Friday, December 19, 2014

आओ गिनें कफ़न, चुनें ताबूत

अमरावती डिविज़न में है बुलढाणा, विदर्भ का सबसे पश्चिमी हिस्सा - नाम-शोहरत-दौलत-ख़्वाब बनाती बिगाड़ती मुंबई से कुछ पांच सौ किलोमीटर दूर। अरुणावा सिन्हा की किसी अनूदित कहानी में पढ़ा था कि बुलढ़ाणा में एक झील है जो दरअसल झील नहीं, दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा क्रेटर है। एक सैलानी बाबा की दरगाह भी है वहाँ। पीर की दर पर मेरे जैसे फ़ितरती घुमंतुओं की दरकार है या नहीं, मैं नहीं जानती। बुलढ़ाणा शहर को सैलानियों की ज़रूरत ज़रूर है। शहर या तो गन्ने की खेती से चलता है या फिर थोड़ी-बहुत कपास की खेती से। 

मैं जिस मौसम में बुलढ़ाणा गई थी वो मौसम कपास के खेतों से कपास चुनने का था। कांटों में उंगलियां और अपने दामन उलझाए खेतों में सिर झुकाए या तो औरतें कपास चुनती रहती थीं, या फिर बच्चे। 

रोज़ी-रोटी की ज़रूरत इल्म से कहीं ज़्यादा बड़ी होती है। पढ़-लिखकर दुनिया को बदल देने के वालों की जो गिनी-चुनी कहानियां बच्चों तक पहुंचती है, उसमें बहुत उम्मीद नहीं होती। आनेवाले कल के बिकाऊ ख़्वाब तो वो खरीदे जिसके आज का पेट भरा है और एक जो शरीर है वो किसी बाहरी-भीतरी ज़ख़्म या तपिश से थका हुआ न हो। वरना ज़िंन्दगी के रोज़-रोज़ के संघर्ष दो वक्त किसी तरह पेट भरने और सिर पर छत जुटाए रखने से आगे नहीं निकल पाते। वजूद का सवाल बेसिक सर्वाइवल के जवाब से जुड़ा हुआ है। 

फिर मैं, और मेरे जैसे लोगों की टीम खामगाँव में क्या कर रही थी? अपनी-अपनी गर्दनों में कैमरे लटकाए हम किस गरीबी की तस्वीर खींचते? किस डोनर को भेजते? किस इंटरनेशनल फंडिंग एजेंसी को पक्का यकीन दिला पाते कि उनके दिए यूरोज़ (या डॉलर) बच्चों के ख़्वाब खरीद लाएंगे? हम फिर भी उस गाँव में अपने लिए तस्वीरें और केस स्टडिज़ ढूंढते रहे थे। 

एक प्राइमरी स्कूल था वो, जहाँ उस रोज़ का सबक मिला था हमें। शाम होने को थी, लेकिन मग़रीब की ओर बढ़ता सूरज धीरे-धीरे चलता है। रोशनी के जो थोड़े-बहुत टुकड़े खिड़कियों से आने चाहिए थे, उन्हें बंद खिड़कियों ने रोक रखा था। 

खिड़कियां बंद क्यों हैं? मैंने पूछा था। 

दूसरी-तीसरी-चौथी क्लास के बच्चे क्या जवाब दे पाते कि मुझे कोई जवाब मिलता। 

बाहर से शोर बहुत आता है न, इसलिए। 

बाहर का शोर भी दो हिस्सों में बंटा हुआ है, ये समझने में मुझे देर न लगी। मैं जिस स्कूल में खड़ी थी वो एक प्राइमरी स्कूल था और वहां की दीवार से कुछ पचास मीटर दूर जो दो कमरों की इमारत थी वहाँ उर्दू प्राइमरी स्कूल चलता था। तालीम बंटी हुई थी। तालीम का मज़हब और तालीम की ज़ुबानें भी बंटी हुई थीं। ज़ाहिर सी बात है, शोर भी बंटा हुआ था।  

हम दोनों स्कूलों में गए थे। एक स्कूल में बच्चों ने हमें सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला का लिखा'वर दे वीणावादिनी वर दे' सुनाया था, तो दूसरे में अल्लामा इक़बाल का लिखा 'लब पे आती है दुआ बनके' सुनाया था। बच्चे कहां बंटे होते हैं कि बंद खिड़कियां उन्हें बांट पातीं? लेकिन दुआएं बंटी हुई थीं, दुआओं की ज़ुबानें भी बंटी हुई थीं। ऊपरवाला जाने ज़ुबानों की सुनता होगा या आवाज़ों की सुनता होगा! या शायद बहरे हो जाने में ही अक्लमंदी नज़र आई होगी उसको। 

दुआ की ज़ुबानें हिंदी और उर्दू में बंटी हुई थीं। लेकिन आवाज़ें एक-सी थी, बातें एक-सी थीं और सरोकार बिल्कुल एक जैसे थे। बच्चों का नाम चाहे जो भी रहा हो, उन्हें अपने स्कूलों में साफ़ पानी चाहिए थी, किताबें और नोटबुक चाहिए थे और खेलने-कूदने के लिए गेंद, बल्ला, फुटबॉल, रस्सियां और वक़्त चाहिए था। उन्हें हिफ़ाज़त चाहिए थी। स्कूल में बच्चे ज़िन्दगी के उन कड़वी सच्चाईयों से महफ़ूज़ थे जिन्हें जीना उनके वजूद की मजबूरी थी। 

बांटने का काम हम कर करते हैं। कितने सारे बंटवारे हैं - नामों के, उपनामों के, गांवों-कस्बों-गली-मोहल्लों के। मज़हब के, ज़ुबानों के। यहां तक कि मज़हब में भी बंटवारे। हम तो अपने बच्चों को भी बांट देते हैं - तू बड़ा, तू छोटा। तू लड़का, तू लड़की। तू गोरा, तू काला। तू बेवकूफ़, तू ज़हीन। स्कूल में बंटवारे और बड़े। तू मिलिट्री वाला, तू सिविल। तू अमीर, तू गरीब। तू कसाई टोला का, तू बाह्मन टोला का। 

अंतहीन बंटवारे। ज़मीन के बंटवारे, आसमान के बंटवारे। गोलियों के बंटवारे, ख़ून के छींटों के बंटवारे। गुनाह के बंटवारे, यकीन के बंटवारे। 

जिस देश में एक ख़ूनी की मूर्ति चौराहों पर लगाकर उसका जश्न मनाने की बात होने लगे, उस देश को अपने पड़ोसी की गिरेबान में झांकने का हक़ मिलना भी चाहिए? चलो बंटवारों को अंतिम सत्य मान लें, और गोलियां गिनें। ख़ून के क़तरे गिरें। कफ़न गिनें, ताबूत चुनें। गिनते-गिनते जब थक जाएं तो अपने-अपने चौराहों पर लगे मूक महापुरुषों की मूर्तियां गिनें। 

फिर चलो ये भी गिन लें कि अपनी-अपनी गलियों, गांवों, शहरों में कितने बच्चों को कितनी बार बांटा हैं हमने। 

आओ, अपनी-अपनी खिड़कियां बंद कर लें। तुम अरबी-फ़ारसी में पढ़ो मर्सिया और मैं संस्कृत में श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक गुनगुनाती हूं। 

अध्याय दो, श्लोक २७-२८ - 

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च। 
तस्मादपरिहार्य अर्थे न त्वं शोचितुमर्सि। 

क्योंकि इस मान्यता के अनुसार जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है। इस बिना उपाय वाले विषय में तू शोक करने योग्य नहीं है। 

सुनो कि तुम्हें नसीब होगी जन्नत, और मुझे एक हज़ार चंद्रलोकों का सुख। बच्चों का क्या है? फिर पैदा हो जाएंगे। उन्हें हम फिर से बांट देंगे। 

Thursday, December 4, 2014

एक इंटेलिजेंट फ़िल्म है 'ज़ेड प्लस'

"फिल्म देखी तुमने?" 

हालाँकि मेरे इस फोन पर नाम फ़्लैश नहीं कर रहा था, लेकिन मैं जानती थी कि आवाज़ किसकी थी और ये दो टूक सवाल मुझसे पूछने का अधिकार कौन सा फ़िल्मकार रखता है। 
अपन की इतनी औकात नहीं अभी कि हैप्पी न्यू ईयर की रिलीज़ से पहले फराह खान फ़ोन करके पूछें, "फिल्म देखी तुमने?" ? ये दीगर बात है कि हैप्पी न्यू ईयर को हम नाचीज़ दर्शकों के बिना भी बॉक्स ऑफ़िस में दो-चार सौ करोड़ तो यूँ ही मिल जाएँगे। लेकिन ज़ेड प्लस जैसी फ़िल्म को हम जैसे दर्शकों की सख़्त ज़रूरत है। इसलिए नहीं कि ज़ेड प्लस किसी एब्स्ट्रैक्ट इंटेलेक्चुअल फ़िल्म की श्रेणी में आती है - वैसी फ़िल्में जो सत्तर और अस्सी के दशक की मेनस्ट्रीम ढिशूम-ढिशूम फ़िल्मों के बीच उतनी ही ख़ामोशी से बन रही थीं जितनी ख़ामोशी से फ़िल्म रिलीज़ हो जाती थी और एनएफडीसी के आर्काइव में जमा कर दी जाती थी। ज़ेड प्लस इंटेलेक्चुअल फ़िल्म बिल्कुल नहीं है। लेकिनज़ेड प्लस इंटेलिजेंट ज़रूर है, एक ऐसा पॉलिटिकल सटायर जिसे पढ़ने की आदत तो है हमें, लेकिन पिक्चर हॉल में देखने की बिल्कुल नहीं है। 
इसलिए कीकर और खेजड़ी के झाड़-झंखाडों से होते हुए कोई एक सड़क जिस रेगिस्तानी कस्बे की ओर का रुख लेती है, वो कस्बा अपनी पूरी ऑथेन्टिसिटी के साथ हमारे समक्ष खुलता है - गड्ढा दर गड्ढा, दुकान दर दुकान, किरदार दर किरदार, बात दर बात, गली दर गली। सुखविंदर सिंह (और किसी नई गायिका) की आवाज़ में कव्वाली को रूह ज़ब्त कर लेना चाहती है, लेकिन रेडियो पर या यूट्यूब पर बार-बार सुना होता तब तो मनोज मुंतशिर नाम के गीतकार के बोल ज़ेहन में ठहरे रहते। इसलिए ज़ेड प्लस का संगीत दर्शकों के लिए उतना ही भर रह जाता है - बैकग्राउंड स्कोर - पार्श्व में चलती हुई धुन जिससे कहानी का वास्ता न के बराबर है। 
किरदारों के इंट्रो के बाद जो कहानी खुलती चली जाती है उसमें कहीं कोई बनावटीपन नहीं है, यहाँ तक कि सरकार गिराने की धमकी देती समता मुखर्जी में भी नहीं। व्यंग्य अपने शुद्ध रूप में बचा रहता है - चाहे वो हिंदी न बोल पाने वाले दक्षिण भारतीय प्रधानमंत्री के रूप में हो (कुलभूषण खरबंदा) या चैनलों को ख़त भेजने की ख़्वाहिश रखने वाले 'पड़ोसी देश' के टेररिस्ट ग्रुप के मुखिया (संजय मिश्रा) के रूप में। ग़ौर फ़रमाने वाली बात ये है कि 'पीएम' न पीवी नरसिंह राव का कैरिकेचर है न देवेगौड़ा का। बल्कि लॉन्ग शॉट में तो कुलभूषण खरबंदा का किरदार मुझे कई जगह चंद्रशेखर के आस-पास लगा। (और चूँकि डॉ द्विवेदी ने फ़िल्म की शुरुआत में ही डिस्क्लेमर दे दिया है कि ऐसी घटनाएँ डेमोक्रैसी में नहीं घटतीं, इसलिए फ़िल्म को हम सिर्फ़ और सिर्फ़ 'डेमोक्रैसी' का कैरिकेचर मान लेते हैं।) 
परत दर परत जो कहानी खुलती है वो कुछ यूँ है - एक छोटे से कस्बे के पीपल वाले पीर की दरगाह पर पीएम आते हैं, अपनी सरकार बचाने की दुआ माँगने। पीर की दरगाह पर एक दिन का खादिम असलम पंचरवाला है, जो अपने पड़ोसी की शिकायत पीएम से कर बैठता है। पीएम का आला अफ़सर 'पड़ोसी' से तात्पर्य वही लगाता है जो डेमोक्रैसी के आला अफ़सर को अब तक कूटनीति के पाठ के तहत समझाया गया है - पड़ोसी यानी पाकिस्तान। फिर ज़ुबानों और तर्जुमे का कम, डेमोक्रैसी का कुछ ज़्यादा... घालमेल इस तरह का होता है कि पीएम असलम को ज़ेड प्लस सेक्युरिटी दिलवा देते हैं। उसके बाद असलम महज़ एक किरदार है, बाकी का स्वाँग डेमोक्रैसी रचती चली जाती है।   

