गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019

बोलो इतने दिन क्या किया?


मुझसे ठीक दस फ़ुट की दूसरी पर डाइनिंग टेबल है। टेबल पर बेतरतीबी से बिखरी हुई कई चीज़ों में मेरा एक वॉलेट भी शामिल है, जिसके हालात उसकी मुफ़लिसी का बयां करने के लिए बहुत है। लेकिन मेरा आज का ये दुखड़ा उस पर्स के नाम नहीं है। मेरा आज का ये दुखड़ा मेज़ के ठीक बीच-ओ-बीच बड़े प्यार से रखे गए स्टील के एक डिब्बे का है, जिसमें नारियल के कुछ लड्डू पड़े हैं। अब सवाल ये है कि नारियल के लड्डुओं का रोना कोई कैसे रो सकता है। लेकिन मैं इस पन्ने पर उन्हीं लड्डुओं का रोना रोने वाली हूँ। हमारी (वु)मैन फ्राइडे (एंड एवरीडे) अनीता ने उस एक डिब्बे में लड्डू क्या रख दिए, मेरे ख़ुद से किए हुए कई वादे उन्हीं लड्डुओं की तरह मेरे ही दाँतों तले चूर-चूर होकर मेरे ही हलक से उतरकर मेरे ही डाइजेस्टिव सिस्टम का अभिन्न हिस्सा बनते जा रहे हैं। 

ख़ुद से किए हुए असंख्य वादों में से एक चीनी न खाने का वायदा था। और एक वायदा था पर्सनल राइटिंग न करने का। 

दोनों वायदों के पीछे की कहानी मुझे ठीक-ठीक ध्यान नहीं, कि ये समझते समझते समझ में आया होगा शायद कि अत्यधिक चीनी की तरह ही अत्यधिक पर्सनल होकर यहाँ इस ब्लॉग पर सबकुछ उगल देना मेरी बढ़ती उम्र और गिरती सेहत दोनों के हित में नहीं। मुझे विरासत में डायबिटिज़ मिली, और इस ब्लॉग के माध्यम से इंटरनेट और बाद में लेखन की दुनिया में मिली शोहरत अपनी कमाई हुई थी। दोनों मेरी ज़िन्दगी में बहुत धीरे-धीरे साल २०१४ से आने लगे थे। २०१४ में मेरी पहली किताब छपी, २०१५ में दूसरी। २०१६ तक आते-आते मेरी ज़िन्दगी मेरे नियंत्रण से बाहर जा चुकी थी। ब्लड शुगर के साथ-साथ बीपी का गहरा रिश्ता है, और दोनों का उससे भी गहरा रिश्ता तनाव से है। और तनाव का सबसे गहरा रिश्ता ‘डिनायल’ से है। आप चाहें तो अपनी पिछली पीढ़ी की तरह अपनी पूरी ज़िन्दगी इस तरदीद में निकाल सकते हैं कि आपको किसी किस्म की तकलीफ़ है, और आपकी ये कमबख़्त तकलीफ़ आपकी अपनी ही बोई और उगाई हुई है। 

मैं भी इसी तरदीद में हूँ पिछले दो-चार सालों से। ये ज़िन्दगी मेरी अपनी चुनी हुई है। यहाँ के दोस्त-दुश्मन, रिश्ते-नाते, भाई-बंधु सब अपने बनाए हुए हैं। यहाँ तक कि अपनी चुनी हुई तन्हाईयाँ भी हैं। ये सच है कि जितनी ही तेज़ी से मैं लिखती जा रही थी, फैलती जा रही थी, उतनी ही तेज़ी से ख़ुद को दुनिया से काटती भी जा रही थी। ये भी मेरा अपना फ़ैसला था। 

और मैं अकेली इस तरदीद में नहीं हूँ। यहाँ वहाँ लिखते-फैलते-बिखरते हुए एक मैं ही तन्हां नहीं हुई हूँ। इंटरनेट के सर्च इंजन ने हमें हर वर्चुअल स्पेस में जगह दे दी है, हमारी एक नहीं, कई-कई प्रोफ़ाइल्स हैं। एक नहीं कई ज़रिए हैं कि एक-दूसरे की ख़बर ली जा सके। और फिर भी हम तन्हां हैं। जितना ज़्यादा लिखती जा रही हूँ, उतना ही ज़्यादा बोलने-बात करने के लिए कुछ नहीं रह गया। जितने अलग-अलग माध्यमों और डेडलाइन्स और किताबों और स्क्रिप्टों और प्रोजेक्टों में ख़ुद को बाँट दिया है, उतनी ही कम कहानियाँ हैं अब मेरे पास। जितने ही ज़्यादा लोग मुझे पहचानने लगे हैं, उतने ही कम दोस्त हो गए हैं। जितना ही ज़्यादा शुगर पर कंट्रोल करने की कोशिश की है, उतना ही ज़्यादा कमज़ोर महसूस किया है ख़ुद को। 

तो इसलिए दोस्त, ये न पूछना कि इतने दिनों कहाँ रही और क्या किया। सारे नारियल के लड्डू खा जाने की ख़्वाहिश संभालने के अलावा कैरियर में आगे बढ़ने की कोशिश कर रही हूँ। बच्चों को दूर पहाड़ पर भेजकर एक नए शहर में अपना घर बनाने की कोशिश कर रही हूँ। कई कई अनदेखे मेसेज का जवाब देने के बीच आधी-अधूरी कहानियाँ पूरी करने की कोशिश कर रही हूँ। सो, बीआरबी!




x

शनिवार, 2 फ़रवरी 2019

फ़ेसबुक से अफ़ेयर और ब्रेकअप की एक दास्तान


2008 में किसी एक ऊबी हुई-सी दोपहर को मैंने ‘फ़ेसबुक’ गूगल किया, उनके वेबसाईट पर गई, एक अकाउंट क्रिएट किया और वहीं एक पोस्ट छोड़ दी: "आई एम हियर टू” - मैं भी यहीं हूँ.  देखते ही देखते पहले आठ फ्रेंड रिक्वेस्ट आए, और फिर बीस-पच्चीस, अठतीस, अठहत्तर, एक सौ बारह...

ये सारे अपने लोग थे - बिछड़े हुए कुछ दोस्त, अपने ही ममेरे-फूफेरे-चचेरे भाई-बहन, पुराने दफ़्तर के कुछ सहयोगी, और कुछ अड़ोसन-पड़ोसन, जिनसे मैं पार्क में अपने बच्चों को घुमाते हुए मिला करती थी. औरों की बनिस्पत मैं फ़ेसबुक पर देर से आई थी. फ़ेसबुक तो 2004 में ही लॉन्च हो गया था, और कुछ ही हफ़्तों के भीतर भारत की वाई2के पीढ़ी के बीच ख़ूब लोकप्रिय भी हो गया था. दफ़्तर में सिस्टम के खुलते ही फ़ेसबुक खुल जाया करता, और उसके साथ ही पोकिंग और एक-दूसरे के पन्नों पर कमेन्टिंग का सिलसिला शुरू हो जाता. 
मेरे पास फ़ेसबुक पर शेयर करने के लिए कुछ नहीं था, सिवाय उन तन्हां लम्हों के, जब आप अपनी अदद-सी नौकरी को छोड़कर घर में बैठे हुए अपने बच्चों के बड़े होने के इंतज़ार में महसूस किया करते हैं. तस्वीरें भी बच्चों की ही थीं, कहानियाँ भी बच्चों की ही थी. तब वे दो साल के थे और मेरे पास उनकी शरारतों के हजार क़िस्से, और उतनी ही तस्वीरें थीं.

और मैं अकेली नहीं थी. धीरे-धीरे फ़ेसबुक के ज़रिये मैं उन माँओं के बारे में जानने और पढ़ने लगी जिन्होंने बच्चों की परवरिश के लिए अपना कैरियर छोड़ा था. कोई केक बेक कर रही थी, तो किसी ने फ़ोटोग्राफ़ी के शौक़ को संजीदगी से लेना शुरू कर दिया था. मेरे जैसे कई माँएँ ऐसी भी थीं जिनके पास शब्दों के अलावा कुछ और नहीं था, इसलिए फ़ेसबुक पर ही अपनी आड़ी-तिरछी कविताएँ, लेख, छोटी कहानियाँ और संस्मरण लिखकर अपने गुबार निकाल रही थीं. 

मेरे लिए फ़ेसबुक ने ऐसे ही लोगों के जुड़ने का रास्ता खोल दिया. वो दौर ब्लॉगिंग का भी था, तो जिसके ब्लॉग पढ़ा करते थे, फ़ेसबुक पर उनसे जुड़ते भी चले गए. फ़ेसबुक एक किस्म का इक्वलाइज़र था: सबको एक-से धरातल पर ले आनेवाला. जो दफ़्तर में बॉस हुआ करते थे, सीनियर हुआ करते थे, यहाँ तक कि हमारी नज़रों में सेलीब्रिटी हुई करते थे, फ़ेसबुक ने उनकी दुनिया हमारे सामने उघेड़ कर रख थी. हम हैरान थे कि हम सबके डर और हमारी तकलीफ़ें, हमारी असुरक्षा और थोड़ी-सी वाहवाही पाने की हमारी चाहत कितनी तो एक-सी है.

फ़ेसबुक ने सोशल हायरेकी पूरी तरह से मिटा दिया. सिक्स डिग्री ऑफ़ सेपरेशन (यानी, सभी जीवित इंसानों का महज छह स्टेप की दूरी में ‘फ्रेंड’ का ‘फ्रेंड’ होना) हंगेरियन बुद्धिजीवी फ्रिग्ये कारिंटी की एक कोरी कल्पना और सैद्धांतिक थ्योरी भर नहीं रही. दुनिया वाकई में सिमटने लगी थी और इसके लिए मुझे और आपको किसी कोलंबिया यूनिवर्सिटी या किसी एमआईटी के भारी-भरकम शोध को समझने की कतई ज़रूरत नहीं थी.

इसलिए क्योंकि एक मार्क ज़करबर्ग और उनकी टीम ने ये बात क्रैक कर ली थी कि वाकई दुनिया को इस बात का न सिर्फ़ यकीन दिलाया जा सकता है कि वे एक बिल क्लिंटन या एक जॉर्ज बुश या एक बराक ओबामा से न सिर्फ़ छह स्टेप्स की दूरी पर हैं, बल्कि ये बात सफलतापूर्वक साबित भी की जा सकती है. दो-चार बड़ी सेलीब्रिटीज़ के मेरी फ्रेंड लिस्ट में आते ही मुझे भी इस थ्योरी पर पक्का यकीन हो गया. 

