Monday, October 25, 2010

बच्चों का आना - भाग 3

रांची से मेरा बोरिया-बिस्तर बंध चुका है, चार महीनों के बच्चों के साथ। ननिहाल में वक्त गुज़ारने के बाद अब दादा-दादी की बारी है कि वो जुड़वां बच्चों के सुख उठाएं। मेरा मन भारी है। जानती हूं, अब ज़िन्दगी में कभी अपने ही घर में, अपने मायके में इतने लंबे वक्त के लिए नहीं आ सकूंगी। कैसी अजीब-सी स्थिति में होती हैं हम लड़कियां! कितनी जल्दी पहचान बदल जाती है, घर का पता बदल जाता है, प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। और हमें बदलने की इस प्रक्रिया में भी संभला-संभला सा, बिना शिकायत के बहते चले जाने की सीख दी जाती है, बचपन से।

फिर कोलकाता होते हुए मैं पूर्णियां पहुंची हूं। इस बार छोटे चाचा-चाची और मेरा ग्यारह साल का चचेरा भाई मेरे हमसफ़र हैं, दादाजी के घर तक। फिर नए सिरे से बक्सों का खुलना, नए घर की दिनचर्या के साथ अपना, बच्चों का ढल जाना, फिर धूप के एक कोने को अपना साथी बनाना, शाम ढलते ही अपनी गोद में दोनों को लिए कमरों में दुबक जाना। बच्चों के अन्नप्राशन के बहाने बड़े स्तर पर उनका आने के समारोह की तैयारी की जा रही है। गांवों, शहरों, बच्चों के ननिहाल से आए मेहमान। बैंगलोर से आया मेरा भाई। असम से आए बच्चों के फुआ-फूफा। नाना-नानी, दादा-दादी, काका-चाचा, भैया। कई सारे लोगों के बीच साढ़े चार महीने के आद्या-आदित अपनी पहचान बना चुके हैं, गोद में लेने पर हंसकर अपनी पहचान जताते हैं, भीड़ से, लोगों से कतराते नहीं। आद्या फिर भी शर्मीली है, आदित तो सबसे रिश्ते जोड़ चुका है।

समारोहों के खत्म होने का वक्त है। यहां आए मुझे दो महीने हो चुके हैं। इनकी पहली होली भी शुभ-शुभ निकली है। मेरी मैटरनिटी लीव बस खत्म होने को है। दो बच्चों के साथ काम पर जाना कितनी मुमकिन होगा, इसको लेकर जद्दोज़ेहद शुरू हो गई है। हर रोज़ बहस छिड़ती है, हर रोज़ हम किसी नतीजे पर नहीं पहुंचते। मैं क्या चाहती हूं? कहना मुश्किल है। फिलहाल, मैं दिल्ली वापस जाना चाहती हूं। पिछले एक साल में बच्चों के आने के इंतज़ार के अलावा मैंने कुछ नहीं किया। अब मैं नए सिरे से, नई ज़िम्मेदारियों के साथ अपनी पहचान कायम करना चाहती हूं। सुनने में तो ये सब अच्छा लगता है, लेकिन क्या इतना आसान है?

हम बच्चों के दादा-दादी को लिए सिलीगुड़ी/बागडोरा होते हुए दिल्ली पहुंचते हैं। सोचती हूं, पांच महीने के बच्चों ने पांच शहर देख लिए। घूमन्तू मां की घूमन्तू संतानें!

एक साल से बंद पड़े घर में गृहस्थी फिर नई आवाज़ों के साथ शुरू होने लगी है। इस बार बच्चों की आवाज़ के इर्द-गिर्द पूरा घर घूमता है। मैं नौकरी पर वापस चली गई हूं। फिलहाल तय हुआ है कि बारी-बारी से नानी और दादी आकर बच्चों को संभालती रहेंगी। झूठ नहीं बोलूंगी। दफ्तर में वापस जाना ऐसा है जैसे मुझे मुद्दतों बाद खुली हवा का झोंका मिला हो। मैं दुगुने उत्साह के साथ काम में लग जाती हूं। न्यूज़ रूम की चिल्ल-पों कानों को संगीत समान लगती है, बुलेटिन ऑन-एयर होता है तो लगता है बाजबहादुर का किला फतह कर लिया।

लेकिन ये उत्साह बहुत दिनों तक नहीं चलता। बच्चों को छोड़कर आने के अपराध-बोध के बीच ये भी दुविधा परेशान करने लगी है कि मेरी वजह से बच्चों की दादी-नानी को अपना-अपना घर छोड़कर यहां, नोएडा प्रवास की सज़ा भुगतनी पड़ रही है।

