1
जितनी बार हम जी रहे होते हैं
दुःख
क्षोभ, व्यथा, हानि
बिछोह, संताप, प्रताड़ना, ग्लानि
पीड़ा की ये आरी
काट रही होती है
कई पूर्वजनमों के जंजाल।
जितनी बार
हम होते हैं
किसी के प्रेम में
उतनी ही बार
कस रहे होते हैं
अपनी गर्दन के चारों ओर
नारियल की रस्सियां
और तैयार कर रहे होते हैं
फिर से एक दुर्गम जाल।
प्रेम के जाल
और पीड़ा की आरी के बीच
बचा रह जाता है
पल-पल झरता शरीर
जिसके मोम के न होने का
रहता है अफ़सोस
लगातार।
जब हम काट रहे होते हैं
अपने हिस्से के करम
और बुन रहे होते हैं
कई नए कष्टसाध्य जाल
अगली ज़िन्दगी के लिए
दर्ज करा रहे होते हैं
एक ही दरख्वास्त -
प्रेम।
2
जो कहता नहीं है
अपनी जुबां से
उसकी आँखों में
सबसे गहरी होती है बेचैनी
जो नहीं जानता हाथ मिलाना
खींचकर गले लगाओ तो
सबसे ऊँची आवाज़ में
रोया भी वही करता है अक्सर
जिसके होठों पर
कम होती हैं शिकायतें
चखो तो सबसे उदास
बोसे उसी के होते हैं
जिसके कंधे लगते हैं
सबसे मज़बूत और मुकम्मल
उसके सीने से कभी नहीं उतरता
इस बेगैरत दुनिया का बोझ
दरअसल जो दिखता है
वो होता नहीं है
जो नहीं दिखता
वही हुआ करता है
सबसे ईमानदार सच।
3
ख्वाहिशों की तितलियों को
आम के मंजर,
सेमल के फूल,
अरहर के सिट्टे,
बेल की लदी डालियां,
नशे में झूमता महुआ पेड़,
जंगली गुलाब रास नहीं आते।
ख्वाहिशों की इन तितलियों को
बेसबब बेकरारियों के अंगारों पर
मंडराने का नया चस्का लगा है।
ख्वाहिशों की तितलियों के
इस सुसाईड अटेम्पट की
वे ख़ुद ज़िम्मेदार करार दी जाएँ!
4
मत पूछ कि
इस पागल शहर में
रहती कहाँ हूँ मैं
कॉफ़ी के झूठे प्यालों में हूँ
व्हाट्सएप्प पर कुछ सवालों में हूँ
तुम्हारे गुसल की बेसिन पर
उस रात छोड़ी थी जो अपनी
मैगनोलिया क्रीम, वहाँ हूँ मैं।
कंघी के टूटे बालों में हूँ
अलमारी की दराजों में हूँ
छोटी सी इक रसोई के कोने
सिल बट्टे की जगह ले गयी जो
मिक्सी, वहाँ हूँ मैं।
अस्पतालों के नंबर में हूँ
कोम्बिफ्लाम के पत्ते में हूँ
तपते हुए माथों पर जो
लगती, बदलती, गीली हुयी है
पट्टी, वहाँ हूँ मैं।
गमले में हूँ कि बाड़ों में हूँ
एसी के नकली जाड़ों में हूँ
गुल्लक में हूँ कि लॉकर में हूँ
सच में हूँ, फसानों में हूँ
एफ़म पर चलते गानों में हूँ
गाडी में भी हूँ, रिक्शे पे भी हूँ
घर को बनाए दफ्तर में भी हूँ
बिखरी हुयी हूँ, बहकी हुयी हूँ
फिर क्या बताऊँ,
रहती कहाँ हूँ मै
5
कैसे करें शुक्रगुजारी ऐ खुदा
दिया तो इतना दिया
कि बक्सों, सन्दूकों,
काग़ज़ के गत्तों के डब्बे
भी कम पड़ते हैं।
सुनो, कि कभी लेना ही वापस मुझसे
तो सबसे पहले
लम्हों, लोगों, दर-ओ-दीवारों से
डूबकर इश्क करने की
ये बेजां फितरत ले लेना।
तुम भी बख्श दिए जाओगे
और मेरी भी इस छोटी सी दुनिया को
मिल जाएगा आराम!
6
झरती डाल
फुदकती चिड़िया
कड़वे नीम
पर आये फूल
दरकती ज़मीन
फूटा अंकुर
दहकता माथा
शबनमी बोसा
कराहती पीठ
गोद में बच्चा
जलती आँखें
बरसते बादल
सुलगता चूल्हा
ठंडी शिकंजी
छूटती सांसें
थामती उम्मीद।
7
नाज़ुक था
डाल से बिछड़ गया
कचनार था
था अलहदा
भीड़ से अलग हुआ
काला मेमना
सख्त था
चोरी के गुल्लक पर
मम्मी का थप्पड़ था
था उलझा हुआ
कुर्सी बुनता
नया-सा कारीगर कोई
गर्म था, सर्द था
खिला था, ज़र्द था
नहीं था ख्वाब वो
कई रातों का सिरदर्द था
वो क्या था, कहती
सब कह देती
मगर तुम्हारी मौजूदगी में
हमेशा
और अदना हो जाती हैं
मेरी सारी कवितायें!
8
मरती रहती हूँ
फिर भी रह जाते हैं काम
मैं कब, कहाँ
किस मौन में
पुकारूं तुम्हारा नाम।
9
अगर खींच सकती
तो ले आती तस्वीरें
कानों और इअर प्लग्स के बीच
तिरकिट मचाती हवाओं की
नाईट शिफ्ट के बाद
अपने झुरमुट में सोने चली गयी
रात की रानी की
बैसाख को ठेंगा दिखाकर
फलते फूलते लैवेंडर की
दहकते इश्क का चोगा पहनते
गुल्मोहर, अमलतास, कचनार की
ॐ, प्राणायाम में ग़म ग़लत करती
नाराज़, हैरान, दयनीय दुनिया की
लेकिन जान, मैं फोटोग्राफर नहीं
और तुम फुर्सतज़दा नहीं
इसलिए आज भी टहलकर
लौट गयी हूँ पार्क से।
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रविवार, 13 जुलाई 2014
मंगलवार, 17 दिसंबर 2013
रौंद दिए जाने का सुख
1.
उड़ उड़ जाने दो
और फिसल जाने दो
रोक कर थाम कर जो रक्खे हैं क़दम
थोड़ी ठोकर लगे
थोड़े घुटने छिलें
तब तो मानेंगे कि हम थे चले दो क़दम
हर हमेशा संभाला है चलते हुए
फ़िक्र की है कि कोई भी जाने नहीं
कोई देखे नहीं हमको गिरते हुए
गिन लिए फॉर्मूले, तय किए रास्ते
पढ़ लिए क़ामयाबी के कुछ फ़लसफ़े
कभी ढूंढा नहीं
कभी पूछा नहीं
इनमें क्या सच रहा और क्या था वहम
मैं भी डरती रही, तुम भी डरते रहे
जो न देखा सुना वो नया ही रहा
ख़ौफ़ खाते रहे हर नई दुनिया से हम
हर बदलते हुए को बेमुरव्वत कहा
चुन लीं कुछ गालियां, हाथ पत्थर लिए
जो बदलने चला वो ज़हर ही पिए
मैं तो फिर भी कहूं
कि चलो कुछ करें
कुछ बदलने का बाकी रहे इक भरम
उड़ उड़ जाने दो
और फिसल जाने दो
रोक कर थाम कर जो रक्खे हैं क़दम
2.
गुल्लक में बचाकर रखे
छोटी ईया के दिए हुए पैसे
उनसे खरीदी हुई पेंसिलें,
चुकाई हुई फ़ीस
रिक्शेवाले के चार रुपए
पानी में घुली हॉर्लिक्स
और सबके हिस्से में आया
दो मिल्क बिकिस
एस्बेस्टस की छत से
छनकर आती धूप
टूटी हुई प्लास्टर वाली
एक कच्ची-पक्की दीवार
और रफू की हुई फ्रॉक में
चमकता कच्चा रूप
एक अंतर्देशीय में आया
नानी का 'शुभासीस'
कोनों पर लटकते जाले
सोफे पर गिरे हल्दी के दाग़
बूंद-बूंद रिसता
वॉश बेसिन का नल
बेमौसम उजड़ गया
एक बदकिस्मत बाग़
धूल खाती साइकिल
मुंह चिढ़ाता अलीगढ़ी ताला
घर बंद कर शहर-शहर
भटकने की कोई एक टीस
कविता नहीं होती
सुंदर, शीतल शब्दों, भावों,
बिंबों का मायाजाल
बिंबों का मायाजाल
कविता नहीं होती
सिर्फ प्रेम की ऊष्णता
कविता होती है
नोस्टालजिया के प्रति कृतज्ञता
और कभी-कभी रौंद दिए जाने का
सुख भी होती है कविता!
शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013
चोट, स्टिच और कविता
किसने कहा था कि मेरी ज़ुबान काली है? किसने कहा था कि सपनों में आने वाले दिनों के संकेत छुपे होते हैं? जाने किसने कहा था, लेकिन दोनों बातें सौ फ़ीसद सही निकलीं - उन तमाम अंदेशों की तरह जो मेरे दोस्त, मेरे शुभचिंतक हमेशा मेरे लिए ज़ाहिर किया करते हैं और जिन्हें नज़रअंदाज़ करते हुए मैं अपनी धुन में चलती चली जाती हूं। ठोकर हर हाल में लगनी है। बेहतर है कि ख़ुद के चुने रास्ते पर ख़ुद की शर्तों के साथ ठोकरें खाई जाएं।
बहरहाल, भूमिका बहुत हुई और मैं मुद्दे पर आती हूं। तो सपना ख़ौफ़नाक तरीके से सच निकला। आदित को चोट लगी आज। बुरी तरह। मैं घर पर नहीं थी और मेरे पास आद्या का फ़ोन आया। "मम्मा, जल्दी आओ। आदित गिर गया और और उसको बहुत-बहुत सारा ख़ून निकल रहा है।"
मैं घर में मौजूद इकलौती वयस्क - बच्चों की मौसी रुचि से बात करना चाहती थी। "मौसी फ़ोन पर नहीं आ सकती। वो आदित को बाथरूम में लेकर खड़ी है। उसके मुंह से ख़ून निकलना बंद नहीं हो रहा।"
आनन-फ़ानन में दो-चार नसीहतें देकर मैं घर की ओर भागी। ऐसी भागी कि दो ट्रैफिक सिग्नल तोड़े, एक ट्रैफ़िक पुलिस के रोके जाने पर गाड़ी को और तेज़ कर दिया (जाने इसका नतीजा क्यो होगा) और उल्टे-सीधे तरीकों से ओवरटेक करते हुए हांफते-सांस फुलाते किसी तरह घर पहुंची।
अस्पताल, सूजा हुआ मुंह, निकलता हुआ ख़ून और उन सबके बीच धीर-गंभीर सा एक बच्चा।
"डॉक्टर अंकल सुई भी देंगे?"
"हां बेटा। टिटनस की।"
"अच्छा। मुंह में भी देंगे?"
"हो सकता है। अनीस्थिसिया। स्टिच लगाने से पहले, ताकि तुम्हें दर्द ना हो।"
"आप मेरे पास होगे मम्मा?"
"शायद। हो सकता है डॉक्टर अंकल मुझे थिएटर से बाहर भी कर दें। मैं बाहर वेट करूंगी।"
"अच्छा। मेरे दांत टूट जाएंगे तो मुझे दर्द भी होगा?"
मैंने दांतों को हिलाकर देखा। मसूढ़ों से और ख़ून निकल पड़ा। इस बच्चे ने किस बुरी तरह ज़ख़्मी किया है ख़ुद को।
मैं आदित के कटे हुए होंठे, बहता हुआ ख़ून, टूटे हुए दांत के बीच अपना काम करती रही - गाड़ी चलाना, एटीएम से पैसे निकालना, बिल भरना, दवाएं लेकर आना... ऐसे कि जैसे ये सब रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का हिस्सा हो। मुझे एमरजेंसी में और लोगों को देखकर घबराहट भी नहीं हुई। मुझे ख़ून सने कपड़े देखकर घिन नहीं आई। ना जी मिचला। मैं अपने-आप से हैरान थी। एक साल भी नहीं हुआ इस बात को... पिछली गर्मी छुट्टियों में हम पूर्णियां में थे और मनीष के पीठ पर एक घाव हो गया था। किसी किस्म का सिस्ट जिसमें बुरी तरह इन्फेक्शन हो गया था। उस सिस्ट की ड्रेसिंग का काम मां करती थीं - मेरी सासू मां, क्योंकि मुझसे ज़ख़्म देखे नहीं जाते। किसी को सुई पड़ते देखकर मरीज़ से ज़्यादा मेरे चिल्लाने का ख़तरा रहता है। तो हुआ यूं कि छत पर खड़ी होकर मां मनीष के ज़ख़्म की गर्म पानी से सफ़ाई कर रही थीं। उन्होंने मुझे ये देखने के लिए बुलाया कि घाव सूखा है या नहीं, एक बार छूकर देख लो। मैं डरते-डरते पहुंची। तबतक मां घाव को दबाकर उससे पस निकालने लगीं।
आपको मेरी बात का यकीन नहीं होगा, लेकिन सिर्फ़ इतने से ज़ख़्म को देखकर मैं वहीं छत पर खड़े-खड़े गश खाकर ज़मीन पर गिर गई। होश आया तो बेचारे मनीष अपनी तकलीफ़ छोड़कर मेरे मुंह पर पानी के छींटे मारने में लगे थे और मां मुझे संभाले बैठी थीं। कई दिनों तक इस बात को लेकर मेरा मज़ाक उड़ाया जाता रहा। हम भी बेशर्म होकर खुद को सुकुमारी डिक्लेयर कर बैठे।
सुकुमारी मां के रूप में आती है तो सब बर्दाश्त करना सीख जाती है। अलर्ट होना, एमरजेंसी सिचुएशन हैंडल करना, ऑपरेशन थिएटर की बदबू में खड़े रहना, पट्टियां बदलना, एंटिबायोटिक का ठीक-ठीक डोज़ देना, अपने करीबी दोस्तों से मदद मांग लेना, उन्हें आवाज़ देकर बुला लेना - सबकुछ। कमाल है कि स्टिच वाले मुंह में खाना डालने के तरीके भी आ जाते हैं और दर्द के बावजूद थपकी देकर सुला देना भी। कमाल है कि इस बारे में बेबाकी से लिखना भी आ जाता है, और सोते हुए बच्चे के सिरहाने बैठे हुए उसपर इतना प्यार भी आ जाता है कि टूटी-फूटी कविताएं तक निकल आती हैं।
१
कहां से लाएं
शब्दों की दौलत
कहने की मोहलत
सुनने की फ़ितरत
जो लाना ही है
तो मांग न लाएं
तुमसे हमारा गुज़रा हुआ वक़्त?
२
मुल्तानी मिट्टी
आंवला और रीठा
पपीते का पैक
संतरे का छिलका
नाख़ून पर रंग
बालों पर रोगन
चम्मच-भर नींबू
ज़र्रा भर शहद
ज़ुबां की मिठास
आंखों की प्यास
जिस्म की ख़ुशबू से
दुनियादारी का क्या वास्ता?
३
धीमे धीमे
आंच जलाओ
अब दिल का
एक डोंगा चढ़ाओ
भर दो उसमें
इश्क का पानी
अपने आप को
उसमें मिलाओ
पकने दो और
भूल भी जाओ
हाथ जलाओ
हाथ हटाओ
इस गाढ़ी चाशनी को
अब जहां चाहो, बांटकर आओ
बहरहाल, भूमिका बहुत हुई और मैं मुद्दे पर आती हूं। तो सपना ख़ौफ़नाक तरीके से सच निकला। आदित को चोट लगी आज। बुरी तरह। मैं घर पर नहीं थी और मेरे पास आद्या का फ़ोन आया। "मम्मा, जल्दी आओ। आदित गिर गया और और उसको बहुत-बहुत सारा ख़ून निकल रहा है।"
मैं घर में मौजूद इकलौती वयस्क - बच्चों की मौसी रुचि से बात करना चाहती थी। "मौसी फ़ोन पर नहीं आ सकती। वो आदित को बाथरूम में लेकर खड़ी है। उसके मुंह से ख़ून निकलना बंद नहीं हो रहा।"
आनन-फ़ानन में दो-चार नसीहतें देकर मैं घर की ओर भागी। ऐसी भागी कि दो ट्रैफिक सिग्नल तोड़े, एक ट्रैफ़िक पुलिस के रोके जाने पर गाड़ी को और तेज़ कर दिया (जाने इसका नतीजा क्यो होगा) और उल्टे-सीधे तरीकों से ओवरटेक करते हुए हांफते-सांस फुलाते किसी तरह घर पहुंची।
अस्पताल, सूजा हुआ मुंह, निकलता हुआ ख़ून और उन सबके बीच धीर-गंभीर सा एक बच्चा।
"डॉक्टर अंकल सुई भी देंगे?"
"हां बेटा। टिटनस की।"
"अच्छा। मुंह में भी देंगे?"
"हो सकता है। अनीस्थिसिया। स्टिच लगाने से पहले, ताकि तुम्हें दर्द ना हो।"
"आप मेरे पास होगे मम्मा?"
"शायद। हो सकता है डॉक्टर अंकल मुझे थिएटर से बाहर भी कर दें। मैं बाहर वेट करूंगी।"
"अच्छा। मेरे दांत टूट जाएंगे तो मुझे दर्द भी होगा?"