फ़ेसबुक न सिर्फ़ अभिव्यक्ति का, या लोगों से जुड़ने का ज़रिया था, बल्कि मेरे जैसे लोगों के लिए तो अवसरों का ख़ज़ाना भी था. और ये ख़ज़ाना फ़ेसबुक पर ही इतना बड़ा था कि मुझे तो ट्विटर तक जाने की ज़रूरत भी नहीं हुई. मेरी पोस्ट पर न सिर्फ़ लोगों के कमेंट आने लगे बल्कि यहाँ-वहाँ लिखने के अवसर भी मिलने लगे.

फ़ेसबुक और ब्लॉग पर लिखते-लिखते तो मैं कहानियाँ भी लिखने लगी, और छपने भी लगी. बाकी अवसरों का तो क्या ही कहना! मुझे ये अच्छी तरह याद है कि मैं बहुत दिनों से अनुवाद के कुछ काम के लिए एक बड़ी पब्लिशर से संपर्क साधने की कोशिश कर रही थी. कई महीनों की मशक्कत के बाद जब आख़िरकार मिलने का मौक़ा मिला तो उन्होंने मुझसे कहा, “तुम्हारे बच्चे बहुत प्यारे हैं. फ़ेसबुक पर तस्वीरें देखी हैं मैंने. उन्हें मेरी ओर से बहुत प्यार देना.”

यानी, थैंक्स टू फ़ेसबुक, पर्सनल और प्रोफ़ेशनल - सब गड्डमड्ड हो गया था. बिज़नेस नेटवर्किंग की एक मीटिंग में मैंने एक मैनेजमेंट कन्सलटेंट को यहाँ तक कहते सुना कि आप सोशल मीडिया, ख़ासकर अपने फ़ेसबुक पर, क्या पोस्ट कर रहे हैं, उसका ख़्याल रखिए क्योंकि आप लगातार अपने पोटेन्शियल रेक्रूटर्स (या इन्वेस्टर्स या क्लायंट) की निगरानी में हैं.

आप निगरानी में हैं. यू आर अंडर सर्वेलेंस. जॉर्ज ऑरवेल ने अपनी किताब ‘1984’ जिस ‘बिग ब्रदर’ की परिकल्पना की थी उसकी आँखें और हम सबमें उग आयी थीं और उसके दिमाग़ का ख़ुराफ़ात हमारी ज़रूरत बन गया था. फ़ेसबुक, और फ़ेसबुक ही क्यों, सोशल मीडिया पर रहते-रहते हम सब स्टॉकर्स की एक ऐसी पीढ़ी में तब्दील होते जा रहे थे जिसके पास दूसरों के पेज पर जाकर पोक करने, एक-दूसरे के इन्बॉक्स में उलटे-सीधे मेसेज छोड़ने, अपनी-अपनी ढफली लिए अपने-अपने राग अलापने, और दुनिया की तमाम सारी चीज़ों की ओर उंगली उठाते हुए सारे ठीकरे दूसरों के माथे फोड़ने की दुर्व्यसन के हद तक की आदत बन चुकी थी. और इसका न सिर्फ़ फ़ेसबुक ने, बल्कि हम जैसे लोगों की तरह नकली कहानियाँ बेचनेवालों से लेकर असली सत्ताओं की कुर्सियाँ बेचने और खरीदनेवालों तक ने ख़ूब फ़ायदा उठाया. 

फ़ेसबुक की सीनियर मैनेजमेंट और फ़ाउंडिंग टीम के एक एक्स-एक्ज़ीक्यूटिव शॉन बेकर ने पिछले साल एक सार्वजनिक मंच से कहा, “सोशल वैलिडेशन का ये एक फ़ीडबैक लूप है... ठीक उसी तरह का लूप जो मेरे जैसा एक हैकर इसलिए बनाता है ताकि इंसानी मनोविज्ञान की कमज़ोरियों का ज़्यादा से ज़्यादा शोषण कर सके.” ये वही शॉन बेकर थे जिन्होंने 2004 में फ़ेसबुक शुरू होने के पाँच महीने बाद ही टीम ज्वाइन की और ज़करबर्ग ने जिनके लिए कहा कि “फ़ेसबुक को एक कॉलेज प्रोजेक्ट से एक रियल कंपनी बनाने में बेकर ने अहम भूमिका निभाई है”। ये वही बेकर थे जो फ़ेसबुक की बदौलत अरबपति बने थे, और इतने ही सफल हो गए ‘ग्लोबल पब्लिक हेल्थ’ के क्षेत्र में काम करने लगे (और इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि करोड़ों इंसानों के दिमाग़ पर काबिज़ होने के बाद अब दुनिया की सेहत बनाने में योगदान दे रहे हैं!) 

बहरहाल, फ़ेसबुक कंपनी के भीतर से निकली असहमतियों और विरोध, नाराज़गी और नाइत्तिफ़ाकी की ये इकलौती आवाज़ नहीं है. फ़ेसबुक के यूज़र ग्रोथ के पूर्व वाइस प्रेसिडेंट रहे चमथ पालिहापितिया ने कहा कि उन्हें इस बात का गहरा पछतावा (‘गिल्ट’) है कि उन्होंने ऐसे “औज़ारों पर काम किया जो समाज की सामाजिक संरचना को ही तहस-नहस कर रही है. और इसका रिश्ता सिर्फ़ उन रूसी विज्ञापनों से नहीं है. ये एक ग्लोबल समस्या है. यहाँ तो वही समाज की वही नींव खोखली हो रही है जहाँ लोग एक-दूसरे से पेश आते हैं”. एक नहीं बल्कि फ़ेसबुक में काम करनेवाले ऐसे कई टॉप एक्ज़ीक्यूटिवों के बयान सामने आए जिसमें उन्होंने कहा था कि उनके अपने घरों में फ़ेसबुक का इस्तेमाल करने पर पाबंदी है.

लेकिन ये भी सच था कि फ़ेसबुक की ही बदौलत मेरी पहली किताब ‘नीला स्कार्फ़’ की छपने से पहले ही तकरीबन दो हजार कॉपियाँ प्रीबुक हो गईं (और ये हिन्दी प्रकाशन की दुनिया में एक किस्म की अद्भुत घटना थी). ये फ़ेसबुक की ही बदौलत था कि मेरे पास लगातार अवसरों का ताँता लग रहा था - मैं अपने कैरियर के शिखर पर थी. फ़ेसबुक से मिली एक पहचान की बदौलत एक अख़बार से जुड़ने का मौक़ा मिला जिसके लिए रिपोर्टिंग करते हुए मुझे गोएनका और लाडली जैसे सम्मानित अवॉर्ड तक मिल गए. फ़ेसबुक की वजह से ही मेरे पास एक बड़ा पाठक वर्ग था, चाहनेवाले लोग थे, मेरी पहचान थी, मेरी वाहवाहियाँ थीं. फ़ेसबुक की वजह से ही मेरे पास मीडिया का एक बड़ा नेटवर्क भी था. दोस्त तो ख़ैर थे ही. फ़ेसबुक मेरे डेटाबैंक भी था. पिछले दस सालों की ज़िन्दगी का लेखा-जोखा था वहाँ. ब़कायदा तस्वीरों के साथ. 

तो फिर ऐसा क्या हुआ कि दिसंबर की एक सुबह मुझपर जैसे कोई फ़ितूर सवार हुआ और मैंने अपना फ़ेसबुक अकाउंट डिएक्टिवेट कर दिया? 

उसके पीछे दो मूल और दो गौण कारण थे: मैं रात-रात जगकर नोटिफ़िकेशन के इंतज़ार की बुरी आदत की वजह से ज़ाया होने लगी थी. कई सालों तक रात में अधपकी नींद में उठकर अपने पेज का ट्रैफ़िक देखना, अपने पोस्ट पर का ट्रैक्शन देखना, और उससे ख़ुद को लगातार ‘जज’ करने से मैं आजिज़ हो चुकी थी.

और दूसरा कारण ये था कि आस-पास का वर्चुअल शोर मेरे आत्मविश्वास की धज्जियाँ उड़ा रहा था. मैं तनाव में थी, डिप्रेस्ड थी, अकेली थी, परेशान थी, हारी हुई थी. लेकिन फ़ेसबुक पर मैं रोल मॉडल थी (अब तो और भी ज़्यादा क्योंकि मेरे मम्मी-पापा समेत मेरे मायके-ससुराल के रिश्तेदारों की पूरी फौज मुझे मैग्निफाइंग लेंस लगाकर फ़ेसबुक पर देख रही थी). मैं दो ज़िन्दगियाँ जीते-जीते थक गई थी. और दो गौण कारण ज़ाहिर है, वैसी न्यूज़ रिपोर्ट्स थीं जिनका मैंने ऊपर ज़िक्र किया है. फ़ेसबुक पर डेटा प्राइवेसी का उल्लंघन करने से लेकर रंगभेद और फ़ेक न्यूज़ और राजनीतिक प्रोपोगैंडा (ख़ासकर दक्षिणपंथी) को शह देने का आरोप लगता रहा है। 

इस जनवरी उस फ़ेसबुक के बिना मेरे एक साल और एक महीने पूरे हो जाएँगे, जिसकी लत में मैंने चूल्हे पर का खाना जलाया है, अपने बच्चों की पूरी बात नहीं सुनी, अपनी रातों की नींद ख़राब की है. और तो और, लाल बत्ती पर नोटिफ़िकेशन देखने के चक्कर में अपनी गाड़ी का करीब-करीब एक्सिडेंट भी करवा डाला है.

और इस साल में मेरे ज़िन्दगी क्या बदला है? मैंने इस बात का भी लेखा-जोखा किया और पता चला कि इस साल मैंने उतनी किताबें पढ़ीं जितनी पिछली दस सालों में मिलाकर नहीं पढ़ पाई. तकरीबन उतनी ही फ़िल्में देखने का मौक़ा (और वक्‍त) भी मिला. इस साल भी नए दोस्त बने, नए शहर मिले, नया देश मिला, नए तजुर्बों ने दिल और दिमाग में नई खिड़कियाँ खोलीं.

और कम से कम ये एक बात मैं दावे के साथ कह सकती हूँ: फ़ेसबुक के बिना की इस एक साल ज़िन्दगी ने मुझे ये हौसला दिया है कि मैं बिना इस डर के लिख (या जी) सकती हूँ कि मेरे लिखे या कहे या सोचे हुए पर दुनिया की प्रतिक्रिया क्या होगी (या इस post को कितने लाइक्स, शेयर या कमेंट मिलेंगे)!         
   

