Thursday, December 22, 2011

हद-ए-वफ़ा क्या है आख़िर?

नैना को पहली बार देखा था तो हैरान रह गई थी। कोई इतना भी ख़ूबसूरत हो सकता है? रौशन चेहरा, गोरा रंग, तीखे नक्श और चेहरे पर चमकती मुस्कान। हम पड़ोसी थे लेकिन सीढ़ियों पर आते-जाते एक-दूसरे का हाल पूछने के अलावा और कोई बातचीत ना थी। उसका बेटा मेरे बच्चों से एक साल बड़ा है, लेकिन तीनों में पटती नहीं। इसलिए, बच्चों के बहाने मिलने का मौका भी कम ही लगा। लेकिन हम अपने बच्चों की बर्थडे पार्टी में एक-दूसरे को बुलाना कभी नहीं भूलते थे। इतनी दोस्ती भी थी कि फोन नंबर एक-दूसरे के सिम में बचाए रखे गए हों। 

नैना और उसके पति को देखकर लगता था, हैंडसम कपल इसे ही कहते होंगे। सबकुछ परफेक्ट। घर भी, बच्चा भी, बच्चे के साथ लगे रहनेवाले दादा-दादी भी और नैना का दफ़्तर भी। सास-बहू को कई बार साथ बाज़ार जाते देखा, अक्सर वीकेंड की रातों को पूरा परिवार साथ लौटता और मैं रश्क करती। एक साथ रहने का कितना सुख है, इसकी मिसालें नैना के नाम पर फोन पर अपनी सासू मां को देना कभी नहीं भूलती थी। अब नैना का मुझपर ऐसा ही असर था कि उसकी सलाह पर अपने बच्चों को उसी स्कूल में दाख़िला दिलाया जहां उसका बेटा पढ़ा करता था। 

हमारी बातचीत कभी निजी नहीं होती थी। बच्चों की परवरिश और काम करते हुए बच्चों को वक्त देने की चुनौती, कर्सिव सिखाने में आनेवाली अड़चनें, फ्लेक्सिबल वर्क ऑप्शन्स और बबल सीरिज़ की किताबें... इससे ज़्यादा कुछ नहीं। लेकिन सुबह उसे दफ्तर जाते देख लेती तो मेरा दिन बन जाता। उसकी खुशमिज़ाजी और ताज़गी पूरे दिन मेरे साथ रहती। मैं अक्सर उसके पति की किस्मत की दाद दिया करती थी कि उसे नैना जैसी हसीन और समझदार बीवी मिली। नैना से भी कम ईर्ष्या नहीं होती थी। 

आज पता चला नैना ने घर छोड़ दिया है। घर भी। पति को भी। बच्चे को भी। बच्चे की कस्टडी को लेकर मामला अदालत में है और नैना कहीं और अकेली रह रही है। जब से ये मालूम चला है, मैं इस कदर सदमे में हूं जैसे किसी अपने की मौत की ख़बर मिल गई हो। मुझे अपने भरोसे और यकीन पर कुछ भारी-सा गिर जाने जैसा महसूस हो रहा है, ऐसे जैसे किसी ने मुझे बुरी तरह धोखा दिया हो। 

रिश्तों के डोर की बुनावट आख़िर कैसी होती है? कैसे साफ़ दिखाई देनेवाली गांठों के साथ डोर बची भी रहती है और कैसे बाहर से रेशम-सी दिखनेवाली डोर दरअसल मकड़ी के जाले के रेशे से ज़्यादा कुछ नहीं होती? रिश्तों को पकने में कितना समय लगता है और सीलने में कितना? खुशनुमा क्या है और टिकाऊ क्या? ये सामंजस्य किस बला का नाम है? मेरी करीबी दोस्त और पेशे से डॉक्टर वंदना का कहा मुझे अचानक याद आ रहा है, 'याद रखो कि 80 फ़ीसदी से ज़्यादा कपल्स मानसिक रूप से तलाकशुदा हैं। वे साथ तो हैं, लेकिन साथ रहने की कोई वजह सही नहीं।' सच है शायद। जब साथ रहने की वजहें गलत थीं और सही वजहों से अलग ही हो गए दोनों तो मैं मातमपुर्सी के लिए क्यों बैठी हूं? 