मैंने दांतों को हिलाकर देखा। मसूढ़ों से और ख़ून निकल पड़ा। इस बच्चे ने किस बुरी तरह ज़ख़्मी किया है ख़ुद को।
मैं आदित के कटे हुए होंठे, बहता हुआ ख़ून, टूटे हुए दांत के बीच अपना काम करती रही - गाड़ी चलाना, एटीएम से पैसे निकालना, बिल भरना, दवाएं लेकर आना... ऐसे कि जैसे ये सब रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का हिस्सा हो। मुझे एमरजेंसी में और लोगों को देखकर घबराहट भी नहीं हुई। मुझे ख़ून सने कपड़े देखकर घिन नहीं आई। ना जी मिचला। मैं अपने-आप से हैरान थी। एक साल भी नहीं हुआ इस बात को... पिछली गर्मी छुट्टियों में हम पूर्णियां में थे और मनीष के पीठ पर एक घाव हो गया था। किसी किस्म का सिस्ट जिसमें बुरी तरह इन्फेक्शन हो गया था। उस सिस्ट की ड्रेसिंग का काम मां करती थीं - मेरी सासू मां, क्योंकि मुझसे ज़ख़्म देखे नहीं जाते। किसी को सुई पड़ते देखकर मरीज़ से ज़्यादा मेरे चिल्लाने का ख़तरा रहता है। तो हुआ यूं कि छत पर खड़ी होकर मां मनीष के ज़ख़्म की गर्म पानी से सफ़ाई कर रही थीं। उन्होंने मुझे ये देखने के लिए बुलाया कि घाव सूखा है या नहीं, एक बार छूकर देख लो। मैं डरते-डरते पहुंची। तबतक मां घाव को दबाकर उससे पस निकालने लगीं।
आपको मेरी बात का यकीन नहीं होगा, लेकिन सिर्फ़ इतने से ज़ख़्म को देखकर मैं वहीं छत पर खड़े-खड़े गश खाकर ज़मीन पर गिर गई। होश आया तो बेचारे मनीष अपनी तकलीफ़ छोड़कर मेरे मुंह पर पानी के छींटे मारने में लगे थे और मां मुझे संभाले बैठी थीं। कई दिनों तक इस बात को लेकर मेरा मज़ाक उड़ाया जाता रहा। हम भी बेशर्म होकर खुद को सुकुमारी डिक्लेयर कर बैठे।
सुकुमारी मां के रूप में आती है तो सब बर्दाश्त करना सीख जाती है। अलर्ट होना, एमरजेंसी सिचुएशन हैंडल करना, ऑपरेशन थिएटर की बदबू में खड़े रहना, पट्टियां बदलना, एंटिबायोटिक का ठीक-ठीक डोज़ देना, अपने करीबी दोस्तों से मदद मांग लेना, उन्हें आवाज़ देकर बुला लेना - सबकुछ। कमाल है कि स्टिच वाले मुंह में खाना डालने के तरीके भी आ जाते हैं और दर्द के बावजूद थपकी देकर सुला देना भी। कमाल है कि इस बारे में बेबाकी से लिखना भी आ जाता है, और सोते हुए बच्चे के सिरहाने बैठे हुए उसपर इतना प्यार भी आ जाता है कि टूटी-फूटी कविताएं तक निकल आती हैं।
१
कहां से लाएं
शब्दों की दौलत
कहने की मोहलत
सुनने की फ़ितरत
जो लाना ही है
तो मांग न लाएं
तुमसे हमारा गुज़रा हुआ वक़्त?
२
मुल्तानी मिट्टी
आंवला और रीठा
पपीते का पैक
संतरे का छिलका
नाख़ून पर रंग
बालों पर रोगन
चम्मच-भर नींबू
ज़र्रा भर शहद
ज़ुबां की मिठास
आंखों की प्यास
जिस्म की ख़ुशबू से
दुनियादारी का क्या वास्ता?
३
धीमे धीमे
आंच जलाओ
अब दिल का
एक डोंगा चढ़ाओ
भर दो उसमें
इश्क का पानी
अपने आप को
उसमें मिलाओ
पकने दो और
भूल भी जाओ
हाथ जलाओ
हाथ हटाओ
इस गाढ़ी चाशनी को
अब जहां चाहो, बांटकर आओ
लेबल:
कविता,
डायरी,
Motherhood
मंगलवार, 3 अप्रैल 2012
ज़िन्दगी होती बॉक्स ऑफ चॉकलेट्स
१
बहुत बढ़ गई है महंगाई
कि हाफ़िज़ सईद पर है
दस मिलियन डॉलर का ईनाम
और क़ीमती हो गई हैं
आईपीएल की टिकटें
झीना हिकाका के बदले
मांगे गए हैं दो-चार और कॉमरेड
कुपोषण से लड़ने के लिए
बढ़ गया है सालाना डोनेशन
बाल काटने के लिए
पच्चीस रुपए ज्यादा लेगा नाई
एक इंसान की जान है
मुद्रास्फीति के विषमचक्र से बाहर।
२
उदास
बदहवास
कोई प्यास
नहीं पास
धीमी सांस
ना कोई आस
खुशी का कोई लम्हा
बेतुका लगता यहां!
३
भूला हुआ वक्त
भूले हुए लोग
भूला हुआ घर
भूला हुआ कल
भूली हुई यादें
भूली हुई बात
भूली हुई शाम
भूली हुई रात
एक तुम ही नहीं
गुमशुदा इन दिनों
एक मैं ही नहीं
भूली अपना रास्ता।
४
बुनते रहना
ख्वाबों के तिलस्म
सजाए रखना
दुखों का बाज़ार
बनाए रखना
चांद को बंदी
जिलाए रखना
सच्चा-झूठा प्यार
बचाए रखना
अनगढ़ कविताएं
बढ़ाए जाना
दंतकथाओं का कारोबार
तुमपर दूसरे की तकलीफ़ों का है दारोमदार
मैं भी समझूंगी भ्रम को सच बार-बार।
५
चुभते हैं दर्द के कांटे
सीना भी भारी-सा लगता है
रुकी रहती है सांस इन दिनों
कोई डर बस साथ चलता है
रंग-बिरंगी गोलियां
बच्चों को मम्मा की जेम्स लगती हैं
मैं पॉपिन्स को याद करती हूं बार-बार
कैंडीज़ नहीं,
ज़िन्दगी को बॉक्स ऑफ चॉकलेट्स
बनाने का कोई हुनर मालूम है दोस्तों?
बहुत बढ़ गई है महंगाई
कि हाफ़िज़ सईद पर है
दस मिलियन डॉलर का ईनाम
और क़ीमती हो गई हैं
आईपीएल की टिकटें
झीना हिकाका के बदले
मांगे गए हैं दो-चार और कॉमरेड
कुपोषण से लड़ने के लिए
बढ़ गया है सालाना डोनेशन
बाल काटने के लिए
पच्चीस रुपए ज्यादा लेगा नाई
एक इंसान की जान है
मुद्रास्फीति के विषमचक्र से बाहर।
२
उदास
बदहवास
कोई प्यास
नहीं पास
धीमी सांस
ना कोई आस
खुशी का कोई लम्हा
बेतुका लगता यहां!
३
भूला हुआ वक्त
भूले हुए लोग
भूला हुआ घर
भूला हुआ कल
भूली हुई यादें
भूली हुई बात
भूली हुई शाम
भूली हुई रात
एक तुम ही नहीं
गुमशुदा इन दिनों
एक मैं ही नहीं
भूली अपना रास्ता।
४
बुनते रहना
ख्वाबों के तिलस्म
सजाए रखना
दुखों का बाज़ार
बनाए रखना
चांद को बंदी
जिलाए रखना
सच्चा-झूठा प्यार
बचाए रखना
अनगढ़ कविताएं
बढ़ाए जाना
दंतकथाओं का कारोबार
तुमपर दूसरे की तकलीफ़ों का है दारोमदार
मैं भी समझूंगी भ्रम को सच बार-बार।
५
चुभते हैं दर्द के कांटे
सीना भी भारी-सा लगता है
रुकी रहती है सांस इन दिनों
कोई डर बस साथ चलता है
रंग-बिरंगी गोलियां
बच्चों को मम्मा की जेम्स लगती हैं
मैं पॉपिन्स को याद करती हूं बार-बार
कैंडीज़ नहीं,
ज़िन्दगी को बॉक्स ऑफ चॉकलेट्स
बनाने का कोई हुनर मालूम है दोस्तों?
रविवार, 25 मार्च 2012
हर्फ़ों के तीखे खंजर
आधी रात गए परेशानियों की निशानियां थी पेशानी पर, एक और रात नींद ना आने का डर था और आते-जाते कुछ ख़्याल थे। उन्हें हर्फो़ं में उतारा था तो जाने क्या बना, कि कविताओं की विभिन्न विधाओं के बारे में मुझे ख़ास जानकारी नहीं। ना ग़ज़ल, नज़्म, त्रिवेणी, हाइकू, छंद, मुक्त छंद की समझ है। हालांकि लिखा हुआ मुकम्मल हुआ जब भाई ने काफ़िया मिलाया, आधी रात के बाद बैठकर। कुछ शब्द लिए एक-दूसरे से ख़्वाबों में बात करने का नतीजा है ये। ये कविताएं ना भी हो तो आज की सुबह उम्मीदनुमा कुछ लगती है कि सफ़र कट ही जाएगा, हम पा ही लेंगे एक हसीन मुकाम।
1.
हमारे दिल के चाहे पर कसो ना फ़ब्तियां
दुआएं और क्या होती हैं, ख़्वाहिशों के सिवा। - अनु
तुम्हारा मुस्कुराना भी, कि अब है तीर सा चुभता
बलाएं और क्या होती हैं, चंद नालिशों के सिवा। - प्रशांत
2.
