में वो बालकनी में बैठकर एक डिब्बा फूंक चुकी थी। नया डिब्बा उसने रूममेट के आने पर ही खोला।
"मेरी कोशिश कामयाब रही। वो अब वापस नहीं लौटेगा।"
"तुमने ऐसा किया क्यों आखिर?"
''उसे अपने घर पर होना चाहिए, अपने मां-बाप के साथ। ही ओज़ देम हिज़ लाइफ। ही डिडन्ट ओ मी एनीथिंग।"
''तुम उसके साथ भी तो जा सकती थी। प्यार नहीं करती थी उससे?''
'करती थी। करती हूं। इसीलिए तो उसके साथ नहीं गई,' ये कहते हुए उसने सिगरेट का एक आखिरी गहरा कश लिया और उठकर बीयर से बालों की कंडिशनिंग करने के लिए बाथरूम में घुस गई।
गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011
प्रायश्चित
मुझे वड़नेरा से ट्रेन में चढ़ना था। अहमदाबाद जाने के लिए यही ट्रेन ठीक थी – पुरी अहमदाबाद एक्सप्रेस। सुबह सात बजे तक पहुंच ही जाऊंगा, दिनभर काम करके शाम की राजधानी लेकर दिल्ली पहुंच जाना मुमकिन हो सकेगा। मैं एक डॉक्युमेंट्री फिल्म की शूटिंग के लिए अमरावती आया था। साथ में कैमरा – डीएसआर 450, हम जैसे कैमरामैनों के लिए वरदान। ज्यादा भारी भी नहीं, और शूट क्वालिटी डीजी बीटा जैसी। मेरे साथ मेरा असिस्टेंट था, विजय।
वड़नेरा पर ट्रेन दो ही मिनट रुकती है, इसलिए विजय को मॉनिटर और ट्राईपॉड की ज़िम्मेदारी सौंप मैं दस मिनट पहले ही बोगी के इंतज़ार में खड़ा हो गया। विजय बैठना चाहता था, लेकिन यहां कैमरामैन यानि बॉस मैं था। पीठ पर बैगपैक, कंधे पर लटकता कैमरा और दोनों हाथों में पानी की बोतलें और बिस्कुट के पैकेट। बगल में स्थानीय अखबार भी दबा लिए थे मैंने। यानि हाथ भी खाली नहीं, दिमाग पर तो ख़ैर बोझ लिए चलते रहने की पुरानी आदत है मेरी।
लेकिन विजय पूरी तरह सफ़र का आनंद उठाने के मूड में था। “ट्रेन आने में अभी देर है सर। चाय पिएं क्या?” बिना मेरे जवाब का इंतज़ार किए वो सामान मेरे बगल में रख चाय की स्टॉल के पास चला गया। जाने क्यों मेरा मन कहीं बैठने को नहीं कर रहा था। एक तो लोहे की कुर्सियां दूर थीं और ये जगह बिल्कुल सही थी मेरे लिए। बोगी यहीं आनी थी और फिर यहां से प्लेटफॉर्म पर लगा टीवी स्क्रीन नज़र आ रहा था जिसमें चित्रहार टाईप के गाने आ रहे थे – पहले संजीव कुमार-शबाना आज़मी का एक गाना और अब मॉनिटर पर ज़ीनत अमान और अमिताभ बच्चन लिपटे खड़े थे। गाने के बोल मुझे यहां तक सुनाई नहीं दे रहे थे, लेकिन स्क्रीन पर चलते गानों को देखकर आदतन दिमाग में भी एक के बाद एक गाने गूंज रहे थे। यहां से हिलने का मतलब था सामान को फिर से रखने और उठाने की मशक्कत, और टीवी पर चल रहे थोड़े-से मनोरंजन से हाथ धो बैठना।
विजय चाय ले आया था, और चाय के साथ कुछ प्याज़ के पकौड़े भी। अगर प्लेटफॉर्म की ओर आते हुए मैंने स्टॉल पर सजे पकौड़ों पर मक्खियां भिनभिनाते नहीं देखा होता तो शायद पकौड़ों से भरा दोना विजय के हाथ से ले लिया होता। लेकिन फिलहाल मैंने अपने हाथ के बिस्कुट और पानी की बोतल बैग में घुसाकर सिर्फ चाय उसके हाथ से ले ली।
ट्रेन के लिए अनाउसमेंट हो चुका था। एसी टू के डिब्बे में यहां से चढ़नेवाले हम दो ही यात्री थे। वैसे भी इस भीषण गर्मी में भला कौन सफ़र करता होगा? ट्रेन आई, एसी टू के पहले कंपार्टमेंट में पहली सीट – 1 नंबर। विजय को 38 नंबर सीट अलॉट हुई थी। लंबी दूरी की ट्रेनों पर किसी छोटे-से स्टेशन पर चढ़ने के कई नुकसान हैं – पहला, आपको सीटें मनपसंद मिल ही नहीं सकतीं, दूसरा – अपनी-अपनी सीटों पर पसरे दूर से आ रहे सहयात्रियों और उनके भारी-भरकम बक्सों के बीच अपना सामान घुसाना नामुमिकन और तीसरा, गंदे टॉयलेट। तीसरे नुकसान का ख्याल आते ही दिमाग भन्नाया। यहां तो नीचे की दोनों सीटों पर लोग यूं भी पहले से कब्ज़ा जमाए थे।
सफेद चादर के पीछे से एक 70-75 साल का चेहरा निकला। झुर्रियों के बीच से बिना दांतोंवाले अंकल मुस्कुराए, “ऊपर तो नहीं जा सकूंगा। आप सीट बदल लेंगे क्या?” दांत ना होने की वजह से उनकी बात उनके बोलने से कम, उनके हाथ के इशारों से ज्यादा समझ में आई। दूसरी तरफ नीचे वाली सीट पर लेटी महिला ने ना किताब से सिर उठाना ज़रूरी समझा, ना सीट के नीचे बिखरी अपनी चप्पलों, झोलों, न्यूज़पेपर के टुकड़ों और खाने की प्लेट के बीच से मेरे लिए जगह बनाने की ज़ेहमत उठाना।
अभी तक मैं कैमरे को कंधे पर लिए-लिए ही खड़ा था, बिल्कुल उसी मुद्रा में जैसे प्लेटफॉर्म से ट्रेन पर सवार हुआ था - पीठ पर बस्ता, कंधे पर लटकता कैमरा, दोनों हाथों में पानी की बोतलें और बिस्कुट के पैकेट। “सीट तो मैं बदल लूंगा लेकिन आप इन मोहतरमा को मेरे लिए जगह बनाने को क्यों नहीं कहते?” मैंने झल्लाते हुए कहा।
“हम साथ नहीं हैं,” किताब के पीछे से ठंडी-सी आवाज़ सुनाई दी, लेकिन अभी भी उन्होंने उठकर सामान समेटने की कोई कोशिश नहीं। अब मेरे तेवर में पूरी गरमी आ चुकी थी। मैंने अपने पैरों से ही उनकी चप्पलें और जूठी प्लेट को ज़ोर से मारकर डिब्बे के गलियारे में कर दिया। मैडम का पढ़ना अब भी बंद ना हुआ, ना ही मेरी ठोकर की उन्होंने कोई परवाह की। कंबल के नीचे से पैरों में एक हल्की-सी हरकत हुई बस। लेकिन आंखें किताब पर ही थी। मैं भी किताब का नाम देख चुका था अबतक – “प्रेमाश्रम।”
अब मैंने चिढ़कर सीट के नीचे से सामान खींचना शुरू किया। लेकिन खींचता भी कैसे? सामान लोहे की कड़ियों से बंधे थे।
“आप अपना सामान समेटेंगी या मैं ट्रेन से बाहर कर दूं इनको?” भद्र महिला ने अभी भी उठना उचित ना समझा।
“ऐसे कैसे बाहर कर देंगे आप? दूसरी सीट के नीचे इतनी जगह पड़ी है, वो नहीं दिखती?“
“नहीं दिखती। सिर्फ बदतमीज़ी दिखती है। शाम के साढ़े पांच बज रहे हैं। ये कोई वक्त है लेटे रहने का? आपसे इतना भी ना हुआ कि पैर समेटकर साथवाले मुसाफिर के लिए जगह बना दें? और अंकल आप, हां, हैलो, अंकल... मैं आपसे बात कर रहा हूं। बेशक नीचेवाली सीट ले लीजिए। लेकिन अगले तीन घंटे के लिए मुझे बैठने की जगह तो दीजिए।“ बुजुर्ग सज्जन हड़बड़ा के उठ गए।
मैंने पानी की बोतलें और बिस्कुट के पैकेट सीट पर इतनी ज़ोर से फेंका कि पैकेट के भीतर से ही बिस्कुट के टूटने की आवाज़ भी सुनाई दी। करीब-करीब इसी गुस्से में मैं सीट पर पसरी महिला को डिब्बे के बाहर फेंक देना चाहता था। लेकिन मेरी झल्लाहट का उनपर कोई असर नहीं हुआ और वो वैसे ही लेटे-लेटे किताब पढ़ती रहीं। मैंने भी अपना चेहरा अख़बार के पीछे छुपा लिया, लेकिन मेरे दिमाग की बड़बड़ाहट कम ना हुई।
“जाने क्या समझते हैं ऐसे लोग अपनेआप को? एक सीट रिज़र्व करते हैं और पूरी ट्रेन को अपने बाप की जागीर समझ लेते हैं। सिविक सेन्स तो है ही नहीं। जहां खाया वहीं फेंक दिया। यहां भी इनके लिए नौकर आए चप्पलें और सामान समेटने। पढेंगे प्रेमाश्रम और समझेंगे खुद को भारी इन्टेलेक्चुअल। प्रेमचंद को ही पढ़ना है तो ‘गोदान’ पढ़ो, ‘गबन’ पढ़ो, ‘रंगभूमि’, ‘कर्मभूमि’ पढ़ो। उनकी कहानियां पढ़ो। लेकिन पढ़ने चले हैं प्रेमाश्रम। कुछ और मिला ही ना होगा स्टेशन के बुक स्टॉल पर। मिला होगा लेकिन समझ में ही ना आया होगा। प्रेमचंद का नाम देखकर महारानी जी ने किताब उठा ली होगी, बस।“ मन-ही मेरा भुनभुनाना जारी रहा।
“थेपला खाओगे?” बिना दांतों वाले अंकल ने अचानक पूछा और मैंने हड़बड़ाते हुए ना चाहते हुए भी उनके खाने के डिब्बे से एक टुकड़ा निकाल लिया। मेरा थेपला उठाना ही मेरे लिए भारी पड़ गया। अंकल तो जैसे मौके की ताक में बैठे थे। छूटते ही उन्होंने बातों का पिटारा खोल दिया।
“मेरा नाम जेपी घोघारी है, जयप्रकाश घोघारी। मैं यवतमाल का हूं और अहमदाबाद जा रहा हूं, बेटे और बहू के पास। मैं गुजराती हूं लेकिन हमलोग तकरीबन सौ सालों से यवतमाल में ही रह रहे हैं। आप कहां के हैं बेटे?”
“मैं ओडिशा का हूं,” मेरा जवाब संक्षिप्त था। ज्यादा बोलने का मतलब था उनसे बातचीत को बढ़ावा देना, जो मैं बिल्कुल नहीं चाहता था।
“ओडिशा के? कहीं आप दूसरी ओर की ट्रेन में तो नहीं बैठ गए? ये ट्रेन पुरी से अहमदाबाद जा रही है, अहमदाबाद से पुरी नहीं।”
“जानता हूं,” मैंने खीझते हुए कहा, “मैं अहमदाबाद ही जा रहा हूं।”
“अच्छा अच्छा। यही तो ख़ासियत है हमारे देश की। हम वाशिंदे कहीं के होते हैं, बसते कहीं जाकर हैं। अमरीकियों की तरह नहीं होते जहां ईस्ट कोस्ट के लोगों ने वेस्ट कोस्ट देखा भी नहीं होगा। अब मुझे ही देख लीजिए। मैं गुजरात का। पला-बढ़ा महाराष्ट्र में। पूरी ज़िन्दगी नौकरी की दिल्ली में और अब रिटायरमेंट के बाद नागपुर में रह रहा हूं, अपने बड़े बेटे के पास। अभी छोटे बेटे के पास जा रहा हूं, अहमदाबाद।”
मैंने करीब-करीब टालनेवाले लहज़े में सिर हिलाकर कहा, “अच्छा।”
लेकिन घोघारी साहब का घों-घों करते हुए बोलना कम नहीं हुआ। “मैं स्वतंत्रता सेनानियों और समाज सुधारकों के परिवार से हूं। हमारे जैसा गुजराती परिवार ना देखा होगा आपने। महाराष्ट्र में रखकर हमने मराठी संस्कृति को अपनाने में कोई कोताही नहीं बरती। आप गोपाल कृष्ण गोखले को जानते हैं?”
