सोमवार, 31 दिसंबर 2012

साल की आख़िरी चिट्ठी, बच्चों के नाम

मेरे प्यारे बच्चों,

कल पहली बार तुम दोनों को साथ मिलकर आपस में जोड़-जोड़कर अख़बार की सुर्ख़ियां पढ़ते हुए देखा। मुझे खुश होना चाहिए था, लेकिन कोई गहरी उदासी अंदर तक उतर गई थी। मैं तुम दोनों के हाथों से अख़बार ले लेना चाहती थी क्योंकि मैं नहीं चाहती कि तुम एक-दूसरे को ज़ोर-ज़ोर से ये पढ़कर सुनाओ - 'कड़ी सुरक्षा में पीड़िता का अंतिम संस्कार'।

जिसका डर था, वही हुआ। मम्मा पीड़िता मतलब क्या? मम्मा अंतिम संस्कार क्या होता है? मम्मा, इतने सारे लोग खड़े होकर क्या कर रहे हैं? मम्मा आर-ए-पी-ई यानि रेप? इसका मतलब क्या?

ऐसे मुश्किल सवाल तुम दोनों को परिकथाओं और पंचतंत्र में उलझाए रखने की मेरी दिनभर की जद्दोजेहद पर पानी फेर दिया करते हैं। मैं तुम दोनों से कुछ छुपाना नहीं चाहती, लेकिन ये भी कैसे बताऊं कि जिस भरोसे की नींव पर तुम्हारे इर्द-गिर्द प्यार और इंसानियत की जो दुनिया खड़ी करने की कोशिश करती रहती हूं, वो सब दरअसल छलावा है।

तो सुनो बच्चों, इस साल की आख़िरी चिट्ठी में दुनिया के वो घिनौने और मुंह जला देनेवाले सच सुनो जिनसे एक-ना-एक दिन तुम्हारा पाला पड़ना ही था। मैं कबतक, आख़िर कबतक तुमको अपने पंखों में छुपाए सोचती रहूंगी कि आज नहीं, कल कहूंगी कि वो सामने दिखाई देनेवाले अंधेरे डरावाने जंगल में ही तुम्हें उड़ान भरनी होगी, वहीं अपने हिस्से का आसमान भी तलाश करना होगा। मैं कबतक नहीं बताऊंगी कि पीड़िता कौन और अंतिम संस्कार क्या?

आदित, पहले तुम सुनो बेटा।

हनी सिंह के गानों को हर एफएम, हर पार्टी में सुनोगे तुम। फिल्मी गाने तुम्हें सिखाएंगे कि लड़कियां चमेली और जलेबी होती हैं। कार्टून चैनलों पर दिखाई देनेवाले पॉपिन्स के विज्ञापन में तुमसे ज़रा-सा ही बड़ा बच्चा 'लेने' और बच्ची घूमकर 'देने' की बात करेगी। फिर और बड़े होगे तो तुम्हारे साथ के दोस्त लड़कियों के जोक्स बनाएंगे। मुमकिन है कि हर गांव, हर शहर, हर कस्बे की दीवारों पर तुम्हें मर्दानगी की चमत्कारी दवाओं के विज्ञापन नज़र आएं। मर्दानगी की जो परिभाषा मीडिया या बाहर की दुनिया तुम्हारे सामने परोसेगी, उसका बिल्कुल यकीन मत करना। तुम देखोगे कि हर समाज में अपनी शक्ति और पौरुष के प्रदर्शन का रास्ता औरत के जिस्म से होकर जाता है।  

