Friday, October 8, 2010

बच्चों का आना - भाग 1

10 अक्टूबर 2006। कल रात से ही धीरे-धीरे दर्द हो रहा है। कुछ बेचैनी है, नहीं जानती क्या। मेरे भीतर बच्चों का नौवां महीना शुरू ही हुआ है। डॉक्टर घोष ने दीवाली तक इंतज़ार करने को कहा है। "पटाखों का शोर कैसे बर्दाश्त कर पाएंगे", हंसते हुए कहती हैं। दीवाली मतलब 22 अक्टूबर। उतने दिनों तक कैसे रह सकूंगी? उठना-बैठना, हिलना-डुलना मुश्किल है। कई रात गए, नींद भी नहीं आई।

परेशान हूं। ना मम्मी से मेरी परेशानी देखी जा रही है ना मेरे पति से। सुबह से हॉटलाइन की तरह एसटीडी पर अपनी मां से हज़ार सवाल पूछ चुके हैं। मेरी मां से पूछने में उलझन महसूस होती होगी शायद। शुक्र है कल रात ही पापा आ गए। वरना मेरे बदले पहले इन्हें अस्पताल पहुंचाना पड़ता, नर्वस ब्रेकडाउन का इलाज कराने के लिए।

"
कैसा दर्द है। कितना तेज़ है?" पतिदेव पूछते हैं।

"
मेरे भीतर कोई मशीन लगी है दर्द नापनेवाली? कोई पेन-ओ-मीटर?" मैं चिढ़कर कहती हूं।

मम्मी तुरंत सफाई देने लगती हैं, "नहीं, इनका मतलब है अस्पताल जाना पड़ेगा?"

इतनी देर में पूरे कोलकाता को सूचित कर दिया जाता है। मेरे चाचा-चाची, उनके दोस्त, दोस्तों के रिश्तेदार, रिश्तेदारों के दोस्त... सब अस्पताल आने को तैयार हैं। और मुझे मालूम ही नहीं कि ये दर्द आखिर है कैसा। "कहीं अपच वाला तो नहीं," रिश्ते की एक चाची पूछ बैठती हैं फोन पर।

ख़ैर, मुझे अस्पताल पहुंचाया जाता है पूरे काफिले के साथ। सबको वेटिंग रूम में छोड़ मैं अल्ट्रासाउंड के लिए बुलाई जाती हूं। मैं अकेली हूं यहां इस कमरे के बाहर। जाने कैसी बेचैनी है? चप्पल खोलकर मैं नंगे पांव फर्श पर चलने लगती हूं। और ये क्या पहना है मैंने? पापा का कुर्ता? लाल-नारंगी रंग के इस कुर्ते को मैं ही तो ले गई थी दिल्ली से उनके लिए। किसे पता था इस हाल में यही कुर्ता मेरे काम आएगा। बेचैनी बढ़ती जा रही है। आस-पास कोई नहीं है। सब वेटिंग रूम में हैं।

पूरे पैंतीस मिनट के बाद सोनॉलोजिस्ट मुझे अंदर बुलाती है। मुझे बेड पर लिटा दिया गया है। पीठ के बल लेटते ही दर्द बर्दाश्त से बाहर हो जाता है। सोनॉलोजिस्ट मुझसे कुछ पूछ रही है और मैं मेरी आंखों के आगे अंधेरा छा रहा है। फिर अचानक हरकतें बढ़ जाती है। उसका लपककर फोन तक पहुंचना, डॉ घोष से बातचीत, मेरे चेहरे पर पानी के छींटें और टुकड़ों-टुकड़ों में आती आवाज़... ढाई किलो के हैं दोनों बेबीज़, नहीं... एक का मूवमेंट कम है... हां, सिज़ेरियन करो, जितनी जल्दी हो सके... मैं भेजती हूं ऊपर लेबर रूम में।

मैं बेहतर महसूस कर रही हूं अब। अब मैं यहां से दोनों को लेकर ही निकलूंगी। हां, ये दर्द अब थोड़ी देर और... व्हील चेयर पर मुझे लेबर रूम में पहुंचाया जाता है। पता नहीं बाहर सबको मालूम है या नहीं...