फ़िल्म में कुछ कमाल के मेटाफ़र हैं - सईदा यानी कश्मीर के लिए दो पड़ोसियों की लड़ाई; असलम का पंचरवाला होना (जो बाद में चुनाव उम्मीदवार के तौर पर दिल्ली से सीमावर्ती राजस्थान तक पहुँचते-पहुँचते पंचर हो जानेवाली योजनाओं के 'पंचर' ठीक करने का दावा करता है; पीपलवाले पीर की दरगाह से गायब पीपल ठीक वैसे ही जैसे लोकतंत्र से 'लोक' गायब होता है; पीएम का दक्षिण भारतीय होना, जो अब तक के लोकतंत्र के सबसे बड़े स्टीरियोटाईप को तोड़ता है।  
फ़िल्म की दूसरी बड़ी ख़ूबी वे कलाकार हैं जिन्हें हमने अभी तक सह-किरदारों के रूप में देखा है। आदिल हुसैन को देखकर सबसे ज़्यादा हैरानी होती है। जिस आदिल को अभी तक द रिलक्टेंट फंडामेन्टलिस्टलाइफ ऑफ़ पाई याइंग्लिश विंग्लिश में हमने बहुत शहरी और सोफिस्टिकेटेड भूमिकाओं में देखा है, उस आदिल को असलम की भूमिका के रूप में स्वीकार करते हुए ज़रा भी वक़्त नहीं लगता। असलम असलम लगता है, आदिल नहीं और यहीं आदिल के अभिनय को विश्वसनीय बनाता है। हालाँकि, निजी तौर पर मुझे आदिल के पड़ोसी की भूमिका में मुकेश तिवारी ने बहुत प्रभावित किया। छोटे से कस्बे के एक नाकाम शायर (और नाकाम महबूब) के रूप में मुकेश ने कमाल का अभिनय किया है। और कुलभूषण खरबंदा मेरी याद में शान के शाकाल के रूप में कम, 'डीक्षिट' कहने की अपनी अदा और आईपैड से असलम के लिए संदेश पढ़ते पीएम के रूप में ज़्यादा बचे रहेंगे। 
इस फ़िल्म में जिस एक शख़्स को पर्दे पर देखते ही चेहरे पर हँसी आ जाता है, वो है संजय मिश्रा। ओवर-द-टॉप भूमिकाओं में भी कैसे अपने अभिनय की छाप छोड़ी जाती है, संजय मिश्रा को इसमें महारात हासिल है। हालाँकि जाने क्यों मुझे फँस गया रे ओबामा में संजय का किरदार याद आता रहा। उतनी ही प्रभावशाली भूमिका में पीएम के ओएसडी के रूप में हैं के के रैना। स्टारों और सुपरस्टारों के लिए लिखी और बनाए जानेवाली फ़िल्मों के बीच ऐसे कलाकारों के लिए भूमिकाएं क्यों नहीं लिखी जातीं, ये समझ पाना कोई रॉकेट साइंस नहीं है। पर्दे पर का स्पेस हर स्टार को इतना ही प्यारा होता है कि मुझे नहीं लगता कि वो किरदारों के इक्वल या फ़ेयर डिस्ट्रिब्यूशन में यकीन भी करता होगा। इस लिहाज़ से ज़ेड प्लस को इसलिए पूरे नंबर मिलने चाहिए क्योंकि यहाँ कहानी को तवज्जो दी गई है, कलाकारों को नहीं। कलाकार अपने दम पर कहानी पर अपनी-अपनी छाप छोड़ते हैं। 
हालाँकि फ़िल्म की महिला किरदारों को देखकर अफ़सोस होता है। हो सकता है ये मेरा वहम हो, लेकिन चाहे वो हमीदा हो, सईदा हो या फ़ौज़िया, सब अभिनेत्रियाँ ज़्यादा लगती हैं, किरदार कम। जितनी मेहनत पुरुष किरदारों के डायलॉग सँवारने में गई, उसका दसांश भी महिला किरदारों के डायलॉग को दिया जाता तो शायद जो बनावटीपन उनके किरदारों में दिखाई देता है, उससे बचा जा सकता था। मिसाल के तौर पर, मोना सिंह का शहरी लहज़ा उनसे छूटता नहीं और वहाँ स्थानीयपन को कोई पुट नहीं। ये स्थानीयपन और नहीं तो कम-से-कम पुरुषों की गालीनुमा गालियों में तो बचा रहता है। हालांकि, मुझे लगता रहा कि अगर मुख्य किरदारों के संवादों में रेगिस्तान की थोड़ी सी ख़ुशबू मिलाई जा सकती तो क्या मज़ा आता। उनकी उर्दू और हिंदुस्तानी कहीं-कहीं तो एकदम आर्टिफिशियल लगती है। जो और चीज़ें खलती रहीं वो मीडिया का पोट्रेअल था, जिसमें कहीं कोई ताज़गी नहीं थी। हम इन कैरिकेचरों को इतना देख चुके हैं कि स्क्रीन पर उनका आना बेमानी लगा। फ़िल्म की लंबाई भी खलती रही। एक और चीज़ जो खलती रही वो क्लाइमैक्स का बड़ी ख़ामोशी से आकर ख़त्म हो जाना था। आख़िरी के आधे घंटे फ़िल्म बहुत प्रेडिक्टेबल लगी मुझे - ऐसे कि जैसे एक के बाद घटनाएं ठीक वैसी ही बढ़ती रहीं जैसी हम उम्मीद कर रहे थे।  
मैं वीकेंड में जिस हॉल में फ़िल्म देख रही थी, वहाँ कुल मिलाकर २३ दर्शक थे। उड़ने वाली गाड़ियों और अनरिअलिस्टिक कहानियों के बीच अपने स्टार के लिए सीटियाँ और तालियाँ बजाने की आदत रखने वाली ऑडिएंस को ज़ेड प्लस इसलिए अच्छी नहीं लगेगी क्योंकि इस फ़िल्म में कहीं कोई मसाला नहीं है। अगर आपको सिर्फ़ और सिर्फ़ तंदूरी, पिज्ज़ा और चाइनिज़ खाने की आदत है तो ऑथेन्टिक राजस्थानी कुइज़िन की तरह ये फ़िल्म भी आपकी ज़ुबान पर थोड़ा भारी पड़ सकता है। ये फ़िल्म सटायर है, स्लैपस्टिक कॉमेडी नहीं। इसलिए हँसी फव्वारों में नहीं, फुहारों में आएगी। बाकी, जिस लोकतंत्र को लेकर ही हम इतने तटस्थ हो गए हैं, उस लोकतंत्र पर बने सटायर को लेकर हम क्या पता कभी संवेदनशील होंगे भी या नहीं (पहले आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी/अब किसी बात पर नहीं आती)। 
बहरहाल, एक मीडियम के रूप में फ़िल्म की सफलता इस बात में निहित होती है कि उस फ़िल्म ने हमारे वक़्त को कैसे रिकॉर्ड किया है। इस लिहाज़ से ज़ेड प्लस एक महत्वपूर्ण फिल्म है क्योंकि हमारा वक़्त और हमारी पीढ़ियों का सच सिर्फ़ कैंडीफ्लॉस अर्बन डिज़ाईनर सिनेमा ही नहीं है। हमारे वक़्त का सच उन कस्बों का सच भी है जिसे मीडिया रिपोर्ट करती नहीं, जिससे वजूद से हमारा कुछ बनता-बिगड़ता नहीं। और चूँकि फिल्म का लेखक (राम कुमार सिंह) ऐसे ही किसी कस्बे में पला-बढ़ा है, कस्बों में बसे उसी लोकतंत्र और वहाँ की दुनिया के बारे में लिखता-पढ़ता रहता है, इसलिए ज़ेड प्लस जैसी फ़िल्म इससे अधिक ईमानदारी से नहीं लिखी या बनाई जा सकती थी। कोअलिशन पॉलिटिक्स का दौर मुमकिन है टल गया हो, लेकिन ख़त्म नहीं हुआ। मेरा मानना है कि अपनी तमाम खामियों-खूबियों के साथ ज़ेड प्लस सिनेमा के तौर पर उतना ही प्रासंगिक है, जितनी लोकतंत्र के लिए गठबंधन की राजनीति। 
बावजूद इसके मेरे जैसे नाकारा दर्शक हैप्पी न्यू ईयर फर्स्ट डे फर्स्ट शो देखने जाएंगे, और जेड़ प्लस जैसी फ़िल्में तब देखेंगे जब वे या तो डीवीडी पर आ जाएंगी या जब कोई उनसे हक से पूछेगा, "फ़िल्म देखी तुमने?" 

