Friday, February 20, 2015

मॉर्निंग पेज १० है अक्षय के नाम

डिस्केलमर - मॉर्निंग पेज मेरे अपने लिए है। ये मैं किसी और के लिए नहीं लिखती। न इसलिए लिखती हूं कि लोग पढ़ें, वाहवाहियां भेजें (या फिर अपनी सहानुभूतियां)। मॉर्निंग पेज कहीं और छपने, छापने या शेयर करने के लिए भी नहीं है। ब्लॉग पर इसलिए है क्योंकि अपने लेखन, अपनी सोच (और अपनी शख़्सियत) में आ रहा बदलाव यहां रेकॉर्ड होता रहता है। मॉर्निंग पेज मेरी निजी डायरी है, और मैं ये क्लिक्स या विज़िट हासिल करने के लिए बिल्कुल नहीं लिख रही।

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कल शाम अक्षय ने फोन किया, महीनों बाद। मैं कई बार सोचती हूं कि उसके बारे में लिखूं। लेकिन समझ नहीं पाती कि लिखूं क्या।

२००१-०२ में मैं मुंबई में थी। फिल्में लिखने और उनका प्रोडक्शन सीखने का फ़ितूर था। अपने बैच के और पत्रकारों की तरह किसी चैनल या अख़बार के चक्कर काटने से ज़्यादा अच्छा मुंबई जाकर किस्मत आज़माने का ख़्याल लगा। हालांकि कुछ निजी वजह भी थी। निकम्मेपन पर आमादा हों हम तो इश्क क्या, फ़ितूर भी निकम्मा बना दिया करता है।

ख़ैर, मुझे काम मिल गया था। पहली कोशिश में ही। आरे कॉलोनी के एक स्टूडियो में शूटिंग का भी पहला दिन था, और मेरे काम का भी। मैं ख़ुश थी कि पहली बार शूटिंग देख रही हूं। हालांकि मुझे क्या काम करना होगा, ये ठीक-ठीक मुझे तो क्या, मुझे काम पर रखने वाले डायरेक्टर को भी नहीं मालूम था।

मैं मुहूरत के वक़्त प्रॉड्यूसर-डायरेक्टर के साथ जाकर खड़ी हो गई थी। उन्होंने मुझपर एक सरसरी सी निगाह डाली और तभी उन्हें अपने फ़ैसले की निरर्थकता का अहसास हो गया होगा। उन्होंने एक लड़के को आवाज़ दी।

जो लड़का भीड़ से निकलकर आया, गज़ब गुड-लुकिंग था। कम से कम दिल्ली के पैमाने के हिसाब से तो था ही। (लेकिन मुझे चिकने लड़के बिल्कुल पसंद नहीं। तब भी नहीं थे, अब भी नहीं हैं।)

डीटी (प्रॉ़ड्यूसर-डायरेक्टर) ने हमारा इंट्रो कराया और लड़के से कहा कि मुझे बाहर ले जाकर काम समझा दे।

What exactly are you doing here? उसने पूछा तो मैं हड़बड़ा गई। किसी का पहला सवाल इतना रूड कैसे हो सकता है? पूछने का अंदाज़ तो और भी रूड था। उसने डिब्बे से सिगरेट निकाली और मुंह में दबा लिया। पूछा तक नहीं कि तुम्हें मेरे सिगरेट पीने से एतराज़ तो नहीं।

मैंने जवाब में क्या दोहराया, ये याद नहीं लेकिन उसके जवाब में उसने मुझे अपने काम समझा दिया। ये नहीं बताया कि फ्लोर पर रहते हुए मुझे क्या करना है।

पहले दिन मैं हैरान-परेशान घूमती रही। आशुतोष गोवारिकर को सामने से आते देखा (ये लगान से तुरंत बाद की बाद है) तो घबराकर दरवाज़े के पीछे छुप गई। राज ज़ुत्शी को देखा, आदि इरानी को देखा। उस रोज़ एक-एक करके लगान की सारी टीम प्रॉड्युसर को बधाई देने पहुंच रही थी। ये डीटी की पहली फिल्म थी, और एक्टिंग के ज़माने से उनके कई दोस्त थे। मैं total awe में थी। जो पर्दे पर दिखता है, वो वैसा होता नहीं जैसा है। लोग, सेट्स, कहानियां... पर्दा सबसे बड़ा धोखेबाज़ है। पर्दे के छोटे छोटे टुकड़े कर दो तो दुनिया के सबसे शानदार मुखौटे तैयार हो जाते हैं।