“जी, जानता हूं। इतिहास में पढ़ा है उनके बारे में,” मैं अबतक नहीं समझ पाया था कि मैं क्यों उनकी बक-बक ना सिर्फ सुन रहा था बल्कि उन्हें बोलने के मौके भी दे रहा था। मुझे अपने बैग में रखी किताबें याद आ रही थीं, कितना कुछ था पढ़ने के लिए – विलियम डैलरिम्पिल, मार्केज़ और एक नाजीरियन लेखिका जिनका नाम याद नहीं आ रहा था अभी।
“पढ़ा होगा। ज़रूर पढ़ा होगा। महान हस्ती थे गोखले। मेरे दादाजी के बहुत करीबी दोस्त। जानते हो मेरे दादाजी यवतमाल मिडल स्कूल के प्रिंसिपल थे। जब 1915 में गोखले मरे तो उन्होंने अपने स्कूल में एक शोक-सभा आयोजित की। फिर क्या था, अंग्रेज़ों ने उन्हें नौकरी से निकालकर जेल में डाल दिया।”
“हम्म।” अचानक मुझे उसे नाइजीरियन लेखिका का नाम याद आ गया – अदीची, चिदामामन्दा गोज़ी अदिची। मैंने अपने बैग की ओर हाथ बढ़ाया ही था कि घोघारी अंकल ने मुझे बीच में ही रोक दिया।
“अरे बैठो ना बेटा। जानते हो, कहते हैं कि गोखले जी स्ट्रेस से मरे थे, तनाव से। बड़ी कम उम्र में ही मौत हो गई थी उनकी, 49 साल भी कोई उम्र होती है मरने की?”
“उस ज़माने में, आज से सौ साल पहले भी लोग स्ट्रेस से मरते थे, नहीं?” मेरी आवाज़ में व्यंग्य था।
“स्ट्रेस कैसे ना होता? देश गुलाम था। अपने आस-पास, परिवार-समाज-देश पर आप आख़िर कितना अत्याचार देख सकते हैं? आप ज़रा भी संवेदनशील होंगे तो आपको परेशानी तो होगी ही, तनाव तो होगा ही,” सामने लेटी हुई महिला एक सांस में ही बोल गई। इस अप्रत्याशित जवाब का कोई जवाब मैं ना दे पाया।
घोघारी अंकल ने बातचीत का सिलसिला जारी रखा। कैसे उनके पिता स्कूल के दिनों में ही आज़ादी की लड़ाई में कूद पड़े थे, कैसे दादाजी के घर की कुर्की की अफ़वाह सुनते ही दादी ने आठ बच्चों के पूरे परिवार को अपने पड़ोसी के तबेले में छुपा दिया था, कैसे उनका बचपन आज़ादी की कविताएं लिखते-सुनते बीता और कैसे एक आज़ाद भारत के साठ सालों को देखने का सुख उन्हें भाव-विभोर कर देता है...
मैं अब भी निश्चेष्ट श्रोता ही बना रहा, बीच-बीच में हां-हूं से ज्यादा मेरी भागीदारी नहीं थी। लेकिन वो महिला बहुत देर तक लेटे-लेटे ही घोघारी जी से घुल-मिलकर बातें करती रही, जैसे मुद्दतों की दोस्ती थी उनकी।
ट्रेन दस बजे के आस-पास भुसावल पहुंची। मैंने अभी तक कुछ खाया नहीं था, इसलिए यहीं प्लेटफॉर्म पर उतरकर कुछ खाने के इरादे से उतरने लगा कि मुझे विजय की याद आई। इस गहन बातचीत को सुनते रहने के क्रम में मैं उसे तो भूल ही गया था। मैं उठने लगा कि उस महिला ने मुझसे उड़िया में कहा, “ट्रेन रू ओलिहबे कि? मो पाईं पाणिर बोटल आणिबे कि? (नीचे उतरेंगे क्या? मेरे लिए पानी की एक बोतल ले आएंगे?”)
“आपको कैसे मालूम चला कि मैं उड़िया बोलता हूं?” मैंने हैरान होकर पूछा।
“आप ही ने तो सामनेवाले अंकल को बताया कि आप ओड़िशा से हैं?”
“ओ हो, तो आप किताब पढ़ने का स्वांग रच रही थीं। आपका ध्यान तो दरअसल हमारी बातों पर था,” मैं फिर अपने व्यंग्य पर उतर आया था।
महिला ने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया, घूमकर लेट भर गईं। मुझे अपने ऊपर बड़ी कोफ्त हुई। ये कमबख्त ज़ुबान अपने नियंत्रण में कभी होती क्यों नहीं? फिसलने और ज़हर उगलने की बुरी आदत है उसको। लेकिन माफ़ी मांगने की हिम्मत ना हुई। मैंने अंकल की ओर घूमकर पूछा, “आपको कुछ चाहिए क्या?” अंकल ने हाथ के इशारे से मना किया, कहा कुछ नहीं।
मैं भारी मन से प्लेटफॉर्म पर उतर गया। कुछ खाने की इच्छा नहीं हुई। विजय के लिए खाना पैक कराकर मैं दूसरे दरवाज़े से डिब्बे में चढ़ा और उसे खाने का पैकेट पकड़ाकर फिर प्लेटफॉर्म पर उतरकर टहलने लगा। एक बार जी में आया, जाकर माफ़ी मांग लूं। लेकिन अहं ने डिब्बे के दरवाज़े पर एक बांस का मोटा बल्ला डाल दिया था, उछलकर लांघना भी मुश्किल, झुकना तो ख़ैर नामुमकिन। मैं अपनी ऊहापोह से जी चुराने के लिए सिगरेट के गहरे कश लेता रहा।
ट्रेन के खुलने के सिग्नल के बाद जब पानी की बोतल लिए डिब्बे में वापस पहुंचा तो कम्पार्टमेंट की बत्तियां बुझाकर मेरे दोनों सहयात्री सो चुके थे। मैं भी ऊपर वाली सीट पर लेटे-लेटे रीडिंग लाईट जलाकर कुछ पढ़ने की कोशिश करता रहा, फिर सो गया।
सुबह नींद खुली तो ट्रेन अहमदाबाद पहुंचनेवाली थी। सभी यात्री अपने-अपने सामान समेटने लगे थे। घोघारी अंकल भी अपनी चप्पलें समेटकर बैग में रखने लगे थे। मैं भी नीचे उतरकर जूते पहनने लगा। लेकिन सामनेवाली सीट पर लेटी महिला वैसे ही दूसरी ओर घूमकर सोती रही।
मुझसे रहा नहीं गया। पश्चाताप करने के इरादे से मैंने उन्हें ज़ोर से आवाज़ देते हुए उड़िया में कहा, “आप सो रही हैं? अहमदाबाद आनेवाला है। आपको सामान निकालने में कोई मदद चाहिए?”
उस महिला ने कोई जवाब नहीं दिया। मैंने घोघारी अंकल की ओर बड़ी उम्मीद से देखा, लेकिन वे बड़ी मसरूफियत के साथ अपने जूतों के तस्मे बांधने में लगे थे।
ट्रेन के अहमदाबाद पहुंचते ही कुलियों के साथ-साथ एक चौबीस-पच्चीस साल का शख्स डिब्बे में घुस आया और हमारे सामने लेटी महिला के पास आ खड़ा हुआ।
“दीदी! दीदी! तमो फोन बॉन्द काहि कि ओछि? मू बहूत सोमोयो रू चेष्टा कॉरूछि? कितनी चिंता हो रही थी मुझे। फोन तो ऑन रखती।”
“नहीं रे, फोन डिस्चार्ज हो गया था, इसलिए बंद हो गया। अब मैं चार्ज करने के लिए पावर प्वाइंट तक पहुंचूं तब ना?” पिछले चौदह घंटों में पहली बार मुझे महिला के चेहरे पर हंसी की एक लकीर नज़र आई थी।
“किसी की मदद ले लेती। अपने सहयात्रियों से कह देती,” भाई की आवाज़ में अब भी परेशानी घुली थी।
“हां रे, मेरे सहयात्री बड़े अच्छे हैं, बड़ी मदद करनेवाले। मैंने ही नहीं कहा,” इस बार व्यंग्य महिला की आवाज़ में था।
इसी बातचीत के बीच भाई नीचे से सामान खींच-खींचकर सीट पर रखता गया। सामान से साथ एक व्हील चेयर और एक जोड़ी बैसाखियां भी थीं। सामान निकालने के बाद उसने अपनी बहन को पकड़कर बिठाया और तब मुझे अहसास हुआ कि महिला की दाहिनी टांग की जगह एक कृत्रिम टांग लगी थी।
मुझे जाने ऐसा क्यों लगा कि मुझपर घड़ों पानी पड़ गया हो। मैं अब ना उस महिला से आंख मिला पा रहा था ना घोघारी अंकल से। जाते-जाते उन्होंने मुझसे हाथ मिलाया तो भी मेरा ध्यान व्हील चेयर पर ही था। भाई ने कुली की मदद से एक-एक करके सामान उतारा और अपनी बहन को भी डिब्बे से उतारकर व्हील चेयर पर बिठाया।
मैं भारी मन से सीट पर ही बैठा रहा। फिर विजय के आने के बाद सामान उतारने के लिए वॉश बेसिन के पास जाकर खड़ा गया। मेरी नज़र के ठीक सामने एक स्टिकर चिपका था – “आप भाग्यवान हैं कि आपके हाथ-पैर सलामत हैं। लेकिन संसार में कई ऐसे लोग हैं जो शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग हैं। यदि आप ऐसे किसी व्यक्ति की आर्थिक मदद करना चाहें तो निम्नलिखित पते और फोन नंबर पर संपर्क करें…”
मैंने अपने मोबाइल फोन में नंबर सेव कर लिए। मेरा प्रायश्चित हो सके, इसके लिए बहुत ज़रूरी था कि मैं जल्द-से-जल्द इस नंबर पर संपर्क करता।
गुरुवार, 29 सितंबर 2011
रूममेट
कॉन्फ्रेंस रूम में गहन विचार-विमर्श के बीच असीमा का फोन इतनी तेज़ बजा कि सभी चौंक गए।
"फोन साइलेंट पर क्यों नहीं है? मीटिंग में तहज़ीब का थोड़ा तो ख्याल रखा करो असीमा।" अकबर ने सबके सामने असीमा को डांट पिला दी। लेकिन असीमा का पूरा ध्यान फोन करनेवाले पर था।
गाड़ी में बैठते ही अकबर ने पूछा, "खोई-खोई क्यों हो? सबके सामने डांट दिया इसलिए?” "नहीं अकबर। मुझे एक फोन करने दो पहले।"
उधर से लिली की चहकती हुई आवाज़ सुनाई दी। "मियां-बीवी किसके लिए ताजमहल बना रहे हैं दुबई में कि मुंबई आने की भी फ़ुर्सत नहीं होती?"
"कहो तो तुम्हारे लिए भी एक बनवा दें। अपने लिए कोई शाहजहां तो ढूंढ लो मेरी मुमताज़।"
"ढूंढ लिया। दो महीने बाद शादी है पटना में। आओगी या नहीं, उसका हिसाब बाद में। पहले ख़ास बात सुनो। नेशनल जिओग्रैफिक पर मेरी डॉक्युमेंट्री आ रही है आज रात। दुबई में चालीस मिनट बाद बीम करेगी। अब जहां भी हो, जल्दी घर पहुंचो और टीवी खोलकर बैठ जाओ। बाकी बातें बाद में।"
"अकबर, मुझे कितनी देर में घर पहुंचा सकते हो?"
"क्या हो गया? तबीयत दुरुस्त तो है?"
"लिली की फिल्म आ रही है। मैं एक मिनट भी मिस नहीं करना चाहती।"
फिल्म शुरू होने से ठीक पांच मिनट पहले दोनों घर पहुंचे। नन्हीं अलीज़ा को गोद में लेकर असीमा टीवी के सामने बैठ गई। फिल्म झारखंड के किसी टाना भगत के बारे में थी। बेहद दिलचस्प। इतिहास से पन्नों से निकलकर आज के झारखंड में टाना भगत की प्रासंगिकता को छूते हुए छोटानागपुर के सांस्कृतिक रूप को इस डॉक्यू-ड्रामा में बखूबी पेश किया गया था। स्क्रिप्ट और निर्देशन में लिली पांडे के साथ किसी अभिनव का नाम था।
असीमा ने फिर से लिली को फोन लगाया।
"कैसी लगी फिल्म मोहतरमा?"
"एक सपने के पूरा होने जैसा। लिली, मुझे तुमपर बहुत फ़ख्र है।"
"वो तो तुम्हें मुझपर तबसे है जब मैं सिर्फ सपने देखा करती थी।"
"नहीं वाकई। क्रेडिट रोल्स में तुम्हारा नाम देखकर मेरी आंखें भर आईं। पूरी दुनिया में कितने सारे लोगों ने देखी होगी ये फिल्म।"
"क्रेडिट रोल्स में अभिनव का नाम देखा? उसी से शादी कर रही हूं। हम जल्दी ही एक फीचर फिल्म पर भी काम शुरू कर रहे हैं। कहानी मैंने लिखी है, निर्देशन अभिनव का होगा। एक बड़े प्रोडक्शन हाउस के साथ पिछले हफ्ते ही कॉन्ट्रैक्ट साईन हुआ है।"
थोड़ी सी बातचीत के बाद असीमा ने फोन रख दिया। अलीज़ा सो रही थी। खाना खाकर असीमा लिविंग रूम में ही आ गई। लैपटॉप के डी ड्राईव में एक फोल़्डर था जो सालों से नहीं खुला था। असीमा के भीतर उस फोल्डर को खोलने की बेचैनी-सी हो रही थी।
नौ साल पहले की तस्वीरें थी उनमें। और थीं वो सारी कविताएं और कॉन्सेप्ट नोट्स जो लिली रात-रात भर उसके लैपटॉप पर बैठकर लिखा करती। मुंबई से यादों की जो थाती सहेजकर असीमा दुबई आई थी, वो सबकुछ इसी फोल्डर में था। पहली बार लिली से मिलना भी कितना अजीब-सा था...