निकल आए थे हर्फ़ों के कुछ तीखे-तीखे खंजर
आह हम भरते रहे, कत्ल-ए-आम होता रहा। - अनु
हमारी आहों में मिन्नत थी, गुलाबी थी नज़र मगर
नशे में तुम थे ऐ हमदम, छलकाए-जाम होता रहा - प्रशांत
3.
बुतपरस्ती अब नहीं करते, ना बदगुमां सिर झुकता है इन दिनों
हमें फिर भी कहनवाले काफ़िर कहा करते हों तो कोई बात नहीं। - अनु
ना अपना रास्ता कोई, ना ही कहीं ठिकाना है इन दिनों
जो अपनी मंजिल पर चंद आवारा रहा करते हों तो कोई बात नहीं। - प्रशांत
4.
किसने कहा मुश्किलें कम हो गईं,
यहां हर शख़्स सौ दर्द लिए चलता है।
किसी को चारागरी आती नहीं,
फिर भी अजनबी कंधों पर हाथ रखता है। - अनु
जिगर में एक चिंगारी थी, वो अब दिल तक पहुंची है
कि जलता दिल भी आँखें सर्द लिए चलता है
ये अच्छा है हमें हाराकिरी आती नहीं
खुदा भी खुदी वालों को अपने साथ रखता है। - प्रशांत
5.
नहीं है ख़ौफ़ ज़लज़लों का, ना हादसों का डर है आजकल
जो जान पर आई तो तैर जाएंगे एक आग का दरिया भी
बस एक तेरी तरकश से निकले सच का तीर डराता है। - अनु
ना कम किस्मत का ही है डर, ना समय से पहले होगी जुम्बिश
जो खुद पे हो तो हंस के काटेंगे लम्हे-गिरया भी
कि जिससे थी दुआ मांगी, मेरा वो पीर डराता है। - प्रशांत
6.
मत सिखाओ लीक पर चलना
कि तुम्हारा रास्ता मेरा हो, ज़रूरी नहीं
मुझे तुम भी तो अजनबी रास्ते पर मिले थे हमसफ़र। - अनु
दोस्त हो मेरे, वाईज़ नहीं बनना
कि तुमसे वास्ता मेरा हो, ज़रूरी नहीं
क्या करोगे जो मोहब्बत ही बन जाए शिकायत ग़र!! - प्रशांत
1.
हमारे दिल के चाहे पर कसो ना फ़ब्तियां
दुआएं और क्या होती हैं, ख़्वाहिशों के सिवा। - अनु
तुम्हारा मुस्कुराना भी, कि अब है तीर सा चुभता
बलाएं और क्या होती हैं, चंद नालिशों के सिवा। - प्रशांत
2.
निकल आए थे हर्फ़ों के कुछ तीखे-तीखे खंजर
आह हम भरते रहे, कत्ल-ए-आम होता रहा। - अनु
हमारी आहों में मिन्नत थी, गुलाबी थी नज़र मगर
नशे में तुम थे ऐ हमदम, छलकाए-जाम होता रहा - प्रशांत
3.
बुतपरस्ती अब नहीं करते, ना बदगुमां सिर झुकता है इन दिनों
हमें फिर भी कहनवाले काफ़िर कहा करते हों तो कोई बात नहीं। - अनु
ना अपना रास्ता कोई, ना ही कहीं ठिकाना है इन दिनों
जो अपनी मंजिल पर चंद आवारा रहा करते हों तो कोई बात नहीं। - प्रशांत
4.
किसने कहा मुश्किलें कम हो गईं,
यहां हर शख़्स सौ दर्द लिए चलता है।
किसी को चारागरी आती नहीं,
फिर भी अजनबी कंधों पर हाथ रखता है। - अनु
जिगर में एक चिंगारी थी, वो अब दिल तक पहुंची है
कि जलता दिल भी आँखें सर्द लिए चलता है
ये अच्छा है हमें हाराकिरी आती नहीं
खुदा भी खुदी वालों को अपने साथ रखता है। - प्रशांत
5.
नहीं है ख़ौफ़ ज़लज़लों का, ना हादसों का डर है आजकल
जो जान पर आई तो तैर जाएंगे एक आग का दरिया भी
बस एक तेरी तरकश से निकले सच का तीर डराता है। - अनु
ना कम किस्मत का ही है डर, ना समय से पहले होगी जुम्बिश
जो खुद पे हो तो हंस के काटेंगे लम्हे-गिरया भी
कि जिससे थी दुआ मांगी, मेरा वो पीर डराता है। - प्रशांत
6.
मत सिखाओ लीक पर चलना
कि तुम्हारा रास्ता मेरा हो, ज़रूरी नहीं
मुझे तुम भी तो अजनबी रास्ते पर मिले थे हमसफ़र। - अनु
दोस्त हो मेरे, वाईज़ नहीं बनना
कि तुमसे वास्ता मेरा हो, ज़रूरी नहीं
क्या करोगे जो मोहब्बत ही बन जाए शिकायत ग़र!! - प्रशांत
शुक्रवार, 23 मार्च 2012
मुस्कुराने का कोई सबब नहीं होता
इन दिनों अजीब-सी हालत है। आंधियां मध्य-पूर्व और पूर्वी अफ्रीका के रेगिस्तानों में चलती हैं, मौसम दिल्ली का बदल जाता है। ३१ मार्च की डेडलाइन नौकरीपेशा लोगों की सांसत कम, हम जैसे फ्रीलांसर्स के गले की हड्डी ज्यादा बन जाती है। सो, इन दिनों धूल भरी आंधियां हैं, ऑस्टियोपरोटिक मां की टूटी हुई कुहनी की चिंताएं हैं, अस्पताल के आईसीयू में पड़ी एक प्यारी लड़की के लिए दुआएं मांगने के बेसाख़्ता सिलसिले हैं, बच्चों के नए सेशन का आगाज़ है, ढेर सारे डेडलाइन्स हैं और हैं कुछ टूटी-फूटी कविताएं। वैसे सब बेमानी है क्योंकि कुछ ठहरता नहीं। आद्या और आदित, मम्मा की डायरी पढ़कर परेशान होना नहीं क्योंकि ये उलझे-उलझे सितमगर दिन भी निकल ही जाएंगे, तुम्हारे रतजगों वाले बचपन की तरह।
१.
मां ने सिखाया था बचपन से
कि जितनी हो चादर, उतना ही फैलाना पांव
क्या करें जब कम पड़ने लगे चौबीस घंटे भी।
२.
वो ज़िद्दी है मगर मन का है कोमल
अपने-उसके रिश्ते में हैं परछाईयां कहीं की
मैं भी तो तुम जैसी ही हो गई हूं, मां।
३.
रेगिस्तान में चलती है आंधियां
बदल जाती है हवा-फ़िज़ां दिल्ली की
कहां-कहां जुड़ी होती हैं इंसानों की नियतियां।
४.
दर्द के रेशे हैं, टूटी हुई कुहनी है
बिखरे तकिए, कुशन, चौके का बोझ है सिर पर
पचपन की स्पीड को भी चाहिए एक स्पीडब्रेकर।
५.
बालकनी में झूलती है जयपुरी चादर
छोटी नैपियां, ऊनी कपड़े, नई मां की चुन्नी
सुना है, हमारी पड़ोसन के घर बेटा हुआ है।
६.
ठेके पर हो जाती है पेंटिंग
घर भी तो मिल जाता है ईएमआई पर आजकल
हेडलाईन है, तलाक मिलना और हो गया आसान।
७.
रिक्शे की मूठ पकड़े, गले में बोतल टांगे
गीली आंखें लिए जा रही है वो स्कूल पहले दिन
मुस्कुराने का कोई सबब नहीं हुआ करता।
१.
मां ने सिखाया था बचपन से
कि जितनी हो चादर, उतना ही फैलाना पांव
क्या करें जब कम पड़ने लगे चौबीस घंटे भी।
२.
वो ज़िद्दी है मगर मन का है कोमल
अपने-उसके रिश्ते में हैं परछाईयां कहीं की
मैं भी तो तुम जैसी ही हो गई हूं, मां।
३.
रेगिस्तान में चलती है आंधियां
बदल जाती है हवा-फ़िज़ां दिल्ली की
कहां-कहां जुड़ी होती हैं इंसानों की नियतियां।
४.
दर्द के रेशे हैं, टूटी हुई कुहनी है
बिखरे तकिए, कुशन, चौके का बोझ है सिर पर
पचपन की स्पीड को भी चाहिए एक स्पीडब्रेकर।
५.
बालकनी में झूलती है जयपुरी चादर
छोटी नैपियां, ऊनी कपड़े, नई मां की चुन्नी
सुना है, हमारी पड़ोसन के घर बेटा हुआ है।
६.
ठेके पर हो जाती है पेंटिंग
घर भी तो मिल जाता है ईएमआई पर आजकल
हेडलाईन है, तलाक मिलना और हो गया आसान।
७.