लेकिन डॉ घोष परेशान हैं। बताती हैं, आज करवा चौथ है। "तो?" मैं सोचती हूं।

अस्पताल के सारे कमरे, सारे ऑपरेशन थिएटर बुक हैं। शुभ दिन है और चार बजे के बाद शुभ घड़ी, सो मांओं ने अपने आनेवाले बच्चों की कुंडली पहले से बनवा ली है, सिज़ेरियन के मूहुर्त के हिसाब से! "ऐसा कोलकाता में भी होता है?" मैं हैरान हूं। लेकिन बगल में लेटी मारवाड़ी महिला को देखकर हैरानी दूर हो जाती है। डॉ घोष लगातार मेरे लिए ओटी में वक्त निकालने की कोशिश में हैं, कभी इंटरकॉम पर झगड़ती हैं, कभी समझाने की कोशिश कर रही हैं। एडमिनिस्ट्रेशन वाले आठ बजे तक इंतज़ार करने को कहते हैं। "शी इज़ इन लेबर। द ट्विन्स हैव टू भी टेकेन आउट डैममिट।" करीब-करीब चीखते हुई डॉ घोष की आवाज़ मुझे रह-रहकर सुनाई दे रही है।

रह-रहकर इसलिए क्योंकि मेरा सारा ध्यान उस मीटर के शोर पर है जो मेरे बच्चों की धड़कनें पकड़कर बगलवाली दो स्क्रीनों पर दिखा रहा है। उनकी धड़कनें मुझे दर्द बर्दाश्त करने की वजह दे रही हैं। डॉ घोष आकर बताती हैं कि चार बजे सिजेरियन होगा, और कमरा नहीं है इसलिए ऑपरेशन के बाद मुझे लेबर रूम में ही रहना होगा। "और बच्चे?" मैं चाहकर भी नहीं पूछ पाती।

पता नहीं कितना वक्त गुज़रा है, पता नहीं बाहर किसी ने खाना खाया है भी या नहीं। तभी एक नर्स भारी मलयालम लहज़े के साथ आकर पूछती है, "आपका नाम अनु सिंह है?" "कोलकाता में भी केरल की नर्सें। बहुत सही।" मैं सोचती हूं।

फिर ऑपरेशन की तैयारी, हरे रंग का गाउन, माथे पर लटकती हुई स्लाइन की बोतल और बड़ी मुश्किल से स्ट्रेचर पर लादी गई मैं... बीच में पतिदेव मिलते हैं। "आर यू ओके? रूम नहीं मिला, लेकिन मैं कोशिश कर रहा हूं।" "आई डोन्ट केयर।" मैं फिर चिढ़ जाती हूं। "मुझे इस दर्द से बाहर निलकना है बस।" हमेशा सारी खीझ शरीफज़ादे पति पर ही क्यों उतरती है?

ऑपरेशन थिएटर के बाहर का नज़ारा देखने लायक है। मैं कतार में हूं, चौथे नंबर पर। आज चालीस सिज़ेरियन होनेवाले हैं, मेरा नंबर ग्यारहवां है। और वैसे भी मैं तो बिना अप्वाइंटमेंट पहुंची हूं, हमेशा की तरह। तबतक ऐसे ही छत को निहारते हुए वक्त निकालना होगा। पता नहीं कितना वक्त निकला है। आधा घंटा या शायद एक घंटा।

आखिरकार मैं ओटी के अंदर हूं। पीछे एफएम बज रहा है। "बड़ा कूल ओटी है ये तो," मैं सोचती हूं। मुझे ऑपरेशन टेबल पर लिटा दिया गया है। चार-पास सिर मंडरा रहे हैं मेरे ऊपर। डॉ घोष को छोड़कर मैं किसी को नहीं पहचानती।

