मंगलवार, 29 जनवरी 2013

उलझे रिश्तों को सुलझाने का जज़्बा!

मैं इस बारे में पब्लिक फोरम पर लिखना ही चाहती थी, लेकिन हिम्मत नहीं थी। ना यकीन था इस बात का कि क़ायदे से, बिना किसी पर उंगली उठाए अपनी तकलीफ़ साझा करने का हुनर भी होगा मुझमें। लेकिन बात अगर सिर्फ़ इतनी ही है कि मेरी ज़िन्दगी के दस्तावेज़ ये पन्ने कल को मेरे बच्चों की अमानत होंगे, तो उनसे कोई बात छुपाई जाए, ये सही नहीं होगा। इसलिए भरोसा है कि धीरे-धीरे हर गलत-सही को बांटने का, उनपर चर्चा करके कोई रास्ता निकालने का तरीका एक ना एक दिन आ ही जाएगा मुझको।

ये बात कुछ दस दिन पहले की है। मैं दिल्ली से साढ़े तीन हफ्ते बाहर रहकर आई थी और बहुत सारे सफ़र के बहुत सारे गंदे कपड़ों को धो लेने की बहुत सारी मेहनत के बाद उन्हें अलमारियों में सहेजकर रखने का बहुत बड़ा काम कर रही थी। बच्चों की अलमारियां खुली, मेरी अलमारी खुली और आख़िर में पतिदेव की अलमारी खुली, जिसमें उनके भी पीछे रह गए दो-चार कपड़े डालने थे।

अलमारी खोलते ही मेरी धड़कनों ने तेज़ हो जाने जैसे कुछ महसूस किया। ये नाटकीय लम्हा अपेक्षित नहीं था। क़रीब-क़रीब खाली अलमारी को देखकर मेरी धड़कनों को ऐसे बिल्कुल पेश नहीं आना चाहिए था। सब्र और गरिमा भी कोई शय होती है यार।

लेकिन मैं बहुत देर तक अलमारी का कपाट थामे खड़ी रही थी। ये किसी बहुत अज़ीज़ को ट्रेन में बिठाकर आने के बाद प्लैटफॉर्म पर खड़े रहकर गुज़रे लम्हों की याद के कचोटे जाने के लिए खुद को छोड़ दिए जाने जैसा कोई लम्हा था। ये वो तकलीफ़ थी जो हॉस्टल के अपने कमरे को खाली करते हुए हुई थी - कि जहां लौटकर आना ना था, जहां से जवानी के कहकहों को अलविदा कह दिया जाना था।

हो सकता है कि मैं मेलोड्रेमैटिक हो रही होऊं। एक्चुअली मैं मेलोड्रेमैटिक ही हो रही हूं। लेकिन मेरी तकलीफ़ वो एक बीवी समझ सकती है जो हर छठे महीने एक महीने की छुट्टी के बाद अपने पति को जहाज़ पर सेल करने के लिए विदा करती है। मेरी तकलीफ़ वो एक बीवी समझ सकती है जो भारी मन से फील्ड पोस्टिंग के लिए अपने फौजी शौहर को कर्तव्य की राह पर चलने के लिए भेजती है। मेरी तकलीफ़ हर वो औरत समझ सकती है जो किसी ना किसी वजह से अकेली अपने दम पर अपना घर-परिवार, अपने बाल-बच्चे, नाते-रिश्तेदारियां निभा रही है। मेरी तकलीफ़ मेरी मां समझ सकती है जिसने पच्चीस सालों तक पापा के साथ शहर-शहर, गांव-गांव, जंगल-जंगल भटकने की बजाए एक जगह पर रहकर एक हज़ार पच्चीस तकलीफ़ें झेलते हुए भी हमें अकेले बड़ा करने का फ़ैसला किया। सबसे बड़ी विडंबना है कि मैं मां की तरह जीना नहीं चाहती थी, और मुझे हर मोड़ पर अपनी ज़िन्दगी में उनके जिए हुए की परछाईयां दिखती हैं। 

