Friday, February 5, 2016

इश्क़, ख़ुदा और पछतावा

कहाँ से शुरु करे कोई जब छूटी हुई दास्तानों का सिरा मौसमों की आवाजाही में भटक गया हो कहीं।

ज़िन्दगी क़ायदों के राग अलापती है और बेतरतीबी से बाज़ नहीं आती। बच्चे गोद से उतरकर शहर की सड़कें नापने लगे हैं। तोतली बोलियों की ज़ुबान पुख़्ता, भरे-पूरे निर्देशों में तब्दील हो चुकी है। जब बच्चों की अभिव्यक्ति का अंदाज़ बदल गया है तो फिर ज़िन्दगी कैसे वैसी की वैसी रहे जनाब? ज़िन्दगी भी बदली है, और हमने उसके मायने भी बदल डाले हैं। उस गंभीर, दार्शनिक मुद्दे पर गहन बातचीत फिर कभी।

लेकिन वाकई वजूद से जुड़े सवाल बदल गए हैं। मैं कौन हूं और कहां हूं, क्यों हूं जैसे सवालों की जगह कहीं ज़्यादा व्यावहारिक सवालों ने ले ली है। एटमॉस्फियर में कितनी परतें होती हैं और हर लेयर का काम क्या है? फ्रिक्शन और ग्रैविटी के बीच का रिश्ता क्या है? पार्ट्स ऑफ स्पीच कितने किस्म के होते हैं? मिक्स्ड फ्रैक्शन को सिर्फ दो स्टेप में डेसिमल में कैसे बदलेंगे? फोटोसिंथेसिस की परिभाषा क्या है?

सवाल दरिया की लहरे हैं। मैं नाचीज़, नासमझ, मूढ़ उनमें कतरा-कतरा विकीपीडिया के लिंक्स डालती रहती हूं।
मेरे बालों में अब इतनी ही सफेदी उतर आई है कि मैं उन्हें मेहंदी की लाल परतों के नीचे छुपाने की नाकाम कोशिश भी नहीं करती। इतना ही सुकून आ चला है भीतर कि जिस्म का फ़िजिक्स न दिन के चैन पर हावी होता है न रातों की नींद उड़ाता है। पढ़ लिया बहुत। पढ़ लिया मर्सिया कि उम्र अब चेहरे पर अपने रंग दिखाने लगी है। आंखें कमज़ोर होती हों तो हों, नज़र तो नहीं बदली न। उंगलियों पर शिकन पड़ती हो तो पड़े, मोहब्बत पर पकड़ तो ढीली नहीं हुई। पैर कमज़ोर हुए हों तो क्या है, कोई बरसों पुराना दोस्त, कोई अज़ीज़, कोई जानशीं महबूब एक बार बुलाओ और मैं न आऊँ तो फिर कहना। दिन घट रहे हैं तो क्या हुआ? ज़िन्दगी तो बढ़ रही है हर रोज़।  

सुकून है। है सुकून कहीं भीतर। उम्मीद के आख़िरी पुल पर ही सही, लेकिन बैठा है वो कहीं - महबूब। ज़र्रा-ज़र्रा नूर बिखराता, वस्ल की डूबती-उतराती शामों को रौशन करता, हम आशिक़ों के सब्र का इम्तिहान लेता है वो। कई जिस्मों, कई ज़िन्दगियों से होकर कई सूरतों में उसको ढूंढते हुए जो हर बार ये रूह मौत और ज़िन्दगी के बीच की जो हज़ारों यात्राएं करती है, उसी के लिए करती है।

इसलिए सुनो ओ इश्क़ में डूबे हुए एक मारी हुई मति के बदकिस्मत सरताज, जिससे मिलना प्यार से मिलना। उंगलियों से यूँ छूना कि कई जन्मों की गिरहें खुलकर फ़ानी हो जाएं। साबुन के टुकड़े-सा यूँ पिघलना हथेलियों पर कि कई जन्मों के पाप धुल जाएँ। जितना बार गुज़रना अपने किसी महबूब के जिस्म से होते हुए, ऊँचे पहाड़ों और गहरी घाटियों में उलझी-हुई बेचैन हवाओं की तरह गुज़रना। उसके जिस्म को ख़ुदा का ठौर समझना और अपने इश्क़ को सज्दा।

जिस दिन इतनी निस्वार्थ मोहब्बत तुममें आ जाएगी, उस दिन तुम वस्ल और फ़िराक़ की दुश्चिंताओं से आज़ाद हो जाओगे। फिर मत पढ़ना तुम गीता और पुराण। मत रटना आयतें। मत सुनना ओल्ड टेस्टामेंट से मूसा की ज़िन्दगी और मौत की कहानियां। उस दिन - उस एक दिन - बन जाओगे तुम इंसान।

लेकिन तब तक चलो गमलों में बंद तुलसी के सेहत की फ़िक्र करें। रंग-बिरंगे गेंदे के फूलों की मालाएँ गूंधे। अगरबत्ती और धूप की ख़ुशबुओं में छुपाएँ अपने मन के कोनों में चढ़ी मैल के दुर्गंध। चढ़ते हुए सूरज के सामने हाथ बांधे रटते रहें अपने मुरादों की अंतहीन सूचियाँ और ढ़ारते रहें शिवलिंग पर गंगा के कई तीरों से जुटाया गया जल।

तब तक चलो फिर से झाड़ लें अपने जानमाज़ की धूल और सभी मेहराबों का मुँह मोड़ दें काबे की ओर।

सुनो, जमा कर लो दुनिया भर की मोमबत्तियाँ और रौशन कर डालो एक-एक गिरिजाघर को कि दिलों के अंधेरों को रौशन करने का कोई और रास्ता सूझता नहीं है।