रिक्शे की मूठ पकड़े, गले में बोतल टांगे
गीली आंखें लिए जा रही है वो स्कूल पहले दिन
मुस्कुराने का कोई सबब नहीं हुआ करता।
मंगलवार, 13 मार्च 2012
भूली हुई नायिकाएं
कल रात महाभारत की कहानी सुनते हुए पांच साल के बेटे ने पूछा, सिर्फ पांडव, कौरव और कृष्ण थे वहां? तो फिर लड़कियां कहां थीं? वाकई, महाभारत की नायिकाएं कहां थीं? गंगा, कुंती, गांधारी, द्रौपदी और सुभद्रा की तो कहानियां सुनीं, लेकिन बाकी नायिकाएं कहां थीं? महाभारत का बीज कहां से आया? दुर्योधन की पत्नी कैसी रही होगी? जीवनभर सारथिपुत्र कहलाने और दुर्योधन की आजीवन कृतज्ञता का बोझ ढोने को शापित कर्ण की पत्नी वृशाला को कैसा लगता होगा जब उसका पति पथ-पथ पर घोर उपहास का पात्र बनता होगा? वो कैसी पत्नियां रही होंगी कि एक ने साथ छोड़कर चले जानेवाले पति की मौत का उपहार मांगा होगा मातृऋण के बदले, तो दूसरी ने नागमणि का दान दिया होगा? वो कैसी पत्नी रही होगी जिसने अपने इकलौते पुत्र को युद्धक्षेत्र में भेजने में संकोच नहीं किया होगा - वो भी उस पिता के बुलावे पर जिसे बेटे ने देखा तक नहीं। महाभारत धर्म और अधर्म, जय और पराजय, विलास और संन्यास, महत्वाकांक्षा और अभिमान, सुरक्षा और भय, भोग और त्याग, युद्ध और शांति, कर्म और दुष्कर्म, जीवन और मृत्यु की महागाथा है। महाभारत उन भूली हुई नायिकाओं का शोक-गीत भी है जो अपने कर्मों को भोगने के लिए इस महागाथा के पन्नों का हिस्सा बनीं।
सत्यवती
ऊंची महत्वाकांक्षा
अप्रतिम सौंदर्य
केवट का घर
वृद्ध राजा का महल
देवव्रत के भीष्म
होने का फल
निष्फल पुत्र
अभिमान क्षुण्ण
मत्स्यगंधा, तुम
गंगा की लहरों पर ही सुरक्षित रहती!
हिडिंबा
प्रेम में समर्पण
विरह को अर्पित
जीवन-दर्शन
सुहाग में वैधव्य
पति को सर्वस्व
छिनी भाई की शान
किया कुरुक्षेत्र में
पुत्र का बलिदान
हे देवी हिडिंबा
तुम राक्षसी ही भली थी!
माद्री
ना कोई लिप्सा
ना ही प्रतिकार
ना मांग ही कोई
ना मिला वरदान
कुंती की छाया
अश्विनी की माया
पति का बाहुपाश
चिता की आग
ओ माद्री,
तुम्हें सती तो ना होना था!
भानुमति
सुयोधन की नायिका
दुर्योधन की संगिनी
दुःस्वप्नों का श्राप
पति के पाप
अधर्म का साथ
खलनायक का हाथ
द्रौपदी से डाह
इंद्रप्रस्थ की चाह
हे काशीकन्ये,
तुम्हें मोक्ष कैसे मिलना था!
चित्रांगदा
मणिपुर की रानी
वीरांगना, अभिमानी
अर्जुन हुए पस्त
रूप से मदमस्त
बब्रुवाहन बना नायक
अर्जुन-सा धनुर्धर
बेटे से वचन
पितृवध की कसम
हे अर्जुन पत्नी,
पति से ये कैसा बदला था?
उलुपी
नागों की कन्या
मोहक और रम्या
अर्जुन से नेह
दिया जीवन सस्नेह
नागमणि का मान
पति को प्राण-दान
अपेक्षाओं से किनारा
बेटे को संवारा
ओ उलुपी,
एक रात के बदले ऐसे बलिदान?
उत्तरा
विराट की बेटी
मत्स्यवंशी कन्या
नृत्य में प्रवीण
अभिमन्यु की प्रिया
कुरुक्षेत्र की धरोहर
कोख में विरासत
ब्रह्मास्त्र की सताई
नारायण की बचाई
ओ उत्तरी,
उस जीवन से कीमती विजय का कोई टुकड़ा ना था।
सत्यवती
ऊंची महत्वाकांक्षा
अप्रतिम सौंदर्य
केवट का घर
वृद्ध राजा का महल
देवव्रत के भीष्म
होने का फल
निष्फल पुत्र
अभिमान क्षुण्ण
मत्स्यगंधा, तुम
गंगा की लहरों पर ही सुरक्षित रहती!
हिडिंबा
प्रेम में समर्पण
विरह को अर्पित
जीवन-दर्शन
सुहाग में वैधव्य
पति को सर्वस्व
छिनी भाई की शान
किया कुरुक्षेत्र में
पुत्र का बलिदान
हे देवी हिडिंबा
तुम राक्षसी ही भली थी!
माद्री
ना कोई लिप्सा
ना ही प्रतिकार
ना मांग ही कोई
ना मिला वरदान
कुंती की छाया
अश्विनी की माया
पति का बाहुपाश
चिता की आग
ओ माद्री,
तुम्हें सती तो ना होना था!
भानुमति
सुयोधन की नायिका
दुर्योधन की संगिनी
दुःस्वप्नों का श्राप
पति के पाप
अधर्म का साथ
खलनायक का हाथ
द्रौपदी से डाह
इंद्रप्रस्थ की चाह
हे काशीकन्ये,
तुम्हें मोक्ष कैसे मिलना था!
चित्रांगदा
मणिपुर की रानी
वीरांगना, अभिमानी
अर्जुन हुए पस्त
रूप से मदमस्त
बब्रुवाहन बना नायक
अर्जुन-सा धनुर्धर
बेटे से वचन
पितृवध की कसम
हे अर्जुन पत्नी,
पति से ये कैसा बदला था?
उलुपी
नागों की कन्या
मोहक और रम्या
अर्जुन से नेह
दिया जीवन सस्नेह
नागमणि का मान
पति को प्राण-दान
अपेक्षाओं से किनारा
बेटे को संवारा
ओ उलुपी,
एक रात के बदले ऐसे बलिदान?
उत्तरा
विराट की बेटी
मत्स्यवंशी कन्या
नृत्य में प्रवीण
अभिमन्यु की प्रिया
कुरुक्षेत्र की धरोहर
कोख में विरासत
ब्रह्मास्त्र की सताई
नारायण की बचाई
ओ उत्तरी,
उस जीवन से कीमती विजय का कोई टुकड़ा ना था।
गुरुवार, 1 मार्च 2012
मुंबई से पोस्टकार्ड
१
तुझे देखा है लेटे हुए बातें करते ऐ समंदर
कभी साहिल पे भी पैग़ाम दिए जाता है
जो मौज तेरी नहीं कहतीं तेरे डर से ज़ालिम
वो सुर्ख सूरज उतरते हुए कहे जाता है
तू शहंशाह है और तेरे राज में ही ऐ बेदर्द
सितमगरों का ये शहर बसता चला जाता है
तूने जादू से रचा है जो एक हसीन तिलस्म
वो तेरी गहराई से भी ऊंचा हुआ जाता है
तू ख़्वाबों का है साथी, तू अश्कों का है डेरा
तेरे पानी में हरपल ज़हर घुला जाता है
तू अपनी बेरूखी का ये लबादा ओढ़े ही रख
बेफिक्र ये शहर तुझपे काबिज़ हुए जाता है
२
हवा से बातें करता
धुंए के जाम पीता
ठोकरों, गड्ढों से
मुझको बचाता
चला जाता है वो
धीमे-धीमे गुनगुनाता
आज की दोपहर
हमसफ़र बना है ऑटोवाला।
३
दो रुपए में
खरीद लिया है सनसेट प्वाइंट
और समंदर के किनारे की
थोड़ी-सी हरियाली
एक डक पॉन्ड भी है उसमें
सी-सॉ पर हैं बच्चे
रिबॉक पहने
उनकी आया इतराती है
मेरे जूतों ने कहा है,
नहीं काटेंगे तुझे
कि इतने सस्ते में
जॉगर्स पार्क के ये महंगे नज़ारे
हर दिन कहां मिलते हैं?
