Thursday, October 7, 2010

एक बेतुकी लोरी

आई है अंखियों में मीठी से नींदिया,
चंदा के झूले पर बैठी है बिटिया,
तारों से बेटा करता है बातें,
ऐसे ही गुज़रेंगी दोनों की रातें।

गुजरेंगी रातें, आएगी मीठी-सी सुबह नई
खिड़की से झांकेंगे सूरज दादा और
खुल जाएंगी तेरी आंखें सुरमई।

खुल गई जब आंखें
तो दिखती होगी एक सोनपरी
तेरा वो पकड़ेगी हाथ और
दे देगी तुझको जादुई छड़ी।

जादुई छड़ी करती है बच्चों ऐसा कमाल
तेरे बुलाने से आती हैं परियां
और तेरे ही कमरे में मचता धमाल।

मचता धमाल और थकते हैं बच्चे,
करते हैं बातें कुछ झूठे, कुछ सच्चे।
बातों में घुलती हैं मिश्री की डलियां
तुमसे ही रोशन है अपनी ये गलियां।

रोशन हैं गलियां और जगमग है आंगन,
तुमसे ही सीखा है जीना ये जीवन।
आओ, हम तीनों सो जाते हैं,
मीठे-से ख्वाबों में खो जाते हैं।

2 comments:

संजय भास्कर said...

हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

संजय भास्कर said...

सुन्दर भावों को बखूबी शब्द जिस खूबसूरती से तराशा है। काबिले तारीफ है।