शुक्रवार, 11 जुलाई 2014

दोनों जहां से खोए, गए हम... दास्तान-ए-इंदिरा नूयी

इंदिरा नूयी का इंटरव्यू पढ़कर मैं बहुत देर तक ज़ोर-ज़ोर से हंसती रही थी। हंसी उस विडंबना पर आ रही थी जो सर्वव्यापी है, यूनिवर्सल। लेकिन है अकाट्य सत्य ही - आप चाहे दुनिया की सबसे बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी की सीईओ हों, या फिर दिन भर पत्थर तोड़कर शाम को घर लौट जाने वाली मजदूर, दुनिया के हर कोने में आपकी ज़िन्दगी की कहानी एक-सी ही सुनाई देगी बिल्कुल। 

अब मैं अपनी ही बात करते हुए इस लम्हे, बिल्कुल इस लम्हे का हाल बयां करूं तो सीन कुछ ऐसा है। मैं डायनिंग टेबल के एक कोने में बैठी ये लेख लिखने की कोशिश कर रही हूं और मेरे दोनों बच्चे मेज़ की दूसरी तरफ़ खाना खाते हुए लगातार मुझे टोकते जा रहे हैं। मम्मा, ऊंट अपनी नाक क्यों बंद कर सकता है? मम्मा, आद्या ने मेरे पैरे को छुआ। मम्मा, आदित ने अपना होमवर्क नहीं किया... मैं एक तरफ़ लिखने की नाकाम कोशिश कर रही हूं और दूसरी तरफ ध्यान झगड़ा सुलझाने में भी है। इसके अलावा फ़िक्र कल सुबह के नाश्ते की, बच्चों के यूनिफॉर्म साफ़ करवाने की, उनका होमवर्क कराने की, राशन के सामान की, घर की छत से लटकते जाले साफ़ कराने की भी है और ये सारे ख़्याल एक साथ ज़ेहन में चल रहे हैं। हफ़्ते के ख़त्म हो जाने का अफ़सोस भी है। सोमवार की सुबह तक डेडलाईन फिर से हावी होगी। 


अचानक मुझे ये ख़्याल बहुत सुकून देता है कि किसी इंदरा नूयी की, किसी शेरिल सैंडबर्ग या किसी टाइगर मॉम एमी चुआ की हालत रोज़-दर-रोज़ मुझसे अलग नहीं होती है। 

घर की दहलीज़ के भीतर एक औरत से जिस संजीदगी के साथ मां, बहू, बेटी, पत्नी और इस तरह की तमाम ज़िम्मेदारियों के निर्वहन की अपेक्षा की जाती है वो अपेक्षा एक पुरुष से नहीं रखी जाती। इंदिरा से उनकी मां ने कहा था कि वो अपने सीईओ होने का ताज या तो गैरेज में छोड़कर आए या फिर दफ़्तर में। घर में उसकी ज़िम्मेदारी दूध लाने की है, और अपना घर चलाने की। घर के पुरुष से ऐसी कोई अपेक्षा नहीं की जाती। दफ़्तर से लौटकर आने के बाद भी वो एक पुरुष ही होता है।
ऐसे में महिलाओं के लिए, ख़ासकर कामकाजी महिलाओं के लिए, दोनों जहां की ख़ुशियां मिल जाने का ख़्वाब किस कमबख़्त ने देखा था? दोनों जहां में परफेक्ट होने की कोशिश वो गफ़लत है जिससे जितनी जल्दी बाहर आया जाए, उतना अच्छा।

