Sunday, December 18, 2011

ताकि ज़िन्दगी में बची रहे आस्था

रो़ज़ सोचती हूं कि आज कुछ उदात्त लिखूंगी - sublime - जिसका वास्ता दुनिया से हो, जो सर्वहारा के सरोकारों से जुड़ा हो, जिससे मेरे गिने-चुने इन्टेलेक्चुअल दोस्तों को मेरे कामभर इंटेलिजेंट होने पर पुख़्ता यकीन हो जाए । अन्ना और सरकार के बीच फुटबॉल बने लोकपाल पर, चिदंबरम और नेपोटि़ज़्म पर, उत्तर प्रदेश के ड्रामे पर या वीना मलिक के गुम हो जाने पर, कुछ तो ऐसा हो जिसपर बहस मुहाबिसे हों!

लेकिन घूम-फिरकर फ़साना वहीं का वहीं, किस्से वही घिसे-पिटे पुराने। फिर सोचती हूं, लिख किसके लिए रही हू्ं? अगर अपने बच्चों के लिए लिख रही हूं तो उन्हें पांच-आठ साल बाद क्या फर्क पड़ेगा कि उनकी मां हर रो़ज़ बासी हो जानेवाली ख़बरों के बारे में क्या सोचती थी? उन्हें इससे ज़रूर फर्क पड़ेगा कि उनकी मां जीती कैसे थी, अपनी आस्था कैसे बचाए रखती थी ज़िन्दगी में, जीवन को लेकर नज़रिया क्या था उसका, और उन्हें और खुद को बड़ा करने में टूटी कहां-कहां वो?

यही सोचकर आज फिर एक रोज़नामचा लिख डालने की ज़ुर्रत की है। पब्लिक स्पेस पर 'ranting' के ख़िलाफ़ रही हूं और आज वही करने जा रही हूं। हम यूं भी हर कदम पर ढोंगी और पाखंडी ही होते हैं - अव्वल दर्ज़े के हिपोक्रेट। कहते कुछ और हैं, करते कुछ और हैं। (बच्चों, सॉरी, लेकिन ज़रूरी नहीं कि मैं हमेशा तुमलोगों को नीति शास्त्र की शिक्षा देती रहूं। कुछ चीज़ें तुमलोग खुद तय करोगे।)

ये रैंटिंग वही है - दिन अच्छा नहीं रहा, आंसू नहीं रुके, बेपरवाही, बेरुखी परेशान करती रही, पलायन का ख़्याल आता रहा, सिगरेट और व्हिस्की की नाजायज़ तलब सताती रही, ये ज़िन्दगी कमबख्त कमीनी और बेमुरव्वत ही निकली और प्यार निकला बेवफ़ा। ये सब मान लेने भर से बोझ तो हल्का हुआ दिल का। हमारी आस्था बचाए रखने का एक तरीका ये भी है - हमारा लिख डालना, बेवजह बेसबब बेसलीका ही सही।

जापानी में एक शब्द है - कोसेन रुफु (kosen rufu)। ये एक शब्द मुझे बेहद पसंद है और मेरी ख्वाहिश है कि कोसेन रुफु एक दिन हक़ीकत बने। कोसेन रुफु का मतलब है, व्यक्तिगत प्रसन्नता और शांति हासिल करते हुए वर्ल्ड पीस कायम करना। कोसेन रुफु एक हाइपोथेटिकल टर्म हो सकता है, यूटोपियन दुनिया जैसा कुछ। लेकिन मैं सिर्फ इतना कहना चाहती हूं कि यहां भी केन्द्र में 'इन्डिविजुअल' ही है। यानि मैं और तुम। इसलिए रैंटिंग ही सही, मेरा लिखा, कहा और सोचा हुआ मेरे सुख-दुख का परिचायक है तो फिर कोसेन-रुफु हासिल करने की दिशा में कहीं ना कहीं मैं कुछ ना कुछ योगदान तो दे ही रही हूं। फिर अपनी खुशियां और अपने आंसू यूं खुलेआम प्रदर्शित करने से क्यों घबराया जाए? Express. Express freely. कालजयी रचना का मोह त्यागो। जुलिया कैमरॉन ने भी कहा है कि कला आत्म-संरक्षण (self care) की पहली सीढ़ी है। लिखना भी। चाहें वो फेमिनीन टॉश हो या फिर रैंटिंग। जो है, सो है।

कल एक बेहद ख़ूबसूरत पोएट से मिली - अरुंधती सुब्रमण्यम। जब अरुंधती को उनकी कविताएं पढ़ते सुना तो मैं भीतर से परेशान हो गई। ये तो मुझे लिखना था, ऐसा तो मुझे कहना था। फिर मुझमें वो हिम्मत क्यों नहीं थी जो इसमें है? मुझे सेल्फ केयर और फ्री एक्सप्रेशन के बारे में और ज्ञान हासिल करना होगा, तबतक के लिए अरुंधती की एक कविता 'Another way' के उस हिस्से का अनुवाद, जो मुझे बेहद पसंद है।


खड़े होना
विस्तीर्ण भीषण वर्षा से भेदे हुए
खुले काग़ज़ में
सवाल पूछते हुए
जो पहले भी पूछे जा चुके हैं
जानते हुए कि हज़ार ग्रंथालयों के झोंके
इसे अंधेरे में उड़ा देंगे कहीं।

कोई पदचिन्ह ना छोड़ना
उष्म जलोढ़क पर
कोई डॉल्बी की नहीं गूंज
जो प्रतिध्वनित हो आराधना-स्थलों में
ना स्मृति लेख
ना केसरिया झंडे

ये एक और तरीका था
अपनी आस्था बचाए रखने का

To stand 
in the vast howling rain-gouged
openness of a page
asking the question
that has been asked before,
knowing the gale of a thousand libraries
will whip it into the dark.
To leave no footprints
in the warm alluvium,
no Dolby echoes 
to reverberate through prayer halls,
no epitaphs,
no saffron flags.
This was also a way
of keeping the faith.