"मेरा नाम असीमा है, असीमा कॉन्ट्रैक्टर। नाम से हिंदू लगती हूं, लेकिन हूं मुस्लिम। पांचों वक्त की नमाज़ पढ़ती हूं और रोज़े रखती हूं। क्या किसी को मेरे यहां रहने से कोई परेशानी है?"
"फोन साइलेंट पर क्यों नहीं है? मीटिंग में तहज़ीब का थोड़ा तो ख्याल रखा करो असीमा।" अकबर ने सबके सामने असीमा को डांट पिला दी। लेकिन असीमा का पूरा ध्यान फोन करनेवाले पर था।
गाड़ी में बैठते ही अकबर ने पूछा, "खोई-खोई क्यों हो? सबके सामने डांट दिया इसलिए?” "नहीं अकबर। मुझे एक फोन करने दो पहले।"
उधर से लिली की चहकती हुई आवाज़ सुनाई दी। "मियां-बीवी किसके लिए ताजमहल बना रहे हैं दुबई में कि मुंबई आने की भी फ़ुर्सत नहीं होती?"
"कहो तो तुम्हारे लिए भी एक बनवा दें। अपने लिए कोई शाहजहां तो ढूंढ लो मेरी मुमताज़।"
"ढूंढ लिया। दो महीने बाद शादी है पटना में। आओगी या नहीं, उसका हिसाब बाद में। पहले ख़ास बात सुनो। नेशनल जिओग्रैफिक पर मेरी डॉक्युमेंट्री आ रही है आज रात। दुबई में चालीस मिनट बाद बीम करेगी। अब जहां भी हो, जल्दी घर पहुंचो और टीवी खोलकर बैठ जाओ। बाकी बातें बाद में।"
"अकबर, मुझे कितनी देर में घर पहुंचा सकते हो?"
"क्या हो गया? तबीयत दुरुस्त तो है?"
"लिली की फिल्म आ रही है। मैं एक मिनट भी मिस नहीं करना चाहती।"
फिल्म शुरू होने से ठीक पांच मिनट पहले दोनों घर पहुंचे। नन्हीं अलीज़ा को गोद में लेकर असीमा टीवी के सामने बैठ गई। फिल्म झारखंड के किसी टाना भगत के बारे में थी। बेहद दिलचस्प। इतिहास से पन्नों से निकलकर आज के झारखंड में टाना भगत की प्रासंगिकता को छूते हुए छोटानागपुर के सांस्कृतिक रूप को इस डॉक्यू-ड्रामा में बखूबी पेश किया गया था। स्क्रिप्ट और निर्देशन में लिली पांडे के साथ किसी अभिनव का नाम था।
असीमा ने फिर से लिली को फोन लगाया।
"कैसी लगी फिल्म मोहतरमा?"
"एक सपने के पूरा होने जैसा। लिली, मुझे तुमपर बहुत फ़ख्र है।"
"वो तो तुम्हें मुझपर तबसे है जब मैं सिर्फ सपने देखा करती थी।"
"नहीं वाकई। क्रेडिट रोल्स में तुम्हारा नाम देखकर मेरी आंखें भर आईं। पूरी दुनिया में कितने सारे लोगों ने देखी होगी ये फिल्म।"
"क्रेडिट रोल्स में अभिनव का नाम देखा? उसी से शादी कर रही हूं। हम जल्दी ही एक फीचर फिल्म पर भी काम शुरू कर रहे हैं। कहानी मैंने लिखी है, निर्देशन अभिनव का होगा। एक बड़े प्रोडक्शन हाउस के साथ पिछले हफ्ते ही कॉन्ट्रैक्ट साईन हुआ है।"
थोड़ी सी बातचीत के बाद असीमा ने फोन रख दिया। अलीज़ा सो रही थी। खाना खाकर असीमा लिविंग रूम में ही आ गई। लैपटॉप के डी ड्राईव में एक फोल़्डर था जो सालों से नहीं खुला था। असीमा के भीतर उस फोल्डर को खोलने की बेचैनी-सी हो रही थी।
नौ साल पहले की तस्वीरें थी उनमें। और थीं वो सारी कविताएं और कॉन्सेप्ट नोट्स जो लिली रात-रात भर उसके लैपटॉप पर बैठकर लिखा करती। मुंबई से यादों की जो थाती सहेजकर असीमा दुबई आई थी, वो सबकुछ इसी फोल्डर में था। पहली बार लिली से मिलना भी कितना अजीब-सा था...
"मेरा नाम असीमा है, असीमा कॉन्ट्रैक्टर। नाम से हिंदू लगती हूं, लेकिन हूं मुस्लिम। पांचों वक्त की नमाज़ पढ़ती हूं और रोज़े रखती हूं। क्या किसी को मेरे यहां रहने से कोई परेशानी है?"
असीमा ने ऐसे अपना परिचय दिया था पहली बार। मुंबई के अंधेरी के चार बंगला इलाके की कोठी के एक कमरे में चार लड़कियों को पेइंग गेस्ट बनाकर रखने की जगह थी। तीन तो पहले से थे। कमरे में वो चौथी रूममेट बनने के लिए घुसी थी। दो मिनट तक असीमा के सवाल पर सब चुप्पी साधे बैठे रहे, अपने-अपने बिस्तरों पर, अपनी-अपनी दुनिया में। बीच वाले बिस्तर पर बैठी लड़की ने चुप्पी तोड़ी।
"मैं नफ़ीज़ा डीसूज़ा हूं, न-फ़ी-ज़ा, नफीसा नहीं। डीसूज़ा हूं तो ज़ाहिर है, क्रिश्चियन हूं। खिड़की के बगल वाली बिस्तर पर जो मैडम बैठी हैं, उनका नाम है लिली पांडे। अब लिली जी पांडे कैसे हैं, ये तो उन्हीं से पूछिए। दरवाज़े के बगल वाले बिस्तर पर बैठी हैं विशाखा पटेल। नैरोबी से मुंबई आई हैं भरतनाट्यम सीखने। इनकी धर्म, जाति का हमें पता नहीं। कभी ये फोन पर गुजराती बोलते मिलती हैं, कभी मलयालम। बॉयफ्रेंड जर्मन है। हममें से किसी को तो एक-दूसरे से परेशानी नहीं। ना नाम से, ना टाइटिल से और ना जाति-धर्म से। आप अपनी बात बताएं असीमा जी।"
नफ़ीज़ा के इस तल्ख़ जवाब से असीमा थोड़ी देर शांति से खड़ी रही। फिर ट्रॉली वाला अपना सूटकेस लुढ़काती हुई कमरे के अंदर आ गई और विशाखा की ओर देखकर अंग्रेज़ी में पूछा, "विच वन वुड बी माई बेड?"
विशाखा ने इशारे से नफ़ीज़ा के ठीक बगल वाले बिस्तर की ओर इशारा कर दिया। असीमा चुपचाप बिस्तर पर अपना सामान खोल-खोलकर रखती गई और बगलवाली अलमारी में घुसाती रही। इस बीच विशाखा फोन से चिपकी रही, लिली ने अखबार में सुडोकू खेलना जारी रखा और नफ़ीज़ा ने अपने कानों में वापस सीडी प्लेयर के इयरप्लग्स लगा लिए। इतवार का दिन था। किसी को कोई जल्दी नहीं थी।
जल्दी का आलम तो अगले दिन सुबह सात बजे देखने को मिला। विशाखा को क्लास के लिए देर हो रही थी, लिली को शूट पर जाना था और नफ़ीज़ा को दफ्तर। दस मिनट पहले भी कोई बिस्तर छोड़ने को तैयार नहीं होता, लेकिन बाथरूम के लिए दस मिनट की बहस सबको मंज़ूर थी। बस असीमा ही अपने कोने में बैठी थी, आज की मशक्कत के लिए पूरी तरह तैयार, अख़बार पकड़े कल की बासी ख़बरें पढ़ते हुए।
"कहां है ऑफिस तुम्हारा? कहीं काम करती हो या काम की तलाश में निकलोगी आज से?" पहला सवाल नफ़ीज़ा ने ही दागा।
"नहीं, नौकरी करती हूं। पेशे से आर्किटेक्ट हूं, कर्माकर आर्किटेक्ट्स के साथ। वर्ली में है ऑफिस। बस निकलूंगी थोड़ी देर में।"
"आर्किटेक्ट हो। नाम भी असीमा कॉन्ट्रैक्टर है। कहीं हफ़ीज़ कॉन्ट्रैक्टर तुम्हारे रिश्तेदार तो नहीं लगते?" ये सवाल लिली की ओर से आया था।
कल से पहली बार असीमा के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आई थी।
"नहीं, नहीं। कोई रिश्तेदार नहीं लगते। लेकिन काश ऐसा होता। मुझे यहां तक पहुंचने के लिए इतनी मारा-मारी तो नहीं करनी पड़ती।"
असीमा का इतना कहना था कि लगा जैसे कमरे का माहौल अचानक हल्का हो गया हो। लगा जैसे चारों का रूममेट बनकर रहना अब मुमकिन हो सकेगा। अपना ये कमज़ोर-सा छोर सबके सामने रखकर असीमा ने दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया था।
"चलो, चलो नाश्ता कर लो सब लोग। दूध-कॉर्नफ्लेक्स है आज। असीमा, तुम खा सकोगी ना ये?" मकानमालकिन कविता दीदी कमरे में सबको बुलाने आई।
"थैंक्यू दीदी, लेकिन मेरे रोज़े चल रहे हैं। अब मैं रात को ही खाना खाऊंगी।"
"हां, हां तुमने बताया था कल। भई असीमा तो रोज़े रखेगी और नमाज़ पढ़ेगी। तुममें से किसी को कोई परेशानी तो नहीं है ना?"
"दीदी, जब रोज़-रोज़ सुबह आपके बेसुरे 'ऊं जय जगदीश हरे' से परेशानी नहीं होती तो किसी के नमाज़ पढ़ने से क्या परेशानी होगी?" जवाब विशाखा ने दिया था। "अब चलो यार, वरना आज देर हुई तो गुरुजी मुझे बैरंग लिफाफे की तरह क्लास से लौटा देंगे।"
सब एक-एक कर घर से निकलते गए। विशाखा मलाड़ की ओर भरतनाट्यम की कुछ और मुद्राएं सीखने, लिली आरे कॉलोनी की ओर क्रिएटिव आर्ट्स टेलीफिल्म्स के डेली सोप का प्रोडक्शन संभालने और नफ़ीज़ा जेके ट्रेडिंग के रिसेप्शन पर बैठने।
नफ़ीज़ा को असीमा ने ही पीछे से आवाज़ दी थी। "बस स्टॉप तक जा रही हो नफ़ीज़ा? मैं भी चलती हूं।"
दोनों चुपचाप चलने लगे थे। नफ़ीज़ा कनखियों से असीमा का बैग देख रही थी – डिज़ाईनर था, हाईडिज़ाईन का।
"कहां से हो असीमा?"
"पूना से। अब्बू-अम्मी वहीं रहते हैं। लेकिन मैंने यहीं जेजे स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर से पढ़ाई की है। इसलिए मुंबई में नई नहीं हूं।"
"आर्किटेक्ट हो, अच्छा कमाती ही होगी। मुंबई में रही हो, जानती होगी कि चार बंग्ला से वर्ली की दूरी कितनी है। फिर महालक्ष्मी या खार जैसी जगहों में पीजी क्यों नहीं खोजा?"
"ये जगह मुझे अच्छी लगी नफ़ीज़ा। आख़िर मुंबई में ऐसे रो हाउसेज़ और कहां मिलेंगे, जहां बीचोंबीच एक पार्क हो, कॉलोनी में अंदर आते ही मुंबई का कोलाहल दूर चला जाए। और सच कहूं तो मैंने कमरे की खिड़की से दिखनेवाले गुलमोहर के लालच में यहां रहना तय किया। वैसे लिली खुशकिस्मत है। बिस्तर पर बैठे-बैठे ही हाथ बाहर निकालकर गुलमोहर को छू सकेगी। तुम कब से रह रही हो यहां?"
"पिछले डेढ़ साल से। और तुम्हारे जैसे रोमांटिक ख्याल मुझे नहीं आते। मैं गुलमोहर या पार्क के चक्कर में यहां नहीं हूं। कविता दीदी के पति मेरे दफ्तर में ब्रोकर हैं, इसलिए मुझे फोर्टी पर्सेंट डिसकाउंट पर ये जगह मिल गई। लो आ गई तुम्हारी बस। २२० ही लोगी ना वर्ली तक?"
"नहीं, एएस फोर। तुमको कहां तक जाना है?"
