Tuesday, July 3, 2012

गर्मी छुट्टी डायरिज़ समापन: और मैं सुघड़ गृहिणी ठहरी!


गर्मी छुट्टियों से वापस आने का अफ़सोस ज़्यादा इसलिए सालता है क्योंकि पूरब में आषाढ़ के आगमन की आहट छोड़कर हम भट्ठी में झोंक दिए गए हैं। फिर छुट्टियां ख़त्म होना यूं भी किसे रास आता है? जैसे-जैसे जाने की घड़ी नज़दीक आ रही है, सासू मां की लिस्ट लंबी होती जा रही है।

मेरे साथ सालभर की सौगात आती है - घर के पिसे हुए सूखे मसाले, दार्जिलिंग की ख़ास लौपचू चाय, घर के पेड़ से तोड़ा हुए तेज़पत्ता, दालचीनी, खेतों के सरसों का पेरा हुआ तेल, आम और मिर्ची का अचार, बेसन के लड्डू, गाय का घी, गुड़, शहद, मूढ़ी, चूड़ा और सत्तू। हां, कम-से-कम एक बोरा आम भी, जिसे किसी तरह लड़-झगड़कर एक टोकरी करवाया जाता है। पैकिंग में दो लोग जुटते हैं और ये कम-से-कम अठतालीस घंटे चलनेवाला कार्यक्रम होता है। ये कोई नहीं सोचता कि बहू अकेली अनपैकिंग करते हुए कैसे ज़ार-ज़ार रोएगी।

तो हो गई पैकिंग और इस बार तो साथ में सिलिगुड़ी के एयरपोर्ट मोड़ बाज़ार से खरीदे गए कांच के बर्तन और सात किस्म के चाकू भी हैं। मुझे पटना तक छोड़ने आए पापा आठ बार हिदायत दे चुके हैं - पैसे की चिंता मत करना। कम-से-कम दो कुली ले लेना। मैं भी सांस-ही-सांस में कुछ बुदबुदाती हूं - जेतना के बबुआ ना ओतना के झुनझुना। इसी सामान के चक्कर में हर साल फर्स्ट एसी की टिकट कटवाना पड़ता है, पूरा एक कूपे बुक होता है आम, लीची और मसालों के लिए। मज़ाक थोड़े है कि सत्तू और चूड़ा के बिना तो हमारी एक शाम नहीं कट सकती दिल्ली में!

दो बच्चों और एक दर्ज़न सामान के साथ लौट आई हूं दिल्ली, और कुली (और पतिदेव) से बहस-मुबाहिसे करते हुए घर भी पहुंच गए हैं हम। सब अनपैक हो गया है, बस घर से आए सामान को खोलने से बचती रही हूं। बात दरअसल ये है कि इसके लिए पहले रसोई की सफ़ाई भी ज़रूरी होती है। वो डिब्बे और मर्तबान खुलने लगे हैं जिनमें महीनों से झांका नहीं मैंने। मर गए। घी तो रखी हुई है अभी। तेल भी है। मसाले के डिब्बे भी खाली नहीं हुए। स्टील के तीन बड़े डिब्बों में मूढ़ी है और शहद में मरी हुई चींटियां तैर रही हैं। सत्तू में कीड़े जैसा कुछ चल रहा है और अचार के मर्तबान तो खुले ही नहीं। मेरी मां पिछली बार जो नींबू के अचार डालकर धूप में सूखने के लिए बालकनी में रख गई थी, उसे मैंने दस दिन बाद उठाया था - तब जब ओस और धूप ने अचारनुमा चीज़ की मिट्टी पलीद कर दी थी। हाय, ये आंवले का मुरब्बा बनाने में भी मम्मी ने कितनी मेहनत की होगी। इसमें फफूंदी लग गई है। और एक डिब्बे में तिल के लड्डू बंद पड़े हैं। तिल तो जाड़े में खाते हैं ना? यानि छह महीने से यूं ही...