Saturday, November 29, 2014

हलक में अटकी 'मम्मा की डायरी'

आज कल मुझे 'मम्मा की डायरी' के अलावा कुछ नहीं सूझता।

'मम्मा की डायरी' क्या है - इसका सही-सही जवाब देना भी ज़रा मुश्किल है। ये संस्मरण है या आत्मकथा, कथेतर रचना है या शब्दचित्र - ठीक-ठीक किसी को बता नहीं पाती। अपने प्रकाशक को भी नहीं। इसलिए, ये किताब मम्मा की डायरी है - एक माँ की डायरी के कुछ २०० पन्ने।

अब इस रचना प्रक्रिया से गुज़रते हुए मुझे समझ में आने लगा है कि कहानियाँ लिखना ज़्यादा आसान है, अपनी ज़िन्दगी बाँटना नहीं। कितना मुश्किल है सिर झुकाकर सरेपब्लिक ये कह देना कि मुझसे ग़लतियाँ हुई, और एक माँ परफेक्शन का पुतला नहीं होती है। कितना मुश्किल है बेख़ौफ़ ये कह देना कि माँ बनने को लेकर एक परिवार या समाज में जितना हाईप पैदा किया जाता है, उतनी ही संजीदगी से एक लड़की को माँ बनने के लिए तैयार किया जाता तो वो बेचारी लड़की औरत बनते-बनते अपने वजूद को चिंदी-चिंदी बिखरने और कतरा-कतरा समेटने के अतिरिक्त बोझ से बच जाती।

डायरी में प्रेग्नेंसी से लेकर बच्चों को आठ साल का कर देने के बीच का उतार-चढ़ाव है। डायरी में कई ज़रूरी सवाल भी हैं, जिनका जवाब इतनी सारी औरतों से, माँओं से, बच्चों से बात करने के बाद भी मुझे नहीं मिला। डायरी में मेरे कन्फ़ेशन्स भी हैं और कई पन्नों पर तो मैं बुरी तरह बिखरी हुई नज़र आती हूं। मम्मा की डायरी सिर्फ़ एक माँ की डायरी नहीं है, कई परिवारों, परिवारों की संरचनाओं, हमारे ज़माने की परवरिश के तौर-तरीकों का लेखा-जोखा है।

सवाल ऐसे हैं कमबख़्त की जवाब फिर भी नहीं मिलते।

किताब के पन्ने अभी तक प्रकाशक को सौंप नहीं पाई। ये भी नहीं मालूम कि मैं कब पूरी तरह आश्वस्त हो जाऊंगी कि अब मैं क्लोज़ेट से बाहर निकलने को तैयार हूँ। शायद उस दिन, जिस दिन किसी टीनेजर की माँ से बात करते हुए 'abandoned' सुनने पर रुलाई नहीं आएगी। शायद उस दिन, जिस दिन अपने जवान बेटे की मौत का शोक़ मनाती एक बदकिस्मत माँ का स्यापा रात में पूरी कायनात को गालियाँ देने को जगाए नहीं रखेगा। शायद उस दिन, जिस दिन मुझे लगेगा कि बहुत सुन लिया, झेल भी लिया अब तो। अब जाने दो कि हर हाल में जीने की सज़ा की मियाद कम नहीं होनी है।

उस दिन किताब के पन्ने प्रकाशक को सौंप दिए जाएंगे जिस दिन मैं अपने दो कांधों पर मुँह घुसाए सो रहे बच्चों की साँसों के अलावा सब भूल जाएंगे। उस दिन किताब के पन्ने प्रकाशक को सौंप दिए जाएंगे जिस दिन सुबह उठकर मैं कहूँगी कि बस, अब बहुत हुआ - अब कुछ नया सोचते और करते हैं। एक नए तरीके से एक नई पहचान के साथ जीते हैं।

यकीन रखो कि वो दिन जल्द ही आनेवाला है।

Friday, November 28, 2014

Of promises kept and broken

Promises to self from 27/11/13: 

- Will get those nameless faceless stories out of your system, and give them a definite identity. (Checked)

- Will take at least two vacations with A & A - one, by the sea and another on the hills. (Checked)

- Will live with each set of parents at least for one week each, at least twice a year. (Checked)

- Will spend some time with siblings and siblings-in-law, at least once a year (Checked)

-  Will lose those extra 4 kgs (Checked!)

- Will be a practitioner of light (A promise to keep forever!)

- Will stay away from the screen (either mobile or laptop) post 8 pm (Checked. Almost)

- Will do something about that damned backache (Still struggling)

- Will go back to learning Kathak from the scratch (Started. Yay!)

- Will learn a new Indian language. First option: Urdu (Started two days ago. Better late than never!)

- Will direct a short film on the musings of a mother/several mothers (Nowhere close to achieving it :() 
- Will go paragliding in Bir Billing (Pushed to next year's list)

- Will write a book or two for children (Pushed to next year's list) 

- Will work on those unfinished drafts lying in my folders since eternity (Nowhere close to that!)

- Will take two months off to travel across my home-state (Deferred, yet again)

- Will not worry about sounding stupid, or pompous. Will say what is meant to be said. (Almost there. This post is a proof. :))

- Will remind myself of this poem every single day of my existence, and will remember to be grateful for every single thing (Ongoing)

“Promise Yourself

To be so strong that nothing
can disturb your peace of mind.
To talk health, happiness, and prosperity
to every person you meet.

To make all your friends feel
that there is something in them
To look at the sunny side of everything
and make your optimism come true.

To think only the best, to work only for the best,
and to expect only the best.
To be just as enthusiastic about the success of others
as you are about your own.

To forget the mistakes of the past
and press on to the greater achievements of the future.
To wear a cheerful countenance at all times
and give every living creature you meet a smile.

To give so much time to the improvement of yourself
that you have no time to criticize others.
To be too large for worry, too noble for anger, too strong for fear,
and too happy to permit the presence of trouble.

To think well of yourself and to proclaim this fact to the world,
not in loud words but great deeds.
To live in faith that the whole world is on your side
so long as you are true to the best that is in you.”


― Christian D. LarsonYour Forces and How to Use Them

Wednesday, November 19, 2014

चांद निगलने की ताक़त फ़िलहाल मुझमें नहीं

अक्सर (सौ में से निन्यावे बार) आपके अपने बच्चे ही आपको आईना दिखा देते हैं। आदित ने बड़ी मासूमियत से कह दिया बीती रात, "जब देखो तब आप कोई न कोई किताब लेकर ट्रान्सलेट करते रहते हो। मम्मा, आप अपना कुछ क्यों नहीं लिखते?" 

मैं उसकी बात पर हँस पड़ी थी, और भाई को फ़ोन किया था कि देखो, मेरे पेट का जाया मेरा ही छोटा टास्कमास्टर हो गया है। लेकिन फिर उसकी बात पर बड़ी देर तक सोचती रही। बच्चे हमारी कमज़ोरियों, हमारे डर और हमारी फ़ितरत को हमसे बेहतर जानते हैं। आदित जानता है कि मैं इन दिनों से किस चीज़ से भाग रही हूं। 

मैं इन दिनों लिखने से भाग रही हूँ (और मेरी ही डायरी - मेरे ब्लॉग से नदारद सफ़हे इस बात का सबूत हैं)। मैंने इस साल इतना ही कम लिखा है कि ब्लॉग पोस्ट्स पचास का आंकड़ा भी नहीं छू पाईं। जो टेढ़ी-मेढ़ी बेतुकी कविताएं रचकर उनकी कमज़ोर बुनावट पर भी जो थोड़ी-बहुत वाह-वाहवाहियां मिल जाया करती थीं, वो बंद हो गई हैं। सात सालों में लिखी कुल बारह कहानियों को जोड़-तोड़कर जिस एक किताब (नीला स्कार्फ़) को लिख देने की बेईमानी मैंने की, उसकी कमउम्र शोहरत के दिन भी लद गए। 

अभी तो और कहानियां सुनाई जानी थीं। अभी तो कई फ़साने बाकी थे। फिर उनका क्या हुआ? 

बारह कहानियां लिखकर यूं तो कोई रचनाकार बन नहीं जाता, लेकिन अगर ख़ुद को सिर्फ़ कम्युनिकेटर - कहानियां सुना देने का एक ज़रिया भी मान लिया जाए - जो उसके लिए छह महीने तो क्या, छह साल की पहचान भी बहुत कम होती है। 

शायर सोते-जागते, उठते-बैठते, चलते-फिरते काफ़िया मिला रहा होता है। नसर में अपनी बात कहने का अदब रखनेवालों के लिए भी तो जुनून इसी टक्कर का होना चाहिए। 

कैसे कहूं आदित को कि जुनून तो है, हिम्मत नहीं। हर कहानी के साथ लगता है कि आंख पर पड़ा पर्दा हट गया। कोई झिल्ली थी जो फट गई। मन की आंखों के मोतियाबिंद का हर रोज़ इलाज चलता रहता है, और मन की आंखों की हर जिराही के बाद हर बार जो दुनिया नज़र आती है वो तकलीफ़ ही देती है। जी कहता है कि हम अंधे ही अच्छे थे। 

जो दिखने लगता है, उन कहानियों पर कहानियां चढ़ती जाती हैं। किरदारों के दर्द इस तरह काटते हैं कि अपने पैर की बिवाई हों। दुनिया बेमानी और बेमुरव्वत लगती है। हर इंसान बेचैन, हर रूह बेकल। सबकी इतनी इनसेक्योरिटी, इतने डर कि लगता है, जान बदन छोड़ती होगी तभी निडर होती होगी। वरना हम सबके कांधों पर तो सिर्फ़ खो देने का डर है - अपनी ताक़त, अपनी शोहरत, अपना परिवार, अपने ख़्वाब, अपना प्यार, अपनी चाहत, अपनी जान खो देने का डर। हम हैं क्यो सिवाय डर के पुलिंदों के? और तो और, ख़ुदा न ख़ास्ता, किसी कहानी का सिरा उसके मुक़म्मल अंजाम तक न पहुंचा पाए, उसे उसके डर से आज़ाद न कर पाए तो उसकी बेचैनी अलग। नहले पर दहला तो ये ग़म होता है कि किरदार अपना होता भी नहीं, लेकिन फिर भी अपना ही कुछ घुटता रहता है हर कहानी में। 

आदित की मां हुनरमंद है या नहीं, इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है? साबित किसे करना है और किसकी ख़ातिर? आदित की मां लिखे-पढ़े के दम पर जिस रोज़गार की तलाश में भटकती फिरती है उसका हासिल क्या है, ये भी आनेवाली नस्लें ही तय करेंगी। लेकिन आदित की मां में इंसानी जज़्बातों (इंसानी ही क्यों, पाशविक और हैवानी भी क्यों नहीं?) से आंख मिलाने की कितनी ताक़त थी, ये बात आदित तय करेगा। आदित की मां हर कहानी के साथ इंसानी रिश्तों की परतें खोलने की हिम्मत रखती थी या नहीं, ये भी आदित तय करेगा। 

जो कहानियों में आएगा, वो जख़्म की तरह भर दिया जाएगा। जो इन किरदारों की ज़िन्दगी में नहीं समा पाएगा, मन के किसी अंधेरे आवर्ती खाते में जमा किया जाता रहेगा। 

कहानियां लिखने वाले दौर और बेहोशी और बेख़ुदी के उन दौरों का इंतज़ार है। तब तक किसी और के लिखे का तर्जुमा ही कर लेने दो। चांद निगलने की ताक़त फ़िलहाल मुझमें नहीं, इसलिए 'आई स्वालोड द मून' का अनुवाद करने दो। अभी हिम्मत जुटा रही हूं। डर और डर से क्षणभंगुर आज़ादी की कहानियां लिखने में अभी थोड़ा और वक़्त है। 

और सुनो आदित कि वो चांद निगलने वाला शायर क्या कहता है - 

"... मगर एक बात को है, नज़्म हो या अफ़साना, उन से इजाज़ नहीं होता। वह आह भी है, चीख भी, दुहाई भी। मगर इंसानी दर्दों का इलाज नहीं है। वह सिर्फ़ इंसानी दर्दों को ममिया के रख देते हैं, ताकि आने वाली सदियों के लिए सनद रहे।" 

Friday, October 17, 2014

ज़िन्दगी के गीतों पर भारी पड़ी मौत की ख़ामोश पुकार

मुझे याद नहीं कि वो कौन-सा उदास दिन था कि मैंने ख़ुद को दिलासा देने के लिए एक गीत को लूप पर लगाकर छोड़ दिया था बस। तुतली-तुतली भोर सुनाती उजले-उजले बोल... न जाने कितनी बार रिवाइंड कर-करके सुनती रही थी ये गीत। फिल्म थी शोर, और शोर का दूसरा गीत ज़्यादा मशहूर है - एक प्यार का नग़मा है, मौजों की रवानी है / ज़िन्दगी और कुछ भी नहीं, तेरी मेरी कहानी है।

