Thursday, December 22, 2011

सीज़न्स ग्रीटिंग्स और हैपी न्यू ईयर

साल के इन आख़िरी दिनों तक रंग-बिरंगे ग्रीटिंग कार्ड्स आ जाते थे, थोक में। बाबा के ऑफिस में उनकी कंपनी के लोगो के साथ छपनेवाले कार्ड्स ख़ास दिलचस्प नहीं होते थे। क्राई, यूनिसेफ जैसे किसी एनजीओ से गुडविल में कार्ड्स लेकर उन्हें कंपनी के कर्मचारियों को दे दिया जाता था। बाबा बॉस थे, घर में सबसे बड़े भी थे। इसलिए उन्हें प्रोफेशनल और पर्सनल दोनों मोर्चों पर सैंकड़ों की संख्या में ग्रीटिंग कार्ड्स की ज़रूरत पड़ती थी। साल का ये वक्त सबसे हसीन हुआ करता था - स्कूल की छुट्टियां, नर्म गुलाबी धूप, आंगन में तकरीबन सारे मौसमी फूलों की क्यारियां, पेड़ पर लटके हुए अमरूद, छज्जों से लटके हुए पेट्युनिया से लदे गमले और बाबा के पैरों से सिमटी-लिपटी बैठी पेपी। टेबल पर लाल डायरी निकल आया करती थी, लिफ़ाफ़ों पर पते लिखे जाने लगते थे और डाक टिकटें चिपकाने का काम भी हम तीनों भाई-बहन में किसी एक को मिल जाया करता था। अपने ख़ास दोस्तों के लिए आर्चीज़ या हॉलमार्क से आते थे कार्ड्स, जिनमें प्यारभरे संदेश होते थे। इन्हीं कार्ड्स की सेटिंग के हिसाब से क्लास में अगले साल के लिए जोड़ियां तय हो जाया करती थीं।

नए साल की स्वागत की तैयारी का पैटर्न तकरीबन तय था - 25 तक कार्ड डिस्पैच करना, 26-27 की रात कंपनी गेस्टहाउस में न्यूईयर की पार्टी और 31 की रात दूरदर्शन के साथ हैपी न्यू ईयर, जब पार्वती खान नींद में खुला ताला छोड़ आने की खुशी में नाचती थीं और येसुदास तिस्ता नदी सी चंचला आवाज़ वाली हेमलता को छेड़ते थे। 1 जनवरी को हम घूमने जाते थे - कभी डियर पार्क कभी कांके डैम, कभी रुक्का तो कभी ओरमांझी। ढेर सारी भीड़ और जगह-जगह पतीलों पर चढ़े मीट की खुशबू में हंडिया की गंध गड्ड-मड्ड हो जाया करती थी। न्यूईयर की यही अजीब-सी मादक गंध अभी भी ज़ेहन में है।

एक साल ऐसा भी हुआ कि हमने गुड्डी के किचन गार्डन में पिकनिक मनाना तय किया। आटा, नमक, हल्दी, आलू और रिफाइन्ड ले आए घर से। लेकिन आटा गूंधे कौन और आलू काटे कैसे! धूप में आटा और आलू को लेकर अपना दिमाग भिड़ाते रहे, फिर रॉ मैटिरियल की तैयारी के लिए वापस घर चले गए। जाने आटा किसकी मां ने गूंधकर दिया और आलू किसने काटे, लेकिन जली हुई पूड़ियां और अधपके आलू का सोंधा-सा ज़ायका एक तस्वीर में अभी भी कैद है (मेरी दो चुटिया, भाईयों की मैंचिंग शर्ट और निकर और गुड्डी की 'ओह-सो-ग्रेसफुल' स्माईल के साथ)।

