Friday, December 16, 2011

बोर हो जाओ तो सोचो मत, काफ़िया मिलाओ

ये कमबख़्त दिल्ली की सर्दी भी जानलेवा चीज़ है। जो मर ही जाऊं और बहार आ भी जाए तो क्या। पिछले दो दिनों से माइग्रेन से जूझने के हर मुमकिन उपाय कर लिए - स्टीम ले लिया, हॉट वॉटर बैग सिर पर बांधकर सोई, मरी हुई धूप में जान डालने की कोशिश में पार्क गुलज़ार किया, कोई पेनकिलर नहीं छोड़ा। राहत ना मिलनी थी, ना मिली।

सिर दर्द जितना परेशान नहीं कर रहा, कुछ ख़्याल कर रहे हैं। कुछ बेचारे-से आवारा लावारिस रिश्तों के मर जाने से जुड़े हुए ख़्याल। संवाद टूट जाने, आवाज़ के बंद हो जाने और कुछ कह ना पाने के डर से जुड़े हुए ख़्याल। रिश्तों की वजह क्या होती है? निस्बत कब और कैसे पैदा हो जाती होगी? कैसे दो अजनबी ज़िन्दगी के किसी चौराहे पर मिलते होंगे और भ्रम में ही सही, दो कदम उलटी राह पर चल देते होंगे थोड़ी देर साथ होने के लिए? जो अपनी मंज़िल का ख़्याल आ गया तो क्या? जो रास्ते में कुछ हासिल ना होने की समझदारी ने दिल पर काबिज़ कर लिया तो? और फिर हम सब तो सभ्य समाज के ज़िम्मेदार नागरिक भी हैं। ये ज़िम्मेदारियां ही ले डूबेंगी एक दिन।

स्थायी क्या होता है - कुछ नहीं, सिवाय उन लम्हों के जो गुज़र गए, जिन्हें हम जी चुके, जो रिकॉर्ड हो गए कहीं। गुज़रा हुआ ही सच है और मैं गीता नहीं पढ़ती। मैं गुज़रे हुए में जीती हूं क्योंकि सच वही है। बाकी आनेवाला कल तो अंदेशों और उम्मीदों के बीच के दो खंभों के बीच तनी हुई रस्सी पर चलने जैसा है।

हम रिश्तों की मियाद की बात कर रहे थे। ये भी कहां तय होता है? यहां भी सच इतना ही है कि जो जिया, जैसे जिया, वही सच था। जिस वक्त तुम्हें सोचने से डरने लगी, वहां से नया सच शुरू हो गया। इन ख़्यालों का मोल नहीं है। इनसे अच्छी कहानियां गढ़ी जा सकती हैं, पोस्ट लिखे जा सकते हैं, थोड़ी-सी वाहवाहियां हासिल की जा सकती हैं और क्रिएटिव होने के दंभ को बचाए रखा जा सकता है। इससे ज़्यादा कुछ नहीं।

बाकी, ये भी सच है कि फटते हुए सिर पर कहां कोई हाथ होता है। ये भी सच है कि ठंडी, सर्द रातों को नरमी बच्चों की हथेलियों से ही मिलती है और ये भी सच है कि सुबह गुज़रे हुए कल का सच घूमकर देख लूंगी पल दो पल को और फिर वही तनी हुई रस्सी है, वही झूठ है और फ़रेबी रिश्ते हैं।

हद है। अव्वल दर्ज़े की बोरियत की निशानी है ये मोनोलॉग। बचपन में अकेले खेलनेवाले एक खेल से फिर अंधेरा भर लिया है आज। बोर हो जाओ तो काफ़िया मिलाओ। जो बन गया, बेढ़ब, बेसलीका, बेशऊर ही सही, सच ही होगा कोई। 



मुझे तरतीब की कोई सीख ना दे मेरे रक़ीब
सलीके से कहीं कोई आंधी बुलाई जाती है?

नहीं आती मुझे निस्बत की शर्तें, ठीक है,
मगर शर्त पर कैसे मोहब्बत निभाई जाती है?

बेहिस और बेहरकत जो मरता और जीता है
उस दिल से पूछोगे ज़िन्दगी कैसे पाई जाती है?

नशेमन में नहीं जिसके कहीं कोई झरोखा भी
एक दीद की उम्मीद फिर कैसे बनाई जाती है?

चलो हमने कहा 'अनु' पेशानी यूं ना तानो तुम
आईने को कैसे तस्कीन शक्ल दिखाई जाती है?

9 comments:

देवेन्द्र पाण्डेय said...

इसे पढ़कर जान लिया अब हमने भी
सलीके से गज़ल कैसे पढ़ाई जाती है।

प्रवीण पाण्डेय said...

ठंड से विचारों की गर्मी ही बचा पायेगी, लगता है।

Arvind Mishra said...

एक रकीबः (रकीब का स्त्रीलिंग ) का तो आत्मालाप नहीं लगता यह -हाँ अतिशय अतीतजीविता खतरनाक है -टेक केयर !

Puja Upadhyay said...

Love it. Love it. Love it. कहाँ से कौन सी लाइन उठा कर कहूँ कि ये वाली मेरी सबसे फेवरिट है...सब एक से एक अच्छी हैं.

sushma 'आहुति' said...

बेहतरीन...

Arvind Mishra said...
This comment has been removed by the author.
Arvind Mishra said...

काफिया काफी पिलाने का भी हो सकता है -


एक काफी कथा......

Arvind Mishra said...

अरे हाँ ,ग़ज़ल की तारीफ़ ही भूलता गया हर बार ..मगर वह तो बिना कहे ही

अनूप शुक्ल said...

माइग्रेन का दर्द भयानक होता है।

कुछ और दर्द शायद इससे भी ज्यादा बीहड़ होते हैं। उनका बयान करती हुयी से पोस्ट!

बस अन्दाज है यह!