सेट्स पर ये मेरा पहला दिन था, और मुझे डर इस बात का था कि किसी ने कुछ पूछ लिया मुझसे तो कहूंगी क्या। मुझे तो कुछ भी नहीं आता। जिस लड़के से मुझे डीटी ने मिलवाया था, वो तो मसरूफ़ियत का ऐसा नाटक करते हुए घूम रहा था कि जैसे दुनिया की बड़ी ज़िम्मेदारी उसे ही सौंपी गई हो। कहां क्या हो रहा है, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। मैं भाग जाना चाहती थी।

लंच ब्रेक की अनाउंसमेंट हुई तो मैं एक कोने में जाकर खड़ी हो गई। मुझे ये भी नहीं मालूम था कि लंच में करना क्या होता है, कहां जाना होता है।

वो लड़का मेरे बगल में फिर से खड़ा हो गया, सिगरेट पीते हुए। Come, let me show you where they serve lunch.

उसने मुझे वहां लाकर खड़ा कर दिया, जहां जूनियर आर्टिस्टों को खाना दिया जा रहा था और ख़ुद किसी कमरे में घुस गया। मैं परेशान वहीं खड़ी रही। ऐसे कैसे किसी से खाना मांग लेती? एक तो न मुझे उनकी भाषा समझ आ रही थी, और न लहज़ा। मुझे रोना आ रहा था। मैं घर जाना चाहती थी। मुंबई से आधे दिन में ही जी भर गया था। इतने सारे शोर में इतना अकेला हो सकता है इंसान? सुबह बिना खाए निकली थी और अब भूख से सिर में दर्द शुरु होने लगा था।

You haven't taken your food? Come, let me introduce you to other crew members. वो लौट आया था, मुझे अपने साथ ले जाने के लिए।

अंदर गई तो आठ-दस लोग बाहर मिल रहे खाने से कहीं बेहतर खाना खा रहे थे। मुझे दूर से ही तवा रोटियां और सलाद दिख गए थे (अभी भी खाना अच्छा है या नहीं, ये मैं इन्हीं दो चीज़ों के दम पर तय करती हूं)। मैं बैठ गई थी और क्रू के एक-एक जने से परिचय होता रहा। प्रोडक्शन के हेड शाहिद भाई, प्रोडक्शन मैनेजर सतीश भाई, आर्ट डायरेक्टर कुमार भाई, कोरियोग्राफर बॉस्को-सीज़र, असिस्टेंट डायरेक्टर नीतल और अक्षय। दो-चार और लोग थे, लेकिन अब याद नहीं कि कौन थे। सिर्फ़ ये याद है कि सारे बंबईया हिंदी बोल रहे थे। सिर्फ़ एक अक्षय था जो दिल्ली वाली सही हिंदी और सही अंग्रेज़ी बोल रहा था। हालांकि मुझे उससे चिढ़ होने लगी थी, लेकिन मैं उसी दिन समझ गई थी कि एक यही शख़्स है जो मेरी भाषा में मुझसे बात करेगा, और जिसकी वजह से मैं टिकी रहूंगी।

मेरा अंदाज़ा सही निकला। धीरे-धीरे मैं काम भी सीखने लगी, और क्रू के साथ कम्फर्टेबल भी होती गई। लेकिन दोस्ती सिर्फ अक्षय से ही हुई।

अक्षय दिल्ली से आया था। ग्रैजुएशन भी नहीं किया था उसने, लेकिन फिल्म बनाने (और एक्टिंग करने) का इतना ज़बर्दस्त पागलपन था कि मुंबई चला आया था। उसके मौसा टीवी एक्टर थे, और फूफा एक बहुत बड़े पॉलिटिकल लीडर (अभी भी हैं, सेन्ट्रल कैबिनेट के सबसे बड़े मंत्रियों में एक)। ज़ाहिर है, उसकी पैराशूट लैंडिंग हुई थी। मेरी तरह उसको काम खोजना नहीं पड़ा था। इस फिल्म में वो असिस्टेंट डायरेक्टर था। लेकिन मुझे पक्का यकीन था कि उसके गुड लुक्स की वजह से अगली फिल्म में उसे ब्रेक मिल ही जाएगा।

मैं मुंबई दो-चार लोगों की वजह से ही टिकी रही। आने के तीन-चार महीने भीतर ही बहुत बड़ा हार्टब्रेक होने के बावजूद। अक्षय मुझसे तीन साल छोटा था, लेकिन मुझे उससे वो समझदारियां और हिम्मत मिलती रही जिसकी उस वक़्त मुझे सख़्त ज़रूरत थी।

