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बुधवार, 13 अगस्त 2014

स्मार्ट फ़ोन के बग़ैर ज़िन्दगी के जलवे

ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं... 

मेरी हथेलियों पर मेरा नोकिया लुमिया सूरजमुखी-सा खिला हुआ था उस दिन। इतवार की सुबह थी, रक्षा बंधन की, और मैं व्हॉट्सऐप्प पर कहीं दूर से आई अपनी तारीफ़ पढ़कर मुस्कुरा रही थी।

फिर पता नहीं क्या हो गया!

तारीफ़ें शायद इस क़दर फ़रेबी और झूठी थीं कि फ़ोन उस गुनाह को झेल न पाया और बेहोश हो बैठा। मैं अक्सर मज़ाक में कहती थी कि मेरा स्मार्टफ़ोन मेरे हाथ में आकर सिर्फ़ सेन्सिटिव रह गया है, स्मार्टनेस का तो अता-पता नहीं है।

कौन जानता था कि मेरा अपना मज़ाक मुझी पर भारी पड़ेगा!

फिर पूरा अट्टा छान मारा। राखियाँ बाँधने-बँधवाने के लिए जाना था फ़रीदाबाद, और वक़्त हाथ से निकलता जा रहा था। लेकिन संडे की उस बेरहम सुबह किसी भलमानस ने मेरे फ़ोन को रिवाईव करने का बीड़ा न उठाया। ज़ाहिर है, कोमा में पड़े मेरे बिचारे फ़ोन ने उस सुबह उम्र से पहले दम तोड़ दिया।    

ये वो सदमा था जिसे बर्दाश्त करना मेरे बस के बाहर की बात हो सकती थी।

अपने फ़ोन को लेकर ओसीडी है मुझे। मैं रास्ते पर चलते-चलते, सब्ज़ियाँ खरीदते-खरीदते, गाड़ी चलाते-चलाते, आधी नींद में सोते-जागते, अस्पताल के बाहर इंतज़ार करते, मेट्रो में शहर के दूसरे छोर जाते, बर्तन और कपड़े धोते-धोते भी फ़ोन चेक करती रहती हूँ। मैं बातचीत का कोई सिरा ज़ाया नहीं होने देती। हर मुमकिन कोशिश करती हूँ कि जवाब दूँ। चाहे उसमें मेरी ऊर्जा का क्षय ही क्यों न हो रहा हो।

जो फ़ोन लाइफ़लाइन था, उस फ़ोन के बिना जी लगता कैसे? फ़ोन का गुज़र जाना किसी प्यार के हमेशा के लिए छूट जाने से कम तकलीफ़देह नहीं था। उस दिन तो बहकी-बहकी परेशान से घूमती रही मैं। लगा कि जैसे कुछ लुट गया है, कुछ छिन गया है।

राखी की तस्वीरें नहीं खींची गईं।

यहाँ से फ़रीदाबाद जाते हुए सड़क के ट्रैफ़िक के हाल पर कोई फ़ेसबुक पोस्ट नहीं लिखा गया।

कोई आड़ी-तिरछी कविता नोट्स में सेव नहीं हुई।

किसी दोस्त से झूठ कहा नहीं व्हॉट्सऐप्प पर कि ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं...

याद ही नहीं कि उस एक इतवार जाने कैसे शब ढली, जाने कैसे दिन ढला... मुद्दतों बाद ऐसा हुआ था कि मैं जहाँ थी, वहीं थी - कहीं और नहीं। मुद्दतों बाद ऐसा हुआ था कि मेरी फ़ितरती गुमख़्याली को कहीं कोई वर्चुअल दुनिया नहीं मिली थी।

भीतर से कोई और आवाज़ देता रहा, झूठ था... सरासर झूठ था वो सब जो दुनिया से जुड़े रहने के ख़्याल से जोड़ रखा था तुमने।

फ़ोन सबकुछ नहीं ज़िन्दगी के लिए!

मुझे लगता था कि दुनिया में कुछ चीज़ें (और कुछ लोग) ऐसी हैं जिनके बिना मेरा वजूद बेमानी है, और जीना नामुमकिन। इंटरनेट और स्मार्टफ़ोन उन्हीं दो हासिल चीज़ों में से था। फ़ोन मेरे लिए चलता-फ़िरता दफ़्तर था - आप सबकी तरह। अपनी तमाम तन्हाईयों और सुख-दुख के बीच फ़ोन मेरे लिए रियल और वर्चुअल दुनिया से जुड़े रहने का इकलौता ज़रिया था। जो जी में आए, तब के तब बोल देना... उसे पोस्ट कर देना... किसी दोस्त को व्हॉटसऐप्प कर देना... रात-दिन, सुबह-शाम बातचीत के उन सिरों को थामे रहने की कोशिश करना जो कभी अंजाम तक नहीं पहुँचतीं... मेरी ज़िन्दगी ऐसी ही होने लगी थी पिछले दो-ढाई सालों से। ज़िन्दगी जिस रस्ते को अख़्तियार कर चुकी थी वहाँ बेमतलब की वर्चुअल स्माइली, दिल, टूटा हुआ दिल, फूल के गुच्छे, तोहफ़ों के बक्से और बिना सोचे-समझे किसी की ओर भी उछाल दिए जानेवाले बोसे थे।

और अचानक एक फ़ोन के न होने से वो सब ख़त्म हो गया!

वो सारे वर्चुअल रिश्ते ख़त्म हो गए!

वो सारे संपर्क और नंबर (कुल सत्रह सौ) ख़त्म हो गए जो मैंने इन दो-चार सालों में अर्जित किए होंगे!

हाथ में आया एक बेसिक फ़ोन, और ठहर जाने का गुमां।

कुल साढ़े चौदह फ़ोन नंबर मुझे मुँहज़ुबानी याद थे। मम्मी-पापा, पतिदेव, सासू माँ, ससुराल का लैंड-लाईन नंबर, भाई-भौजाई के, और कुल मिलाकर साढ़े पाँच दोस्तों के, जो पिछले सालों की सबसे बड़ी कमाई हैं... जिन्हें बचाए रखने में दस साल से ज़्यादा लंबी उम्र लगी है।

स्मार्टफ़ोन के न होने ने मेरी ज़िन्दगी में सबकी अहमियत और जगह भी मुक़र्रर हो गई थी। ये तय हो गया था कि ये वही साढ़े चौदह लोग हैं जो आपको आपकी तमाम ख़ामियों और ख़ूबियों के साथ स्वीकार करेंगे। जो एक आवाज़ पर आपके साथ होंगे, और जिन्हें आपने अच्छे-बुरे दिनों में मुलससल आवाज़ें दी हैं इसलिए इनके नंबर आपको मुँहज़ुबानी याद हैं।

(एक और एपिफ़ैनी - आत्मबोध - ये भी है कि किसी और की ओर से आनेवाला भरोसा हमारे भीतर के भरोसे का रिफ्लेक्शन, उसी का अक्स होता है। हम वही हासिल करते हैं जो हम बाँट रहे होते हैं।)

दिल जज़्बाती है, मजबूर नहीं है

अपने आस-पास क्या होना चाहिए, और किस रिश्ते पर कितना भरोसा किया जाना चाहिए - ये आत्मबोध अपने आप में मोक्ष का दरवाज़ा है। हम कई भ्रांतियों और ग़लतफ़हमियों के साथ जीते हैं। सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी  इस भंगुर दुनिया में अपनी जगह को लेकर पालते हैं हम। हमें कितने लोग जानते हैं... कितने लोगों को हम पहचानते हैं... हमारा वजूद इससे मुक़र्रर होता है, यही बताया जाता है हमें। बड़े होकर ख़ूब नाम और पैसे कमाओ - यही आशीर्वाद मिलता है न हमें बचपन से? अपने बच्चों को 'बडे होना' सिखाते हुए सही मायने में बड़े होने की परिभाषा क्या होती है, ये बताना भूल जाते हैं हम।

जिसे नापा जा सकता है, जो टैंजिबल है - परिणाम के तौर पर देखा जा सकता है, उसे ही हासिल समझ लिया जाता है। इन्टैंजिबल माइलस्टोन्स - अपने स्वभाव और शख़्सियत में जीते गए बदलावों की क़ीमत नहीं समझी जाती।

अभी हाल ही में एक फ़िल्म आई थी - फॉल्ट इन आवर स्टार्स। दो टीनएजर्स की कहानी है - कैंसर के आगे इनकी उम्र की रेखाओं ने हार मार लिया है, लेकिन इनकी जिजीविषा ने नहीं। मौत का इंतज़ार करते हुए जीने की उत्कट इच्छा रखने वाली सत्रह साल की हेज़ल ग्रेस अठारह साल के अपने कैंसरपीड़ित बॉयफ्रेंड से कहती है - ऑब्लिवियन इज़ इनएविटेबल - गुमनामी लाज़िमी है।

जब गुमनामी लाज़िमी है तो फिर इतनी हाय-हाय क्यों?