"जहन्नुम तक।" नफ़ीज़ा मन-ही-मन बुदबुदाई। "मैडम यहां से भी एयरकंडीशन्ड बस में चढकर जाएंगी।" लेकिन जवाब में इतना ही कहा, "मैं अंधेरी स्टेशन तक जाऊंगी। ऑटो लूंगी। चलो, शाम को मिलते हैं।"
शाम को कमरे से कबाब की खुशबू आ रही थी, दीदी के किचन में पकौड़ियां तली जा रही थीं और असीमा अपने बिस्तर पर बैठी पुराने अख़बार पर प्लेट रखकर फल काट रही थी।
"इफ्तारी का वक्त हो गया है नफीज़ा। आओ ना, बैठकर कुछ खाओ मेरे साथ। ये कबाब लाई हूं। खाओगी ना? दीदी कितनी अच्छी हैं ना। पकौड़ियां तल रही हैं मेरे लिए।"
"दीदी अच्छी हैं क्योंकि तुम नयी मुर्गी हो। इन पकौड़ियों में डाले गए बेसन, प्याज और नमक की कीमत धीरे-धीरे वसूलेंगी तुमसे।" नफ़ीज़ा ने धीरे-से कहा।
"ऐसा क्या? अच्छा हुआ तुमने आगाह कर दिया। लिली और विशाखा कब तक आते हैं?"
"लिली को देर होती है। कई बार बारह भी बज जाते हैं। स्टार पर प्राइमटाईम का सीरियल देखा होगा - क्या कहें क्या ना कहें। लिली उसी का प्रोडक्शन संभालती है। कभी फ़ुर्सत में हो तो टीवी स्टारों की गॉसिप सुनना उससे। ऐसे-ऐसे किस्से बताती है कि सीरियल की कहानी का उतार-चढ़ाव उसके आगे सपाट पड़ जाए। और ये विशाखा है ना, इसका एक्स-बॉयफ्रेंड मॉडल था। नेस्ले का एड देखा है ना? वो हेज़ल आईज़ वाला हंक? नाम भूल रही हूं उसका। शायद वीर सप्पल। विशाखा का बॉयफ्रेंड था। रोज़ अपनी एन्टाईसर लेकर नीचे खड़ा हो जाता था। पता नहीं क्या हुआ, ब्रेक-अप हो गया उनका। अब कोई जर्मन है। पर मैंने देखा नहीं उसे।"
"मैंने सिर्फ उनके वापस आने का वक्त पूछा था नफ़ीज़ा।" असीमा नीचे देखते हुए सेब काट-काटकर प्लेट में रखती रही। उसके बाएं हाथ की उंगली में एक हीरा चमक रहा था।
"एन्गेज्ड हो?" नफीज़ा से रहा नहीं गया और सवाल ज़ुबान से फिसल ही निकला।
"नहीं। शादी-शुदा। शौहर दुबई में हैं।"
"हाउ इंटरेस्टिंग! इसलिए डिज़ाईनर कपड़े पहनती हो। मैं तो पहले ही सोच रही थी कि आखिर ये आर्किटेक्ट कमाती कितना है कि पूरा वॉर्डरोब इतने महंगे़ कपड़ों से अंटा पड़ा है। हस्बैंड गिफ्ट करते होंगे, नहीं?"
असीमा ने नज़रें उठाकर नफ़ीज़ा को घूर भर लिया, कुछ कहा नहीं। लेकिन असीमा ने ये समझ लिया कि किसी के सामने ज़रूरत से ज़्यादा खुलना उसे अपनी ज़िन्दगी में ताक-झांक के मौके देने के बराबर होगा। ये ताक-झांक असीमा को मंज़ूर ना थी।
लिली से बातचीत का पूरे हफ़्ते कोई मौका ना मिला, ना विशाखा ने असीमा से ज़्यादा सवाल पूछे। असीमा की चुप्पी और रवैये को देखकर नफ़ीज़ा ने भी खुद से अपने काम से काम रखने जैसा कुछ वायदा किया। नफ़ीज़ा की ये कसम अगले ही इतवार को टूट गई। सुबह-सुबह लिली ने कमरे में मौजूद तीनों रूममेट से पूछा, "फेम एडलैब्स में 'अ ब्यूटिफुल माइंड' लगी है। रसेल क्रो को पक्का ऑस्कर मिलेगा इसके लिए। सुबह के शो की टिकट तीस रुपए में मिल भी जाएगी। कोई चलेगा मेरे साथ?"
"आई एम गेम।" पहला जवाब विशाखा की ओर से आया।
"मैं चल सकती हूं क्या?" असीमा के मुंह से ना चाहते हुए भी दिल की बात निकल ही गई। 'द इनसाइडर' और 'ग्लैडिएटर' के बाद रसेल क्रो ने इस फिल्म में अपने अभिनय का क्या कमाल दिखाया है, ये असीमा पिछले कई दिनों से अख़बारों में पढ़ रही थी। इसलिए रूममेट के साथ दोस्ती को लेकर तमाम आशंकाओं के बावजूद असीमा बाकी तीन लड़कियों के साथ फेम एडलैब्स जा पहुंची।
फिल्म के बाद लंबी बहस के साथ कॉफी और फिर लंच का सिलसिला चलता रहा। असीमा लिली की टिप्पणियां सुनकर बहुत प्रभावित थी। फिल्म के कथानक से लेकर पात्रों की अभिनय-शैली, स्क्रिप्ट से लेकर कैमरा एंगल तक पर वो कुछ-ना-कुछ बोलती रही।
"जॉन नैश की तरह तो तुम भी कोई प्रोडिजी ही लगती हो लिली। मुझे तुम्हारी प्रतिभा का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था।"
"अभी तुमने मुझे पहचाना कहां है असीमा। अभी तो हमारी दोस्ती की शुरूआत भर है। जुहू बीच चलोगी शाम को? अपनी प्रतिभा के और नमूने दिखाऊंगी तुम्हें।"
असीमा ना कहते-कहते हां बोल बैठी। "तुम मेरे लिए कहीं चार्ल्स हरमन तो नहीं बनने जा रही ना लिली। जॉन नैश का वो रूममेट जो गायब भी है, हाज़िर भी," असीमा ने हंसते हुए पूछा था। जाने क्या था इस लड़की में, जो उसे अनायास उसके करीब ले जा रहा था। दिन भर चार बंगला के आस-पास भटकने के बाद चारों रूममेट शाम को पैदल ही जुहू चौपाटी की ओर चल दीं। पूरे रास्ते लिली का बोलना जारी रहा - पटना का घर, दिल्ली का हॉस्टल, आरा का गांव, मुंबई के सेट - लिली तीनों को अपनी रंग-बिरंगी दुनिया की सैर कराती रही। नफ़ीज़ा ने भी अपनी कहानी सुनाई थी सबको, भयंदर में कैसे एक कमरे के दबड़ेनुमा घर में बिन बाप की तीन बेटियों को मां ने बड़ा किया, कैसे शराब की ख़ातिर बहन को जीजा ने चार ही दिनों में छोड़ दिया, कैसे अपनी ऑल-वूमैन फैमिली के लिए नफ़ीज़ा को कमाई का इकलौता ज़रिया बनना पड़ा...
रात के नौ बजे भी चारों में से किसी को घर लौटने की इच्छा नहीं थी। यूं तो अपनी-अपनी ज़िन्दगियों के किस्से सबने सुनाए, लेकिन लिली की बातें सबने बड़े मज़े से सुनी। कैसे-कैसे पात्र थे लिली के जीवन में! प्रोडक्शन मैनेजर सतीश भाई जिन्होंने तेलुगू फिल्मों में किस्मत आजमाई लेकिन असफल रहे। मुंबई में अब आर्टिस्टों, तकनीशियनों के लिए नाश्ते-खाने का इंतज़ाम करने में ही उन्हें जीवन का अनुपम आनंद प्राप्त होता है। सात भाषाएं बोलते हैं और भूल जाते हैं कि किससे कौन-सी भाषा में बात करनी हैं - तो स्पॉट बॉय से अंग्रेज़ी बोलते हैं, डायरेक्टर से गुजराती और लिली से तेलुगू। सामनेवाले को याद दिलाना होता है कि उससे किस भाषा में बात की जाए। जिस सीरियल का काम लिली संभाल रही है, उसकी कहानी सेट पर मौजूद कलाकारों को देखकर लिखा जाता है। कलाकार अनुपस्थित तो एपिसोड से किरदार भी गायब! लिली की मां की मीठी आवाज़ उसे विरासत में मिली है, और वो झूमर भी जो मां रोटियां बेलते हुए भी गाया करती है। बिना किसी भूमिका के रेत पर पसरे-पसरे लिली ने असीमा को वो झूमर सुनाया था।
"सासु मोरा मारे राम बाँस के छिऊकिया/मोर ननदिया रे सुसुकत पनिया के जाय/छोटे-मोटे पातर पियवा हँसि के ना बोले/मोर ननदिया रे से हू पियवा कहीं चलि जाय/गंगा रे जमुनवा के चिकनी डगरिया/मोर ननदिया रे पैयाँ धरत बिछलाय"
"मेरी ज़िन्दगी में इतना रस नहीं," अपने बारे में कुछ बताने के लिए कहने पर असीमा ने धीरे-से कहा था। "मॉल बनवाती हूं, इमारतें बनवाती हूं और कॉन्क्रीट के बारे में सोचते-सोचते ख़्याल भी पत्थर-से हो गए हैं।"
"ये पत्थर हमारे साथ रहकर पिघल जाएगा असीमा," लिली ने हंसते हुए कहा था।
"आज वीकेंड खत्म हो गया है। कल देखेंगे किसे कहां पत्थर तोड़ने जाना होता है और किसमें पत्थरों को पिघलाने की ताकत बची होती है। अब चलोगी कि रात यही समंदर किनारे बिताने का इरादा है," नफ़ीज़ा की आवाज़ में तल्ख़ी रह-रहकर लौट आती थी।
"काश ऐसा मुमकिन होता। वैसे झूमर की कीमत वसूलनी है मुझे। मेरे मीठे गले को तर करने के लिए नैचुरल्स से सीताफल आइसक्रीम ले देना मुझे तुमलोग।"
"बिल्कुल मोहतरमा। वैसे विशाखा की तरह तुम भी संगीत क्यों नहीं सीखती," असीमा ने लिली से पूछा।
"याद नहीं नैश ने क्या कहा था फिल्म में। क्लासेस विल डल योर माइंड, डिस्ट्रॉय द पोटेनशियल फॉर ऑथेन्टिक क्रिएटिविटी। कक्षाएं तुम्हारे दिमाग को कुंठित कर देंगी, सच्ची रचनात्मकता की क्षमता को नष्ट कर देंगी। और मैं इसकी जीती-जागती मिसाल हूं," विशाखा ने हंसते हुए कहा और सब हंस पड़े।
फिर तो पूरे हफ़्ते असीमा रविवार का इंतज़ार करती रही थी। विशाखा कई बार अपने बॉयफ्रेंड के फ्लैट पर ही रुक जाया करती। हर बात में नफ़ीज़ा के सिनिसिज्म को झेलना मुश्किल होता, इसलिए असीमा उससे दूरी बनाकर ही रखती। एक लिली थी जिससे बात करना मुमकिन था। लेकिन लिली का काम ऐसा था कि वो देर रात शूट से वापस लौटती, सबके सो जाने के बाद। सुबह-सुबह उसे उठाना असीमा को उचित ना लगता। लिली से उसका मोबाइल नंबर भी नहीं लिया था असीमा ने। अब नफ़ीज़ा से मांगती तो नफ़ीज़ा आंखें घुमा-घुमाकर कहती, "बड़ा याराना लगता है दोनों में।" मकानमालकिन से नंबर के लिए पूछा तो उन्होंने सीधे पूछ दिया, "कोई काम है? मुझे बता दो। मैं मैसेज दे दूंगी। वैसे तुम इन तीनों से दूर ही रहो तो अच्छा है असीमा। तुम पढ़ी-लिखी हो, शरीफ हो, इन तीनों से उम्र में भी बड़ी हो। इनसे क्या मतलब तुम्हें?"
असीमा समझ गई कि कविता दीदी नहीं चाहती कि चारों में दोस्ती हो। दोस्ती होने का मतलब उनके विरुद्ध एकजुट होना, उनके खि़लाफ़ साज़िश। और अगर चारों ने उनकी अधपकी दाल और प्रेशर कुकर में चढ़नेवाले बासी चावल के साथ पकनेवाले नए चावल के विरोध में झंडा उठा लिया तो उनका क्या होगा?
"शुक्र है कि मेरे रोज़े चल रहे हैं," कविता दीदी के पकाए खाने की याद आते ही असीमा को उबकाई आ गई।
एक रोज़ फज्र की नमाज़ के लिए असीमा उठी तो लिली उसे बाहर ड्राइंग रूम में बैठी मिली।
"नमाज़ के लिए उठी हो? सेहरी करोगी ना? दूध पियोगी? ब्रेड है, वो भी लाती हूं।"
"तुम बैठो लिली। मैं सब कर लूंगी। कब लौटी?"
