Tuesday, April 17, 2012

हल्के हल्के ज़मीं पे वो मिटते निशां

मैं इस शहर को ऐसे देखती हूं जैसे कोई टूरिस्ट नई जगह पर आया हो। सैर-सपाटे, खुशी के चंद लम्हे बटोरने और खुद को तरोताज़ा करने के मकसद से। टूरिस्ट से उस शहर का रिश्ता ट्रेन में मिलनेवाले हसीन हमसफ़र सा होता है। उसको उस शहर की धड़कनें नहीं सुनाई देती, उसकी दुखती रग नहीं दिखती, शहर की दुख-तकलीफों को नज़रअंदाज़ करना और उसमें खलल ना डालना ही टूरिस्ट धर्म होता है। अपनी याद में एक अजनबी शहर को कसक सा बचाए रखना ही टूरिस्ट धर्म होता है।

बार-बार लौटकर आने के बाद भी मुंबई से मेरा रिश्ता कुछ ऐसा ही है। मैं टैक्सी की बंद खिड़कियों के पीछे से शहर को टूरिस्ट की हैरतभरी निगाहों से देखती हूं। मेरे लिए मुंबई समंदर का किनारा है, दाबेली और सेबपूरी है, कार्टर रोड पर मॉर्निंग वॉक है, उस वॉक के दौरान दिख जानेवाले सेलेब्रिटी चेहरे हैं, और हैं कुछ पुराने दोस्त जो अपनी तमाम मसरूफ़ियत के बावजूद आपके लिए वक्त निकाल ही लिया करते हैं। इसलिए मुझे इस शहर से इतनी मोहब्बत है।

इसी शहर में रहते हैं डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी। डॉक्टर द्विवेदी कौन हैं, ये मैं आपको क्या बताऊं? उन्हें कैसे जानती हूं, इस बात का भी मेरे पास कोई जवाब नहीं है। लेकिन डॉ द्विवेदी उन लोगों में से हैं जिन्होंने एक बार इस अजनबी शहर में मुझ अजनबी को फोन पर कहा था, मुंबई में कोई मदद चाहिए तो बताना।

कोई ऐसा भी कहता है क्या? सुना है कि मुंबई शहर में सिर्फ ज़ालिम कसाई बसते हैं। मुझे फरिश्ते क्यों मिलते हैं फिर?

डॉ द्विवेदी के ऑफिस के लिए निकली हूं ऐसे एक दिन जब शहर में ऑटोचालकों की हड़ताल है। जब शहर के एक लाख ऑटोवालों में से एक-चौथाई ने सड़कों पर ना उतरने की कसम खा ली हो तो उसका ख़ामियाज़ा हम जैसों को कैसे भुगतना पड़ेगा, इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं। मैंने टैक्सी के लिए निकाले गए पैसों में दो सौ और जोड़ दिए हैं। जस्ट इन केस, टैक्सीवालों ने मीटर से ज्यादा मांग लिया तो। "भाई, लक्ष्मी एस्टेट जाना है।" मुम्बईया लहज़े में टैक्सीवाली कहता है, "आपको रास्ता मालूम है क्या मैडम।" "नहीं भैया, मैं तो नई हूं शहर मेँ।" "मैं भी नहीं जानता। बैठ जाओ। वडाला से आया मैडम। इधर का रोड नहीं मालूम। बैठो ना मैडम, अपन पूछ लेंगे ना कहीं उधर ही रास्ते मेँ।"

कह ही दिया होता, बैठ जाओ। घुमा ही दिया होता बैंड्रा, सैंटाक्रूज़, जुहू, अंधेरी। मुझे क्या पता चलता? हम पचास मिनट और आठ पूछताछ के बाद लक्ष्मी एस्टेट पहुंचते हैं। टैक्सीवाला बीस रुपए कम लेने की ज़िद करता है। "आपको कितना घुमाया मैडम? टाईम भी खराब किया।"

अच्छा? ऐसा भी होता है? ज़ालिम कसाई बसते हैं मुंबई में, मुझे किसी का कहा हुआ याद आया है।

डॉ द्विवेदी किसी के साथ मीटिंग में हैं। अपनी कुर्सी की ओर इशारा करके कहते हैं, "उसपर बैठ जाओ अनु, क्रिएटिव लोगों की कुर्सी है।"

मैं कहती हूं, "अब दो मिनट के लिए सही, इसपर बैठूंगी ज़रूर।"

डॉ द्विवेदी फोन पर बात करते हैं तो मैं सोचती हूं, जानती हूं इन अलनूर मर्चेंट और नबील अब्बास को, जिनसे बात कर रहे हैं डॉक्टर साहब। दो बार मिली थी उनसे। मीडिया कन्सलटेन्ट्स, डिजिटल मार्केटिंग के शहंशाह। लगान की भी ऑनलाइन पब्लिसिटी का ज़िम्मा था उनपर। याद आया कि अपने एक्जेकेटिव प्रोड्युसर को आकर बताया था मैंने इक्कीस साल की उम्र में, "आई थिंक आई हैव फॉलेन फॉर अलनूर।" तब कितनी बेवकूफ थी मैं। कई सालों तक नंबर भी सहेज कर रखा था मोबाइल में। शहर बदला तब भी, नंबर और पते बदले तब भी।

ये वो ही अलनूर मर्चेंट है। दुनिया कितनी छोटी सी है, नहीं?