४
सुना है वो सुपरस्टार
सिर्फ़ दो घंटे सोता है हर रोज़
सुना है धुंए के छल्लों से
उलझती है रात
सुना है कि वो होती है
बहुत तन्हां
कि उसकी वैनिटी
सिर्फ सेट्स और वैन में मिला करती है
सुना है कवि है कोई
दिन में लिखता है आईटम नंबर
और रात में रोते हुए
कामायिनी पढ़ता है
सुना है ये शहर
ख़्वाबों को पर देता है
सुना है कि ये नींद-ओ-चैन
गिरवी रखता है।
तुझे देखा है लेटे हुए बातें करते ऐ समंदर
कभी साहिल पे भी पैग़ाम दिए जाता है
जो मौज तेरी नहीं कहतीं तेरे डर से ज़ालिम
वो सुर्ख सूरज उतरते हुए कहे जाता है
तू शहंशाह है और तेरे राज में ही ऐ बेदर्द
सितमगरों का ये शहर बसता चला जाता है
तूने जादू से रचा है जो एक हसीन तिलस्म
वो तेरी गहराई से भी ऊंचा हुआ जाता है
तू ख़्वाबों का है साथी, तू अश्कों का है डेरा
तेरे पानी में हरपल ज़हर घुला जाता है
तू अपनी बेरूखी का ये लबादा ओढ़े ही रख
बेफिक्र ये शहर तुझपे काबिज़ हुए जाता है
२
हवा से बातें करता
धुंए के जाम पीता
ठोकरों, गड्ढों से
मुझको बचाता
चला जाता है वो
धीमे-धीमे गुनगुनाता
आज की दोपहर
हमसफ़र बना है ऑटोवाला।
३
दो रुपए में
खरीद लिया है सनसेट प्वाइंट
और समंदर के किनारे की
थोड़ी-सी हरियाली
एक डक पॉन्ड भी है उसमें
सी-सॉ पर हैं बच्चे
रिबॉक पहने
उनकी आया इतराती है
मेरे जूतों ने कहा है,
नहीं काटेंगे तुझे
कि इतने सस्ते में
जॉगर्स पार्क के ये महंगे नज़ारे
हर दिन कहां मिलते हैं?
४
सुना है वो सुपरस्टार
सिर्फ़ दो घंटे सोता है हर रोज़
सुना है धुंए के छल्लों से
उलझती है रात
सुना है कि वो होती है
बहुत तन्हां
कि उसकी वैनिटी
सिर्फ सेट्स और वैन में मिला करती है
सुना है कवि है कोई
दिन में लिखता है आईटम नंबर
और रात में रोते हुए
कामायिनी पढ़ता है
सुना है ये शहर
ख़्वाबों को पर देता है
सुना है कि ये नींद-ओ-चैन
गिरवी रखता है।
सोमवार, 6 फ़रवरी 2012
मन के शहर से पाती
१
खोजे डिब्बे दो-चार,
निकाल लिए पैकेट्स
खुल गई मेरे सिरहाने
से सटकर बैठी दराज़
समेटा-सहेजा,
झाड़ा-बुहारा
और बंद करके रख दिया
हमने आज फिर
टुकड़ों टुकड़ों का इंतज़ार।
२
चलो सपनों की चादर का कोई कोना तो थामो तुम
बिछा दें हम ज़मीं पर जो, किसी ख्वाहिश का लम्हा हो
जो सर पर और कुछ ना हो तो बस तारों का डेरा हो,
कोई तकिया हो बांहों का, मद्धम सांसों का घेरा हो
समंदर साथ में लेटे, बरसती रात हो हमपर
मिले जो सुबह सिरहाने, कोई शबनम का क़तरा हो
जो कहना भी नहीं आए तो चुप्पी साथ रख लेना
पलक का कोई एक मोती हमारे हाथ में देना
चूनर में बांध जो लूंगी तुम्हारे डर का टुकड़ा हो
बिछा दें हम ज़मीं पर जो, किसी ख्वाहिश का लम्हा हो
३
ना आवाज़ दो,
ना मुझको पुकारो
नहीं कर पाऊंगी
तुम्हारे पीछे बंद
मैं दरवाज़ा
नहीं कह पाऊंगी
आज फिर एक बार
अलविदा।
खोजे डिब्बे दो-चार,
निकाल लिए पैकेट्स
खुल गई मेरे सिरहाने
से सटकर बैठी दराज़
समेटा-सहेजा,
झाड़ा-बुहारा
और बंद करके रख दिया
हमने आज फिर
टुकड़ों टुकड़ों का इंतज़ार।
२
चलो सपनों की चादर का कोई कोना तो थामो तुम
बिछा दें हम ज़मीं पर जो, किसी ख्वाहिश का लम्हा हो
जो सर पर और कुछ ना हो तो बस तारों का डेरा हो,
कोई तकिया हो बांहों का, मद्धम सांसों का घेरा हो
समंदर साथ में लेटे, बरसती रात हो हमपर
मिले जो सुबह सिरहाने, कोई शबनम का क़तरा हो
जो कहना भी नहीं आए तो चुप्पी साथ रख लेना
पलक का कोई एक मोती हमारे हाथ में देना
चूनर में बांध जो लूंगी तुम्हारे डर का टुकड़ा हो
बिछा दें हम ज़मीं पर जो, किसी ख्वाहिश का लम्हा हो
३
ना आवाज़ दो,
ना मुझको पुकारो
नहीं कर पाऊंगी
तुम्हारे पीछे बंद
मैं दरवाज़ा
नहीं कह पाऊंगी
आज फिर एक बार
अलविदा।
शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012
एक गीत पुराने पन्नों से
मैं बोलूं कुछ, तुम कुछ सोचो
हम साथ बहें पर साथ नहीं
तुम हमसाए हो, मेरे साथी हो
फिर भी हाथों में हाथ नहीं.
तेरे कांधों पर रखकर सर
पलकों की थिरकन गिनते थे
जब गर्म हथेली में अपनी
तकदीर की सर्दी भरते थे
वो नर्म-नर्म से दिन छूटे
और साथ मुलायम रात नहीं
तुम हमसाए हो, साथी हो
फिर भी हाथों में हाथ नहीं.
हमने सीखा है तुमसे ही
उम्मीद के बोझ लिए चलना
और गीली आंखों के पीछे
ख़ुश रुख़सार लिए मिलना
लेकिन बांटें हम चुपके से
अब ऐसी कोई बात नहीं
तुम हमसाए हो, साथी हो
फिर भी हाथों में हाथ नहीं
हम साथ बहें पर साथ नहीं
तुम हमसाए हो, मेरे साथी हो
फिर भी हाथों में हाथ नहीं.
तेरे कांधों पर रखकर सर
पलकों की थिरकन गिनते थे
जब गर्म हथेली में अपनी
तकदीर की सर्दी भरते थे
वो नर्म-नर्म से दिन छूटे
और साथ मुलायम रात नहीं
तुम हमसाए हो, साथी हो
फिर भी हाथों में हाथ नहीं.
हमने सीखा है तुमसे ही
उम्मीद के बोझ लिए चलना
और गीली आंखों के पीछे
ख़ुश रुख़सार लिए मिलना
लेकिन बांटें हम चुपके से
अब ऐसी कोई बात नहीं
तुम हमसाए हो, साथी हो
फिर भी हाथों में हाथ नहीं
गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012
एक फ़साना ऐसा हो
टूटी-फूटी,
उलझी-सिमटी
प्रेम में लिपटी
कहानी को
दूं छोड़
और बख़्श दूं ऐसा मोड़
जहां से लौटने की
ना बाकी हो कोई राह।
आवेग में बहती
बिफरती, बिखरती
नायिका से
पूछूं ना सख़्त सवाल,
ना कसूं कोई तंज,
ना हो कोई रंज
उसे दूं बिखरे बाल,
और एक शख्सियत बेहाल।
रचूं एक हीरो
जिसके हारने का
ना हो कोई मलाल,
जो कांधे पर रखकर सिर
कह सके अपनी बात
जिसकी नमकीन आंखें
चलती हों हर पल नई चाल।
ना पूछो
ऐसा फ़साना कहां
कहां हों ऐसे किरदार
कि हमने ख़्वाबों में
जागते हुए
गुज़ार दिए कई
बेशक़ीमती साल...
उलझी-सिमटी
प्रेम में लिपटी
कहानी को
दूं छोड़
और बख़्श दूं ऐसा मोड़
जहां से लौटने की
ना बाकी हो कोई राह।
आवेग में बहती
बिफरती, बिखरती
नायिका से
पूछूं ना सख़्त सवाल,
ना कसूं कोई तंज,
ना हो कोई रंज
उसे दूं बिखरे बाल,
और एक शख्सियत बेहाल।
रचूं एक हीरो
जिसके हारने का
ना हो कोई मलाल,
जो कांधे पर रखकर सिर
कह सके अपनी बात
जिसकी नमकीन आंखें
चलती हों हर पल नई चाल।
ना पूछो
ऐसा फ़साना कहां
कहां हों ऐसे किरदार
कि हमने ख़्वाबों में
जागते हुए
गुज़ार दिए कई
बेशक़ीमती साल...
बुधवार, 1 फ़रवरी 2012
गीत बसंत और अनुवाद
अपना नया रूप दिखाओ, ओ बसंत
बढ़ाओ अपना हाथ, मुझे ले लो साथ
और रंग दो अपने ही किसी रंग।
धूप दो ऐसी कि पिघलूं
और दो सुकूं कि रो लूं जीभर के
टूटी हुई ख्वाहिशों के लिए लिखने दो गीत
और सौंप दो वो आख़िरी पैग़ाम-ए-इश्क।
टूटने दो लहरों का सन्नाटा,
कि बर्फ़ पिघली तो होगी कहीं
कहने दो अलविदा सर्द हवाओं को
कि लौटा मेरा वो महबूब नहीं।
उड़ने दो तितलियों को घूंघट के पास
लगाने दो घूंघर में एक लाल गुलाब
ना छेड़ो कोई राग ओ बुलबुल आज की रात
जो गाऊंगी साथ, तभी पूरी होगी बात।
रुको, रख दूं तुम्हारे होठों पर उंगलियां
गुज़र जाए आंखों का पानी, गुज़र जाए ये नर्म रात
ये मौसम नहीं होने देगा हमें नमनाक
ना तोड़ो इसकी लय को, और ना ही बैठो मेरे पास।
Show me your beauty, O Spring –
Give me a gentle touch,
and smear your colour atop the green.