आओ एक वो बात बताती हूं तुमको जो तुम्हें बाद में तुम्हारी प्रेयसी या बीवी भी बताएगी शायद। लड़की या औरत के जिस्म को रौंदकर, ज़ख़्मी कर मर्दानगी कभी साबित नहीं होती, हैवानियत सिद्ध होती है। जिस्म को ज़ख्मी कर भले किसी शरीर पर काबिज हुआ जा सकता है, लेकिन रूह सिर्फ एक भाषा समझती है - प्यार की। मैं तुम्हें यही प्यार और सम्मान की भाषा सिखाना चाहती हूं, आदित। इंसानियत के पक्ष में खड़ा होना सिखाना चाहती हूं। हाथ जोड़कर अपनी परवरिश का वास्ता देते हुए कहना चाहती हूं कि कभी किसी ज़ख़्मी इंसान को सड़क पर पड़े हुए देखो तो अपनी गाड़ी से उतरने की ज़ेहमत उठाओ। मैं चाहती हूं कि तुम ख़ुद से ये वायदा करो कि लड़की को भोग की चीज़ नहीं समझोगे। उसे वही इज़्जत दोगे, जिस इज्ज़त की तुम्हें अपेक्षा होगी। उससे वैसे ही पेश आओगे जिस बर्ताव की तुम उम्मीद रखते हो।आदित, तुम अपने आस-पास की पांच लड़कियों और औरतों को मान दोगे तो अपने आस-पास जीने लायक माहौल तैयार कर सकोगे।

रही बात पीड़िता की, तो सुनो - एक लड़की थी जो अपने दोस्त के साथ फिल्म देखकर निकली थी, वैसे ही जैसे तुम्हारी मम्मा कई सालों से करती रही है। फिर उसने एक बस स्टैंड से अपने घर तक जाने के लिए बस ली, अपने उसी दोस्त के साथ, वैसे ही जैसे तुम्हारी मम्मा, तुम्हारी मौसी अपने दोस्तों के साथ कई सालों से करती रही हैं। उस बस में सवार कुछ लोगों ने लड़की के जिस्म को इस तरह छलनी किया कि शायद काग़ज़ की लुगदी को भी पिटते हुए थोड़ी-सी रहम दिखाई जाती होगी। मैं और कोई डिटेल नहीं दे सकती आदित, मुझमें हिम्मत नहीं है सोचने की। लेकिन ये बात ज़रूर बताना चाहती हूं तुमको कि जितने बड़े अपराधी और हैवान लड़की का बलात्कार करने वाले थे, उससे कम बड़े अपराधी वो लोग नहीं जो उस सड़क से गुज़रे होंगे लेकिन सड़क पर ज़ख़मी पड़े दो लोगों को देखकर रुकने की ज़रूरत नहीं समझी होगी।

आदित, हिम्मत सलमान खान और अक्षय कुमार की तरह एक्शन और स्टंट सीन्स करने में नहीं होती। हिम्मत अपने आस-पास हर रोज़, हर लम्हे लिए जाने वाले 'एक्शन' में होती है, जिसमें दूसरों की मदद करना, दूसरों का सम्मान करना और सही-गलत की पहचान करना होता है।

आद्या, तुम्हारे लिए ज़िन्दगी तो बहुत मुश्किल होगी बेटा।

लड़की होकर पैदा होना किसी दुनिया में, किसी देशकाल में, किसी तरह के वातावरण में आसान नहीं रहा। लेकिन अगर देश और समाज बदलाव की किसी गहरी और तेज़ प्रक्रिया से होकर गुज़र रहा होता है तो उसका सबसे बड़ा ख़ामियाज़ा लड़कियों को ही भुगतना पड़ता है। तुम जितनी तेज़ रफ़्तार से अपनी आज़ादी की ओर बढ़ोगी, अपने हक़ में आवाज़ उठाओगी उतनी ही तेज़ी से तुम्हें अपमानित किए जाने के रास्ते ईजाद किए जाएंगे। इनमें से सबसे आसान तरीका तुम्हारे जिस्म पर, तुम्हारी अस्मिता पर हमला करना होता है। कुछ ऐसा कर दो कि तुम्हारे आस-पास भी कोई तुम्हारी तरह हो पाने की हिम्मत ना कर सके।

फिर भी आद्या, अपना भरोसा बचाए रखना। हिम्मत रखना क्योंकि तुम्हारे घर में बैठ जाने से, बस में नहीं बैठने से कोई समस्या हल नहीं होगी। हमला होना ही होगा तो घर में भी तुम, मेरी बेटी, महफ़ूज़ हो, कहना मुश्किल है।