गुमनामियों के इन ख़तरों के बीच हेज़ल ग्रेस को एक और टीनेजर एन्न फ्रैंक की याद में बने म्यूज़ियम में गुमनामी के बीच की शोहरत सेलीब्रेट करने से ज़्यादा ज़रूरी मौत के मुहाने पर खड़े अपने बॉयफ्रेंड को पहली बार किस करना लगा।

हेज़ल के लिए वो लम्हा गुमनामियों के अंधेरों में इकलौती रौशनी रहा होगा। वो लम्हा उसके भीतर के किसी डर पर हासिल की गई जीत का लम्हा था।

मुझे फिल्म देखते हुए वो बात इतनी स्पष्टता से समझ में नहीं आई थी जितनी अब आई है - अपरिहार्य गुमनामी के बीच जो शोहरत का इकलौता शाश्वत कारण होता है, वो किसी इंसान का जज्बा होता है। वही जज्बा डर पर जीत हासिल करने की हिम्मत देता है।

एन्न फ्रैंक का जज्बा था कि चौदह साल की उम्र में गुज़र गई लड़की को पचासी साल बाद भी दुनिया भूल नहीं पाई है।

हेज़ल ग्रेस का जज्बा था कि मरते-मरते भी उसने किसी एक ज़िन्दगी को इस बेरहम, बेवफ़ा, मतलबी दुनिया में वापस आने की वजह दे दी... अपनी बची हुई ज़िन्दगी की सारी तकलीफ़ों और छूटती हुई साँसों के बीच तारों से भरी एक रौशन रात के शामियाने तले गीली आँखों से मुस्कुराना सीख लिया।        

ये जज्बा भीड़ पैदा नहीं करती। ये जज्बा हम अकेले अंधेरे कमरे में ख़ुद से जूझते हुए, अपनी हार और नाकामियों के बीच अपने हालातों को अपने हिसाब से ढालते हुए पैदा करते हैं। इस जज्बे का इससे कोई वास्ता नहीं होता कि हम दुनिया से कितने जुड़े हुए हैं और हमारी बातों पर कितनी वाहवाहियाँ मिल रही हैं। इस जज्बे को फोन-बुक में मौजूद हज़ारों नंबरों से भी कोई वास्ता नहीं होता।

हम हर रिश्ते को अपनी वजह से ढोते हैं, झेलते हैं या उन्हें पालते-पोसते हैं। उनकी ज़रूरत हमें होती है क्योंकि हमारे जज्बात उन रिश्तों पर फ़ीड कर रहे होते हैं। उन रिश्तों से हासिल हमदर्दी (और कई बार तरसते हुए बोलों के जवाब भी, जो हम सुनना चाहते हैं), उन रिश्तों से हासिल भरोसा (कभी झूठा, कभी सच्चा) और उन रिश्तों से हासिल ऊर्जा हमें ज़िन्दगी की नीरस और अरुचिकर जद्दोजेहद को झेलने का माद्दा देती है।

हम उस ग़लतगुमानी में ख़ुश रहते हैं कि हमारी ज़रूरत है - हमारे घर-परिवार में, हमारे वर्क प्लेस पर, हमारे सहकर्मियों को, हमारे बॉस को, हमारे जान-पहचान वालों को, हमारे क्लायंट्स को... हम इस बदगुमानी में होते हैं कि जो जब भी, जिस भी तरह आवाज़ लगाए, हमें उसका जवाब देना ही चाहिए क्योंकि अपनी ज़रूरत बचाए रखने का ये इकलौता रास्ता है।

बेताबियों में खुशी ढूंढने वाले बेताबियां भी ढूंढ-ढूंढकर लाते हैं। ये बेताबियां रिश्तों की शक्लों में होती हैं जो हर रोज़ किसी न किसी से बना रहे होते हैं हम। अक्सर क्षणभंगुर। अक्सर छोटी मियाद वाले। अक्सर ज़रूरतपरस्ती।

कितना बड़ा फ़रेब है ये!

फ़ोन नहीं है तो समझ में आया कि इस फ़रेब को जीना मजबूरी नहीं है। हमारे जज़्बातों का सबब भी हम ही, मरहम भी हम ही। हमारी ज़रूरत अगर किसी को सबसे ज़्यादा है, तो वो हम हैं।

मेरे फ़साने पे न जा... 

डिस्क्लेमर ये भी है कि ये मेरे अपने तजुर्बे हैं। ये मेरी अपनी राय है। तजुर्बों के आधार पर राय भी बनती-बिगड़ती-बदलती रहती है। मेरा मकसद फ़ोन के बहाने बाहर की दुनिया से जुड़ाव को लेकर अपने हालात और अनुभवों का लेखा-जोखा करना है। मेरा मकसद अपने लिए कुछ फ़ैसले लेना है। ख़ुद को याद दिलाना है कि वेलॉसिटी यदि डिस्प्लेसमेंट और टाईम टेकेन का अनुपात है कि डिस्प्लेसमेंट की वैल्यू को कम करके वेलॉसिटी यानी गति पर काबू पाया जा सकता है।

सारे फ़ैसले अपने हैं - दिल-ओ-दिमाग पर हर लम्हा लगती खरोंचों की तरह। वजह भी मैं ही, मरहम भी मैं ही।

नोकिया लूमिया उर्फ़ डियर सूरजमुखी, तेरा प्यार अनोखा है!

मंगलवार, 8 जुलाई 2014

कई फ़ितूर और 'नीला स्कार्फ'

मैं भुवनेश्वर से पुरी के रास्ते में थी जब नताशा का मेसेज आया था – व्हॉट्सऐप्प पर। कुछ तस्वीरें थीं – उस अनारकली की, जो मैं बनवाना चाहती थी। एक के बाद एक कई मेसेज आए – उसके आईफोन से ली हुई तस्वीरों के। एक तस्वीर मेरे ज़ेहन में अटक ही गई बस, उस तस्वीर में मैनेक्वीन की गर्दन में बेतरतीबी से पड़े दोरंगी नीले दुपट्टे की तरह।

मैंने नताशा को वापस जवाब भेजा, "ये अनारकली चाहिए और ये तस्वीर भी। अपनी पहली किताब की कवर पेज के लिए।"

बात मार्च की है, और मेरे दिमाग में कहानी-संग्रह को पूरा करने का ख़्याल खलबली मचाए थे। मैं जहाँ-जहाँ जाती थी, वो ख़्याल साथ जाया करता था। एक किस्म के फ़ितूर की तरह। बेशक काम नहीं किया करती थी इस ख़्याल पर, लेकिन फ़ितूर तो था।

उम्र के पैंतीस गर्मी-जाड़ा, सूखा-बाढ़ और सूनामी देख लेने के बाद मैं एक बात पूरे यकीन के साथ कह सकती हूँ – एक फ़ितूर न होता तो दुनिया में क्रांतियां न आया करतीं। वक़्त फ़िसलता रहता किसी चिकने से रास्ते पर घूमते पहिए की तरह, और हमारे पास जानने-सुनने को किसी किस्म का इतिहास न होता।

ये कमबख़्त फ़ितूर कई चीज़ें करा लेता है इंसानों से।

मुझसे कहानियाँ लिखवा लीं इसी फ़ितूर ने। इसी फ़ितूर ने मेरी अच्छी-खासी आर्टिस्ट-राईटर दोस्त को ऑन्ट्रप्रॉन्योर और बिज़नेसवूमैन बना दिया। इसी फ़ितूर ने व्हॉट्सऐप्प पर आई उस तस्वीर को किताब के कवर पेज तक पहुंचा दिया जो दरअसल मेरे ही एक कुर्ते, मेरे ही एक दुपट्टे की तस्वीर है। 'नीला स्कार्फ' भी तो उस तस्वीर, उन कपड़ों की तरह आख़िर मेरे ही वजूद के जिए हुए अनुभवों का कई टुकड़ा है। 

'नीला स्कार्फ' कई मायने में ख़ास है। ख़ास इसलिए कि इसे बनाते हुए हमने अनजाने में कई अनकन्वेंशनल रास्ते अख़्तियार किए। 'नीला स्कार्फ' का इस मुकाम तक पहुंचना एक लिहाज़ से आउट ऑफ द बॉक्स सोचकर ख़तरे उठाने वाले चार अजूबा फ़ितूरियों की सच्ची कहानियां भी है।

मिलिए अजूबा नंबर एक से। अनु सिंह। लिखने का शऊर नहीं था, गलतफ़हमियां थी कईं। लिखना ज़रूरत से ज़्यादा मजबूरी बनता गया एक वक़्त के बाद, और फिर जेबखर्च का ज़रिया भी। लिखने के फ़ितूर ने ब्लॉग दिया, ब्लॉग ने दोस्त दिए, दोस्तों ने काम के ज़रिए दिए, काम के ज़रिए मिले तो ठीक-ठीक समझ में आया कि कैसे, कब और कहां, किन लोगों के साथ काम करना चाहती हूं। लोग मिले तो भरोसा आया। भरोसा आया तो रास्ते पता नहीं किस-किस मोड़ से होते हुए निकलते चले गए। अनु सिंह इस लिहाज़ से अनकन्वेंशनल है क्योंकि वो कहीं भी किसी एक रूप में मुकम्मल नहीं। अनु सिंह का लिखना भी मुकम्मल नहीं। टुकड़ों-टुकड़ों में कई वजूदों के बीच कई कामों के साथ बिखरी-बिखरी ज़िन्दगी समेटना, और उस बीच लिखते रहना, हर रोज़ का रोज़गार है। रोज़गार भी यही है, और ज़िन्दगी से भिड़ने का हथियार भी यही।

मिलिए अजूबा नंबर टू से। शैलेश भारतवासी। अव्वल दर्ज़े के फ़ितूरी। एक फ्लिपकार्ट, एक इंफीबीम के सहारे एक टाइटल की पाँच सौ प्रतियाँ छापकर हिंदी के बेस्टसेलर लेखक तैयार करने चले हैं। ढूंढ-ढूंढकर लेखक निकालते हैं। रेगिस्तान-नखलिस्तान, समंदर-मैदान, पहाड़-पठार, महागनर-देहात – कुछ भी नहीं बख़्शा इन्होंने। जहाँ किसी के लेखक होने का एक आना भरोसा भी हुआ नहीं कि जी-जान लगा बैठे। महाराज, ऐसे पब्लिशर का बेड़ा गर्क होगा, ये चित्रगुप्त महाराज ने अपनी कलम को अपने ही ख़ून में डुबो-डुबोकर बड़े-बड़े अक्षरों में लिख दिया है। सातवें आसमां पर जब इनके कर्मों का लेखा-जोखा प्रस्तुत होगा तो नर्क की सज़ा सुनाई जाएगी इनको। हिंदी पठन-पाठन की अलौकिक शांति में व्यवधान डालने का अक्षम्य अपराध जो किया है इन्होंने।