अगर यही सच है तो फिर क्या अपना सिर पीटा जाए या कई किस्मों के, कई वजहों के अपराध बोध से मर जाने का जुगाड़ कर लिया जाए? या फिर इस पुरुषप्रधान समाज के नाम को पचहत्तर बार कोसा जाए?
यकीन मानिए, जो औरत हर रोज़ की जंग लड़ रही होती है, हर रोज़ वक़्त का सही इस्तेमाल करते हुए हर लम्हा उपयोगी बनाने की कोशिश में जुटी होती है, उसके पास शिकायत करने का सबसे कम समय होता है। हम अपने हालातों के सबसे अच्छे पारखी और निर्णायक होते हैं। इंदिरा नूयी ने अपनी ज़िन्दगी के लिए निजी फ़ैसले लिए और ये बिल्कुल ज़रूरी नहीं कि वो मेरे हालात पर कारगर हों। हमारे फ़ैसले कई बातों पर निर्भर होते हैं - हमारे चुनाव, हमारी पृष्ठभूमि, हमारी ज़रूरतें, और सबसे अहम - हमारी फ़ितरत। अपनी फ़ितरत और अपने हालात के आधार पर दोनों जहां में कितना और कब-कब बने रहना है, इसकी समझ विकसित कर ली जाए तो किसी और को कोई फ़र्क पड़े न पड़े, आप ज़रूर सुकून में रहेंगी।


ये सुकून, ये मानसिक शांति ही दरअसल असल वर्क-लाइफ बैलेंस होती है। वर्क-लाइफ बैलेंस का कोई फॉर्मूला नहीं होता। ये फॉर्मूले अपने लिए हम ख़ुद तय करते हैं और वक़्त के साथ-साथ इनपर काम लगातार चलता रहता है। तीन साल पहले बच्चों के साथ पार्क में खेलना मेरी प्राथमिकता में सबसे ऊपर था। अब नहीं है। मैं उन्हें दिन भर में दो घंटे का वक़्त देकर भी ख़ुश रहती हूं। लेकिन ये फ़ैसले मेरे अपने हैं, और इनके लिए ज़िम्मेदार भी मैं ही हूं। ऐसे कई फ़ैसले हर रोज़, हर बात पर लेने होते हैं और इंदिया भी ठीक यही कहती हैं। मुझे नहीं लगता कि इंदिरा के लहज़े में, बड़ी बेबाकी से किए हुए उनके बयान-ए-हकीकत में इस बात से कोई शिकायत है।

अपने बारे में बात करते हुए वे खुलकर हंस सकती हैं, और ये हंसी उनकी सबसे बड़ी सफलता है मेरे हिसाब से। वैसे इंदिरा की एक बात से मैं बिल्कुल सहमत नहीं हूं। मुझे इस बात का पक्का यकीन है कि उनकी बेटियों से कोई पूछे तो वे यही कहेंगी कि उन्हें अपनी मां पर बेइंतहा फ़ख्र है और एक दिन वे भी अपनी मां की तरह ही बनना चाहेंगी। और इस बात का उनकी मां के कामकाजी होने, या बेहद सफल होने से कोई रिश्ता नहीं है। इस बात का सीधे तौर पर रिश्ता इस बात से है कि वे दोनों बड़ी होकर कैसे महिलाएं, और किस तरह की मां बनना चाहेंगी। मुझे उम्मीद है कि जल्द ही हमें बेटियों की राय भी सुनने को मिलेगी। दोनों जहां के होने न होने की बहस को अंजाम तभी दिया जा सकेगा।

वैसे घर और काम - दोनों जहां में होने न होने की ये बहस हमारे बच्चों की पीढ़ियों तक आते-आते जेंडर की बहस से बाहर निकल सके तब जाकर कह सकेंगे कि मुमकिन है दोनों जहां हासिल करना। 

6 टिप्‍पणियां:

राजीव कुमार झा ने कहा…

बहुत सुंदर प्रस्तुति.
इस पोस्ट की चर्चा, रविवार, दिनांक :- 13/07/2014 को "तुम्हारी याद" :चर्चा मंच :चर्चा अंक:1673 पर.

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को ब्लॉग बुलेटिन की आज कि बुलेटिन प्राण साहब जी की पहली पुण्यतिथि और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

Unknown ने कहा…

बहुत सुंदर

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बढ़िया :)

Onkar ने कहा…

बहुत बढ़िया

BS Pabla ने कहा…

सहज अभिव्यक्ति

मस्त!