Saturday, February 14, 2015

मॉर्निंग पेज ५ - अपना पहला ऑफिशियल फोटो शूट

कल का दिन बहुते मजेदार रहा। वजह कई है लेकिन दो कारणों को मैं दिन का हाईलाईट मानते ही यहां अपनी डायरी में रिकॉर्ड करना चाहूंगी।

श्रॉफ आई सेंटर में आदित के एक्सरसाइज़ के ख़त्म होने का इंतज़ार कर रही थी कि मेरे मोबाइल पर फ़ोन आया। आधा मिनट तो समझने में लगा कि सामने वाला है कौन और चाहता क्या है। फिर समझ में आया कि सामने वाला एक फोटोग्राफर है और उसे एक मैग़जीन के लिए मेरी प्रोफ़ाइल तस्वीर खींचने का असाईनमेंट मिला है। फिर ये भी समझ में आया कि वो जानता तक नहीं कि मैं कौन हूं, और उसे तस्वीर किसके लिए और क्यों खींचनी है। बस बार-बार अपने पब्लिकेशन का नाम दुहराता रहा।

Are you sure you haven't got the wrong number, or... ummm... the wrong person? मैंने फोन रखते-रखते अपनी तसल्ली के लिए पूछ ही लिया।

No... no... no... I got this message at 2 in the night from my editor. I need to photograph Ms. Anu Singh Choudhary at 1 pm today. Will you pls text me your address?

और उसके बाद मेरे पैरों के नीचे जो क्लच-ब्रेक-एक्सीलरेटर आया, वो सीधे ग्रेटर नोएडा होते हुए मेरे घर के बाहर आकर मेरे चंगुल से छूटा। तब दिन के १२.५५ हो रहे थे।

जाज़ो (फोटोग्राफर का यही नाम था) बिल्कुल वक़्त पर आया था। माथे पर लटके एकदम स्ट्रेट बाल, वैसे जैसे आयरनिंग के बाद भी मेरे बाल नहीं होते, स्निकर्स, कंधे पर बैकपैक और हाय की मुद्रा में उठे हुए हाथ। मुस्कुराता हुआ मंगोलियन चेहरा - धूप में ऐसे टैन हुआ हो जैसे बिस्कुट बनने के क्रम में मैदा हो जाता है। ड्राईंग रूम में बैठे मम्मी-पापा को पक्का झटका लगा होगा। आख़िर हमारी बेटी कर क्या रही है? कैसे-कैसे लोग इससे मिलने आते हैं?

उसने अपना सामान रखा और कमर पर हाथ रखकर मेरे ड्राईंग रूम में खड़ा हो गया। There is too much light in here. Can I see other parts of your house?

मैंने उसे बिखरे-फैले हुए दो और बेडरूम्स दिखाए दिए। टंगे हुए आधे गीले, आधे सूखे कपड़ों के बीच से होते हुए ले जाकर छत भी दिखा दिया।

Is there any park that we can go to? Is that your neighbourhood park? Is there any other park which is less messier?

मैंने उससे कहा, भैय्या जो है तुमरे सामने है। अब फोटू खींचना हो तो खींचो वरना हमको बख़्श दो।

I could take you to a friend's house. मैंने उसका स्ट्रेस कम करने के लिए कहा।

Will it be as big as this one? उसने पूछा।

Yes. All my friends live in as small apartments as this one. मैंने उसे हंसते हुए कहा।

जाज़ो ने हथियार डाल दिए और किसी तरह फोटो खींचने के लिए जगह के जुगाड़ में लग गया। बुक शेल्फ पीछे धकेला गया (जिसके सामने जमी धूल पर पोंछा मारने का काम मैंने किया)। किताबें इधर से उठाकर उधर रखी गईं। मैंने इस पूरे प्रकरण के awkwardness से बचने के लिए रसोई का सहारा ले लिया और चाय बनाने में लग गई। पापा किसी तरह उसके जोक्स और अपने ही जोक्स पर ठहाके के बीच की अंग्रेज़ी समझने की कोशिश करते हुए उसकी मदद में लगे रहे। मम्मी ने सोफे पर बैठे-बैठे अख़बार पढ़ने का काम जारी रहा।