"
भालो आछेन? दोरोद टा कि खूब भीषोन?(ठीक हैं आप? तेज़ दर्द तो नहीं?)" एक डॉक्टर मुझसे बंगाली में पूछता है। "ओनू बांगाली नेई,(अनु बंगाली नहीं हैं।)" शुभ्रा कहती हैं। "ना ना। आमि शोब कोथा बूझते पारी। खूब भालो कोरे बोलते पारबो ना। दोरोद तो आछे, एकटू एकटू,"(नहीं, नहीं। मैं सब बातें समझ रही हूं। अच्छी तरह बोल नहीं पाऊंगी। दर्द तो है, थोड़ा-थोड़ा) मैं झट-से बोलती हूं।

"
सब दर्द ठीक हो जाएगा। अभी मैं आपको मीठी नींद में सुलाऊंगा। आप उठेंगी तो दो प्यारे बच्चों के रोने की आवाज़ सुनाई देगी आपको," एनिस्थिसिस्ट हैं ये शायद। मैं एक फीकी थकी हुई-सी हंसी होठों पर ले आती हूं। पीछे गाना बज रहा है, "क्यों आजकल नींद कम, ख्वाब ज्यादा है, लगता ख़ुदा का कोई नेक इरादा है..." नीलेश मिश्रा, इसे नीलेश मिश्रा ने लिखा है, मैं झट-से सोचने लगती हूं। गाना सुनते ही गीतकार पहचानने की आदत बहुत पुरानी है मेरी। ध्यान गाने की तरफ है, ओटी में हरकतें जारी है। और तभी सभी आवाज़ें, ओटी की तेज़ गंध, नीलेश मिश्रा के बोल, केके का गाना... सब पीछे छूटते चले जाते हैं।

मालूम
नहीं मैं कितनी देर बाद जागी हूं। डॉ घोष मेरे कानों में कहती हैं, "इट्स अ ब्यूटिफल गर्ल एंड ए क्यूट लिटल ब्यॉय। कॉन्ग्रैच्युलेशन्स अनु।" बंगाली में बात करनेवाले डॉक्टर भी आ जाते हैं। "फैमिली कॉम्प्लीट होए गाछे। खूब भालो। खूब भालो।"

मुझे स्ट्रेचर पर ही बाहर निकाला जाता है। पतिदेव फिर रास्ते में मिलते
हैं। "यू डिड इट अनु। आइ सॉ देम। दे आर सो ब्यूटिफुल।" लेकिन मैंने उन्हें अभी तक नहीं देखा। छुआ भी नहीं, महसूस भी नहीं किया। मुझे एक फोर-सीटर कमरे में जगह मिली है। अनिस्थिसिया का असर गया नहीं। अभी भी डिसओरिएन्टेशन है। थोड़ी देर में पिडियैट्रिशिन डॉ रूमा रे मिलने आती हैं। "दोनों ठीक हैं। लेकिन बेटा थोड़ा रोया नहीं। डिस्ट्रेस में था। फिर भी दोनों को 48 घंटों के लिए क्रिटिकल केयर यूनिट में रखेंगे," अपने बंगाली लहज़े में हिंदी-अंग्रेज़ी-बंगाली के बीच डॉ रे मुझे समझाती हैं।

थोड़ी-थोड़ी देर में मुझसे कई लोग एक-एक करके मिलने आते रहते हैं। डॉ घोष
, मेरे पति, मम्मी-पापा, चाचा-चाची, चाचा के दोस्त, उनके दोस्तों के दोस्त, भाई का दोस्त, छोटी दादी, चचेरी मौसी, दुर्गापुर से आए मेरे दोस्त का परिवार... लेकिन मुझे किसी से नहीं मिलना। मैं सिर्फ बच्चों को देखना चाहती हूं।