8 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

यह जापानी शब्द मुझे भी बहुत भाता है क्योंकि हम वही दे पा़येंगे जो हमारे पास होगा।

Kishore Choudhary said...

कविता का हिंदी पाठ मेरे लिए बहुत सुन्दर और सहज हैं. बहुत सुन्दर अनुवाद है कविता की आत्मा को सुन्दर बनाते हुए प्रवाहमय है. हम हर रोज के जिस जाया होने का जो अफ़सोस करते हैं उस जाया होने को इस तरह के काम टाल देते हैं. लिखते रहिये.

Puja Upadhyay said...

अच्छा लिखना वो नहीं है कि जो हमेशा के लिए रहे...कालजयी टाइप्स कुछ...या सबको पसंद आए...अच्छा लिखना वो है जब लिख के मज़ा आ जाये...मन खुश हो जाये...धूप निकल जाये...अड्रेनलिन का उत्पादन बढ़ जाये...आप लोगों को फोन कर के आई लव यू टाइप चीज़ें कह दें...दोस्तों को शुक्रिया कह दें जिंदगी में होने के लिए इत्यादि इत्यादि...

दो दिन पहले लिखा था :)आपके विचार ऐसे ही कुछ पढ़े तो बहुत अच्छा लगा. मैं वेब पर रैन्टिंग के एकदम पक्ष में हूँ...वैसे भी मुझे इतना बोलना होता है कौन सुनेगा...ब्लॉग पर जो मन है वो तो लिखूं...यहाँ पढ़ने की किसी की मजबूरी नहीं है. मेरी रैन्टिंग सही, कोई अपनी मर्जी और फुर्सत से पढ़ेगा...किसी को फोन करके सर खाने से बेहतर है :)

Rahul Singh said...

ईमानदार, (सरल-तरल भी) सधी अभिव्‍यक्ति.

Arvind Mishra said...

ब्लॉग जगत की ख़ूबसूरती या उपलब्धि जो भी कहिये यही है कि यहाँ संवेदना और बुद्धि के विभिन्न स्तरों से साक्षात्कार का सुख मिल जाता है जो समकालिक होने पर भी वस्तुतः मनुष्य के बौद्धिक विकास की एक क्रमिकता का आश्चर्यजनक रूप से सिंहावलोकन करा देता है -मैं प्रत्येक ऐसे अवसर पर रोमाचित और आह्लादित होता हूँ -मैं घुमंतू से मिल जाना ऐसा ही एक अनुभव है -बहरहाल ..जापानियों का 'गहमोन' जीवन दर्शन भी मुझे बहुत आकर्षित करता है -जो भीषण आत्मपीडा के समय भी गरिमामय बने रहते हैं ,दिखते हैं......आपकी यह पोस्ट सहसा मुझे अपनी भी एक पोस्ट याद दिला गयी ....
आप की पूरी पोस्ट और अरुंधती की कविता को मैं इसी पृष्ठभूमि और परिप्रेक्ष्य में देख रहा हूँ ...
सृजनात्मकता को अपनी ऊष्मा देती रहिये -उनकी कालजयिता का जिम्मा पाठकों और भविष्य पर छोडिये .....


क्या हम जापानियों का यह जीवन दर्शन अपना सकते हैं

Arvind Mishra said...

ब्लॉग जगत की ख़ूबसूरती या उपलब्धि जो भी कहिये यही है कि यहाँ संवेदना और बुद्धि के विभिन्न स्तरों से साक्षात्कार का सुख मिल जाता है जो समकालिक होने पर भी वस्तुतः मनुष्य के बौद्धिक विकास की एक क्रमिकता का आश्चर्यजनक रूप से सिंहावलोकन करा देता है -मैं प्रत्येक ऐसे अवसर पर रोमाचित और आह्लादित होता हूँ -मैं घुमंतू से मिल जाना ऐसा ही एक अनुभव है -बहरहाल ..जापानियों का 'गहमोन' जीवन दर्शन भी मुझे बहुत आकर्षित करता है -जो भीषण आत्मपीडा के समय भी गरिमामय बने रहते हैं ,दिखते हैं......आपकी यह पोस्ट सहसा मुझे अपनी भी एक पोस्ट याद दिला गयी ....
आप की पूरी पोस्ट और अरुंधती की कविता को मैं इसी पृष्ठभूमि और परिप्रेक्ष्य में देख रहा हूँ ...
सृजनात्मकता को अपनी ऊष्मा देती रहिये -उनकी कालजयिता का जिम्मा पाठकों और भविष्य पर छोडिये .....


क्या हम जापानियों का यह जीवन दर्शन अपना सकते हैं

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

जो अभिव्यक्ति बिना मस्तिष्क लगाये अपने आप निर्झर झरने की तरह बाहर फूट पड़े उसे रोकना क्यों? यह मंच तो इसके लिए बना ही है। इसमें जो नैसर्गिक आनंद है वह विद्वत्‌वाणी में दुर्लभ होगी।

मन के बहुत करीब लगी यह पोस्ट।

अनूप शुक्ल said...

अच्छी पोस्ट है। जीवन बहुत खूबसूरत होता है -बावजूद तमाम खामियों के, खराबियों को।इसको और खूबसूरत बनाना हमारा काम है।