Wednesday, April 4, 2012

गुमशुदा लोगों की याद

पार्क में इन दिनों अकेले वॉक के लिए आने से डर लगता है। कुछ तो गर्म होते जाते मौसम की वजह से मुरझाते फूल उदास करते हैं, कुछ यूं भी उदासी होती है साथ-साथ और मैं वॉक करके अपनी सेहत बनाने की जगह कोने में बैठकर रोते हुए अपना दिन नहीं बिगाड़ना चाहती। इसलिए आज रुचि साथ है और इस हसीन दिलचस्प साथ के साथ-साथ फूल-पत्तों-पौधों-पक्षियों-कीड़े-मकोड़ों के बारे में कई ऐसी बातें पता चल रही हैं जो नई हों मेरे लिए। उसके साथ इतने सालों में पहली बार पार्क को एक नई नज़र से देखती हूं जैसे।

रुचि को मैं सिर्फ कुछ महीनों से जानती हूं, लेकिन लगता है ताउम्र निभानेवाली दोस्ती है ये। हम पहले चक्कर के साथ मौलश्री के पेड़ों से थोड़ा ही आगे पीले फूलों वाले पेड़ के पास पहुंचते हैं। "मैं इन फूलों का नाम नहीं जानती, देखो कोने में लगी झाड़ियों पर लगे वो पीले फूल और ये फूल कितने एक-से हैं, लेकिन हैं अलग-अलग।"

अलग-अलग हैं हम दोनों भी, लेकिन फिर भी कितने एक-जैसे, मैं सोचती हूं। रुचि झुककर एक सूखा हुई पत्ता उठा लेती है। डाल से बिछुड़ी हुई, मैं सोचती हूं। कहीं तुम भी तो नहीं बिछड़ जाओगी रुचि, पूछना चाहती हूं, कह नहीं पाती।

बिछड़ जाना, गुम हो जाना, कितना आसान है, नहीं?

एसएमएस है किसी का। फोन देखती हूं। पंद्रह साल पुराने एक दोस्त। ये गुम नहीं होंगे कभी, शुक्र है। लेकिन कहां गए मेरे सालों पुराने दोस्त? कहां गई सुवर्णा, मेर बचपन की दोस्त? और ऋतु, जिसके साथ मैंने क्लासरूम में आगे बैठकर संस्कृत की क्लास में चिड़िमार सर को बेवकूफ बनाते हुए पूरा का पूरा लंच खाया था? जिसका नाम ब्लेड से कुरेदा था अपनी डेस्क पर? जिसका जूठा पानी पीने में कभी कोई एतराज़ नहीं हुआ? जिसके फर्स्ट आने और अपने सेकेन्ड आने पर कभी नहीं हुआ कोई दुख? गुम हो गई क्या? कई सालों से देखा नहीं उसे।

मेरी रूममेट जो रुममेट कम, सोलमेट ज्यादा लगती थी - गुम हो गई शायद। उसे कभी-कभी टीवी पर देख लिया करती हूं बस। वो दोस्त जिसकी कविताओं के किए थे कई अनुवाद, जिसके साथ पढ़ा ज़ेन एंड द आर्ट ऑफ मोटरसाइकिल मेन्टेनेन्स, जिसके साथ पहली बार गई मुंबई के एक पब में, जिसके साथ मरीन ड्राईव पर बांटे सपने कि तुम बनना संजय लीला भंसाली, और मैं तनुजा चंद्रा, जिसके साथ लोखंडवाला पुल पर बैठकर खाए थे भुट्टे - गुम नहीं हुआ अभीतक शायद कि हम अब भी फॉर्मल लंच पर मिला करते हैं अक्सर।

"वो देखो, एक कचनार खिला है उस पेड़ पर, सिर्फ एक", रुचि कहती है और मैं मुड़कर देखती हूं। अच्छा, हम तो पार्क में वॉक कर रहे हैं। गुम हो गए हैं कई रिश्तेदार भी, मैं उससे बताना चाहती हूं। रुबी फुआ से बात नहीं हुई कितने महीनों से, जाने किस हाल में हैं? जिस चाची से सुबह-शाम क्या पका है, बिना ये बताए नहीं पचती थीं चपातियां, वो चाची भी गुम हो गईं शायद।

