Friday, December 30, 2011

सिगरेट का आख़िरी कश

कमरे का कोना-कोना दुरुस्त कर दिया गया था। केन के लैंपशेड से ठीक उतनी ही रौशनी आ रही थी जितनी उसे पसंद थी - सिर्फ उसी कोने पर बिखरती हुई जहां कांच के एक फूलदान में नर्गिस के फूल बेतरतीबी से डाल दिए गए थे। फूलदान के नीचे मेज़पोश पर गिरती रौशनी में उसने जल्दी से उसपर बिखरे रंग गिन लिए - छह थे। एक रंग छूट गया था। खरीदते हुए उसने ध्यान क्यों नहीं दिया था? तैयार होते हुए लिली ऑफ द वैली
की शीशी देखी, जिसमें दम तोड़ती खुशबुओं की कुछ आखिरी बूंदें थी। कुछ स्थायी नहीं होता। एक दिन ये खुशबू भी अपनी-सी नहीं लगेगी। फ्रिज में पिछली पार्टी की बची हुए बियर की कुछ बोतलें थी जिनका नसीब तय किया जाना था। पार्टी में उसने अपने एक कॉलिग के सामने कहा था कि बियर और घोड़े की लीद की बदबू में कोई ख़ास अंतर नहीं होता। पार्टी में सब बीयर को छोड़कर ब्रीज़र पर भिड़ गए थे और किंगफिशर की ये बोतलें अभी भी वैसी ही पड़ी थीं, लावारिस। 

"बालों की कंडिशनिंग में इस्तेमाल कर लेंगे,"  उसकी रूममेट ने कहा तो उसे सोनमर्ग की घाटियों पर पसरे आर्मी कैंप के अस्तबलों से आती बदबू याद आ गई। 

''मिसमैच होगा, तुम्हारे बाल, ये बदबू... सोनमर्ग और कैंप्स की तरह'', और बोतलों में बची बीयर के इस्तेमाल की योजना फिर अनिश्चितकाल के लिए मुल्तवी हो गई।

जाने क्या सोचकर उसने बीयर के दो मग्स और बोतलें डाइनिंग टेबल पर रख दीं। बहुत ठंडी बीयर गले को नुकसान पहुंचाएगी और फिर कल प्राइमटाईम में उसी के शो के लिए कोई वॉयस ओवर करनेवाला नहीं मिलेगा।

रूममेट आज रात देर से आनेवाली थी, क्लायंट पार्टी में एप्पल जूस पर एक लंबी शाम काटने की सज़ा भुगतकर। लड़का कभी एक घंटे से ज्यादा वक्त के लिए नहीं आता था इन दिनों उसके पास। दूरी एक बहाना हो सकता था, लेकिन रोहिणी और जीके की दूरी से उसे ये ज़ेहन की दूरी ज्यादा लगती थी - मार्स और वीनस की दूरी जैसा कुछ। रोहिणी से आने में कम-से-कम डेढ़ घंटे लगते। यानि उसके पास बहुत सारा वक्त था। डिनर
के लिए राजमा-चावल बन सकता था, कपड़ों की अलमारी ठीक की जा सकती थी, रूममेट के किताबों के ख़ज़ाने में से कुछ मोती चुराए जा सकते थे, हर हफ्ते मंगाए जानेवाले न्यूज़वीक का एक आर्टिकल पढ़ कर अख़बारवाले पर अहसान किया जा सकता था... या ये तय किया जा सकता था कि अपने दिशाहीन रिलेशनशिप का क्या किया जाए। ये आख़िरी काम सबसे आसान था, क्योंकि तय करना बिल्कुल मुश्किल नहीं था। छोटे शहर से आई थी, लौटकर चली जाती। वहां सुकून था, कुशन था और पहचान बनाने की कोई जद्दोजेहद नहीं थी। फलां-फलां की बेटी अमुक साहब की बहू होती और पैरों के नीचे छह इंच मोटी गद्देदार लाल कालीन बिछाकर उसका स्वागत किया जाता। वहां कोई लड़ाई नहीं थी, एक आसान रास्ता था। बल्कि ज़िन्दगी भर की आसानी थी। 

फिर ये ज़िद किसलिए? क्या बचाए रखना था? हासिल क्या करना था आख़िर? 

सिगरेट, सिगरेट हासिल करना था फिलहाल। आदत ना सही, तलब सही। तलब ना सही, ज़रूरत सही। उसने लड़के को फोन करके उसे क्लासिक माइल्ड्स लाने की हिदायत दे दी। लड़के के आने में अब भी एक घंटे का वक्त था। 60 मिनट, 3600 सेकेंड। ज़रूरत इतना लंबा इंतज़ार क्यों करती? सो, उसने नीचे जाकर सिगरेट खरीदने का फ़ैसला किया। लाल रंग के चमकी चप्पलों में चमकते लाल रंग के नाखूनों पर नज़र गई तो रूममेट की एक और ज़िद का जीत जाना याद आया। वो इतनी जल्दी क्यों हार मान लेती है? अब घर जाकर नेलपॉलिश रिमूवर ढूंढने का अलग काम करना होगा। वैसे हर नाखून पर बीस सेकेंड के हिसाब से वक्त लगाया जाए तो 200 सेकेंड कम किए जा सकते हैं। रिमूवर ढूंढने में कम-से-कम 600 सेकेंड।

जीके में लड़कियों को सिगरेट खरीदते देखकर किसी की भौंहें नहीं चढ़ती और यहां सुपरमार्केट में आसानी से एल्कोहोल मिल जाया करता है। सिगरेट भी खरीद ली गई और ग्रीन एप्पल फ्लेवर वाले वोदका की बोतल भी। वो 600 सेकेंड का सौदा भी कर आई थी। वक्त का सौदा इतना भी मुश्किल नहीं होता।

इंटरनेट नहीं था, वरना कोई अच्छी सी कॉकटेल बनाई जा सकती थी। वोदका नीट पिया जा सकता है या नहीं, ये जानने के लिए उसके फिर लड़के को फोन किया। आखिरी ट्रैफिक सिग्नल पर हूं, जवाब में सवाल के जवाब जैसा कुछ नहीं था। नीट सही, ये सोचते हुए उसने एक ग्लास में वोदका डाल ली और क्लासिक माइल्ड्स के डिब्बे से सिगरेट निकाल ली, जलाने के लिए। "तुम्हें सिगरेट पीना कभी नहीं आएगा लड़की," रूममेट का
ताना याद आ गया। बाएं हाथ में सिगरेट थी और दाहिने में माचिस की जलती हुई तीली। ''मुंह में लेकर जलाओ और गहरा कश लो,'' दिमाग में रूममेट का निर्देश फॉलो करती रही और वॉयला! जलती हुए एक सिगरेट उसके हाथ में थी। 240 सेकेंड...

फोन की घंटी बजी। मां थी। 1200 सेकेंड, कम-से-कम। वक्त पर शादी और बच्चे हो जाने चाहिए, लोग बातें बनाते हैं... 200 सेकेंड... मोहल्ले में चिंकी-पिंकी-बिट्टू-गुड़िया की शादियां तय हो गई, लड़कों के खानदान का विवरण और दहेज की तैयारी... 600 सेकेंड... तुम्हारी नालायकी और सिरफिरेपन पर हमले... 600 सेकेंड... यहां तो बोनस था! दरवाज़े की घंटी बजी और फोन से सुबह तक के लिए निजात मिल गया।

"सिगरेट नहीं मिली। गाड़ी नहीं रोक सका कहीं।"

"मुझे मिल गई, पियोगे?"

"ओह! नो थैंक्स।"

''वोदका या बीयर?''

''कुछ ख़ास है?''

"नौकरी की सालगिरह है। अगले पच्चीस साल वहीं टिके रहने का वायदा कर आई हूं।"

''क्या चाहती हो?''

''पूछो क्या नहीं चाहती। जवाब देना आसान होगा।''

''तुम्हें उलझने की बीमारी है?''

''इतने सालों में आज पता चला है?''

''कुछ खाओगी? बाहर चलना है?''

''ग्रीन एप्पल के साथ काला नमक मस्त लगता है।''

''आई गिव अप।''

''बचपन से जानती हूं, तुम लूज़र हो।''

''व्हॉट्स रॉन्ग विथ यू? आई फील लाइक शेकिंग यू अप।''

''यू वोन्ट बिकॉज़ आई डोन्ट परमिट। तुम तो मुझे छूने के लिए इजाज़त मांगते हो।''

''आर यू ड्रंक?''

''देखकर क्या लगता है?''

''लगता है कि कोई फायदा नहीं। हम बेवजह कोशिश कर रहे हैं। मुझे वापस लौट जाना चाहिए।''

''दरवाज़ा तुम्हारे पीछे है। जाते-जाते मुझे सिगरेट की एक और डिब्बी देते जाना। रूममेट को चाहिए हो शायद। हम आधी रात को कहां खोजते फिरेंगे? हां, यू कैन वॉक डाउन टू द मार्केट। गाड़ी नीचे ही रहने दो।''

''यही होता है जब छोटे शहरों से लड़कियां आती हैं दिल्ली पढ़ने। बिगड़ जाती हैं। कुछ तो अपने वैल्युज़ याद रखा करो। यही करने के लिए आई थी यहां?''

''ये अगर तुम्हारा आख़िरी वार था तो खाली गया। अगली कोई कोशिश मत करना।''

''आई गिव अप।''

"ये वोदका लेते जाओ। यू मे नीड इट। सिगरेट भी एक्स्ट्रा खरीद लेना। तुम्हारे सारे गुनाह माफ़ हैं। वैल्युज़ मुझे ही गठरी में बांधकर दी गईं थीं दिल्ली आते हुए। लेते जाओ। मेरे घर वापस कर आना।"

लड़के ने उसकी तरफ बहुत उदास होकर देखा और कहा, 'मुझे क्यों लग रहा है कि तु्म्हें आखिरी बार देख रहा हूं?'

'फिर तो ठीक से देख लो। मैं इतनी खूबसूरत दुबारा नहीं लगूंगी।'

लड़का चला गया। थोड़ी देर बाद वॉचमैन क्लासिक माइल्ड्स के पांच डिब्बे पहुंचा गया था।

रूममेट के इंतज़ार में वो बालकनी में बैठकर एक डिब्बा फूंक चुकी थी। नया डिब्बा उसने रूममेट के आने पर ही खोला।

"मेरी कोशिश कामयाब रही। वो अब वापस नहीं लौटेगा।"

"तुमने ऐसा किया क्यों आखिर?"

''उसे अपने घर पर होना चाहिए, अपने मां-बाप के साथ। ही ओज़ देम हिज़ लाइफ। ही डिडन्ट ओ मी एनीथिंग।"

''तुम उसके साथ भी तो जा सकती थी। प्यार नहीं करती थी उससे?''

'करती थी। करती हूं। इसीलिए तो उसके साथ नहीं गई,' ये कहते हुए उसने सिगरेट का एक आखिरी गहरा कश लिया और उठकर बीयर से बालों की कंडिशनिंग करने के लिए बाथरूम में घुस गई।

4 comments:

Arvind Mishra said...

हे भगवान लहरें के बाद यहाँ भी! येट टू ब्रूटस:)

Puja Upadhyay said...

WOW!!!
यही तो ढूंढ रही थी मैं कब से...कहाँ है ये लड़की, मुझे मिलना है इससे...क्या लाजवाब लिखा है...खास तौर से अंत सबसे खूबसूरत लगा...प्यार करती थी इसलिए तो नहीं गयी।

जहाँपनाह...तुससी ग्रेट हो...तोफा कुबूल करो ;)

दीपक बाबा said...

अपनी अपनी जिंदगी.

डॉ .अनुराग said...

बियर के कंडिशनिंग इफेक्ट ......जिंदगी की तरह है ....दो दिन तक सब कुछ खिला खिला लगता है ...कुछ चीज़े वैसी ही रहती है मसलन मांये....इंटरनेट मुआ इन्हें नहीं बदल पाया ...बस बोयेज़ हॉस्टल में इत्ता फर्क होता था के कोकटेल के बदले पञ्च बनाना आसान था ...यूँ भी तीसरे पैग के बाद विल्स भी चल जाती है .......Love your writing....