मिलिए अजूबा नंबर थ्री से। नताशा बधवार। इस औरत से बड़ा फ़ितूरी मैंने अपनी पूरी लाईफ़ में नहीं देखा, बाई गॉड। मैं टीवी चैनल में जब एक टुच्ची-सी रिपोर्टर/प्रोड्युसर थी तो मैडम कुछ तो टॉप टाईप पोस्ट पर थीं। इक्कीस साल की थी तब मैं, और नताशा बधवार के बारे में सुनते-सुनते उसके टाईप बन जाने का वो जुनून था कि जो आज तक कमबख़्त ख़त्म नहीं हुआ है। वैसे इतने सालों में ये भी नताशा से ही सीखा है कि कोई किसी की तरह होता नहीं है, और फिर भी हम सब अपने आस-पास के अजीज़ लोगों के आईने हुआ करते हैं। बहरहाल, फ़ितूरी नंबर थ्री ने ज़िन्दगी में कई फ़ितूर पाले और उन्हें अंजाम तक पहुंचाया। (हाथ कंगन को आरसी क्या, मुझपर यकीन हो न हो गूगल पर तो है)। नताशा का सबसे बड़ा और ख़तरनाक फ़ितूर आजकल 'ऑकर स्काई' नाम के ब्रांड के रूप में फेसबुक पर दिखाई दे रहा है। कसम से कह रही हूं, इस फ़ितूर की पहली ख़बर मिली थी तो मैंने अपना सिर पीट लिया था। अब मैं ही इस फ़ितूर की सबसे बड़ी कायल (और ख़रीददार) हूं। नताशा के फ़ितूर ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि हर फ़ितूर के साथ हम ख़ुद को बेहतर पहचान रहे होते हैं, और ये अपने किस्म की अलग साधना है – एक अलग किस्म का मे़डिेटेशन। ये अपने-अपने आसमान के टुकड़ों को ढूंढ लाने की कोशिश है, जो ताउम्र चलती रहे तो अच्छा।

और आख़िर में, मिलिए अजूबा नंबर फ़ोर से। रोहित भाटिया। मैं डिज़ाईनर-विज़ाईनर, आर्टी टाईप लोगों से ज़रा दूर ही रहती हूं और नताशा के घर रोहित से दो-चार बार मिली तो उसे भी दूर से सलाम किया था। मतलब वो कितना पागल शख़्स होगा जो बच्चों के साथ कमरे की दीवारें पेंट करते हुए पूरा वीकेंड गुज़ार सकता है? जिसे चांदनी चौक टाईप की जगहों पर सुकून मिलता है? जो चाय बनाकर पिलाता है तो दूसरों की जूठी चाय की प्यालियां धोने से भी नहीं हिचकता? जिसका कारोबार वेडिंग ट्रूज़ो पर चलता है? जिसका बस चले तो कुशन कवर्स और पर्दों पर भी ब्रॉकेड की पट्टियां और सलमा-सितारा लगा दे। आई मीन, वियर्ड, रियली। और इसी रियली वियर्ड टाईप के डिज़ाईनर के भीतर के कई रंगों से वाकिफ़ हुई तो चार बार कान खींचे ख़ुद के। हम कितनी आसानी से लोगों को जज कर लेते हैं। स्टीरोटाईपिंग दुनिया का सबसे आसान और ख़तरनाक काम है। इस फ़ितूरी के डिजाईन किए हुए कपड़े मेरा नया फ़ितूर है आजकल - एक किस्म के ऑबसेसिव कम्पलसिव डिसॉर्डर की तरह। जिस डिज़ाईनर की बनाई सलमा-सितारा, कढ़ाई वाली साड़ियों को देखकर दिल घबराता था, उसी का तैयार किया हुआ डिज़ाईन मेरी सबसे अहम कहानी की सबसे अहम किरदार का आईना बन गया! उसकी पहचान बन गयाअपनी पहली किताब के कवर पर उसे जगह देकर ज़िन्दगी भर के लिए उस डिज़ाईन को न भूलने लायक बना दूंगी, ये मैंने अपने वियर्डेस्ट ख़्याल में भी नहीं सोचा था।

चार फ़ितूरियों के इस साझा नतीजे – 'नीला स्कार्फ' ने कई चीज़ें साबित की हैं। पहला, दिल अपनी शक्ल के दिल खोज लेता है। 

दूसरा, दिल अपने फ़ितूर को पूरा करने के रास्ते भी खोज लेता है। 

तीसरा, ज़िन्दगी में कभी भी ‘I will never do it (or I will never be able to do it)’ नहीं बोलना चाहिए। कुछ भी हो सकता है। कुछ भी!!!
         
और चौथा, एक फ़ितूर ही है जो आपको भी आपके अंजाम तक पहुंचाएगा। इसलिए अपने भीतर के फ़ितूर शिद्दत से पालिए दोस्तों।

(पोस्टस्क्रिप्ट - मेरे बाबा चीन से मेरे लिए सिल्क का स्कार्फ लेकर आए थे - नीले रंग का स्कार्फ, मेरी सोलहवीं सालगिरह पर। वो स्कार्फ इतना ख़ूबसूरत था कि उसे गले में लटकना दुश्वार हो जाया करता। एकदम अजनबी लोग मुझे रोक कर उस स्कार्फ के बारे में पूछा करते। वो स्कार्फ गुम हो गया कहीं। मैं इस सदमे से कई महीनों तक उबर नहीं पाई। आज भी उस स्कार्फ की बड़ी शिद्दत से याद आती है। गुम हो गए उस नीले स्कार्फ का ग़म मेरे लिए किसी बेहद अजीज़ दोस्त के गुम हो जाने जैसा है। वैसे सच तो ये है कि हम नीले स्कार्फ की तरह कई रिश्ते भी अपनी गर्दन में टांगे फिरते हैं, जिनकी कोई अहमियत नहीं होती - जो एक महंगी एक्सेसरी से ज़्यादा कुछ भी नहीं। जो न शरीर ढंकने का काम करता है, न गर्मी-सर्दी से बचाने का। लेकिन फिर भी गर्दन में शो-पीस की तरह लटकता रहता है, सिर्फ एक मकसद से - हमारे सौंदर्य और दिखावे में इज़ाफ़े के लिए। नीला स्कार्फ कहानी ऐसे ही एक रिश्ते की पड़ताल करती है। 

एक और बात - ऑकर मटमैला भूरा रंग होता है। नीले आसमान पर चढ़े गहरे मटमैले बादलों के नीचे गर्दन में नीला स्कार्फ लटकाए बेवजह भटकती किसी लड़की को देखिएगा तो हम फ़ितूरियों के बारे में सोचिएगा ज़रूर।)    

नीला स्कार्फ ऑर्डर करने के लिंक ये रहे - 

http://bit.ly/nsflipkart

http://bit.ly/nshomeshop18

http://bit.ly/nsinfibeam

शनिवार, 21 जून 2014

न छोटे ख़्वाब आएं इस दरवाज़े न बड़े

सब अपने छोटे छोटे ख़्वाब देखेंगे और उन्हें पूरा करने में लग जाएंगे तो किसी एक बड़े ख़्वाब को पूरा करने के लिए लोग कहां से जुटेंगे?

जाने क्यों बाबा की कही हुई ये बात बड़ी ज़ोर से याद आ रही है। बाबा यानी मेरे दादाजी। पूरी ज़िन्दगी एक कंपनी की नौकरी खटते रहे, एक मालिक के लिए काम करते रहे, एक टीम का ख़्वाब बुनते रहे - पूरी एकनिष्ठता के साथ। चालीस सालों तक। या शायद पैंतालीस सालों तक। ठीक-ठीक मालूम नहीं और फ़र्क भी क्या पड़ता है? 

बाबा ऑन्ट्रोप्रॉन्योर नहीं थे, लेकिन उद्यमी थे। बाबा बिज़नेस मैन नहीं थे, लेकिन जिस कंपनी के लिए काम किया उसका बिज़नेस पांच गुना बढ़ाया। बाबा इनोवेटर - आविष्कारक - नहीं थे। लेकिन हर जगह नई पहल को शुरु करते देखा है हमने उन्हें। बाबा मशहूर भी नहीं थे। बड़े आदमी भी नहीं थे। लेजेंड भी नहीं थे। महान भी नहीं थे। कालजयी भी नहीं थे। उनके नाम पर कोई सम्मान, कोई पुरस्कार, कोई सड़क, कोई मोहल्ला नहीं है। लेकिन बाबा ने जिसकी ज़िन्दगी को थोड़ा सा भी छुआ, वो उनके गुज़र जाने के कई साल बाद भी उन्हें हर रोज़ याद करता है। बाबा पर्स में रखी जानेवाली तस्वीर हैं। बाबा किसी किताब के बीच से झांकते ज़िन्दगी के फ़लसफ़े हैं। बाबा सपनों में आकर रास्ता बतानेवाले फ़कीर हैैं।

हम बेशक उन्हें बात-बात पर याद न करते हों, लेकिन उनके बारे में जो बात हममें से कोई नहीं भूलता वो उनका वर्क एथिक्स है। काम में कोई कोताही उन्हें मंज़ूर न थी और अपने काम, अपनी प्रोफेशनल ज़िम्मेदारियों के लिए उस स्तर का कमिटमेंट मैंने तो क्या, उन्हें जो भी जानता होगा, उसने कभी नहीं देखा होगा, ये बात मैं दावे के साथ कह सकती हूं। अब सोचती हूं कि बाबा को इसके बदले मिला क्या? 

