Tuesday, February 10, 2015

मॉर्निंग पेज १ - क्योंकि बहना ज़रूरी है

जुलिया कैमरॉन की किताब 'द आर्टिस्ट्स वे' मैंने अपने मुश्किल दिनों में पढ़ी थी। वैसे मुश्किल दिनों की एक ख़ासियत होती है। चूंकि उनका वास्ता हमारे मन, हमारी सोच से होता है, इसलिए वे ताउम्र बने रहते हैं। वैसे वो वाले मुश्किल दिन कुछ और तरह से मुश्किल थे। मुझे लगने लगा था कि मुझे न कोई बात कहनी आ रही है, न लिखना आ रहा है।

चारेक साल पहले की बात होती ये। मई-जून की होंठ सुखाती, पसीना चुआती गर्मी में मैं पूर्णिया में थी, और औचक जूलिया कैमरॉन की शरण में चली गई थी। पहली बार किताब के बारे में गोवा की एक राईटर विनीता कोएल्हो ने बताया था। विनीता कई सारी फिल्में, टीवी सीरियल और बच्चों की किताबें लिख चुकने के बाद गोवा के किसी गांव में घर खरीदकर बहुत ही प्यार से अपनी बेटी, कुत्ते, बिल्ली और नया शौक - पेंटिंग - पाल रही थीं। मैं उन दिनों भटकी हुई थी - एक दम कन्फ्यूज्‍ड। दफ़्तर और नौकरी से बेघर। जुड़वां बच्चों को पालते हुए अपनी ज़िन्दगी का पता ढूंढती।

विनीता के घर में, विनीता की ही रसोई में, विनीता की ही ज़िन्दगी की बातें करते, विनीता के हाथों की चाय पीते हुए मैंने अपने लिए सोचा था - अनु सिंह, ये जीना भी कोई जीना है लल्लू? कुछ करो अपना नहीं तो यूं ही ज़िन्दगी ज़ाया होती रहेगी।

पता नहीं कौन सा जीना जीना होता है, लेकिन मैंने दिल्ली पहुंचते ही सबसे पहले जुलिया कैमरॉन की वो किताब खरीद ली थी, इस उम्मीद में कि किताब पढ़कर मैं विनीता की तरह गोवा में घर खरीद सकूं या नहीं, कम से कम उसकी तरह राईटर तो पक्का बन जाऊंगी। ये और बात है कि किताब दो महीने बाद पूर्णिया जाकर निकली -गर्मी छुट्टी में, क्योंकि वहां वक़्त बहुत था, काम बहुत कम थे, और पढ़ने को किताबें न के बराबर थीं। 

किताब में पहले चैप्टर में ही आपसे एक वायदा लिया जाता है, कि आप हर सुबह मॉर्निंग पेज लिखेंगी। आंख खुलते ही पहली चीज़ वही करेंगी आप। और मॉर्निंग पेज एकदम अनसेन्सर्ड होगा। कुछ न लिखा जाए तो चार पन्ने यही लिखें कि कुछ नहीं लिखा जा रहा। लेकिन लिखें ज़रूर। जुलिया इसे मेडिटेटिंग ऑन पेपर कहती हैं।

बड़ी मुश्किल था इन मॉर्निंग पन्नों का लिखना। अव्वल तो सुबह उठते ही कोई काग़ज़ कलम लेकर कैसे बैठ जाए? सौ तो काम होते हैं यहां। मेरी तो आंख खुलती ही तब है जब बच्चों को जगाने का वक़्त हो रहा हो। सारे काम सुबह-सुबह याद आते हैं। दूध नहीं उबाला। यूनिफॉर्म की शर्ट आयरन नहीं हुई है। जूते पॉलिश नहीं किए गए। फोन चार्ज नहीं है। अईय्यो, मुझे तो योग और प्राणायाम भी करना था। ये लो कर लो बात, चाय के बिना दिमाग भी चलता है भला? और सुनो, उठते ही पहले बाथरूम में घुसते हैं कि पहले लैपटॉप (या डायरी-पेन) लेकर बैठ जाते हैं?