सारे डिब्बों को निकालकर मैंने सफाई अभियान या यूं कहिए कि जनवितरण अभियान शुरू किया है। नए-पुराने सारे सामान कामवालियों, गाड़ी साफ करनेवाले भैया और खाना बनानेवाली महरी के नाम पोलिथीन में बंद करने लगी हूं। केरल से आए गर्म मसाले, श्रीनगर से आया बादाम और अखरोट, सदर बाज़ार से टांगकर लाए गए नमकीन, सासू मां के खेतों का मूंग, मायके के खेतों का कतरनी चूड़ा, ननिहाल की गोड़िन का बनाया हुआ मकई और चने का भूंजा - सब बांट दूंगी। आम भी, कि सड़ जाएं इससे अच्छा है कोई खा ले।

ठीक छह दिन में मम्मी को सीवान से आना है मेरे पास। फोन पर पूछती हूं, क्या ले आएंगे तुम्हारे लिए बबुनी? भूंजा एकदम ताज़ा है, घर का समझ लो। मामाजी खूब बढ़िया चावल दे गए हैं। खीर अच्छी बनेगी उससे। बाबू लोग बेसन का लड्डू पसंद से खाएगा कि ठेकुआ-खजूर? लंगड़ा आम लेते आएंगे? मैं तीस सेकेंड तक मौन हूं। बता दूं अपनी मां से कि उनकी बेटी कितनी सुघड़ गृहिणी है?

15 comments:

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

यही गृहस्थी है, घर के लोग भी सोचते हैं कि यह सब सामान बाहर मिलेगा या नहीं। इसलिए सब घर से ही जोड़ दिया जाए।

varsha said...

:-)
vow post

shikha varshney said...

lol...

Pallavi saxena said...

माँ को बता भी दें तो भी, डांट के साथ-साथ सामान तो आना ही है वो नहीं रुकने वाला :-)

वाणी गीत said...

फुल टाईम गृहिणी होने के बावजूद कुछ तो छिपाना पड़ ही जाता है माँ से , सासू माँ से ...
शुक्र है वे ब्लॉग नहीं पढ़ती :)

Arvind Mishra said...

अब मैं संजीदगी से सोच रहा हूँ इधर कोई माल कम हो तो उधर से ही मंगाने कीफ़रियाद कर लें .....दो पेटी आम बंगलुरु के लिए इधर पैक हो रहा है एक और माता जी द्वारा ..मैं उसका आकार कम करने में लगा हूँ
प्रीत की रीत यही है ..आप भी मां हैं समझेगीं आगे ..

rashmi ravija said...

हर छुट्टी के बाद लौटते हुए माँ से होने वाली झिक झिक याद आ गयी....मेरे कहने पर...'अब और जगह नहीं' वे कहतीं..'मैं एडजस्ट कर देती हूँ' और राम जाने कितने सारे डब्बे कैसे समा जाते...'मुझे तो ये भी सुनना पड़ता..'जब खुद ग्रैनी बनोगी तब पता चलेगा'...:)

Ramakant Singh said...

यही मायका का मोल होता है .

Sonal Rastogi said...

HA HA HA ससुराल और मायके दोनों जगह से आने वाला ढेर सारा प्यार जो डब्बो में बंद रह जाता है क्योंकि हमारे पास उनको उदरस्थ करने की फुर्सत नहीं होती ...जब तक होश आता है तब तक वो किसी दीन का नहीं रहता ...ससुराल के सामान को मना करके एक बार सासू माँ के भयानक गुस्से का शिकार हो चुकी हूँ ...अब एक तरीका निकाला है ..उनके लाडले से सामने से पूछती हूँ "सुनो मम्मी लड्डू दे रही है कितने रख लूं ,आपने पिछली बार खाए नहीं थे " अब माँ जाने और उनका लाडला :-)

प्रवीण पाण्डेय said...

ठेकुआ तो हमारा भी प्रिय है, मित्र सदा ही लाते थे, हॉस्टल में।

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

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उम्दा प्रस्तुति के लिए आभार


प्रवरसेन की नगरी
प्रवरपुर की कथा



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♥ जीवन के रंग संग कुछ तूफ़ां, बेचैन हवाएं ♥


♥शुभकामनाएं♥

ब्लॉ.ललित शर्मा
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Rahul Singh said...

सद्भाव ही आता-जाता है, बाकी तो यूं ही काम-बेकाम का हो जाता है.

संजय @ मो सम कौन ? said...

@ और कुली (और पतिदेव) से बहस-मुबाहिसे करते हुए घर भी पहुंच गए हैं हम।...

बोले तो दो कुलियों के पैसे बचा ही लिए गए :)

अनूप शुक्ल said...

:) :)

Mired Mirage said...

बहुत भाग्यवान हैं आप!
घुघूती बासूती