उस दिन पहली बार मैंने ढूंढकर देखा कि वो कौन-सा गीतकार था, जिसने ज़िन्दगी को बचाए रखने के हौसलों से भरे ये दो गीत लिखे थे। संतोष आनंद। संतोष आनंद का नाम बड़े गीतकारों में नहीं आता, इसलिए विविध भारती पर इस नाम के दो-एक बार सुनने के अलावा कोई और जानकारी थी नहीं इस गीतकार के बारे में। लेकिन गूगल ने संतोष आनंद के नाम कुछ और पसंदीदा गीतों को जोड़ने में मेरी मदद की। 'रोटी,कपड़ा और मकान' की गीत, फिल्म 'प्यासा सावन' का गीत ('मेघा रे, मेघा रे मत परदेस जा रे' और 'तेरा साथ है तो मुझे क्या कमी है')। इसके अलावा फिल्म क्रांति के गीत (ज़िन्दगी की न टूटे लड़ी)... सारे के सारे गीत इश्क के भरोसे और ज़िन्दगी की उम्मीदों से सराबोर। सारे के सारे विविध भारती के भरोसे किसी डूबती हुई दोपहर को बचा लेने वाले गीत।    

संतोष आनंद जी से कोई और वास्ता न था - उस तरह का तो बिल्कुल न था जैसे किसी कवि प्रदीप, मजरूह, साहिर, जांनिसार, कै़फ़ी, गुलज़ार, जावेद, आनंद बख्शी या फिर अमित खन्ना, इरशाद, स्वानन्द, नीलेश, प्रसून के साथ होता है। इन गीतकारों की नज़्में और कविताएं मैंने ढूंढ-ढूंढकर पढ़ी हैं। किताबें खरीद-खरीदकर पढ़ी हैं। लेकिन मैंने संतोष आनंद जी की कविताएं नहीं पढ़ी हैं।

पहली बार सोशल मीडिया पर ही ख़बर देखी कि मथुरा में एक दंपत्ति ने ट्रेन के आगे कूदकर खुदकुशी कर ली। ऐसी ख़बरों से बचकर निकल जाने में ही समझदारी लगती है। अपनी ज़िन्दगी की आपाधापी में ऐसे कई लम्हे आते हैं जब हमें उस धार पर चलने का गुमां होता है जहाँ कट जाने के अलावा कोई और ख़्याल नहीं आता। ज़िन्दगी संघर्षों का नाम है। हर बार एक नई चुनौती - ऐसी कि लगता है अब ज़िन्दगी ख़त्म कर देने में ही आसानियाँ हों।

खुदकुशी की ख़बर पढ़कर आगे बढ़ गई थी।

और फिर अचानकर सोशल मीडिया पर ही कहीं देखा कि ख़ुदकुशी कवि और गीतकार संतोष आनंद के बेटे संकल्प आनंद और उनकी पत्नी ने की, वो भी मानसिक प्रताड़ना से आज़िज आकर।

संतोष आनंद! उस संतोष आनंद के बेटे ने, जिस संतोष आनंद ने ज़िन्दगी पर ज़िन्दगी भर गीत बाँटे - वो भी उम्मीदों के,  प्यार के, यकीन के,रूह और वजूद की ताक़त के। जिसने लिखा, जो जीवन से हार मान जाए, उसकी हो जाए छुट्टी... नाक चढ़ाकर कहे ज़िन्दगी तेरी-मेरी हो गई कुट्टी। जिसने खेल-खेल में ज़िन्दगी के सबसे बड़े फ़लसफ़े को बड़ी आसानी से समझा दिया, और लिखा... ज़िन्दगी की न टूटे लड़ी, प्यार कर ले घड़ी दो घड़ी...

मैं नहीं जानती क्यों, लेकिन मैं फूट-फूटकर रोना चाहती हूँ। वो कैसा बदकिस्मत शायर निकला कि जिसने पूरी ज़िन्दगी अपने अल्फ़ाज़ों से उम्मीदें बाँटीं उसके हिस्से ऐसी त्रासदी आई है। वो कैसा बदकिस्मत शायर निकला कि उसी की अपनी संतान ने मौत की ख़ामोश पुकार को इतनी बेरहमी से गले लगाते हुए अपने ही पिता के अमर को गए शब्दों को कई तरजीह नहीं दी। वो कैसा बदकिस्मत शायर निकला कि जिसने ज़िन्दगी के दर्शन को गीतों-कविताओं में हमारे लिए सरल तो कर दिया लेकिन अपनी किस्मत की जटिलताओं से बच न सका।

संकल्प और उसकी इतनी प्यारी बीवी ने अपनी पाँच साल की मासूम बच्ची के साथ मर जाने का इतना बड़ा फ़ैसला क्यों लिया, इसके पीछे के राज़ बहुत गहरे हैं ज़रूर। हो सकता है कि मौत के उस रहस्यमयी कुंए में से नक्कारखाने की तूती की तरह कई और आवाज़े निकलें। लेकिन जो बच्ची बची रह गई और जो पिता बची हुई उम्र की ज़िंदा लाश को अपने कंधे पर ढोने के लिए बचा रह गया उन दोनों में से कोई अब गीत नहीं लिख पाएंगे कभी।

 

Wednesday, October 15, 2014

चाँद से चमक उठोगे एक दिन...

फ़िल्म अंखियों के झरोखे से का ये गीत (एक दिन, तुम बहुत बड़े बनोगे एक दिन) गुनगुनाते हुए सोच रही हूं कि वो एक दिन आता कब है?

जानते हो, वो एक दिन कभी नहीं आता।

वो एक दिन नहीं होता कि जिस दिन तुम्हारा कोई ख़्वाब अचानक पूरा हो जाता है। वो एक दिन कई रातों को जाग-जागकर ज़र्रा-ज़र्रा आबाद करने और ख़ुद को लम्हा-लम्हा बर्बाद करने से होता है।

वो एक दिन नहीं होता कि जिस दिन दुनिया को अचानक दूर उफ़्फक में तुम्हारे नाम का परचम लहराता हुआ दिखता है। वो एक दिन कई प्रकाश वर्षों तक धीमे-धीमे ख़ुद को मुसलसल जलाते-बुझाते रहने से होता है।

वो एक दिन नहीं होता कि जिस दिन तुम्हारी गुल्लक में ख़ुशियों के साथ-साथ सोने की गिन्नियाँ भी खनकने लगें। वो एक दिन अपने आंसुओं से मिट्टी को गीला कर-करके ज़िन्दगी की चाक पर कई बार उसे चढ़ाने, उसके टूट जाने का अफ़सोस बग़ैर मनाए नई मिट्टी को फिर से चढ़ाते रहने की लगातार कोशिशों से आता है। गुल्लक भी वैसे ही बनती है, और मिट्टी भी तभी सोना बनता है - कई सदियों-सी लंबी शामों के अथक इंतज़ार के बाद।

वो एक दिन नहीं होता कि जिस दिन ख़ुशियों की तितलियाँ कांधे पर उछलती-फिरती तुम्हारी मुट्ठियों में आ जाने को बेताब हो जाएँ। वो एक दिन वसंत के रूप में कई-कई सालों तक दिल के खेत में सरसों उगाने की मेहनत के बाद आता है। वरना दिल जब चाहे संग हो जाए, जब चाहे आंसुओं से बह जाए!

वो एक दिन नहीं होता कि जिस दिन तुम्हारी हैप्पी फ़ैमिली की तस्वीरें तुम्हारे घर की दीवारों पर मुस्कुराने लगती हैं। वो एक दिन कई सालों का लम्हा-लम्हा सब्र, क़तरा-क़तरा बलिदान, साँस-साँस भरोसे से आता है। उस दीवार में जुड़नेवाली ईंटें भी कई जन्मों की बचाई हुई उम्मीदों का प्रतिफल होती है।

जानाँ, वो एक दिन नहीं होता कि जिस दिन तुम्हारी किताब छप जाती है। तुम्हारी  फ़िल्म बन जाती है। वो एक दिन कई-कई सालों तक भीतर हर लम्हा पकते तजुर्बे से आता है। कई-कई सालों तक जिए हुए किसी रिसते हुए दर्द से आता है। जाने कितने जन्मों तक न कह पाने, न बता पाने, न बाँट पाने की बेचैनी से आता है।

वो एक दिन आएगा फिर भी, एक दिन!

Wednesday, September 10, 2014

यह फिल्म पुरुषों के लिए भी सबक है

जुड़वां बच्चों की प्रेगनेंसी मेरे लिए कई लिहाज़ से मुश्किल रही थी। जिस वक्त मैं एक अदद-सी नौकरी छोड़ने का मन बना रही थी, उस वक्त मेरे साथ के लोग अपने करियर के सबसे अहम पायदानों पर थे। मैं बेडरेस्ट में थी – करीब-करीब हाउस अरेस्ट में। न्यूज़ चैनल देखना छोड़ चुकी थी क्योंकि टीवी पर आते-जाते जाने-पहचाने चेहरे देखकर दिल डूबने लगता था। किताबें पढ़ना बंद कर चुकी थी क्योंकि लगता था, अब क्या फायदा। यहां से आगे का सफ़र सिर्फ बच्चे पालने, उनकी नाक साफ करने और फिर उनके लिए रोटियां बेलने में जाएगा। गाने सुनती थी तो अब नहीं सोचती थी कि बोल किसने लिखे, और कैसे लिखे। फिल्में देखती थी तो हैरत से नहीं, तटस्थता से देखती थी। ये स्वीकार करते हुए संकोच हो रहा है कि बच्चों के आने की खुशी पर अपना वक्त से पहले नाकाम हो जाना भारी पड़ गया था। सिज़ेरियन के पहले ऑपरेशन टेबल पर पड़े-पड़े मैं ओटी में बजते एफएम पर एक गाना सुनते हुए सोच रही थी कि मैं अब कभी लिख नहीं पाऊंगी – न गाने, न फिल्में, न कहानियां और न ही कविताएं। दो बच्चों की मां की ज़िन्दगी का रुख़ यूं भी बदल ही जाता होगा न?

मेरी कॉम ऑपरेशन थिएटर के टेबल पर डॉक्टर से बेहोशी के आलम में पूछती है, सिज़ेरियन के बाद मैं बॉक्सिंग कर पाऊंगी न?

वो मेरी कॉम थी – वर्ल्ड चैंपियन बॉक्सर। लेकिन उस मेरी कॉम में मुझे ठीक वही डर दिखाई दिया था जो मुझमें आया था बच्चों को जन्म देते हुए। फिल्म में कई लम्हे ऐसे थे जिन्हें देखते हुए लगा कि इन्हें सीधे-सीधे मेरी ज़िन्दगी से निकालकर पर्दे पर रख दिया गया हो। सिर्फ शक्लें बदल गई थीं, परिवेश बदल गया था, नाम बदल गए थे। लेकिन तजुर्बा वैसा ही था जैसा मैंने जिया था कभी।
इसलिए इस लेख को शुरु करते हुए मुझे इस बात का डर लग रहा था कि ये लेख मेरी कॉम फिल्म की समीक्षा की बजाए आत्मकथात्मक अधिक हो जाएगा। लेकिन मेरा डर इसलिए निराधार है क्योंकि अगर कोई कहानी, कोई फिल्म या किसी की कही हुई कोई बात में अपना अक्स नज़र आता है तो स्टोरीटेलिंग के उस फॉर्मैट को सफल मान लिया जाता है।

हालांकि रॉजर एबर्ट का एक मशहूर कोट है – It’s not what a movie is about, it’s how it is about.
व्हाटके बारे में बात की जाए तो मेरी कॉम का सफल होना लाज़िमी है। उमंग कुमार और प्रियंका चोपड़ा की अथक मेहनत के साथ-साथ मेरी कॉम की कहानी अपने आप में इस कदर मुकम्मल है कि उसमें एक बेस्टसेलर के सारे तत्व स्वाभाविक तौर पर मौजूद हैं। मेरी कॉम की ज़िन्दगी खुली किताब है। अनब्रेकेबल नाम की ऑटोबायोग्राफी में मेरी अपनी ज़िन्दगी के बारे में बहुत बेबाकी और ईमानदारी से पहले ही लिख चुकी हैं।

