Wednesday, February 18, 2015

मॉर्निंग पेज ८ और ब्रोकेन सॉन्ग

अब उस जगह पहुंच गई हूं जहां बाहर की आवाज़ें बंद कर देने को जी चाहता है। स्मार्टफोन है नहीं, इसलिए व्हॉटसैप्प बंद है। फेसबुक को डिएक्टिवेट करने का बटन ढूंढते ढूंढते थक गई और फिर सोचा कि यहां भी अनुशासन ही चलने दें। एसएमएस का जवाब देना भारी काम लगने लगा है। फोन पर किसी से बात नहीं करना चाहती। मजबूरी न हो तो किसी से मिलने की भी क्या ज़रूरत? 

क्या ये सारे डिप्रेशन के लक्षण हैं? 

ये सारे क्रिएट करने से पहले की बैचैनियां और गुमख़्याली है। मैं आजकल मम्मा की डायरी को लेकर बहुत बेचैन हूं। दिमाग़ किस्सों और मुद्दों से भरा हुआ है। स्क्रीन पर सामने जो नज़र आता है, वो मुकम्मल नहीं लगता। लगता है कि कहीं मैं कुछ बेईमानी कर रही हूं। कोई बात थी जो कहनी थी, लेकिन कहने से बच रही हूं। जबतक ईमानदारी से चैप्टर लिखे नहीं जाएंगे, तब तब बेचैनी ख़त्म नहीं होगी। 

लिखने के लिए वक़्त बहुत कम है। या मैं वक़्त नहीं दे रही शायद। काम तो कोई है नहीं, लेकिन वक़्त ज़ाया करने की बुरी आदत बचपन से लगी है। सुबह तभी उठती हूं जब बच्चों को उठाने का वक़्त होता है। सुबह की सैर बंद हुए पूरा जाड़ा निकल गया। बच्चों के जाने के बाद घर में इधर-उधर बेमतलब के काम करती रहती हूं। और फिर थककर बाहर निकल जाती हूं। कभी किसी सड़क पर, कभी किसी मॉल में। अगर बाहर निकल जाने से बेचैनियां कम हो जातीं तो सड़क पर इतने सारे बेचैन लोग क्यों दिखते? 

दिन निकलता जा रहा है और भीतर पकती कहानियां सड़ने को हो रही हैं। उन्हें शाखों से तोड़ लेना चाहिए। उन्हें अब हर हाल में काटकर परोस दिया जाना चाहिए। 

कल रात नीला स्कार्फ़ की टाइटल स्टोरी - नीला स्कार्फ - का अनुवाद एडिट कर रही थी। एडिट करते करते कई हिस्से दुबारा लिखने लगी। अपनी ही कहानी अनुवादक के नज़र से पढ़ते और देखते हुए मैं बहुत उदास हो गई थी। नीला स्कार्फ़ इतनी सारी उदास कहानियों का संग्रह क्यों है? मुझे उदासियों के अलावा कुछ बुनना नहीं आता? 

रात में अजीब-अजीब से सपने आते रहे। सपने के एक टुकड़े में मैं किसी कमरे में बंद कर दी गई थी। बाथरूम की खिड़की खोलकर मैं बाहर भागने का रास्ता तलाश कर रही थी। मेरे हाथ में पांच मैग़जीन्स थे और मैं उन पांचों के बिना खिड़की से बाहर नहीं कूदना चाहती थी। मुझे डर था कि वो पत्रिकाएं हाथ से छूटीं तो मेरे हाथों से कहानियां निकल जाएंगी। सपने में मैंने राजदीप को भी देखा। पता नहीं क्यों। कुछ लोग राजदीप के कमरे का दरवाज़ा ज़ोर ज़ोर से पीट रहे थे। मुझे डर लगा कि कहीं ये लोग राजदीप को मार तो नहीं देंगे? 

पता नहीं किसकी जान ख़तरे में है। पता नहीं कौन कहां बंद है? पता नहीं किसे मुक्ति दिलानी है, लिबरेट करना है। 

He sets deadly traps for himself, then cuts them away: 
The courtiers listen in amazement, give frequent gasps of praise. 

टैगोर का 'ब्रोकेन सॉन्ग' क्यों याद आ रहा है? वो तो काशीनाथ था। ये तो राजदीप है। 

राजा प्रताप राय को सिर्फ़ और सिर्फ़ बरज लाल का गीत पसंद आता था। उनके दरबार में ये काशीनाथ क्यों आ गया था? टैगोर की कविता ब्रोकेन सॉन्ग कविता नहीं है, एक लंबी कहानी है। नवीन और पुरातन के बीच के संघर्ष की कहानी। सुरों के संघर्ष की कहानी। एक दरबार की कहानी, दरबार में राजा के पक्षपात की कहानी। हुनर द्वारा अपने लिए जगह बनाने की कहानी। 

मैं ब्रोकेन सॉन्ग पढ़ने लगी हूं। ज़ोर ज़ोर से। ऊंची आवाज़ में। बच्चों के स्कूल चले जाने के बाद घर के खाली हो जाने के अपने फ़ायदे हैं। 

The singer along does not make a song, there has to be someone who hears:
One man opens his throat to sing, the other sings in his mind.
Only when waves fall on the shore do they make a harmonious sound;
Only when breezes shake the woods do we hear a rustling in the leaves.
Only from a marriage of two forces does music arise in the world.
Where there is no love, where listeners are dumb, there never can be song.'   

डियर डायरी, अाज कई काम निपटाने हैं।

न चाहते हुए भी पुस्तक मेला में अपनी शक्ल दिखानी है। मुस्कुराने का नाटक करना है। नॉर्मल दिखना है। नॉर्मल बातें करनी हैं।

नीला स्कार्फ को The Blue Scarf में तब्दील करना है पूरी तरह।

मम्मा की डायरी का एक चैप्टर फाइनल करना है।

अपने नए ओपएड के बारे में सोचना है।

स्वर्ण सुमन के लिए सवाल भेजने हैं। जिस सोशल मीडिया ने मेरी अपनी ज़िन्दगी में भूचाल ला दिया, उस सोशल मीडिया से जुड़े विहंगम सवाल पूछने हैं। परिचर्चा की तैयारी करनी है।

और देर शाम एक औपचारिक डिनर में ग्रेसफुल होने की कोशिश करनी है।

आज के लिए इतने काम बहुत हैं।


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