Sunday, October 17, 2010

दुर्गा पूजा की यादें, बच्चों की ख़ातिर

आद्या और आदित,

आज विजयदशमी है। मम्मा आप लोगों के लिए अपने बचपन की कुछ यादें सहेजकर लिख ले रही है ताकि आप दोनों जब बड़े हो जाएं और मेरी भी यादें धुंधली पड़ने लगे तो मैं आपको फिर भी अपने बचपन के बारे में कुछ बता सकूं।

छुट्टी तो हमारी भी लंबी ही होती थी दुर्गा पूजा के लिए, लेकिन हम छुट्टियों का नहीं, पूजा के आने का इंतज़ार करते थे। क्या कहूं कि पूरा शहर कैसे अचानक एक नया रंग ले लेता था। मौसम बदलने लगता था, सुबह-शाम की हवा अच्छी लगती थी और हम भी समझ जाते थे कि मां दुर्गा ने अपने आने की आहट दे दी है। हमारे रांची वाले घर की गली तो देखी है ना आप दोनों ने? गली में घुसते ही बाईं तरफ जो बड़ी चहारदीवारी दिखती है ना, वहां दरअसल एक बड़ा-सा खाली मैदान था। पूरे साल हम उसी मैदान में धमाचौकड़ी करते, खो-खो, कबड्डी, पिट्ठू, क्रिकेट, गुल्ली डंडा खेलते। शाम तो हमारी वहीं निकला करती थी, उसी मैदान में। वहीं हमने साइकिल चलाना सीखा, वहीं भैया मामू से खूब उलझी भी, वहीं दोस्त बनाए और कुछ दुश्मन भी। पांच-छह कट्ठे का रहा होगा वो मैदान, लेकिन तब लगता था जैसे पूरी दुनिया उसी परिधि में सिमटती हो।

तो उसी मैदान में बारिश के बाद लंबी-लंबी घास निकल आया करती थी जिसपर पूरा-पूरा दिन हेलीकॉप्टर-सी तितलियां मंडरातीं और पूरा-पूरा दिन हम उन तितलियों के पीछे भागते। मैदान के किनारे-किनारे कास के फूल निकल आते थे। उजले, रूई से हल्के फूल। छुओ तो हाथ से फिसल जाएं। वो घास जब कपड़ों में चिपकती तो आपकी नानी मां हमपर गुस्सा करतीं। धोने में कितनी परेशानी होती होगी उनको!

जब घसियारिनें मैदान में घास काटने के लिए पहुंचतीं तो हम समझ जाते कि पू्जा की तैयारियां शुरू हो गई हैं। पूरे शनिवार-इतवार हम बहाने बना-बनाके मैदान में उनका घास काटना देखने के लिए पहुंच जाया करते। उस कटे हुए घास की खुशबू अबतक नहीं भूली हूं मैं, बारिश के बाद का गीलापन लिए हुए घास की वो खुशबू। तो घास कट जाती, मोहल्ले के चाचा-भैया लोग चंदे उठा लिया करते और उसी मैदान में बांस की बल्लियां गिरने लगतीं। सब उत्सुक होते कि इस साल मां दुर्गा सपरिवार किस रूप में उतरेंगी हमारे मोहल्ले में। हर साल नया रूप, हर साल पंडाल का नया रंग। नए कपड़े सिल जाते, चप्पलें बदल दी जातीं, चूड़ियों के नए डिब्बे निकल आते, माथे की बिंदियों पर पूर्णमासी का चांद उतर आता।