इस लिहाज़ से हाउ के पैमाने पर फिल्म का खरा उतरना ज़रूरी हो जाता है। और यही आकर प्रियंका चोपड़ा की मेरी के रूप में अदाकारी पर वाहवाहियां लुटाती मेरे भीतर बैठी मां और औरत पर एक सचेत दर्शक भारी पड़ जाता है। बायोपिक रिसर्च के दम पर बनाई जाती है, और वहां उमंग कुमार के हिस्से की वाहवाही इसलिए कम हो जाती है क्योंकि मेरी एक लिविंग लेजेन्ड तो है, लेकिन उसकी कहानी हर रोज़ लिखी जा रही है। इसलिए सब्जेक्ट के लिहाज़ से मेरी कॉम एक आसान विषय है। निर्देशक के हिस्से में इस बात का क्रेडिट ज़रूरत जाता है कि उन्होंने एक जीती-जागती बॉक्सर पर फिल्म (और वो भी पूरी तरह कमर्शियल फिल्म) बनाने की हिम्मत की। कई बार आसानियां ही हमारी लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है। उमंग के साथ भी यही हुआ है।
उमंग पहले खुद प्रोडक्शन डिज़ाईनर और आर्ट डायरेक्टर रहे हैं, इसलिए उनकी डिटेलिंग को देखकर हैरानी नहीं होती। बल्कि एक सीन है जिसमें ऑनलर मेरी को पहली बार अपनी मोटरसाइकिल पर बिठाकर घर छोड़ने जा रहा है। बिना स्ट्रीटलाइट वाली अंधेरी सड़क से गुज़रती हुई बाइक की हेडलाइट को देखकर एक झुरझुरी सी होती है। ठीक ऐसी ही हैं इम्फाल की सड़कें – अंधेरी, डरावनी, सुनसान। वो एक सीन मेरी कॉम के होम स्टेट मणिपुर के बारे में सबकुछ कह जाता है।
प्रोडक्शन में छोटी-छोटी बारीकियों का ख्याल रखा गया है – कोयले का चूल्हा, एक मरियल-सी गाय, घर और घर के सामान, इमा और इपा (मेरी के मां-बाप) की पोशाकें, कोच सर का बदहाल जिम और ट्रेनिंग सेंटर... हालांकि फिल्म मणिपुर में शूट हुई नहीं है, लेकिन एक बार भी मणिपुर में न होने का गुमां नहीं होता।

मेरी के किरदार के लिए प्रियंका चोपड़ा को साईन किए जाने पर उमंग की बहुत आलोचना हुई थी। मैं भी उन लोगों में से थी जो मेरी के रोल में किसी मणिपुरी एक्ट्रेस को देखना चाहते थे। एक ग्लैमरस प्रियंका चोपड़ा जैसी हीरोईन भला सीधी-सादी मेरी कॉम की तरह दिख भी कैसे सकती है? लेकिन प्रियंका चोपड़ा ने अपने अभिनय से सबकी बोलती बंद कर दी है।

मनाली की वादियों में कम-बैक की तैयारी करती मेरी कॉम के रूप में प्रियंका का शरीर वाकई किसी फाइटर का शरीर लगता है। पूरी फिल्म में प्रियंका के चेहरे पर कोई न कोई भाव है। एक लम्हे के लिए भी उनकी आंखें हमें नहीं छोड़तीं। कभी जोश, कभी ज़िद और कभी कमज़ोर दिखने वाली उन आंखों और उस चेहरे में असली मेरी कॉम का चेहरा बड़ी सहजता से घुल-मिल जाता है। दर्शन कुमार, रॉबिन दास और सुनील थापा अपने अपने किरदारों में बहुत आसानी से ढल जाते हैं।

हालांकि कई बार लगता है कि डायरेक्टर ने फिल्म के लिए संवाद लिखवाते हुए काश इतनी ही बारीकियों का ख्याल रखा होता। फिल्म में संवाद कई जगह ढीले हैं, और फेडरेशन के प्रमुख के रूप में सिन्हा के जिस किरदार को और दिलचस्प बनाया जा सकता था, वो तो बहुत ही ढीला और स्टीरियोटिपिकल है। मेरी कॉम की ज़िन्दगी के सभी अहम हाई-प्वाइंट्स को दिखाने की जल्दी में कई ख़ूबसूरत सीन से समझौता करना पड़ा है। मेरी का अपने पिता के साथ का रिश्ता, ओनलर की भूमिका, कोच की नाराज़गी, परिवार की परेशानियां, फेडरेशन की ज़्यादतियां, देशभक्ति, नॉर्थ-ईस्ट और इन्सर्जेंसी, महिला सशक्तिकरण – ये सबकुछ दिखाने के चक्कर में लगता है कि हम कहानी के एक पन्ने से दूसरे पन्ने पर इतनी तेज़ी से जा रहे हैं कि हमें कहानी ख़त्म कर देने की जल्दी है बस। फ्लैशबैक के जिस स्ट्रक्चर का इस्तेमाल हुआ है, उसकी कोई ज़रूरत नहीं लगती। कहानी लिनियर हो सकती थी, और तब शायद ज़्यादा बांधती। क्लाइमैक्स का मेलोड्रामा तो ज़रा भी नहीं पचता। तब डायरेक्टर के लिए भी अफ़सोस होता है, और एक्टर के लिए भी। बॉक्स ऑफिस पर तालियों और सिक्कों की खनक इतना बड़ी प्रेरणा होती है कि इसके लिए हम अपनी मूल कहानी के साथ समझौता करने को भी तैयार हो जाते हैं। आख़िर में आए राष्ट्रगीत ने रही-सही कसर पूरी कर दी। जो देश के नाम की भक्ति हमारे भीतर आनी भी हो, तो वो अपने आप नहीं आनी चाहिए?

बावजूद इसके फिल्म के कई हिस्सों में मेरी के किरदार में अपना अक्स दिखाई देता है – अपनी भीतर की बेचैन लड़की जिसका महत्वाकांक्षी होना उसकी शख्सियत का सबसे खराब पहलू माना जाता है, प्यार में पड़ी हुई औरत जिसे घर उतनी ही शिद्दत से चाहिए जितनी शिद्दत से मेडल चाहिए, एक मां जो अपने करियर के सबसे अहम मुकाम पर अपनी सबसे बड़ी फैमिली क्राइसिस भी झेल रही होती है, वो भी परिवार से दूर रहकर।

मेरी का ये किरदार एक शख्सियत न होकर महज़ एक काल्पनिक चरित्र होता तो क्या फिल्म को एक सार्थक कोशिश माना जा सकता था? मेरा जवाब हां में इसलिए है क्योंकि हाल की फिल्मों में फिल्म के हीरो की जो परिभाषा बदली है, मेरी कॉम उसी परिपाटी पर चलती है। मेरी कॉम अलग तरह से क्वीन है, और बिल्कुल अलग तरह से एक औरत के वजूद का, उसके रोज़मर्रा के संघर्षों पर उसकी जीत का सेलीब्रेशन है।

मुझ जैसी कई मांओं के लिए सबक भी है ये फिल्म – कि मदरहुड एक नई शुरुआत होती है। जब हम किसी नए चैप्टर की शुरुआत के लिए ज़िन्दगी का दूसरा चैप्टर ख़त्म कर रहे होते हैं तो कोई भी तजुर्बा बर्बाद नहीं जाता। हम अपने तजुर्बे का, अपने अलग-अलग वजूदों का कुल योग होते हैं, और ये कुल योग हमेशा टुकड़ों में बंटे हमारे वजूद से बड़ा होता है। ये बात हमारे मामले में उतनी ही सच है, जितनी मेरी कॉम के मामले में रही।

वैसे ये फिल्म पुरुषों के लिए भी एक सबक है। कोई और न सोच रहा हो तो ऑनलर की कहानी पर मैं फिल्म बनाना चाहूंगी एक दिन।   

Monday, September 1, 2014

तन्हा न बीत जाए दिन बहार का!

आई डोन्ट नो, मैंने एक सवाल के जवाब में कहा था।

मुझे नहीं मालूम मुझे कब, क्या, कैसे, क्यों चाहिए। मुझे ये भी नहीं मालूम कि जो है, जैसा है, वैसा क्यों है आख़िर। मुझे ये भी नहीं मालूम कि जो ठीक है नहीं, उसे ठीक किया कैसे जाए।

आई डोन्ट नो - मुझे नहीं मालूम - दुनिया के सबसे बड़े झूठ में से एक है।

वी ऑल नो। हम सबको मालूम होता है कि मुश्किल कहां है। हमें कौन-सी चीज़ आगे बढ़ने से रोक रही है। हम क्यों उलझे हुए हैं। हमारी तकलीफ़ों का सबब क्या है।

वी ऑल नो। रियली। हम सिर्फ़ सच से नज़र चुराने के लिए ख़ुद से झूठ बोलते रहते हैं।

मैंने अपने आस-पास कई जंजाल बुन लिए हैं। इन जंजालों की मुकम्मल शक्ल-सूरत होती तो इनसे निकलने के मुकम्मल रास्ते ढूंढे जा सकते थे। लेकिन ये जंजाल अमूर्त हैं। ग़ज़ब रूपों में अचानक कौंधी हुए बिजली की तरह दिखाई दे जाते हैं ये जंजाल -

अपने ही किसी अधूरे ख़्वाब के रूप में...

दूसरों के की जानेवाली अपेक्षाओं के रूप में...

किसी अज़ीज़ को औचक मिल गई सफलता से होने वाले तीखे रश्क के रूप में...

ख़ुद के कांधे चढ़ाई जा रही अपेक्षाओं के बोझ के रूप में...

सबके जंजाल एक-से। मेरे-आपके-इसके-उसके। सब बातों की जड़ कुल मिलाकर नौ रस, वो नौ भावनाएं जो हमारे जीवन को नियंत्रित करती हैं। सब बातों की जड़ें मन में कहीं समाई हुई हैं।

मैं नहीं जानती कि इन जंजालों से निकलने का रास्ता क्या है। लेकिन ये जानती हूं कि ये ताज़िन्दगी चलने वाली कोशिश है। ये भी जानती हूं कि फ़ैसला हमें करना होता है - कि हम इन जंजालों से हर रोज़ बाहर निकलने के रास्ते ढूंढेंगे या नहीं, अपने मन को दुरुस्त करने के तरीके अपनाएंगे या नहीं, उदासियों का लिबास ओढ़े दुनिया भर की सहानुभूतियां हासिल करने के लिए अपना दिल हथेली पर लिए सबकी ख़िड़कियों पर झांकते फिरेंगे - कि लो सुन लो मेरी बात, कोई तो इस टूटे हुए दिल की मरम्मत करने का ज़िम्मा उठा लो...