मंगलवार, 28 अगस्त 2018

चिंता का एक सबब सिक्किम में

सिक्किम के पहाड़ पर एक स्कूल है, और स्कूल में हैं कुल ढाई सौ बच्चे। इसी स्कूल में सातवीं क्लास में पढ़नेवाले दो बच्चे हमारे भी हैं। दिल्ली शहर की धूल-धक्कड़ और धुँए से दूर हिमालय की आगोश में अपने शहराती बच्चों को भेजने का फ़ैसला करना बहुत आसान नहीं था तो बहुत मुश्किल भी नहीं था। जिस रोज़ हम स्कूल में दाख़िले की बात करने गए थे, उस रोज़ हमने सुबह के सूरज को कंचनजंघा की चोटियों से होकर स्कूल के आंगन में गिरते हुए देखा था। और देखा था हिमालय के अलग-अलग पहाड़ों से आए हुए अलग-अलग देशों और राज्यों के बच्चों को सुबह की उसी धूप में नहाते हुए, खेलते हुए, कुलांचे भरते हुए। मैंने अपने पति से कहा था, “एक तो सिक्किम भूटान का पड़ोसी है, दूसरे इस स्कूल में भूटान के इतने सारे बच्चे हैं। और कुछ नहीं तो यहाँ का हैपीनेस इन्डेक्स देश के बाकी जगहों से तो ज़्यादा ही होगा। बच्चे शहर की मारा-मारी और बेमतल के तनाव से दूर रहेंगे।”

इसलिए स्कूल के वार्षिक समारोह के दौरान जब दो बच्चों ने एक ख़ास विषय पर अपनी राय पेश की तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए। और मेरी हैरानी का ठिकाना न रहा। सिक्किम जैसे ख़ुशहाल राज्य में बच्चे एक सार्वजनिक मंच से, वो भी अपने माँ-बाप और अभिभावकों के सामने ‘सुसाइड’ जैसे विषय पर क्यों बात कर रहे हैं भला? 

उस कार्यक्रम के कुछ ही दिन पहले - २ जुलाई को - बच्चों को गर्मी छुट्टियों के बाद गैंगटोक पहुँचाने के बाद वापस लौटते हुए रास्ते में एक मनहूस घड़ी की गवाह हुई थी मैं। पहाड़ों और उत्तर बंगाल के मैदानों को जोड़ने वाले ऐतिहासिक तीस्ता कॉरोनेशन ब्रिज से कूदकर सिलिगुड़ी की एक महिला ने ख़ुदकुशी कर ली। और तकलीफ़ की बात तो ये कि हादसा दिन दहाड़े हुआ था, जब दोनों ओर से गाड़ियों का आना-जाना लगा हुआ था। वो महिला तकरीबन साठ किलोमीटर दूर से सिलिगुड़ी शहर से अपनी स्कूटी पर आई, स्कूटी को पुल के पास लगाया और इससे पहले कि उसके चारों ओर भागती-दौड़ती दुनिया को कुछ समझ भी आता, वो औरत तीस्ता की गहराईयों में समा चुकी थी। 


अंधेरे यहाँ भी, वहाँ भी
उस घटना के दस दिन बाद मुंबई के जिस अंधेरी इलाके में मैं रहती हूँ, और जो इलाका फ़िल्म और टीवी के सफल चेहरों के साथ-साथ दशकों से संघर्षरत ख़्वाबमंद एक्टरों, डायरेक्टरों, राईटरों का घर माना जाता है, उसी अंधेरी के सात बंगला इलाके की एक इमारत से कूदकर 32 साल के एक युवा स्क्रिप्टराईटर ने अपनी जान दे दी। बिहार से मुंबई आए इस लड़के के माँ-बाप दो दिन पहले ही अपने बेटों के पास रुककर वापस घर लौटे थे। बॉलीवुड डांसर अभिजीत शिंदे की ख़ुदकुशी की ख़बर तो चौबीस घंटे पुरानी भी नहीं हुई।   

इसलिए गैंगटोक के एक सभागार में मंच पर खड़े होकर नवीं और दसवीं क्लास के दो बच्चों ने कुछ आंकड़े पेश किए तो दर्शकों में ज़रूर एक हलचल हुई। आपके लिए कुछ आंकड़े यहाँ पेश-ए-नज़र है: 
  1. दुनिया भर में आत्महत्या का दर प्रति एक लाख की आबादी पर चालीस है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन के मुताबिक हर चालीस सेकेंड पर दुनिया में कहीं न कहीं कोई न कोई अपनी जान दे चुका होता है।
  2. जिस भूटान को हम उसके कुल राष्ट्रीय आनंद यानी ग्रॉस नेशनल हैपीनेस के लिए जानते हैं, वो देश डब्ल्यू हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन के अध्ययन के मुताबिक आत्महत्या के मामले में दुनिया में 21वें स्थान पर है।
     
  3. भारत आत्महत्या के मामले में 12वें स्थान पर है, और आधे से ज़्यादा मामलों में कारण या तो पारिवारिक और अत्यंत घरेलू होते हैं या फिर मानसिक परेशानियों से उपजा हुआ अवसाद। (ये बात ग़ौरतलब इसलिए भी है क्योंकि बाक़ी के देशों में आत्महत्या के कारणों पर नज़र डालें तो इनमें विस्थापित, बेरोज़गार, युद्ध या युद्धजैसी परिस्थितियों, जातिगत हिंसा और संघर्षों की वजह से शोषित, पीड़ित, भूख से लड़ते और अपनी ज़मीन छोड़ने के मजबूर पनाहगीरों की संख्या अधिक है।)
  4. और जिस सिक्किम में बैठे हुए हम दुनिया भर की आत्महत्या दर के बारे में सुन रहे थे, उस सिक्किम में ख़ुदकुशी की दर भारत के राष्ट्रीय दर से तीन गुणा ज़्यादा है। यानी कि 2015 में अगर भारत का औसत प्रति एक लाख की आबादी पर 10.6 की आत्महत्या का दर रहा तो सिक्किम में प्रति एक लाख की आबादी पर 37.5 आत्महत्या के मामले दर्ज हुए।                  

प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से सिक्किम दिल्ली और चंडीगढ़ के बाद भारत का तीसरा सबसे अमीर राज्य है। इसी साल स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर बीस से ज़्यादा सालों से सिक्किम के मुख्यमंत्री पवन चामलिंग के दावा किया कि राज्य शत-प्रतिशत साक्षरता दर हासिल करने की राह में बड़ी तेज़ी से अग्रसर है। अभी नरेन्द्र मोदी का पहला बड़ा सपना - राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान देश भर में शुरू भी नहीं हुआ था, तभी 2008 में ही सिक्किम में खुले में शौच से मुक्त राज्य घोषित कर दिया गया था। 2016 में सिक्किम को शत-प्रतिशत ऑर्गैनिक राज्य घोषित कर दिया गया। और तो और, कामकाजी महिलाओं की स्थिति के लिहाज़ से सिक्किम देश का सबसे उत्तम राज्य माना जाता है। 

सिक्किम, एक घर वो भी 
मैं अक्सर ये बात कहती हूँ कि सिक्किम इकलौता ऐसा राज्य है जहाँ मुझे कभी भी एक लम्हे के लिए भी किसी बात का ख़ौफ़ नहीं हुआ - क्या पहनना है, क्या खाना है, कौन-सी सड़क पर किस तरह चलना है, और रात के कितने बजे चलना है। बिहार और उत्तर भारत में अपनी पूरी ज़िन्दगी गुज़ार देने के बाद सिक्किम जैसी किसी जगह पर होना, जहाँ निगाहें आपकी पीठ (या आपके सीने) से नहीं चिपकती, किसी भी लड़की या औरत के लिए सबसे महफ़ूज़ अहसास है। महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के मामले उस राज्य में न के बराबर सुनने को मिलते हैं। इसलिए, अपनी बेटी को सुरक्षा का यकीन और अपने बेटे को महिलाओं का सम्मान करने की सीख देने के लिए हमें सिक्किम से बेहतर कोई जगह नहीं मिली। 

लेकिन जब वहाँ रहने का मौक़ा मिला, तो स्थानीय आबादी के संघर्षों की नई-नई परतों को देखने-समझने के हालात भी बने। टैक्सी ड्राईवरों से बात करते हुए, गलियों के मुहानों पर छोटी-छोटी दुकानें चलानेवाली औरतों से मिलते हुए, होटलों और रेस्टुरेन्टों में काम करनेवाले लड़कों से बोलते-बतियाते हुए दबी-छुपी ज़ुबान में ड्रग्स, ख़ासतौर पर फ़ार्मास्युटिकल ड्रगों, की लत के बारे में सुनने को मिला। टैक्सी ड्राईवर अक्सर ये बात बड़े फ़ख्र से बताया करते हैं कि वे बिना ड्रग या शराब के गाड़ी चलाते हैं, और इस बात को अपने यूनिक सेलिंग प्वाइंट की तरह इस्तेमाल करते हैं। इसी से अंदाज़ा लगा लीजिए कि ड्रग की लत कितनी बुरी तरह से सिक्किम के युवाओं को खाए जा रही है। 


ड्रग की लत आत्महत्या का एक कारण तो है ही, वहाँ बेरोज़गारी भी बहुत बड़ी समस्या है। और नज़दीक से देखें तो ड्रग की लत भी ज़िन्दगी में लक्ष्यहीनता से ही उपजती है। सिक्किम जैसा राज्य पूरी तरह पर्यटन पर निर्भर है। साक्षरता दर बहुत ऊँचा है। दूर-दराज के गाँवों में भी पढ़ाई-लिखाई को लेकर जागरुकता है। शहरों के कॉफ़ी-शॉप में अक्सर किताब पढ़ते बच्चे आपको मिल जाएंगे। सुबह-शाम बच्चों के काफ़िलों के स्कूल ड्रेसों की रंगों से पहाड़ी के ऊंचे-नीचे रास्तों को रंगते रहते हैं। 

पढ़ाई तो है लेकिन नौकरियाँ नहीं हैं। रोज़गार के अवसर नहीं हैं। इसलिए एम्पलायमेंट एजेन्सियों का कारोबार उस राज्य में धड़ल्ले से चलता है। बड़े बड़े कमीशन लेकर ये एजेंसियाँ सिक्किम के पहाड़ी युवाओं को एक बेहतर भविष्य के सपने दिखाती हैं और उन्हें यूरोप के छोटे से किसी देश में मूंगफली के दानों जितनी सैलेरी पर, अमानवीय हालातों में काम करने के लिए भेज देती हैं। थोड़ी सी भूख मिटने का लालच, उसकी चाहत इतनी बड़ी होती है कि मूंगफली के दानों जैसी ये सैलेरी न छोड़ते बनती है न लेने का कुछ हासिल होता है। 

अगर सिक्किम के ये हालात आपको पंजाब की याद दिला रहे हैं तो इसमें कोई हैरानी नहीं। ये सच है कि ऊँची साक्षरता दर और समृद्धि वाले देश के इन दो अलग-अलग कोनों की कहानियाँ एक-सी सुनाई देंगी आपको। बस किरदारों के नाम और उनकी शक्लें बदल जाएँगी।

ऐसे में उन दो स्कूली बच्चों की चिंता जायज़ थी। और कुछ सुझाव भी उन्हीं बच्चों की तरफ़ से आए थे। 