एक हफ्ते की कोशिश के बाद मैंने वक़्त से आधे घंटे पहले उठना शुरु कर दिया, ताकि मॉर्निंग पेज का वायदा पूरा कर सकूं। बच्चे बिस्तर से आवाज़ लगाते। दूध उबल कर गिर गया होता। दो-एक दिन तो बस छूटने की नौबत भी आ गई। फिर भी पन्नों पर भड़ास निकालने का सिलसिला कायम रहा। कई बार ये कोशिश जगने से लेकर बच्चों को स्कूल भेजकर आने के बाद तक चलती रहती।

इस कोशिश का नतीजा क्या निकला? मैंने कुछ कहानियां लिखीं। मैंने एक स्क्रिप्ट लिखी -पूरे सौ पन्नों की। मैंने वापस ब्लॉग लिखना शुरु किया और ख़ूब लिखा।

मॉर्निंग पेज मेरे भीतर की सफाई करने का ज़रिया बन गया। मैं जब अनसेन्सर्ड लिखती थी तो पहले ख़ूब सारी शिकायतें लिखती थी। मेरे भीतर की नाराज़गी उतरती थी पन्ने पर। मुझे ज़मीन से, आसमान से, घर से, बाहर से, ख़ुद से, इससे, उससे, सबसे एक हज़ार शिकायतें थीं। मुझे लगता था कि पूरी कायनात मेरे ख़िलाफ़ मेरी बर्बादी की साज़िश रच रही है। मौसम का कोई और मौसम हो जाना भी ख़ुद पर ढाया हुआ ख़ुदा का ज़ुल्म लगता था।

मॉर्निंग पेज लिखते-लिखते मुझे कायनात की कमियों में अपनी कमियां नज़र आने लगी। दिखने लगा कि जो दिखता है, दरअसल वो दिखता इसलिए है क्योंकि हमारी आंखें वहीं देखना चाहती हैं। समझ में आने लगा कि कोई और नहीं (मौसम भी नहीं, मौला भी नहीं) होता हमारे हालातों का ज़िम्मेदार। जो किया-धरा होता है, हमारा ही किया-धरा होता है। लोग हम चुनते हैं, फ़ैसले हम लेते हैं। करते हम वही हैं जो करना चाहते हैं। नहीं करना चाहते तो भी करते हैं, क्योंकि अपनी हरकतों के लिए पचहत्तर जस्टिफिकेशन देने वाले भी हम ही होते हैं। तो फिर किस ख़ुदा को आवाज़ लगाते हैं? किसकी मसीहाई मांगते हैं? जब अच्छे कर्मों के नतीजों का हार अपने गले में लटकाए फिरते हैं दुनिया भर को दिखाने के लिए, तो चुभनेवाले लम्हों के कांटे भी तो अपने ही बोए हुए होते होंगे न?

समझ आ गई तो ऐसा नहीं कि ग़लतियां करना बंद कर दिया मैंने। ग़लतियां रोज़ होती थीं, रोज़ सुधरने का वायदा करती थी पन्ने पर ख़ुद से।

मॉर्निंग पेज का लिखना ख़ुद को कॉफी पिलाने के लिए, अपनी ही बातें सुनने के लिए डेट पर ले जाने जैसा लगने लगा। दिमाग जो कहता, मैं उसे लिखती जाती। यूं कि जैसे अपनी ही सुन रही हूं। और फिर ख़ुद से ख़ुद की बातों का सिलसिला चल पड़ता। दिमाग़ प्रॉबलम्स गिनाता, मॉर्निंग पेज पर मैं उसे सॉल्यूशन दिखाती। दिमाग़ कहता, क्या फ़ायदा? मैं कहती - कोई कोशिश बेकार नहीं जाती। दिमाग़ कहता - किसके लिए? मैं कहती - ख़ुद को बचा लेने से बड़ा ख़ुद के लिए कोई और क्या तोहफ़ा होगा? 

और फिर एक दिन जब सब ठीक लगने लगा तो मॉर्निंग पेज लिखना बंद कर दिया।

हम सारे काम ज़रूरत के हिसाब से ही तो करते हैं। रिश्ते भी अपनी ज़रूरत के हिसाब से बनाते-तोड़ते हैं। ख़ुद से रिश्ता बनाया था क्योंकि उस वक़्त ख़ुद को संभालने की ज़रूरत थी। भीतर की आवाज़ को सहेजना ज़रूरी था। ज़िन्दगी पटरी पर आई (और कुछ दोस्त मिल गए) तो वो ज़रूरत ख़त्म हो गई।

मॉर्निंग पेज की याद इसलिए आई है क्योंकि फिर ज़रूरत महसूस होने लगी है सफाई की। अपनी ही बात सुनना फिर से ज़रूरी हो गया है। दिल लगाकर काम करने को कहते हैं सब। लेकिन दिल कहता क्या है, ये सुनने की फ़ुर्सत किसे होती है?