चलो न ढूंढे अपना कोई एक महबूब दरियादिल ख़ुदा जो आसानी से हमें हमारे गुनाहों से निजात दिला सके।

...कि टूटकर मोहब्बत होती नहीं हमसे, और गुनाहों की गठरी अब ढोई नहीं जाती और।

Friday, August 14, 2015

मसान से उपजा हुआ दुख

एक भारीपन है जो गया ही नहीं कल से। एक इम्पल्स में स्क्रीन खोलकर बैठ गई हूं, एक राईटर के इन्बॉक्स तक अपना संदेश पहुंचाने के लिए। इसलिए क्योंकि संवाद के बाकी सारे पब्लिक प्लैटफॉर्म बेमानी लग रहे हैं। मुझे वाहवाहियां नहीं लिखनी। न समीक्षा लिखनी है कि किसी ब्लॉग, किसी मैगेज़ीन में डाल दूं। मुझे तो बस अपना दुख बांटना है। मसान से उपजा हुआ दुख।

ज़िन्दगी ऑटोपायलट मोड में है, जो चलती रहती है। बच्चों का होमवर्क, प्लेट में बचे सहजन के टुकड़े और दो-चार आलुओंं जूठन, दरवाज़े के बाहर जमा हो गए जूतों की भीड़, बिस्तर की सिलवटों, फर्श पर औचक चली आई फिसलन के बीच। ज़िन्दगी एक लीक पर चलती रहती है। अहसास पत्थर हो गए हैं, और ख़्याल भुरभुरी मिट्टी। लेकिन जो कल दोपहर से अटका हुआ है गले में, वो बाहर निकल आने की कोई सूरत नहीं पाता। हलक में अटके हुए उस भारीपन का रिश्ता 'मसान' से है।  

कल देखी मैंने मसान। अकेले। स्पाइस मॉल के सबसे छोटे ऑडी नंबर पांच में। सिर इतने थे कि गिने जा सकते थे, फुसफुसाहटें ऐसी कि कानों को चुभती थीं। फिल्म देखने से पहले मैंने मसान का कोई रिव्यू नहीं पढ़ा था। जानबूझकर। कुछ हैरतें अपने लिए एकदम महफ़ूज़ रखनी होती हैं - इस तरह महफूज़ कि किसी और के ख़्याल उसे करप्ट न कर सकें। मसान के लिए वो हैरत ऐसी ही थी बस। मैं फ़िल्म समीक्षक नहीं हूं। न आपके आम दर्शकों में से एक हूं। इन दोनों के बीच-बीच की हूँ। इसलिए, न समीक्षकों की ज़ुबां में बात करना आता है न किसी आम दर्शक की तरह वाहवाहियों का समां बांधने का शऊर है।

सिर्फ़ इतना बता सकती हूं कि मसान ने कुछ यादों की चीटियां हथेलियों पर छोड़ दी है। कल से बस वो यादें रेंगती जाती हैं, काटती जाती हैं। वो शहर बनारस नहीं था, इलाहाबाद नहीं था। डूबने को कोई गंगा नहीं थी, न वो घाट था जिस पर किसी को जलाते हुए ये यकीन हो कि जिस्म के साथ दुखों का बवंडर भी जल गया... कि आत्मा को मुक्ति मिली। न वो संगम था कहीं, कि उम्मीद बंधे दुबारा लौट आने की। इस बार किसी और के साथ।

मसान की कहानी किसकी रही होगी, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। लेकिन उस कहानी में सबको अपने-अपने दुखों की परछाई ज़रूर दिखती होगी। दुख बड़ा या छोटा नहीं होता। दुख बस दुख होता है। इसलिए तो एक मृत्यु के दुख को हम चिता पर जली देह के साथ भूल जाते हैं, और लेकिन जीते-जागते इंसान के बिछोह का दुख राख की तरह सुलगता रहता है। दुख की तरह ही प्रेम भी बड़ा या छोटा नहीं होता। प्रेम बस प्रेम होता है। चेतन मन की सारी समझ को झुठलाता हुआ प्रेम। अजर, अमर प्यास वाला प्रेम। रूह को चीरकर जिस्म से होकर गुज़रता हुआ प्रेम। उस धड़धड़ाती रेल के नीचे कमज़ोर पुल-सा थरथराता प्रेम! दुख और प्रेम के इस गंगा-जमुनी संगम में जो अदृश्य सरस्वती दिखाई नहीं देती मसान में, वो उम्मीद है। धू-धू जलती चिताओं के बीच भी जिस्म और रूह, प्रेम और दुख के पुनर्जन्म की उम्मीद। एक जानलेवा-सी डुबकी में सिक्कों की बजाए एक अंगूठी निकाल लाने की उम्मीद। दो कमज़ोर चप्पुओं वाली उस डूबती-सी नाव के किनारे पर लौट आने की उम्मीद। घोर अपमान और सज़ा के साथ-साथ बची रह गई माफ़ी की उम्मीद। मसान में उम्मीद पुनर्जीवन की!  