इस दौड़ती-भागती दुनिया में हमने यूं भी खुद को अंधे कुंओं में ढकेल रखा है और अपने चारों ओर अपने ही अहं की दीवार खड़ी कर ली है। रही सही कसर पैसा, डेडलाइन, काम, ख़्वाब और ज़िम्मेदारियां पूरी कर देते हैं। लेकिन अपना घर छोड़ देना एक बड़ा फ़ैसला होता होगा। कई रातों की नींद, कई दिनों के सुकून की आहुति मांगता होगा ऐसा कोई कदम। परिवारों की नाराज़गी, खुद का खुद से उलझना, ढेर सारी तन्हाई और टूट जाने के डर को दरकिनार कर ऐसा कोई फ़ैसला लेना आसान नहीं होता। फिर भी क्यों?

मुझे नैना की आंखों के नीचे के काले घेरे अचानक याद आने लगे हैं। अचानक मैंने खुद को किसी अदृश्य तराजू पर बैठा दिया है।  

9 comments:

Puja Upadhyay said...

हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी...
कुछ लोगों को ज़ख्मों के ऊपर हंसी चिपकानी बहुत करीने से आती है...ऐसे ज़ख्मों के टाँके देखने के लिए बहुत गहरे उतरना पड़ता है...उसके लिए बहुत वक्त भी चाहिए और सामने वाले का किसी लम्हे के लिए कमजोर पड़ना भी.

जाने कैसा इत्तिफाक होता है कि मैंने अक्सर देखा है कि ऊपर से चीज़ें जब बहुत खुशनुमा हों तो अक्सर कहीं अंदर दर्द की सरस्वती बहती रहती है. कहानी जिंदगी के जैसी सच्ची लगी.

Rahul Singh said...

खौफनाक.

अनुपमा त्रिपाठी... said...

बहुत बुरा लगा पढ़कर |अच्छी कहानी का अंत भी अच्छा ही होना चाहिए न ....पर शायद यही नैना के लिए अच्छा होगा यही सोच कर तसल्ली कर रही हूँ ....

प्रवीण पाण्डेय said...

बाहर से कहाँ दिखते हैं मन के तूफां...

अनुपमा त्रिपाठी... said...

कल 24/12/2011को आपकी कोई पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

Arvind Mishra said...

जो पास हैं दरअसल वे दूर होते जाते हैं और जो दूर हैं वे पास खींचे आते हैं ...
हाय रे निगोड़ी जिन्दगी तेरे खेल निराले :-)

कुश्वंश said...

अंदर के दर्द की कहानी जिंदगी सच्ची लगी

***Punam*** said...

कहानियों में ही हकीकत छुपी होती है...और हकीक़त को कहानी बनते देर नहीं लगती..!

पूजा की बात में अक्षरश: सच्चाई है...
जब तक बात परदे में रहती है तभी तक परदे के ऊपर के सुन्दर कसीदे दिखाई देते हैं...पर्दा उठाते ही कईयों की सच्चाई अपने नग्न रूप में सामने आ जाती है...क्या कहा जाए इसे...कोई कब तक इसे ढांपे रह सकता है..निर्भर होता है कई बातों पर....कई लोग तो इसी तरह पूरी जिन्दगी ही बिता देते हैं..!!

Manoj K said...

मानसिक रूप से तलाकशुदा !! सटीक .. यूँ भी हम कई बार चीज़ों और इंसानों को बहुत जल्दी जज कर लेते हैं और जब उन्हें इसके विपरीत पाते हैं तो असमंजस में पड़ जाते हैं. एक उम्दा पोस्ट..