घर की छत पर खड़े खड़े एक दिन मैंने पूछा था उनसे - आपकी पहचान क्या? 

बाबा ने कहा था, मेरा काम। मेरी ड्यूटी। मेरी ज़िम्मेदारियां। 

मैंने पूछा कि आपका नाम कहां? बाबा ने कहा था, हर उस शख़्स की ज़ुबान पर जिसने मेरे साथ काम किया है। जो मुझे थोड़ा भी जानता है। 

मैंने पूछा था कि आपका हासिल क्या? बाबा कहते थे, इज्ज़त, भरोसा और प्यार। 

मैंने पूछा था कि आपकी कमाई क्या? बाबा कहते थे, सिर पर तीन पीढ़ियों के लिए अदद-सी छत और सुकून कि जो किया, ईमानदारी से किया। मेरी शोहरत मेरी वाहवाहियों में नहीं, बल्कि इसमें है कि कितने लोग मेरे जाने के बाद मुझे याद करेंगे। 

ये सब उल्टे-सीधे पाठ पढ़ाकर आप किस दुनिया में चले गए बाबा? 

अब जब अपने आस-पास इतनी स्पर्द्धा और गला-काट प्रतियोगिता देखती हूं तो दिल बैठने लगता है। ये तो आपने सिखाया नहीं था। ये कैसी दुनिया है जिसमें इतनी घबराहट होती है? हर चीज़ बेचनी क्यों पड़ती है यहां? हर चीज़ की क़ीमत क्यों है? हर बात का पिच नोट क्यों? 

मुझे तो सिर्फ काम करना था न। हम सबको करना चाहिए था। फिर हर चीज़ ख़ुदगर्ज़ी के तराजू पर क्यों तौली जाती है? सबकुछ गिव एंड टेक क्यों है? हम सबकी क़ीमत क्यों लगाना चाहते हैं? हर 'मौके' का 'फ़ायदा' उठाना हमें क्यों सिखाया जाता है? सबकुछ 'opportunity' ही क्यों? रिश्ते भी? सबकुछ एक्सपायरी डेट के साथ क्यों आता है? 

ये दुनिया मेरे लिए नहीं है बाबा। इस अंधदौड़ में हम कहां होना चाहते हैं? हमारा वजूद क्या है और सपनों का रूप क्या? उनकी क़ीमत क्या? मेरे सपनों की क़ीमत पैसे-शोहरत-बैंक बैलेंस में कैसे नापी जाए? इनमें से कुछ भी तो नहीं बचता बाबा। आपने क्या छोड़ा था हमारे लिए? इन ऊटपटांग सीखों, वर्क एथिक्स और बेमानी मूल्यों के अलावा? पैसे छोडे होते। घर छोड़ा होता। संपत्ति छोड़ी होती। तो हम इस दुनिया में जीने का शऊर सीख पाते। 

सिखाया भी तो क्या - देना? प्यार करना? ईमानदार होना? काम करना - हर रोज़, बेशुमार? 

दिया भी तो क्या दिया कि देख लीजिए, आज बैरागी हो जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं सूझता। छोटे-छोटे और बड़े-बड़े ख़्वाबों की इस भीड़ में मेरा जी डूब रहा है। मुझे नहीं देखने ख़्वाब।  

इसलिए क्योंकि ख़्वाब का मालूम नहीं और पता नहीं कि इनकी अहमियत क्या? लेकिन मुझसे फिलहाल जो हो सकता है वो रोज़-रोज़ का जीना है। रोज़-रोज़ के तय किए हुए रास्ते हैं। रोज़-रोज़ का कमाया हुआ यकीन है। रोज़-रोज़ की इस दिहाड़ी मजदूरी में आज का दिन कमाए हुए को एक साथ जमा करके किसी शीशे में उतारकर पी जाने का है। 


मंगलवार, 28 जनवरी 2014

जेएलएफ डायरिज़ 3: एक दिग्गी पैलेस, कुल पांच दिन, 240 से ज़्यादा वक्ता, कुल 175 सत्र

अंतिम दिन सुबह की ज़ोरदार बारिश में सबकुछ धुल जाने का डर था - दिग्गी पैलेस में सजे मंच और कुर्सियां तो शायद बेअसर भीगती रहतींजेएलएफ में आनेवालों का उत्साह जनवरी की इस ठंड में पहले जम जाता। लेकिन मेरी आशंका निराधार रही। सुबह दस बजे अशोक वाजपेयी और यतीन्द्र मिश्र के साथ "कविता की कहानी" पर जो चर्चा होनी थीवो बिना एक मिनट की भी देरी सेअपने तय वक़्त पर दिग्गी पैलेस के एक छोटे से कमरे में शुरू हो चुकी थी। हम दस मिनट की देरी से पहुंचेऔर उतनी ही देर में पूरा कमरा ठसाठस भर गया था और बिना माइक्रोफोन और स्पीकरों के भी सुननेवाले बड़े ध्यान से अशोक वाजपेयी की "कविता की कहानी" पर कविता-सी चर्चा सुन रहे थे! 

थोड़ी ही दूर एक दूसरे कमरे में ग्लोरिया स्टेनेम अमेरिकी सिविल राइट्स मूवमेंट में महिलाओं की भूमिका को हिंदुस्तान के संदर्भ में देखने के लिए प्रेरित कर रही हैं। ठंड में उंगलियों ने हरकत करना बंद कर रखा है तो क्यादिमाग के लिए ढेरों काम है। आख़िरी दिन भी कीचड़ सने रास्तों से होकर दिग्गी पैलेस में आने वालों का तांता रुका नहीं। कहने वालों का कुछ नहीं जातासुनने वाले कमाल करते हैं! 

सुनने वालों और गुनने वालों की ये भीड़ हर साल जमा होती है यहां। मैं इस बार पांचों दिन रुककर देखना चाहती थी कि वो क्या चीज़ है कि जिसे देखो वही जयपुर जाने को बेताब रहता है। मैं देखना चाहती थी कि जयपुर के नाम का ये 'स्टेटस सिंबलहैया वाकई पांच दिनों तक यहां की हवा में कोई सुरूर होता है जिसकी कशिश से खिंचकर लोग जाने कहां-कहां से होते हुए जयपुर पहुंच जाते हैं। 

प्रोफेसर अमर्त्य सेन के ओपनिंग एड्रेस - उद्घाटन भाषण - में वो जवाब मिल गया। जब एक नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अपने देश के लिए सात ख़्वाहिशें बयां करते हुए ये कहे कि काशमेरा देश विज्ञान के ऊपर कला और समाजशास्त्र (आर्ट्स एंड ह्यूमैनिटिज़) को तरजीह दे तो जवाब वहीं मिल जाता है। जाने क्यों अमर्त्य सेन को सुनते हुए रामवृक्ष बेनीपुरी का लिखा स्कूल में पढ़ा हुआ निबंध 'गेहूं और गुलाबदिमाग में घूमता रहा। 

"गेहूं बड़ा या गुलाबहम क्या चाहते हैं - पुष्ट शरीर या तृप्त मानसया पुष्ट शरीर पर तृप्त मानस?"

मानव को मानव बनाया गुलाब ने! उस गुलाब ने जो साहित्य और संस्कृति का प्रतीक है। उसी गुलाब की ख़ुशबू में खींचेथोड़ी देर के लिए अपनी जिज्ञासाओं को शांत करने के उद्देश्य सेअपने तंग समझ की गोल धरती को आकाश बनाने के लिए ऐसे साहित्योत्सवों में पहुंचते हैं लोग। इन लोगों में लिखने वाले या कभी लिखने की ख़्वाहिश रखने वाले ज़रूर होते होंगे शायद। लेकिन इन लोगों में ज़्यादातर जिज्ञासुन बुझनेवाली प्यास लिए चलनेवाले होते हैं। अपने भीतर की प्यास को बुझा पाने की थोड़ी-सी उम्मीद सुननेवालों को ऐसे महाआयोजन में खींच लाती है। 

और कहनेवालों के पास तो कई वजहें हैं। उनके पास कहनेअभिव्यक्त करने को इतना कुछ था,इसलिए उन्होंने किताबें लिखीं। फिल्में बनाईं। गीत और संगीत का ज़रिया चुना। अभिव्यक्त कर चुकने के बाद संवाद की कभी न मिट पाने वाली प्यास कहने वालों को मंच पर ले जाती हैउन लेखकों-कवियों-चिंतकों-दार्शनिकों के भीतर का वक्ता बाहर ले आती है। यूं भी अपनी कहानी सुनानेअपने अनुभव बांटने की कला में हम सब माहिर होते हैं। 

फिर एक बिज्जी पर बात करने के लिए इरफ़ान ख़ान की ज़रूरत क्यों पड़ती हैक्यों कोई स्टार ओमप्रकाश बाल्मिकी की पिछड़े हुए लोगों पर लिखी पिछड़ी हुई कविताएं पढ़ता है तभी कविता अचानक 'ग्लैमरसलगने लगती हैबेस्टसेलर कौन होता हैपॉपुलर को तवज्जो दी जाए लिटररी को

जवाब भी इरफान ख़ान की ओर से ही आता है। बिज्जी को शाहरुख या इरफ़ान की ज़रूरत नहीं। बॉलीवुड को बिज्जी की हैक्योंकि बिज्जी पारसमणि थे। तालियां नीरव पटेल के लिए भी बजती हैंऔर सीपी देवल के लिए भी। अगर सुननेवाले राज कुंद्रा के थ्रिलर की रचना-प्रेरणा के बारे में जानना चाहते हैंतो उतने ही सवाल जॉनथन फ्रैनज़न के लिए भी बचाकर रखे जाते हैं। 

आख़िर वो कौन सी कड़ी है जो इन सबको जोड़ती है?

