Tuesday, October 26, 2010

बच्चों का आना - भाग 4 (पहाड़ों पर उनके बगैर)

नौकरी छोड़ते ही एक शानदार प्रस्ताव मिला है, जिसे ठुकरा नहीं सकती। "क्या आप हमारे लिए एक डॉक्युमेंट्री बनाएंगी?" एक एनजीओ के डायरेक्टर जब मुझसे पूछते हैं तो मुझे यकीन नहीं होता। फिल्म और मैं? एक टूटी पीठ और दो छोटे बच्चों के साथ? लेकिन पूरा परिवार मेरी हौसलाअफ्ज़ाई में जुट जाता है। बच्चों की दादी और नानी ने गज़ब के तारतम्य के साथ घर का मोर्चा संभाल लिया है। मैं घर से दूर, पूर्वा एक्सप्रेस में बैठ अपने ही राज्य झारखंड के एक ऐसे शहर, ऐसे इलाके के लिए निकल पड़ती हूं जिसका नाम ही सुना है बस।

कई महीनों में ये पहला मौका है जब मैं अकेले सफ़र पर निकली हूं। फिल्म की शूटिंग के पहले रेक्की करनी है, इसलिए साथ में कोई नहीं। ब्रीफ के नाम पर इतना मालूम है कि झारखंड और पश्चिम बंगाल की राजमहल पहाड़ियों में एक प्रीमिटिव ट्राइबल ग्रुप (आदिम जाति) रहती है जिन्हें पहाड़िया कहते हैं। इनकी जीवन-शैली, इनकी समस्याओं और मुख्यधारा से दूर इनके रोज़-रोज़ के संघर्ष पर ना सिर्फ फिल्म बनानी है, बल्कि इसे तस्वीरों और कहानियों के ज़रिए शहरों में बसनेवाले "सभ्य समाज" तक भी पहुंचाना है। इस तरह का ये मेरा पहला असाइनमेंट है, इसलिए चिंता लाज़िमी है।

मैं सफ़र में पढ़ने की कोशिश करती हूं। मन बार-बार बच्चों की ओर लौटता है। क्या कर रहे होंगे? उन्हें लगता होगा मां कहां चली गई? रात में रोएंगे तो नहीं? जहां-जहां नेटवर्क मिलता है, मैं उनकी खोज-खबर के लिए फोन करती रहती हूं। फिर मेरी मां ही कहती है, "हमपर भरोसा करो और अपने फ़ैसले पर भी। जिस काम के लिए गई हो, वो ठीक से करके आओ।" फिर मैं घंटे-घंटे फोन करना बंद कर देती हूं।

मुझे जेसीडीह उतरना है। यहां से अस्सी किलोमीटर दूर गोड्डा जाना है, जहां से फिर साठ किलोमीटर अंदर राजमहल की पहाड़ियों पर बसे गांवों में मेरे पात्र होंगे, मेरी कहानियां होंगी। स्टेशन पर मुझे एक टूटी-फूटी से मार्शल लेने आई है। वैजनाथ जी ड्राईवर हैं। जेसीडीह से निकलते ही पूछते हैं, "मैम, गाना लगा दूं क्या?" हामी भरते ही घरघराता हुआ टेपरिकॉर्डर बज उठता है। मोहम्मद रफी के गानों की बेहद खराब नकल। नकल करनेवाले गायक की आवाज़ नहीं पकड़ पाती। बाबुल सुप्रियो? नहीं, वो तो किशोर दा के गानों की नकल करते हैं, और फिर उनकी आवाज़ ठीक ही है। ये महाशय कौन हैं? ना चाहते हुए भी मैं कैसेट का कवर मांग बैठती हूं। ऐश्वर्या की आंखें मुझे ऐसे घूर रही हैं जैसे पूछ रही हों, क्या जानना चाहती हो? चुपचाप कैसेट बजने दो और ज्ञान बघारने की कोशिश तो बिल्कुल मत करना। सो, घरघराता हुआ टेपरिकॉर्डर अपनी घिसी हुई आवाज़ में कैफ़ी आज़मी के लिखे गीत गाता चला जाता है - "ये दुनिया ये महफिल मेरे काम की नहीं..." मैं घबराकर आंखें बंद कर लेती हूं।