"थोड़ी देर पहले। नैश की एक और बात याद आ रही है। फाइंड ए ट्रूली ओरिजिनल आइडिया। इट इज़ द ओनली वे आई विल एवर मैटर। एक ओरिजिनल आइडिया खोजना होगा। तभी कुछ हो सकेगा मेरा।"
"बिल्कुल। लेकिन सुबह के चार बजे? कल शनिवार है और परसों इतवार। तुम्हारा शो ऑन-एयर नहीं होगा। कल से लेकर परसों तक सोचना इस बारे में। अभी सो जाओ। और हां, अपना नंबर देती जाना।"
दिन में असीमा ने लिली को एसएमएस किया था कि शनिवार को उसे डिनर के लिए भिंडी बाज़ार ले जाएगी। इफ़्तार के वक़्त भिंडी बाज़ार की रौनक देखने लायक होती है, और कई दिनों से असीमा शालिमार रेस्टूरेंट की तंदूरी खाना चाहती थी। लिली ने वापस एसएमएस कर डिनर के लिए हां कह दिया था, लेकिन नैचुरल्स की सीताफल आइसक्रीम के साथ!
लिली असीमा के दफ्तर आ गई थी, और दोनों वहां से मोहम्मद अली रोड के लिए टैक्सी में बैठ गए। "मैं पहली बार किसी मुसलमान के साथ इफ़्तार के वक़्त खाना खाऊंगी असीमा। मेरी लंबी-चौड़ी उम्मीदों पर पानी मत फेरना," लिली ने कहा। थोड़ी देर में दोनों मोहम्मद अली रोड पर थे। सड़क के इस किनारे से भिंडी बाज़ार तक लगी रंग-बिरंगी दुकानें, खाने-पीने के स्टॉल, मिठाईयों के ढेर - मुंबई की इस गली का नाम किसी ने खाऊ गली यही देखकर रख दिया होगा।
असीमा लिली को सीधे शालिमार ले गई। तंदूरी रान मसाला और शालिमार चिकन चिली, दोनों के लिए असीमा ने ही ऑर्डर किया था। लिली थोड़ी देर तक अंदर से आती गंध से परेशानी महसूस करती रही, लेकिन खाने का लोभ उसे रोके हुए था। कुछ सोचते हुए उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कुराहट पसर आई। "जानती हो असीमा, मेरे पिता के एक मुसलमान सहयोगी थे, ताहिर अंकल। घर से जब वे पापा से मिलकर जाते थे, दादी उस कुर्सी का कवर धुलवाया करती थीं, डिटॉल से। उनके लिए अलग कप, अलग बर्तन थे। मां को पता लगेगा कि मैं यहां तुम्हारे साथ हलाल मीट खा रही हूं तो मुझे हलाल कर देंगी।"
"अच्छा? इक्कीसवीं सदी में भी? ख़ैर, ये बताओ कि वो ओरिजिनल आइडिया क्या है जो तुम्हें परेशान किए जा रहा है?"
"वही आइडिया जिसके लिए मैं मुंबई आई। जानती हो, मैं बचपन से पूरी सिनेमची थी। 1989 में मेरे यहां वीसीपी आया तो मैं ग्यारह साल की थी। दूरदर्शन पर आनेवाली हर फिल्म याद रहती, मैं देखती भी। वीसीपी पर भी सभी नई-पुरानी फिल्में देखती। बच्चे बड़े होकर डॉक्टर, इंजीनियर बनना चाहते हैं, मैं फिल्मों की दुनिया में शामिल होना चाहती थी। मुझे याद है कि मैं ननिहाल में थी, गर्मी की छुट्टियां के लिए। मामाजी ट्रैक्टर की बैटरी चार्ज कराकर लाए थे कि इतवार को सब मिलकर 'रामायण' देखेंगे। और मैंने हड़ताल कर दी कि नहीं, शाम को आनेवाली फिल्म देखेंगे। मैं जीत गई। हमने प्रकाश झा की 'हिप हिप हुर्रे' देखी थी उस शाम। तभी मैंने सोच लिया था कि मैं भी ऐसी ही फिल्में बनाऊंगी जिनमें छोटे शहरों के ख़्वाब हों, उनकी खुशियां, उनकी इनसिक्युरिटी, उनकी संवेदानाएं हों।"
"तो फिर? क्या रोके हुए है तुम्हें?"
"इतना आसान नहीं है। दिल्ली तक मेरे जाने में किसी को परेशानी ना हुई। पटना से दिल्ली रातभर की ही तो बात है। फिर आधे बिहारी तो दिल्ली में आ बसते हैं। लेकिन मुंबई आने के लिए ज़िन्दगी दांव पर लगानी पड़ी।"
"मैं समझी नहीं लिली।"
"पापा ने कहा मैं शादी कर लूं तभी मुंबई आ सकती हूं। किसी तरह शादी तो टाल दी मैंने, सगाई नहीं टाल पाई। मंगेतर यहीं पवई के पास लार्सन एंड टूब्रो में इंजीनियर है।"
"तो इसमें परेशानी क्या है। तुम मुंबई में हो, नौकरी कर ही रही हो। आइडिया तो वैसे भी दिमाग से सोचना है ना। वो तुम कहीं भी सोच सकती हो।"
"परेशानी ये नहीं कि आइडिया कहां से आए, परेशानी है कि आइडिया एक्ज़िक्युट कैसे हो।"
"वो भी हो जाएगा। वैसे अपने मंगेतर से मिलवाओगी नहीं मुझे।"
"क्यों नहीं। लंदन में है किसी प्रोजेक्ट के लिए। सच पूछो तो तुम्हारे साथ मैं बैठ भी इसलिए सकी हूं क्योंकि वो है नहीं यहां।"
"ठीक है भई। ही डिज़र्व्स योर टाईम। वीकेंड पर तो मिलते होगे तुम दोनों।"
"हां। ख़ैर, मरीन ड्राईव चलोगी क्या? तुम्हें अपना ओरिजिनल आइडिया सुनाऊंगी।"
"बिल्कुल। ओरिजिनल आइडिया सुनने के लिए तो कुछ भी करूंगी।"
मरीन ड्राईव में समंदर के किनारे बैठे-बैठे लिली ने पहली बार अपनी वो कहानी सुनाई थी जिसपर उसे फिल्म बनानी थी। असीमा ने कहा था उससे कि वो फाइनैंन्सर होती तो बिना दुबारा सोचे उसकी फिल्म में पैसे लगा देती। साथ ही ये भी कहा था कि लिली अपने विचारों को इकट्ठा करने के लिए असीमा के लैपटॉप का इस्तेमाल कर सकती है, बेहिचक। लिली के लिए इतनी मदद ही काफी थी।
ईद के लिए असीमा घर नहीं गई थी। कहा था कि एक ज़रूरी मीटिंग के लिए ईद की अगली सुबह ही बैंगलोर जाना था, इसलिए। लेकिन उस दिन लिली को लेकर वो हाजी अली गई थी। पीर की मज़ार पर चादर चढ़ाने के बाद सज्दे के लिए झुकी असीमा क्यों दुपट्टे में मुंह छुपाए रोती रही थी, लिली चाहकर भी नहीं पूछ पाई थी। दरगाह से निकलने के बाद लिली ने सिद्धिविनायक जाने की इच्छा ज़ाहिर की थी। मंदिर में असीमा भी घुसी थी लिली के साथ।
"सारी मनोकामनाएं पूरी करते हैं यहां के गणपति। आज ईद का दिन भी है। पीर से जो मांगा, सिद्धिविनायक से भी मांग लो। रिइन्फोर्समेंट हो जाएगी।" लिली ने हंसते हुए कहा था।
"जो दुआ मांगी है वो बख़्शी नहीं जाएगी। लेकिन फिर भी मांगने की ज़िद पर मैं कायम तो हूं लिली।"
"मैं नहीं जानती कि तुम्हें कौन-सा ख़्याल परेशान कर रहा है, लेकिन कभी इस बारे में बात करना चाहो तो मैं हूं असीमा।"
"जानती हूं, लेकिन अभी नहीं। इस ख़्याल का बोझ बहुत भारी है। बांटूंगी तो ये बोझ बढ़ेगा ही।"
दोनों दोपहर तक घर आ गए। कविता दीदी ने स्पेशल लंच बनाया था। खाने के बाद लिली ने मोटी-सी डायरी अपनी अलमारी से निकाली।
"आज ये खज़ाना बांटूंगी तुम सबसे। चार बंगला की कोठी नंबर 12 के इस कमरे में दस मिनट में मुशायरा शुरू होनेवाला है। सभी लोग अपनी-अपनी जगह ले लें।"
थोड़ी देर में चारों रूममेट और कविता दीदी नीचे फर्श पर ही पालथी मारकर बैठ गए। लिली ने ग़ालिब से शुरूआत की। "आज हम अपनी परेशानी-ए-खातिर उनसे/कहने जाते तो हैं, पर देखिए क्या कहते हैं।"
असीमा ने फिर से शेर दुहराया - "आज हम अपनी परीशानि-ए-ख़ातिर/कहने जाते तो हैं, पर देखिए क्या कहते हैं।"
"हां तो? मैं कुछ और कह रही थी क्या असीमा?"
"नहीं। सिर्फ़ नुक़्तों का फ़र्क़ था। ख़ से नुक़्ता क्यों नदारद है लिली?"
"भई बिहार में तो ऐसे ही उर्दू बोलते हैं। सुनना चाहो तो सुनो।"
"मेरे कानों को चुभेंगे। ख़ैर, एक मेरी ओर से सुनो, मजाज़ है।
"मैं आहें भर नहीं सकता कि नग़्मे गा नहीं सकता/सुकूं लेकिन मिरे दिल को मयस्सर आ नहीं सकता/कोई नग़्मे तो क्या, अब मुझसे मेरा साज़ भी ले ले/जो गाना चाहता हूं आह वो मैं गा नहीं सकता।"
मुशायरे से शुरू हुआ सिलसिला फिल्मी गानों की ओर बढ़ा, फिर विशाखा ने मीराबाई का एक भजन सुनाया और नफ़ीज़ा ने सिलिन डिओन का "आई एम योर लेडी" सुनाया। कविता दीदी भी कुछ चुटकुले, कुछ किस्से सुनाकर हंसती-हंसाती रहीं। देर शाम चारों लड़कियां सामने वाली पार्क में जाकर बैठ गए।
"व्हाट अ डे। बहुत मज़ा आया आज। अच्छा हुआ तुम घर नहीं गई असीमा," विशाखा ने कहा।
"तुम्हारे हस्बैंड नहीं आए ईद पर असीमा?" नफ़ीज़ा का ये सवाल असीमा और लिली, दोनों को तीर की तरह लगा।
"छुट्टी नहीं मिली," असीमा ने नज़रें झुकाए हुए ही जवाब दिया। उसकी उंगलियां लॉन की घास से उलझती रहीं।
लिली ने असीमा की ओर गहरी नज़रों से देखा भर, कुछ कहा नहीं।
उस रात दोनों को नींद नहीं आई, लेकिन कमरे में मौजूद दो और रूममेट के सामने कोई बात नहीं हो सकती थी।
अगली सुबह असीमा घर से निकल चुकी थी। लिली के मोबाइल इन्बॉक्स में एक मेसैज था - "बैंगलोर नहीं, बांद्रा जा रही हूं, फैमिली कोर्ट। आज क़ानूनन तलाक़ मिल जाएगा। तुम्हें क्या बताती। आज शाम घर जाऊंगी, अम्मी-अब्बू को बताने। दो दिन बाद लौटूंगी तो बात करूंगी।"
लिली भारी मन से तैयार होती रही। घर से निकली तो चांदिवल्ली स्टूडियो की बजाए बांद्रा-कुर्ला कॉम्पलेक्स के लिए ऑटो ठीक किया। बांद्रा कोर्ट के बाहर बहुत देर तक दुविधा में खड़ी रही। कुटुंब न्यायालय, मुंबई के बाहर कई कुटुंब टूटने-बिखरने के कगार पर खड़े थे। लिली ने कभी तलाक होते नहीं देखा था। ना परिवार में, ना जान-पहचान में। रिश्तों को तोड़ने की क्या ज़िद होती होगी, कौन-सा झटका रेशमी डोर से मज़बूत रिश्तों को तोड़ डालता होगा, एक घर और एक छत के नीचे सपने बांटनेवाले कैसे अजनबी बन जाते होंगे...
