Tuesday, February 17, 2015

मॉर्निंग पेज ७ - लिखना क्या था, लिख क्या गई

हम दो ही किस्म के लोगों को जज करते रहते हैं लगातार - जिसे नहीं जानते अच्छी तरह (या जानना नहीं चाहते) या फिर जिसे हम बहुत अच्छी तरह जान जाते हैं। माइंड अजीब-सी चीज़ है। दुनिया भर के योगी-ज्ञानी माइंड पर कितने तरह का ज्ञान दे चुके। जाने कितनी किताबें इसी माइंड के बारे में है। इसी माइंड से असुरक्षा पैदा होती है। यही माइंड हमारे साथ तरह-तरह के खेल खेलता है।

कई लोग हैं जिन्हें मेरा माइंड माफ़ ही नहीं करना चाहता। दिल कहता है - जाने दो, लेट गो। माइंड पकड़े रहता है। ज़ख्म और उन ज़ख़्मों पर लगातार लगनेवाली खराशें गिनता रहता है।

मुझे लगता है दुनिया की आधी से ज़्यादा समस्याएं सिर्फ़ compassion यानी सहृदयता से सॉल्व हो सकती हैं। दूर क्यों जाएं, मेरी ज़िन्दगी से मिसाल लेते हैं। एक इंसान की ज़िन्दगी में सबसे मुश्किल रिश्ता कौन सा होता है? विवाह का। वैवाहिक रिश्ता सबसे चुनौतीपूर्ण होता है, और उस रिश्ते में प्रेम (और प्रेम के साथ अपेक्षाएं) जुड़ जाएं तब तो समझ जाईए कि आप उस रॉबिन्सन क्रूसो की तरह के जहाज़ी हो गए जिसे समंदर औऱ समुद्री यात्राओं ने तबाह कर दिया लेकिन वो बार-बार समंदर की और लौटता रहा।

देखें और कौन कौन से रिश्ते मुश्किल होते हैं? पेरेन्ट और बच्चों का, ख़ासकर टीनेज की तरफ से होकर निकलते युवा बच्चों के साथ का रिश्ता। भाई-बहन या सिबलिंग के साथ का अपना रिश्ता। एक किस्म की राइवलरी, अलग-अलग वजूदों में ढलते सहोदर भी एक दूसरे की परेशानी का सबब बन जाते हैं। हमें अपने साथ काम करने वालों से परेशानी होती है। हमें अपने एक्सटेन्डेड परिवार के लोगों से परेशानी होती है। हमें कई बार हमारा पड़ोसी परेशान करता है। उससे भी ज़्यादा अक्सर सड़क पर जानलेवा तरीके से गाड़ी चलाते लोगों से चिढ़ मचती है।

और इस बीच हम क्या करते रहते हैं? लगातार एक-दूसरे को जज कर रहे होते हैं, और फिर अपने दिमाग़ में किसी और को लेकर बना लिए गए फ़ैसले और धारणाओं के दम पर ख़ुद बिहेव करते रहते हैं। सामनेवाला अपने कर्मों से जितना पापी नहीं होता, हमारे दिमाग़ में उसके लिए बना ली गई धारणा से हो जाता है।

तो फिर कम्पैशन का क्या काम?

कम्पैशन हमें सिर्फ़ अपना नज़रिया बदलना सिखाता है। दुनिया भर को जज करने वाले (ये बीमारी पत्रकारों और बुद्धिजीवियों में सबसे ज़्यादा होती है)  लोग करते क्या हैं, एक बार देख लीजिए अख़बार खोलकर। हम आलोचना कर रहे होते हैं - निरंतर। बात करते हैं तब आलोचना कर रहे होते हैं, शिकायत कर रहे होते हैं, किसी और के बारे में अपनी राय बांट रहे होते हैं, दुनिया ने हमारे साथ कितना बुरा किया, वो आपस में डिस्कस कर रहे होते हैं। हमारी नज़र में हम विक्टिम हैं और दुनिया भर की वाह्य संरचना दरअसल हमें बर्बाद करने, हमें सताने, परेशान करने के लिए ही रची गई है।

आदत ही नहीं कि अपने भीतर देखें और सोचें - हम बदलेंगे तो क्या बदलेगा?