अपने साथियों का आह्वान करते हुए उन दोनों ने मंच से कहा कि अपने माँ-बाप, अपने अभिभावकों से संवाद का ज़रिया बचाए रखें। ज़िन्दगी इन्साग्राम की सतरंगी तस्वीरें और बहुरंगी हैशटैग नहीं, बल्कि उनके पीछे की हक़ीकत है जिससे बचने की नहीं बल्कि आँखें मिलाने की ज़रूरत है। और पेरेन्ट्स से उन दो बच्चों ने गुज़ारिश की कि वे अपने बच्चों की ज़िन्दगी में दिलचस्पी लें। उन्हें यकीन दिलाएं कि सफलता से कहीं बड़ा ज़िन्दगी की इस रोज़मर्रा की लड़ाई में बने रहने का हौसला है। 

दुख की तासीर एक-सी
दरअसल, निजी कुछ भी नहीं होता। ख़ुदकुशी भी निजी दुख से उपजी हुई नियति कतई नहीं होती। हर ख़ुदकुशी एक समाज के रूप में हमारी हार की ओर इशारा करती है। जब कुदरत की आपदाओं और सरकार की उदासीनता से परेशान एक किसान कीटनाशक खाकर या अपने ही खेत के किसी पेड़ से लटककर अपनी जान देता है, तो वो सरकार की और प्रशासन की हार है। जब अपने सपनों से हारा हुआ एक नौजवान अपनी जान दे देता है, तो वो भी एक समाज की हार है, कि ये सफलताओं के कैसे उपभोक्तावादी मापदण्ड तय कर दिए हैं हमने? जब स्कूल से और अपने रिज़ल्ट से हारा हुआ एक किशोर अपनी जान देता है तो ये शिक्षा-प्रणाली की हार है। जब एक औरत नदी में कूद जाती है तो ये एक परिवार की हार है। 

वाकई, निजी कुछ भी नहीं होता, और एक निजी दुख भी अक्सर एक से ज़्यादा इंसानों की ज़िन्दगियाँ तबाह करने के लिए बहुत होता है। 

अवसरों से कहीं बड़े तो हमने सपने पैदा कर दिए हैं। काम-धंधा है नहीं और जहाँ नज़र दौड़ाइए, वहाँ अरमानों को हवा देते निर्लज्ज इश्तहारों का जमावड़ा है। क्या सिक्किम, क्या अंधेरी - जितनी बड़ी कमाई नहीं, उसके दस गुणा कर्ज़ हैं। तो फिर हल क्या है? 

उन दो बच्चों की बात ध्यान से सुनना, जो सार्वजनिक मंच पर खड़े होकर सुने जाने की गुहार लगा रहे थे। संवाद हल है। विवेक हल है। कंजूसियाँ हल हैं। अपनी चादर में पैबंद लगाकर भी उसमें अपने पैरों को मोड़े रखना, मगर चादर से बाहर पाँव न जाने देना हल है। हौसलों के इश्तहार, उनका खुलेआम प्रदर्शन हल है। अपने-अपने भीतर की खिड़कियों को खोलकर दूसरों के भीतर झाँकने की कोशिशें हल हैं। हम अगर अपने कंधों से अपने ही अरमानों का बोझ उतारकर उन्हें हौसलों की ज़मीन में जब तक दफ़न नहीं कर देंगे, तब तक मैं, आप, सिक्किम, पंजाब, अंधेरी और अहमदाबाद आत्महत्याओं के आंकड़े गिनते जाने से ज़्यादा कुछ कर भी नहीं पाएंगे।     

बारहवीं के नतीजे निकले थे, और मैं अपनी ही अपेक्षाओं के ख़िलाफ़ औंधे मुँह गिरी थी। सपना पढ़ने के लिए दिल्ली जाने का था। मुझे राँची की उस तंग सोच वाली ज़िन्दगी से निजात चाहिए था। लेकिन मेरे रास्ते अब बंद हो गए थे। रिज़ल्ट देखकर आने के बाद मैंने अपने आप को एक कमरे में बंद कर लिया। दुपट्टा गले में डालकर पंखे से लटकने की कोशिश की, लेकिन घुटती हुई साँसों ने इतनी तकलीफ़ दी कि उतरने पर मजबूर होना पड़ा। फिर शेविंग किट से ब्लेड निकालकर बहुत देर तक बैठी रही। लेकिन नस काटने का दर्द सोच से ही परे था। घर दो मंज़िला था, तो छत से कूदने का कोई फ़ायदा नहीं था। कांके डैम घर से दो-ढाई किलोमीटर दूर था। मरने के लिए कोई इतनी दूर क्यों जाता? इसलिए दादी को दी जानेवाली बीपी और नींद की सारी गोलियाँ एक बार में खा लीं। 

ऐसा नहीं था कि उस घर में मैं अकेली थी। मेरे मम्मी-पापा, चाचा-चाची, भाई-बहन और दादा-दादी समेत भरा-पूरा परिवार वहीं, उसी कमरे से बाहर था। लेकिन किसी ने ये नहीं सोचा होगा कि कमरा बंद किए मैं अपनी कहानी ख़त्म करने चली थी। घंटों कमरे से नहीं निकली तो पापा ने दरवाज़े को धक्का देकर कुंडी तोड़ी और मेरे पास आए। मैं बिस्तर पर औंधी पड़ी हुई थी शायद। लेकिन बस गहरी नींद में थी, क्योंकि पापा मुझे नींद से उठाने में कामयाब रहे थे। उस रोज़ पापा ने कुछ कहा नहीं था, बस ज़ोर से गले लगा लिया था। जिस पिता की गोद से उतरने के बाद उस रोज़ तक कभी छूने की या नज़दीक जाने की हिम्मत भी नहीं थी, उस पिता की ओर से आया हुआ इतना अनकहा हौसला ही बहुत था। 

काश इतना ही अनकहा हौसला हर उस डूबती हुई रूह को मिल जाए जिसके सामने सिर्फ़ निराशा के अंधेरे होते हैं। अपनी जान लेने का फ़ैसला, या अपनी ज़िन्दगी बर्बाद कर देने का फ़ैसला, ज़रूर निजी होता है। लेकिन किसी को बचा लेने की कोशिश हमेशा साझा होती है। उन दो बच्चों की साझा कोशिश ने सिक्किम की ऊँची आत्महत्या दर के बावजूद सिक्किम के समाज पर मेरा यक़ीन और पुख़्ता कर दिया था।    

रविवार, 2 अप्रैल 2017

कभी भूला, कभी याद किया

'बॉस बेबी' को रॉटेन टोमैटोज़ पर बमुश्किल पचास फ़ीसदी वोट्स मिले हैं। आईएमडीबी पर तो दस में छह। वैसे भी ब्रीफ़केस लिए नवजात की ज़ुबान से मैनेजमेंट ज्ञान हम कितना पचा पाएँगे?

गूगल पर 'बॉस बेबी' के ख़िलाफ़ हासिल की गई मेरी कोई दलील काम नहीं आती, और हम शाम का शो देखने को निकल पड़ते हैं। सच कहूँ तो ये रिश्वत है। मैं उन्हें उनकी मर्ज़ी से दो फ़िल्में दिखा दूँ तो बच्चे मुझे मेरी मर्ज़ी की दो फ़िल्में देखने के लिए जाने देंगे।

ऐसे ही ट्रांज़ैक्शन्स और बार्टर पर इन दिनों मेरी ज़िन्दगी टिकी हुई है। मैं डेढ़ घंटे का वक्त फ़िजियोथेरेपिस्ट को देती हूँ तो मुझे तीन घंटे की पेनलेस दिनचर्या मिल पाती है। दिन में पंद्रह-पंद्रह के सेट वाले चार आइसोमेट्रिक एक्सरसाइज़ करती हूँ तब जाकर रात में बिना तकलीफ़ करवट बदल पाती हूँ।

ख़ैर, इस बार भी बार्टर में सही सौदा नहीं मिला। 'बॉस बेबी' बहुत ख़राब फ़िल्म है। बच्चे मुख्य किरदार हैं, और बच्चों की सोच, हकीक़त और यहाँ तक कि उनकी कॉमेडी से कितनी दूर है इस फ़िल्म की कहानी! यकीन नहीं होता कि ये फ़िल्म उसी डायरेक्टर की फ़िल्म है जिसने 'मैडागास्कर' सीरीज़ की फ़िल्में बनाई, 'पुस इन द बूट्स' बनाई।

बाकी के सौदों की तरह इस सौदे की विफलता का दोष भी मैं अपनी उम्र पर मढ़ देती हूँ।

***

मैंने 'फिलौरी' नहीं देखी। मैं न 'सेल्समैन' देख पाई और न 'रंगून' देखने का मौक़ा मिला।

देखने को तो मैं कुछ भी नहीं देखा। कुछ भी नहीं पढ़ पाई। बहुत सारी फ़िल्में छूट गईं और बहुत सारी किताबें सिरहाने वैसे ही अनछुई पड़ी हैं।

फ़िल्म देखने के बाद मैं एक कॉफ़ी शॉप में ले आई हूँ बच्चों को। मैं एक खाली घर में वापस नहीं जाना चाहती। कहीं कुछ है जो होकर भी नहीं है।

अपने लिए मसाला चाय-टोस्ट और बच्चों के लिए हॉट चॉकलेट और कुकीज़ का ऑर्डर देने के बाद मैं वापस फ़ोन पर लग गई हूँ। बच्चों के पास कुछ और करने को नहीं, इसलिए दोनों मेन्यू कार्ड पढ़ने लगे हैं। हम तीनों आपस में कुछ नहीं बोल रहे।

इन दिनों लिखने-पढ़ने में मेरा मन नहीं लगता।मैं कहीं आना-जाना नहीं चाहती। मुझे याद नहीं आ रहा कि मैं आख़िरी बार सेक्टर अठारह के इस मार्केट में आख़िरी बार कब आई थी। इसलिए तो मुझे न बीच की सड़कों के वन-वे हो जाने की ख़बर थी न नए डाइवर्ज़न का पता था।

फ़ोन पर भी देखने को कुछ नहीं है। तीन ईमेल हैं, जिनके मैं मोनोसिलेबल्स में जवाब दे देती हूँ।

और कुछ करने को नहीं इसलिए मैं एक नाम गूगल करती हूँ। भानुमती के पिटारे की तरह इंटरनेट भी साँप, बिच्छू, कीड़े-मकोड़ों सी ज़हरीली बातें उगलने लगता है। मैं घबराकर फ़ोन बंद कर देती हूँ।

इंटरनेट के संस्कारों में सिर्फ़ सियापा और अधूरी, एकतरफ़ा जानकारियाँ ही है क्या? जिस इंटरनेट और सोशल मीडिया की बनाई हुई हूँ मैं, उसी से ऐसा वैराग्य क्यों? मैं 'सर्फ़र' से 'सफ़रर' कब बन गई?