लेकिन लिली को असीमा की फ़िक़्र थी। फोन मिलाया तो कोई जवाब नहीं मिला। अब लिली कोर्ट की दहलीज़ लांघकर भीतर जा चुकी थी। असीमा को ज़्यादा ढूंढने की ज़रूरत नहीं पड़ी। उसके साथ उसका कोई वकील था, और उससे थोड़ी दूर पर उसके शौहर खड़े थे। लिली को देखकर असीमा बिल्कुल हैरान नहीं हुई। "इनसे मिलो, ये आदिल हैं। अबतक मेरे शौहर हैं, लेकिन अगले एक घंटे बाद नहीं होंगे।"
आदिल ने लिली की ओर बेफ़िक्री से अपना दाहिना हाथ बढ़ा दिया। सकुचाती हुई लिली ने जल्दी से हाथ मिलाया और असीमा को लेकर एक कोने में चली गई। "क्या है ये सब असीमा? आई फील रिअली चीटेड।"
"मोर दैन मी?" असीमा की आंखों में तैरते पानी के जवाब में लिली कुछ ना कह पाई।
"जब यहां तक आई हो तो मेरे लिए थोड़ी और परेशानी उठा लो। घर जाकर दो दिनों के लिए सामान ले आओ। पूना चलो मेरे साथ। मैं अम्मी-अब्बू के सामने थोड़ी-सी हिम्मत चाहती हूं।"
शाम को लिली असीमा के साथ पूना जानेवाली बस में थी। क्यों, कैसे - इन सवालों से फिलहाल लिली नहीं जूझना चाहती थी।
बस में ही असीमा ने लिली को सबकुछ बताना शुरू किया। कॉलेज में असीमा और आदिल साथ थे, साथ आर्किटेक्ट बने, साथ नौकरी शुरू की और एक दिन पूना जाकर आदिल ने असीमा का साथ मांग लिया, हमेशा के लिए। तब दोनों ने मुंबई में बसने का फ़ैसला किया। आदिल ने अपनी कंपनी खोल ली और बीच-बीच में आर्किटेक्चर पढ़ाने लगे। असीमा ने कर्माकर आर्किटेक्स में नौकरी कर ली। शादी के बाद सालभर सबकुछ अच्छी तरह चलता रहा। पूरे हफ़्ते की नौकरी और फिर लोनावला, कजरथ या महाबलेश्वर में वीकेंड।
लेकिन एक साल में ही आदिल शादी से परेशान होने लगे। उन्हें बंदिशों से, सवालों से उलझनें होने लगीं। ससुराल लखनऊ में थी, इसलिए रिश्ते को मज़बूती देने के लिए उनका सहारा भी मुश्किल था।
"आर्किटेक्ट भी कलाकारों की तरह होते हैं लिली। जैसे उनकी कला को नहीं बांधा जा सकता, वैसे ही उनकी फ़ितरत भी मनमौजी होती है, बिल्कुल स्वच्छंद। पहले मैं बहुत रोती-चिल्लाती थी, बहुत झगड़ती थी। मेरे मां-बाप पूना से आनेवाले थे हमसे मिलने। आदिल ने उनसे मिलने की बजाए अपनी एक क्लायंट के साथ मड आयलैंड में रुक जाना ज़्यादा ज़रूरी समझा। अगले दो साल तक हम ऐसे ही डूबते-उतराते रहे। कभी बहुत क़रीब, कभी बहुत दूर। लेकिन फिर खींचना मुश्किल हो गया। हर छोटी-छोटी बात तक़रार का सबब बन जाती। एक रात मैं बैंगलोर से मीटिंग के बाद वापस आई तो मुझे मेरा सूटकेस फ्लैट से बाहर पड़ा मिला। घर अंदर से बंद था। घंटे-भर तक घंटी बजाने के बाद भी आदिल ने दरवाज़ा नहीं खोला। मैं रातभर लावारिस जैसी कोलाबा की सड़कों पर घूमती रही, सूटकेस खींचते हुए। ना किसी दोस्त को बता सकती थी ना घर फोन कर सकती थी। सुबह दफ़्तर आई, गेस्ट हाउस बुक किया और पीजी खोजने लगी। इस बीच आदिल ने ना मेरे फोन का जवाब दिया ना एसएमएस का। मैं एक हफ़्ते तक फिर भी घर जाती रही, इस उम्मीद में कि शायद उन्हें अपनी ग़लती का अहसास हो जाए, शायद कोई रास्ता हम तलाश कर सकें। फिर एक रात एसएमएस पर उन्होंने तीन बार तलाक़ लिखकर भेज दिया, फिर ई-मेल किया और फिर अदालत के ज़रिए एक नोटिस मेरे दफ़्तर के पते पर आया। मैंने तब भी घर पर कुछ नहीं कहा और एक ट्रेनिंग के लिए छह महीने के लिए इटली चली गई। वापस आई तब भी आदिल तलाक़ पर क़ायम थे। और बस आज तुमने देखा, वो मेरी प्रेम-कहानी का आख़िरी पन्ना था।"
लेकिन पूना में सबके सामने असीमा ये सबकुछ इतनी आसानी से ना कह पाई। लिली उसके साथ समझाने की कोशिश करती रही। कभी उसे परिवार के लोगों ने सुना, कभी बेइज़्जत किया। कभी उसे ख़ुद पर कोफ़्त होती रही कि इस पचड़े में पड़ी ही क्यों, कभी लगता असीमा की जगह वो होती तो क्या करती। इस तूफ़ान के बाद दोनों साथ ही लौटे थे। असीमा ज़्यादा दिनों तक घर पर नहीं रुकना चाहती थी।
दोनों की ज़िन्दगी फिर वीकेंड के इंतज़ार में कटने लगी। लेकिन लिली ने कई रातों को नमाज़ के बहाने उठी असीमा की सिसकियां सुनी थी, उसे क़ुरान की आयतों में सुकून ढूंढने की कोशिश करते देखा था। लेकिन कमरे में किसी और को असीमा की हालत का ज़रा-भी इल्म ना था। चारों फेम ऐडलैब्स जाते, लंच और डिनर के लिए मिलते, यहां तक कि साथ मिलकर मुंबई दर्शन के लिए भी निकलते।
लिली के मंगेतर के मुंबई लौट आने के बाद ये सिलसिला कम हो गया। मार्च में लिली को घर जाना था, अपनी शादी के लिए। असीमा ने भी दुबई जाने का फ़ैसला कर लिया था और नौकरी के लिए अर्ज़ियां भी डालने लगी थी। "इट हैज़ टू बी दुबई इफ आई एम एन आर्किटेक्ट," उसने दलील दी और अपने लैपटॉप पर बुर्ज ख़लीफा और पाम जुमैरा के कंस्ट्रक्शन की तस्वीरें और उनके थ्री-डी प्रेज़ेन्जेशन दिखाए, जिन्हें आर्किटेक्चर की दुनिया का अजूबा माना जाता है।
एक इतवार को रात में सोने से पहले लिली आदतन असीमा के पास गई, अपने बालों में तेल लगवाने के लिए। विशाखा और नफ़ीज़ा नहीं लौटे थे।
बालों में तेल लगाते हुए असीमा शादी की तैयारियों के बारे में पूछती रही। लिली हां-हूं में ही जवाब देती रही।
बालों से निकलकर असीमा की उंगलियां लिली के कंधों को दबाने लगी थीं। लिली की आंखें अपने-आप बंद होने लगीं। पतली-सी नाइटी के भीतर से असीमा की उंगलियां अब लिली की गर्दन पर उभर आए उन नीले निशानों को सहला रही थीं जो उसने कल से कॉलर-वाली शर्ट पहनकर छुपा रखा था।
"जिस मंगेतर से तुम अपनी सबसे क़रीबी दोस्त को नहीं मिलवा पाई, जिससे ना मिलने के तुम सौ बहाने ढूंढती हो और जिससे मिलकर आने के बाद तुम दो दिनों तक बीमार दिखती हो, उसी मंगेतर के प्यार की निशानी हैं ये ज़ख़्म?"
लिली हड़बड़ाकर उठ खड़ी हुई। "नहीं, नहीं। वो तो बस ऐसे ही। शेखर को गुस्सा ज़रा जल्दी आता है।"
"और गुस्से का ये अंजाम होता है कि तुम चोट के दाग़ छुपाए फिरती हो? इतनी तकलीफ़ सह कैसे लेती हो लिली?"
"शरीर के ज़ख़्मों को मन पर नहीं आने देती, इसलिए।"
"लेकिन कबतक? मैं रिश्तों की कोई एक्सपर्ट नहीं। बल्कि रिश्तों पर सलाह देने का तो मुझे कोई हक़ ही नहीं। लेकिन जान-बूझकर ख़ुद को कुंए में मत ढकेलो लिली।"
लिली चुप रही। असीमा ने कुछ रुककर कहा, "ग़ालिब तुम्हारे पसंदीदा शायर हैं ना। सो, ये शेर तुम्हारे लिए है – “वफ़ा कैसी, कहां का इश्क़, जब सर फोड़ना ठहरा? तो फिर ऐ संगदिल, तेरा ही संग-ए-आस्तां क्यूं हो?"
"नहीं जानती असीमा। लेकिन शादी के दो महीने पहले मैं कुछ नहीं कर सकती। मुझमें हिम्मत नहीं।"
"और सपनों को टूटने देखने की हिम्मत है? छुप-छुपकर पिटने की हिम्मत है? जो रात-रात भर बैठकर स्क्रिप्ट्स लिखती हो उनको समंदर में बहा आने की हिम्मत है? दस साल की उम्र से फिल्में बनाने का जो सपना देखा, उसे चूर-चूर करने की हिम्मत है?"
अगली सुबह लिली ने पटना फोन किया था। शादी तोड़ने की घोषणा करने के लिए। अगला एक हफ़्ता बहुत भारी था। मां-पापा और बाद में तमाम चाचाओं-मामाओं के सामने फोन पर अपनी दलीलें रखते-रखते लिली थक गई थी। शेखर नाराज़ होकर सीधा उसके सामाजिक चरित्र-हनन पर उतर आया था। टीवी की जिन पार्टियों में वो शेखर को अपना मंगेतर बनाकर ले गई थी, उससे कुछ ना छुपाने के मकसद से उसने जो राज़ शेखर से साझा किए थे, वे सभी आज उसी के ख़िलाफ़ हथियार के तौर पर इस्तेमाल किए जा रहे थे। रिश्ता टूटने के बाद शेखर जैसे लिली से पेश आया, उसे देखकर लिली ने चैन की सांस ली। कम-से-कम उसका असली चेहरा तो सामने आया था...
एक शाम असीमा ने लिली को एसएमएस भेजा था - "जिस जन्नत की तलाश में हम हैं, वो है कहीं।"
फिर एक दिन असीमा दुबई चली गई और लिली ने कुछ सालों के लिए मुंबई छोड़ दिल्ली को वापस अपना घर बना लिया। असीमा दुबई में इमारतें बनवाती रही, लिली दिल्ली में डॉक्यूमेंट्रीज़ बनाने में लग गई। दोनों में बातचीत होती रही, लेकिन उतनी ही जितनी एक इंटरनेशनल कॉल पर मुमकिन हो सकती है। अकबर से मिलने और उनसे निक़ाह के बाद असीमा पहले अपना बिज़नेस बढ़ाने में मसरूफ हो गई और फिर अलीज़ा के आने के बाद तो दुनिया घर और दफ़्तर के बीच ही सिमटकर रह गई।
पिछले तीन घंटों में असीमा अपनी ज़िन्दगी का रूख़ बदल डालनेवाले उन सात महीनों के लम्हे-लम्हे को जी गई थी। और फिर उसने उन सात महीनों की हमसफ़र अपनी सबसे अज़ीज़ रूममेट के लिए एक ई-मेल भेजा। इसमें उसकी लिखी हुई कविताएं और कहानियों की ज़िप्पड फाइलें थीं, और था एक शेर - "कोई दिन गर ज़िन्दगानी और है, अपने जी में हमने ठानी और है/ हो चुकीं 'ग़ालिब' बलाएं सब तमाम, एक मर्ग-ए-नागहानी और है..."
"सासु मोरा मारे राम बाँस के छिऊकिया/मोर ननदिया रे सुसुकत पनिया के जाय/छोटे-मोटे पातर पियवा हँसि के ना बोले/मोर ननदिया रे से हू पियवा कहीं चलि जाय/गंगा रे जमुनवा के चिकनी डगरिया/मोर ननदिया रे पैयाँ धरत बिछलाय"
"मेरी ज़िन्दगी में इतना रस नहीं," अपने बारे में कुछ बताने के लिए कहने पर असीमा ने धीरे-से कहा था। "मॉल बनवाती हूं, इमारतें बनवाती हूं और कॉन्क्रीट के बारे में सोचते-सोचते ख़्याल भी पत्थर-से हो गए हैं।"
"ये पत्थर हमारे साथ रहकर पिघल जाएगा असीमा," लिली ने हंसते हुए कहा था।
"आज वीकेंड खत्म हो गया है। कल देखेंगे किसे कहां पत्थर तोड़ने जाना होता है और किसमें पत्थरों को पिघलाने की ताकत बची होती है। अब चलोगी कि रात यही समंदर किनारे बिताने का इरादा है," नफ़ीज़ा की आवाज़ में तल्ख़ी रह-रहकर लौट आती थी।
"काश ऐसा मुमकिन होता। वैसे झूमर की कीमत वसूलनी है मुझे। मेरे मीठे गले को तर करने के लिए नैचुरल्स से सीताफल आइसक्रीम ले देना मुझे तुमलोग।"
"बिल्कुल मोहतरमा। वैसे विशाखा की तरह तुम भी संगीत क्यों नहीं सीखती," असीमा ने लिली से पूछा।
"याद नहीं नैश ने क्या कहा था फिल्म में। क्लासेस विल डल योर माइंड, डिस्ट्रॉय द पोटेनशियल फॉर ऑथेन्टिक क्रिएटिविटी। कक्षाएं तुम्हारे दिमाग को कुंठित कर देंगी, सच्ची रचनात्मकता की क्षमता को नष्ट कर देंगी। और मैं इसकी जीती-जागती मिसाल हूं," विशाखा ने हंसते हुए कहा और सब हंस पड़े।
फिर तो पूरे हफ़्ते असीमा रविवार का इंतज़ार करती रही थी। विशाखा कई बार अपने बॉयफ्रेंड के फ्लैट पर ही रुक जाया करती। हर बात में नफ़ीज़ा के सिनिसिज्म को झेलना मुश्किल होता, इसलिए असीमा उससे दूरी बनाकर ही रखती। एक लिली थी जिससे बात करना मुमकिन था। लेकिन लिली का काम ऐसा था कि वो देर रात शूट से वापस लौटती, सबके सो जाने के बाद। सुबह-सुबह उसे उठाना असीमा को उचित ना लगता। लिली से उसका मोबाइल नंबर भी नहीं लिया था असीमा ने। अब नफ़ीज़ा से मांगती तो नफ़ीज़ा आंखें घुमा-घुमाकर कहती, "बड़ा याराना लगता है दोनों में।" मकानमालकिन से नंबर के लिए पूछा तो उन्होंने सीधे पूछ दिया, "कोई काम है? मुझे बता दो। मैं मैसेज दे दूंगी। वैसे तुम इन तीनों से दूर ही रहो तो अच्छा है असीमा। तुम पढ़ी-लिखी हो, शरीफ हो, इन तीनों से उम्र में भी बड़ी हो। इनसे क्या मतलब तुम्हें?"
