Friday, February 13, 2015

मॉर्निंग पेज ४ - बढ़ना कदम-कदम धीरे-धीरे

जैसे ही ब्लॉग खोलकर लिखने बैठी, बिजली चली गई । मॉर्निंग पेज लिखने के लिए तकनीक का सहारा लो तो यही होता है। बात तो ये है कि दिल की भड़ास निकालने के लिए किसी टूल की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए । जिस आसानी से कीपैड पर हाथ (और उसके साथ दिमाग) चलता है, उतनी ही आसानी से कलम काग़ज़ पर शब्द उगलें तब तो कोई बात हो ।
बहरहाल, कल का टार्गेट मैंने हासिल कर लिया। एक नई कहानी भी लिखी (जो कल ऑक्सफोर्ड बुक स्टोर में वैलेंटाईन डे के मौके पर पढ़ी जाएगी) और अपना पहला ओप-एड भी लिखकर भेज दिया । वो भी वक़्त पर । वो भी अंग्रेज़ी भी । वो भी दो घंटे के भीतर । 

ओप-एड भेजते ही पहला ई-मेल उस बंदे का आया जिसने मुझसे सीधे बात की थी । स्टिंकर था बिल्कुल । उसने आर्टिकल पढ़ा तक नहीं था और मेरे अगले ओप-एड के आईडिया को पूरी तरह शूट डाउन कर दिया था । रात के साढ़े दस बजे ये ईमेल पढ़ते ही मुझे लगा कि दिन का पूरा ज़ायका बिगड़ गया है । लेकिन मैंने उसे तभी जवाब देने की ज़रूरत नहीं समझी । कभी-कभी रिएक्टिव न होना भी अच्छा होता है । बल्कि हमेशा अच्छा होता है ।

सुबह उठी हूं तो उसकी बॉस का ईमेल देखा । उसे आईडिया भी पसंद आए और पहला ओप-एड भी । वो आज ही उसे पब्लिश करना चाहती है । ये मेरे लिए बड़ा सबक है । कई बार निजी और प्रोफेशनल ज़िन्दगियों में हम छोटी-छोटी बातों पर तुरंत प्रतिक्रिया दे बैठते हैं । फिर अपने मन की कोई बात पूरी न हो तो उसके ख़िलाफ़ फिर और रिएक्ट करते हैं । बात बनने की बजाए बिगड़ती चली जाती है, और फिर इस कदर बिगड़ जाती है कि हमें भीतर से तिक्त और नेगेटिव बनाती है ।

मुश्किल है, लेकिन अगर थोड़ी-सी कोशिश की जाए तो इन छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देना हमारे वजूद का हिस्सा बन जाता है । मैं अभी भी सोच रही हूं कि कल रात एक ईमेल के जवाब में मैंने अपना सारा गुस्सा उसी तरह निकाल कर भेज दिया होता, और लिख दिया होता कि मेरी ज़िन्दगी तुम्हारी बकवास और तुम्हारे ज्ञान, दोनों के बग़ैर अच्छी चल रही है तो क्या होता?

ख़ैर, ये एक छोटी-सी जीत है ।

मुझे चार दिनों में ही मॉर्निंग पेज लिखने का फ़ायदा दिखाई देने लगा है । मैं पहले घंटों स्क्रीन की ओर ताका करती थी । फिर कुछ नहीं सूझता था तो यहां-वहां इंटरनेट पर भटकती रहती थी । दिन भर बैठे रहने के बाद भी काम न के बराबर होता था ।
अब मैं बैठती कम हूं । जितनी देर बैठती हूं उसके हिसाब से वैसी प्रॉडक्टिव नहीं हूं जितनी हो सकती हूं लेकिन हर रोज़ प्रॉडक्टिविटी इन्डेक्स ऊपर जा रहा है । मुझे उम्मीद है कि मैं 'मम्मा की डायरी' इस महीने के अंत तक अपने पब्लिशर को सौंप पाऊंगी, और फिर ख़ुद को पूरी तरह किताब से डिटैच भी कर लूंगी । मुझे इस बात की भी यकीन होने लगा है अब कि मेरे लैपटॉप के अलग-अलग फोल्डरों में रखे हुए कई सारे अधूरे काम पूरे हो सकेंगे ।