और एक साल हम ज़रा महत्वाकांक्षी हो गए थे। दूरदर्शन का वही घिसा-पिटा कार्यक्रम क्यों देखा जाए? क्यों ना अपनी तैयारी, अपना जश्न, अपना माहौल हो? तो मैं थी, पार्टनर इन क्राइम मेरे दो भाई थे और मेरी दोस्त सुवर्णा और उसका भाई था। उसके घर में टेपरिकॉर्डर लग जाया करता और हम 'काली तेरी चोटी है' की प्रैक्टिस करते। दो-चार और गाने भी थे, मंदाकिनी की किसी फिल्म के, जो अब याद नहीं। ये याद है कि मोहल्ले के सबसे रईस लोगों में से एक बापी अंकल ने हमारे 'कॉन्सेप्ट' से प्रभावित होकर टेन्ट, कुर्सियां और माइक स्पॉन्सर कर दिया था और हमारे ग्रैंड फिनाले के लिए अच्छी खासी भी़ड़ जमा हो गई थी। कार्यक्रम के लिए जमा किए गए चंदे में से कुछ पैसे बचाकर हमने सुवर्णा की छत पर एक की दोपहर पिकनिक भी की और मेन्यू तक याद है - चिकन करी, मटर पनीर, पुलाव, चने की दाल, टमाटर की चटनी और रोशॉगुल्ला।

एक साल ये भी हुआ था कि अपनी छत पर पिकनिक करने की कोशिश में हमने चूल्हा ऐसे लगाया कि रेलिंग पर कालिख जमा हो गई। उसको साफ करने के जतन में हमने सीमेंट, चूना, मिट्टी - सब इस्तेमाल कर लिया और नतीजा सिर्फ यही कि कालिख राख के रंग की हो गई। बाबा का गुस्सा मुझे आज भी याद है, जो कालिख से ज्यादा लकड़ी के अलाव से हमारे हाथ-पैर जल जाने के ख़तरे से जुड़ा था।

सीज़न्स ग्रीटिंग्स अब फेसबुक पर एक स्टेटस मेसेज हो जाएगा, न्यूईयर का स्वागत उसी बॉनफायर, उसी तंदूर और उसी शैंपेन के साथ होगा जिनके बिना हमारी ख़ास तरह की लाइफस्टाईल मुकम्मल नहीं दिखती। लेकिन क्रैक्स, पॉपिन्स और बिल बिस्कुट के स्वाद के साथ-साथ मेरे ज़ेहन में जो बची रही गई है, हंडिया की खट्टी और तीखी गंध है।

6 comments:

Prashant Raj said...

गुस्से से ज्यादा याद है कितना स्वाद लेकर बाबा जी ने वो पुलाव और सब्जी खायी थी......हमारे सारे इन प्रयोगों पर गुस्सा दिखाते थे और मन ही मन खूब मन से मज़ा लेते थे..... वैसे वो गाना बताते हैं हम तुमको फ़ोन कर के अभी.....हँसते हँसते गिर जाओगी ! :)

Rahul Singh said...

बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी, ऊंगलियां उट्‌ठेंगी सूखे हुए बालों की तरफ, इक नजर देखेंगे गुजरे हुए सालों की तरफ...

प्रवीण पाण्डेय said...

तैयारियाँ अपनी भी हैं।

rashmi ravija said...

आह....याद आ गया..तब हम 31st की रात को नहीं...1st Jan के दिन में नया साल सेलिब्रेट करते थे....वो भी महल्ले के बच्चों के साथ,छत पर गोभी मटर वाली खिचड़ी बनाकर...चावल का कच्चा-पका स्वाद जैसे अब भी जुबान पर है.

Arvind Mishra said...

आपने तो आने वाले गले कुछ दिनों के लिए संवेदित औरत उन्मुख कर दिया....हाँ बाप रे मुझे भी याद है उन ग्रीटिंग कार्डों के बोझ का निस्तारण -दम फूलने को आता ....कितनी बदल गयी है न दुनियां!

Arvind Mishra said...

*और उन्मुख