मेरा ही नहीं, आदित का भी ध्यान कहीं और है। मेरे देखते-देखते, मेरे सामने उसके हाथ से चॉकलेट मिल्क का पूरा कप छलक उठता है और गर्म लिक्विड से उसकी टी-शर्ट और जींस सराबोर है। वो घबराकर मुझे देखता है।

मैं बिल्कुल रिएक्ट नहीं करती। कुछ नहीं बोलती। सिर्फ़ उसको देखती रहती हूँ।

आदित भी बिल्कुल रिएक्ट नहीं करता। हाथ में कप लिए मुझे देखता रह जाता है।

हमारे बगल वाली मेज़ से एक लड़का उछलकर आदित तक आ गया है। उसके हाथ में बहुत सारे पेपर नैपकिन्स हैं। अचानक हमारे आस-पास बहुत सारी हलचल है। हमारी टेबल वेट कर रहा लड़का पोंछा लिए लपक आता है। दो लड़के आदित के कपड़े पोंछते हुए उससे पूछ रहे हैं कि कहीं उसके हाथ-पैर जले तो नहीं?

अपने आस-पास की इतनी हलचल से शर्मिंदा मैं और आदित बाथरूम का रास्ता ढूँढते हैं।

आदित को दूध गिराने की आदत है। बचपन से। मैंने इसी ब्लॉग पर लिखा भी है उसके बारे में कभी।लेकिन उसे कुछ कहते नहीं बनता। मेरी बेख़्याली जितना मुझे नुकसान पहुँचाती है, उससे कहीं ज़्यादा तकलीफ़ बच्चों को होती है।

हम फिर भी फ़ोन के स्क्रीन से नज़रें नहीं हटा पाते।

***

मैं कई हफ़्तों के बाद आज ड्राईविंग सीट पर हूँ। बाहर का शहर संडे के कोलाहल में डूबा हुआ है। सामने मल्टीस्टोरीड पार्किंग के हर फ्लोर पर कंस्ट्रक्शन लाईट्स चमचमा रही हैं। ये शहर मेरे देखते-देखते बदल गया। जिस नोएडा को हम गाँव समझा करते थे, जिस अट्टा में पहली बार एक मल्टीप्लेक्स खुलने का जश्न हमने 'हैदराबाद ब्लूज़' जैसी एक फ़िल्म देखकर मनाया था, उस नोएडा की आब-ओ-हवा, ज़मीन-ओ-आसमान पर अब नाज़ेबा समृद्धि के प्रतीक-चिन्ह काबिज़ हैं।

हम बहुत देर तक सेक्टर अठारह से निकलने की कोशिश में ट्रैफ़िक में फँसे रह जाते हैं।

एफ़एम पर अनिरुद्ध एलएलबी का इंटरव्यू राहुल बोस का साथ चल रहा है, जो 'पूर्णा' की फिल्मिंग के बारे में बता रहे हैं। मेरा मन अफ़सोस से भर जाता है। काश मैंने 'बॉस बेबी' जैसी फ़िल्म के बदले 'पूर्णा' देखी होती। ड्रीमवर्क्स एनिमेशन को हम जैसे दर्शकों के हजार रुपए से बहुत फ़र्क नहीं पड़ेगा, एक इन्डिपेन्डेंट हिंदुस्तानी सिनेमा को ज़रूर पड़ेगा।

राहुल बोस बता रहे हैं कि कैसे सिक्किम में पंद्रह हजार फ़ुट की ऊँचाई पर शूटिंग के दौरान जब सड़कें भी बर्फ़ हो गई थीं तो जान की बाज़ी लगाकर क्रू ने फ़िल्म की शूटिंग की थी। मैं उसी वक़्त राहुल बोस को गले लगाना चाहती हूँ। जिन दिनों राहुल बोस ने अपनी पहली निर्देशित फ़िल्म (एवरीवन सेज़ आई एम फ़ाइन) रिलीज़ की थी उन दिनों मैं मुंबई में रह रही थी। मुझे याद है कि मैंने तकरीबन सोलह साल पहले वो फ़िल्म अंधेरी के फ़ेम ऐडलैब्स में जाकर देखी थी। राहेजा टावर के बगल में। फ़ेम ऐडलैब्स अब पीवीआर है शायद।

हम अभी भी जाम में फँसे हुए हैं। बच्चे पीछे की सीट पर खुसफुसाते हुए बात कर रहे हैं कि क्या मम्मा उन्हें ये फ़िल्म दिखाने ले जाएगी? मैं अपने जवाब से कोई दख़लअंदाज़ी नहीं करती। हम चींटियों की रफ़्तार से आगे बढ़ रहे हैं। अनिरुद्ध एलएलबी ने एक सॉन्ग ब्रेक ले लिया है।

ऊँचे नीचे रास्ते और मंज़िल तेरी दूर... गाना बजने लगता है और इस धीमी ट्रैफ़िक में भी मेरी याददाश्त सुपरसॉनिक स्पीड से कई साल पहले पहुँच जाती है।

***

मैंने दसवीं तक की पढ़ाई उर्सुलाइन कॉन्वेंट में की। एक हिंदी मीडियम स्कूल में, जो कहने को एक कॉन्वेंट था। दरअसल था तो कॉन्वेंट ही। मिशनरी स्कूल था हमारा, लेकिन गौतम बुद्ध के मध्यम मार्ग पर बख़ूबी चलते हुए सरकारी और मिशनरी - दोनों किस्म के वैल्यू सिस्टम को बड़े कारगर तरीके से ढोया करता था। इसलिए हम स्कूल में मेला (जिसे 'फ़ेट' कहते हैं) लगाकर अपने ऑडिटोरियम के लिए चंदा भी जमा किया करते थे और तीन सौ सताईस रुपए की सालाना स्कूल फ़ीस का मज़ा भी लिया करते थे। इसलिए हम थीं तो बिहार बोर्ड की लायक छात्राएँ, लेकिन मिसेज़ नाम्बियार और सिस्टर ग्लोरिया जैसी अंग्रेज़ी टीचर्स ने ब्रॉन्टे सिस्टर्स और जेन ऑस्टीन के लिए उतनी ही मुहब्बत पैदा की जितनी शिद्दत से चिड़ीमार सर ने (उनका असली नाम अब याद नहीं) सुभाषितानी के श्लोक रटवाए।

बहरहाल, उर्सुलाइन कॉन्वेंट की एक और मज़ेदार बात थी। हमें गाहे-बगाहे हमारे ऑडिटोरियम में पर्दा लगाकर उसपर हिंदी फ़िल्में दिखाई जाती थीं। 'रजनीगंधा', 'छोटी-सी बात', 'मुकद्दर का सिकंदर', 'नमक हराम', 'आनंद'... ये वो फ़िल्में हैं जो मुझे स्कूल में पर्दे पर देखना याद है। हमसे शायद दो या डेढ़ रुपए लिए जाते थे फ़िल्म दिखाने के, और अक्सर शनिवार को हाफ़ डे के स्कूल के बाद फ़िल्म दिखाया जाता था।

'खुद्दार' भी वो फ़िल्म है जो स्कूल में देखना याद है।

ऊँचे नीचे रास्ते 
और मंज़िल तेरी दूर 
राह में राही रुक न जाना 
होकर के मजबूर 

किशोर कुमार गा रहे हैं और अपने सेक्टर के मोड़ तक पहुँचने से पहले मैं स्कूल के ऑडिटोरियम में पहुँच चुकी हूँ।

एक और 'खुद्दार' वीसीआर पर देखना याद है। गोविंदा और करिश्मा कपूर वाली। सेक्सी सेक्सी सेक्सी मुझे लोग बोलें... इसी फ़िल्म का तो गाना था वो! 'सेक्सी' टर्म इन दिनों नौजवान फ़ेमिनिस्टों की बहस में एक नया आयाम जोड़ रहा है।

ये हमारी ज़िन्दगी 
एक लंबा सफर ही तो है 
चलते हैं जिसपे हम 
अनजानी डगर ही तो है 
देख संभलना, बचके निकलना 
जो नहीं चलते देख के आगे  
ठोकर से हैं चूर

हम कॉलोनी के गेट में घुस चुके हैं। मेरे मल्टीट्रैक दिमाग़ का एक ट्रैक शब्द-दर-शब्द साथ-साथ गुनगुना रहा है। मैं हैरान हूँ कि मुझे ये गाना अभी तक याद है।

फिर ये भी याद आया है कि मैं फ़िल्म देखने के बाद घर में बिना बताए अपनी एक सहेली रिंकू पटोदिया के घर चली गई थी। रिंकू डिप्टी पाड़ा में रहती थी। उसकी माँ लॉयर थी, और वो पहली ऐसी लड़की थी जिसकी माँ के बारे में मैंने सुना था कि वे काम पर जाया करती हैं। मुझे ये भी याद आया कि रिंकू पटोदिया ने छठी क्लास में अपना नाम बदलकर नेहा पटोदिया कर लिया था। मैं रिंकू की अच्छी दोस्त बन गई थी, लेकिन नेहा की दोस्त कभी नहीं बन पाई। पता नहीं क्यों।

यानी 'खुद्दार' मैंने छठी क्लास से पहले देखी होगी।

अब तो मेरे बच्चे छठी क्लास में हैं।

हमने गाड़ी पार्क कर दी है, और मैं फिर भी बैठकर पूरा गाना ख़त्म होने का इंतज़ार कर रही हूँ। या शायद इस बात का इंतज़ार कर रही हूँ कि राहुल बोस किस हीरोइन पर बायोपिक बनाना चाहते हैं, जिसके बारे में अनिरुद्ध ने सॉन्ग ब्रेक में जाने से पहले टीज़ किया था।

बच्चे गाड़ी से उतर चुके हैं, इसलिए मुझे भी मजबूरी में इंजन ऑफ़ करना पड़ता है। मुझे मालूम नहीं चल पाया कि राहुल किसी हीरोइन की कहानी पर अगली फ़िल्म बनाने जा रहे हैं।

मैं सीढ़ियाँ चढ़ रही हूँ। बच्चे गीत गुनगुना रहे हैं। ऊँचे नीचे रास्ते और मंज़िल तेरी दूर...

ये हीरोइनप्रधान फ़िल्मों का दौर है। ये 'अनारकली', 'पूर्णा', 'शबाना', 'फिलौरी', 'नूर', 'मातृ', 'मॉम', 'बेग़म जान' का दौर है।

मैं घर का ताला खोलते हुए सोच रही हूँ कि मेरे दोस्त अरिंदम सिल की नई फ़िल्म भी तो 'दुर्गा सहाय' है, और मैंने भी बनाया तो क्या - 'द गुड गर्ल शो'!

