Friday, December 9, 2011

लाइफ़ इज़ अ डर्टी पिक्चर, माई फ्रेंड

हम चांदिवल्ली स्टूडियो में शूट कर रहे थे। वहां दो-चार सीरियलों की भी शूटिंग चल रही थी जिनमें एक बालाजी का सीरियल था। सीरियल के लीडिंग रोल में जो लड़की थी, उसे मैं कम पहचानती थी। मां की भूमिका निभानेवाली इस एक्ट्रेस को ज़रूर देखा था कई फिल्मों और सीरियलों में। प्रोडक्शन में होने का एक फायदा था, लंचब्रेक में हमें खाना आख़िर में ही सही, गर्म रोटियों के साथ मिलता था और कई बार इन रोटियों जैसी ही सींकी हुई, गर्म गॉसिप का पूरा डोज़ भी खाने का ज़ायका चटपटा बना देने के लिए आ जाया करता था।

मां के रोल में करीब-करीब मशहूर एक्ट्रेस के बारे में सबसे ज़्यादा कहानियां सुनने को मिलतीं। मैं हैरान। कैमरे के सामने जाते ही कैसे इनकी शक्लें बदल जाया करती हैं! ऐसे ही लोगों से प्रभावित होकर हमारी मांएं सीरियल देखते हुए न्याय-अन्याय की दुहाई देंगी!

एक दिन स्माइल एक्सचेंज करने का नतीजा हुआ कि अगली सुबह वो मुझसे मेरे हाथ में मौजूद किताब के बारे में पूछने आ गईं। मैं उनकी शक्ल के पीछे का चेहरा देखने की कोशिश करती रही, बेटी महमूदी की 'नॉट विदाउट माई डॉटर' पर दिया गया जवाब बहुत संतोषप्रद नहीं था। शाम को हम फिर ग्रीन रूम के बाहर टकरा गए, और हमने बातचीत शुरू कर दी। बाईस साल से फिल्मों में काम कर रही थीं वो।

'रिग्रेट्स?'

'नन।'

'परिवार?'

'दो बार तलाक के बाद तीसरी बार घर बसाने की कोशिश नहीं की।'

'लोनलिनेस?'

'यू हैव द बिगेस्ट वेपन। ऐज़ लॉन्ग ऐज़ इट वर्क्स, यू विल नेवर बी लोनली।'

मैं कान खुजा रही थी, क्या सही सुना था?

'हाउ ओल्ड आर यू?'

'ट्वेंटी टू।'

'आई विल टेल यू समथिंग अबाउट मेन। दे वॉन्ट टू गो टू एक्ज़ैक्ट्ली वेयर दे कम फ्रॉम। ऑल ऑफ देम।'

'द डर्टी पिक्चर' देखते हुए मुझे ग्रीन रूम के बाहर हुई वो टूटी-फूटी बातचीत याद आती रही, जो मेरे लिए फीमेल सेक्सुएलिटी पर सबसे बड़ा और क्रूड सबक था। रेशमा या सिल्क ही उस 'बिगेस्ट वेपन' का इस्तेमाल करना नहीं जानती, अलग-अलग रूपों और तरीकों से वॉर और पीस के हालातों में सेक्सुएलिटी का इस्तेमाल किया जाता रहा है - कभी अपनी रियासतें, कभी रिश्ते, कभी रंजिशें बचाए रखने के लिए। फिर भी शराफत आमतौर पर जिन लोगों की जागीर है, वे खुलेआम शरीर की बात नहीं करते, भले सबसे ज़्यादा शरीर के बारे में ही सोचते हों।

औरतों को तो शिक्षा ही शरीर को मंदिर बनाए रखने की दी जाती है। लज्जा (modesty) और शुचिता (chastity) जैसे सबक औरतों को ही सिखाए जाते रहे। ये बात और है कि पर्दे के पीछे, घरों की चहारदीवारियों में, बंद कमरों में, इच्छा-अनिच्छा से सबसे ज़्यादा यही शरीर और सबक रौंदे जाते हैं। जो छुपकर हुआ तो सही। जो खुलेआम किया तो अश्लील, चरित्रहीन और निर्लज्ज कहलाई जाओगी। इसके बारे में बात करना तो सबसे बड़ी वर्जना। लिख दिया तो गुनाह कर दिया।

कट टू डिबेट कॉम्पिटिशन, जिसकी जज थी मैं आज। विषय - वूमेन एम्पावरमेंट - ए मिथ। ये भी कोई बहस का विषय है? जाने क्यों वेपन वाली बात फिर याद आई है। बच्चों के सामने कैसे कहूं? एम्पावर्ड और वल्नरेबल, दोनों महसूस करने का ये कैसा तरीका है?