Grant me a sun full of warmth
Give me some peace
Let the air sing a song of heartache
And give me that one final fling.
Let the lakes break out of their listlessness,
For, freeze has come and gone.
Let me say my adiue to the chill,
And beloved, forlorn.
Let the butterfly grace my veil,
And let a red rose dazzle in my hair
Behold your mellow song, O nightingale
Let me sing with you, when I come there.
Hang in there, for you are not allowed to say
Let the water flow, let the placid night go
Spring is the season not for tear
Hold that rhythm but not with me, Oh dear!
बढ़ाओ अपना हाथ, मुझे ले लो साथ
और रंग दो अपने ही किसी रंग।
धूप दो ऐसी कि पिघलूं
और दो सुकूं कि रो लूं जीभर के
टूटी हुई ख्वाहिशों के लिए लिखने दो गीत
और सौंप दो वो आख़िरी पैग़ाम-ए-इश्क।
टूटने दो लहरों का सन्नाटा,
कि बर्फ़ पिघली तो होगी कहीं
कहने दो अलविदा सर्द हवाओं को
कि लौटा मेरा वो महबूब नहीं।
उड़ने दो तितलियों को घूंघट के पास
लगाने दो घूंघर में एक लाल गुलाब
ना छेड़ो कोई राग ओ बुलबुल आज की रात
जो गाऊंगी साथ, तभी पूरी होगी बात।
रुको, रख दूं तुम्हारे होठों पर उंगलियां
गुज़र जाए आंखों का पानी, गुज़र जाए ये नर्म रात
ये मौसम नहीं होने देगा हमें नमनाक
ना तोड़ो इसकी लय को, और ना ही बैठो मेरे पास।
Show me your beauty, O Spring –
Give me a gentle touch,
and smear your colour atop the green.
Grant me a sun full of warmth
Give me some peace
Let the air sing a song of heartache
And give me that one final fling.
Let the lakes break out of their listlessness,
For, freeze has come and gone.
Let me say my adiue to the chill,
And beloved, forlorn.
Let the butterfly grace my veil,
And let a red rose dazzle in my hair
Behold your mellow song, O nightingale
Let me sing with you, when I come there.
Hang in there, for you are not allowed to say
Let the water flow, let the placid night go
Spring is the season not for tear
Hold that rhythm but not with me, Oh dear!
बुधवार, 25 जनवरी 2012
एक कविता, एक अनुवाद
Hometown no more
Various silences
She is acquainted with
And noises
that aren't unknown
The applause
which has died down
And the sniggers some more
An ache and
minnows packed in a bag with a pair of wheels,
She leaves the hometown
She leaves the hometown
like a stealthy lover
For beloved seems so far away
Tonight
And so does home.
शहर अब अपना नहीं
कई चुप्पियां
जिनसे वाकिफ है वो,
और आवाज़ें
जो अनजान भी नहीं,
वाहवाहियां
जो होने लगी हैं ख़ामोश,
और पीठ पीछे उड़ाए गए
कुछ भद्दे मज़ाक,
एक दर्द
और कुछ तुच्छ-सी चीज़ें
बंद हो गई हैं एक
पहियोंवाले बैग में।
वो शहर छोड़ देती है अपना
छुप के आई महबूबा की तरह
कि महबूब बहुत दूर है
आज की रात,
घर भी तो है उतनी ही दूर।
सोमवार, 26 दिसंबर 2011
काफ़िए की एक रात
आधी रात को भाई के साथ काफ़िया मिलाया तो नतीजा ये निकला..
कभी ख्याल बनकर ही छू लिया, कभी नींद उड़ाई एक ख़्वाब की
जो राज़ बना, हमराज़ बना, करूं कैसे शिकायत उस माहताब की
जो राज़ बना, हमराज़ बना, करूं कैसे शिकायत उस माहताब की
घनघोर घटा को जिसने बांधा है, ऐसी ताक़त है तेरे हिजाब की
जो तीर-ए-निगाह है पोशिदा, दो बूंद मिले उस नज़र-ए-आब की
जो तीर-ए-निगाह है पोशिदा, दो बूंद मिले उस नज़र-ए-आब की
कहो कैसे चैन आ जाएगा जब बात ना हो किसी इज़्तराब की
हम दीवाने हैं, अपनी हस्ती क्या, हमें उम्मीद कहां है इंतख़ाब की
हम दीवाने हैं, अपनी हस्ती क्या, हमें उम्मीद कहां है इंतख़ाब की
हमने भी कहा चलो ऐसा भी हो, भूलें हर्फें माज़ी के किताब की
थोड़ी शक्लें वैसे हम पहचानते हैं तुझसे आनेवाले जवाब की
थोड़ी शक्लें वैसे हम पहचानते हैं तुझसे आनेवाले जवाब की
जब झोंके से ही काम बने, क्यों ख़्वाहिश करें फिर सैलाब की
पहले सुलझें अपनी ये उलझनें, तब बात करेंगे इंकलाब की
पहले सुलझें अपनी ये उलझनें, तब बात करेंगे इंकलाब की
गुरुवार, 3 नवंबर 2011
जाने दो मुझे, आज जाने दो
बजने दो आज फोन की घंटियां
मर भी जाए तो क्या है
मर जाए एक और डेडलाईन।
गुज़र जाने दो घंटों को
पटरियों पर दौड़ती रेल की तरह।
आने दो ई-मेलों को
घबराए हुए कबूतरों की तरह
भरने दो इनबॉक्स।
जाने दो ट्रैफिक के शोर को
किनारे से,
पीछेवाले बजाते रहें हॉर्न
सरकती रहे एक और भेड़चाल।
उड़ती रहे धूल,
गुज़रती रहे धूप
और निकल जाए आज का दिन भी।
मुझे रुक जाने दो आज,
जीभर के सांस तो लेने दो,
थोड़ी देर तो और सो लेने दो मेरी जान!
थोड़ी देर तो और सो लेने दो मेरी जान!
रविवार, 18 सितंबर 2011
ना... ख़बर नहीं है
ना, छूना ना उस गिरह को।
जो पिघला कहीं अगर तो
बह पाओगे तुम कहां तक
कि बंद है उस जगह पर
इक सोता है कि समंदर
हमको भी ख़बर नहीं है।
कोई नीला नहीं था गुबंद
जो थी बस एक ख़ला थी।
ये आई कहां से बारिश,
और गुज़रा है जो बरसकर
अब्र था कि मन हमारा,
हमको भी ख़बर नहीं है।
इस आतिश-फिशां को हमने
सालों से छुपा रखा था
और इस्मत ही अपनी हमने
मेहंदी-सा सजा रखा था।
जो उतरेगा एक रंग तो
क्या आतिश का रंग चढ़ेगा
हमको भी ख़बर नहीं है।
जो पिघला कहीं अगर तो
बह पाओगे तुम कहां तक
कि बंद है उस जगह पर
इक सोता है कि समंदर
हमको भी ख़बर नहीं है।
कोई नीला नहीं था गुबंद
जो थी बस एक ख़ला थी।
ये आई कहां से बारिश,
और गुज़रा है जो बरसकर
अब्र था कि मन हमारा,
हमको भी ख़बर नहीं है।
इस आतिश-फिशां को हमने
सालों से छुपा रखा था
और इस्मत ही अपनी हमने
मेहंदी-सा सजा रखा था।
जो उतरेगा एक रंग तो
क्या आतिश का रंग चढ़ेगा
हमको भी ख़बर नहीं है।
रविवार, 24 जुलाई 2011
घर किसको कहते हैं
घर
क्या होता है
घर
किसको कहते हैं
ईंट, गारे, पत्थर,
छत और दीवारें
या ज़मीन भरोसे की,
छत ख़्वाबों का?
घर
रिश्तों की बुनियाद
पर खड़ी एक इमारत
जिसकी दीवारों पर
बच्चों के सपने,
उनकी शरारतें,
खिलखिलाहटें चिपकाईं हैं।
बाबा की खांसी,
दादी की घंटी का स्वर,
नानी की साधना,
नाना के योग के
गूढ़ रहस्यों की
यादें सजाईं हैं।
घर
अपना हो कि ना हो
रोज़-रोज़ की उलझनें,
झगड़े,
प्यार-मोहब्बत,
भागमभाग तो अपनी हो।
घर
बड़ा हो कि ना हो
मेहमानों की कद्र,
आनेवालों का सम्मान
करनेवाला
एक दिल तो बड़ा हो।
घर,
मुझसे मेरा घर,
मेरी पहचान
मेरा वजूद
तो मत मांग लो।
दे ना सकूंगी
इतनी बड़ी कुर्बानी
घुमन्तू हूं
फिर भी घर
लौटकर आती हूं।
क्या होता है
घर
किसको कहते हैं
ईंट, गारे, पत्थर,
छत और दीवारें
या ज़मीन भरोसे की,
छत ख़्वाबों का?