'बॉस बेबी' देखकर वक़्त बर्बाद करने का अफ़सोस थोड़ा और बढ़ गया है।

फिर याद आता है कि कभी कुछ ज़ाया नहीं होता। जब मेरे लिए अमिताभ बच्चन की 'ख़ुद्दार' देखना ज़ाया नहीं हुआ तो आज की शाम भी क्यों ज़ाया मान ली जाए?

मुझे मालूम है कि 'खुद्दार' का गीत मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखा और म्यूज़िक आर डी बर्मन ने दिया।मुझे ये भी याद है कि अमिताभ बच्चन वाली 'खुद्दार' कादर ख़ान ने लिखी और गोविंदा वाली इक़बाल दुर्रानी ने। मुझे ये भी याद है कि अमिताभ बच्चन वाली 'खुद्दार' में एक और गाना था - अंग्रेज़ी में कहते हैं कि आई लव यू... और मुझे ये भी याद है कि गोविंदा वाली 'खुद्दार' का मशहूर गाना तुमसा कोई प्यारा कोई मासूम नहीं है था।

सिनेमा कैसे-कैसे हमसे रिश्ता बनाता है न? यही अजीब-सा रिश्ता फ़िल्मकारों के लिए पहला और आख़िरी ग्रैटिफ़िकेशन होता है। सिनेमा जीते-भोगते-समझते-सराहते-दुत्कारते हुए हम यादें गढ़ रहे होते हैं। ऑल काइन्ड्स ऑफ़ मेमोरिज़, जिस पर लिखते हुए नोरा एफ़्रॉन बड़ी सहजता से लिख देती हैं - आई रिमेम्बर नथिंग - मुझे कुछ याद नहीं!

और ये याद भी बड़ी ग़ज़ब चीज़ है। कुछ भी बर्बाद जाने नहीं देती। बच्चों के ग्यारहवें और मेरे अड़तीसवें का अफ़सोस भी अचानक पिघल गया है। :)




गुरुवार, 2 मार्च 2017

मोहब्बत २ मार्च की!

हम सबकी ज़िन्दगी में एक मुश्किल तारीख़ होती है। २ मार्च मेरी ज़िन्दगी की सबसे मुश्किल तारीख़ है।

हम सबकी ज़िन्दगी में एक वो शख़्स ज़रूर होता है जिससे हम बेइंतहा मोहब्बत करते हैं। बिना शर्त। बिना नापे तौले। बिना किसी अपेक्षा या उम्मीद के। ये जो मुश्किल तारीख़ होती है न हमारी ज़िन्दगी की, ऐसे ही किसी शख़्स के गुज़र जाने की तारीख़ होती है।

बाबा आज होते तो बयासी साल के हुए होते। बाबा के बयासी का न हो पाने का अफ़सोस उतना बड़ा नहीं जितना बड़ा ये अफ़सोस है कि वे हमारे भीतर-बाहर के कई ऐसे यकीन फलते-फूलते देखने के लिए बाक़ी न रहे जिनके बीज उन्होंने अपने हाथों से हमारी रूहों में डाला था। बाबा ये देखने के लिए बाक़ी न रहे कि हम हर रोज़ उन्हें नई शिद्दत और अथाह ईमानदारी से जीते हैं। बाबा ये देखने के लिए बाक़ी न रहे कि हमने उनका बनाया हुआ घोंसला छोड़ा तो अपने लिए पूरी की पूरी डाल ढूँढ डाली। ऐसी-वैसी नहीं बल्कि बरगद की डाल, बाबा। हमने कई जड़ों से ख़ुद को जोड़ लिया है। ससुराल से लेकर मायके के बीच, भाई-भतीजे से लेकर देयाद-गोतिया के बीच हमने कई परिवार बसा लिए हैं बाबा। और कुछ जुटा न जुटा, मोहब्बत ख़ूब जोड़ी है, बाँटी है।

प्यार करना भी तो आपसे ही सीखा था!

आपकी पिछली और इस बार की बरसी के बीच एक और ग़ज़ब की बात हो गई, बाबा। मुझे प्यार में माफ़ी देना आ गया। ख़ुद को माफ़ करना, और उनको माफ़ करना जिनसे मोहब्बत में गुनाह हो जाते हैं। जिनकी फ़ितरत में दूसरों का दिल दुखाना नहीं होता, उन्हें माफ़ कर देना चाहिए। मोहब्बत में नैतिक-अनैतिक कुछ नहीं होता। मोहब्बत के नियम-क़ायदे नहीं होते। मोहब्बत की दुनिया में सिर्फ़ और सिर्फ़ रूह का कानून चला करता है। उस रूह को चोट न पहुँचे, बस इतना ही हो हासिल मोहब्बत का। बाक़ी तो जिसका हाथ छूट गया, उसके लिए प्यार बाक़ी है। जिसे छोड़ दिया उससे तो दुगुनी मोहब्बत है।

बाबा, माई लव गुरु, थैंक यू फॉर टीचिंग मी हाउ टू लव, एंड हाउ टू फॉरगिव इन लव। एंड थैंक यू फॉर गिविंग मी द मोस्ट डिफ़िकल्ट डे ऑफ़ माई लाइफ़। आई लव यू!


शनिवार, 8 अक्तूबर 2016

लिखना, और चलना तनी हुई एक रस्सी पर

मैं गहरी उदासियों के गीत सुनना चाहती हूँ। इश्क़ में सराबोर, टूटती हुई सिसकियों-हिचकियों और दरकती हुई हँसी में भींगे हुए गीत। लेकिन घर के दोनों बच्चे और उन बच्चों के दम पर हँसती-चहकती गृहस्थी उदासियों को सिरे से नकार देती है। इसलिए तमाम सारे डर और तवील उदासियों की पतवार उखाड़कर अपनी बालकनी पर के गमलों में हरियाली उगाते हैं, रंगीन मधुमालती के झाड़ रोपते हैं और काँटों के बीच से दहकते बुगनवेलिया को देखकर ख़ुश होते फिरते हैं। 

घर भरा-पूरा है। बच्चों की ख़ातिर कामवालियाँ सालों से मेरी तमाम ज़्यादतियाँ बर्दाश्त करती रहती हैं, मेरा साथ नहीं छोड़तीं। मेरे मम्मी-पापा, सास-ससुर अपनी-अपनी सहूलियतों को दरकिनार कर हमारी सहूलियत को मज़बूत बनाते रहते हैं। मैं वैसी एक ख़ुशनसीब औरत हूँ जिसके एक फ़ोन कॉल पर उसका पूरा सपोर्ट सिस्टम अपनी सारी ताक़त लगाकर उसकी ज़रूरतें पूरी करता है। और मैं दुष्ट औरत - उनके इस निस्सवार्थ मोहब्बत का ख़ूब बेजां इस्तेमाल भी करती हूँ। 

बात मई-जून की है। मैं एक नए प्रोजेक्ट के लिए स्क्रिप्ट लिखने की दुरूह कोशिश में पागल हुई जा रही थी। लॉन्ग फ़ॉर्मैट मैंने कभी किया नहीं है, इसलिए बार-बार कोशिश के बावजूद मुझसे लिखा ही न जाए। जितनी बार मैं अपने आधे-अधूरे ड्राफ्ट उन दो लोगों को भेजूँ जिनपर मुझे सबसे ज़्यादा भरोसा है, उनका फ़ीडबैक मेरा दिल तोड़ जाता था। मुझे लगता था कि या तो इन लोगों की अपेक्षाएँ ज़रूरत से ज़्यादा बड़ी हैं या मैंने इतने साल अपने स्किल को ओवरएस्टिमेट किए रखा है। मुझसे पाँच एपिसोड की एक स्क्रिप्ट नहीं लिखी जा रही थी! 

और एक बताऊँ मैं आपको? पहला एपिसोड तो मैंने पिछले साल अक्टूबर में ही लिख लिया था - संगम हाउस में अपनी रेसिडेन्सी के दौरान! अब मेरी सहूलियतों की हद ही देखिए कि मुझे परिवार और ज़िम्मेदारियों से पूरे एक महीने की छुट्टी इसलिए मिल गई थी ताकि मैं शहर और रोज़मर्रा के जंजालों से दूर, बहुत दूर, नृत्यग्राम जैसे स्वप्नरूपी किसी एक द्वीप पर लिख सकूँ, अपने साथ वक़्त बिता सकूँ। संगम हाउस में गुज़रा एक महीना मेरी ज़िन्दगी का सबसे ख़ुशनुमा तजुर्बा रहा है, लेकिन उसपर फिर कभी लिखूँगी। बहरहाल, उस स्क्रिप्ट की बात को अंतड़ियों में फँसी हुई थी कहीं। 

मैं इस बात की बदगुमानी में जीती आ रही हूँ कि मैं बहुत प्रोग्रेसिव हूँ। अपने से पंद्रह-बीस साल बच्चों से उनके ज़माने की बातें कर सकती हूँ, उनके साथ हँस-बोल सकती हूँ। गेम ऑफ़ थ्रोन्स, हाउस ऑफ़ कार्ड्स और नार्कोस देखती हूँ। इलिना फेरान्ते पर फर्राटेदार बात कर सकती हूँ। न्यूडिटी, मेडिटेशन और मेटाफ़िजिक्स - तीनों को उनके शुद्ध रूप में स्वीकार करती हूँ। अपने दस साल के बच्चे के सेक्स, पीरियड्स, क्रश, लव, पॉर्नोग्राफी, सेक्सुअल कॉन्टेंट, किस, स्मूच और सेक्सुएलिटी से जुड़े बचकाने सवालों का ठीक-ठाक कूल जवाब देती हूँ। 

और फिर भी मुझसे चार कैरेक्टर्स ठीक से क्रिएट नहीं हो पा रहे थे? जिन चार लड़कियों की कहानी मैं सुनाना चाहती थी वो उम्र में मुझसे अठारह-बीस साल छोटी थीं। और ये फ़ासला उन्हें ठीक तरह से समझने में आड़े आ रहा था। मैं अठारह साल की एक लड़की की कहानी सोच तो रही थी, उसकी तरह उसका फ़साना नहीं बुन पा रही थी। उम्र और तजुर्बा आड़े आ रहा था क्योंकि अपने सारे कूल कोशन्ट के बावजूद मेरा पूर्वाग्रह आड़े आ रहा था। 

पूजा, सैम, डेब और मेघना - इन चार लड़कियों के किरदार रच रही थी मैं। हर एक शख़्सियत दूसरे से जुदा होती है। हर नज़रिया और फिर हालात पर हर रेस्पॉन्स एक-दूसरे से भिन्न होता है। हम अपने शरीर में रहते हुए अपनी ही रूह की साँसें गिनते हुए हर हाल में एक-से नहीं होते। चेन्ज इकलौता कॉन्सटेंट है। हम हर लम्हा बदल रहे हैं। हमारी समझ हर लम्हा बदल रही है। 

