Thursday, December 29, 2011

ओह! कलकत्ता

तब ट्रेनों में शायद एसी के डिब्बे नहीं होते थे। या होते भी होंगे, मुझे याद नहीं। एक फर्स्ट क्लास डिब्बा ज़रूर होता था रांची से हमें कलकत्ता लेकर आनेवाली हटिया-हावड़ा मेँ। कुछ टुकड़े-टुकड़ों में पहली बार कलकत्ता आने की जो याद बाकी रह गई है उसमें वही डिब्बा है और जाने क्यों लगता है कि उस डिब्बे की खिड़कियों में रॉड नहीं लगे थे। नज़रों और नज़ारों के बीच कोई रुकावट नहीं थी, ऐसा ही कुछ याद है। मेरी उम्र तब पांच साल की रही होगी शायद, और मैं बाबा-दादी के साथ कलकत्ता जा रही थी, पहली बार। यादों के मॉन्टाज में जो स्लो-मोशन में बचे रह गए कुछ शॉट्स हैं उनमें हावड़ा ब्रिज और नीचे बहती हुगली है, विक्टोरिया मेमोरियल है और विशालकाय खंभों वाला ग्रैंड होटल का अहाता है, एक सफेद एम्बैसेडर कार है और ढेर सारी भीड़ है। हां, तिरहट्टी बाज़ार का चॉलनुमा घर भी है जहां एक कमरे में हमारा पूरा परिवार समा जाया करता था, और पब्लिक टॉयलेट्स के बाहर लगनेवाली कतारें भी याद हैं। ये भी याद आ रहा है कि हम जहां रहा करते थे उसकी छत पर मिश्र बाबा का परिवार रहता था और रहते थे ढेर सारे कबूतर। मैंने पहली बार सिगरेटनुमा टॉफी भी वहीं देखी थी।

हम 1988 में कलकत्ता गए थे दूसरी बार। तब चॉल से फ्लैट में शिफ्ट कर चुके थे, लेकिन कलकत्ता वैसा ही था - उतना ही ठहरा हुआ, उतनी ही भीड़-भाड़ वाला, उतनी ही गंदगी और उतनी ही पीली टैक्सियां। तबतक केसी दास के रॉशोगुल्ले और अलीपुर चिड़ियाघर के साथ बिरला प्लैनिटोरियम की यादों को करीने से सजाकर रखा जा सके, इतनी अक्ल आने लगी थी। उस साल लूची-पायॉश-दम आलू-बेगुन भाजा था और फुचका खाते हुए दुर्गा पूजा के पंडालों की सैर थी। था ढेर सारा पैर दर्द और मलेरिया में तपता बेहोश होता माथा।

फिर मैं जितनी बार कलकत्ता गई, हर बार एक नए तरह का अनुभव लेकर आई। हर बार के दिलचस्प वाकये, हर बार शहर के एक नए रूप को पहचान लेना। और तब, जब आपको अकेले घर की दहलीज़ से बाहर निकलने की आज़ादी भी ना हो। तब, जब बिना दुपट्टे के आप कमरे से बाहर निकलें तो गज़ब हो जाए और तब, जब आप अपनी उम्र के बग़ावती मोड़ पर हों। तमाम पहरों और नफ़रतों, कॉलेज स्ट्रीट से आते सब्जी बाज़ार की तीखी गंध और एक बारिश में ही जमा होनेवाले घुटने भर गटर के पानी के बावजूद कलकत्ता से इश्क कायम रहा। पार्क स्ट्रीट पर अकेले घूमने और फ्लूरिज़ में बैठकर चॉकलेट ट्रूफल खाने की ख्वाहिश ने दम नहीं तोड़ा, मैं कभी फेलूदा और प्रोफेसर शॉन्कु, कभी ताराशंकर बंद्योपाध्याय तो कभी डॉमिनिक लैपियर की नज़रों से कलकत्ते को देखती रही, जीती रही, महसूस करती रही। कलकत्ता अब भी दूर था, अनजान, अबूझ, अपरिचित - मेरा 'सेकेन्ड होम' और 'चाइल्डहुड क्रश' होते हुए भी।

मैं फिर कलकत्ता आई, ज़िन्दगी का अहम फ़ैसला लेने। जिससे शादी करनी थी उसके लिए अपने भाईयों की सहमति जुटाने। कलकत्ता ने इस बार भी निराश नहीं किया। मनीष और मैं ठीक चार महीने बाद मियां-बीवी बनकर कलकत्ता लौटे।

जिस शहर से इतना गहरा कार्मिक कनेक्शन हो, वो आपको बार-बार बुलाया करता है। तय नहीं कर पाती कि मैं पिछले जन्म में क्या थी - कलकत्ते में पान और चाय खाते हुए, ऊंघती दोपहरों को किताब लिखने का ख्वाब बचाए रखनेवाली बंगाली या मायानगरी में एक दिन अपने पसंद की फिल्म बना डालने की उम्मीद के साथ आखिरी सांस ले लेनेवाली कोई असिस्टेंट डायरेक्टर, क्योंकि दोनों शहरों से इस जन्म में भी मुझे बेइंतहा नफ़रत और मोहब्बत है और ये दोनों ख्वाब अभी भी आधी रातों को डराने आ जाया करते हैं।