शाम होते-होते हम गोड्डा पहुंच गए हैं। मैं एनजीओ के स्थानीय दफ्तर गई हूं। सब घर निकलने की तैयारी में हैं। सुबह दस बजे का वक्त देकर सब अंधेरा होते-होते निकलने लगते हैं। पांच बजे? दिन इतना छोटा? दस बजे सुबह तक मैं क्या करूंगी इस सोए हुए कस्बे में? मैं बेहद परेशान हो जाती हूं। कुछ प्रोजेक्ट रिपोर्ट देखने के बहाने से एक घंटा निकल जाता है, लेकिन अब और नहीं। मुझे होटल पहुंचा दिया गया है। एक अकेली लड़की को होटल वाले भी घूम-घूमकर देख रहे हैं। ये कहां फंस गई मैं? जी में आता है, ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाकर कहूं, दो बच्चों की मां हूं मैं। मेरे पहनावे को देखकर लड़की मत समझना मुझे। ख़ैर, खाना कमरे में ही भेजने को कह मैं धाड़ से दरवाज़ा बंद कर लेती हूं। अचानक मुझे घर और बच्चों की याद बुरी तरह सताने लगी है। कमरे में अजीब-सी गंध है। खिड़की खोल नहीं सकती, जाली पर मच्छरों को दिमाग में ही गिन लिया है मैंने। अपनी क्रीम की आधी बोतल मैं अपने हाथों पर उंडेल लेती हूं। कुछ तो राहत मिलेगी। बाथरूम की ओर तो झांकने का भी मन नहीं करता। फिल्ममेकर भी बनोगी अनु सिंह और ज़िन्दगी के मज़े भी लूटोगी? मुमकिन ही नहीं।

रात सफ़ेद पन्नों पर कई तरह की योजनाएं बनाते गुज़रती है। लाल-नीले कलम में पूरी ज़िन्दगी की योजना पन्नों पर बिखरी पड़ी है, मैं फिर भी उतनी ही उलझी हुई और परेशान हूं। अकेलापन क्या बना देता है आपको? आठ बजे से ही ड्राईवर का इंतज़ार है। पौने दस बजे पहुंचता है वो। तबतक मैं गोड्डा से ही भाग निकलने को तत्पर हूं। ख़ैर, आज का दिन तो शहर में ही बीतना है। मैं दिनभर क्षेत्र में काम करनेवाले सामाजिक कार्यकर्ताओं से पहाड़िया लोगों के बारे में ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी इकट्ठी करना चाहती हूं। सुंदरपहाड़ी में रहनेवाले टीम लीडर कहते हैं, "आंकड़ें कुछ नहीं बताएंगे आपको। You will have to experience them to know them better." बिल्कुल। यही तो मैं कह रही हूं। सुंदरपहाड़ी ले चलिए ना मुझे। दफ्तर में रेक्की थोड़े करूंगी। मैं झल्ला उठती हूं।

अगली सुबह पांच बजे का वक्त मुकर्रर होता है निकलने के लिए। मुझे नींद तो आज भी नहीं आई है, लेकिन फिर भी खुश हूं कि कल फील्ड में तो रहूंगी। पीठ जवाब देने लगी है। डर से पेनकिलर नहीं खा रही। अगर सुबह नींद ना खुली तो? करवट बदलते रात निकलती है।

सुबह-सुबह मैं होटल के चौकीदार कम वेटर को आवाज़ देती हूं। "इतना भोरे-भोरे?" मैं बिना जवाब दिए सीढ़ियां उतर जाती हूं। थोड़ी ही देर में हम शहर के बाहर होते हैं। गाड़ी में अब भजन बज रहा है, फिल्मी गानों की तर्ज पर। "बहारों फूल बरसाओ" की पैरोडी भजन के रूप में! लेकिन आज मैं आंखें बंद नहीं करती। गोड्डा शहर से बाहर सड़क के किनारे के गांव अंगड़ाई लेते हुए बाहर निकल आए हैं। कहीं साथ-साथ मवेशी चलते हैं, कहीं नवंबर की हल्की ठंड में धूप का कोना पकड़े बड़े-बूढ़े सुस्ता रहे हैं। और बाकी भारत के गांवों के खेतों, सड़कों पर सुबह-सुबह जो नज़ारा दिखता है, उससे कहां बच सकते हैं आप! सुंदरपहाड़ी एक ब्लॉक है जहां मुझे टीमलीडर से मिलना है। यहां से गाड़ी में नहीं, मोटरसाइकिल पर जाना है। खु़दा रहम करे! मेरी पीठ का क्या होगा? जहां मोटरसाइकिल नहीं जाएगी वहां दो से तीन किलोमीटर पैदल चलना होगा। पहाड़ी रास्ते पर? नहले पर दहला! जब ओखली मे सिर दिया तो मूसलों से क्या डरूं। मैं बहादुर बच्चे की तरह हराधन साव की मोटरसाइकिल पर पीछे बैठ जाती हूं।

