Tuesday, February 24, 2015

मॉर्निंग पेज १४ और मर्ज़ ज़िन्दगी

मुझे लंबे समय तक घर में बंद रखने का एक मेडिकल बहाना मिल गया है। घर में रहने का भी, और जितना कम से कम काम करने का भी। आलसी को और क्या चाहिए? काम न करने का मेडिकल सर्टिफिकेट।

क्या सभी औरतों के साथ होता है कि उन्हें कोई न कोई शारीरिक तकलीफ़ रहती है? या क्या ये तकलीफ़ साइको-सोमैटिक होती है? मन के अवसाद से जुड़ी हुई। इसी सवाल के जवाब में मैंने एक कहानी भी लिखी थी - मर्ज़ ज़िन्दगी, इलाज ज़िन्दगी। थ्योरेटिकल लेवल पर, और समझदारी के मामले में, मुझे कोई मात नहीं दे सकता। मैं सारी चीज़ें ख़ूब अच्छी तरह समझती हूं, लेकिन ख़ुद पर नियंत्रण नहीं रख पाती। मैं लगातार इसी डायकॉटोमी के साथ जीती रहती हूं।

डॉ शेरगिल मेरे भीतर की आवाज़ हैं, वो जो मेरा पब्लिक परर्सॉना है - ज़हीन, सुलझी हुई, मसरूफ़, उम्रदराज़, क़ायदेवाली। शिवानी वो है जो मैं हूं दरअसल। उलझी हुई, बिखरी हुई, कन्फ़्यूज़्ड, परेशान। डॉ शेरगिल और शिवानी का ये वार्तालाप कभी बंद ही नहीं होता। चलता ही रहता है लगातार। इसी से कहानियां निकलती हैं, इसे से ज़िन्दगी को देखने के अलग-अलग नज़रिए की समझ पैदा होती है।

सुबह उठने के बाद अब बच्चों को तैयार करने में फ़िज़िकली कुछ नहीं करना होता। वे ख़ुद तैयार हो जाते हैं, ख़ुद अपने जूते पॉलिश कर लेते हैं, कपड़े पहन लेते हैं। मैं सिर्फ़ उनका साथ देने के लिए उनके पास होती हूं। कई बार उन्हें अकेले बस स्टॉप भी भेज दिया जाता है। आज भी अकेले भेज दिया। ऊपर तीसरी मंज़िल से, जहां हम रहते हैं, मैं देखती रही दोनों को ख़ुद से दूर जाते। उनकी चाल में आत्मविश्वास आने लगा है। उन्हें अब किसी का हाथ पकड़ने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

आदित के जूते के फीते खुलते जा रहे थे। उसने दो बार कोशिश की, लेकिन उससे हुआ नहीं। आद्या झुककर ज़मीन पर उकड़ूं बैठी उसके फीते बांध रही थी और अचानक न जाने क्यों लगा कि फीतों के साथ-साथ मेरे भीतर भी उसने कोई गिरह बांध दी है। मैं साठ सीढ़ियां दूर, ऊपर से उन्हें देख रही थी। मेरे ये बच्चे मेरी उंगलियां थामे जाते थे बस स्टॉप। उनकी तस्वीरें खींचना और उन्हें फ़ेसबुक पर डालना मेरा प्रिय शगल था।

अब न मेरे पास कोई कैमरा है न बच्चे तस्वीरें खिंचवाते हैं उस तरह। मेरी उंगलियां पकड़ चलने की आदत भी जाती है। अगर भीड़ में न हों, तो उन्हें दूर-दूर रहना ठीक लगने लगा है। मैं अचानक बहुत उदास हो गई थी, बहुत अकेली। हम एक-दूसरे से किस तरह भागते रहते हैं। और फिर जब वाकई एक-दूसरे से अलग होने का वक़्त आता है तो दम घोंट देने की हद तक एक-दूसरे को पकड़ने के लिए लौट जाते हैं। ये हर करीबी रिश्ते की हक़ीकत है। आद्या और आदित एक दूसरे के बिना जी नहीं सकते। उन्हें पांच मिनट के लिए अकेला छोड़ दो तो एक-दूसरे को नोंच-खरोंच मारते हैं। जब वो होते हैं घर में, तो मैं अकेला कोना ढूंढती रहती हूं ताकि अपने काम निपटा सकूं। जब वे स्कूल चले जाते हैं, मुझे घर की तन्हाई से सबसे ज़्यादा नफ़रत होती है। मेरा अपने भाईयों के बिना गुज़ारा नहीं होता, लेकिन हम अधिकांश एक-दूसरे से लड़ते रहते हैं, या फिर एक-दूसरे से बहुत नम्र होने की कोशिश कर रहे होते हैं। पति से बहस से बचने में मेरे दिन की आधी एनर्जी जाती है।