आद्या, फिर भी झूठा ही सही, यकीन रखना कि तुम्हारी गहरी सांसों की जुंबिश समझनेवाला कोई होगा कि दुनिया में हर दस दरिंदे पर एक इंसान है, मैं भी ऐसी ही किसी बात पर पुख़्ता यकीन करना चाहती हूं। यकीन रखना कि तुम्हें गले लगाने की ख़्वाहिश रखनेवाला हर वक्त नज़र से तुम्हारे शरीर को तौल रहा हो, ये ज़रूरी नहीं। यकीन रखना क्योंकि मेरे भीतर भी ये यकीन किसी ना किसी तरह फिर भी बाकी है, मेरी बेटी। दुनिया जो टिकी हुई है, उसकी कोई ना कोई वजह तो होगी ही, नहीं?

इसके साथ ही, आद्या, नज़र से जिस्म को तौलनेवालों की आंखें निकाल लेने का हुनर तुम्हें सिखा पाऊंगी, अभी इसका भरोसा नहीं है। लेकिन उनकी आंखों में वापस आंखें डालकर घूर देने का तरीका तो तुम्हें हम लोग सीखा ही देंगे।

वो 'पीड़िता' मर गई आद्या, इसलिए अंतिम संस्कार की ख़बर पढ़ रहे थे तुम दोनों। और अंतिम संस्कार का मतलब संस्कारों का वो अंतिम जनाज़ा है जिनपर हम ताज़िन्दगी अमल तो कर नहीं पाते, मरने के बाद मरनेवालों के लिए अंतिम संस्कार के नाम पर कुछ ढकोसले ज़रूर करते हैं। इस मामले में, बेटा, ये ढकोसला राजनीतिक और सार्वजनिक तौर पर हुआ है जिससे परिवारवालों का कोई वास्ता नहीं रहा।


आद्या और आदित, तुम्हारे लिए एक महफ़ूज़ दुनिया का दुआ मांगूंगी, लेकिन फिर भी इस दुनिया के सच को याद रखना कि वो महफ़ूज़ दुनिया भी एक छलावा ही होगी। ऐसी एक दुनिया में तुम जी सको और बिना रोज़-रोज़ तबाह हुए बच सको, इसके लिए वही तीन चीज़ें मांगूगी तुम्हारे लिए, जो अक्सर अपने लिए मांगा करती हूं - साहस (courage), समझदारी (wisdom) और संवेदना (compassion)। अगर कोई ईश्वर है कहीं तो वो तुम्हारी हिफ़ाज़त करे!
 

28 टिप्‍पणियां:

sonal ने कहा…

ये चिट्ठी हर माँ को अपने बच्चो के लिए लिखनी है इस साल ... बेटों से शुरू करना है .

KC ने कहा…

एक चिट्ठी जो बेहद ज़रूरी है और समसामयिक भी...

रश्मि प्रभा... ने कहा…

कितना डरावना सच !!! और माँ की मुश्किलें ..... अपनी ऐंठन को सहलाते हुए बच्चों को ही सोचती हूँ

Rahul Singh ने कहा…

संदेह तो सभी दस पर बना रहता है, लेकिन शायद दुनिया में हर दस इंसान पर एक दरिंदा है, यह बात अलग है कि कई बार वह एक ही इंसानियत पर भारी पड़ता दिखता है.

खोरेन्द्र ने कहा…

अखबारों पर बिखरी सहानुभितियों को
कैंची से काटकर सहेजने में भी डर लगता हैं
क्योंकि ये सब मात्र दिखावा हैं
क्योंकि अपराधियों को सजा नहीं मिली है
30 दिन या 90 दिन या 180 दिन
यदि कानून के रखवाले दामिनी को अपनी बेटी मानते तो
सजा उसके अंतिम संस्कार के साथ ही करते
तभी न्याय हो पाता

आपके इस गंभीर लेख में छिपी आपकी पीड़ा ..ह्रदय को छू लेती है
सच तो यही है जो ...आपने लिखा है ..