शिकायत करने का हक़ हमें इसलिए नहीं होता क्योंकि ज़िन्दगी की तरह प्यार भी किसी पर थोपा नहीं जा सकता। जैसे हमें अपनी आसानियां चुनने का हक़ है, वैसे ही हम अपनी दुश्वारियां भी चुनते हैं। वजह कुछ भी हो सकती है। ज़रिया कोई भी हो सकता है। बावजूद इसके लॉग आउट करने का विकल्प किसी के पास नहीं होता, क्योंकि मैं नहीं समझती कि कोई भी इंसान किसी परफेक्ट सेट-अप में, पूरी तरह ख़ुश होता होगा। इसलिए चाहे मानिए या ना मानिए, ज़िन्दगी नाम के शहर का रास्ता समझौतों के जंगलों से होकर  जाता है। हम हर क़दम पर विक्षिप्त हो जाने से बचने के लिए समझौते ही कर रहे होते हैं। उसकी इन्टेन्सिटी ज़रूर कम-ज़्यादा होती होगी, लेकिन फिर भी होते तो समझौते ही हैं - जिसका धैर्य और जिसकी सहनशक्ति जितनी इजाज़त दे, उतना।

इसलिए किसी और तरह की ज़िम्मेदारी को निभाने के लिए पति से दूर होते हुए मैं चाहे भीतर से ज़ार-ज़ार बिलख रही होऊं, क़ायदा और मर्यादा ये है कि उसे विदाई हंसते हुए ही दूं। शिकायत उसपर भारी पड़ेगी। रोना उसको तोड़ेगा। इसलिए अपने अकेलेपन के साथ समझौता कर लो। घर में बनी रहने वाली सुख-शांति की क़ीमत किसी समझौते से बड़ी नहीं होती।

समझौता करने की ताक़त भी तो इसी भरोसे से आती है कि तोड़ना-बिखेरना-टूटना हमारी फ़ितरत में नहीं। ख़ुद से ये भी एक तरह का समझौता ही होता है कि जब हम अपने गिले-शिकवों की बजाए अपनी नेमतें गिनने बैठते हैं। मेरा अपना अनुभव कहता है कि हर वो औरत जो घर बचाए रखने के लिए हरदम उलझे रिश्तों को सुलझा लेने में तत्परता दिखाती है, वो अपनी नेमतें याद करके ख़ुद को बहुत मज़बूत बनाए रखती है।

तो आद्या और आदित, बचाए रखने का हुनर सीखना होगा तुमको। तोड़ना आसान है, बनाना मुश्किल। चीखना-चिल्लाना आसान है, ख़ामोशी से रास्ता बनाना मुश्किल। लेकिन मुश्किलों की आंच पर जो पकता है, खरे सोने-सा होता है। उसके मन की शुद्धता इन्हीं मुश्किलों से होकर गुज़रते हुए निखरती है।

वैसे उस दिन के बाद से अलमारी नहीं खोली मैंने। प्यार के साथ इंतज़ार का तुक शेरों, गज़लों, कविताओं, गीतों में ही नहीं, ज़िन्दगी में भी मिलता है।


शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

बाबा के बहाने ज़िन्दगी के मानी-बेमानी फ़लसफ़े

वो भी १८ जनवरी का ही दिन था। २००२ जनवरी का।

मगर वो दिन ऐसा उदास, हाड़ कंपाने और रुलाने वाला नहीं था। सुबह-सुबह धूप छत पर मेहरबान होकर ऐसे बरस रही थी कि जैसे रातभर के ठंडे और बेरहम बिछोह के बदले सारा प्यार बस अभी के अभी उंडेल देगी। हम दो ही लोग थे छत पर - बाबा और मैं। आराम कुर्सी पर बैठे हुए बाबा दूर कांके डैम और उनकी नज़रों के बीच कांटे की तरह उग आए शहर को देख कर मायूस हो रहे थे, मैं अभी नई-नई मिली नौकरी की डींगें हांक रही थी।

"हम इंटरनेट पर गाने सुनते हुए काम करते हैं। दफ़्तर में कहीं कोई औपचारिकता नहीं है।" मैं डॉटकॉम के ज़माने में जवान होती बेपरवाह लड़की, बाबा ब्लू-कॉलर से व्हाईट-कॉलर हो जाने की मशक्कत में ज़िन्दगी के पैंतालीस साल निकाल देनेवाले मेहनतकश इंजीनियर। बाबा में फिर भी मेरी बातें सुनने का सब्र रहा, मेरी पैदाईश से। सब कहते थे कि बाबा का गुस्सा दो ही चीज़ों से पिघलता है - सलीके से परसी हुई थाली से और अनु रानी के थोबड़े से। मुझे लेकर उनमें बेइंतहा धैर्य था, मेरी तमाम ज़्यादतियों और ज़िद के बावजूद।