फेसबुक पर लाडली अवॉर्ड्स की तस्वीरें देखकर बहुत सारे लोग मुझे इन्बॉक्स कर रहे हैं । यहां तक कि कई सारे दोस्तों ने मुझे फोन भी किया । मैं हंस देती हूं और कहती हूं कि फेसबुक पर जो दिखता है वो एक दहाई सच है । इन मुस्कुराती तस्वीरों का लम्हा आधे घंटे का भी नहीं होता । उसकी पृष्ठभूमि में जो चल रहा होता है, वो chaos और पागलपन बड़ा सच है । किसी भी किस्म की उपलब्धि की उम्र उसके पीछे (और उसके आगे) जी जा रही ज़िन्दगी का बहुत छोटा सा हिस्सा होती है। सेलीब्रेशन अस्थायी होता है, क्षणभंगुर । सफ़र और हर रोज़ का संघर्ष स्थायी है । हम इससे नहीं बनते कि हमारे नाम छोटी-बड़ी उपलब्धियां कितनी हैं । हम इससे बनते हैं कि हर रोज़ हम जीते कैसे हैं ।

एक और बात नोटिस कर रही हूं मैं आजकल । मुझे शॉर्ट फॉरमैट में लिखने की इतनी आदत हो गई है कि ठीक साढ़े छह शब्दों के बाद मेरी उंगलियां और मेरा दिमाग, दोनों चलना बंद कर देते हैं । मैं ख़ुद से भी एक कॉन्वर्शेसन लंबे समय तक नहीं खींच सकती ।

मेरी अगली चुनौती लंबे फॉर्मैट में लिख पाने की है ।

साढ़े सात बजने को हैं और दिन बहुत लंबा है । मुझे आदित को लेकर पहले श्रॉफ आई सेंटर, दरियागंज जाना है और उसके बाद वापस उसे स्कूल छोड़ना है ग्रेटर नोएडा । फिर मुझे लौटकर नोएडा आना है और एक फोटो शूट के लिए अपने ड्राइंग रूम को तैयार करना है । मुझसे किसी ने पूछा कि क्या मैं किसी पीआर फर्म का सहारा ले रही हूं? ऐसा क्यों है कि अचानक पब्लिक स्पेस में मैं हर जगह दिखाई दे रही हूं । मैंने हंसकर कहा कि पीआर फर्म को देने लायक पैसे होते तो वो पैसे देकर मैंने अब तक अपनी (बहुत खराब) कविताओं की कम-से-कम दो किताबें छपवा ली होंती । छपास की भूख भी शांत हो जाती और कवि होने की ख़ुशफहमी मिलती, सो अलग । पब्लिक स्पेस में मैं इसलिए हूं क्योंकि कोई भी मीडिया (या मंच) किसी एक म्यूज़ को पकड़ लेता है तो फिर जब तक उसका पूरी तरह दोहन न कर ले, तब तक कोई भी डिस्कवरी सफल नहीं मानी जाती, न उसके रिसोर्स का सही इस्तेमाल होता है । पब्लिक मेमोरी होती है छोटी, और मीडिया (अब सोशल मीडिया भी) यूज़ एंड थ्रो पर चलता है । स्टोरी निकालो, छापो, दिखाओ और फिर भूल जाओ । मैं मीडिया में रही हूं, इसलिए ये बात अच्छी तरह समझती हूं ।

आप कहां कहां और कैसे छप रहे हैं, आपके बारे में क्या लिखा जा रहा है, वो भी अस्थायी है – मंच पर होनेवाले लम्हे की तरह। जो टिका रहेगा, बचा रहेगा – आपके भीतर का अपना संतोष होगा । आपसे बेहतर आपकी क्षमता और आपके सफ़र के पड़ावों को कोई नहीं जानता । अपना काम ईमानदारी से करना इकलौता संतोष है । उसके साथ आने वाली आलोचनाएं, तीखी बातें, प्रतिक्रियाएं, वाहवाहियां, हैरानियां, सज्दे – सब सकेंडरी, टर्शियरी बाई प्रॉडक्ट हैं । बाई प्रॉडक्ट की उम्र बहुत छोटी होती है । उसको लेकर भी एकभाव बने रहना चाहिए -  equanimous ।


(और इस तरह मैंने साढ़े छह सौ शब्दों की सीमा पार कर ली J)  

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