Friday, October 29, 2010

बेज़ुबां ख़्वाब कुछ कहते हैं

सुबह-सुबह मिले ख़्वाब की
तासीर कैसी है,
कैसा है मिज़ाज तुम्हारा,
पूछती हूं ख़ुद से।
हंस देता है आईना,
उलझे-रूखे बालों,
सूखे होंठों पर
ठंड उतर आई है।

लेकिन नर्म हाथों की
गर्मी से आज मैंने
आंखों को सहलाया है ।
बांधा है फिर से
कुछ हर्फ़ों को
दुपट्टे के कोने में।
नुक़्तों को
माथे की बिंदिया बनाया है।
फिर बनी हूं
एक नज़्म आज मैं,
फिर कोई गीत
याद आया है।

I can hear my dreams talk

Dream, my dream!
How are we this morning,
I ask.
The mirror smiles at me
And the chapped lips,
Dry, coarse hair
Resemble new-found winter.

But I share the warmth
Of my palms
With my watery eyes.
I tie some phrases
At the far end of my dupatta,
And sprinkle some words
over my forehead.
I am a sonnet today,
I am looking out for a song.

4 comments:

गिरिजेश राव said...

gr8
why not write about different moods during a day? just an idea, sirjee! :)

Manoj K said...

आज की ठंडी सुबह का विवरण, कुछ ऐसे ही ठंडे होंठ और गरम हथेलियों के साथ आज उठा हूँ..

बहुत ही सधी हुई रचने है..

Udan Tashtari said...

फिर बनी हूं
एक नज़्म आज मैं,
फिर कोई गीत
याद आया है।

-वाह!! बहुत उम्दा नज़्म बन गई...

Staff Association said...

bahut sundar anu....kuchh hai baat tumhari yahan tak pahunch rahee hai..