असीमा समझ गई कि कविता दीदी नहीं चाहती कि चारों में दोस्ती हो। दोस्ती होने का मतलब उनके विरुद्ध एकजुट होना, उनके खि़लाफ़ साज़िश। और अगर चारों ने उनकी अधपकी दाल और प्रेशर कुकर में चढ़नेवाले बासी चावल के साथ पकनेवाले नए चावल के विरोध में झंडा उठा लिया तो उनका क्या होगा?
"शुक्र है कि मेरे रोज़े चल रहे हैं," कविता दीदी के पकाए खाने की याद आते ही असीमा को उबकाई आ गई।
एक रोज़ फज्र की नमाज़ के लिए असीमा उठी तो लिली उसे बाहर ड्राइंग रूम में बैठी मिली।
"नमाज़ के लिए उठी हो? सेहरी करोगी ना? दूध पियोगी? ब्रेड है, वो भी लाती हूं।"
"तुम बैठो लिली। मैं सब कर लूंगी। कब लौटी?"
"थोड़ी देर पहले। नैश की एक और बात याद आ रही है। फाइंड ए ट्रूली ओरिजिनल आइडिया। इट इज़ द ओनली वे आई विल एवर मैटर। एक ओरिजिनल आइडिया खोजना होगा। तभी कुछ हो सकेगा मेरा।"
"बिल्कुल। लेकिन सुबह के चार बजे? कल शनिवार है और परसों इतवार। तुम्हारा शो ऑन-एयर नहीं होगा। कल से लेकर परसों तक सोचना इस बारे में। अभी सो जाओ। और हां, अपना नंबर देती जाना।"
दिन में असीमा ने लिली को एसएमएस किया था कि शनिवार को उसे डिनर के लिए भिंडी बाज़ार ले जाएगी। इफ़्तार के वक़्त भिंडी बाज़ार की रौनक देखने लायक होती है, और कई दिनों से असीमा शालिमार रेस्टूरेंट की तंदूरी खाना चाहती थी। लिली ने वापस एसएमएस कर डिनर के लिए हां कह दिया था, लेकिन नैचुरल्स की सीताफल आइसक्रीम के साथ!
लिली असीमा के दफ्तर आ गई थी, और दोनों वहां से मोहम्मद अली रोड के लिए टैक्सी में बैठ गए। "मैं पहली बार किसी मुसलमान के साथ इफ़्तार के वक़्त खाना खाऊंगी असीमा। मेरी लंबी-चौड़ी उम्मीदों पर पानी मत फेरना," लिली ने कहा। थोड़ी देर में दोनों मोहम्मद अली रोड पर थे। सड़क के इस किनारे से भिंडी बाज़ार तक लगी रंग-बिरंगी दुकानें, खाने-पीने के स्टॉल, मिठाईयों के ढेर - मुंबई की इस गली का नाम किसी ने खाऊ गली यही देखकर रख दिया होगा।
असीमा लिली को सीधे शालिमार ले गई। तंदूरी रान मसाला और शालिमार चिकन चिली, दोनों के लिए असीमा ने ही ऑर्डर किया था। लिली थोड़ी देर तक अंदर से आती गंध से परेशानी महसूस करती रही, लेकिन खाने का लोभ उसे रोके हुए था। कुछ सोचते हुए उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कुराहट पसर आई। "जानती हो असीमा, मेरे पिता के एक मुसलमान सहयोगी थे, ताहिर अंकल। घर से जब वे पापा से मिलकर जाते थे, दादी उस कुर्सी का कवर धुलवाया करती थीं, डिटॉल से। उनके लिए अलग कप, अलग बर्तन थे। मां को पता लगेगा कि मैं यहां तुम्हारे साथ हलाल मीट खा रही हूं तो मुझे हलाल कर देंगी।"
"अच्छा? इक्कीसवीं सदी में भी? ख़ैर, ये बताओ कि वो ओरिजिनल आइडिया क्या है जो तुम्हें परेशान किए जा रहा है?"
"वही आइडिया जिसके लिए मैं मुंबई आई। जानती हो, मैं बचपन से पूरी सिनेमची थी। 1989 में मेरे यहां वीसीपी आया तो मैं ग्यारह साल की थी। दूरदर्शन पर आनेवाली हर फिल्म याद रहती, मैं देखती भी। वीसीपी पर भी सभी नई-पुरानी फिल्में देखती। बच्चे बड़े होकर डॉक्टर, इंजीनियर बनना चाहते हैं, मैं फिल्मों की दुनिया में शामिल होना चाहती थी। मुझे याद है कि मैं ननिहाल में थी, गर्मी की छुट्टियां के लिए। मामाजी ट्रैक्टर की बैटरी चार्ज कराकर लाए थे कि इतवार को सब मिलकर 'रामायण' देखेंगे। और मैंने हड़ताल कर दी कि नहीं, शाम को आनेवाली फिल्म देखेंगे। मैं जीत गई। हमने प्रकाश झा की 'हिप हिप हुर्रे' देखी थी उस शाम। तभी मैंने सोच लिया था कि मैं भी ऐसी ही फिल्में बनाऊंगी जिनमें छोटे शहरों के ख़्वाब हों, उनकी खुशियां, उनकी इनसिक्युरिटी, उनकी संवेदानाएं हों।"
"तो फिर? क्या रोके हुए है तुम्हें?"
"इतना आसान नहीं है। दिल्ली तक मेरे जाने में किसी को परेशानी ना हुई। पटना से दिल्ली रातभर की ही तो बात है। फिर आधे बिहारी तो दिल्ली में आ बसते हैं। लेकिन मुंबई आने के लिए ज़िन्दगी दांव पर लगानी पड़ी।"
"मैं समझी नहीं लिली।"
"पापा ने कहा मैं शादी कर लूं तभी मुंबई आ सकती हूं। किसी तरह शादी तो टाल दी मैंने, सगाई नहीं टाल पाई। मंगेतर यहीं पवई के पास लार्सन एंड टूब्रो में इंजीनियर है।"
"तो इसमें परेशानी क्या है। तुम मुंबई में हो, नौकरी कर ही रही हो। आइडिया तो वैसे भी दिमाग से सोचना है ना। वो तुम कहीं भी सोच सकती हो।"
"परेशानी ये नहीं कि आइडिया कहां से आए, परेशानी है कि आइडिया एक्ज़िक्युट कैसे हो।"
"वो भी हो जाएगा। वैसे अपने मंगेतर से मिलवाओगी नहीं मुझे।"
"क्यों नहीं। लंदन में है किसी प्रोजेक्ट के लिए। सच पूछो तो तुम्हारे साथ मैं बैठ भी इसलिए सकी हूं क्योंकि वो है नहीं यहां।"
"ठीक है भई। ही डिज़र्व्स योर टाईम। वीकेंड पर तो मिलते होगे तुम दोनों।"
"हां। ख़ैर, मरीन ड्राईव चलोगी क्या? तुम्हें अपना ओरिजिनल आइडिया सुनाऊंगी।"
"बिल्कुल। ओरिजिनल आइडिया सुनने के लिए तो कुछ भी करूंगी।"
मरीन ड्राईव में समंदर के किनारे बैठे-बैठे लिली ने पहली बार अपनी वो कहानी सुनाई थी जिसपर उसे फिल्म बनानी थी। असीमा ने कहा था उससे कि वो फाइनैंन्सर होती तो बिना दुबारा सोचे उसकी फिल्म में पैसे लगा देती। साथ ही ये भी कहा था कि लिली अपने विचारों को इकट्ठा करने के लिए असीमा के लैपटॉप का इस्तेमाल कर सकती है, बेहिचक। लिली के लिए इतनी मदद ही काफी थी।
ईद के लिए असीमा घर नहीं गई थी। कहा था कि एक ज़रूरी मीटिंग के लिए ईद की अगली सुबह ही बैंगलोर जाना था, इसलिए। लेकिन उस दिन लिली को लेकर वो हाजी अली गई थी। पीर की मज़ार पर चादर चढ़ाने के बाद सज्दे के लिए झुकी असीमा क्यों दुपट्टे में मुंह छुपाए रोती रही थी, लिली चाहकर भी नहीं पूछ पाई थी। दरगाह से निकलने के बाद लिली ने सिद्धिविनायक जाने की इच्छा ज़ाहिर की थी। मंदिर में असीमा भी घुसी थी लिली के साथ।
"सारी मनोकामनाएं पूरी करते हैं यहां के गणपति। आज ईद का दिन भी है। पीर से जो मांगा, सिद्धिविनायक से भी मांग लो। रिइन्फोर्समेंट हो जाएगी।" लिली ने हंसते हुए कहा था।
"जो दुआ मांगी है वो बख़्शी नहीं जाएगी। लेकिन फिर भी मांगने की ज़िद पर मैं कायम तो हूं लिली।"
"मैं नहीं जानती कि तुम्हें कौन-सा ख़्याल परेशान कर रहा है, लेकिन कभी इस बारे में बात करना चाहो तो मैं हूं असीमा।"
"जानती हूं, लेकिन अभी नहीं। इस ख़्याल का बोझ बहुत भारी है। बांटूंगी तो ये बोझ बढ़ेगा ही।"
दोनों दोपहर तक घर आ गए। कविता दीदी ने स्पेशल लंच बनाया था। खाने के बाद लिली ने मोटी-सी डायरी अपनी अलमारी से निकाली।
"आज ये खज़ाना बांटूंगी तुम सबसे। चार बंगला की कोठी नंबर 12 के इस कमरे में दस मिनट में मुशायरा शुरू होनेवाला है। सभी लोग अपनी-अपनी जगह ले लें।"
थोड़ी देर में चारों रूममेट और कविता दीदी नीचे फर्श पर ही पालथी मारकर बैठ गए। लिली ने ग़ालिब से शुरूआत की। "आज हम अपनी परेशानी-ए-खातिर उनसे/कहने जाते तो हैं, पर देखिए क्या कहते हैं।"
असीमा ने फिर से शेर दुहराया - "आज हम अपनी परीशानि-ए-ख़ातिर/कहने जाते तो हैं, पर देखिए क्या कहते हैं।"
"हां तो? मैं कुछ और कह रही थी क्या असीमा?"
"नहीं। सिर्फ़ नुक़्तों का फ़र्क़ था। ख़ से नुक़्ता क्यों नदारद है लिली?"
"भई बिहार में तो ऐसे ही उर्दू बोलते हैं। सुनना चाहो तो सुनो।"
"मेरे कानों को चुभेंगे। ख़ैर, एक मेरी ओर से सुनो, मजाज़ है।
"मैं आहें भर नहीं सकता कि नग़्मे गा नहीं सकता/सुकूं लेकिन मिरे दिल को मयस्सर आ नहीं सकता/कोई नग़्मे तो क्या, अब मुझसे मेरा साज़ भी ले ले/जो गाना चाहता हूं आह वो मैं गा नहीं सकता।"
मुशायरे से शुरू हुआ सिलसिला फिल्मी गानों की ओर बढ़ा, फिर विशाखा ने मीराबाई का एक भजन सुनाया और नफ़ीज़ा ने सिलिन डिओन का "आई एम योर लेडी" सुनाया। कविता दीदी भी कुछ चुटकुले, कुछ किस्से सुनाकर हंसती-हंसाती रहीं। देर शाम चारों लड़कियां सामने वाली पार्क में जाकर बैठ गए।
"व्हाट अ डे। बहुत मज़ा आया आज। अच्छा हुआ तुम घर नहीं गई असीमा," विशाखा ने कहा।
"तुम्हारे हस्बैंड नहीं आए ईद पर असीमा?" नफ़ीज़ा का ये सवाल असीमा और लिली, दोनों को तीर की तरह लगा।
"छुट्टी नहीं मिली," असीमा ने नज़रें झुकाए हुए ही जवाब दिया। उसकी उंगलियां लॉन की घास से उलझती रहीं।
लिली ने असीमा की ओर गहरी नज़रों से देखा भर, कुछ कहा नहीं।
उस रात दोनों को नींद नहीं आई, लेकिन कमरे में मौजूद दो और रूममेट के सामने कोई बात नहीं हो सकती थी।
अगली सुबह असीमा घर से निकल चुकी थी। लिली के मोबाइल इन्बॉक्स में एक मेसैज था - "बैंगलोर नहीं, बांद्रा जा रही हूं, फैमिली कोर्ट। आज क़ानूनन तलाक़ मिल जाएगा। तुम्हें क्या बताती। आज शाम घर जाऊंगी, अम्मी-अब्बू को बताने। दो दिन बाद लौटूंगी तो बात करूंगी।"
लिली भारी मन से तैयार होती रही। घर से निकली तो चांदिवल्ली स्टूडियो की बजाए बांद्रा-कुर्ला कॉम्पलेक्स के लिए ऑटो ठीक किया। बांद्रा कोर्ट के बाहर बहुत देर तक दुविधा में खड़ी रही। कुटुंब न्यायालय, मुंबई के बाहर कई कुटुंब टूटने-बिखरने के कगार पर खड़े थे। लिली ने कभी तलाक होते नहीं देखा था। ना परिवार में, ना जान-पहचान में। रिश्तों को तोड़ने की क्या ज़िद होती होगी, कौन-सा झटका रेशमी डोर से मज़बूत रिश्तों को तोड़ डालता होगा, एक घर और एक छत के नीचे सपने बांटनेवाले कैसे अजनबी बन जाते होंगे...