कहानियां वो नहीं होतीं जो आप लिखते हैं। किरदार वो नहीं होते जो आप रचते हैं। कहानियां, और किरदार, वो होते हैं जिन्हें जीते हुए आप नए सिरे से रचे जाते हैं। जिनसे गुज़रते हुए आप फिर एक बार बनते हैं, बिगड़ते हैं, संवरते हैं, निखरते हैं। कहानियां वो होती हैं जो आपकी पत्थर होती जा रही ज़िन्दगी का सीना चीरकर वेदनाओं के अंकुर निकाल लाने का माद्दा रखती हैं। जिनसे होकर गुज़रते हुए आपके दुखों की चींटियां चमड़ी की खोल चीरकर बाहर निकलती हैं, और फिर रेंगती हुई कहीं किसी बिल में गुम होकर आश्रय पा जाती हैं। मसान ने बनानेवालों को कितना हील किया होगा, मालूम नहीं। मसान ने देखनेवालों को ज़रूर थोड़ा-थोड़ा हील किया है। 'मसान' से उपजा हुआ दुख यूनिवर्सल है, प्रेम और मृत्यु की तरह।

Thursday, August 13, 2015

कहना फिर कभी, सुनना फिर कभी

आज कल कुछ और बड़ी चिंताएं तारी हैं - सब्ज़ी बनने से पहले कम से कम दो बार  धुलती है नहीं, बिस्तर पर की चादरें हर हफ़्ते बदल तो दी जाती हैं न, घर में कहीं चलो तो पैरों के नीचे धूल तो नहीं आती? अच्छा है वक़्त पर सोना, और वक़्त पर जगना। ये भी अच्छा है कि ज़िन्दगी में कोई दुर्व्यसन नहीं। मैं सिगरेट-शराब नहीं पीती। आख़िरी बार वाइन कब पी थी, याद नहीं। सिगरेट के आख़िरी कश का स्वाद ज़ुबां से कब का उतर गया। दिन में कितने ग्लास पानी पीती हूं और कितनी देर योग-ध्यान करती हूं - इसका हिसाब ज़रूरी हो गया है।

और कितना ही अच्छा है कि सारे गुण भरे हुए हैं भीतर - संवेदना, समझ, सुकून। एक माँ, और एक औरत को बिल्कुल ऐसा ही होना चाहिए। रसोई के डिब्बों में समृद्धि अंटी पड़ी हो, बालकनी में शांति कोंपलों से फूट-फूट जाती हो, कमरों में कपूर-सी पवित्रता बांधती हो, फर्श पर अपने सुघड़ होने की परछाई मुस्कुराती हो, सुसंस्कृत बच्चे सिर पर मौजूद अदृश्य ताज हों। 

ज़िन्दगी का हासिल बस इतना ही होना चाहिए न? यही तो होना चाहिए - एक अच्छा-सा घर, दो गाड़ियां, बैंक अकाउंट में उतने पैसे जितने से ज़िन्दगी आराम से कटती रहे, अच्छे कपड़े-लत्ते, इज्ज़त, शोहरत, तीन कामवालियां जो आकर आपकी गृहस्थी बारी-बारी से संभाल जाती हों। ज़िन्दगी का हासिल बस इतना ही होना चाहिए। सच में। ज़िन्दगी का हासिल वाकई बस इतना ही होना चाहिए। 

मैं तुम्हें किस तरह के क़िस्से सुनाऊं दोस्त? तुमसे बात भी करूं तो क्या? कहूं तो क्या? सुनूं तो क्या? ये कि ग्रोफर्स पर सब्ज़ियां सैंतीस के मार्केट से थोड़ी सस्ती मिल जाएंगी? या फिर ये कि बिग बाज़ार में नॉन-स्टिक फ्राइंग पैन पर भारी डिस्काउंट था? या मैं तुम्हें ये बताऊं कि मल्टिप्लिकेशन की छह किस्म की स्ट्रैटेजी होती है - बाइनरी, लैटिस, एरिया मॉडल, ऐरे मेथड, रिपीटेड एडिशन और चिप मॉडल? या फिर ये बताऊं कि बादामरोगन में दही डालकर बाल में लगाओ, और एक घंटे छोड़ दो तो बाल एकदम सॉफ्ट हो जाते हैं? या फिर ये बताऊं कि पीठ दर्द का इकलौता इलाज नैचुरोपैथी में है, और आयुष के सेंटर्स दिल्ली के बेहतर हैं, नोएडा के नहीं? 
  
श्श्श्श्शशशश... शोर बिल्कुल मत मचाओ। मेरे भीतर का लफंगा मन फिलहाल योग निद्रा के अभ्यास में मसरूफ़ है। जिस रोज़ उठकर लुच्चापंती करेगा, उस रोज़ आऊंगी सुनाने क़िस्से। इन दिनों कहने के लिए वाकई कुछ नहीं है। 


Wednesday, July 15, 2015

अटकी हुई स्क्रिप्ट - डे थ्री

भीतर से भरने लगो तो बाहर से कटने लगते हैं। ये मेरी रचना-प्रक्रिया का हिस्सा है।

सारा वक़्त ख़ुद में उलझी-उलझी चलती हूँ। बात किसी से कर रही होती हूँ, सोच कहीं रही होती हूँ। किसी से मिलने-जुलने या बात करने का मन नहीं करता। नींद या तो बहुत आती है या बिल्कुल नहीं आती। सोचती हूँ कि बीमार पड़ जाऊँ - टायफॉय या मलेरिया या जॉन्डिस जैसा कुछ हो जाए तो ऑफ़िस न जाने की वजह मिल जाए, डेडलाइन से पिंड छूटे। झूठ बोल नहीं सकती, क्योंकि जानती हूँ बीमार पड़ने का बहाना किया तो चार कॉलीग या दोस्त और धमक आएंगे घर पर बीमार की मिज़ाजपुर्सी करने।

लेकिन अब तैयार होने लगी हूँ लिखने के लिए। इतने दिनों से जैसे भीतर का घड़ा भर रही थी। छोटे-छोटे काम रास्ते से हटाने ज़रूरी हैं। वो कॉलम जिन्हें लिख देने का वायदा किया था, और जिसके लिए एडिटर कई मेल कर चुकी है... वो अनुवाद जो बस आज के आज ही जाना है... वो किताब जो हर हाल में अब एडिट हो ही जानी चाहिए... तीन मिनट की फ़िल्म की स्क्रिप्ट भी लिखकर आज ही देनी है... सब ख़त्म करके अब अपनी स्क्रिप्ट, अपनी कहानी की ओर मुड़ने का वक़्त हो चला है।

