Saturday, April 14, 2012

वो जो हममें तुममें क़रार था

कहते हैं पतिदेव कि मुझे बेचैन रहने की बीमारी है। आराम ही नहीं देती ख़ुद को, और यही वजह है कि सेहत अक्सर नासाज़ हो जाया करती है। किताब पढ़ो, गाने सुनो, टीवी देखो, आराम करो। तुम्हें कैसी बेचैनी है ये? सही ही कहते होंगे, लेकिन भटकने की फ़ितरत लेकर पैदा हुए लोग अपना जेनेटिक स्ट्रक्चर कैसे बदल डालेंगे भला? अब आज की ही मिसाल लीजिए। हज़ार काम हैं निपटाने को - घर के बाहर के। इस बीच पैकिंग करनी है, एक नए सफ़र पर जाने की तैयारी। एक हफ्ते लायक काम निपटा डालना है। एडिटर दोस्तों से किए गए झूठे-सच्चे बेमानी वायदे निभाने हैं और कॉलम लिखकर भेजने हैं। असाईनमेंट्स को आप ना नहीं कह सकते। बैंक भी जाना है। मॉर्निंग वॉक भी छूट नहीं सकता और बैंक में आपके बदले कौन कर आए दस्तखत? तमाम कोशिशों के बावजूद मैं डिसऑर्गनाइज्ड ही लगती हूं, स्क्रीन पर चमकते पावर नोट्स काम नहीं आते और टाईम मैनेजमेंट पर पढ़ी गई एक हज़ार किताबें यहां धत्ता बता जाती हैं।

दरअसल, रेस्टलेसनेस कोई बीमारी होती होगी, इसका मुझे पूरा यकीन है। अपने दिन, अपनी शामें किनारों तक भर लेने का ऑबसेसिव कम्पलसिव डिसॉर्डर है मुझे और शगल ही कहिए कि बुक लॉन्च और जेन्डर बैलेंस पर होनेवाली डिस्कशन मीटिंग्स के एसएमएस आते ही मुझे बेचैनी होने लगती है। मैं कैफे ज़ाफिरो से लेकर कॉन्सटिट्यूशन क्लब तक, सब जगह होना चाहती हूं। मैं किताब लिखने से लेकर पढ़ने और यहां तक कि बच्चों को पढ़ाने तक के सारे काम करना चाहती हूं। मुझे घर भी दुरुस्त चाहिए, बाहर भी। मुझे बेड कवर पर कोई सिलवट नहीं मांगता, मुझे कुशन को सीधे करते रहने की बीमारी है और दिन में दस बार दीवारों पर लगे दाग़ गिनती हूं।  थोड़ी-बहुत कसर जो बाकी रह गई तो दोस्तों के साथ वक्त गुज़ारने की बेचैनी मुझे और थका देती है।

लेकिन अब नहीं तो कब? मिली हुई एक ज़िन्दगी को कैसे ना जीएं? दिन जाया होते रहें? हम ज़ाया होते रहें? यही बेचैनी या रेस्टलेसनेस चीज़ों को बदल देने का माद्दा रखता होगा। बल्ब और मोशन कैमरा के आविष्कारक थॉमस अल्वा एडिसन कहते हैं, Restlessness is discontent and discontent is the first necessity of progress. Show me a thoroughly satisfied man and I will show you a failure. आहा! दिमाग की बत्ती को जलाए रखने का इससे बेहतर बहाना क्या होगा? शुक्रिया, श्री एडिसन।

अब सवाल है कि हम आख़िर बदलना क्या चाहते हैं? ऐसी कौन-सी असंतुष्टि है जो हमारे पैरों और दिमाग में पहिए डालकर दम लेता है? सब ठीक ही तो आस-पास। बच्चे स्कूल जाते हैं, घर में कामवालियां आकर आपका काम आसान कर जाया करती हैं, तनख्वाह  वक्त पर आ ही जाती है, काम चल ही जाता है, देश-समाज में भी क्या कहां रुकता है कब? फिर क्यों मैं बेचैन? तुम बेचैन? ये बेहतरी की ख्वाहिश ना होती, कुछ बदल डालने की चाहत ना होती तो गोभी और तुममें अंतर क्या होता? आद्या को भी बेहतर वीकेंड चाहिए, आदित का मन छोटी भीम की काल्पनिक कहानियों से नहीं भरता अब। मैं खुश हूं इनकी शिकायतों से। ये इनोवेट करने का, अपने लिए रास्ते ईजाद करने का कोई तरीका सीखेंगे अब।

रही बात मेरी तो पतिदेव, आपका कहा मानकर नए सफ़र पर जाने से पहले सांसों की डोर को थामकर छू लेने की कोशिश में हूं। सोचते हुए, चलते हुए, बेचैन होते हुए थक तो जाती ही हूं। फिर भी बेचैनी बरकरार रहे, यही दुआ है।

सोचते-सोचते थक गई हूं और जहां गाड़ी रोककर बैठी हूं वहां से विंडस्क्रीन पर नीम के सूखे हुए पत्ते गिरे जा रहे हैं बेसाख्ता, धूप आंख-मिचौली खेल रही है और अप्रैल शबाब पर है। दूर क्षितिज पर कुछ दिखता नहीं, एक अंतहीन सड़क दिखती है बस। मैं नए सफ़र पर जाने से पहले थककर बैठी हूं थोड़ी देर और आबिदा परवीन जाने क्या गा रही हैं। ये क़रार के मुख़्तसर लम्हों को याद करना दरअसल तूफ़ान के आने से पहले की शांति है। वैसे, हमारे और तुम्हारे बीच बेक़रार बने रहने का ही क़रार था शायद।

5 comments:

Arvind Mishra said...

होपलेस केस .. :) लिव लांग!
आबिदा परवान को सुन रहा हूँ .....कभी यही ग़ज़ल बेगम अख्तर से भी सुनिए ..
ठीक बाद,मुझे गुलाम अली की यह गजल सुननी है जो आपकी पोस्ट पढ़ते वक्त बेसाख्ता याद आयी !
बेचैन बहुत फिरना घबराये हुए रहना ...आप भी सुनें -
http://www.youtube.com/watch?v=06X-g5mZ_0E

Dr.Nidhi Tandon said...

three cheers for RESTLESS souls like U.

Arvind Mishra said...

वह नहीं यह वाला सुनिए

Anupama Tripathi said...

करार तो अभी भी है .....आप में और आप की लेखनी में .....तभी तो कुछ लिखने को बेकरार रहता है आपका मन ...और लिखतीं रहें हमें भी करार आता है पढ़ कर ....
शुभकामनायें ...

प्रवीण पाण्डेय said...

Order and Chaos ही पढ़ रहा हूँ, आपकी पोस्ट और मनःस्थिति पूर्णतया सटीक बैठती है उस पर।