"आपका फेवरिट गाना कौन-सा है?" बाबा से ऐसे सवाल पूछने की ज़ुर्रत एक मैं ही कर सकती थी।

बाबा सोचते रहे।

"चलिए रैपिड फ़ायर खेलते हैं। हम सवाल पूछेंगे, आप जवाब दीजिए।"

बाबा के साथ ऐसे बेतुके खेल खेलने की ज़ुर्रत भी एक मैं ही कर सकती थी।

"फेवरिट एक्टर?"

"राज कपूर।"

"और फेवरिट हीरोईन?"

"वहीदा रहमान।"

"फेवरिट खाना?"

"खीर। चावल-चिकन। मीठा पान।"

 "फेवरिट सिंगर?"

"मुकेश और लता मंगेशकर।"

"फेवरिट गाड़ी?"

"ओपेल एस्ट्रा।"

"फेवरिट गाना?"

"एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल... और अब हमको शांति से अख़बार पढ़ने दो।" बाबा ने बात बंद कर दी, और मैं बात करने को कुलबुलाती रही।

"हम अगले तीन घंटे में चले जाएंगे।"

"हां, तो? रहने के लिए तो आई नहीं थी?"

"रह जाते हैं। यहीं रांची में। हम कहीं भी, किसी भी जगह किसी भी हाल में रह सकते हैं।"

"रांची में रहकर क्या करोगी?"

"कुछ भी। शादी की तैयारी करेंगे। किसी स्कूल में पढ़ा लेंगे। घर में आराम करेंगे।"

बाबा ने अख़बार नीचे ज़मीन पर रख दिया, बल्कि फेंक दिया और अपनी कुर्सी मेरी ओर खींच ली।

"शादी के बाद क्या करोगी अनु?" बाबा का ये सवाल बेहद गंभीर था।

अपनी कमअक्ली और बीस के ऊपर आ जाने वाले जुवेनाईल आत्मविश्वास का बेबाक परिचय देते हुए मैंने सास-ससुर की सेवा और ससुराल में रिश्तों को बनाए रखने के लिए किए जाने वाले बलिदान पर कुछ तो छोटा-सा भाषण दे दिया।

बाबा के चेहरे पर पसर गई हैरानी मुझे आज भी नहीं भूली।

"मुझे तुमसे ये उम्मीद नहीं थी," बाबा ने कहा।

क्या सोचा था अनु सिंह? सरदार खुश होगा? शाबाशी देगा? 

"हम नहीं जानते हैं कि मेरी बात तुमको कितनी समझ आएगी। हो सकता है तुम कई बातों से डिसएग्री भी करो। लेकिन फिर भी सुनो अनु। ये ज़िन्दगी एक बार मिलती है - सिर्फ एक बार। इसको अपनी शर्तों पर जीना सीखो और याद रखो कि आसानियां नहीं चुननी हैं। दिल... यहां देखो यहां... एक दिल होता है, जो रास्ता दिखाता है। उसकी सुनो। दूसरों के लिए जीने से पहले अपने लिए जीना सिखोगी तो खुश रहोगी - खुद भी खुश रहोगी और दूसरों को भी खुश रखोगी। याद रखना अनु, यहां तक पहुंचने के लिए तुमने बहुत-बहुत मेहनत की है। अपनी उम्र के बच्चों से कहीं बहुत ज़्यादा। इसलिए इतनी आसानी से किसी के लिए भी सबकुछ छोड़ देने की बात मत करो।"

बाबा नाराज़ थे और मैं हैरान थी क्योंकि मुझे पूरी उम्मीद थी कि कुर्बानियों की बात सुनकर बाबा को मुझे दिए गए संस्कारों पर फ़ख्र होगा। आख़िर हमको समझौतों के पाठ ही तो पढ़ाए जाते हैं पूरी ज़िन्दगी। घर के लिए समझौता। परिवार के लिए समझौता। बच्चों की ख़ातिर समझौता।