किसी ने बताया था कि १५ जुलाई को सितारों की गति और उनकी जगहों में बहुत बदलाव होने वाला है। आनेवाला वक़्त हम सबके लिए, यहाँ तक कि देश के लिए भी अच्छा है। आज है १५ जुलाई। पता नहीं सितारों की गति बदली या नहीं। लेकिन एक ही वक़्त पूरी दुनिया के लिए अच्छा या बुरा कैसे हो सकता है? सबकी किस्मत एक-सी होती तो ये दुनिया एकरूप न होती? कहते हैं कि किस्मतें जुड़ी होती हैं सबकी। हम जहां कहीं भी होते हैं, जिस भी लम्हे, जिन भी हालातों में... वहाँ किसी न किसी वजह से होते हैं... इसलिए होते हैं क्योंकि यूनिवर्स एक बहुत ही महीन, बहुत ही सोफिस्टिकेटेड मैथेमैटिकल कैलकुलेशन पर चलता है। उस कैलकुलेशन में हम सब एनवेरिएबल फैक्टर्स हैं, और हमारे कर्म वेरिएबल फैक्टर्स। हर माइक्रो-लम्हे का गणित इन्हीं दो फैक्टर्स पर निर्भर है। मेरा बीजगणित बचपन से बहुत कमज़ोर है, इसलिए मुझे शायद ये कैलकुलेशन समझ न आए। जिसे समझ में आता है, उसकी बात पर यकीन कर लेने में भलाई है। यूँ भी क्या बुरा है ये सोचना कि आनेवाले दिनों में सब अच्छा-अच्छा होगा?

घड़ी तीन चालीस का वक़्त दिखा रही है और आँखों से अधूरी नींद बहे जा रही है निरंतर। पता नहीं क्या सूझा है कि पहले मन की भड़ास, अलाय-बलाय बाहर निकाल देने का इरादा बना लिया है मैंने। उसके बाद शायद काम पर लौटना आसान हो जाए। पूरे दिन के चक्कर हैं। इन चक्करों में कई लोगों से मिलना भी शामिल है। मैं एक ही दिन में इतने सारे कमिटमेंट करती ही क्यों हूँ? अपने ही चैन की दुश्मन आपे-आप हूँ!

बग़ल में रश्मि बंसल की किताब औंधे मुँह पड़ी हुई कह रही है - अराइज़, अवेक। स्वामी विवेकानंद को काहिलों से जाने कैसा बैर था कि एक जुमला छोड़ गए। सदी गुज़र गई लेकिन वो जुमला हज़ारों की मेज़ों के ऊपर चिपका पूरे देश को जगाने का ढोंग भरता रहता है। पता नहीं वो गोल क्या है, और वो रास्ते क्या जिन पर चलते चलनेवाले अंतहीन सफ़र पर रहते हैं। अराइज़! अवेक! एंड स्टॉप नॉ ट टिल द गोल इज़ रिच्ड। सोने मत दीजिए स्वामी जी। बिल्कुल सोने मत दीजिए। इसी किताब का अनुवाद करना है मुझे? हो गई छुट्टी। रात की जूठन में थोड़ा-सा चैन भी बचा होगा तो उसे डस्टबिन में फेंक देने का पूरा इंतज़ाम मैंने अपने ही हाथों कर लिया।

हआ बहुत अनु सिंह। लौटो काम पर। इंतज़ार है कि तुम्हारी एडिटर ने रात में तुम्हें इतना ही कोसा होगा कि सपने में भी जगाने आ गई वो नैन्सी!

शुक्र है कि शुक्रवार को बजरंगी भाई जान रिलीज़ होने को है। इस पागलपन में सैनिटी का थोड़ी-सी उम्मीद!    

Tuesday, July 14, 2015

अटकी हुई फ़िल्म स्क्रिप्ट - डे टू

हमें इन्सटेंट ग्रै टिफिकेशन की आदत पड़ी हुई है। डेडलाइन माथे पर नाचने लगे तो किसी न किसी तरह कुछ लिख दिया। किसी तरह ख़्यालों को एक स्ट्रक्चर दिया, और हो गई कहानियाँ, कविताएँ, लेख, विचार, कॉलम, ब्लॉग, वगैरह वगैरह तैयार। जितनी तेज़ी से लिख लिया, उतनी ही तेज़ी से उस लिखे हुए पर प्रतिक्रियाएँ भी हासिल हो गईं। लिखना फेसबुक स्टेटस मेसेज पर लाइक की कामना से आगे जाता ही नहीं कमबख़्त। लिखना बस इसलिए, क्योंकि जल्दी से जल्दी कोई बात कह देनी है किसी तरह।

जब हम लॉन्ग फॉर्मै ट में लिखने बैठते हैं तो यही सबसे बड़ी समस्या होती है। काम जब तक पूरा नहीं हो जाता, तब तक किसी को दिखाना संभव नहीं होता। हमारी तरफ से पूरा हो भी गया तो भी उसमें स्ट्रक्चर के बिखरे हुए होने का डर सताता रहता है। फेसबुक के स्टेटस मेसेज की तरह उसको हाथ के हाथ लाइक नहीं मिलते।

लॉन्ग फॉर्मैट भीतर ही भीतर हमें तन्हां करता रहता है, दुनिया से काटता रहता है, ख़ामोश रहने पर मजबूर करता रहता है। लॉन्ग फॉर्मैट सीखाता है कि हर छोटी-छोटी बात कहकर और उस पर प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार कर अपनी ऊर्जा मत ज़ाया करो। ये ऊर्जा बचाए रखो, क्योंकि अभी कई और ड्राफ्ट्स लिखे जाने हैं। अभी बहुत सारा काम और होना है।

कल मैंने भाई को मॉर्निंग पेज या डायरी लिखने की सलाह दी तो उसने बहुत अच्छी एक बात कही। ज़रूरी नहीं कि जो लॉन्गहैंड लिखता हो, या शब्दों का खेल समझता हो, उसका थॉट प्रॉसेस बहुत साफ-सुथरा ही होगा। हम कई बार अच्छा लिखने की बदगुमानी में verbose होते चले जाते हैं। सटीक, साफ-सुथरे ख्यालों का पता नहीं होता, बस शब्दों को सजाने-सँवारने के चक्कर में लगे रहते हैं। कई बार शॉर्टहैंड लिखना टू-द-प्वाइंट सोचने के लिए ज़रूरी होता है। और अपनी बात अच्छी तरह कम्युनिकेट करने के लिए भी। मुझे अचानक उसकी बात में बहुत दम नज़र आया। वाकई ज़्यादा लिखने के चक्कर में हम ज़्यादा शब्द ज़ाया भी करते हैं, और जो कहना होता है वो कह नहीं बाते। बीटिंग द बुश मुहावरा किसी राईटर के कॉन्टेक्स्ट में ही पैदा किया गया होगा।

ख़ैर, लॉन्गहैंड फॉर्मैट लिखने की एक समस्या ये भी है कि ज़्यादा-ज़्यादा लिखा जाता है लेकिन काम का बहुत कम निकल पाता है। स्क्रिप्ट लिखते हुए भी ठीक यही हो रहा है। एक सीन इतना लंबा और बोरिंग हो जाता है कि ख़ुद ही कोफ़्त होने लगती है। वही बात इशारों में, या किसी एक छोटे से एक्शन के ज़रिए भी तो कही जा सकती है। कहानीकार होने और स्क्रिप्टराईटर होने में यही अंतर है।

मैं जिस चीज़ से परेशान हूं उसे अपने लर्निंग प्रोसेस की सीढ़ियां क्यों नहीं मान लेती? ऐसे कितने राईटर होंगे जिन्हें एक साथ कई किस्म की चीज़ें कई तरह के फॉर्मैट में लिखने का मौका मिल रहा होगा? मैं ख़ुशनसीब हूं कि मैं एक ही दिन में किसी बड़े उपन्यासकार की रचना एडिट कर रही होती हूँ, वेब के लिए कॉन्टेन्ट लिख रही होती हूँ, किसी किताब का अनुवाद कर रही होती हूं, किसी टीवी चैनल के प्रोमो के लिए स्क्रिप्ट लिख रही होती हूं, किसी अंग्रेज़ी वेबसाइट के लिए अगले कॉलम के आईडिया सोच रही होती हूँ और उसके साथ-साथ अपने लॉन्ग फॉर्मैट के साथ संघर्ष भी कर रही होती हूँ। हर बार लिखना - ख़राब या अच्छा, शॉर्ट या लॉन्ग, संभला हुआ या बिखरा हुआ, अपने लेखन को मांजने का ज़रिया क्यों नहीं हो सकता? लिखने के साथ इतना सारा रोमांस जोड़ देने की इजाज़त मुझे है क्या?

और अगर है, तो उस रोमांस को बचाए रखना भी मेरा ही काम है। लिखना अब मेरे लिए रोमांस रहा नहीं, वो कई सालों की शादी हो गई है जो बस है - दिन-रात, आजू-बाजू, भीतर-बाहर.... वजूद का एक अकाट्य हिस्सा, जिसके लिए लॉयल्टी में ही चैन है। अपनी तमाम उलझनों और कोफ़्त के बावजूद। उस रिश्ते में कुछ एक्साइटिंग करने की बेमानी और नाजायज़ ख़्वाहिश के बावजूद। इसलिए क्योंकि लॉयल्टी में सुख है। जिन्होंने लेखन को रोमांस बनाकर उसे बचाए रखा, जिलाए रखा और उसमें ज़िंग डालते रहे, वो ऊबते रहे, डूबते रहे। मेरे लिए लेखन शादी ही ठीक। टेढ़ा है, मगर मेरा है। बोरिंग है, लेकिन फिर भी मेरा है। एकरस है, फिर भी मेरा है। रुलाता है, थकाता है, मगर फिर भी मेरा है। इसलिए हर सुबह और शाम इस शादी के लिए ख़ुद को दुरुस्त बनाए रखना है, मेहनत करते रहनी है। जो कई सालों से शादी-शुदा है, वो जानता है कि एक रिश्ते को सुकूनदायक बनाए रखना कोई हँसी-ठठा नहीं। शादी लाइफलॉन्ग है। लिखना कई जन्मों के आर-पार से होते हुए हर जन्म में पाल लिया गया वही लाइफलॉन्ग फितूर है।

इसलिए निजात है नहीं अनु सिंह। किसी भी तरह से नहीं। रोकर-धोकर, तमाम सारी शिकायतें करके भी बस ये समझ लो कि लिखना रोमांस नहीं है। लिखना जीने की ज़रूरत है। इसलिए खाली पन्ने निहारते रहने और लिखने को रोमांटिसाइज़ करते रहने से अच्छा है कि हर रोज़ ख़राब या अच्छा, जैसा भी हो लिखा जाए।

आज की डेडलाइन क्या है, देखो तो ज़रा।

आज की चुनौतियां? ब्रिंग इट ऑन, वर्ल्ड!

Monday, July 13, 2015

अटकी हुई फ़िल्म स्क्रिप्ट - डे वन

दिनभर लिखती रहती हूँ - कभी किसी के लिए, कभी किसी के लिए। काम अब सिर्फ़ शब्दों का खेल हो गया है। इसलिए कहानियाँ गायब हो गई हैं, शब्द बचे रह गए हैं।

एक थकन सी तारी रहती है इन दिनों। टीएसएच लेवल बहुत बढ़ा हुआ है। जी में आता है, रोती रहूँ। लेकिन रोने की भी फ़ुर्सत नहीं। दिन हरसिंगार की डाल है तो डेडलाइन वो अजगर जो उस डाल की जान ही नहीं छोड़ता। माली को फिर भी उम्मीद है कि मौसम बदलेंगे। पेड़ों से पत्ते झर-झरकर गिरेंगे जिस रोज़, उस रोज़ अजगर किसी और डाल का रास्ता अख़्तियार करेगा। या कोई सँपेरा ही कहीं आ जाए कहीं से। काबू में अजगर भी होगा एक दिन, डेडलाइन का डर भी।

तब तक एक बोझिल गर्दन पर जलती आँखें और तपता माथा कायम रहे, यही उम्मीद है।

कोहिनूर की कहानी आंतों में जाकर अटक गई है कहीं। ग़म के क़िस्से लिखना आसान है। हँसी और मज़ाक से कहकहे ढूंढ निकालने के बहानों के लिए लिखना बहुत मुश्किल। वो भी, कहानी अगर बच्चों की ज़ुबां में कहनी हो तो...

इन दिनों यही सोचती रहती हूँ कि बच्चे अपने आस-पास के लोगों को किस तरह देखते हैं, उनके बारे में क्या सोचते हैं, उनके भीतर क्या डिस्ट्रक्टिव और क्या कन्सट्रक्टिव है, रिबेलियन की भावना पहली बार कब और क्यों आती है, वो कौन-सी वाइब होती है जो एक खूंखार दिखनेवाले इंसान की बेतरतीबी उन्हें बहुत आसानी से जोड़ देती है जबकि एक शांत दिखनेवाला, दुनिया की नज़र से सफल और क़ायदे का इंसान उन्हें बिल्कुल रास नहीं आता। बच्चों के लिए मुमकिन क्या है और असंभव की परिभाषा क्या है?

दस सीन के इर्द-गिर्द ही घूम रही हूं पिछले कितने दिनों से। कहानी आगे बढ़ने से इंकार कर रही है। कहती है, पहले जितना बनाया है, उसे अच्छी तरह तैयार तो करो, उससे संतुष्ट तो हो जाओ। भीतर का एडिटर नुक्ताचीं करता रहता है। बाहर का दबाव लिखने से रोके रहता है। अजीब सी हालत है। न हरसिंगार के पत्ते झड़ने का नाम ले रहे हैं, न अजगर किसी और चंदन की तलाश में निकलने को तैयार है।

फिर भी ये उम्मीद है कि कहानी एक न एक दिन ख़ुद को कह ही डालेगी। फ़िल्म की स्क्रिप्ट लिखने का हुनर भी एक न एक दिन आ ही जाएगा।

Saturday, May 2, 2015

भटकना बेसबब, रिपोर्ट काठमांडू से


एयर इंडिया की जिस फ्लाईट में मैं हूं, उसमें तीन तरह के लोग हैं – अपने घर की ओर जा रहे नेपाली नागरिक, देशी-विदेशी राहत एजेंसियों के लोग और पत्रकार। काठमांडू जाने की कोई और चौथी वजह नहीं हो सकती। काठमांडू के रनवे पर क्रैक की ख़बर आई है, इसलिए विमान में बिठा दिए जाने के बाद भी हमें रोक दिया गया है। हम ये भी नहीं जानते कि अगले दो घंटे में हम काठमांडू में होंगे या नहीं।

मेरी बगल की सीट पर बैठे बुज़ुर्ग की आँखें जितनी ही ख़ामोशी से दुआ में बंद हैं, उतना ही ऊंचा शोर उंगलियां प्रेयर बीड्स पर मचा रही हैं। हिम्मत नहीं हो रही पूछने की, सब भूकंप में चला गया या बाकी भी है कुछ?


काठमांडू में उतरते ही जो बाकी रह गया, वो दिखने लगता है। चारों ओर राहत का सामान बिखरा पड़ा है। एक कार्गो विमान अभी-अभी उतरा है। कोई नाम नहीं लिखा, इसलिए बताना मुश्किल है, लेकिन राहत सामग्री पर रेड क्रॉस के लेबल चिपके हैं। अलग-अलग देशों की सेना के विमान हैं। भारतीय वायुसेना के भी। सब अपने-अपने घेरों में सामान उतार रहे हैं। कन्वेयर बेल्ट पर भी काग़ज़ के गत्तों और कार्टूनों में लिपटे सामान दिखाई देते हैं – दवाएं, मच्छरदानियां, स्लीपिंग बैग्स। चार दिन पहले आए भूकंप की वीरानी हर कोने में पसरी है। एयरपोर्ट पर नेपाली कस्टम अधिकारी कम हैं, अलग-अलग देशों और राहत एजेंसियों के डेस्क ज़्यादा हैं।


आज काम पर लौटा हूं। कहीं मन नहीं लग रहा। मेरा घर भक्तापुर में है। उधर सब खतम हो गया। पूरा घर गिर गया। मां बीमार है। बेटी उधर तराई में है। बार-बार फोन करके पूछती है कि कैसा है हमलोग। उसको क्या बोलेंगे? क्या बताएंगे? समझ में ही नहीं आ रहा करें क्या... सब खतम हो गया, मुझे लेने पहुँचे ड्राईवर कुमार भगत ने मेरे एक सवाल के जवाब में इतनी लंबी बात कह डाली है।


एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही धँसी हुई सड़क है। भूकंप की वजह से, ड्राईवर बताता है। शहर की तासीर में एक अजीब-सी बेचैनी घुली है। गाड़ियों पर लदे ढेर सारे लोग हैं। मुमकिन है मेरा वहम है, लेकिन सब भागते दिखाई दे रहे हैं।


न्यू बानेश्वर तक पहुंचते-पहुंचते वहम यकीन में बदल जाता है। कई किलोमीटर लंबी कतार में अपने अपने सामान के साथ खड़े लोग वाकई काठमांडू से भाग रहे हैं – तराई की ओर, अपने गांवों की ओर, हिंदुस्तान की ओर... अख़बारों में छपे आंकड़े बताते हैं कि तकरीबन चार लाख लोग राजधानी छोड़कर जा चुके हैं।


शहर में जगह जगह गिरी इमारतों को देखकर लगता है कि इंसानों के साथ-साथ इंसानों की बनाई दुनिया की भी अपनी-अपनी किस्मत होती है। एक जगह एक घर पूरा का पूरा ढहा पड़ा है तो उसके ठीक बगल वाली इमारत साबुत खड़ी है। यूं लगता है कि जैसे कुदरत ने बच्चों का खेल खेला। जहां गिर पड़ा, वहां अपना हथौड़ा चलने दिया।


आर्मी बेस रिलीफ़ कैंप


शहर के ठीक बीचोंबीच बने इस राहत शिविर में घुसते ही एक वैन दिखाई देता है। प्लास्टिक बोतलों में पीने का पानी बांटा जा रहा है। कॉलेज के कुछ बच्चे हाथों में केले और पानी बोतलें लिए तंबुओं के बाहर खेलते बच्चों को बांट रहे हैं। किरण गौतम अपने पूरे परिवार के साथ यहां है। लगन में जिस तीन-मंज़िला मकान को बनाने में दो पीढ़ियां लग गईं, उस मकान को ढहने में ठीक एक मिनट का वक्त लगा। टेंट के बाहर किरण का चार साल का पोता खेल रहा है। घर के बाकी लोग यूं ही इधर-उधर लेटे हुए हैं। किसी से कुछ भी पूछना बेकार है। वो बताएंगे क्या, मैं पूछूंगी क्या। भूकंप ने जान बख़्श दी तो रही-सही उम्मीद ज़िन्दगी बख़्श ही देगी।       


धरहरा स्मारक


विकास शर्मा की दुकान है धरहरा से दस कदम दूर। हिलती हुई इमारत गिरी तो दूसरी ओर। जिन घरों और दुकानों पर इमारत गिरी, उनका क्या हुआ होगा, ये विकास न भी बताएं तो इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं। धरहरा के आस-पास की दुकानें खुल गई हैं। जो मकान बच गए हैं, उनमें ज़िन्दगी का कारोबार शुरू हो गया है। पांच दिन पहले तक सैलानी दो सौ दस फ़ीट ऊँचे इस टावर पर चढ़कर काठमांडू घाटी का नज़ारा देखने आया करते थे। अब गिरे हुए टावर को देखने के लिए भीड़ जमा है, वो भी इस कदर कि बाहर तक की सड़कों पर जाम लग गया है।   


काष्टमंडप और बसंतपुर दरबार स्कावयर  


लकड़ी के बने जिस मंडप के नाम पर काठमांडू का नाम पड़ा, वो मंडप, राजा के पुराने महल और मंदिर धराशायी पड़े हैं। काष्टमंडप के आंगन में धंसी हुई इमारत से थोड़ी दूर लोग तंबुओं में रह रहे हैं। इलाके की सफाई करने के लिए नेपाली पुलिस और सेना की मदद के लिए सैंकड़ों वॉलेंटियर जुट गए हैं। ईटें और लकड़ी के टुकड़े साफ किए जा रहे हैं। धीरे-धीरे जगह साफ करना मुमकिन है, इन ऐतिहासिक इमारतों को वापस खड़ा करना नामुमकिन।  


गन्गाभू


न्यू बस पार्क से थोड़ी दूर एक गली में गेस्ट हाउस के बाहर भारी भीड़ जमा है। अमेरिकी बचावकर्मी नेपाली सेना के साथ अभी भी कुछ खोज रहे हैं। भीड़ हटने के नाम नहीं लेती। उम्मीद बाकी है कि पांच दिन के बाद भी मलबे में फँसा एक आदमी ज़िंदा निकाला जा सकेगा। उम्मीद नामुमिकन पर भारी पड़ी है। १४४ घंटे के बाद भी ज़िंदा निकला है एक आदमी यहां से। भीड़ तालियों से उसका स्वागत करती है। दूर से इस चमत्कार की तस्वीर नहीं खिंची जा सकती, लेकिन एंबुलेंस की तस्वीर सैंकड़ों लोग अपने अपने मोबाइल कैमरों में क़ैद कर रहे हैं। 


स्वयंभू मंदिर  


पहाड़ के ऊपर बने इस बौद्ध मंदिर से पूरा काठमांडू दिखता है। मंदिर में विदेशी सैलानियों की एक छोटी सी टुकड़ी अभी भी मौजूद है। वे मंदिर देखने नहीं आए, मंदिर को पहुंची क्षति को देखने आए हैं। ऊपर पहाड़ पर मंदिर के आस-पास दो सौ से ज़्यादा लोग रहते थे। उनकी आमदनी का ज़रिया मंदिर ही था। उर्मिला का मकान और दुकान – दोनों मंदिर के पास था। दोनों में से कुछ भी नहीं बचा। जिस ईश्वर ने कहर ढाया, उसी ईश्वर के टूटे-फूटे आंगन में उर्मिला और उसके बच्चों ने शरण ली है। ऊपर से बोरों में भरकर ज़रूरत का सामान टूटे हुए घर से नीचे लाने की नामुमकिन कोशिश जारी है। खाना सब साथ मिलकर मंदिर में ही बना रहे हैं। पेट किसी तरह भर रहा है, भरा हुआ दिल भर किसी सूरत में खाली नहीं होता।  


