Friday, October 8, 2010

कुट्टी और मेल का खेल


वो आई है लौटकर घर चुपचाप-सी,
कहती है, भाई से कुट्टी हुई है।
नहीं चाहिए उसके खिलौने, और साथ भी
ऐसे रूठी जैसे सुबह ही रूठी हुई है।
नहीं हो तुम मेरी मम्मा अगर पास आएगा वो,
ऐसी एक सख़्त-सी ताक़ीद मुझको हुई है।

लेकिन जो मैं कान पकडू़ं भाई का
तो मुझपर बरसती है।
जैसे कोई गलती ही मुझसे हुई है।
जाने कब मिल जाते हैं दोनों,
पिघल जाता है गुस्सा,
यूं हो जाते हैं फिर एक साथ
जैसे मेरी ही कुट्टी उनसे हुई है!

2 comments:

संजय भास्कर said...

bachpan ki yaden taja ho gai..

संजय भास्कर said...

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com