मैं चार बंगला में एक पीजी में रहती थी और अक्षय वर्सोवा में अपनी मौसी के घर रहता था। शूटिंग के बाद, या ऑफिस के बाद हम अक्सर साथ घर जाते। दफ़्तर ओशिवारा में था, और अब सोचकर हैरानी होती है कि कई बार मैं और अक्षय ओशिवारा से चार बंगला तक पैदल चलते हुए जाते। उसके पास ज़िन्दगी के किस्से नहीं थे, किताबी बातें थीं। और ढेर सारे सपने थे। मेरे पास बहुत सारे किस्से थे, और वो सपने थे जिन्हें मैं किताबों और फिल्मों में डालना चाहती थी।

मैं उसे शेखर: एक जीवनी पढ़ने को कहती। वो मुझे Zen and the art of motorcycle maintenance की कॉपी थमाता। वो अंग्रेज़ी में कविताएं लिखता था - existentialist फ्लेवर वाली कविताएं। मैं उड़ने, भागने, दौड़ने, किसी और दुनिया में चले जाने के कच्चे-पक्के गीत लिखती। वो अंग्रेज़ी में मेरे लिखे हुए की बघिया उधेड़ता। मैं उसकी कविताओं का हिंदी अनुवाद करती और उनके abstractness पर सिर पीटती।

इस बीच हम फिल्म प्रोडक्शन, डायरेक्शन, साउंड डिज़ाईन, म्युज़िक कॉम्पोज़िंग, स्क्रिप्ट्स, पीआर और रिलीज़ के पहले और बाद के ताम-झाम की बारीकियां सीखते रहे। क्रू में हम दो ही थे पढ़े-लिखे, इसलिए हमारे माथे कई सारे काम आने लगे। मुझे मुंबई अच्छी लगने लगी। मैं वहां बस जाने का, कई सारी और चीज़ें सीखने का ख़्वाब देखती रही। मुझे इस बात का पक्का यकीन होने लगा कि एक दिन मैं फ़िल्में लिखूंगी भी, बनाऊंगी भी। तनुजा चंद्रा को मैंने रोल मॉडल बना लिया। अक्षय भी एक दिन स्टीफन स्पिलबर्ग हो जाने के सपने देखता रहा (बॉलीवुड के तमाम सारे डायरेक्टर उसे किसी काम के नहीं लगते थे)।

वो मुझे अपनी गर्लफ्रेंड के बारे में बताता, मैं उसे प्रोपोज़ करने के तरीके बताती। मैं उससे अपने डर बांटती, वो मेरे पढ़ने के लिए कोई नई किताब ले आता।

अक्षय और मैंने कभी साथ कोई फिल्म नहीं देखी, कभी साथ चाय-कॉफी नहीं पी। हमने साथ बहुत सारी किताबें पढ़ीं, बहुत सारी कविताएं लिखीं।

वैसे मुझे एक शाम कभी भी नहीं भूलती।

फिल्म के रिलीज़ से ठीक पहले डीटी ने हम दोनों 'kids'  को हज़ार-हज़ार रुपए दिए, इसलिए क्योंकि हमलोग रोलिन्ग स्टोन्स लाइव कॉन्सर्ट देखने जाना चाहते थे, वो भी टाउन। कॉन्सर्ट रात में था, और डीटी ने हमें आधी रात को अकेले आने से मना किया था। इसलिए अक्षय कॉन्सर्ट के बाद मुझे अपनी बुआ के घर पेडर रोड ले गया था। मैं पहली बार ऐसे किसी घर में गई थी जहां के बटलर मोनोग्राम किए हुए यूनिफॉर्म पहनते हों, और जहां मेहमानों की ऐसी खातिरदारी होती हो जैसे भगवान आ गए हों कोई। अब सोचती हूं कि अक्षय की बुआ ने पता नहीं क्या सोचा होगा कि कौन सी लड़की आ गई है भतीजे के साथ। ये मेरी अपनी तंगदिली और तंगसमझ भी हो सकती है क्योंकि हमारे कल्चर में किसी लड़की को इस तरह तब तक घर नहीं लेकर आते जब तक मामला गंभीर हो। लेकिन वहां मेरा इस तरह चले जाना बिल्कुल एबनॉर्मल नहीं था। मेरी वैसी ही ख़ातिर हुई जैसे कुंभ मेले में भटक गई किसी भतीजी की होती।

बुआ ने हम दोनों को निकलते हुए पांच-पांच सौ रुपए दिए थे और हमने उन पैसों से पब जाने का फ़ैसला किया (इसलिए क्योंकि मैं कभी किसी पब में गई नहीं थी।) मुझे याद नहीं कि पब का नाम क्या था, लेकिन अक्षय के मुताबिक मुंबई का सबसे हैपनिंग बार था वो। ये और बात है कि पंद्रह मिनट में ही मेरा दम घुटने लगा था और हम बाहर मरीन ड्राईव की तरफ आ गए थे।