एक दिग्गी पैलेस। कुल पांच दिन। 240 से ज़्यादा वक्ता। कुल 175 सत्र। छह अलग-अलग मंच। क्या सुनें और क्या छोड़ें। फिर समझने की शक्ति की भी तो अपनी सीमाएं हैं! 

लेकिन उस जगह का प्रताप है कि अपनी तमाम सीमाओं को थोड़ा और धक्का लगाते हुएखुद को थोड़ा और प्रोत्साहित करते हुए मेरे जैसे हज़ारों सुनने वाले कभी लोकतंत्र पर गहन चर्चा का हिस्सा बने हैं तो कहीं विलुप्त होती भाषाओं पर सिर धुन रहे हैं। हर ओर एक मुद्दा हैहर तरफ उठती,बाहर निकलती आवाज़ें हैं। और ये मलाल भीकि हर आवाज़ किसी निष्कर्ष पर पहुंचेये ज़रूरी नहीं। 

इसलिए बिना किसी अपेक्षा के किसी सत्र में बैठ जाने पर बाहर निकलते हुए झोली के भर जाने जैसा गुमां हुआ है। कभी मैंने ये नहीं सोचा था कि अंडमानी भाषा पर गूगल करके गीत सुनूंगी कभीलेकिन अन्विता अब्बी को उनके शोध के बारे में बोलते हुए सुनकर विलुप्त होती ऐसी भाषाओं की चिंता सताती है। थोड़ी देर के लिए ही सहीसमझ में आता है कि गुम होती भाषा कैसे एक समाज को गायब कर सकती है। प्रसून जोशी के बगल में बैठे शेखर पाठक को राग पहाड़ी गुनगुनाते देखकर अफ़सोस होता है कि नानी जो झूमर गाया करती थींउसको रिकॉर्ड नहीं किया। तब समझ में आता है कि गीत की एक कॉपी का गुम हो जाना एक परिवार का निजी नुकसान ही नहीं होताभाषा को भी उससे झटका लगता है। 

गूगल के इस दौर में पर्यावरण की चिंताओं पर बहस के लिए मुद्दे खोजने के लिए इंटरनेट बहुत है। लेकिन जब एक मंच पर सुमन सहाय और शेखर पाठक के साथ एक पाकिस्तानी पर्यावरणविद् अहमद रफी आलम को बोलते सुनते हैं तब समझ में आता है कि नदियोंजंगलोंज़मीनआसमानों से जुड़ी हुई चिंताएं न सरहदों में बांधी जा सकती हैं न किसी समाजविशेष की जागीर होती हैं। साहित्य के मंच पर पर्यारवरण जैसा मुद्दा क्योंइसलिए क्योंकि साहित्य रचना सिर्फ ख़ूबसूरत शब्दों में छंदोंकथाओं को बांधना नहीं होताअपने दौर के पुख़्ता और सटीक दस्तावेज़ तैयार करना भी होता है।    

अपने समय और समाज के दस्तावेज़ों के ज़रिए दुनिया भर में पहुंचनेवाले अंतरराष्ट्रीय लेखक 'द ग्लोबल नॉवेलपर बात करते हुए भी कई-कई समाजों को बांधने के लिए अनुवाद की ज़रूरत पर ज़ोर देते हैं तब समझ में आता है कि ग्लोबल नॉवेल भी दरअसल अंग्रेज़ी का मोहताज नहीं। एक नॉवेल तभी ग्लोबल होता हैजब वो 'यूनिवर्सलहोता है - अपने देशकालवातावरण और पात्रों में किसी समाज विशेष की परछाई होते हुए भी अपने कथानक और भावों में पूरी तरह 'यूनिवर्सल।

सरोकार कई हैंचिंताएं कईं। विषय कई हैंबोलनेवाले कई। पक्ष में कईविपक्ष में कई। लेकिन बहसविरोधविवादप्रलाप - ये सब एक स्वस्थ समाज की निशानियां हैं। जब कई सारी विचारधाराएं कई सारी भाषाओं और कई सारे विचारों से होती हुई किसी एक मंच पर पहुंचती हो तो उम्मीद बंधाती है कि हर आवाज़ के लिए वक़्त देने वाला ये समाज विकसित होता - इवॉल्व होता समाज है। जो समाज किताबें पढ़ता हैसोचता हैबिना विरोध या नतीजे की चिंता किए अभिव्यक्त करता हैउस समाज को देखकर उम्मीद बंधती है। और ये उम्मीद टोलियां बना-बनाकर घूम रहे स्कूली बच्चों को देखकर और पुख़्ता हो जाती है जो न सिर्फ झोले भर-भरकर किताबें खरीद रहे हैं बल्कि उन किताबों को लिखनेवालों से मुश्किल सवाल भी पूछ रहे हैं। जयपुर साहित्योत्सव का कोई और उद्देश्य हो न होइस महाआयोजन की सार्थकता इन बच्चों को देखकर सिद्ध हो जाती है। 

ज़रूरी नहीं कि हम हर बात से सहमत ही हों - वर्तिका नंदा की उन कविताओं से भीजो उन्होंने सुनंदा पुष्कर को श्रद्धांजलि देते हुए आख़िरी दिन के एक सत्र में पढ़ा। लेकिन इन सहमतियों और असहमति के बीच से जो निकलता हैएक बीच का रास्ता है। इस बीच के रास्ते का नाम साहित्य है।

प्रोफेसर अमर्त्य सेन की दुआओं के पूरा हो जाने की दुआ मांगने में मेरा भी एक स्वार्थ निहित है। "अब गुलाब गेहूं पर विजय प्राप्त करे! गेहूं पर गुलाब की विजय - चिर विजय!" और ये गुलाब सिर्फ सौंदर्यबोध का प्रतीक न हो। ये गुलाब सूक्ष्म भावनाओं का प्रतीक होसंतुलन का प्रतीक हो। ये गुलाब आज़ाद अभिव्यक्ति का प्रतीक हो। 

किसने कहा कि एक साहित्योत्सव समाज बदल देगा। लेकिन एक साहित्योत्सव अपने-अपने समाजों में बदलाव की कहानियां लिख रहे लोगों को ज़रूर जुटा देगा हमारे-आपके लिए!  

(ये पोस्ट मूलतः 'जानकी पुल' पर प्रकाशित हुई)

रविवार, 12 जनवरी 2014

अरी ओ किस्मत! हमें घुमन्तू बनाए रखना

हम तीन जनों के बीच में डेढ़ सीटें हैं - आरएसी वाली। बच्चों के साथ ट्रेन में सफ़र करने का मेरा अनुभव शायद ही कभी खराब रहा है, इसलिए मैं एक मिनट के लिए भी परेशान नहीं होती। कुछ न कुछ हो ही जाएगा। लोग इतने भी उदासीन नहीं कि दो बच्चों के साथ अकेली चलती मां के लिए जगह न बना सकें।

अगस्त क्रांति राजधानी में बैठते हुए समझ में आया है कि एक मैं ही नहीं, एसीटू की इस बोगी में कुल मिलाकर दस लोग ऐसे हैं जो आरएसी में हैं। इनमें से तो एक बिचारी लड़की को छोड़ने आए मां-बाप इतना घबराए हुए हैं कि अंधेरी से बोरिवली तक उसके वेटलिस्ट एक टिकट को किसी तरह कन्फर्म कराने की नाकाम कोशिश करते हुए बोरिवली में मायूस उतर गए हैं। लड़की फिर भी दिल्ली जाने पर अड़ी हुई है। सोमवार से उसका कॉलेज खुल रहा है शायद।

सामान कहीं, मैं कहीं, बच्चे कहीं।

लेकिन ये अव्यवस्था कुल मिलाकर बीस मिनट की ही है। मेरे साथ की सीट वाले सज्जन अपनी पत्नी और एक बेटी की परिवार को लेकर बगल की सीट में एडजस्ट हो गए हैं और उन्होंने अपनी एक सीट हमारे लिए छोड़ दी है। अब हमारे पास पूरी दो सीटें हैं, वो भी ऊपर-नीचे की।

बच्चों ने इतनी ही देर में अपना सामान खोल लिया है और ऊपरवाली सीट पर ऐसे जा बैठे हैं कि ये उनका रोज़-रोज़ का काम है - मुंबई सेंट्रल से बोरिवली तक रोज़ आते-जाते राजधानी लेने वाले चंद रेलवे कर्मचारियों की तरह, जिनके लिए यही ट्रेन दफ़्तर जाने का साधन है।

वो लड़की भी कहीं जगह बनाकर बैठ ही गई है। मेरे सामने वाली सीट पर एक और लड़की है, जो फोन पर अपनी मां से पहले उड़िया में बात करती है और उसके बाद अपने भैया से हिंदी में - झारखंडी हिंदी में। मैं ये जानने के लिए उत्सुक हूं कि ये लड़की रांची या बोकारो या जमेशदपुर से है क्या? ट्रेन में लोगों से बात करने और दोस्त बनाने की यूं भी बीमारी है मुझे।

लेकिन हम किसी से कुछ नहीं कहते और मेरी आंखें सिडनी शेल्डन के उस थ्रिलर में जा घुसी हैं जो घर से निकलते हुए मेरी भाभी ने मुझे पकड़ाया था - सफ़र बैठकर काटना पड़े तो उसके लिए।

नाश्ता आता है, खाली ट्रे वापस लौटा दी जाती हैं। ट्रेन में एक ख़ास किस्म की ऊर्जा होती है, एक ख़ास किस्म का माहौल। आवाज़ें, गंध, हलचल, बोलियां, गतिविधियां - सब एक ख़ास किस्म की। हमारे व्यक्तित्व के वो हिस्से रेल यात्राओं में बाहर निकलकर आते हैं जिनपर हमने भी शायद कभी ध्यान दिया हो।

मसलन, सामने बैठी उस लड़की ने शायद ही कभी सोचा हो कि मदद करना उसका स्वभाव है। वो बड़ी आसानी से दे सकती है, मदद कर सकती है, खुल सकती है किसी अजनबी से। होता यूं है कि वेटिंग में सफ़र कर रही लड़की को वो अपनी सीट पर बुला लेती है, और कहती है कि डोंट वरी, हम दोनों रात इसी सीट पर काट लेंगे। सफ़र करो तो इतना एडजस्ट करना ही पड़ता है!