12 comments:

Arvind Mishra said...

पोस्ट के पहले पैराग्राफ पढ़ते हुए अचानक उभरा एक विचार स्फुलिंग.....अभी अभी बिग बॉस के एक बीते दृश्य में महेश भट्ट घर के सदस्यों को थोड़ी देर तक गंभीर मुद्रा बना कर बारीकी से देखते हैं और कहते हैं मुस्कुराहटों के पीछे सच को छिपा लिया जाता है ..इसलिए मुझे मुस्कुराहटें नहीं देखनी ....लोगों की असहजता उनके चेहरों पर साफ़ दिख रही थी .......
अब दूसरी बात ..हम तो ठहरे साईंस फिक्शन वाले लोग ..हमें इन भावुक और गलदश्रु भावुकता और नैतिकता की बातों से उबकाई सी आती है -मनुष्य प्रजाति क्यों नहीं अपने मन और तन की मनमौजी मालिक अबन सकती? क्यों नहीं? पुरुष पाखंड के पीछे तो खैर है ही ..मगर विकास के क्रम में नारी अभी भी थोड़ी कम एमपावर्ड है ...नौ महीने का गर्भकाल ,दसियों बर्षों शैशव दुलार नहीं तो आदमी का बच्चा साला किसी काम का नहीं ,पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता -इन विभीषिकाओं से नारी बिचारी उबरे तो बात बने ..हाँ उबार तो गयी है अब वह ..पश्चिम में काफी उबरी है ....मन नहीं अब देह पर भी नियंत्रण आसान हो चला है ..नियोजन के आधुनिक तरीके हैं कारगर भी .....मगर वो जो नहीं उबार पायीं हैं (पढ़ें लिबरेट ) बिचारी, उन्हें स्वच्छंद घूमते निषेचन कारी जीवित मशीनों के कहर से बचाने को हमारे पास कोई अस्त्र है क्या -बस नैतिकता की ही दुहाई ही तो न ......
मुझे इसलिए ही साईंस फिक्शन की दुनियां रस आती हैं जहाँ सब कुछ साफ़ है ...एक परिष्कृत नैतिकता है -मन में जो आये कहने का पूरा अवसर है और इनकार करने का भी -और इनकार के सम्मान का सलीका भी और कितने ही विकल्प भी ..... आपकी पोस्ट ने इतना लिखा दिया ..पता नहीं बकवास या फिर इसमें कुछ काम का भी है -सच मुझे भी नहीं पता :)

Arvind Mishra said...

@और हाँ ,सुनते हैं सौन्दर्य का वर्नेबिलिटी से भी तो कोई रिश्ता है न ? पुरुष लोग तो यही कहते हैं ..कितना फर्क है न पुरुष और वीमेन सेक्सुअलटी में :)

Arvind Mishra said...
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Manish Kumar said...

"फिर भी शराफत आमतौर पर जिन लोगों की जागीर है, वे खुलेआम शरीर की बात नहीं करते, भले सबसे ज़्यादा शरीर के बारे में ही सोचते हों।"

खूब कहा आपने...
शायद ऐसे प्रोफेशन में रहते रहते बेबाकियत आ ही जाती है। बाकी जो कहा आपने हमारे समाज के लिए उससे पूर्णतः सहमत !

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

बहुत सुंदर! किमाधिकम्‌!!

प्रवीण पाण्डेय said...

लोग अपने मूल भाव में उतर जाता है पर फिर कुछ सोच कर वापस आवरण ओढ़ लेता है, विचारणीय है।

mukti said...

मेरे बाऊ अक्सर कहते थे कि ये दुनिया बड़ी दोगली है. एक ही फंडा है "किया तो किया, पता क्यों चलने दिया" यही बात आपके लेख में भी कही गयी है 'जो छुपकर हुआ तो सही। जो खुलेआम किया तो अश्लील, चरित्रहीन और निर्लज्ज कहलाई जाओगी। इसके बारे में बात करना तो सबसे बड़ी वर्जना। लिख दिया तो गुनाह कर दिया।'

rajiv said...

@Arvind Ji: Naitikta -anitikta ke ki bahs me nahi padna lekin ye apne Kya science fiction-science fiction ki rat laga rakhi hai.Ye testosterone ka khel hai and Guruji iske peeche bhi science hai..verna aap yaha bahas karte na nazar aate :-)

शेष धर तिवारी said...