मुंबई में अक्षय के साथ गुज़ारी हुई वो आख़िरी शाम थी। मैं कुछ दिनों बाद दिल्ली लौट आई थी और यूके पढ़ने जाने के लिए अप्लाई करना शुरु कर दिया था। फिर वो भी नहीं हो सका तो एनडीटीवी की नौकरी कर ली थी।

अक्षय तीन फिल्मों में असिस्ट करने के बाद दिल्ली लौट आया था। उसकी गर्लफ्रेंड तब दिल्ली में ही थी। उन दोनों ने भी एनडीटीवी ज्वाइन कर लिया। साक्षी से मैं अपने जन्मदिन पर मिली थी। दोनों साथ घर आए थे। उसके बाद हम कई बार मिलते रहे। फिर मेरी शादी हो गई और जब आदित-आद्या होनेवाले थे उन दिनों अक्षय और साक्षी की शादी भी हो गई।

ज़िन्दगी कई करवटें लेती रही और हमने अपनी दोस्ती बचाए रखी। बच्चे छोटे थे, इसलिए मैं पूर्णिया में रही। अक्षय और साक्षी मुंबई शिफ्ट हो गए। तीन-चार सालों तक हमारे बीच कोई संपर्क नहीं रहा और फिर अक्षय ने मुझे ढूंढ निकाला। याद नहीं कैसे। शायद एनडीटीवी के किसी कॉमन लिंक के ज़रिए। तबतक अक्षय टीवी स्टार हो चुका था और साक्षी एक बड़ी कंपनी में वाइस-प्रेसिडेंट।

अक्षय दोस्ती में बचा हुआ मेरा यकीन है। जब भी अपने आस-पास बहुत-बहुत सारी खुदगर्ज़ियां देखती हूं और रिश्तों (या दोस्ती) को लेकर इनसेक्योर लोगों को देखती हूं तो अक्षय के बारे में सोचती हूं। हम साल में एक बार मिलते हैं शायद, और शायद साल में एक ही बार फोन पर बात भी करते हों। लेकिन हमारे लिए कभी बातों की डोर पकड़कर वहीं से शुरु हो जाना जहां पिछली बार छोड़ा था, कभी मुश्किल नहीं रहा। मैं अक्षय और साक्षी से बड़ी हूं, इसलिए उनकी ज़िन्दगी के बारे में सलाह देने का हक़ उन्होंने मेरे नाम रख छोड़ा है। वो छोटे हैं, इसलिए मेरे नाम की आवारगी की याद दिलाते रहते हैं मुझे।

अक्षय मुझे अपनी स्क्रिप्ट सुनाता है, जिसपर वो फिल्म बनाना चाहता है। मैं उसे नीला स्कार्फ़ पढ़ने की ज़िद करती हूं। हम लिखने को लेकर घंटों बातें करते रहते हैं, कभी वर्सोवा के कॉस्टा में, कभी मलाड उसके घर पर, और कभी बैंडस्टैंड के पास। उसने लिखने का ख़्वाब नहीं छोड़ा। मैंने फिल्म बनाने की ख़्वाहिश को दफ़्न होने नहीं दिया। अपने अपने संघर्षों के बीच उसने अपनी सैनिटी बचाए रखी, मैंने अपनी ग्रेस।

ये वो दोस्ती है जिसकी मिसाल मैं आद्या और आदित को दूंगी और यकीन के साथ बताऊंगी उसको कि हर रिश्ता स्वार्थ के लिए नहीं होता। कुछ रिश्ते ख़ुदा इसलिए बना देता है ताकि हमारे भीतर के दिल दरिया पर निस्वार्थ नेमतों की बारिशें गिरती रहें। यही वो एक खाता है - दोस्ती का खाता - जहां तुम्हें कितना मिला और तुमने कितना दिया - ख़ुदा उसका हिसाब नहीं रखता।  

ईश्वर आद्या को भी अक्षय जैसा दोस्त बख़्शे और आदित को किसी लड़की के लिए वैसा ही एक दोस्त बना दे, यही दुआ करती हूं।

2 comments:

Ankur Agarwal said...

Bahut khub alka ji, yaha ajay ji ke blog se roy ki gatha sunte sunte pahuncha..

Umda hei aapki dosti ki daastan()

varsha said...

anu aap DIL likh rahi hain aur ham DIL padh rahe hain.