इस बार मैं पब्लिक प्लैटफॉर्म पर अन्सेन्सर्ड लिखने की ज़ुर्रत कर रही हूं। इस बार सारे मॉर्निंग पेज ब्लॉग पर लिखे जाएंगे। दिल क्या कहता है, ये मैं भी सुनूंगी और मेरे बच्चों के लिए भी दिल की बातें रिकॉर्ड की जाएंगी, लिखी जाएंगी।

लिखना उन सारी बातों और कहानियों को शब्द देने का ज़रिया होता है जिन्हें किसी और तरह शायद कभी कहा नहीं जा सकेगा। कहानियां रचनेवाला अपने किरदारों के ज़रिए कुफ़्र की बातें लिखता है, अनकम्फर्टेबल सवाल पूछता है। अपने शब्दों में अपने सबसे बड़े डर को रचता है। इस लिहाज़ से रचने वाले के पास तो दैवीय ताक़त होती है। जो बात लिखी न जा सके, वो अपने भीतर का सबसे बड़ा झूठ होता है। उसी झूठ से निजात पाकर ही हम अपने सबसे शुद्ध रूप के करीब होते हैं। सच और क्या है सिवाय हिम्मत के? सच और क्या है सिवाय अपने ही सामने आईना रख अपनी ही आंखों में देखकर उलटे-सीधे सवाल पूछने के?

जब तक भीतर से झूठ का मैल निकलेगा नहीं, कुछ और लिखना, ईमानदारी से लिखना मुश्किल होगा। इसलिए मॉर्निंग पेज की शरण में जा रही हूं। जूलिया कैमरॉन, पता नहीं तुम दुनिया के किस कोने में रहती हो। लेकिन सच कहती हो कि क्रिएटिव रिकवरी की प्रक्रिया ताउम्र चलती रहनी चाहिए। बहना ज़रूरी है, नहीं तो ज़िन्दगी की तलछट में काई जमने का ख़तरा बना रहता है।

http://juliacameronlive.com/basic-tools/morning-pages/

5 comments:

Leena Goswami said...

पहली बार आप ही से मालूम चला था जूलिया कैमरॉन और उनकी किताब 'द आर्टिस्ट वे' के बारे में पर सच कहूँ तो एक ईमानदार कोशिश नहीं की मैंने, न उस किताब के साथ ना अपने अंदर शायद किसी कोने में छुपे आर्टिस्ट के साथ. किताब और उसके तरीकों को लेकर खुदसे ही बहुत तर्क वितर्क किये और जब जवाब मिलने की जगह और उलझ गई तो अलमारी में बंद कर दिया किताब को भी और अपनी उलझनों को भी। पर आज एक जवाब आपके शब्दों से मिल गया 'जब तक भीतर से झूठ का मैल निकलेगा नहीं, कुछ और लिखना, ईमानदारी से लिखना मुश्किल होगा।' तहे दिल से शुक्रिया, फिर से बंद किताब और बंद डायरी को निकाल लिया है हर रोज़ मॉर्निंग पेजेस लिखने के वादे के साथ । वाकई ये सफाई बहुत जरुरी है।

shikha varshney said...

जूलिया कैमरॉन और उनकी किताब का तो पता नहीं पर तुम्हारी पोस्ट ने गहरा असर किया है. आजकल अपनी हालत भी कुछ ऐसी ही है, शायद यह मोर्निंग पेज ही कुछ सहारा बन सकें. शुक्रिया इस जरुरी ब्लॉग का अनु.

Abhimanyu singh said...

इतना अच्छा लिखने के लिए धन्यवाद अनु जी । क्या यह किताब हिंदी में उपलब्ध है ।

Abhimanyu singh said...
This comment has been removed by the author.
poonam jain said...

bahtareen post