Thursday, October 28, 2010

इन बेज़ुबां ख़्वाबों का क्या करूं

एक ख़्बाब मिलता है सुबह सिरहाने,
कैसी बेचैनी है जो तकिए पर लेटी दिखती है।
जहां जाती हूं, घर में पीछे-पीछे चलती है।
लफ़्ज़ हैं कि तितलियों जैसे फड़फड़ाते हैं,
थाम भी लूं तो काग़ज़ पर उतरने से डरते हैं।

आंखों के कोने पर लटका एक आंसू
आज क्यों बाढ़-सा बहने को बेताब है?
क्या उलझन है जो मन में
एक गांठ-सी बनी बैठी है
किसे झकझोरूं, किसको खोलूं।

खिड़की से बाहर आसमां का कोई कोना
अपना नहीं लगता।
नीले-नीले बादलों की नाव
मुझे मंझधार में क्यों छोड़ जाती है
क्यों सब डूबता उतराता-सा लगता है।

सुबह सिरहाने मिला वो ख़्वाब
कुछ कहता ही नहीं,
बस साथ-साथ चलता है।
वो बेचैनी जैसे आंखों में उतर आई है
धूप में भी सब नमनाक दिखता है।

Dreams, that don't speak


I find a dream kept on my bed

The restless one rests on my pillow.

It follows me in the house,

And wherever I go.

Words keep flying around,

Like butterflies.

And won't sit still on the paper,

Even when I hold them by their wings.

One teardrop hangs at one corner

Waiting to inundate my world.

What is that snarl in my heart,

Looks like a knot not willing to open.

What do I shake?

What do I open?

The sky hanging down on my window

Looks so far away.

Blue clouds are like boats,

Which refuse to move from here.

I can't take the plunge.

I can't sit still.

The dream that I found

Doesn't say anything.

Only walks around with me.

The dream has now walked into my eyes,

And the sun seems wet today.

4 comments:

अरूण साथी said...

दिल की बात..

गिरिजेश राव said...

निर्वेद
करुण

अब

दूसरे रस भी।

Manoj K said...

धूप में भी सब नमनाक दिखता है।

खूब लिखा है.... अच्छा लगा

Udan Tashtari said...

बहुत तरल...सीधे उतरी.