दिल बदनीयत है दोस्त। दिल किसी की मरम्मत किए नहीं जुड़ता। दिल किसी की सुनता भी नहीं। वो सिर्फ़ तुम्हारी सुनता है - उसकी, जिसके सीने में धड़कता है, हंसता-रोता है ज़ार-ज़ार।

इसलिए ख़ुद को कतरा-कतरा संभालने का ज़िम्मा अपने हाथों में लो। ख़्वाबों से पूछो कि चाहते क्या हैं। ख़ुद से प्यार करो। इतनी भी मत दो अपने कांधे कि टूट जाओ, बिखर जाओ। किसी और के रास्ते अपनी अपेक्षाओं की गेंदें मत उछालो। उस बिचारे को मैदान में अपनी जंग लड़ने से फ़ुर्सत नहीं।

मैं भी नहीं समझ पाती औऱ तुम भी नहीं समझ पाते कि सुकून 'तराना' फ़िल्म के गाने - 'गुंचे लगे हैं कहने' में मिथुन चक्रवर्ती के पीछे-पीछे चलती रंजीता है, जो ठीक साथ है लेकिन हम मुड़कर उसे देख नहीं पाते, और ज़िन्दगी की वादियों में भटकते हुए उसे आवाज़ देते-देते पूरी उम्र निकाल देते हैं। भागते रहते हैं, और सुकून दबे पांवों पीछे-पीछे भागती रहती है। रुककर उसे थाम लेने से अपने हिस्से के संगीत के, अपने हिस्से के इंतज़ार के ख़त्म हो जाने का डर सुकून को बांहों में ले लेने की ज़रूरत से बड़ा होता है।

इसलिए सभी सवालों के जवाब 'आई डोन्ट नो' पर आकर ख़त्म हो जाते हैं।

और ये जो सारी भाषणबाज़ी है न, सब की सब सिर्फ़ और सिर्फ़ नोट टू सेल्फ़ है!
 


Sunday, August 24, 2014

Then as it was, then again it will be...

(It is uncanny how I was dreaming of my grandfather yet again. 


Two years later... the same date... the same dream. 


Here is a note I wrote on FB on August 23rd, 2012. Yet another proof of what writing a diary could do to us, and how writing helps us understand our lives, actions and ourselves better through months and years, and through our lifetime. Yet another proof of why we should often communicate with ourselves. Yet another proof of how our expressions help us in the moments of despair.)  


I woke up really early today, having cried freely even in my dreams. It is really uncanny how I dream of my grandfather every time there is something I need to take a decision about.

I dreamt of him again last night. He was restless, and he was making me look for something I had lost. He was stading right behind me holding me by my shoulders, forcing me to duck down right under the bed.

"It's filthy out there. I am allergic to dust," I resisted.

"Get a broom and clean it", he said.

That couldn't be my grandfather, I thought to myself. This has to be someone else. Baba would have never asked me to pick up a broom, and do something THAT menial. I was too precious for him. 

I couldn't find what I was looking for, but I have got your message Baba. 

I need to clean up. I need to duck down in order to see where all this filth is lying, and I need to look for what I have lost, making my way through that clutter.

I need to find myself. I need to find patience. And I need to find time to indulge in meaningful conversations with myself in order to express better.

Now, THAT is what is bothering me. I am in such a hurry most of the time that I just need outlets to express - short conversations, a flash of thought, an idea, a sentence, a phrase, a line which is self-explanatory... All the mediums through which I am communicating are giving me such outlets. 

But what happened to the more meaningful conversations? The result is here - endless day-to-day shallowness and a monotony that is making me wonder where all my time is going! 

My dear Facebook, if it were not for you, I wouldn't have found even this bit of myself which wants to take a plunge into something deeper, something more challenging. I owe my courage to express uninhibitedly in public to you, and this is precisely why I need to step aside and look at what has become of me from a distance now. 

Is this what I wanted my expressions to be? 

I don't deny that what starts here with a monologue sometimes results into very meaningful and quick dialogues, with ideas flowing in from all sides - sometimes inspirational, sometimes creative, intuitive, imaginative, but quick nevertheless. And if you come to think of it, these quick conversations are like quick lovemaking, which fulfills the desire but can never be passionate and meaningful.

I am feeling the need of more meaningful conversations with myself now, more in-depth, more evocative. And hence I need to take some strong actions against small and quick communication, for some ideas will need to be left untouched and dissatisfied in order to grow into something bigger and more powerful.   

An action doesn't necessarily proceed by laws or by reasons. An action proceeds by feelings, intuition and conscience. An action, I would like to believe, is a representation of thoughts and behaviour. Consider this action of mine a way of disciplinging myself. I need to stay quiet. I need to cry without feeling miserable. I need to laugh without having this obsessive compulsive disorder of sharing that joke with the world. I need to be with myself. I am hoping that it surely will bring some order to the chaos of mind and will help me make the unknown known. If not that, it will at least help me acknowledge the unknown, and sometimes help me accept it.

For now, I would like to measure "a meaningful talk" by the control it has managed to achieve over outbursts of emotions. 

I will come back when I have something more meaningful and important to share that the mundane status updates and note-to-selfs. I will come back when I have found myself. 

क्या कहूं कहां ग़ुम हूं मुद्दतों से, 
मुझको तो ढूंढने निकला है अब घर मेरा। 

And here is the famous Led Zeppelin song which has been on a loop since early morning. Melancholy has its own charm, I tell you!

"But the eagle leaves the nest, it's got so far to go

Changes fill my time, baby, that's alright with me
In the midst I think of you, and how it used to be"  

Wednesday, August 20, 2014

ख़ानाबदोशियों पे ही जाने क्यों, इलाही मेरा जी आए!

टूटा हुआ एक घोंसला, बिस्तर पर फुदकते दो चूजे, फ़र्श पर घूमती बेपरवाह निर्भीक मोटी छिपकली, बिखरा हुआ घर और बाथरूम का एक नल जो बंद ही नहीं हो रहा... रात कुछ ऐसे बिंबों से होकर गुज़री है।

शुक्र है, सुबहों का वजूद रातों से आज़ाद होता है।

साढ़े छह बज गए हैं, लेकिन मैं उठना नहीं चाहती। छह चालीस हो गए हैं, लेकिन मैं फिर भी उठना नहीं चाहती। अगले पैंतीस मिनट में बच्चों की बस आ जाएगी, लेकिन मैं फिर भी उठना नहीं चाहती।

जाने वजह क्या है। रात जल्दी सो गई थी। लेकिन फिर भी मैं उठना नहीं चाहती। मैं बच्चों के बहाने अपनी छुट्टी चाहती हूँ।

बच्चों का इंटर-हाउस कविता पाठ है आज, और दोनों ने बहुत तैयारी की है। आदित तो साढ़े नौ बजे तक होमवर्क करता रहा था, और अपने क्लास के नोटिस बोर्ड पर लगाने के लिए पुलिसवाले का एक स्केच बनाता रहा था। नींद में भी दोनों अपनी-अपनी रटी हुई कविताएं दोहराते रहे थे।

मुझे उठना ही होगा। मुझे दोनों को स्कूल भेजना ही होगा, वरना दिल टूट जाएगा दोनों का।

साढ़े सात से थोड़ा पहले ही घर एकदम खाली हो जाता है। यूं कि जैसे तूफ़ान गुज़र गया हो, और आपाधापियों की निशानियां चुनते हुए एक ही ख़्याल तारी रहता है - बिस्तर पर जाऊं और सो जाऊं बस। गहरी नींद। बहुत गहरी। मर जाने के माफ़िक। और जब उठूं तो किसी अनजान शहर में उठूं, जहां से बिस्तर से बाथरूम तक जाने तक का दरवाज़ा ढूंढना पड़े, रसोई खोजनी पड़े, घर से बाहर निकलने का दरवाज़ा ख़ुद ही बनाना पड़े।

हम सबसे ज़्यादा जो छुपाते हैं, अपनी थकान को छुपाते हैं। जिस्म से ज़्यादा मन की थकान को।

मन को थकान दूर करने का कोई तरीका चाहिए।

ऐसे थके हुए मन को रिजुवेनेट करने के लिए जुलिया कैमेरॉन आपको आर्टिस्ट डेट पर जाने की सलाह देती हैं। कहती हैं कि अपने 'इनर चाइल्ड', अपनी भीतर के 'आर्टिस्ट चाइल्ड' को घर से बाहर निकालिए। शहर में बेवजह घूमिए। सूखी हुई पत्तियाँ अपनी जेबों में भरिए। टूटे-फूटे पत्थर गली-मोहल्लों से लाकर अपनी मेज़ों पर सजाईए। हफ़्ते में एक घंटे का वक़्त अपने लिए, सिर्फ़ अपने लिए निकालिए। ये वक़्त आपके भीतर के 'आर्टिस्ट चाइल्ड' की ज़िद पूरी करने का है।

मैं सोचती हूं, जूलिया कैमरॉन हिंदुस्तान में - ख़ासकर - उत्तर भारत में नहीं रही होंगी। सितंबर की चिलचिलाती धूप और गंदी-सी उमस में भला कोई पत्ते-पत्थर चुनने घर से बाहर जाए? मेरे भीतर का आर्टिस्ट चाइल्ड कभी सोता, कभी रोता हुआ ही ठीक है। हमारे देश में बच्चे ऐसे ही पाल लिए जाते हैं। हमारा समाज बच्चों को नर्चर करने में यकीन नहीं करता, इस बात पर यकीन करता है कि बच्चे बड़े हो ही जाते हैं। रोज़़-रोज़ का संघर्ष जो है, वो बच्चों और बच्चों की तरह भीतर के आर्टिस्ट बच्चे की बात सुनने का वक़्त नहीं देता।

फिर क्या है कि मन ज़िद पर अड़ा है? फिर क्यों मैं बेवजह इंटरनेट पर दुनिया के सबसे तन्हां और अलहदा शहरों के नाम ढूंढ रही हूं? क्यों गूगल पर अचानक टाईप कर बैठी - the 25 most remote places in the world? वो कौन-सी हैरतें हैं जो मैं जीना चाहती हूं, महसूस करना चाहती हूं? रोज़मर्रा की ज़िन्दगी कम हैरतअंगेज़ है? आस-पास कम हैरानियां, कम सदमे हैं कि कहीं दूर जाकर डूबते हुए देखना है सूरज को?

वो कौन-सा शहर होता होगा जहाँ रात उगती नहीं होगी कभी?

वो कौन-सा पहाड़ होगी जिसके चिकने पत्थरों पर से फिसलकर सीधे प्लूटो पर लैंड किया जा सके?

वो कौन-सी नदी होगी जिससे निकलकर मछलियां रेत पर आराम फ़रमाती हों?

दुनिया का सबसे ऊंचा, और सबसे नीचा शहर कैसा होता होगा?

मछुआरों की बस्तियों में क्या वाकई समंदर से निकलकर नाचने के लिए आती होंगी रूहें?

जंगल की बीचोंबीच सड़क जब बल खाना भूल जाती होगी तो कहाँ ठहरती होगी?

एक ज़िन्दगी में ये सब देख लें और जान लें, क्या मुमकिन है ये भी?

दो किताबें और एक आर्टिकल दूसरी ज़ुबान की शक्ल में ढलने का इंतज़ार कर रहे हैं। टूृ-लिस्ट है कि ख़त्म नहीं होती। क्लायंट मीटिंग्स और कॉनकॉल्स आज की ज़िन्दगी का इकलौता सच है। ड्राफ्ट्स में अधूरी कहानियां पुकार पुकार कर थक चुकी हैं। बाज़ार के सौ काम हैं, और बाज़ार जाने के नाम पर आनेवाली उबकाई कम नहीं हुई। मेरा बस चले तो दूध और सब्जी भी ऑनलाइन खरीद लूं। दोस्तों को आवाज़ देना चाहती हूं, लेकिन शुक्र है कि मेरे पास किसी का फोन नंबर नहीं। एक ही रोना क्या रोना हर रोज़? काम के अलावा ख़ुद को बचाए रखने का कोई दूसरा रास्ता नहीं। डेडलाइन जिए जाने की इकलौती वजह है।

सब जानती हूं, लेकिन फिर भी...

ख़ानाबदोशियों पे ही जाने क्यों,
इलाही मेरा जी आए, आए।
इलाही मेरा जी आए...

बूंदों पे नहीं, गहरे समंदर पे
इलाही मेरा जी आए, आए
इलाही मेरा जी आए!!!

 





Tuesday, August 19, 2014

एक चिट्ठी 'गुलज़ार' के नाम!