घर
रिश्तों की बुनियाद
पर खड़ी एक इमारत
जिसकी दीवारों पर
बच्चों के सपने,
उनकी शरारतें,
खिलखिलाहटें चिपकाईं हैं।
बाबा की खांसी,
दादी की घंटी का स्वर,
नानी की साधना,
नाना के योग के
गूढ़ रहस्यों की
यादें सजाईं हैं।
घर
अपना हो कि ना हो
रोज़-रोज़ की उलझनें,
झगड़े,
प्यार-मोहब्बत,
भागमभाग तो अपनी हो।
घर
बड़ा हो कि ना हो
मेहमानों की कद्र,
आनेवालों का सम्मान
करनेवाला
एक दिल तो बड़ा हो।
घर,
मुझसे मेरा घर,
मेरी पहचान
मेरा वजूद
तो मत मांग लो।
दे ना सकूंगी
इतनी बड़ी कुर्बानी
घुमन्तू हूं
फिर भी घर
लौटकर आती हूं।
गुरुवार, 21 जुलाई 2011
क्या जी चाहता है
क्या कहें कि आज क्या-क्या जी चाहता है
थोड़ी-सी धूप और थोड़ी छांव भी चाहता है।
शहर का कोलाहल भी, बदहवास भीड़ भीबौराए आम के पेड़ों वाला गांव भी चाहता है।
कुछ बंधन ऐसे हों जो दिलों को बांध लें
मुक्त होकर थिरकते दो पांव भी चाहता है।
साहिल मिल जाए, ऐसी खुशनसीबी हो
लहरों से उलझती एक नाव भी चाहता है।
पूरे होते सपनों को गिनती रही उंगलियां
कभी खाली जेबों-सा अभाव भी चाहता है।
मिश्री हो गीतों में, शहद-सी हो बोलियां
कभी कान उमेठने वाला बर्ताव भी चाहता है।
खाली पन्नों-सा उलटो मुझे, कभी पढ़ा करो
कभी थोड़ी बेरूखी, थोड़ा भाव भी चाहता है।
मंगलवार, 10 मई 2011
लिखना... मेरा लिखना
क़तरा-क़तरा,
लम्हा-लम्हा,
जो बिखरा है
इधर-उधर
उसे सहेजना,
समेटकर रखना
मेरा ही तो काम है।
लफ़्जों में
जो फिसलते नहीं
ज़ुबां से कई बार
वो उतरे, बिखरे,
बरसे काग़ज़ पर
उस सावन की तरह
जिसका मक़सद
हरा कर देना है
मन को भी,
ख्वाबों की
बंजर ज़मीं को भी।
लम्हा-लम्हा,
जो बिखरा है
इधर-उधर
उसे सहेजना,
समेटकर रखना
मेरा ही तो काम है।
लफ़्जों में
जो फिसलते नहीं
ज़ुबां से कई बार
वो उतरे, बिखरे,
बरसे काग़ज़ पर
उस सावन की तरह
जिसका मक़सद
हरा कर देना है
मन को भी,
ख्वाबों की
बंजर ज़मीं को भी।
बुधवार, 2 मार्च 2011
बाबा, आपके लिए...
याद आता है
येज़डी पर सामने बिठाकर
"तोहफा" फिल्म देखने के लिए
पांच साल की पोती को
दूर सुजाता थिएटर ले जाना।
फिर "मौसम मौसम" की धुन
पोती के साथ आते हुए गुनगुनाना।
पंजाब स्वीट हाउस के
पन्तुए अब उतने मीठे नहीं लगते बाबा।
उनमें मिठास तो आपकी
ना खत्म होनेवाली कहानियां घोलती थीं।
हमने सीखा है बाबा
एक इतवार को दिलचस्प बनाना।
बाकी छह दिनों में
फैक्ट्री की असेम्बलिंग लाईन
और अपने काम को
शिद्दत से प्यार करना सिखाना
भी तो था आपका ही काम।
हमने देखा है बाबा,
ईंट-ईंट जोड़कर
कैसे बनता है घर,
और कैसे उस घर के दरवाज़े
खुले रहते हैं दिन-रात
अतिथियों के लिए।
कैसे गुलाबी पर्दों और दीवारों पर
टंग जाती हैं पूरे होते सपनों की निशानियां,
कैसे आसमान छूते हुए भी
पैरों तले की ठंडी ज़मीन
साथ नहीं छोड़ती।
हमने सिखा है बाबा
धर्म, जाति, उम्र से परे बनते हैं
दिल के रिश्ते,
परिवार छोटा-सा नहीं होता,
चाहो तो पूरी दुनिया समाती है उसमें।
देखा है काजू कतली के एक टुकड़े से
पूरे मोहल्ले का मुंह मीठा होते हुए।
हमने देखी है दरियादिली,
सीखा है पैसे को हाथ का मैल
क्यों कहते हैं दोस्तों।
याद है मुझको अब भी
अपनी हथेली में कैसे जकड़ा था
आपने मेरा हाथ,
जाते-जाते अपना भरोसा थमाया था मुझको
हमने सिखा है बाबा,
गुज़र जाना किसको कहते हैं,
और बार-बार हरकतों में,
सपनों, हकीकतों में से
कौन गुज़रा करता है नौ सालों से।
हमने सीखा है बाबा
आंसुओं की नहीं,
कर्म की श्रद्धांजलि अर्पित करना,
हमने सीखा है
स्टीयरिंग व्हील पर अपने हाथों में
आपके खुरदुरे हाथों की
लकीरें ढूंढना।
हमने सीखा है
सपनों में आपको बुलाकर
चौराहे में से अपनी राह पूछ लेना।
हमने सीखा है प्यार करना,
चलती सांस से,
अपने आस-पास से।
हमने सीख लिया है बाबा
खुद में आपको ढूंढ लेना
हमने सीख लिया है बाबा
आपको अपने साथ रख लेना।
(बाबा को हमने 1 मार्च 2002 से देखा नहीं, छुआ नहीं, उनकी आवाज़ नहीं सुनी। बस इतना ही मलाल है। वरना बाबा को तो हमने हर पल जिया है नौ सालों में।)
येज़डी पर सामने बिठाकर
"तोहफा" फिल्म देखने के लिए
पांच साल की पोती को
दूर सुजाता थिएटर ले जाना।
फिर "मौसम मौसम" की धुन
पोती के साथ आते हुए गुनगुनाना।
पंजाब स्वीट हाउस के
पन्तुए अब उतने मीठे नहीं लगते बाबा।
उनमें मिठास तो आपकी
ना खत्म होनेवाली कहानियां घोलती थीं।
हमने सीखा है बाबा
एक इतवार को दिलचस्प बनाना।
बाकी छह दिनों में
फैक्ट्री की असेम्बलिंग लाईन
और अपने काम को
शिद्दत से प्यार करना सिखाना
भी तो था आपका ही काम।
हमने देखा है बाबा,
ईंट-ईंट जोड़कर
कैसे बनता है घर,
और कैसे उस घर के दरवाज़े
खुले रहते हैं दिन-रात
अतिथियों के लिए।
कैसे गुलाबी पर्दों और दीवारों पर
टंग जाती हैं पूरे होते सपनों की निशानियां,
कैसे आसमान छूते हुए भी
पैरों तले की ठंडी ज़मीन
साथ नहीं छोड़ती।
हमने सिखा है बाबा
धर्म, जाति, उम्र से परे बनते हैं
दिल के रिश्ते,
परिवार छोटा-सा नहीं होता,
चाहो तो पूरी दुनिया समाती है उसमें।
देखा है काजू कतली के एक टुकड़े से
पूरे मोहल्ले का मुंह मीठा होते हुए।
हमने देखी है दरियादिली,
सीखा है पैसे को हाथ का मैल
क्यों कहते हैं दोस्तों।
याद है मुझको अब भी
अपनी हथेली में कैसे जकड़ा था
आपने मेरा हाथ,
जाते-जाते अपना भरोसा थमाया था मुझको
हमने सिखा है बाबा,
गुज़र जाना किसको कहते हैं,
और बार-बार हरकतों में,
सपनों, हकीकतों में से
कौन गुज़रा करता है नौ सालों से।
हमने सीखा है बाबा
आंसुओं की नहीं,
कर्म की श्रद्धांजलि अर्पित करना,
हमने सीखा है
स्टीयरिंग व्हील पर अपने हाथों में
आपके खुरदुरे हाथों की
लकीरें ढूंढना।
हमने सीखा है
सपनों में आपको बुलाकर
चौराहे में से अपनी राह पूछ लेना।
हमने सीखा है प्यार करना,
चलती सांस से,
अपने आस-पास से।
हमने सीख लिया है बाबा
खुद में आपको ढूंढ लेना
हमने सीख लिया है बाबा
आपको अपने साथ रख लेना।
(बाबा को हमने 1 मार्च 2002 से देखा नहीं, छुआ नहीं, उनकी आवाज़ नहीं सुनी। बस इतना ही मलाल है। वरना बाबा को तो हमने हर पल जिया है नौ सालों में।)
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