कलकत्ता से इश्क पर नया रंग चढ़े, उसकी एक और वजह मिल गई। आद्या-आदित 'Calcutta babies' हैं। कार्मिक कनेक्शन ही होगा क्योंकि वहां ना मेरा मायका है, ना ससुराल ना हम किसी काम के सिलसिले में कलकत्ते में रह रहे थे। फिर मुझे अपनी गायनोकॉलोजिस्ट से भी ऐसा प्यार हुआ कि किसी और पर भरोसा करने की बजाए मैंने बचपन की मोहब्बत कलकत्ता नगरिया पर यकीन करना ज्यादा सही समझा।

ये कार्मिक कनेक्शन फिर कलकत्ता ले गया कल। चेक-इन काउंटर पर ही आप कोलकाता जा रहे अपने सहयात्रियों को ठीक-ठीक पहचान सकते हैं। बंगाली अलग से पहचान में आ जाएंगे, कोलकाता के मारवाड़ियों की पहचान अलग होगी और मेरे जैसे नॉन-रेज़िडेन्ट्स को पहचानना तो बिल्कुल मुश्किल नहीं। दिल्ली की सर्दी में भी नारंगी रंग की जैकेट के नीचे से एक बाटिक प्रिंट का कुर्ता दिखता नहीं कि मेरा दिमाग शोर मचाने लगता है - You can take a Bengali out of Calcutta, but you can't take Calcutta out of a Bengali.

ऐसा पहली बार है कि मैंने कलकत्ता में अपने रिश्तेदारों में से किसी को नहीं बताया कि यहां लैंड कर रही हूं। ये ना माफ़ किया जानेवाला गुनाह हो सकता है जिसका ख़ामियाज़ा तानों के रूप में मुझे महीनों तक भुगतना पड़ेगा। वक्त 24 घंटे का ही है और कई सारे काम खत्म करने हैं। हम अपने करियर के नए मोड़ पर हैं, यहां से सफ़र कहीं भी ले जा सकता है - गंगा की तरह तफ्सील से मुहाना खोजते हुए सुन्दरवन में गुम हो सकता है या फिर पहाड़ी नदी की तरह अठखेलियां खाते, पत्थर-पहाड़ों से जूझते नए रास्ते बना सकता है। जो भी होगा, अच्छा ही होगा। मेरा काम अपनी ज़िम्मेदारियां निभाना है और उसमें कोताही ना हो।

इस बार कलकत्ते को कैमरे के पीछे से देखा है, फ्रेम और कॉम्पोज़िशन की भाषा में, 60 और 120 की स्पीड से, टाईम लैप्स ढूंढते हुए, मॉन्टाज प्लान करते हुए, बादलों से लुका-छुपी खेलते सूरज से मिन्नतें करते हुए, लाइट पकड़ते हुए... इस बार कलकत्ता हुगली की लहरों पर तैरती नाव है और मैं झुककर पानी पर नाचती किरणों को छू लेना चाहती हूं। इस बार कलकत्ता कई ख्वाबों की ताबीर है। इस बार कलकत्ता वो फोटो एक्जीबिशन है जिसमें मैं सालों से शरीक होने की ख्वाहिश ही रखती रही। इस बार कलकत्ता मेरी नज़रों से ली हुई तस्वीरों का स्लाइड शो है।

ओह कलकत्ता, इस बार मैं तुमसे कह ही देना चाहती हूं - ओ आमार शोनार कोलकाता, आमि तोमा के भीषोण भालो बाशी!

5 comments:

देवेन्द्र पाण्डेय said...

संस्मरण के बहाने सुंदर आलेख ।
मैं तो केवल एक बार ही गया हूँ..वह भी तब जब मैं सात या आठ में पढ़ता था। आपकी पोस्ट ने बहुत सी यादें ताजा कर दीं क्योंकि शुरूआत में आपके लिखने का अंदाज ऐसा है जैसा मैने देखा था मतलब वैसा ही जितना मेरे जेहन में है.।

Rahul Singh said...

कलकत्‍ता, चौरंगी वाले शंकर की नजर से देख कर योग-वियोग का हिसाब लगाया जा सकता है. हमें फ्लरीज के बजाय फिरपोज के दिन अधिक याद हैं.

Arvind Mishra said...

संस्मरणों में हमेशा कुछ ऐसा होता है जो गृह विरही सा भाव संचारित करता है भले ही कहीं किसी का कोई स्थाई ठीहा हो या नहीं ....
यहाँ केवल यह कहना है कि ज़िंदगी में उत्तरोत्तर कहीं भी जाने पर बिना ज्यादा लोगों को बताये काम धाम कर लौटने की ही भावना प्रबल होती जाती है ...मैं भी इसे अब शिद्दत के साथ महसूस करता और क्रियान्वित करता हूँ!:(

प्रवीण पाण्डेय said...

कलकत्ता तो जीवन के गहरे रहस्य छिपाये है, अपने अन्दर।

Sudeep Prakash said...

nice view to see a city as wel as description...