पूरे शहर में जगह-जगह पंडाल बन रहे होते। हम षष्ठी का इंतज़ार करते और मां की आंखें खुलते हीं पूरा शहर जैसे जश्न में डूब जाता। एक हरसिंगार का पेड़ था हमारे घर के पास ऑरोविन्दो आश्रम में। वहां फूल चुनने के लिए मार पड़ने लगती। सुबह चार बजे से ही लोग अपने-अपने हाथों में थैलियां लिए गली-गली फूल चुना करते। हरसिंगार के उन फूलों का पुष्पांजलि में बड़ा महत्व था। शायद अब भी होता होगा। खैर, हरसिंगार के अलावा चंपा, चमेली, जवा कुसुम के फूलों से पूजा की थालियां सज जाया करतीं। हमारे घर के आंगन में चांदनी का एक बड़ा-सा पेड़ था। हम भी फूल चुन-चुनकर चांदनी और जवाकुसुम की एक सुन्दर सी माला बनाया करते।

ढाक के बजते ही पूरा मोहल्ला जान जाता कि सुबह की आरती का वक्त हो गया है। गहरे, चटक रंगों की पाढ़ वाली साड़ियों में लिपटीं मोहल्ले की चाचियां, भाभियां लाल बिंदी लगाए, खुले घुंघराले बालों से पानी टपकाती हुई जब पूजा की थालियां लिए पंडाल में पहुंचतीं तो लगता साक्षात दुर्गा ऐसे ही कई रूपों में होती होगी शायद। धूप और अगरबत्ती की खुशबू हमारे घर के आंगन तक पहुंचती थी। मां के भोग के लिए जो खिचड़ी बनती उसका स्वाद छप्पन भोग से बेहतर होता। आज तक वैसी सोंधी खिचड़ी मैंने नहीं खाई। लकड़ियों के चूल्हे और मिट्टी की हांडी का स्वाद मिला होता था उसमें।

शाम ढलते ही फिर एक बार आरती होती। मेरी दोस्त सुवर्णा मुखर्जी के चाचा (नाम याद नहीं आ रहा अभी) धुनुची नाच करते। हाथ में आग लिए मुंह से भी धुंआ निकालते धूप का दिया पकड़े हुए उनके नाच को देखने के लिए अपना मोहल्ला क्या, आस-पास के इलाकों से भी लोग आया करते। ढाकवाला तो बर्दमान (पं. बंगाल) से आता था शायद।

अंधेरा होते ही पूरी सड़क लाइटों से जगमगा जाती। ऐसा लगता जैसे असंख्य तारे हमारी खुशी में शामिल होने की इच्छा से हमारे बीच ही उतर आए हैं। रात के खाने के बाद हम भी शहर के पंडालों के दर्शन के लिए निकलते। उन पंडालों की सज्जा पर तो एक पूरा थीसिस लिखा जा सकता है। किसी साल व्हाइट हाउस थीम होता, कहीं विक्टोरिया मेमोरियल, कहीं लोटस टेम्पल की थीम होती तो कहीं पूरा का पूरा पंडाल भूसे से बना दिया जाता। पूरी रात अपने दादाजी और घर के बाकी सदस्यों के साथ हम गली-कूचों के पंडाल देखते, दुर्गाबाड़ी में मां के दर्शन करते और रात के तीन बजे कहीं फुचके खाते, कहीं चाट पकौड़ियां। हमारे लिए मेलों से खिलौने भी खरीदे जाते, कभी किचन सेट, कभी डॉक्टर सेट, कभी नाचनेवाला बंदर, कभी घर्र-घर्र चलती गाड़ी।

नवमी के दिन हम रातू जाते, महल में रातू के राजा का मेला देखना। क्या कहूं कि उस बीस किलोमीटर के सफर का, शहर से दूर एक पुराने महल में जाने का हम पूरे साल कितनी बेसब्री से इंतज़ार करते। रातू की पूजा टुकड़ों-टुकड़ों में याद है। ये याद है कि वहां सौ से ज़्यादा बकरों की बलि चढ़ाई जाती, महल के बगीचे में एक बड़ा-सा मेला लगता और रातू के राजा की एक छवि पाने के लिए घंटों लोग इंतज़ार करते।