कम्पैशन नज़रिया कैसे बदलता है? जिसकी हम आलोचना कर रहे हैं, क्या एक मिनट के लिए हम उसके जूते में अपने पांव डालकर देख सकते हैं कि उस बिचारे का जूता उसे कहां कहां और कब काटता है? क्या हम एक मिनट के लिए अपने सबसे बड़े जानी दुश्मन, अपने सबसे बड़े मुजरिम के हालात समझने की कोशिश कर रहते हैं?

क्या कम्पैशन अल्टीमेट सॉल्यूशन है? मुमकिन है नहीं हो। लेकिन कम्पैशन ज़रूर आपको कम तिक्त, कम चिढ़चिढ़ा बनाता है। किसके किसके लिए कम्पैशन होना चाहिए? जिस ट्रैफिक पुलिस वाले ने मुझसे बिना मेरी ग़लती के रुकने को कहा, मेरा चालान कर दिया और बचने के लिए मामले को रफा दफा कर देने के नाम पर खुली ऱिश्वत मांग ली, उसके लिए भी कम्पैशन रखूं? क्या उस सास के लिए कम्पैशन रखूं जिसकी ज़िन्दगी का इकलौता मकसद मेरी रांह में कांटे बोना है? और उन आतंकवादियों के लिए कैसे कम्पैशन रखूं जो बिला वजह लोगों को मारते चलते हैं?

दायरा इतना बड़ा करने की ज़रूरत है क्या? क्या हम अपने आस-पास के उलझे हुए रिश्तों को लेकर सहृदय नहीं हो सकते? वो पति जिसे हमारी तकलीफ़ दिखती ही नहीं? (मुमकिन है, वो कहीं और किसी और तकलीफ़ में डूबा हुआ हो)। वो दोस्त जो दोस्त रहा नहीं, और ठीक से बात ही नहीं करता। (मुमकिन है कि आपने उसे जिस तरह जज किया, उसने आपके बारे में कहीं ज़्यादा बुरी और ग़लत धारणा बना ली हो।) वो मेड जो महीने में दस छुट्टी करती है?

थोड़ी देर के लिए किसी और की नज़र से अपने हालात देखने की कोशिश करना कम्पैशन है। थोड़ी देर के लिए किसी और की नज़र से उसके हालात देखने की कोशिश करना भी कम्पैशन है। बात सिर्फ दिल बड़ा करने की है। बात सिर्फ़ खुद को माफ़ करने और सामने वाले को माफ़ करते जाने की है।

क्या रिश्ते इतने ही सरल होते हैं? क्या जीवन इतना ही सरल है?

नहीं। तमाम समझदारियों के बावजूद जटिल दिमाग़  अपनी करतूतों से सुधरता नहीं।

कल गॉन गर्ल देख आई। ज़िन्दगी और रिश्तों को लेकर दिमाग़ में बचे रहे सवाल सपनों में खुरचन की तरह निकलते रहे। मैं अजीब अजीब से सपने देखती रही कल रात।

मौसी ने कहा है कि ख़ुद को अपने वजूद से अलग कर दो और बाहर से देखो खुद को। ये मान लो कि तुम जो कर रही हो, वो दरअसल तुमसे कोई और करा रहा है।

मैं ये मॉर्निंग पेज नहीं लिख रही क्योंकि मुझे तो कुछ और लिखना था। पता नहीं किसने और किस तरह मुझसे वो लिखवा दिया जिसके बारे में मैं कुछ जानती तक नहीं। जो मैं लिखना चाहती थी, वो पता नहीं कहां गुम हो गया। पता नहीं किस तरह।

2 comments:

Leena Goswami said...

एक अच्छे दिन की इससे अच्छी शुरुवात नहीं हो सकती थी । आदत हो गई है हर रोज़ अपने मॉर्निंग पेज लिखने के बाद आपका लिखा पड़ना की । 15 तारीख़ को ही अहसास हुआ कि कितनी आदत हो गई है ।पर आगे के दिनों ने उसकी कमी भी पूरी कर दी ।

Leena Goswami said...
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