डॉ द्विवेदी को नहीं बताती अपने बचकाने क्रश की बात। हम अपनी बात करने लगते हैं। मैं उनकी फिल्म की तबीयत के बारे में पूछे बगैर अपना रोना रोने लगती हूं। उनके पास हिदायतों, नसीहतों की टोकरी है। कहते हैं, उन्हीं से बांटता हूं जो मेरी सुनते हैं। मैं जानता हूं, तुम सुनोगी।

क्रिएटिव होने की तकलीफों का ब्यौरा कई बार कई जगहों पर सुना है, आज भी सुनती हूं। ये भी सुनती हूं कि मन और दिमाग की जंग चलती रहेगी हमेशा। तुम्हें कई बार अनसुना करना होगा किसी एक को। मैं डॉक्टर साहब से कहती हूं कि दिल ने दिवालिया निकाल दिया। होश-ओ-ज़ेहन का कारोबार चलाकर देखूं क्या? "क्यों नहीं", वो कहते हैं। "दिल को समझाओ की बहुत शोर ना मचाए। मैं नहीं कर पाता, लेकिन तुम कर लोगी।"

तुम कर लोगी। मैं कर लूंगी। दिमाग की सुन लूंगी मैं। लड़की हूं इसलिए। बीवी हूं इसलिए भी। मां हूं, इसलिए ज़रूर। 

मेरे दिमाग की टोकरी में से अब रोडमैपनुमा कुछ निकलने लगा है। नसीहतों के बीच एक मुकम्मल करियर मैप दिखाई देता है। "तुम कर लोगी" के कई भरोसों के साथ।

डॉक्टर द्विवेदी से की हुई ये बातचीत कितनी काम आएगी, ये पांच साल बाद मालूम होगा। इसलिए रिकॉर्ड कर रही हूं आज का दिन।

डिफाइनिंग मोमेन्ट्स शोर मचाते हुए नहीं आते। भरोसे की जीर्ण-शीर्ण होती इमारत को बचाए रखने के लिए कई बार बाहर से पेटिंग काफी होती है, नींव तक जाने की ज़रूरत नहीं होती।

मैं करीब-करीब बेख्याली की स्थिति में घर लौटी हूं। घर लौटते ही किसी और से मिलने की जल्दी में फिर से बाहर का रुख करते हुए। ऑटो स्ट्राईक, उमस, ट्रैफिक, भीड़, पटरी पर बैठे फलवाले से खरीदे गए केले - सब अभी भी वैसे ही दिखते हैं जैसे एक टूरिस्ट को दिखते होंगे। मैं फिर भी यहां लौट-लौटकर आना चाहती हूं। दिमाग उलझा हुआ है। शहर पर शाम उतर आई है। मैं थककर टैक्सी में सिर पीछे की ओर टिका देती हूं। एक दोस्त की नवाज़िशें याद करती हुई ईयरप्लग्स के ज़रिए गुलाम अली को सुन रही हूं - हल्के-हल्के ज़मीं पे वो मिटते निशां, थक के बैठो हों जैसे ज़मीं आसमां।

बाहर थककर शहर बैठा नहीं होगा, अटटालिकाओं ने थाम लिया होगा उसे कहीं। ज़मीं पर जो निशां मिटने लगे हैं, नाउम्मीदियों के हैं। कम-से-कम मैं आंखें बंद किए यही सोचना चाहती हूं आज।

9 comments:

Puja Upadhyay said...

दो लोग होते हैं न एक जैसे...कभी कभी सोचती हूँ..बस इतना...आप मेरी क्लासमेट होतीं तो हम कितने अच्छे दोस्त होते. आप सी कोई और और इस शहर में? किसी का पता हो तो बताना...

Rahul Singh said...

पढ़ा हुआ कुछ याद करते हुए मुझे तो एकाधिक बार ऐसा लगा कि यह लहरें पर था या घुमन्‍तू पर.

Kishore Choudhary said...

कहते कहते रुकी है वो, मेरी जुबां ...

कभी इन दिनों को ज़िंदगी के हसीन दिन कह कर याद किये जाने की पूरी संभावना है कि समय तमाम अपशिष्टों को बाहर कर देगा. हम हो जायेंगे निर्मल...

shikha varshney said...

इस शहर में सिर्फ ज़ालिम कसाई बसते हैं,
पर हर शहर के अपने फ़रिश्ते होते हैं.

Arvind Mishra said...

पढ़ रहा हूँ हर्फ़ दर हर्फ़ ..डूबकर ..कई अहसास यकसा होते हैं ....डॉ .द्विवेदी, एक स्वप्नदर्शी ....
मुम्बई में एक बार फिर अपने होने का अहसास और अपनी पहचान की जद्दो जहद ...
बाकी तो जब भी मुंबई की यादें आती हैं फिल्म गमन के पार्श्व में गूंजती बड़े गुलाम अली की यह ठुमरी बेसाख्ता याद हो आती है
आजा सावंरिया तोहें गरवा लगा लूं रस के भरे तोरे नैन ....
इसमें मुम्बई की बेकसी ,मजबूरियों का जो जज्बात उभरा है कि बस खुदा खैर करे ....
मुम्बई प्रवास आपको शुभ हो ,यही कामना है ......

Arvind Mishra said...

हाय! :) ये मेरा कमेन्ट ही स्पैंम में क्यों जाता है :(

varsha said...

एक दोस्त की नवाज़िशें याद करती हुई ईयरप्लग्स के ज़रिए गुलाम अली को सुन रही हूं - हल्के-हल्के ज़मीं पे वो मिटते निशां, थक के बैठो हों जैसे ज़मीं आसमां।
achcha laga padhkar.

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

mujhe yaad hai...hamne us taxi wale kee baat kee thi... mumbai ki jo filmi image hai dhyan me usse alag hai mumbai... jab main mumbai ke railway station pe utra tha to badi der tak dhyaan jeb par raha..yaar kaheen koi batwa na maar le.. :P

sarthiagra said...

शब्दों की कशीदाकारी देखी-पढ़ी, अच्छे अहसासों से रूबरू हुआ।