So, these are your favourite films? दीवार पर लगे पोस्टरों को देखकर उसने मुझसे पूछा... शायद माहौल को हल्का-फुल्का बनाने की कोशिश में।

मैं कहना चाहती थी, मेरे पति की फेवरेट फिल्में हैं। मैं अंग्रेज़ी फिल्में ज़्यादा नहीं देखती। लेकिन फिर लंबी बातचीत से बचने के लिए मैंने यस कर दिया।

जाज़ो अपने हंसोड़ स्वाभाव के अनुरूप काम करता रहा, प्रॉप्स जमा करता रहा, कैमरे के लेंस बदलता रहा और कुछ न कुछ कहकर हंसता रहा। जितनी देर में उसने बस्सी (दिल्ली पुलिस चीफ) के साथ हुए फोटो शूट का वाकया सुनाया, उतनी देर में मैं मानसिक रूप से फोटो शूट के टॉर्चर से होकर गुज़रने के लिए तैयार हो गई। (मैं बहुत ख़राब सब्जेक्ट हूं। कैमरा मुझे असहज कर देता है। मेरी अच्छी तस्वीरें खींचना किसी भी फोटोग्राफर के लिए चुनौती हो सकता है।)

फिर जाज़ो ने मुझसे पूछा, Do you have a rocking chair? Or a study table where you sit and write?

मैंने कहा, मैं डायनिंग टेबल पर बैठकर लिखती हूं, या फिर बिस्तर पर बैठकर। रॉकिंग चेयर नहीं है। बांस का मूढ़ा है। उससे काम चले तो बताओ।

मूढ़ा आ गया और बेडरूम्स से फ्लोर मैट्स भी, जो कालीन की तरह बिछ गईं। मेरी तस्वीरें खींच गईं। जाज़ो ने अपना काम बहुत उत्साह से किया। वो जिस सहजता से मुझे मुस्कुराने के लिए कहता रहा, मैं उतनी ही सहजता से असहज होती रही। पंद्रह मिनट के संघर्ष के बाद उसने अपना कैमरा बंद कर दिया। मैंने पूछा नहीं कि तस्वीरें कैसी आई हैं, उसने बताया नहीं।

मुझे मालूम होता कि राईटर बनने के बाद ऐसे दिन भी देखने होते हैं, तो किताब छपवाने से पहले सौ बार सोचती। फोटो खिंचवाने से बड़ी embarrassment अभी झेलना बाकी है। मैग़जीन में छप जाने के बाद फोन कॉल्स और मेसेज की जो भरमार होती है उसका दंश झेलना मुश्किल होता है। उसमें तंज अधिक होता है, उत्साह कम। ऐसा लगता है जैसे अख़बार में आपके बारे में छप गया तो आपने बड़ी गलती कर दी।

ख़ैर, जाज़ो मुझे हमेशा याद रहेगा। और अपना पहला ऑफिशियल फोटो शूट भी। मैंने अपने पब्लिशर से कह दिया है कि जब मैं अपनी आत्मकथा लिखूं तो इस प्रकरण की याद ज़रूर दिलाएं। तीस साल बाद ऐसे छोटे-छोटे लम्हों का सोचकर बहुत मज़ा आएगा।

कल की एक और मज़ेदार घटना रॉय फिल्म देखना था। मैं इस बारे में ज़्यादा नहीं लिखूंगी। अपना वो दुख फिर कभी बांटूंगी।

इस बीच डॉयचे वेले इंटरनेशनल पर मेरा पहला ओप-एड कल लाइव हो गया। यहां से एक नया सफ़र शुरु हो रहा है।

लिंक ये रहा - http://www.dw.de/personal-take-in-search-of-refuge/a-18256650

No comments: