Saturday, December 31, 2011

गुज़रे हैं लाख बार इसी कहकशां से हम

ये बेरहम साल भी गुज़र गया आख़िर। मनीष पिछले दस दिनों से कहते रहे, हाथी निकल गया है, दुम भी निकल जाएगी। वाकई हाथी जैसा ही था ये साल - मंथर चाल, मदमस्त जिसपर किसी का वश ना हो। वश यूं भी लम्हों, दिनों, सालों पर किसका होता है? जाने ये चित्रगुप्त महाराज किस देश में बैठते हैं और मालूम नहीं कैसी कलम हाथों में है उनके कि नियति की लिखाई हर रोज़ हैरान कर देनेवाली होती है। मिलेंगे कभी तो पूछुंगी, थकते नहीं? ज़रूरी है शख्स-शख्स की सांस-सांस के लिए कुछ नया लिख दिया जाए?

2011 में चित्रगुप्त का काम थोड़ा आसान कर दिया, अपने करम की कुछ लिखाई अपने हाथों से भी हुई। अब जब जायज़ा लेने बैठी हूं तो कटे-फटे, उलझे हर्फों में हिज्जों की एक हज़ार अशुद्धियां दिखाई देने लगी हैं। कोई अक्षर सही नहीं लगता, कोई वाक्य सीधा नहीं पड़ता। लेकिन मैं एक ज़िद्दी, अड़ियल और घमंडी किस्म की लड़की हूं। महाराज चित्रगुप्त से माफ़ी मांगते हुए अपनी लिखाई और उसकी गलतियों से ली गई सीख यहां दुहरा रही हूं, प्वाइंट बाई प्वाइंट।

1. पूरी दुनिया को ख़ुश रखने की कोशिश मत करो। सब अपनी खुशी ढूंढ लेंगे, तुम ये देखो कि तुम्हारी खुशी कहां बसती है।

(वस्ल-ए-दुश्मन की ख़बर मुझसे अभी कुछ ना कहो/ठहरो ठहरो मुझे अपनी तो ख़बर होने दो)


2. हक़ीकत क्या है और भ्रम क्या, इसमें मत उलझो। ये सबकुछ तुम्हारे लिए रचा गया है, बेहतर होगा कि अपना पात्र अच्छी तरह निभाया जाए और दोज़ख़ में जाते-जाते सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री का तमगा हासिल करने के लिए भी जान ना गंवाई जाए।

(रोते-धोते जी को जलाते मंज़िल-ए-शब तक आ पहुंचे/चेहरे पर है दर्द-ए-तमन्ना दिल पर गहरा दाग़ लिए)


3. ज़िन्दगी बार-बार मौके नहीं देती। ना दिया करे, ज़िन्दगी कोई रास्ता भी नहीं बंद करती।

(मुन्तज़िर है एक तूफ़ान-ए-बला मेरे लिए/अब भी जाने कितने दरवाज़े हैं वा मेरे लिए)


4. बिस्तर पर लेटकर गर्म, उमस भरी रातों में पंखे के चक्कर गिनने से बड़ी सज़ा कुछ नहीं हो सकती। लेकिन सज़ा कट ही जाती है, रात ढल भी जाती है।

(ता फिर ना इंतज़ार में नींद आए उम्र भर/आने का अहद कर गए आए जो ख़्वाब में)


5. सेहत सबसे बड़ी नेमत है। अपनी सेहत का ख़्याल इसलिए रखो कि जबतक सांसें हैं, तबतक तो 'Esc' बटन दबाने की गुंजाईश नहीं बचती।


(चारागरी बीमारी-ए-दिल की रस्म-ए-शहर-ए-हुस्न नहीं/वर्ना दिलबर-ए-नादां भी इस दर्द का चारा जाने है)


6. ढेर सारा पैसा सारी परेशानियों का हल नहीं होता, परेशानियां से जूझना आसान ज़रूर कर देता है। मां-बाप ने रिश्तों में निवेश करना सिखाया था, गोल्ड एसआईपी, म्युचुअल फंड्स और स्टॉक मार्केट में नहीं। लेकिन अपनी ज़िन्दगी जीने के क्रम में हम कुछ चीज़ें सीखते हैं तो कुछ चीज़ें अनलर्न भी करते हैं।

(ज़ौफ़ में ता नए अग़ियार का शिकवा क्या है/ बात कोई सर तो नहीं है कि उठा भी ना सकूं)

7. किसी को मसीहाई नहीं आती। किसी के पास किसी समस्या का कोई समाधान नहीं है। सब अपने में उलझे हुए हैं, इसलिए उम्मीद मत करो।

(दश्त-ए-तन्हाई ये हिजरा में खड़ा सोचता हूं/हाय क्या लोग मेरा साथ निभाने निकले)


8. चमत्कारों की मियाद बहुत छोटी होती है। उसके बाद वही हर रोज़ की जद्दोजेहद है, वही उतार-चढ़ाव है और वही टूटे-बिखरे दिन हैं। उन्हें संभालना सीखो, फिर हर रोज़ कमाल होगा।

(अभी बरसेंगे हर तरफ़ जलवे/तुम निगाहों का एहत्माम करो)


9. प्यार करो, ढेर सारा प्यार - जीवन साथी से, बच्चों से, मां-बाप से, भाई-बहन-दोस्तों से। प्यार संजीवनी बूटी नहीं होता, लेकिन मरहम होता है।

(अब और किस तलाश में बेचैन है नज़र/कुदरत तो मेहरबान है दरियादिली के साथ)

10. ख़्वाबों की बंजर ज़मीं को अपने आंखों के पानी से सींचते रहो। ना जाने कौन सा अंकुर कहां फूटे, ना जाने कहां की हरियाली तुम्हारा बियावां गुलज़ार कर दे।

(सुनते हैं कि मिल जाती है हर चीज़ दुआ से/एक रोज़ तुझे मांग के देखेंगे ख़ुदा से)


11. कुछ नामुमिकन नहीं होता। कुछ भी नहीं।

(जवाब जिनका नहीं वो सवाल होते हैं/जो देखने में नहीं कुछ, कमाल होते हैं)


12. चित्रगुप्त ने जो लिखा, ठीक ही लिखा। लड़ना-भिड़ना छोड़ो और जीने का सलीका सीखो।

(अब किसी से क्या कहें इक़बाल अपनी दास्तां/बस ख़ुदा का शुक्र है, जो भी हुआ अच्छा हुआ)

और साल का आख़िरी दिन महबूब जगजीत सिंह के नाम।

7 comments:

Manoj K said...

जाते साल और आते हुए नए वाले कि लिए इससे बढ़िया सौगात नहीं होगी... आनन्द आया पढ़कर..

खासकर - नामुमकिन कुछ नहीं होता !

दीपक बाबा said...

@ चित्रगुप्त ने जो लिखा, ठीक ही लिखा। लड़ना-भिड़ना छोड़ो और जीने का सलीका सीखो।

जी कोशिश रहेगी...

यहाँ भी जीवन दर्शन... अलग सा

प्रवीण पाण्डेय said...

जिस पल समझ आये, जीना प्रारम्भ कर दें..

आशुतोष की कलम said...

पहली बार आना हुआ इस ब्लॉग पर बहुत अच्छा दर्शन...
जगजीत जी की आवाज में एक बहुत उम्दा ग़ज़ल.....
"आओ मिल कर इंकलाबी ताज़ा तर पैदा करें...
दहर पर इस तरह छा जायें की सब देखा करें"

Rahul Singh said...

अब तो काफी दुरुस्‍त है नोक-पलक.

Arvind Mishra said...

अभी तक तो सुना देखा था कि वो जनाब ग़ालिब ही थे जिनका अंदाज़े बयाँ ही और था....मगर आज कोई और भी है यह बात पुख्ता हो गयी है ..नए वर्ष की सपरिवार हार्दिक शुभकामनाएं!

sushma 'आहुति' said...

बेहतरीन अंदाज़..... सुन्दर
अभिव्यक्ति.........नववर्ष की शुभकामनायें.....