नाइट शिफ्ट की काली रातें न्यूज़ रूम के सन्नाटे में जिन लोगों के साथ कटीं, गुम हो गए वो भी। जिस दोस्त के लिए हॉस्टल छोड़ते हुए ज़ार-ज़ार रोती रही मैं, जिससे बिछड़ जाने का कोई डर नहीं था, वो भी गुम हो गई। मुंबई जाती हूं तो उसे फोन भी नहीं करती अब तो। और कई लोगों के नंबर हैं फोनबुक में, जो हैं भी, नहीं भी।

ब्लॉगिंग करते हुए कई-कई लोगों की आती-जाती रही चिट्ठियां, कई लोगों ने पूछा हाल। वो भी गुम हो गए एक दिन क्योंकि मैं अच्छी मेज़बान तो क्या, कायदे की मेहमान भी नहीं। ना किसी की चिट्ठियों का कोई जवाब देती हूं, ना किसी से आगे बढ़कर पूछती हूं टेढ़े-मेढ़े ज्ञानदर्शन-नुमा सवाल।

फेसबुक और जीमेल के इस ज़माने में भी कोई गुम हो जाया करता है क्या? नहीं, गुम नहीं होता कोई। बस यादों की चादर आंसुओं से धुलते-धुलते और धुंधली हो जाती है और एक दिन उसे अलमारी की गहरी तहों से निकालने की ज़रूरत भी खत्म हो जाती है। ज़िन्दगी चलती रहती है, नए लोग मिलते रहते हैं, पुराने दोस्तों से और गहरे होते रहते हैं रिश्ते और बिछड़ जानेवालों की खत्म हो जाती है याद। बिग बाज़ार की सेल में हमने भी खरीद ली हैं और कई प्रिंटेंड चादरें, साफ कर ली हैं अलमारियां और बदल डाले हैं पुराने कपड़े।

पीले फूलों की समानता-असमानता सूझे ना सूझे, पार्क हम आएं ना आएं, रुचि... बस एक तुम गुम ना होना। कहना चाहती हूं, कह नहीं पाती। वो हो ना हो, गुम तो मैं हो ही जाऊंगी एक दिन।

5 comments:

Arvind Mishra said...

बिना विषय और मुद्दे के भी इत्ता लिखा जा सकता अरे यही तो है क्रिएटिव रायटिंग ..कोई कोर्स वोर्स किया था क्या मैडम ? :)
आज तो पूरी तरह गृह विरही हो गयी हैं ..बोले तो नोस्टालजिक! और स्टाईल ऐसी की पूरी संक्रामक बन उठी है ..चलता हूँ ...

सागर said...

:(

प्रवीण पाण्डेय said...

जाने कितने लोगों से मिले, वर्तमान में। जिसका जितना साथ रहा, स्वीकार हो।

Pallavi said...

चाहे कितना भी कुछ करलो साथ बस यादों को ही रह जाना है, इसलिए जिसका जितना साथ मिले बस कोशिश यह रहनी चाहिए की जितना बन सके उतना मधुर बना रहे....

Arvind Mishra said...

फेसबुक और जीमेल के इस ज़माने में भी कोई गुम हो जाया करता है क्या?
दुःख तो इसी बात का है जिसे गुमनामीं के बियाबां में खोना होता है खो ही जाता है ,,,,,
मेरे कई इन्टरनेट मित्र देखते देखते गायब हुए हैं,अब कहाँ हैं कोई बताता ही नहीं :-(
इन दिनों आप भी नहीं दिखीं तो शक हुआ कि आप भी उन्ही अनजान राहों पर न बढ़ चली हो ..
मगर खुदा का लाख लाख शुक्र है आप सही सलामत दिख गयीं :-) आगे भी दिखती रहिये ,,,,फेसबुक
पर तो ढूँढा भी जा सकता है मगर जी मेल पर तो यह भी पास्बल नहीं है !