गुलज़ार साब,

उड़ीसा में एक इत्तू-सा स्टेशन है - इतना ही इत्तू-सा कि गूगल पर भी बड़ी मुश्किल से मिलता है। इंटरसिटी में बैठने के बाद मुझे कई बार स्टेशन का नाम मन ही मन कई बार रटना पड़ा था - राईराखोल... राईराखोल... राईराखोल... राईरोखोल। कुल दो मिनट ट्रेन रुकती थी वहाँ, और ग़लती से स्टेशन छूट जाता तो अगला स्टेशन कौन-सा होगा, ये भी नहीं मालूम था। उड़िया बोल पाती तो सूरमा बन जाती, लेकिन ज़ुबानों पर मेरी अपनी निर्भरता ने मेरे भीतर की भीरू लड़की के सारे पोल खोल दिए थे।

और ऊपर से ग़ज़ब बात ये कि जिस ड्राईवर को मुझे लेने आना था, वो पहुंचा नहीं वक़्त पर। एक अजनबी प्लैटफॉर्म पर गुम हो जाना फैंटैसी रही है मेरी, लेकिन वो प्लैटफॉर्म राईराखोल नहीं हो सकता था। What a disgrace it would have been!

स्टेशन पर उग आए पलाश के पेड़ों को गिनने में मुझे जितना वक़्त लगा, उतने ही लंबे थे ड्राईवर साब का 'दो मिनट'। गाड़ी में बैठते ही उस ड्राईवर के सात ख़ून माफ़ कर देने का फ़ैसला कर लिया था मैंने। एक तो अप्रैल में जलते उड़ीसा से झूठी राहत मिल गई थी, और दूसरा - गाड़ी में आपकी आवाज़ गूंज रही थी - याद है/मेरी मेज़ पर बैठे-बैठे/सिगरेट की डिबिया पर/छोटे-से एक पौधे का स्केच बनाया था...

मुझे मालूम नहीं था कि मैं किस शहर, किस क़स्बे में हूँ।

मुझे ये भी मालूम नहीं था कि मुझे जाना कहाँ है।

मैं ये भी नहीं जानती थी कि मुझे मंज़िल पर पहुँचाने का बीड़ा उठाने वाले इस ड्राईवर पर यकीन करना भी चाहिए या नहीं।

मुझे रास्ते का पता न था, जिन लोगों से मिलने जाना था उन लोगों के फोन नंबर के अलावा मेरे पास कोई और जानकारी न थी।

(मैं एक फ़ील्ड विज़िट पर थी, और गांवों में जाकर एक रिपोर्ट के लिए डेटा इकट्ठा कर रही थी। उड़ीसा के पांच ज़िलों के सफ़र पर थी, अकेली।)

लेकिन गाड़ी में आपकी आवाज़ सुनते ही सिक्स्थ सेंस ने कहा, इस अजनबी आदमी पर यकीन किया जा सकता है। जिस डाईवर की गाड़ी में गुलज़ार और जगजीत सिंह की आवाज़ मुसलसल बहती हो, वो ड्राईवर मेहमानों की सलामती अपनी ज़िम्मेदारी समझता होगा।

राईराखोल के जंगल-गांवों से निकलते हुए, महानदी के विशालकाय पुल से होकर, किसी नेशनल हाईवे के रास्ते हम सफ़र करते रहे, और गाड़ी में आपकी आवाज़ के पीछे-पीछे चलकर आपकी लिखी ग़ज़लें आती रहीं, गूंजती रहीं।

सारी वादी उदास बैठी है
मौसम-ए-ग़ुल ने ख़ुदकशी कर ली 

किसने बारूद बोया बाग़ों में?


मैं नियमगिरि से कुछ ही दूर थी। मै कालाहांडी के रास्ते में थी। मैं उन जंगलों, पहाड़ों से होकर गुज़र रही थी जिनकी आवाज़ें तभी सुनाई देती हैं जब तरक्कीपरस्त लोग उनपर हमले बोलते हैं। हैरान थी कि हर जगह का अलग-अलग सच एक नज़्म में कैसे बयां हो सकता है? लेकिन ये नज़्मआपकी लिखी थी। जिसने ज़िन्दगी को भरपूर, और भरपूर ईमानदारी से जिया-बोया-काटा-धोया-खंगाला हो, उसका बयां किया हुआ सच यूनिर्वसल सच के बहुत करीब होता है।

आओ हम सब पहन लें आईने 
सारे देखेंगे अपना ही चेहरा 

सबको सारे हसीं लगेंगे यहां 

हम सब ज़रूरतमंद लोग हैं। पेट और जिस्म की भूख से ज़्यादा बड़ी भूख दिल और ज़ेहन की होती है। किसी की छुअन, प्यार से थाम ली गई उंगलियां, दाएं गाल पर बेख़्याली में उतार दिया गया कोई बोसा, तारीफ़ में कहे गए चार सच्चे-झूठे अल्फ़ाज़, और किसी का दिलाया हुआ ये यकीन कि तुम्हारी ज़रूरत है - ये हर बार एक बड़ा फ़रेब होता है। लेकिन हर बार इस बड़े फ़रेब को सच मानने की बदगुमानी हर रोज़ जीना का हौसला देती है। हर शख़्स टूटा-फूटा है यहां।

और ये पहली बार नहीं था कि आपके अल्फ़ाज़ों में किसी कच्चे भरोसे को जोड़ने की पक्की कोशिश सुनाई दी थी फिर एक बार। मैं उन दिनों उलझनों में थी। कई सवाल के जवाब हम ज़िन्दगी भर ढूंढते रहते हैं। वैसे ही कुछ सवालों को बालों के क्लच में उलझाए हुए सिर पर बोझ-सा डाले घूम रही थी गांव-गांव, शहर-शहर।

अपना ही चेहरा देखना चाहते हैं हम गुलज़ार साब - हर रिश्ते में, हर दोस्ती में। हम सब थोड़े कम थोड़े ज़्यादा हैं तो नारसिस ही। हम सबको अपने-अपने एको... अपनी-अपनी ही परछाईयों से मोहब्बत है।

है नहीं जो दिखाई देता है
आईने पर छपा हुआ चेहरा 


तर्जुमा आईने का ठीक नहीं!

और जो दिखता नहीं, वो ऐसा सच है जिसे रेत में सिर घुसाए शुतुमुर्ग की तरह हम देखना ही नहीं चाहते। दोष आईने के किए हुए तर्जुमे का है ही नहीं। दोष हमारी नज़रों का है, जो आईने में सिर्फ़ अपनी झूठी शक्लें देखना चाहती है। नज़रें सच को झुठलाती हैं। नज़रें अपने दोष छुपाती हैं। नज़रें अपने ही गुनाहों, ग़लतियों, बेवकूफ़ियों से आंखें चुराती हैं। नज़रें को नज़र में नज़र डालकर बात करने वाली परछाईयां अच्छी ही नहीं लगतीं।

इसलिए हम बदलते नहीं। इसलिए हम सुधरते नहीं। 

ऐसे बिखरे हैं रात-दिन जैसे 
मोतियों वाला हार टूट गया 

तुमने मुझको पिरो के रखा था! 

कई बार हुआ है कि भीतर के गर्द-ओ-गुबार को साफ़ करने की ज़रूरत होती है हमको। कई बार होता है कि रोने के लिए कोई अनजान रास्ता मंसूब होता है। जब कोई न देख रहा हो तो खुलकर रोना आसान होता है। जब कोई न सुन रहा हो तो अपनी रूह के कन्फेशन बॉक्स में बैठे-बैठे अपने भीतर के किसी पादरी के सामने अपने गुनाहों को क़ुबूल करना आसान हो जाता है।

जिस दिन रूह किसी अनजान रास्ते पर खुलकर ज़ेहन से बात करती है उस दिन गुलज़ार साब, उस सदी में पैदा होने के लिए यूनिवर्स को हज़ारों शुक्रिया भेजता है दिल कि पैदा हुए तो उसी ज़माने में जिस ज़माने ने आप जैसा कोई शायर देखा। चले उन्हीं सड़कों पर, जिए वही सरोकार, हासिल की वही तकलीफ़ें जो आपकी कलम से बरसती रहती है लगातार।

आपकी सालगिरह पर और क्या कहूं, सिवाए इसके कि

हमको ग़ालिब ने ये दुआ दी थी
तुम सलामत रहो हज़ार बरस 


हमको ग़ालिब ने ये दुआ दी थी
तुम सलामत रहो हज़ार बरस 

ये बरस तो फ़क़त दिनों में गया!

और ये जो दिन हों न, उनकी उम्र हज़ार बरसों की हो। है तो क्लिशे ही, फिर आपसे मुआफ़ी के साथ। आपके आगे आप ही की बात करने की ज़ुर्रत की मुआफ़ी भी दे दी जाए!

आप गुलज़ार रहें, सदियों तक।

 अनु


   

Sunday, August 17, 2014

चले हैं दूर हम दीवाने... और मैं घुमन्तू!

सुबह-सुबह उठकर मुझे योगा करना चाहिए। टहलना चाहिए। अपने मोटापे को कम करने के तरीके ढूंढने चाहिए।

लेकिन सुबह-सुबह उठकर मैं कर क्या रही हूँ? गूगल पर पहाड़ों और पहाड़ी शहरों के नाम-पते ढूंढ रही हूं, कि जहाँ जाकर फ़ितूरी मन का चैन ढूंढा जा सके। आईआरसीटीसी पर टिकटें हैं, और छोटे-छोटे होमस्टे की कीमतें इतनी ही हैं कि अपने और अपने बच्चों के लिए ज़िन्दगी की थोड़ी-सी कामचलाऊ सहूलियतें और बहुत-सारी तस्वीरें, अल्फ़ाज़ी तस्वीरें, बिंब, प्रतीक, उपमाएं और ज़िन्दगी के ख़ूबसूरत होने का यकीन खरीद सकूं।


ये मेरी सबसे बड़ी फैंटेसी थी कि किसी दिन गाड़ी में बैठकर पूरा देश धांग मारूंगी। ये मेरा सबसे बड़ा ख़्वाब था - अब भी है - कि डायरी में नई जगहों, नए लोगों के नाम-पते होंगे। मैं हर सुबह किसी नए गांव, किसी नए शहर में उठूंगी और हर शाम शफ़क़ पर गिरते रंगों पर लिखी जानेवाली कविताओं और अफ़सानों की चिंदियाँ उसी गांव, उसी शहर में उड़ा आऊंगी।

मुझे घुमंतू पहाड़ों ने बनाया। दरअसल ईमानदारी से कहूं तो मैं घुमन्तू तो हूँ भी नहीं। गुमां पाल रखा है बस, घुमंतू होने का। याद नहीं कि सड़कों से, और रास्तों से कब प्यार हो गया था। जब से मुझे याद है, मुझे बेमतलब घूमना अच्छा लगता था। हम छोटे थे तो हमारे रास्ते भी बहुत छोटे हुए करते थे। बहुत हुआ तो रांची से ओरमांझी, गुमला, खूंटी, तोरपा, चांडिल, घाटशिला। थोड़े और खुश हुए तो रांची से पटना, सिवान। थोड़े और खुश हो गए तो जमशेदपुर, कोलकाता, पुरी, भुवनेश्वर। 


खुशियों का दायरा इतना सा ही था, लेकिन हर बार खाली सड़क पर, खुले आसमान के नीचे, दरख़्तों की छांव के बीच से, उगती-कटती फ़सलों से होकर अजान गांवों, कस्बों, शहरों की जो तस्वीरें चलती हुई गाड़ी से फास्ट-फॉरवर्ड मोशन में गुज़रतीं, उन्हीं से ज़ेहन में कल्पनाओं के रंग भरे जाते। सड़कों पर होना, रास्तों पर होना मेरे लिए अपने निज के सबसे करीब होने की तरह होता था, एक किस्म के मेडिटेशन की तरह। बचपन से।

फौज में रहे मेरे नानाजी अक्सर कहा करते थे, “यात्रा का मतलब ही है कष्टों की शुरुआत।“ मुझे उन कष्टों से मोहब्बत थी। सहूलियतें और आसानियां, ठहराव और स्टेटस को मुझे बहुत दुखी और परेशान करती हैं। मेरा फ़लसफ़ा ही है कि जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह-ओ-शाम...