मैं इस बातचीत से हैरान किताब से आंखें निकालकर उसकी ओर देखने लगती हूं। बीस-बाईस साल की उम्र में हम ज़्यादा समझदार होते हैं। हमारे दिलों का आकार वक़्त के साथ-साथ संकुचित होता चला जाता है शायद।

बच्चे नीचे उतर आए हैं और उनकी ज़िद है कि मैं बगल वाली महिला से इसलिए दोस्ती कर लूं ताकि उनके बच्चों के साथ खेलने का मौका उन्हें मिल सके।

"मम्मा, आपने बैंगलोर जाते हुए भी तो सजीव की मम्मा से दोस्ती कर ली थी। कितना मज़ा आया था! आप प्लीज़ बात करो न बगल वाली आंटी से। आपको भी तो एक नई फ्रेंड मिलेगी।"

लेकिन मेरे पास करने को कई काम हैं और एक रात के लिए दोस्ती करने की प्रेरणा भी नहीं रही अब। (मैंने कहा था न कि उम्र के साथ-साथ दिल भी छोटे होने लगते हैं!)

बच्चे अब मेरी पहल का इंतज़ार नहीं करते और पास बैठे देव और उसके बड़े भाई से दोस्ती कर लेते हैं। थोड़ी ही देर में किताबें, क्रेयॉन्स और सादे काग़ज़ के पन्नों के साथ-साथ सीटों की भी अदला-बदली हो चली है।

बच्चों का ऊधम चालू है, लेकिन सफ़र करने वालों में शायद बहुत सारा सब्र भी आ जाता है।

अचानक मुझे इस बात का फ़ख़्र हो आता है कि हम इतना सफ़र करनेवालों में से एक हैं। मुझे इस बात की खुशी होती है कि हम घुमंतू हैं, और पैरों में पहिए हैं हमारे।

अरी ओ किस्मत, हमें घुमंतू ही बनाए रखना।

घुमंतू ही बनाए रखना ताकि हम खिलौनों और चीज़ों की बजाए ऐसे बेमानी लम्हों के अनुभवों को संभालना सीखें। घुमंतू बनाए रखना ताकि हम बांटना सीखें - अपनी चीज़ें भी, अपनी सीटें भी।

घुमंतू बनाए रखना ताकि सफ़र हमारे लिए जितना अहम हो, उतनी तवज्जो हम मंज़िलों को कभी न दें। सफ़र में रहें हम, और ये ज़िन्सदगी सफ़र में ही गुज़र जाए।

घुमंतू बनाए रखना ताकि हैरत भरी नज़रों से नए लोगों, नई जगहों, नए शहरों, नए ठिकानों को देखते रहें हम, उनसे अपने वजूद में कुछ न कुछ लेते रहे हम और कभी जड़ न बनें - न शरीर से, न विचारों से।

घुमंतू बनाए रखना क्योंकि दूर-दूर जाकर हम दरअसल बाहर कुछ और नहीं खोज रहे होते। ये सफ़र हमें आत्मान्वेषी बनाते हैं।

घुमंतू बनाए रखना क्योंकि तभी फेसबुक पर हमारे दोस्तों की संख्या में इज़ाफ़ा हो सकेगा, फोनबुक में और नंबर जुड़ सकेंगे, अपनी दुआओं का दायरा बढ़ा सकेंगे हम।

घुमंतू बनाए रखना क्योंकि यूं इस तरह एक घंटे में ज़िन्दगी भर के लिए दोस्त बना सकने का मौका ज़िन्दगी किसी और तरह से नहीं देती।

घुमंतू बनाए रखना क्योंकि हमारे भीतर का कौतूहल तभी ज़िंदा रहेगा और दिलों का आकार तंग न होता जाए, इसके लिए ऐसी यात्राओं पर बने रहना ज़रूरी है।

घुमंतू बनाए रखना क्योंकि सुख 'कम्फर्ट ज़ोन' में बने रहने में नहीं होता। घुमंतू बनाए रखना ताकि कह सकें हम - बहुत ख़ूबसूरत है लत्ताओं, पत्तियों की झांझरी है, लेकिन हमें हमारा सफ़र प्यारा है।

घुमंतू बनाए रखना क्योंकि जीवन सफ़र में चलने का नाम होता है तो घूमते रहने से बेहतर जीने का और तरीका क्या होगा?

घुमंतू बनाए रखना क्योंकि हम नदी की वो धारा बने रहना का सुख चाहते हैं जो बहती रहती है। यूं भी नदी अपने स्रोत से जितनी दूर होती है, उतनी ही लंबी होती है और उतने ही ज़्यादा किनारों को पाटती है।

घुमंतू बनाए रखना क्योंकि तभी हम (और ख़ासकर बच्चे) हर हाल में मज़ा करना सीखेंगी - चाहे इसके लिए तंग सीटों और गंदे टॉयलेट्स से भी क्यों न समझौता करना पड़े।

घुमंतू बनाए रखना क्योंकि तभी ज़िन्दगी से शिकायतें कम होंगी और बाहर की दुनिया को देखने के नज़रिए में करुणा, प्यार, दरियादिली और समझ घुलेगी।

घुमंतु बनाए रखना क्योंकि जो बाहर की दुनिया जितना ही ज़्यादा देखते हैं, दुनिया पर भरोसा भी उतनी ही आसानी से करते हैं। यही भरोसा दुनिया को जिलाए रखता है।

घुमंतू बनाए रखना क्योंकि दुनिया के बारे में जितना ज्ञान अख़बारों और क़िताबों से नहीं मिलता, उतना मुसाफ़िरों के फ़लसफ़ों, उनकी टिप्पणियों से मिलता है।

घुमंतू बनाए रखना हमें क्योंकि हमारी यही फ़ितरत जितनी आसानी से जुड़ना और प्यार करना सिखाती है, उतनी ही आसानी से जाने देना और पीछे से दुआ का एक क़लमा पढ़ने की हिम्मत भी देती है। घुमंतू बनाए रखना क्योंकि विदाई का, जुदाई का सदमा कम होगा फिर।

मैं जीना चाहती हूं और चलते रहना चाहती हूं। इसलिए अरी ओ किस्मत! पैरों में पहिए और घुमंतुओं की ऐसी सोहबतें मेरे लिए भी बचाए रखना, मेरे बच्चों के लिए भी।
     

शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

सिरफिरों की मंडली, ख़्वाबमंदों की टोली



लोदी गार्डन में पिछले इतवार की दुपहर एक बजे का वक़्त मुक़र्रर था मंडली के लिए। सच कहूं तो इतवार की दोपहर कितने लोग आएंगे, इसका ठीक-ठीक अंदाज़ा मुझे भी नहीं था। ख़ासकर तब, जब आने वालों में कईयों को अपने घर के काम समेटने होंगे शायद, अपने बच्चों को सॉकर, म्यूज़िक या बैडमिंटन क्लास के लिए लेकर जाना होगा, या फिर जाड़े की एक नर्म दुपहर अपनी नींद ही पूरी करनी हो शायद... लेकिन मेरी आशंका के ठीक विपरीत लोगों ने एक बजे से पहले ही मुझे फोन करना शुरू कर दिया। डेढ़ बजते-बजते पूरी मंडली इकट्ठा हो चुकी थी, और कुल बारह-पंद्रह लोग एक घेरे में बैठे थे। इनमें से कम-से-कम दस अपनी कहानियां लेकर आए थे सुनाने के लिए, और कई इस उम्मीद में आए थे यहां से लिख सकने की प्रेरणा मिल सके।

शाम के गिरते-गिरते तक, ठंड के बढ़ते रहने तक, अंधेरा और गहरा होते जाने तक हम वैसे ही बैठे रहे थे - एक-दूसरे की कहानियां सुनने और उसपर अपनी प्रतिक्रियाएं देने के लिए। वक़्त तेज़ी से भागने की अपनी लत से मजबूर न होता तो हम कई और घंटे वैसे ही बैठे रहने को तैयार थे।

अब 'मंडली' के बारे में कुछ बताती चलूं। बाकी और लोगों की तरह मैंने भी मंडली के बारे में पहली बार फ़ेसबुक पर ही पढ़ा था और कुछ तस्वीरें देखीं थी वहीं। वो तब का दौर था जब बच्चों को प्ले-स्कूल भेज देने के बाद अपने मन का गुबार निकालने के लिए मैंने इसी ब्लॉग का सहारा ले लिया था। कई और लिखने वालों की तरह मैं भी सात या आठ साल की उम्र से लिखती रही हूं, और दस साल की उम्र से लिखते हुए मैंने अपनी जेबखर्च का इंतज़ाम भी शुरू कर दिया था। तब साठ रुपए बहुत होते थे और एआईआर, रांची या दूरदर्शन रांची में बच्चों के कार्यक्रम में कविताएं पढ़ने वाले बहुत सारे बच्चे थे नहीं। लेकिन लिखना एक शगल भर था - एक फ़ितूर - जिसपर आईआईएमसी जाकर फुल स्टॉप लग गया। उसके बाद का लिखना सिर्फ और सिर्फ रनडाउन भरने और एंकर लिंक्स लिखने तक ही सीमित रह गया। नौकरी छोड़ी तो लिखना शुरु किया - बड़ी बेतरतीबी से।

मैं ये बात इसलिए बता रही हूं क्योंकि मंडली के लिए जमा हुए अमूमन सभी लोगों की कहानी कुछ ऐसी ही थी - कम से कम लड़कियों और महिलाओं की तो थी ही। इनमें से कुछ ने डायरी के पन्ने भरे और उन पन्नों को या तो फाड़कर फेंक दिया या फिर तकियों के नीचे छुपाए रखा। कुछ नौकरी-गृहस्थी में इतने मशगूल हो गए कि लिखना बेमानी लगने लगा और फिर धीरे-धीरे कुछ कहने, बांटने की ज़रूरत भी मरने लगी। कुछ थे जो बेचैन रहे मेरी तरह। इसलिए फ़ेसबुक स्टेटस अपडेट्स में कविताएं लिखते हुए ख़ुद को जिलाए रखने का काम करते रहे। जो भी था, लिखना सब चाहते थे। चाहते हैं, उतनी ही शिद्दत से जितनी शिद्दत से मैं चाहती रही हूं, लेकिन कई सवाल रास्ता रोके रहते हैं।

मसलन, इस लिखने का हासिल क्या हो? ये दीवानगी, लिखने का ये जुनून कौन-सी दुनिया बदल देगा कमबख़्त? कितने लोग कालजयी लिख पाते हैं? कितने लोगों की पहचान बन पाती है लिखकर? लिखकर क्या करेंगे?