सीतापायला


स्वंयभू से आते हुए मेन रोड पर ही गिरे हुए मकान दिखते हैं। उधर से गुज़रने वाली बसें और गाड़ियां भी अपनी रफ़्तार धीमी कर लेती हैं, जैसे शोक में हों। दूसरी ओर नेपाली सेना की एक टुकड़ी का जमावड़ा लगा है, लेकिन जवान किनारे खड़े हैं। और जगहों की तरह कोई मलबे में से कुछ भी खोजने की कोशिश नहीं कर रहा। कुछ लोग ज़रूर सामान ढूंढने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं। कहीं से टूटा हुए चूल्हा झांक रहा है तो कहीं से टूटी हुई चप्पलें। मलबे से इतनी तीखी दुर्गंध आ रही है कि एक पल के लिए भी खड़े रहना मुश्किल है। इन चार मंज़िला इमारतों में से ३९ लाशें निकाली गईं। जो ज़िंदा बचा रह गया, उसके लिए कुछ भी बाकी नहीं रहा। 


पशुपति मंदिर


बागमती के किनारे जलती लाशों को देखकर ज़िन्दगी के सारे दुख छोटे लगते हैं। तीन दिन पहले तक यहां सैंकड़ों लाशें एक साथ जल रही थीं। आठ चिताएं अभी भी सुलग रही हैं। मरने वाले शायद भूकंप पीड़ित न हों, लेकिन उनकी मौत का मुकर्रर वक्त मुश्किल साबित हुआ है। लकड़ियां अभी भी मुश्किल से मिलती हैं। जो मिलती भी हैं, बारिश की वजह से गीली पड़ी हैं। जो शरीर बेजान हो गया, उसे किसी सूरत में संभाला नहीं जा सकता। इसलिए हर हाल में चिताएं सजा ही जाती हैं। मौत किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं करती। जो ज़िंदा हैं, वे करते हैं। यहां घाट भी दो हैं – एक वीआईपी घाट और दूसरा आम जनता के लिए। कौन जाने कि भूकंप ने पूछकर जानें लीं या नहीं। मंदिर में भीड़ नहीं है। अपने ही तांडव से पाशुपति अपने घर के कुछ हिस्से भी नहीं बचा पाए वैसे। मुख्य मंदिर सुरक्षित है, लेकिन भूकंप का असर वृद्धाश्रम और बाहर की इमारतों पर साफ दिखाई पड़ रहा है।    


सड़क पर स्टूडियो


कांतिपुर टीवी का न्यूज़रूम इन दिनों सड़क पर से चल रहा है। पूछताछ करने पर मालूम चलता है कि दफ्तर की इमारत के गिरने का डर था, इसलिए स्टूडियो और न्यूज़रूम सड़क पर एक तंबू में डाल दिया गया। हालांकि कांतिपुर पब्लिकेशन्स के लोग अभी भी उसी दफ्तर से काम कर रहे हैं। टीवी ड्रामा ढूंढता है, और सड़क पर स्टूडियो ले आने से बड़ा ड्रामा और क्या होता? इंसान हर सूरत में तिजारत के बहाने निकाल ही लेता है। 


जीना यहां, मरना यहां


नेपाल रेड क्रॉस के दफ्तर में गाड़ियों और लोगों का हुजूम जुट रहा है। पूरी दुनिया से रेड क्रॉस प्रतिनिधि पहुंच रहे हैं यहां। दफ्तर के भीतर एक रजिस्ट्रेशन डेस्क पर वॉलेंटियर की भीड़ जुटी है। अशोक महरजान अपने परिवार के २२ लोगों को लेकर पहुँचे हैं यहां, वॉलेंटियर करने के लिए। सोलह से लेकर पचास तक की उम्र के लोग हैं। सबके घर टूट गए। शुरू के चार दिन अपने आप को संभालने में लग गए। घर का ज़रूरी सामान जमाकर राहत शिविर में पहुंचाया जा चुका है तो अब परिवार निश्चिंत होकर दूसरों की मदद के लिए यहां पहुंचा है। मानवता के नाते यहां आए हैं। आखिर तो हम सब मुसीबत में हैं। पूरा देश मुसीबत में है, अशोक इतना ही कहते हैं और वापस अपनी बेटी और भांजे के साथ कतार में लगकर ट्रकों में से राहत सामग्री के डिब्बे उतारने में लग जाते हैं। जो ज़िन्दगी बची रह गई, वो किसी के काम आ सके – बस इसी की ख़ातिर।


नोट – काठमांडू में भूकंप से कुल 1,039 मौत हुई है। पिछले पांच दिनों में चार लाख से ज़्यादा लोग काठमांडू छोड़कर जा चुके हैं। पानी की बोतल अब भी दस रुपए में ही मिल रही है, और होटलों में जो भी खाने को मिलता है, उसकी कीमत अभी तक नहीं बढ़ी। जब भूकंप ने पक्षपात किया, तो इंसान भी कैसे बाज़ आता? ये काठमांडू का सुरक्षित इलाका है, जहां ज़िन्दगी अपनी गति पकड़ने लगी है। काठमांडू में कई प्रभावित इलाके ऐसे हैं जहां पीने के पानी, खाने, टॉयलेट और मूलभूत स्वास्थ्य सुविधाओं की सख़्त ज़रूरत है।    


( ये रिपोर्ट सबसे पहले www.satyagrah.com पर प्रकाशित हुई।)