लेकिन कुछ स्टीरियोटाईप्स हैं जो हमारी सोशल और इमोशनल कंडिशनिंग करते हैं। इसलिए हम ये मानकर चलते हैं कि ये शख़्सियत तो बिल्कुल ऐसी ही होगी, उसके एक्सटर्नल और इन्टरनल कॉन्फ्लिक्ट्स भी हम एक खांचे में ढालकर समझने की कोशिश करते हैं। ह्यूमन साइकॉलोजी की सभी थ्योरिज़ उन्हीं पर आधारित होती हैं। 

और यहीं एक कहानीकार अपना हुनर दिखाता है। उन खाँचे में होते हुए भी कैसे एक किरदार उस खाँचे को तोड़कर अपने लिए नई-नई ज़मीनें, नए आसमान ढूँढता है - सारी कहानियाँ उसी तलाश का सार होती हैं। 

मैं वहीं मात खा रही थी। कैरेक्टर स्केच के कई कई ड्राफ्ट, कई कई रेफ़रेंस ढूँढ लेने के बाद भी मुझे उन लड़कियों के किरदार नहीं मिल रही थी जिनके सहारे मुझे अपनी कहानी कहनी थी। 

शब्दों में कहानियाँ कहना और विज़ुअल स्टोरीटेलिंग में एक अहम फ़र्क़ ये होता है कि शब्द आपके लिए कहने और न कहने की गुंजाईश छोड़ते हैं। आप अपनी सहूलियत और अपने हुनर के हिसाब से जितना चाहें, जैसा चाहें, शब्दों का इस्तेमाल कर सकते हैं। विज़ुअल स्टोरीटेलिंग में 'interpretation' और 'inference', दोनों बहुत 'intelligent' होता है। तो मैं निजी तौर पर विज़ुअल स्टोरीटेलिंग को इन तीन I's का कॉम्बिनेशन मानती हूँ। विज़ुअल स्टोरीटेलिंग में शब्द जितने कम होंगे, डायलॉग जितना क्रिस्प होगा, वो स्टोरी उतनी ही पसंद की जाएगी। वहाँ इन्टरप्रेटेशन और इन्फेरेन्स दोनों विज़ुअल और एक्शन के बग़ैर हो ही नहीं सकता।            

एक और बहुत बड़ा अंतर है दोनों अलग-अलग किस्मों की स्टोरीटेलिंग में। आप कहानियाँ अपने लिए, और अधिक से अधिक अपने पाठकों के लिए लिखते हैं। लेखक और पाठक के बीच एक ही पुल होता है, बस एक ही - हवा में लटकता हुआ, अदृश्य, आज़ाद। लेकिन विज़ुअल स्टोरीटेलिंग में क्रिएटर और दर्शक के बीच का पुल कई खंभों पर टिका होता है। एक भी खंभा डगमगाया तो कहानी गई हाथ से। 

मैं शायद इसी कोलैबोरेटिव प्रोसेस से डर रही थी। मुझसे किरदार इसलिए नहीं रचे जा रहे थे क्योंकि मेरे भीतर का रेज़िसटेन्स बहुत बड़ा था। मैं जो रच रही थी, उसे बाक़ी लोग किसी और तरीके से इन्टरप्रेट कर रहे थे, उसका इन्फ़ेरेंस कुछ और निकाल रहे थे। यानी, मैं जो लिख रही थी उसमें और मेरे सामने बैठा जो उसे विज़ुअलाइज कर रहा था उसमें एक बहुत बड़ा गैप था। 

वो गैप इसलिए भी था क्योंकि एक राइटर के तौर पर मेरे दिमाग़ में क्लारिटी ही नहीं थी कि मैं क्रिएट क्या करना चाहती थी। You can't create without absolute clarity in your head. जो स्क्रीन पर दिखाई देता, जो संवादों के माध्यम से कहा जाता - उसके अलावा कई और भी तो ऐसे लम्हे थे जो वो किरदार जी रहे थे, जो उन किरदारों के एक्शन को तय करता था!

तो इस तरह कई महीनों के ऊहापोह के बाद प्रक्रिया समझ में आ रही थी थोड़ी-थोड़ी। 

अव्वल तो ये कि आप आइसोलेशन में रहकर क्रिएट कर ही नहीं सकते, कम से कम इस फॉर्मैट के लिए तो बिल्कुल नहीं। 

दूसरा, आप कितने ही कामयाब स्टोरीटेलर क्यों न हो, हर कहानी के साथ-साथ आपको ख़ुद को नए सिरे से रचना पड़ता है। स्टोरीटेलिंग के कम्फ़र्ट ज़ोन तक आप कभी पहुँच ही नहीं सकते। पूरी ज़िन्दगी लग भी जाए तब भी। आप स्क्रीनराइटिंग की स्किल हासिल कर सकते हैं, लेकिन क़िस्सागोई स्किल के साथ-साथ डिलिजेंस भी होती है जहाँ हर रचना के साथ आपको एक अँधे कुँए में उतरने का माद्दा रखना ही पड़ेगा। 

तीसरा, जब तक आप डेस्क पर बैठेंगे नहीं और लिखेंगे नहीं तबतक कहानी पैदा कहाँ से होगी? हमारे दिमाग़ में चलनेवाली कहानियाँ काग़ज़ पर उतरनेवाली कहानियों और बाद में स्क्रीन पर दिखाई देने वाली कहानियों से एकदम जुदा होती है। आप बेशक अच्छे आइडिएटर होंगे, बिना एक्ज़ीक्यूशन के किसी कहानी का कोई मतलब ही नहीं होता। 

चौथा, मदद माँगने में संकोच कैसा! मुझे अपनी कहानी के अहम मोड़, टर्निंग प्वाइंट्स तब समझ में आए जब मैंने बार-बार उस कहानी के बारे में अपने आस-पास के लोगों से बात की। उनसे उनके अपने तजुर्बे पूछे। हर रिस्पॉन्स के पीछे का तर्क समझने के लिए जब तक टीम के साथ लंबी बहस हुई नहीं, तब तक स्क्रिप्ट लिखी ही नहीं जा सकी। 

पाँचवा, फ़ियरलेसनेस और करेज - निडरता और हिम्मत वो लाइफ़ स्किल है जिसे हम सबसे ज़्यादा अंडरएस्टिमेट करते हैं। और कुछ सिखाएँ न सिखाएँ, ख़ुद को और अपने बच्चों को, अपने से छोटों को, अपने आस-पास के लोगों को हिम्मत करना ज़रूर सिखाएँ। इस दुनिया को अगर हम कुछ पॉज़िटिव दे सकते हैं, तो वो यही भरोसा है। पूरी दुनिया इसी एक लाइफ़ स्किल के दम पर चलती है। क्रिएटिव प्रोसेस भी। 

आख़िरी बात, हम लिखने के क्रम में कई बार फ़ेल होते हैं। कई बार अपने ही लिखे हुए पर उबकाई आती है। अपनी नालायकी पर दीवार पर सिर दे मारने का जी करता है। लेकिन असफलता के इन्हीं पत्थर-से लम्हों को तोड़कर कोई एक अंकुर फूट पड़ता है जिसकी किस्मत में पेड़ बन जाना होता है। बंजर ज़मीनों में खेत लगाने से पहले कई बार जोतना पड़ता है उनको। 

और एक आख़िरी बात - इस बार पक्का आख़िरी ही - भरे-पूरे घर में प्रेम बोया-उगाया जाता है लेकिन इस ख़ुशहाली में आपके भीतर का रचनाकार आत्मसन्तोषी हो जाता है, बिल्कुल कम्पलेसेन्ट। और कम्पलेसेंसी से रचनाएँ नहीं निकल सकतीं। 

इसलिए मैं साल में दो-चार बार अपने भरे-पूरे घर से भाग जाया करती हूँ। बच्चों से छुपकर उदास नज़्में सुनती हूँ, अपने भीतर की तन्हाई बचाए रखती हूँ और याद दिलाती रहती हूँ कि ख़ुद को कि समंदर की गहराईयों में भी बवंडर और तूफ़ान छुपा करते हैं। ख़ुशी मेरे साथ-साथ चलती है, मेरे कांधों पर उड़-उड़कर बैठी चली आती है और मैं उसे दुरदुराती रहती हूँ। उदास-सी शक्ल बनाती हूँ तो बिटिया होठों के दोनों कोरों खींचकर मेरे चेहरे पर मुस्कान चिपकाने चली आती है, किसी बात पर ख़ामोश होती हूँ तो बच्चे बार-बार मुँह चूमते हैं, गले लगाते हैं। चुप हो जाती हूँ तो घर की दीवारों को अपनी बातों, क़िस्सों और लतीफ़ों से रंगते रहते हैं। 

और इसलिए भरे-पूरे घर को दूर पहुँचाकर मैंने अपने घर में अँधेरे जलाए और फिर लिखी उन चार लड़कियों की कहानी, उनके साथ रोई और उनके साथ खुलकर हँसती रही। और फिर पति और बच्चों के पास जाकर उनकी हथेलियों पर कई दुआएँ रखीं, उनके लिए अपने भीतर कई गुना प्यार और इज्ज़त को बढ़ाती रही, ये वायदा किया ख़ुद से कि मेरा परिवार, मेरा सपोर्ट सिस्टम, मेरे यार-दोस्तों के लिए ही करूँगी जो भी करूँगी। परिवार और काम, हक़ीकत और ख़्वाब, दिल और दिमाग़, रूह और जिस्म साथ-साथ ही रहेंगे। हमेशा।  

क्रिएटिव प्रॉसेस एक टाइटरोप वॉक भी है बॉस! 

   





  




मंगलवार, 4 अक्तूबर 2016

सेरेन्डिपिटी भी कोई चीज़ होती है यार!

मैं अक्सर इस बात से हैरान होती हूँ कि कैसे दिमाग़ की कोई एक ख़लल अदना-सी ख़्वाहिश रच लेती है, मन उस ख़्वाहिश को पालता-पोसता रहता है और फिर अचानक कुछ ऐसा होता है कि सारी वाह्य ताकत मिलकर उस ख़्वाहिश को पूरा करने में लग जाती है। अगर इसे लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन की कोई एक टूटी-फूटी थ्योरी ही मान लें तब भी मैंने अपनी ज़िन्दगी में कई बार इस थ्योरी को काम करते देखा है।

पिछले हफ़्ते मैं अपनी साइकोथेरेपिस्ट के पास बड़ी हैरान-परेशान गई थी। मेरे पास मेरी नाजायज़ दुश्चिताओं का पिटारा था। हाल ही में एक सहेली के पति का अचानक सफ़र से लौटते हुए देहांत हो गया। दोनों पति-पत्नी अपनी बच्ची को विदेश की एक यूनिवर्सिटी में छोड़कर वापस अपने शहर लौट रहे थे। हवाई जहाज़ में ही दिल का दौरा पड़ा और उतरते-उतरते तक, अस्पताल तक पहुँचते पहुँचते तक उस दिल के दौरे ने एक अच्छे-ख़ासे सेहतमंद इंसान की जान ले ली। इस हादसे के लिए कोई तैयार नहीं था। हादसे के लिए कब कहाँ कोई तैयार हो पाता है!

