Friday, October 1, 2010

एक स्वीकारोक्ति

सुबह से मैं बदलते मौसम की खुमारी में डूबी हुई हूं। डेडलाईन का बोझ है, इसलिए काम ख़त्म करने की कोशिश जारी है। लेकिन रह-रहकर मन खिड़की से बाहर नीम की झूमती डालियों पर अटक जाता है। उन डालियों पर गहरे हरे-नीले कंठ वाली दो चिड़िया फुदक रही है, कभी आती है कभी उड़ जाती है। नीम जैसे अपने हाथ हिला-हिलाकर उन्हें अपनी ओर बुलाने की असफल कोशिश कर रहा है। जैसे कहता हो, आओ और मेरा घर अपनी मधुर आवाज़ से गुलज़ार करो। मैं बड़ी देर तक कभी लैपटॉप की ओर देखती हूं, कभी नीम की ओर। काम होने-ना होने के बीच-सी कोई स्थिति है।

पता ही नहीं चला कि कब साढ़े बारह बज गए और बच्चों के घर लौटने का वक्त हो गया। चीखते चिल्लाते, अपनी मम्मा को खोजते वो सीधे इसी कमरे की ओर बढ़ते हैं। चार साल के आद्या और आदित जुड़वां हैं और कई बार मेरे लिए अपने प्यार का इज़हार अपनी आपसी प्रतियोगिता से करते हैं - जो पहले मम्मा की गोदी में बैठेगा, वो मम्मा का प्यारा बच्चा होगा। मौसम की खुमारी उनके झगड़े और आपसी खींच-तान से टूटी है। मेरा पूरा ध्यान अब उनमें सुलह कराने में है।

सुलह के बदले उन्होंने लैपटॉप पर यूट्युब खोलने और टॉम और जेरी देखने की मांग कर डाली है। मैं खीझकर उन्हें परे हटाती हूं। खीझ खुद पर भी है। चार घंटे ध्यान कहां था? बहरहाल, फिर झगड़ा सुलझता है और दोनों अब अपनी पुरानी तस्वीरें देखना चाहते हैं, लैपटॉप पर। मैं फिर नाराज़ होती हूं। कितना सारा काम है निपटाने को। तुम दोनों आपस में क्यों नहीं खेलते? लेकिन हथियार डालना पड़ता है। एक को दाईं ओर और दूसरी को बाईं ओर बिठाए मैं किसी तरह अपनी उंगलियों से कीबोर्ड पर निर्देश देती हूं। इस बीच घर के बाकी लोगों को निर्देश देना जारी है - दाल छौंक लेना, खाना टेबल पर लगा दो, यहां पानी गिर गया है, इनके कपड़े बदलना है वगैरह वगैरह। बायां हाथ और कान फोन पर है, ध्यान लैपटॉप पर।

तस्वीरें एक के बाद एक स्लाइड शो पर आती हैं, मैं फोन पर बात करना जारी रखती हूं, दोनों के बीच धक्कामुकी के बीच भी। अब आदित बोलती तस्वीरों की मांग करता है। "वो फोटो जिसमें आदित बोल रहा है मम्मा।" यानी वीडियो। गए काम से। अब तो ये डेढ़ घंटे की कसरत है। फिर साढ़े तीन बज जाएंगे और मुझे टीवी भी तो देखना है। अयोध्या पर फैसला क्या आएगा, ये जानने की उत्सुकता है। ख़ैर, उनकी मांग पर मैं वीडियो लगा देती हूं।

एक के बाद एक बच्चों के बचपन के कई चरण अब मेरी आंखों के सामने हैं। उनके आने से पहले की बेचैनी, आने के बाद की घबराहट, उनका पहला वीडियो, उनका पहला स्नान, उनका चलना-उठना-बैठना-गिरना-संभालना-बोलना-बुलाना-गाना-नाचना... मेरे अंदर जैसे कुछ पिघलने लगता है। इन दोनों को बड़ा करने की जल्दी में मैं तो कई चीज़ें अब भूलने लगी हूं। तीन ही साल में भूल गई कि आद्या कैसे ठुमक-ठुमककर चलती थी। भूल गई कि आदित हंसता था तो उसके दाएं गाल पर गढ्ढा बनता था, मेरे छोटे भाई की तरह। भूल गई कि दोनों छह महीने के थे तब भी लड़ते थे, मम्मा की गोद में आने के लिए।

अचानक लगा कि डायपर बदलने, नाक साफ करने, डिटॉल में धुले कपड़े पहनाने और खाना खिलाने की मशक्कत के बीच ये खूबसूरत लम्हे रिकॉर्ड नहीं किए होते तो मैं कितनी खाली होती। लगा कि अगर इन लम्हों के बारे में लिखूंगी नहीं तो और खाली हो जाऊंगी। फिर तो मेरी हालत भी नीम की डाली जैसी होगी। नीलकंठ पक्षी मेरा आंगन गुलज़ार करेंगे, पलक झपकते उड़ जाएंगे और मैं मौसमों के आने-जाने के बीच हाथ हिला-हिलाकर उन्हें बुलाती ही रह जाऊंगी।

4 comments:

ZEAL said...

Great post regarding capturing of beautiful moments.

Surendra Singh Bhamboo said...

हकीकत और मनः स्थिति का दर्शाती पोस्ट है। बहुत अच्छा लगा पढ़कर इसाके लिए आपका आभार

मो सम कौन ? said...

ये सच में सुनहरे क्षण हैं, जिन्हें खुशकिस्मती से आपने संजोकर रखा है। अपने बच्चों के बचपन को देखते समझते हम सब पुराने रिश्तों को फ़िर से जीते हैं, जब हम बच्चे के रोल में थे।
जिस तरीके से आपने अपनी कोमल भावनायें व्यक्त की हैं, आपके प्रोफ़ाईल में लिखी अंतिम पंक्ति ठीक नहीं लग रही, कृपया उसे बदल दें, या सीमित के पहले अ प्रिफ़िक्स कर दें।
वीडियो अभी नहीं देख पाया, वीडियो ऑम करते ही मेरे नैट कनैक्शन की सीमित संभावनायें धूमिल हो जाती हैं।
शुभकामनायें, नियमित लेखन के लिये।

K C said...

नीलकंठ, सब चिंताएँ हर ले। छू मंतर हो जाए सारे अफसोस। इसे दो साल बाद पढ़ते हुये भी बिलकुल फ्रेश फील होता है। बोलती तस्वीरें इस तकनीक का सबसे बड़ा उपहार है।

आप पहले भी सुंदर लिखती थी, अब भी सुंदर ही लिखती हैं।