काम का बोझ है या मेरे वज़न का, मेरी पीठ दोनों बर्दाश्त नहीं कर पाती और मैं बच्चों के नौ महीने का होते-होते स्लिप्ड डिस्क के साथ अस्पताल पहुंच जाती हूं। नए सिरे से परेशानी, नई चुनौतियां और आठ हफ्ते बिस्तर से ना उठने की हिदायत। बच्चों को संभालने में सब लग जाते हैं। अपनी-अपनी ज़िम्मेदारियों के साथ, अपनी-अपनी काबिलियत के मुताबिक।

तीन किलोमीटर दूर रहनेवाला मेरा भाई शाम को दफ्तर से पहले मेरे पास आता है। घंटा-दो घंटा बच्चों को देखता है। दो-चार दिन तो उनके दूध का डिब्बा, डायपर का बैग लिए एक बच्चे को रात-भर के लिए अपने घर भी ले जाता है। वो और उसका रूममेट बच्चे को रातभर सुलाते हैं, दूध पिलाते हैं, उसकी देखभाल करते हैं, और सुबह हमारे पास छोड़कर चले जाते हैं। लड़कों ने शादी से पहले ही बच्चे संभालने में महारत हासिल कर ली है, हम उन्हें चिढ़ाते हैं। लेकिन बच्चे अकेले तुम्हारे तो नहीं, भाई कहता है। मैं मामा हूं, मेरा हक़ बनता है। बच्चों पर सबके हक़ को मैं कभी चुनौती नहीं देती। इससे मेरी ज़िन्दगी आसान हो जाती है। कभी मन का एक कोना पोज़ेसिव होने की बात भी करे तो डांटकर चुप करा देती हूं। टूटी हुई पीठ वाली मां बच्चों की अकेले देखभाल तो बिल्कुल नहीं कर सकती। और सब मिलकर पालेंगे तो सबका हक़ होगा उनपर।

दो महीने बिस्तर पर पड़े रहने के बाद मैं फिर दफ़्तर जाती हूं। सबको मुझसे सहानुभूति है। यहां तक कि सफाई करनेवाली दीदी भी मुझसे मेरा और मेरे बच्चों का हाल पूछती है। मैं फिर दफ्तर और घर के बीच, बच्चों और अपने स्वास्थ्य के बीच का संतुलन कायम करने में जूझने लगती हूं। वक़्त गुज़र तो रहा है, तेज़ी से भी, लेकिन भारी पड़ता है।

एक दिन यूं ही बुलेटिन बनाते-बनाते मेरी पीठ में असह्य दर्द शुरू होता है। रनडाउन पर एंकर लिंक लिखने की बजाए अब मैं अपना इस्तीफ़ा लिख रही हूं। बिना किसी भूमिका, बिना किसी तैयारी, बिना किसी सलाह-मशविरे के मैं नौकरी से इस्तीफ़ा दे देती हूं। मैं वो नौकरी छोड़ देती हूं जिसने मुझे पहचान दी, मुझे आत्मविश्वास दिया, जिसने आर्थिक सुरक्षा दी। ये दफ्तर मेरे लिए घर के बाद सबसे पावन जगह लगती थी। यहां मैं करीब-करीब सबको जानती-पहचानती थी। यही नौकरी मिली थी तो मैंने पापा को कहा था कि बस यहीं से रिटायर होना है मुझे। और मैंने बिना सोचे-समझे इस नौकरी से इस्तीफा दे दिया।

मेल भेजकर मैं घर चली आई। पूरे रास्ते रोती रही। बीच में मैनेजिंग एडिटर का फोन आया। मैंने कहा, थोड़ी देर में संभल जाऊंगी तो फोन करूंगी। अगले दो दिन तक मुझे सब समझाते रहे, घर में, दफ्तर में, सब जगह। कहा गया कि मैं लंबी छुट्टी ले लूं पर नौकरी ना छोड़ूं। एचआर से फोन आए। लेकिन मैं ज़िद पर कायम थी। जानती थी कि अगले दो महीने में मुझे मुश्किल फैसला तो लेना ही होता। मां और मम्मी का ऐसे अपने घर छोड़-छोड़कर आने वाला इंतज़ाम ज़्यादा लंबा नहीं खिंचना था। मैं बच्चों को आया या क्रेश के भरोसे नहीं छोड़ना चाहती थी। नौकरी तो अब कहां मुमकिन हो पानी थी?

2 comments:

निर्मला कपिला said...

नौकरी मे बच्चे पालना तो आजकल बहुत मुश्किल काम है। फिर ऐसी नौकरी का फायदा भी क्या अगर बच्चों को सही परवरिश नही मिली। लेकिन ये फैसला तभी लेना चाहिये अगर मन मे ये पक्का विश्वास हो कि आप जो कर रही हैं वो सही है नही तो दुविधा मे आप तनाव का शिकार हो सकती हैं। संस्मरण अच्छा लगा। शुभकामनायें, आशीर्वाद।

Manoj K said...

बहुत हिम्मत की आपने..
पार्ट ४ पढ़ने जा रहा हूँ