मैंने मौत को कई बार बहुत करीब से देखा है। आख़िरी हिचकी में साँस जाते हुए देखा है, और जानती हूँ कि जिससे आप बेइंतहा मोहब्बत करते हैं, जिसके इर्द-गिर्द आपकी दिनचर्या चलती है, जिसके होने से आपके वजूद का एक हिस्सा है उसके चले जाने का, और इस तरह अचानक बड़ी तकलीफ़ में चले जाने का अफ़सोस और उस अफ़सोस से पैदा हुई असहायता कितनी बड़ी होती है। रात को अपने बिस्तर पर लेटो तो वो अफ़सोस, वो हेल्पलेसनेस हज़ारों सूई की नोंक से पूरे बदन, पूरी सोच को छलनी किए रहता है।

और चिंता की फ़ितरत तो मालूम है न? चुंबक से भी ख़तरनाक तासीर है उसकी। एक पालो तो हज़ार लोहे के कील की तरह की शंकाएँ आकर्षित करती है अपनी ओर।

बहरहाल, मैं अपनी थेरेपिस्ट के सामने बैठी थी। एक हज़ार शिकायतों का पिटारा था। मेरी पीठ पिछले एक महीने से इस बुरी तरह तकलीफ़ में थी कि मेरा उठना-बैठना-चलना मुश्किल था। मेरे भीतर एक अजीब किस्म का डिटैचमेंट पैदा हो रहा था। दुनिया को छोड़-छाड़ कर किसी गुमनाम जगह भाग जाने की ख़्वाहिश सिर उठाने लगी थी। रात-रात भर ये ख़्याल आता था कि अगर हममें से कोई एक भी मर गया तो ज़िन्दगी में क्या थमेगा, क्या चलेगा। सवालों की शख़्सियत किसी लिहाज से ख़ुशमिजाज़ तो कतई नहीं थी। हम क्यों हैं, किसलिए हैं, ये भागदौड़ क्यों, जीवन का मकसद क्या, मरकर क्या और जीकर क्या। बेतुके। बेहद बेतुके सवाल।

हम भरे-पूरे भी कमाल हैं, और तन्हा भी कमाल हैं।

थेरेपिस्ट ने कहा, "आँखें बंद करो और उन तीन लम्हों के बारे में सोचो जब यू फ़ेल्ट लकी, रियली रियली लकी।" ऐसे तीन लम्हों के बारे में सोचना दुश्वार लगा। आँखें बंद किए सोचती रही। और बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के जवाब दिमाग़ में तोप से निकले गोलों की तरह गूँजने लगे।

मुझे जन्म देने का सुख मिला है - एक बार में दो हसीन बच्चों को। और मुझे याद आए मेरे ही अपने लोग, जिन्होंने अपनी आधी ज़िन्दगी और पूरी कमाई एक बच्चे की कोशिश में निकाल दी।

मेरी टूटी हुई पीठ और शरीर में बहुत सारी तकलीफ़ के बावजूद मेरे पास एक घर है जहाँ मैं सुकून से जी सकती हैं, परिवार है जो मेरी दुखती रग पर हर वक़्त पेनकिलर लगाने के लिए तैयार रहता है, और इतने तो पैसे हैं ही कि मैं एक सेशन के लिए थेरेपिस्ट की सर्विस लेने की क्षमता रखती हूँ।

मुझे कई वो लम्हे याद आए जब मुझे प्यार मिला, बेइंतहा प्यार - एकदम अनकंडिशनल। ये लोग जो अपने पहलू में मेरे लिए जगह बनाते रहे हैं, मेरे दोस्त हैं, मेरे परिचित हैं, और कई बार तो अजनबी भी रहे हैं। ये वो लोग हैं जिनसे में काम-बेकाम, वक्त-बेवक्त, कभी ख़ुदगर्ज़ी में और कभी बेहद निस्सवार्थ भाव से मिलती रही हूँ। जिनसे अपना कुछ न कुछ बाँटती रही हूँ। ये बाँटना हमेशा इन्टैन्जिबल रहा है - अमूर्त। वक्‍त के रूप में, दर्द के रूप में, डर के रूप में, ख़्वाब के रूप में, यकीन के रूप में और शंकाओं के रूप में। इनमें से कईयों ने मेरे सामने सरेंडर किया यकीन से, कुछ के सामने मैं अपने भरोसे समेटने के लिए बिखरी हूँ। ये लोग क्यों हैं? ये लोग क्यों थे? किस्मत ही थी न! ख़ुश-किस्मत! लक!

और फिर आँखें बंद किए-किए ही मुझे याद आया एक शब्द - सेरेन्डिपिटी!

"सो, अनु! ओपन योर आईज़ एंड टेल मी… व्हाट मेड यू फ़ील रियली रियली लकी?" थेरेपिस्ट ने पूछा।

"सेरेन्डिपिटी। इन्सिडेन्ट्स ऑफ़ सेरेन्डेपिटी हैव मेड मी फ़ील रियली रियली लकी," मैंने जवाब दिया।

मैं सेरेन्डिपिटी नाम की एक गोली लिए लौट आई, इस सलाह के साथ कि मैं तबतक किसी की कोई मदद नहीं कर सकती जबतक ख़ुद ठीक न रहूँ। ये भी सच लगा कि मेरा डर किसी के काम नहीं आनेवाला था, उस सहेली के काम भी नहीं जो वैसे भी अपनी ज़िन्दगी से जूझ रही थी। शायद सेरेन्डिपिटी मेरे काम आती, शायद उसके लिए सेरेन्डिपिटी का इंतज़ार काम आता।

शब्दकोश सेरेन्डिपिटी के लिए ये तर्जुमा देता है - आकस्मिक लाभ, या अकस्मात से कुछ खोज करना। मैं सेरेन्डिपिटी को सुखद संयोग से जोड़ती हूँ। सेरेन्डिपिटी मेरे लिए वो हसीन इत्तिफ़ाक़ है जो ज़िन्दगी में मेरा यकीन बचाए रखता है।

जितनी ही बार मैं अचानक कुछ छोटा-बड़ा खोजने निकली हूँ, उतनी ही बार मेरे हाथ कुछ न कुछ लगा ज़रूर है। थेरेपिस्ट के सामने मैं एक्ज़िटेंशियल क्राइसिस के जवाब ढूँढने गई थी, जवाब में मुझे अपनी ही ज़िन्दगी का सबसे बड़ा हसीन राज़ मिल गया! सेरेन्डिपिटी ही तो है।

एक मिसाल देती हूँ। पिछले हफ़्ते मुक्तेश्वर जाने से दो दिन पहले मेरे पब्लिशर शैलेश भारतवासी मुझसे मेरे घर पर मिलने आए, इसलिए क्योंकि मैंने अपनी ही कुछ किताबें मँगाई थीं उनसे। बातों बातों में अपने नए प्रोजेक्ट के बारे में बात करते हुए मैंने शैलेश से कहा कि मैं एक मेल सिंगर की तलाश कर रही हूँ। शैलेश ने मुझे एक युवा सिंगर का नाम बताया, और हम दोनों ने मिलकर यूट्यूब पर उस सिंगर को खोजने की बहुत कोशिश की लेकिन मेरे हाथ कुछ न आया। बस सिंगर का नाम रह गया ज़ेहन में - हरप्रीत।

दो दिन बाद मैं शताब्दी में थी। कोई प्लानिंग थी नहीं लेकिन उसी ट्रेन में शैलेश दिखे - अकस्मात। और शैलेश को देखते ही मेरे दिमाग़ में फिर वो नाम आया - हरप्रीत, और ये कि मुझे वापस दिल्ली लौटकर इस सिंगर का पता करना है।
फिर मैं मुक्तेश्वर में थी, बल्कि सोनापानी के एक रिसॉर्ट में, जहाँ हम इकलौते मेहमान थे। मेज़बानों से बात करते हुए पता चला कि सोनापानी एक म्यूज़िक फ़ेस्टिवल और फ़िल्म फ़ेस्टिवल ऑर्गनाइज़ करता है। कुछ फ़ितरत मिलती थी, और कुछ बातचीत में मज़ा आ रहा था इसलिए मैंने अपने मेज़बानों से अपने नए प्रोजेक्ट की बात की और उन्हें वो गाने भी सुनाए जो हमने कम्पोज़ करवाए थे।

मेरी मेज़बान दीपा ने कहा, "तुमने हरप्रीत को सुना है कभी?" मैं चौंक गई। ये वही नाम तो था जिसके बारे में मैं पता करने की कोशिश कर रही थी! दीपा अपना आईपैड ले आई और मैंने हरप्रीत के कुछ गीत वहीं बैठे-बैठे ही सुन लिए। अगले दो घंटे में मेरे पास न सिर्फ़ हरप्रीत की पूरी सीडी थी (जो मुझे दीपा ने तोहफ़े में दी) बल्कि तीन दिन के भीतर दिल्ली में हरप्रीत से मिलवाने का वायदा भी था (मैं आज हरप्रीत से मिल रही हूँ!)।

सोचा कहाँ, खोजा कहाँ और खोज पूरी कहाँ जाकर हुई!

ये है सेरेन्डिपिटी। अब सोच रही हूँ तो ध्यान में आ रहा है कि जिस प्रोजेक्ट के लिए मैं हरप्रीत से एक बार मिलना चाहती थी, वो पूरा का पूरा प्रोजेक्ट ही सेरेन्डिपिटी के दम पर निकला है (उस प्रोजेक्ट - द गुड गर्ल शो के बारे में बातें फिर कभी)। इतनी ही अहमियत रखते हैं ये हसीन इत्तिफ़ाक़ और हम बेकार में अपना रोना लेकर दुनिया भर में भटकते फिरते हैं। अपने ग़म, अपने दुख, अपने डर बचाए रखते हैं ताकि लोगों के हिस्से के प्यार हमें मिलता रहे। दुनिया को एक ग़मगीन इंसान ख़ूब प्यारा होता है। दुख में डूबे गीत सबसे हसीन होते हैं। टूटे हुए एक दिल के क़िस्से बटोरने वाला कहानीकार हम सबका अजीज़ होता है।

लेकिन फिर भी, सेरेन्डिपिटी भी एक चीज़ होती है यार जो बटोरती है, समेटती है, यकीन देती है। ये सेरेन्डिपिटी अकाट्य, अटल लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन का अकाट्य, अटल सत्य है।