मैं नहीं जानती कि ऐसा सबके साथ होता या नहीं। लेकिन मुझे वाकई रिश्ते संभालना नहीं आता, और कई बार अकेलापन रास आता है। वैसे रिश्ते अच्छे लगते हैं जिनमें प्रोटोकॉल न हो। वरना मैं तन्हा ही अच्छी। कई बार ये सोचती रहती हूं कि एक दिन मैं बौद्ध भिक्षुणी बन जाऊंगी, या फिर फक्कड़ घुमक्कड़। सब छोड़कर नगरी-नगरी द्वारे-द्वारे भटकूंगी। ज़िन्दगी का कोई और उद्देश्य नहीं होगा, सिवाय ख़ुद को समझने के। हम क्या हैं और क्यों हैं, हम जहां हैं वहां क्यों हैं, कहां से आए थे और कहां जाना है - इन सवालों से जुदा कुछ नए सवाल ढूंढूगी और उनके जवाब भी।

मौसी अक्सर कहती है फोन पर, गीता पढ़ो। मुझे लगता है कि अगर पढ़ने बैठी तो कुछ और करना मुश्किल हो जाएगा। मैं जुदा हो जाने के किनारे पर हूं बिल्कुल। एक धक्के में मैं किसी ब्लैक होल में अकेले कूद जाने से बिल्कुल नहीं कतराऊंगी। फिर मेरे बच्चों का क्या होगा? मुझे कम से कम दस साल और इंतज़ार करना होगा - उनका अठारह का हो जाना, और मेरा पैंतालीस का, वो अच्छा समय होगा।

मेरे भीतर की भौतिक ख्वाहिशें ख़त्म होने लगी हैं। मैं किताबें लिखना चाहती हूं लेकिन लगता है किसी को दिखाने के लिए क्यों लिखूं? मैं फ़िल्में लिखना चाहती हूं, लेकिन कमर्शियल हो जाने से डरती हूं। मैं अपनी घुमक्कड़ी भी बिना किसी ग्लैमर के चाहती हूं। क्या सोशल मीडिया ने ये वर्चुअल ग्लैमर दे दिया? क्या सोशल मीडिया ने हमें वो बना दिया जो हम होना नहीं चाहते थे?

मैं पॉपुलर होने और सेक्लुडेड होने की ख़्वाहिशों के बीच पिसती रहती हूं। कभी कभी सोचती हूं कि इतना सोचती भी क्यों हूं। जो है, उसे चलने क्यों नहीं देती?

मेरे भीतर बैठी डॉ शेरगिल मुझे ब्लॉग के पन्ने से हटकर कुछ और कन्सट्रक्टिव करने को कह रही है। मेरे भीतर की शिवानी चाहती है कि मैं कंबल में मुंह ढंककर सो जाऊं। मैंने दोनों के बीच समझौता कराने के इरादे से बीच में एक किताब रख ली है। कल बताऊंगी कि आज का दिन किसका रहा, शिवानी का कि डॉ शेरगिल का।

 

1 comment:

PRAHLAD VERMA said...

आपकी हर लाइन की अभिव्यक्ति बहुत ही उम्दा है। मुझे भी कई वक़्त उसी ब्लैक हॉल में जाने का मन करता है लेकिन फिर अपने से पूछे गए सवालो के जवाब ढूँढने बाहर निकलता हूँ तो जिंदगी के अनेक रूप देख कर ब्लैक होल भूल जाता हूँ।