मैंने भी ये सवाल कई बार पूछे हैं ख़ुद से, और इसी ब्लॉग को कई बार उन सवालों के आड़े-तिरछे, बेमानी जवाबों से भर भी दिया है।
किसी ने लिखकर दुनिया न बदली है, न बदल पाएगा कोई। लेकिन लिखना ख़ुद को ज़रूर बदल देता है भीतर से। इसे एक क्लेनज़िंग प्रोसेस भी मान लिया जाए तो इस सफाई की ज़रूरत हर रूह को किसी न किसी रूप में होती ही है। वैसे लिखना इतना ही ग़ैर-ज़रूरी काम होता तो वाल्मिकी ने क्यों रची थी रामायण? स्वयं सिद्धिविनायक को क्यों बैठना पड़ा था एक महाकाव्य लिखने के लिए? एक पल को इन एपिक्स के बारे में भूल भी जाएं तो हम क्यों बेचैन होकर लिखते हैं चिट्ठियां? लव लेटर्स ही प्यार के इज़हार का ज़रिया क्यों बनते हैं? बहरहाल, ये विमर्श का एक अलग मुद्दा है और मैं तो कोई एक्सपर्ट भी नहीं।

अपने अनुभव से इतना ज़रूर जानती हूं कि लिखने की ख़्वाहिश रखने वाले हर इंसान को संबल ज़रूर दिया जाना चाहिए, उसे पढ़ा बेशक न जाया जाए, एक बार सुना ज़रूर जाना चाहिए। कोई कितना भी ख़राब क्यों न लिखता हो, हम सबके भीतर बैठे किस्सागो को थोड़ी-सी इज़्जत बख़्शने का मतलब दूसरे इंसान की कद्र करना होता है और हर इंसान उस थोड़ी-सी इज़्जत का हक़दार है - लिखनेवाले के तौर पर न सही, इंसान के तौर पर सही और मेरे लिए लिखना-पढ़ना इंसानियत बचाए रखने का एक्सटेंशन है।

सच कहूं तो शुरू में मुझे लगता था कि क़ाबिल लेखकों की एक मंडली एक स्मार्ट बिज़नेस मूव है (और यहां पब्लिक स्पेस में ये स्वीकार करते हुए मुझे बेहद हिचकिचाहट हो रही है) और कमर्शियल राइटिंग स्पेस में इससे बेहतर कोई बिज़नेस आईडिया शायद ही हो (सॉरी नीलेश! मैं पहले ऐसा सोचती थी। अब नहीं सोचती।)

लेकिन मैं जैसे-जैसे ख़ुद मंडली से गहराई और ईमानदारी से जुड़ती गई, वैसे-वैसे समझ में आने लगा कि ये एक पागलपन है - एक किस्म का सिरफिरापन, जिसका कोई रिटर्न, कम-से-कम वक़्त और ऊर्जा के अनुपात में आने वाला फाइनैन्शियल रिटर्न बहुत कम है। इस तरह का पागलपन उसी किस्म का कोई इंसान कर सकता है जिसने अपने लिखने और सीखने के क्रम में कई सारी गलतियां की हों, और बड़ी गहराई से ये महसूस किया हो कि इन गलतियों से हासिल सबक को इकट्ठा करके उन्हें अपने जैसे कई और सिरफिरे लोगों के साथ बांटा जाना चाहिए।

लिखनेवालों की एक टोली जुटाने की हिम्मत वैसा ही कोई शख़्स कर सकता है जिसने अपना ईगो, अपना दंभ एक हद तक क़ाबू में कर लिया हो। वरना ये आसान नहीं होता कि आप बड़ी ईमानदारी से ये स्वीकार कर सकें कि जो लोग आपसे सीखने आए हैं, वो दरअसल आपसे कहीं बेहतर हैं। ये भी आसान नहीं कि अपना लिखना छोड़कर आप बाकी लोगों को लिखने के लिए प्रेरित करते रहें, उनके लिए अवसर ढूंढते रहें।

लेखक या आर्टिस्ट या किसी किस्म का कलाकार अपने एकाकीपन में ही सबसे बेहतर रच पाता है - अपनी उदासियों में। उसकी उलझनें ही दूसरों को बांधती हैं। ये वो सूक्ष्म तंतु होते हैं जिनसे लेखक जितना कस कर  ख़ुद को घेरे रखता है, उतनी ही ज़ोर से पढ़नेवालों को, सुननेवालों को बांध पाता है। आर्टिस्ट का सिरफिरापन, उसका अवसाद, उसके दुख उसकी सबसे बड़ी ताक़त होते हैं - उसके हथियार होते हैं। वो दुनिया को जितनी शिद्दत से नकारता है, उतना ही अच्छा और नया लिख पाता है।

और हम मंडली में क्या कर रहे हैं? लिखनेवालों (या खुद को लेखक समझनेवालों) की फ़ितरत के ठीक विपरीत हम भीड़ जुटा रहे हैं। हम कह रहे हैं कि लिखो, और कुछ सकारात्मक लिखो। हम कह रहे हैं कि तुम्हारे पास जो ताक़त है न लिखने की, उसमें दुनिया को तो नहीं, लेकिन कुछ लोगों की सोच को बदलने का माद्दा ज़रूर है। इसलिए अच्छा लिखो। बदलो तो कुछ बदलो बेहतरी के लिए। बांटों तो उम्मीदें। लफ़्ज़ गिरें तो हौसलों के हों। अपनी टूटन का फ़साना बयां भी हो तो किसी और के टूटे हुए दिल को जोड़ पाने के लिए।

धत्त तेरे की!!! एक और सिरफ़िरी बात।

लेकिन ये मंडली है ही इसी के लिए। सिरफ़िरों की टोली है, जो अभी और बड़ी होगी। मुंबई और दिल्ली से देश के कई और शहरों में जाएगी। अगले कई सालों तक कई सारे लोगों को लिख पाने का भरोसा देगी।

अपने प्यार का इज़हार कर पाने के लिए जो चिट्ठी किसी ने कभी न लिखी, उसे वो चिट्ठी लिख पाने का हौसला देने के लिए।

अपने बॉस को assertive होकर जो ई-मेल कभी हम लिख न पाए, वो polite assertiveness बाहर लेकर आने के लिए।

अपनी मां की सालगिरह पर एक कविता लिख पाने के लिए। अपने भाई को राखी पर एक गीत सुना पाने के लिए।

अपने दोस्तों के बीच बैठकर कहानियां रच पाने के लिए।

अपने बच्चों को सुलाते हुए नई-नई कहानियां बुन पाने के लिए।

मंडली इसी के लिए तो है। रेडियो, टीवी या फिर किताबों-पत्र-पत्रिकाओं में अपना लिखा हुआ देख पाना तो सेकेंडरी है। कम-से-कम मंडली के लिए। दो क़दम आगे और एक क़दम पीछे चलते हुए हम अपना नया रास्ता तय कर ही लेंगे। मंडली के बारे में और बताऊंगी लौटकर। अभी के लिए इतना बता दूं कि दिल्ली में हुई चार मंडली बैठकों से होकर पांच नए (और बेहतरीन) writers निकले हैं, जिनकी कहानियां आप आनेवाले हफ्तों में बिग एफएम पर सुन सकेंगे। इनके अलावा एक मां (जो नानी भी हैं) ने बीस-पच्चीस साल पहले बंद की गई कविताओं और कहानियों की डायरी एक बार फिर निकाल ली है। अंबुज खरे नाम के साथी ने पंद्रह साल के बाद कलम उठाने का वायदा किया है। कॉरपोरेट नौकरियों और ज़िन्दगी की आपाधापी के बीच चार लेखिकाओं ने (जो मां भी हैं, और कामकाजी भी) अपनी कहानियां बांटी हैं।

अब और क्या कहूं कि ये मंडली  आख़िर है क्या?