लेकिन लिली को असीमा की फ़िक़्र थी। फोन मिलाया तो कोई जवाब नहीं मिला। अब लिली कोर्ट की दहलीज़ लांघकर भीतर जा चुकी थी। असीमा को ज़्यादा ढूंढने की ज़रूरत नहीं पड़ी। उसके साथ उसका कोई वकील था, और उससे थोड़ी दूर पर उसके शौहर खड़े थे। लिली को देखकर असीमा बिल्कुल हैरान नहीं हुई। "इनसे मिलो, ये आदिल हैं। अबतक मेरे शौहर हैं, लेकिन अगले एक घंटे बाद नहीं होंगे।"
आदिल ने लिली की ओर बेफ़िक्री से अपना दाहिना हाथ बढ़ा दिया। सकुचाती हुई लिली ने जल्दी से हाथ मिलाया और असीमा को लेकर एक कोने में चली गई। "क्या है ये सब असीमा? आई फील रिअली चीटेड।"
"मोर दैन मी?" असीमा की आंखों में तैरते पानी के जवाब में लिली कुछ ना कह पाई।
"जब यहां तक आई हो तो मेरे लिए थोड़ी और परेशानी उठा लो। घर जाकर दो दिनों के लिए सामान ले आओ। पूना चलो मेरे साथ। मैं अम्मी-अब्बू के सामने थोड़ी-सी हिम्मत चाहती हूं।"
शाम को लिली असीमा के साथ पूना जानेवाली बस में थी। क्यों, कैसे - इन सवालों से फिलहाल लिली नहीं जूझना चाहती थी।
बस में ही असीमा ने लिली को सबकुछ बताना शुरू किया। कॉलेज में असीमा और आदिल साथ थे, साथ आर्किटेक्ट बने, साथ नौकरी शुरू की और एक दिन पूना जाकर आदिल ने असीमा का साथ मांग लिया, हमेशा के लिए। तब दोनों ने मुंबई में बसने का फ़ैसला किया। आदिल ने अपनी कंपनी खोल ली और बीच-बीच में आर्किटेक्चर पढ़ाने लगे। असीमा ने कर्माकर आर्किटेक्स में नौकरी कर ली। शादी के बाद सालभर सबकुछ अच्छी तरह चलता रहा। पूरे हफ़्ते की नौकरी और फिर लोनावला, कजरथ या महाबलेश्वर में वीकेंड।
लेकिन एक साल में ही आदिल शादी से परेशान होने लगे। उन्हें बंदिशों से, सवालों से उलझनें होने लगीं। ससुराल लखनऊ में थी, इसलिए रिश्ते को मज़बूती देने के लिए उनका सहारा भी मुश्किल था।
"आर्किटेक्ट भी कलाकारों की तरह होते हैं लिली। जैसे उनकी कला को नहीं बांधा जा सकता, वैसे ही उनकी फ़ितरत भी मनमौजी होती है, बिल्कुल स्वच्छंद। पहले मैं बहुत रोती-चिल्लाती थी, बहुत झगड़ती थी। मेरे मां-बाप पूना से आनेवाले थे हमसे मिलने। आदिल ने उनसे मिलने की बजाए अपनी एक क्लायंट के साथ मड आयलैंड में रुक जाना ज़्यादा ज़रूरी समझा। अगले दो साल तक हम ऐसे ही डूबते-उतराते रहे। कभी बहुत क़रीब, कभी बहुत दूर। लेकिन फिर खींचना मुश्किल हो गया। हर छोटी-छोटी बात तक़रार का सबब बन जाती। एक रात मैं बैंगलोर से मीटिंग के बाद वापस आई तो मुझे मेरा सूटकेस फ्लैट से बाहर पड़ा मिला। घर अंदर से बंद था। घंटे-भर तक घंटी बजाने के बाद भी आदिल ने दरवाज़ा नहीं खोला। मैं रातभर लावारिस जैसी कोलाबा की सड़कों पर घूमती रही, सूटकेस खींचते हुए। ना किसी दोस्त को बता सकती थी ना घर फोन कर सकती थी। सुबह दफ़्तर आई, गेस्ट हाउस बुक किया और पीजी खोजने लगी। इस बीच आदिल ने ना मेरे फोन का जवाब दिया ना एसएमएस का। मैं एक हफ़्ते तक फिर भी घर जाती रही, इस उम्मीद में कि शायद उन्हें अपनी ग़लती का अहसास हो जाए, शायद कोई रास्ता हम तलाश कर सकें। फिर एक रात एसएमएस पर उन्होंने तीन बार तलाक़ लिखकर भेज दिया, फिर ई-मेल किया और फिर अदालत के ज़रिए एक नोटिस मेरे दफ़्तर के पते पर आया। मैंने तब भी घर पर कुछ नहीं कहा और एक ट्रेनिंग के लिए छह महीने के लिए इटली चली गई। वापस आई तब भी आदिल तलाक़ पर क़ायम थे। और बस आज तुमने देखा, वो मेरी प्रेम-कहानी का आख़िरी पन्ना था।"
लेकिन पूना में सबके सामने असीमा ये सबकुछ इतनी आसानी से ना कह पाई। लिली उसके साथ समझाने की कोशिश करती रही। कभी उसे परिवार के लोगों ने सुना, कभी बेइज़्जत किया। कभी उसे ख़ुद पर कोफ़्त होती रही कि इस पचड़े में पड़ी ही क्यों, कभी लगता असीमा की जगह वो होती तो क्या करती। इस तूफ़ान के बाद दोनों साथ ही लौटे थे। असीमा ज़्यादा दिनों तक घर पर नहीं रुकना चाहती थी।
दोनों की ज़िन्दगी फिर वीकेंड के इंतज़ार में कटने लगी। लेकिन लिली ने कई रातों को नमाज़ के बहाने उठी असीमा की सिसकियां सुनी थी, उसे क़ुरान की आयतों में सुकून ढूंढने की कोशिश करते देखा था। लेकिन कमरे में किसी और को असीमा की हालत का ज़रा-भी इल्म ना था। चारों फेम ऐडलैब्स जाते, लंच और डिनर के लिए मिलते, यहां तक कि साथ मिलकर मुंबई दर्शन के लिए भी निकलते।
लिली के मंगेतर के मुंबई लौट आने के बाद ये सिलसिला कम हो गया। मार्च में लिली को घर जाना था, अपनी शादी के लिए। असीमा ने भी दुबई जाने का फ़ैसला कर लिया था और नौकरी के लिए अर्ज़ियां भी डालने लगी थी। "इट हैज़ टू बी दुबई इफ आई एम एन आर्किटेक्ट," उसने दलील दी और अपने लैपटॉप पर बुर्ज ख़लीफा और पाम जुमैरा के कंस्ट्रक्शन की तस्वीरें और उनके थ्री-डी प्रेज़ेन्जेशन दिखाए, जिन्हें आर्किटेक्चर की दुनिया का अजूबा माना जाता है।
एक इतवार को रात में सोने से पहले लिली आदतन असीमा के पास गई, अपने बालों में तेल लगवाने के लिए। विशाखा और नफ़ीज़ा नहीं लौटे थे।
बालों में तेल लगाते हुए असीमा शादी की तैयारियों के बारे में पूछती रही। लिली हां-हूं में ही जवाब देती रही।
बालों से निकलकर असीमा की उंगलियां लिली के कंधों को दबाने लगी थीं। लिली की आंखें अपने-आप बंद होने लगीं। पतली-सी नाइटी के भीतर से असीमा की उंगलियां अब लिली की गर्दन पर उभर आए उन नीले निशानों को सहला रही थीं जो उसने कल से कॉलर-वाली शर्ट पहनकर छुपा रखा था।
"जिस मंगेतर से तुम अपनी सबसे क़रीबी दोस्त को नहीं मिलवा पाई, जिससे ना मिलने के तुम सौ बहाने ढूंढती हो और जिससे मिलकर आने के बाद तुम दो दिनों तक बीमार दिखती हो, उसी मंगेतर के प्यार की निशानी हैं ये ज़ख़्म?"
लिली हड़बड़ाकर उठ खड़ी हुई। "नहीं, नहीं। वो तो बस ऐसे ही। शेखर को गुस्सा ज़रा जल्दी आता है।"
"और गुस्से का ये अंजाम होता है कि तुम चोट के दाग़ छुपाए फिरती हो? इतनी तकलीफ़ सह कैसे लेती हो लिली?"
"शरीर के ज़ख़्मों को मन पर नहीं आने देती, इसलिए।"
"लेकिन कबतक? मैं रिश्तों की कोई एक्सपर्ट नहीं। बल्कि रिश्तों पर सलाह देने का तो मुझे कोई हक़ ही नहीं। लेकिन जान-बूझकर ख़ुद को कुंए में मत ढकेलो लिली।"
लिली चुप रही। असीमा ने कुछ रुककर कहा, "ग़ालिब तुम्हारे पसंदीदा शायर हैं ना। सो, ये शेर तुम्हारे लिए है – “वफ़ा कैसी, कहां का इश्क़, जब सर फोड़ना ठहरा? तो फिर ऐ संगदिल, तेरा ही संग-ए-आस्तां क्यूं हो?"
"नहीं जानती असीमा। लेकिन शादी के दो महीने पहले मैं कुछ नहीं कर सकती। मुझमें हिम्मत नहीं।"
"और सपनों को टूटने देखने की हिम्मत है? छुप-छुपकर पिटने की हिम्मत है? जो रात-रात भर बैठकर स्क्रिप्ट्स लिखती हो उनको समंदर में बहा आने की हिम्मत है? दस साल की उम्र से फिल्में बनाने का जो सपना देखा, उसे चूर-चूर करने की हिम्मत है?"
अगली सुबह लिली ने पटना फोन किया था। शादी तोड़ने की घोषणा करने के लिए। अगला एक हफ़्ता बहुत भारी था। मां-पापा और बाद में तमाम चाचाओं-मामाओं के सामने फोन पर अपनी दलीलें रखते-रखते लिली थक गई थी। शेखर नाराज़ होकर सीधा उसके सामाजिक चरित्र-हनन पर उतर आया था। टीवी की जिन पार्टियों में वो शेखर को अपना मंगेतर बनाकर ले गई थी, उससे कुछ ना छुपाने के मकसद से उसने जो राज़ शेखर से साझा किए थे, वे सभी आज उसी के ख़िलाफ़ हथियार के तौर पर इस्तेमाल किए जा रहे थे। रिश्ता टूटने के बाद शेखर जैसे लिली से पेश आया, उसे देखकर लिली ने चैन की सांस ली। कम-से-कम उसका असली चेहरा तो सामने आया था...
एक शाम असीमा ने लिली को एसएमएस भेजा था - "जिस जन्नत की तलाश में हम हैं, वो है कहीं।"
फिर एक दिन असीमा दुबई चली गई और लिली ने कुछ सालों के लिए मुंबई छोड़ दिल्ली को वापस अपना घर बना लिया। असीमा दुबई में इमारतें बनवाती रही, लिली दिल्ली में डॉक्यूमेंट्रीज़ बनाने में लग गई। दोनों में बातचीत होती रही, लेकिन उतनी ही जितनी एक इंटरनेशनल कॉल पर मुमकिन हो सकती है। अकबर से मिलने और उनसे निक़ाह के बाद असीमा पहले अपना बिज़नेस बढ़ाने में मसरूफ हो गई और फिर अलीज़ा के आने के बाद तो दुनिया घर और दफ़्तर के बीच ही सिमटकर रह गई।
पिछले तीन घंटों में असीमा अपनी ज़िन्दगी का रूख़ बदल डालनेवाले उन सात महीनों के लम्हे-लम्हे को जी गई थी। और फिर उसने उन सात महीनों की हमसफ़र अपनी सबसे अज़ीज़ रूममेट के लिए एक ई-मेल भेजा। इसमें उसकी लिखी हुई कविताएं और कहानियों की ज़िप्पड फाइलें थीं, और था एक शेर - "कोई दिन गर ज़िन्दगानी और है, अपने जी में हमने ठानी और है/ हो चुकीं 'ग़ालिब' बलाएं सब तमाम, एक मर्ग-ए-नागहानी और है..."
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