निः शब्द हूँ. चाहता हूँ कि जीवन में मिला सारा सम्मान एक गठरी में बाँध कर एक किनारे रख दूं और फिर से प्रारम्भ करूँ. स्तुत्य हैं ऐसे लोग जिनके मन में ऐसे कालजयी सृजन की कल्पना जन्म लेती है.

Arvind Mishra said...

@राजीव जी ,कोई रट नहीं,यह भी एक विवशता ही है कि एक सीधी सपाट बात कहने के लिए हमें भी कोई ढाल लेनी पडी ...कौन कहता है कि यहाँ केवल नारी ही विवश है ,अभिव्यक्ति की अकुलाहट लिए हैं ...पुरुष की भी अपनी अनाभिव्यक्ति की पीडाएं हैं .....

शेष said...

*दहेज उत्पीड़न
1. घर में लड़के की शादी हो तो दहेज में मिलने वाले सामान की लिस्ट आमतौर पर घर की औरतें ही बनाती हैं।
2. बहु के आ जाने के बाद अगर दहेज "पूरा नहीं पड़ा" तो बहु को मौखिक या शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने वालों में लड़के की मां और बहनें मुख्य भूमिका निभाती हैं।

... अगर सामान्य सच दिखने वाले इन "तथ्यों" के हिसाब से कोई यह कहता है कि औरतें ही औरतों की सबसे बड़ी दुश्मन हैं, तो उसकी मूर्खता पर बात नहीं की जानी चाहिए।

...पुरुषवाद ने अपनी सत्ता को बचाए रखने के लिए जैसे-जैसे "हथियार" गढ़ रखे हैं, उसमें हर बार खुद वार करके गला उतार लेने के बाद भी वह निर्दोष रहता है, और उसकी सजा अपने शासितों, यानी स्त्रियों के लिए निर्धारित कर देता है। (भारतीय संदर्भों में यह ब्राह्मणवाद, या वर्णक्रम पर आधारित कोई भी वैसी सामाजिक व्यवस्था, जो वर्णक्रम पर आधारित हो, के साथ घुल-मिल जाता है और ज्यादा जटिल शक्ल अख्तियार कर लेता है।) दहेज के लिस्ट बनाती या बहु को जलाती हुई महिलाएं उस वक्त दरअसल पितृसत्ता का एक औजार भर होती हैं।

स्त्री-यौनिकता (स्त्री के लिए भी) अगर समस्या है और स्त्री अगर यह कहने पर मजबूर है कि 'आई विल टेल यू समथिंग अबाउट मेन। दे वॉन्ट टू गो टू एक्ज़ैक्ट्ली वेयर दे कम फ्रॉम। ऑल ऑफ देम।'(ज्यादातर "पुरुष" इससे परेशान हो सकते हैं, लेकिन...) तो यह भी पुरुष-सत्ता की साजिशों का ही नतीजा है। यह महज आरोप नहीं, थोड़ा ज्यादा ही सही, लेकिन कड़वा सच है और यह आखिरकार स्त्री को एक वस्तु की हैसियत में बनाए रखने का ही इंतजाम है। स्त्री का व्यक्तित्व, यानी देह। यह पुरुष-कुंठा हो या स्त्री का इसे अपने लिए "हथियार" बनाना...!

रही बात इसकी कि "फिर भी शराफत आमतौर पर जिन लोगों की जागीर है, वे खुलेआम शरीर की बात नहीं करते, भले सबसे ज़्यादा शरीर के बारे में ही सोचते हों।" तो जहां शराफत (!!!) ओढ़ी गई होगी, या सामने वाले पर दया होगी, वहां इससे ज्यादा की उम्मीद नहीं की जा सकती।

शरीर प्राकृतिक है, लेकिन जहां यह सामाजिक शक्ल अख्तियार कर लेता है, वहां फिर यह शासक और शासित के संबंधों में बदल जाता है। बल्कि सामाजिक सत्तावाद की साजिश का इससे बेहतर उदाहरण नहीं हो सकता कि किसी प्राकृतिक अनिवार्यता को सामाजिक और इससे आगे सामंती व्यवस्था में तब्दील कर दिया जाए।

डॉ .अनुराग said...

गोया रवायतो पर मालिकाना हक के कागज तो मर्दों पे है कई पुश्तो से ......लगता है लीज़ का एक्सटेंशन जारी रहेगा ....