नानी जी की बात समझ में आती है क्योंकि वे जिस पीढ़ी के थे, उस पीढ़ी के लिए गांव की सरहदें पार करना दुश्वार हुआ करता था। शहर के लिए सुबह चार बजे की इकलौती ट्रेन दस-बारह किलोमीटर दूर दरौंदा स्टेशन से जाया करती, जिसको पकड़ लेना वर्जिश से कम नहीं था। फुटबोर्ड पर अख़बार बिछाकर बैठने में कोई शर्म नहीं थी। दूसरे दर्जे में रिज़र्वेशन लेकर चढ़ना संपन्नता का प्रतीक माना जाता था।

फिर उनके बाद की पीढ़ी नौकरी और बेहतर ज़िन्दगी की तलाश में शहर आकर बसने लगी। यात्रा का मतलब हर साल शहर से गांव लौटना होता था। गर्मी छुट्टियों में घूमना 'घर जाना' होता था। हम भी कई सालों तक 'घर' गए - रांची से सिवान होते हुए अपने गांव मोरवन, और अपनी ननिहाल मुबारकपुर।

दुनिया इतनी-सी ही थी। घूमना इतना-सा ही था। बाबा थोड़े घुमक्कड़ थे, इसलिए पिकनिक के नाम पर पुरी तक जा आए थे हमलोग। पापा बहुत बड़े घुमक्कड़ थे, लेकिन पूरी ज़िन्दगी जंगलों और गांवों में अकेले घूमते रहे। कुछ पेशे की मजबूरी थी, और कुछ फ़ितरत की। और कुछ ये भी डर रहा होगा कि सुकुमार बच्चे मलेरिया के मच्छर झेल पाएंगे या नहीं।

मैं जिस पीढ़ी की हूं, उसका अपना कोई गांव, कोई शहर नहीं है। गांव और शहर - घर - के नाम पर जो भी बचा-खुचा रह गया है, वो नोस्टालजिया में जाकर बस गया है। मैं जिस पीढ़ी की हूं, वो जड़ों से उखड़ी हुई पीढ़ी है। उसे किसी गांव, किसी शहर से कोई ख़ास लगाव नहीं। हमारे लिए घर वहां बसता जहां मां-बाप की पोस्टिंग होती। घर और पते, शहर और गांव अक्सर बदलते रहे।

इसलिए पूरी दुनिया हमारा घर थी, और कहीं किसी मोड़ पर चार कदम से थोड़ी सी ही और दूर साथ चल लेने वाला हमराही हमारे लिए हमारे परिवार का सदस्य बन जाता था। हमने घर महानगरों में बनाया, कटवारिया सराय की किसी बरसाती में, मुंबई के चार बंगला में किसी वन-रूम फ्लैट की पीजी में। हमारे लिए दुख-सुख में साथ रहनेवाले हमारे रूममेट्स, हमारे दोस्त थे। हमारे लिए परिवार का मतलब भी वही थी, और उन्हीं दोस्तों से हमारे बच्चे अब मामा-मौसी-बुआ-चाचा का रिश्ता निभा रहे हैं।

मुझे ठीक-ठीक याद है कि मैंने अकेले घूमना कब शुरु कर दिया था। वो ज़िन्दगी की उदासियों और नाकामियों से बचने के लिए ढूंढे जानेवाले रास्तों के दिन थे। घुमक्कड़ी के मेरे शौक (और मेरी मजबूरी) को कम उम्र में हाथ आ जाने वाली ढेर सारी सैलरी ने हवा दे दी। पांच दिन हम जम कर मेहनत किया करते और बाकी के दो दिन आस-पास के पहाड़ों की खाक छानने में गुज़ारते।

मैं कभी अकेले घूमती, कभी अपने जैसी पागल दोस्तों के साथ घूमती। उस अजनबी ग्रुप के साथ घूमती जिसे ट्रेकिंग का शौक था, और जिससे दोस्ती हो जाने की कई वजहें हुआ करती थी। पता नहीं कब ऐसा हो गया कि अपने वजूद में मौजूद घर से लगाव को नई-नई जगहों को देखने के रोमांच ने रिप्लेस कर दिया।
वो घुमक्कड़ी अलग किस्म की थी। ट्रेन के स्लीपर क्लास में बैठकर नए शहरों की तलाश, शहर में कैंपनुमा ठिकानों की खोज और पैदल या रिक्शे या तांगे पर बैठकर नई गलियों की खोज। सफ़र करने का मतलब दस-बारह किलोमीटर ट्रेक करके किसी दुरूह पहाड़ी की बर्फीली चोटी देख आना होता था, सफ़र करने का मतलब अंधेरे जंगलों में ट्रेकिंग और रियल ट्रेज़र-हंट, रॉक-क्लाइम्बिंग, रैपलिंग, कयाकिंग, बोटिंग जैसी फिज़िकल और बेहद थका देनेवाली एक्टिविटिज़ होतीं। 


सफ़र करने का मतलब कम बजट में मिलनेवाला ढेर सारा थ्रिल होता। सफ़र करने का मतलब अजमेर शरीफ़ की दरगाह पर अकेले बैठकर कव्वाली सुनना होता, श्रीनगर के लाल चौक पर खड़े होकर जली हुई इमारतों से झांकती खिड़कियों के पीछे की ज़िन्दगियों की कल्पना करना होता। 

ऐसे खूब घुमक्कड़ी की मैंने। खूब दोस्त बनाए। वेलेंक्कनी चर्च के बाहर मिल गई स्टीफेन आंटी को सालों तक ख़त लिखे, मुक्तेश्वर के पास के एक गांव में प्रकाश के घर खाए राजमा-चावल का स्वाद महीनों तक याद रखा। बुरूस के सूखे फूलों और गोआ की रेत को छोट-छोटे बक्सों में बचाए रखा। 


ऐसा नहीं कि सिर्फ मधुर स्मृतियों ही मिलीं, लेकिन रास्ते में मिलनेवाली चुनौतियों और लोगों की हैरानी भरी नज़रों को अनदेखा करना कम उम्र में ही सीख लिया। मेरी घुमक्कड़ी ने मुझे आज़ाद बनाया और वो हिम्मत दी जो एक मध्यवर्गीय परिवार की छोटे शहर की लड़की को आमतौर पर संस्कारों में नहीं दिया जाता।

फिर शादी और जीवन साथी ने घुमक्कड़ी थोड़ी सोफिस्टिकेटेड कर दी। बिना किसी प्लानिंग के दो कदम न चलने वाले पति घूमने भी जाते तो पूरी तैयारी के साथ। अच्छे रिसॉर्ट में रहना, अच्छा खाना और ढंग की गाड़ी। मेरी किसी आउटडोर एक्टिविटी और नई-नई जगहों को देख लेने के शौक में उनकी दिलचस्पी नहीं थी। हममें एक ही चीज़ कॉमन थी, हम खूब पैदल चलते थे, हालांकि हमारी चाल, रास्ते और मंज़िल तीनों अलग-अलग होते।धीरे-धीरे हमने एक-दूसरे की घुमक्कड़ी के तरीकों के साथ समझौता करना सीख लिया, और अलग-अलग घूमने की वजहें और मौके तलाशने लगे - बिना किसी दुविधा या शिकायत के, बहुत सारी आपसी समझ और हामियों के साथ।

बच्चों ने मेरी घुमक्कड़ी को एक नया आयाम दिया है। छोटे बच्चों को लेकर भी मैं ख़ूब घूमी हूं। साथ में बारह-चौदह बोतलें, एक छोटा स्टेरेलाइज़र, सेरेलैक और दूध का डिब्बा, गर्म पानी की थर्मस, डायपर्स, बेबी वाइप्स और पुराने अख़बार होते। और साथ में कोई एक सहयात्री, जो पति से लेकर बच्चों के नाना-नानी, दादी-दादी और उनकी आया तक में से कोई भी हो सकता था।

बच्चे बड़े हो गए हैं और घुमक्कड़ी और बढ़ गई है। पहले थ्रिल मकसद था, अब बच्चों को देश-दुनिया दिखाना है। लोग दो बच्चों के साथ सफ़र पर निकली एक मां को देखकर अभी भी हैरान होते हैं। लेकिन उनकी इस हैरानी को मैं अपनी उपलब्धि ही मानती हूं। मैं और बच्चे सफ़र पर अपने मनमुताबिक साथी भी खोज लेते हैं – कोई हमउम्र दोस्त, कोई हमउम्र मां, कोई भलमानस ऑटोवाला, कोई अच्छा रिसॉर्ट मैनेजर...


मुझे इस बात का पक्का यकीन है कि हम सफ़र पर ही अपने असली रूप में होते हैं, बिना किसी दिखावे और मिलावट के। हमारा सब्र, हमारा असली स्वभाव और हमारी अनुकूलनशीलता का पता दरअसल सफ़र पर ही चलता है। जब हम घूम रहे होते हैं तो हम आंखें खुली रखते हैं और सफ़र ज़िन्दगी को लेकर हमारे कई मुगालते दूर करता है, हमें बेहतर इंसान बनाता है।
 

सफ़र करना हमें अपने इन्सटिन्क्ट पर, हमारे सिक्स्थ सेंस पर हमें भरोसा करना सिखाता है। सफ़र हमें दूसरों पर, यूनिवर्स की अदृश्य ताकतों पर भी यकीन करना सिखाता है। मैं नहीं जानती कि बड़े होने पर बच्चों के लिए घर लौटने का मतलब क्या होगा। मैं ये ज़रूर जानती हूं कि उनके लिए घुमक्ड़ी और सफ़र का मतलब ढेर सारी हैरत, हिम्मत, धैर्य और बाहर की दुनिया को खुद में आत्मसात करने की ताक़त होगा।

कुछ भी कर सकने का मेरा ये जज्बा मेरी घुमक्कड़ी की देन है, और अगर कोई दो चीज़ें हों जो मैं अपने बच्चों को दे सकूं तो वो घुमक्कड़ी का शौक और ये जज्बा है। 


In other news, घुमंतू मां की प्लानिंग पूरी हो गई है। हम अगस्त का एक वीकेंड हिमाचल के एक छोटे से पहाड़ पर, सितंबर का एक वीकेंड उत्तरांचल के एक छोटे से पहाड़ पर, अक्टूबर का एक वीकेंड पूर्णिया और दूसरा वीकेंड सिवान में, नवंबर का एक वीकेंड रामेश्वरम और पॉन्डिचेरी में और दिसंबर की छुट्टियां बंगाल और उड़ीसा में काटने की ख़्वाहिश रखते हैं।

डियर यूनिवर्स, हमारी इन ख़्वाहिशों को आपकी डायरी में दर्ज किया जाए!

वैसे एक और फैंटेसी भी है - ज़मीर फ़िल्म में अमिताभ बच्चन के स्टाईल में गिटार लेकर घूमते हुए गाना - 


चले हैं दूर हम दीवाने 
कोई रसीला सा, बांका सजीला सा यार मिले तो रुक जाएं 

ध्यान से सुनिए तो साहिर लुधियानवी के बोलों के मानी घुमक्कड़ी के सबसे दिलचस्प फ़लसफ़े के कम नहीं।