सुंदरपहाड़ी से निकलते ही दूसरी दुनिया में आ जाते हैं हम। दूर तक पसरी पहाड़ियां, पहाड़ पर झुका नीला आसमान, खेतों में कटने के लिए तैयार फसलें, और फिर हम अचानक जंगल में जा घुसे थे। अभी तक तो सड़कें मौजूद थीं। हराधन मुझे निचले इलाके के गांवों में ले जा रहा था।

टूटी-फूटी झोंपडियां, लेकिन सामने पसरे सरसों के पीले खेत। गांव के बाहर एक चापाकल और चापाकल पर झुक आया नीम। मैदान में फुटबॉल खेलते नंग-धडंग बच्चे। हराधन मुझे चापाकल के पास ही किसी पहाड़िया के घर ले आया है। "जामू पहाड़िया नाम है इनका", हराधन कहता है। मैं कुछ झिझकते हुए, कुछ अनिश्चितता के साथ हाथ जोड़कर लकड़ी काटते अधनंगे शख्स को 'नमस्ते' कहती हूं। इसी दुविधा में हूं कि क्या पूछूं, कहां से बातचीत शुरू करूं कि हराधन परेशानी और बढ़ा देता है। "दीदी, इन्हें हिंदी नहीं आती।" "तुम्हें इनकी भाषा तो आती है ना", मैं इतनी जल्दी हताश थोड़ी हो जाऊंगी। "थोड़ी-थोड़ी।" अब क्या करूं? मैं फिर भी जामू से उनका नाम पूछती हूं। जामू मुस्कुरा रहे हैं। मैं पूछती हूं कि परिवार में कितने सदस्य हैं? जामू अभी थोड़ा और मुस्कुरा रहे हैं। "हराधन, मैं कैसे बात करूंगी ऐसे?" मैं झल्ला उठती हूं। हराधन भागता हुआ गांव के भीतर से एक दुभाषिया पकड़ लाया है। जामेश्वर पहाड़िया स्वास्थ्य कर्मचारी हैं, इनकी पत्नी आंगनबाड़ी सेविका है। रांची तक हो आए हैं। गांव में सबसे पढ़ा-लिखा परिवार है इनका।

जामेश्वर की मदद से मैं गांव के लोगों के बारे में कुछ जानकारी चाहती हूं। इन पहाड़ों पर आजीविका के लिए शायद ही कोई ज़रिया यहां बसनेवालों के लिए उपलब्ध है। अमूमन हर पहाड़िया परिवार आज भी झूम खेती पर निर्भर है। पहाड़ों और पहाड़ों की ढ़लानों पर फिर किसी दूसरी जगह जंगल काटकर ये लोग लोबिया, मक्का, बाजरा और सरसों जैसी कुछ फसलें उगाते हैं। जिनके पास खेत नहीं, वे पत्ते चुनकर या लकड़ियां बेचकर अपना गुज़ारा करते हैं। आजीविका का कोई और साधन इन गांवों में मौजूद नहीं है।

ये तो फिर भी समृद्ध गांव है जिसके पास चापाकल है। यहां से और ऊपर जाते-जाते गांवों में पानी के साधन के नाम पर मीलों दूर मौजूद पहाड़ी झरने रह जाते हैं। एक मटका पानी के लिए कई किलोमीटर चलना पड़ता है। भूख-प्यास से जान बच गई तो मलेरिया नहीं छोड़ेगी, मलेरिया से भी बचे तो हैजा और डायरिया जैसी बीमारियां यहां जान लेती हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं इन गांवों में लक्ज़री है, विलास के साधन। जालेश्वर बड़ी उम्मीद से सबकुछ बता रहा है, जैसे मेरा यहां होना उनके लिए बदलाव का कोई रास्ता खोले शायद। मैं सफाई देती हूं, अपनी पहचान भी। लेकिन पूरा गांव जामू के दरवाज़े पर जुट गया है। बताते हैं, कुछ एनजीओ के लोगों को छोड़कर कोई सरकारी व्यक्ति दूर-दराज के पहाड़िया गांवों में कभी गया ही नहीं।

फिलहाल मेरे अंदर का फिल्ममेकर जाग चुका है। मैं सबकुछ कैमरे के पीछे से देख रही हूं। गांव, गांव के लोग, पानी के लिए पैदल चलती औरतें, हंडिया के लिए शाम को जमा हुए आदिवासी, उनके हाट-बाज़ार, उनका लोक-संगीत.... पिक्चर हिट है बॉस। अवार्ड विनिंग। क्या ज़बर्दस्त डॉक्युमेंट्री बनेगी।

