Monday, April 2, 2012

कहता है ये सफ़र...

आंसू रुकते ही नहीं। खिड़की से लगकर सुड़कती जाती है नाक वो, पोंछती रहती है आंसू। सुवर्णरेखा का कोई बांध टूट गया है जैसे। पहाड़ी नदी गीले मौसम में यूं भी वश से बाहर हो जाती है। किनारे को नहीं तोड़ती। लेकिन पत्थरों से उलझता उसका उफान जानलेवा हो सकता है। फिर जो नदी पत्थरों से यूं भिड़ जाती है वो किनारों का क्या करेगी?

वैसे सुवर्णरेखा किनारे नहीं तोड़ती। लड़की को भी नहीं तोड़ना कोई किनारा।

फिर ये कैसी बेचैनी है? बीस की उम्र तो बेफिक्री की होती है ना? तब क्या हो जाने का डर है? हर शाम भारीपन लिए क्यों आती है? लड़की को कोई तकलीफ़ नहीं। घर-परिवार अच्छा है। रुपए-पैसे की दिक्कत नहीं। करती वही है जो करना चाहती है। पढ़ती वही है जो पढ़ना चाहती है। तब? गुज़रे हुए लम्हों को रोती है, आनेवाले कल से डरती है।

लड़की को कुछ नहीं बदलना। सब वैसा का वैसा ही चाहिए जैसा है। दोस्तों के बिछड़ जाने का ख़ौफ़ है, नई जगह नए लोगों के बीच नई चुनौतियों के सामने डाल दिए जाने का अंदेशा है। लड़की का ग्रैजुएशन खत्म होने को है और वो घर लौट रही है, छुट्टियों के लिए या हमेशा के लिए, नहीं जानती। ट्रेन पलाश के जंगलों से होकर गुज़र रही है। गौतमधारा आ गई अब तो। घर पहुंचने में दो घंटे भी बाकी नहीं। लड़की के हॉस्टल का कमरा छूट गया, सहेलियां छूट गईं, सेन्ट्रल मार्केट से खरीदी हुई नीली बाल्टी छूट गई, लाल पर्दे रह गए कहीं और साथ आ गईं यादें। एक डर भी। अब क्या होगा? उन्मुक्तता के दिन लदे? अब?  सब बदल जाएगा अब तो।

"लेकिन ज़िन्दगी इसी को तो कहते हैं, नहीं? सुना है कि ज़िन्दगी में एक ही चीज़ स्थायी होती है - बदलाव। फिर बदलने से कैसा डरना?"

"सुनो, मुझे फ़लसफ़े मत सिखाओ ज़िन्दगी के। किताबी फ़लसफ़े तो बिल्कुल नहीं। सेल्फ इम्प्रूवमेंट और काउंसिलिंग पर तुमसे ज़्यादा किताबें पढ़ीं हैं मैंने। तुमसे ज़्यादा पढ़ी-लिखी हूं, तुमसे ज्यादा इंटेलिजेंट।"

"वही तो, वही तो परेशानी है - तुम्हारा दिमाग। कुछ किताबों के कचरे ने इसका कचरा कर दिया, कुछ तुमने। जो बिना दिमाग का होता है ना उसको इस तरह की लाइलाज बीमारियां नहीं होती।"

"बड़ा खाली और बेरंग जीवन होता होगा उनका फिर तो, नहीं?"

"मुझे देखकर लगता है मेरी ज़िन्दगी रंगहीन होगी?"

"मतलब तुम्हारा दिल कभी नहीं डूबता? तुम्हें कभी कोई खलिश नहीं लगती? नोस्टालजिया... नोस्टालजिया जैसी फीलिंग को महसूस किया है कभी?"

"अरे बाप रे। अब नोस्टालजिया को महसूस करना कैसा होता है?"

"मतलब किसी ख़ुशबू से कोई उलझन? किसी गाने से जुडी कोई याद? कोई कविता? कोई मौसम? कोई फूल? कोई रंग? जिसे देखकर याद आए कुछ?"

"कभी सोचा नहीं इस तरह।"

"अब मुझे देख लो। यहां कॉफी खत्म हो रही है, घड़ी ग्यारह बजा रही है और मैं इस सफ़र के ख़त्म हो जाने को लेकर परेशान हूं। रुलाई आ रही है कि गया... ये लम्हा तो गया हाथ से। रात में सोचूंगी, रोऊंगी। कल सुबह सोचूंगी, रोऊंगी। फिर ऐसी कोई दोपहर आएगी, पलाश का मौसम आएगा, कॉफी का ऐसा स्वाद आएगा होठों पर तब सोचूंगी और मन उदास हो जाएगा।

"एक्जैक्टली। गया ये लम्हा तो हाथ से। क्या खूब होता कि जी लिया होता इसको इतना सोचने की बजाए।"

"हैलो? मेरे जीने का तरीका यही है।"

"तो भुगतो फिर। दे पेरेनियल परेशान आत्मा, तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता।"

"तुम्हारा भी नहीं। तुममें तो फीलिंग्स ही नहीं कोई। लूज़र।"

"एक मिनट। ये फीलिंग को कैसे डिफाईन करती हो, ज़रा सुनें..."

"फीलिंग मतलब कसक, मन में कोई गांठ बंधी हो जैसे। प्यार के खो जाने का डर हो जैसे। बेइंतहा खुशी का  इंतज़ार हो, और रातें उसी इंतज़ार में कट जाए। किसी को देखकर हंसना आए, किसी को देखकर रोना। किसी को बेवजह गले लगाने की इच्छा हो, किसी की गर्दन दबा देना चाहें जैसे। फीलिंग्स मतलब कुछ ना कुछ ऐसा जो दौड़ता रहे रगों में। वरना ज़िन्दगी कितनी बेमानी हो जाएगी, नहीं?"

लड़के ने कुछ कहा नहीं। लड़की ने उसकी ओर देखा और फिर बिना बात को आगे बढ़ाए कान में वॉकमैन के ईयरप्लग्स लगा लिए। ट्रेन चलती रही, रास्ता कटता रहा। वैसे बहुत दिनों तक फीलिंग्स की उस परिभाषा का मज़ाक बनाता रहा - कभी फोन पर, कभी ई-मेल पर, कभी सामने, कभी पीछे।

सुनो लड़के, इतने सालों बाद भी नहीं बदली फीलिंग्स लड़की की। उसे अब भी वैसी ही घबराहट होती है, दिल डूबता है हर दूसरे दिन। बदलाव से डरती है अब भी, दोस्तों को खोना नहीं चाहती, डूबती हुई शामें उदास करती है तब भी जब वो दो बच्चों की मां है। तब भी जब उसने पार की है कई अड़चनें, हासिल किए हैं कई नामुमकिन मुकाम। उसे अब भी दिन के थोड़ा और रौशन हो जाने का इंतज़ार है। उसे अब भी यकीं है कि सितारों से आगे जहां और भी है...

अब भी ईयरप्लग्स लगाकर सुनती है गाने। तुम मत सुनना। तुम्हारे टाईप का नहीं है।

4 comments:

वन्दना said...

नज़रिया अपना अपना

Arvind Mishra said...

यह आत्मालाप है न ?

Anupama Tripathi said...

ये ज़िंदगी ....ये कदम ....
साथ साथ चलते रहेंगे ....
बहुत सुंदर ....उदगार मन के ....
very honest and appealing .....
very nice...

प्रवीण पाण्डेय said...

नदी की तरह सीमाओं में बहना सीख लिया है।