सोमवार, 5 अगस्त 2013

एक थी मनभर


अलवर शहर से कुछ साठेक किलोमीटर दूर एक सरकारी बालिका विद्यालय में मनभर देवी से मुलाक़ात होती है। मनभर मन भर हंसती हैं, मन भर हंसाती हैं। मन भर मन लायक बातें करती हैं - कुछ इस तरह कि उनके आस-पास गोल घेरे में बैठी लड़कियों का मन उनसे भरता ही नहीं। लड़कियों को उनसे और बातें करनी हैं, कुछ और कहानियां सुननी हैं। लड़कियों के पास सवालों का पिटारा है, मनभर किसी सवाल को नहीं टालतीं। 

स्कूल में सेल्फ-डिफेंस की क्लास लेने आईं मनभर देवी को देखकर लगता है कि किसी सशक्त महिला को ऐसा ही होना चाहिए। बल्कि हर महिला को ऐसा ही होना चाहिए। उनके चेहरे में अजीब-सी कशिश है। वे बातें कर रही हैं तो मैं ध्यान से उनकी बोली सुनकर ये समझने की कोशिश करती हूं कि दूध-सी गोरी और बेहद ख़ूबसूरत चेहरे वाली ये महिला कहां की होगी? कश्मीर की? या फिर पंजाब की? हालांकि मनभर पंजाबी नाम ज़्यादा लगता है, कश्मीरी कम। लेकिन उनमें कश्मीरी सौंदर्य ज़्यादा है, पंजाबी अल्हड़पन कम। 

हम बहुत देर तक बात नहीं करते। मैं उन्हें सिर्फ क्लास लेते हुए देखती हूं। उम्र का अंदाज़ लगाना मुश्किल है क्योंकि उनका छरहरा शरीर और मेहंदी रंगे बाल मेरे अंदाज़ के बीच का फ़ासला बन जाता है। ये महिला लड़कियों से हर तरह की बात करती हैं - सेक्स, यौन हिंसा, छेड़खानी, प्यार और समझौते, रिश्ते और नाते, शादी, बच्चे, घर में होने वाली मार-पीट और घर की चहारदीवारी के भीतर होनेवाला सेक्सुअल अब्युज़। मैं मनभर देवी की साफ़गोई और बात करने के तरीके की कायल होने लगी हूं। 
  
मनभर की कहानी जानने को बेचैन हूं। उम्र की समझदारी एक बात है, लेकिन ज़िन्दगी के अनुभव ही आपको इस क़दर 'वाइज़' (अंग्रेज़ी और उर्दू, दोनों) बना सकते हैं। 

मनभर देवी को क्लास के बाद खींचकर एक कोने में लेकर आई हूं। "अपने बारे में कुछ बताईए न", मेरी गुज़ारिश में बच्चों-सी ठुनक है लेकिन मैं उनसे इतनी लिबर्टी तो ले ही सकती हूं। 

"मेरे बारे में क्या सुनेंगी मैडम? मैं तो अंगूठा छाप। पढ़ना-लिखना भी नहीं जानती?"

"हैं, सच्ची?" मैं हैरान हूं। "आपको सुनकर और देखकर तो नहीं लगता।"

"वो तो सालों से घिस रही हूं न ख़ुद को, इसलिए ज़िन्दगी ने सब सिखा दिया। मेरी बेटी बहुत पढ़ी-लिखी है वैसे। एम ए किया है सोशल वर्क में। जयपुर में काम करती है। दामाद भी। दोनों बहुत ख़ुश हैं।"

"और आप? मैं उनसे पूछती हूं।"

"मेरे तो दिन ढल गए मैडम जी।"

"दिन के ढलने से पहले की कहानी सुनाईए न", मैं फिर एक बार कहती हूं। 


"हम जात के दर्ज़ी हैं - यहीं राजस्थान के (मेरा पहला अनुमान ग़लत साबित होता है)। मैं पांच बहनों के बीच की थी।"

"उम्र कितनी है आपकी?"

"साठ की होने वाली हूं।"

"रियली? आपको देखकर नहीं लगता।"

मनभर हंस देती हैं। अब देखती हूं कि उनके दाएं गाल पर गड्ढा बन जाता है हंसते हुए। 

"सास बहुत मानती होंगी", मैं गाल पर पड़ने वाले गड्ढे की ओर इशारा करती हूं। "मेरी सास ने मुझसे यही कहा था, और उनकी सास ने उनसे यही, एक अतिरिक्त जानकारी भी दे देती हूं उनको साथ में।"

"आप और आपकी सास खुशकिस्मत होंगे मैडम। मैं नहीं थी। छह साल की उम्र में शादी हो गई। दस साल बड़े लड़के से। मां-बाप के पास और बेटियां थीं, इसलिए गौना करने की जल्दी थी। शादी के बाद शरीर पर क्या-क्या गुज़री ये मत पूछो। बस इतना समझ लो कि कुछ समझ में भी नहीं आता था कि हो क्या रहा है। मैं छुपती तो सास बांह खींचकर पति के आगे कर देती। बारह साल की उम्र में पेट में बच्चा आ गया। मर भी गया पेट में ही। सुन पाएंगी अगर बताऊं तो कि क्या हुआ।"

"हूं? हां... बताईए न..." मैं हैरान हूं कि मनभर अपनी कहानी इतने मैटर-ऑफ-फैक्टली कैसे सुना सकती हैं! 

"पेट में बच्चा आया, ये तो तब पता चला जब पेट में ज़ोर से दर्द होने लगा। गांव की एक औरत आई। पेट में कान लगाया और बोला बच्चा तो मर गया। फिर दो-तीन औरतों ने मुझे लिटाकर मेरे पेट को दबा-दबाकर वो मरा हुआ बच्चा पेट से निकाल दिया। मैं एक हफ्ते तक खाट से नहीं उठ पाई।"

"अलवर की उमस में मेरे रोएं सिहरने लगे हैं। मैं अपनी दोनों हथेलियां ज़ोर से आपस में भींचकर खड़ी हो जाती हूं। मैंने ज़ख्‍म कुरेदा ही क्यों?"

"फिर पति पीछे और मैं भागती फिरूं। शादी का मतलब यही तो था, मेरी सास ने कहा मुझसे। अब मैं किससे क्या बोलती? अब सोच लो कि इतने साल पहले की बात है। तब मायके जाना भी पाप था। मैं तो कई साल अपने घरवालों से मिली ही नहीं थी। ख़ैर, फिर पेट में एक और बच्चा मर गया। चौदह साल की उम्र में पहला बेटा हुआ, फिर दो साल बाद दूसरा और फिर एक बेटी हुई। मैं नौ महीने पेट से होती और फिर बच्चा पैदा करने के बाद फिर से नौ महीने... पता नहीं कैसे जी रही थी। जी में आता था उस आदमी का गला घोंट दूं। लेकिन हिम्मत कभी नहीं हुई।"


"फिर आप ये..." मैं उनके नारीवादी रूप के बारे में पूछ रही हूं। 

"फिर एक दिन पति दो-चार मर्द ले आया। बोला, इनके साथ सो जा। तीन हजार रुपए मिलेंगे। उस ज़माने में तीन हज़ार बहुत होते थे। मैं तो बहुत रोई। बहुत हाथ-पैर जोड़े। मैं जितना रोती, वो मुझे उतना ही मारता। मैं किसी तरह पड़ोस में भागकर बच गई उस दिन। रात में कुंए में कूद गई लेकिन लोगों ने बचा लिया। ज़िन्दगी का रास्ता बदलना था, शायद इसलिए बचा लिया।"

"उस दिन मैंने कसम खा ली, ऐसे आदमी के पास दुबारा लौटने से रही। दो-एक दिन बाद मौका देखकर घर से भाग गई। सोचा, अपने लिए रोटी जुटा लूंगी तो बच्चों को ले जाऊंगी। वैसे सच कहूं तो बच्चों से बहुत लगाव था नहीं। बच्चे तो दुश्मन लगते। अब एक सोलह साल की लड़की पूरे दिन कुटती-पिटती हो और फिर बच्चे पैदा करती हो तो उसे बच्चों से क्या लगाव होगा?"

"मैंने झाडू-पोंछा किया। बर्तन मांजे। किसी तरह काम करके पेट पालती रही लेकिन उस आदमी के पास नहीं गई जो मुझे वैसे भी वेश्या बना देता। किस्मत से एक डॉक्टर मिल गईं, उन्होंने एक एनजीओ से जोड़ दिया मुझे। वहीं अपना नाम लिखना, जोड़-घटाव करना सीखा और वहीं काम करने लगी। कई साल काम किया। काम मालूम क्या था? अपने जैसी औरतों से जाकर मिलना... उनको हिम्मत देना... उनको पढ़ाना-लिखाना... बेटियों को मरने से बचाना... मैं जी गई। मुझे जीने का मकसद मिल गया। बच्चों को लेने के लिए लौटी तो आदमी ने बेटी को थमा दिया और भगा दिया घर से। खुद जैसी है, वैसी ही इसको बनाना। बोल के निकाल दिया घर से। मैंने भी कसम खाई - अपने जैसी तो बनाऊंगी लेकिन पढ़ाऊंगी। मेरे जैसी किस्मत ऊपरवाले ने दी भी हो उसको तो बदल दूंगी लड़कर। बेटी को स्कूल-कॉलेज भेजा। पैसा-पैसा जोड़कर पढ़ाया। उसकी नौकरी लगी और फिर उसने अपनी पसंद से शादी की - एक ब्राह्मण लड़के से। मैं शादी के ढकोसले नहीं मानती, लेकिन मुझे समाज के सामने साबित करना था कि एक अनपढ़ बेचारी औरत तय कर लो तो कुछ भी कर सकती है। हिम्मत है किसी की कि अब कोई बोल ले कुछ मुझसे? एक बात बोलूं? जयपुर में घर बनाया मैंने। बेटे-बहू वहीं आकर रहते हैं अब। आदमी भी। लेकिन उन सबको मैं किराएदार से ज्यादा कुछ नहीं समझती। अपना काम करती हूं। अपनी धुन में रहती हूं। मैं... मैं मदद करूंगी उनकी... उनसे मदद लेने से पहले ईश्वर उठा ले, यही बिनती करती हूं।"

मनभर की कहानी सुनते हुए मन भी भर गया है, आंखें भी। है किसी में इतनी हिम्मत?