जामू की सात-आठ साल की बेटी अचानक मेरे सामने खड़ी हो जाती है। हाथ में पत्ते के एक दोने में उबली हुई मकई के कुछ दाने हैं और दूसरे हाथ में पानी का एक लोटा। शरीर पर कपड़े के नाम पर एक चड्ढी है। गंदे बाल, बढ़े हुए नाखून। सोचती हूं, कितने दिनों से ये नहाई नहीं होगी। लेकिन उसकी आंखों में ऐसी आत्मीयता है कि मैं अपनेआप उसके हाथ से दोना और पानी, दोनों ले लेती हूं।

मुझे अब सबकुछ साफ-साफ दिखाई दे रहा है। जामू के चार बच्चे, जामू, उसकी पत्नी जिसके बढ़े हुए पेट को एक मैली-कुचली साड़ी किसी तरह ढंके हुए है बस, दरवाज़े की ओट से झांकते कुछ और बच्चे, जालेश्वर और उसके बगल में मोटरसाइकिल का सहारा लिए खड़ा हराधन। अचानक मुझे खुद को देखकर बड़ी शर्मिंदगी महसूस हो रही है। रिबॉक के जूते, लिवाइस की जीन्स, फैब इंडिया की कुर्ती, एडिडास की टोपी, एफसीयूके के सनग्लासेस... मेरा एक दिन के पहनावे का खर्च इनकी सालाना आमदनी से कहीं ज़्यादा है। मैं घबरा उठती हूं। यहां से जाना चाहती हूं। हराधन फिर आने की बात कह मोटरसाइकिल सड़क की ओर मोड़ लेता है।

मेरे पीछे बैठते-बैठते हराधन बस इतना कहता है, "दीदी, वो दाने शायद उनके अनाज के आखिरी दाने थे।" पीछे बैठते-बैठते मैं रो पड़ती हूं। रोती चली जाती हूं।

http://janatantra.com/2010/03/22/anu-singh-reportage-on-condition-of-tribals-of-jharkhand/



7 comments:

संजय कुमार चौरसिया said...

umda prastuti

http://sanjaykuamr.blogspot.com/

Udan Tashtari said...

बहुत प्रवाहमयी संस्मरण..लगा कि साथ साथ चल रहे हैं. अंत में भावुक कर दिया.

sushant said...

fieldworks are tiring but they are the real eye openers..this comment of mine may feel to you out of place...however the point i want to make is that this piece of yours reinforces what i feel about fieldwork..and one realises its worth when one transcends from fieldwork to feelwork...simply written piece which delivers the feelings strongly.

Manoj K said...

अन्थ्रोपोलोजी से ताल्लुक रखता हूँ .. सो आपका फिल्ड वर्क का वर्णन बहुत पसंद आया.

आदिवासी समुदायों को मुख्य धारा में लाने के लिए जवाहरलाल नेहरु के समय से प्रयास चल रहे हैं, सब जानते हैं.. लेकिन जो विचारधारा आजकल पनप रही है वोह यह की आदिवासी समुदायों को वहीँ रहने दिया जाये जहाँ वह हैं.. इसका मतलब यह नहीं की विकास ना हो और उन्हें अच्छे जीवन जीने के अशिकार ना मिलें, पर उन्हें जीविकोपार्जन के साधन वहीँ मिले जहाँ वह निवास कर रहे हैं. जंगल से प्राप्त चीज़ें (forest produce) को प्रसंस्करित किया जाए और उन्हें फिर बाजार में बेचा जाये. ऐसे ही कई और तरीके हो सकते हैं जो आदिवासियों को बेहतर जीवन दे सके..

Manish Kumar said...

इस राज्य में रहते हुए भी इस तरह की जिंदगियों से कम ही मुलाकात हो पाती है। अपने संस्मरण को शब्दों में बखूबी क़ैद किया है आपने..

सतीश पंचम said...

बहुत रोचक ढंग से आपने वर्णन किया है। दरअसल इस तरह के गरीब तबकों के बीच जाने पर, उनकी गरीबी देखकर हमें खुद ब खुद अपने रीबॉक के जूतों और एडीडास के बैग वगैरह से एक तरह का दुराव सा होने लगता है। लेकिन बाद में शहर में आने पर हम फिर उन्हीं चीजों में रम जाते हैं। यह मानवीय प्रवृत्ति है। मैं भी कभी कभी इस तरह से वक्ती तौर पर इमोशनल हो उठता हूं....लेकिन समय बीतने का साथ सब नॉर्मल :)

Kishore Choudhary said...

पहाड़ हो या रेत, ज़िन्दगी इतनी ही सख्त है
आपकी संवेदनाएं अभी ब्रांडेड नहीं हुई है, मुझे इस बात की ख़ुशी है.