ऋता शेखर 'मधु' ने कहा…

बच्चों को उड़ने के लिए खुला आकाश चाहिए...वहाँ उन्हें हिफ़ाज़त मिले, ईश्वर से यही प्रार्थना है बस...

shikha varshney ने कहा…

Love you Anu !!! हम सब यह चिट्ठी ही अपने बच्चों को लिख दें ..बस काफी है.

kamlesh ने कहा…

aapne behtareen chitran kiya h...nav varsh mangalmaya ho!....:)

Saras ने कहा…

अनुजी आपकी यह चिट्ठी पढ़ी ...बार बार पढ़ी ....और उसके सच को भीतर तक महसूस किया .....यह चिट्ठी वाकई .....हर उस बच्चे कप पढ़ने की ज़रुरत है ....जिन्हें हमने सदा डैनों में छिपा....इस सच की तरफ उनकी पीठ कर सदा उसके घिनौने पन को उनसे छिपाने की जद्दोजहद की ....लेकिन पतझड़ के झड़ते पत्तों को देख , दुखी होनेवाले अपने बच्चों को यह बताने का समय आ गया है ...की दुनिया में बहुत दुःखदाई सच हैं ....जिन्हें जानना ...पहचानना है तुम्हे ....शुरुआत अभी से कर दो.

Meenakshi Mishra Tiwari ने कहा…


बहुत ही बढ़िया चिट्ठी .....

कल "दामिनी" को श्रद्धांजलि देने के लिए और उसे अपने दिलों में जिंदा रखने का विचार करते हुए,जब मैं अपने दोनों बच्चों (अभिशु-4) और (अशित-3) को बता रही थी कि हम ये कैंडल्स क्यूँ जला रहे हैं .... तो उनके मासूम सवाल थे -"मम्मा टीवी पर जो आ रहा था कि वो लड़की जो मर गयी उसके मम्मी-पापा" रो रहे होंगे न ????"

saurabh ने कहा…

इस सोच की सबसे ज्यादा जरुरत है,,,,,,,,,,,मित्रों,,,,आप सभी के लिए,,,,वक्त हो तो जरुर पढ़े,,,,
अपने लिए नहीं तो कम से कम अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए,,,एक बेहतरीन अभिभावक बनने के लिए,,,अपनी उस जिम्मेदारी को पूरी करने के लिए,,,,,,,,

बेनामी ने कहा…

कमेंट करने के लिये अल्फ़ाज़ नहीं मिल रहे हैं। अपने बच्चों को उन्नत संस्कार देकर ही परिवर्तन की आशा कर सकते हैं। आपके लिए नववर्ष मंगलमय हो।

बस्तर की अभिव्यक्ति जैसे कोई झरना ने कहा…

हक़ीक़त से रू-ब-रू होते कई पाषाण हो गये सवाल जो खरोंचकर ज़वाब तलाश करने की ज़िद में हैं ....एक दर्द जो बर्फ़ सा सर्द होकर ज़ख़्मों की खाइयाँ खोदने के लिये तैयार दिखता है ......एक शिक्षा जो न केवल आज की ज़रूरत है बल्कि हर बच्चे के लिये एक आचार संहिता की घोषणा करती है ..... एक कफ़न सी सच्चाई जो हर बच्चे को किशोर होते ही और कभी-कभी किशोर होने से पहले ही समझ लेनी चाहिये ....विकास की ओर भागती जा रही दुनिया का वह बद्बूदार कोना जिसे न चाहकर भी झेलने की विवशता है ....माँ की एक गम्भीर प्रतिज्ञा जो बच्चों को इंसानी हादसों से बचाने की मुहिम के लिये कमर कसकर खड़ी हो गयी है।
अनु जी! आपकी इस संजीदा चिट्ठी की ज़रूरत हर माँ को है ...हर संवेदनशील बाप को है कि वे अपने बच्चों को वह सब बता सकें जोकि बताना उनकी मज़बूरी है।

वाणी गीत ने कहा…

हर अभिभावक के मन की व्यथा है आज यही !
भावुक और मार्मिक भी !