विजयदशमी की तो बात ही निराली थी। किसी साल हम मोराबादी मैदान में रावण दहन देखने जाते तो किसी साल धुर्वा चले जाते। एक एम्बैस्डर में पूरा मोहल्ला समा जाता और हम दो बजे से ही मैदान के किसी वान्टेज प्वाइंट पर अपनी गाड़ी लगा देते जहां से दहन का पूरा नज़ारा साफ दिखाई देता। दहन तो अंधेरा होने के बाद होता लेकिन वो तीन-चार घंटे आस-पास के लोगों से गप-शप में मूंगफली तोड़ते, चाट खाते, गुब्बारे फुलाते गुज़रता। हम बच्चों को गाड़ी के ऊपर बिठा दिया जाता। जो थोड़े छोटे होते, उनको बड़ों के कंधों पर जगह दे दी जाती। और हम खुश हो-होकर, तालियां बजा-बजाकर असत्य पर सत्य की, पाप पर पुण्य की विजय देखते। घर लौटकर आते तो हाथ में तीर-धनुष, डुगडुगी, गुब्बारे जैसी कई चीज़ें होतीं। विजयदशमी की कढ़ी-पकौड़ों का भी स्वाद नहीं भूली। वैसी कढ़ी तो कोई नहीं बना पाता अब।

विसर्जन के वक्त शहर में एक अलग-सा नज़ारा होता। मां की विदाई करते हुए सब क्यों भावुक हो जाते थे, क्यों रोते थे, अब समझ में आता है। उन चार-पांच दिनों में तो हम किसी और दुनिया में होते थे, कई रिश्ते बनाते थे, एक परिवार-सा रहते थे।

ये जश्न, ये उत्सव का माहौल तुम्हें सौंप नहीं पाई हूं, इसका मलाल हमेशा रहता है। लेकिन वायदा करती हूं, कोलकाता, रांची, जमशेदपुर, पूर्णियां - सब जगह की दुर्गा पूजा से तुम्हारी यादों को भी भर दूंगी। तबतक, मां दुर्गा तुम्हें खुश रखें, तुमपर अपनी कृपा-दृष्टि बनाए रखें।

तुम्हारी मां।

6 comments:

चैतन्य शर्मा said...

आपके बचपन की यादें तो कितनी सुंदर हैं..... मुझे जानकर अच्छा लगा ...अच्छी बातें भी पता चलीं

विजयदशमी की शुभकामनायें आपको भी

Manish Kumar said...

गुलज़ार वाली पोस्ट पहले पढ़ी अब यहाँ आया हूँ। बेहतरीन ढंग से सँजोया है आपने अपनी यादों को..

राँची में बिताया आपका हँसता खिलखिलाता बचपन इस प्रविष्टि में उभर कर आया है। हजारों चिंताओं से दूर जब बचपन में ऐसे त्योहार आते थे तो मन उत्साह और उमंग से लबरेज़ हो जाया करता था।

मैं तो युवावस्था में राँची आया और अब भी जब दुर्गापूजा के सबसे अविस्मरणीय क्षणों की बात करूँ तो अभी भी पटना में बिताए बचपन के वो लमहे याद आते हैं जब हम अर्धरात्रि में पंडालो् की गहमागहमी से गुज़र चुकने के बाद पटना में देश भर से आय महान कलाकारों की गायिकी, नृत्य और वाद्य वादन का लुत्फ़ उठाया करते थे।

Sunil Kumar said...

achha sansmaran bachpan ki yadon ko sanjona bhi badi bat hai

Prashant Raj said...

Budhun aur Sudhun chacha hain...Suvarna di ke donon chacha log ka naam! :)

manu said...

achchhaa lagaa aapko padhnaa...

Saumya said...

Anu, ye post pardh kar aisa laga mano fir se main wo 10 saal ki bachi ban gayi hu jo din bhar sajh dhaj kar mohalle ke panadal me dosto ke saath khelti thi. Kitne masum aur pyare din the na wo?