मुझे
48 घंटे तक इंतज़ार करना है। दर्द और व्याकुलता में ये दो दिन निकलते हैं। इसके बीच विज़िटिंग आवर्स में लोगों का आना-जाना जारी है। 13 अक्टूबर को सुबह-सुबह डॉ घोष आईं हैं मुझे बच्चों से मिलवाने के लिए। मैं धीरे-धीरे चलते हुए सीसीयू तक जाती हूं। गाउन के ऊपर एक और गाउन डालने को कहा गया है। घुसते ही बाईं ओर तीसरे क्रिब में बेटा सोया हुआ है। उसके नन्हें-से हाथों में एंटीबायोटिक्स के लिए पाइप लगाए गए हैं, नाक पर ऑक्सीजन मास्क है शायद। उसे देखकर लगता है, ज़ोर-ज़ोर से रोने लगूं। उसे मैं गोद में नहीं उठा सकती कल तक।

फिर नर्स मुझे बेटी के पास ले जाती है जो दूसरे कोने में लेटी है। उसकी गोल, चमकदार आंखें से ही मैं उसे पहचान लेती हूं। "ये है फाइटर चौधरी की फाइटर बेटी," मैं सोचती हूं। लगता है जैसे आईना देख रही हूं। जैसे किसी ने मुझे ही जादू की छड़ी से नन्हा-सा बनाकर क्रिब में डाल दिया है। बिल्कुल मेरी शक्ल! नर्स उसे उठाकर गोद में डाल देती है। मेरी आंखों के आगे कोहरा छा जाता है। आंसू हैं, कमज़ोरी भी। "डोन्ट किस द बेबी," वो मुझे हिदायत देती है। मैं फीडिंग रूम में पहुंचते ही उसके माथे पर एक बोसा जड़ देती हूं। मेरी बेटी अपना चेहरा मुझमें और घुसा देती है, मेरी गंध पहचानती है शायद।

अगले तीन दिन कमरे, नर्सरी और सीसीयू के बीच गुज़रते हैं। मैं दिनभर-रातभर उन्हें गोद में लेने के बहाने ढूंढती रहती हूं। फीड देने के नाम पर मेरा वक्त या तो नर्सरी में आद्या के पास गुज़रता है या सीसीयू में आदित के पास। (नाम मैंने उन्हें देखने से पहले ही तय कर लिया था।) पूरे अस्पताल की रॉकस्टार हूं मैं अभी। लिफ्ट में विज़िटर्स भी देखकर मुस्कुराते हैं। कलाई पर लगे दो बैंड देखकर पूछते हैं, "आपको ही ट्विन्स हुए, बेटा और बेटी?" मैं भी मुस्कुरा भर देती हूं।

ये तस्वीर उनको घर लेकर आने के बाद अगली सुबह की है।


8 comments:

अशोक बजाज said...

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता ! नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:!!

नवरात्रि पर्व की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं...

कृपया ग्राम चौपाल में आज पढ़े ------
"चम्पेश्वर महादेव तथा महाप्रभु वल्लभाचार्य का प्राकट्य स्थल चंपारण"

ZEAL said...

It's nice to read someone's painful but beautiful experience.

Minal said...

amazingly cute photograph. muah!

Manoj K said...

अभी पार्ट १ पढ़ा है अब जा रहा हूँ पार्ट २ पढ़ने..

shikha varshney said...

क्या याद करा दिया :).. वाकई औरत बच्चे को ही जन्म नहीं देती. खुद जन्म लेती है फिर से.

monali said...

I dnt know why bt after reading i got goosebumps.. i wanna be a mother.. I desperately wanna be one of you ol...
Blessing n love to both of them... Aadya n Aadit :*

राकेश said...

याद करवा कर आंखें नम कर दीं. नि:शब्‍द !

abhi said...

इसके पार्ट्स खोजता हूँ और पढ़ता हूँ, अभी ही!!