अजय कुमार झा ने कहा…

हम पोस्टों को आंकते नहीं , बांटते भर हैं , सो आज भी बांटी हैं कुछ पोस्टें , एक आपकी भी है , लिंक पर चटका लगा दें आप पहुंच जाएंगे , आज की बुलेटिन पोस्ट पर

Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता ने कहा…

.....

Anju (Anu) Chaudhary ने कहा…

काश ऐसी ही चिठ्ठी हर माँ अपने बच्चों को लिखे और हर बच्चा ये पढ़े

देवांशु निगम ने कहा…

Change will happen, it need to be started from our home, we can't blame others until we change ourselves, our next generation!!!! we will have to be the change that we want to see !!!!

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…


आज की दुनिया की असलियत को माँ बच्चों से कहाँ तक छिपायेगी?अच्छा किया - बता दिया, सावधान कर दिया.सही दिशा का संकेत दे दिया.
बहुत ज़रूरी था यह सब !

Unknown ने कहा…

बहुत प्यारी चिट्ठी ....
बड़े दिनों बाद बड़ा दिन आया है .....कुछ भी मांगो तो सैंटा दे देता है ...आज.
यह बात सालों से सुनती आयीं हूँ....बहुत मन हो रहा है की अबकि मैं भी कुछ मांग ही लूँ ...
अपने लिए न पैसा ना सम्मान चाहिए
हिन्दुस्तान में हैवान नहीं इंसान चाहिए .
आपसे बस यही मांगती हूँ.पता है,मुश्किल है ...क्यूंकि लोगों चरित्र को बदलने के लिए तो काफ़ी वक्त चाहिए और आप तो यूँ भी बहुत बिज़ी हो .
कोशिश तो कर ही सकते हो....जिन नौनिहालों को गिफ्ट देने जाओगे न ..कम से कम उन्हें इंसान बने रहने की दुआ देना...जिससे आगे चलकर देश अपने आप सुधर सके .

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

मुश्किल है पूर पढ़ पाना भी..

Arvind Mishra ने कहा…

बहुत भावपूर्ण और समीचीन भी ! गहरे अहसासात और शिद्दत से जिसने जीवन जिया है वही ऐसी सीख अपनी अगली पीढी को दे सकता है-
प्रिय अनु जी(आपके लिए भी ..)
जो गुज़र गया सो गुज़र गया
उसे याद करके न दिल दुखा जो गुज़र गया सो गुज़र गया
.......................................................................................
तुझे ऐतबारो यकीं नहीं, नहीं दुनिया इतनी बुरी नहीं
न मलाल कर मिरे साथ आ , जो गुज़र गया सो गुज़र गया
(बशीर बद्र)

rashmi ravija ने कहा…

आज हर बच्चे को इस चिट्ठी का एक एक लफ्ज़ ज़िन्दगी में उतार लेने की जरूरत है
awesome piece of writing

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

लगता है बच्चों को सब और स्पष्ट रूप से बताना होगा..प्रभावी चिठ्ठी..

Tulika Sharma ने कहा…

ऐसी चिट्ठी लिख पाना थोड़ा आसान है शायद ....मैंने ये सब अपनी बिटिया को जब समझाया था ....उस समय उसकी निगाहों को बर्दाश्त करना मेरे लिए दुनिया का कठिनतम कार्य था ....

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

यह चिट्ठी हर घर में हर माँ अपने बच्चों को पढ़ाये ... सार्थक ।

vandan gupta ने कहा…

हर माँ के , हर नारी के मन की व्यथा है ये मगर इस सच के साथ जीना है मगर संभल कर और समझा कर …………शायद जी पायें।

अनूप शुक्ल ने कहा…

बहुत संबेदनशील पोस्ट!