बाबा ने कहा था कि एक आना बचाए रखना खुद को। उस वक्‍त इस बात का ठीक-ठीक मतलब समझ आया नहीं था। इतने सालों बाद कुछ-कुछ समझने लगी हूं कि एक आना ख़ुद को बचाने का मतलब पंद्रह आनों की कुर्बानियों के खर्च के बीच थोड़ा-सा स्वार्थी बन जाना होता है। बाबा ने कहा था कि दिल की सुनूं। बाबा होते तो उनसे पूछती कि अपने दिल की सुनने में किसी और के दिल को ठेस पहुंचने के बीच के हेयरलाईन डिफरेंस की सफ़ाई कैसे दी जाती है। बाबा ने कहा था कि आसानियां मत चुनना। होते आप तो पूछती आपसे, ज़िन्दगी आसानियां चुनने के मौके देती ही कहां है। शायद झगड़ती भी आपसे कि ये क्या सिखाया आपने कि हर बार, जिस मोड़ पर भी होती हूं कोई रास्ता सीधा जाता हुआ नहीं दिखता। क्या सिखाया कि जूझना फ़ितरत बन गई और संघर्ष करना शख्सियत।
(बाबा की ये तस्वीर १९७४ की है)

बाबा से वो मेरी आख़िरी बातचीत थी। कुछ घंटे बाद बाबा मुझे एयरपोर्ट छोड़ने आए थे, और हम गाड़ी में उनका फेवरिट गाना - एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल - सुनते रहे थे। डिपार्चर गेट पर खड़े-खड़े उन्होंने  मुझे ख़ूब-ख़ूब मेहनत करने और किसी क़ीमत पर हार ना मानने की सीख दी थी। ये भी कहा था कि सिर उठाकर जीने के लिए आत्मनिर्भर होना ज़रूरी है। ये भी कहा था कि उन्हें अपने पोतों से ज़्यादा मेरे स्वावलंबी होने की फिक्र है क्योंकि इस पेट्रियार्कल सोसाइटी में लड़के तो किसी ना किसी तरह अपना मुकाम हासिल कर ही लेंगे, लड़कियों को पीछे खींचनेवालों में से परिवार और समाज का हर वो शख्स होगा जिससे उसके स्वार्थ की सिद्धि होती है। बाबा ने ये भी कहा था कि तुम्हारे आगे बढ़ने से सबसे ज़्यादा तकलीफ़ तुम्हारे अपनों को होगी, क्योंकि कोई परिवार अपनी औरत को घर के भीतर और चौखट के बाहर की दुनिया में बंटते देखकर खुश नहीं रहता। परिवार उसी औरत को सिर-आंखों पर लेता है जो सवाल नहीं उठाती, सिस्टम को चुनौती नहीं देती, जो सेवा में तल्लीन रहती है और जो उस पानी की तरह होती है जिसे किसी भी बर्तन में डाल दिया जाए, वो उसी बर्तन का रूप ले लेती है। तुम्हें बहती हुई धारा बनने का हुनर सीखना होगा और ये अपने आप में एक बहुत मुश्किल काम है, बाबा ने चेताया था। 

बाबा की कही हुई सारी बातें मेरे सिर के ऊपर से गुज़र गई थीं। तब मुझे शादी कर लेना और परिवार बसा लेना ज़िन्दगी का इकलौता और सबसे ज़रूरी काम लगता था। बाकी सब स्टॉप-गैप अरेंजमेंट था - आज है तो ठीक, कल नहीं तो भी बहुत अच्छा।

मैं मूर्ख थी कि बाबा मुझको अजर-अमर लगते थे। उस आख़िरी बातचीत के ठीक सवा महीने बाद बाबा गुज़र गए। मुझे सिर्फ़ इस बात का सुकून है कि किस्मत ने उनकी ज़िन्दगी के आख़िरी पंद्रह दिनों में मुझे उनके सिरहाने होने का मौका दिया। बाबा ने आख़िरी निवाला, पानी का आख़िरी घूंट मेरे हाथ से लिया और जाते-जाते आख़िरी बार मेरी हथेली को यूं कसकर थामे रखा कि जैसे अपनी सारी शक्ति, अपना सारा भरोसा उसी एक लम्हे में हथेलियों के उसी एक स्पर्श में सौंपकर जाएंगे। बाबा के जाने के बाद समझ में आया कि किसी बेहद क़रीबी, किसी बेहद अज़ीज़ को खोने की तकलीफ़ वो तकलीफ़ होती है जिसकी भरपाई वक़्त जैसी कमाल की ताक़तवर शय भी नहीं कर पाती। जिस आख़िरी बार जाने से पहले बाबा ने हाथ पकड़ा था और कातर आंखों से मेरे चेहरे की ओर देखा था उसे याद करती हूं तो समझ में आता है कि मरना कोई नहीं चाहता, तब भी नहीं जब ज़िन्दगी हज़ार धोखे देती है, मुंह के बल बार-बार पटकती है। इतनी बेमुरव्वत ज़िन्दगी के लिए मोह कभी ख़त्म नहीं होता क्योंकि ज़िन्दगी है तभी सुख-दुख, समझ-नासमझियां, हार-जीत, लड़ाई-झगड़े, प्यार-वफ़ा, रिश्ते-नाते, खुशनसीबी-बदनसीबी सब है।

बाबा ने जो समझ बांटी वो अभी तक पूरी तरह कारगर हुई नहीं है। अव्वल तो इतनी सारी समझ बांटने के ठीक एक महीने भीतर ही बाबा ने ज़िन्दगी का सबसे बड़ा फ़लसफ़ा सीखा दिया कि सांसें हैं तभी तक ये उलझनें हैं। इसलिए, जितना हासिल है उसके लिए शुक्रगुज़ार रहो और हर रोज़ ऐसे जियो कि जैसे कल की सुबह देखने का सुख मयस्सर ना होगा। दूसरा, दिल की बातें सुनकर उनपर अमल करने की हिम्मत कहां आ पाती है हममें? ये जानते हुए भी कि अपने लिए जीना ज़रूरी होता है, हम फिर भी दूसरों की ख़ुशी की ख़ातिर खुद को हज़ार बार ठुकराते चलते हैं। बाकी, ये ज़िन्दगी भी हर रोज़ इम्तिहान लेती है। हर रोज़ हम ख़ुद को नए दिलासे दे दिया करते हैं। फिर भी, आसानियां नहीं चुनने की सलाह पर क़ायम हूं, और ये भी याद रखूंगी कि दूसरों को खुश रख सकूं, इसके लिए ख़ुद खुश रहना बेहद ज़रूरी है। याद  रखूंगी कि जब तक बहती हुई सांसें हैं, रगों में बहती हिम्मत और सेहत है तबतक बहती हुई धारा बनना है, बर्तन में डाला जा सकने वाला ठहरा हुआ पानी नहीं। 

आई लव यू, बाबा।



 

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

साल की आख़िरी चिट्ठी, बच्चों के नाम

मेरे प्यारे बच्चों,

कल पहली बार तुम दोनों को साथ मिलकर आपस में जोड़-जोड़कर अख़बार की सुर्ख़ियां पढ़ते हुए देखा। मुझे खुश होना चाहिए था, लेकिन कोई गहरी उदासी अंदर तक उतर गई थी। मैं तुम दोनों के हाथों से अख़बार ले लेना चाहती थी क्योंकि मैं नहीं चाहती कि तुम एक-दूसरे को ज़ोर-ज़ोर से ये पढ़कर सुनाओ - 'कड़ी सुरक्षा में पीड़िता का अंतिम संस्कार'।

जिसका डर था, वही हुआ। मम्मा पीड़िता मतलब क्या? मम्मा अंतिम संस्कार क्या होता है? मम्मा, इतने सारे लोग खड़े होकर क्या कर रहे हैं? मम्मा आर-ए-पी-ई यानि रेप? इसका मतलब क्या?

ऐसे मुश्किल सवाल तुम दोनों को परिकथाओं और पंचतंत्र में उलझाए रखने की मेरी दिनभर की जद्दोजेहद पर पानी फेर दिया करते हैं। मैं तुम दोनों से कुछ छुपाना नहीं चाहती, लेकिन ये भी कैसे बताऊं कि जिस भरोसे की नींव पर तुम्हारे इर्द-गिर्द प्यार और इंसानियत की जो दुनिया खड़ी करने की कोशिश करती रहती हूं, वो सब दरअसल छलावा है।

तो सुनो बच्चों, इस साल की आख़िरी चिट्ठी में दुनिया के वो घिनौने और मुंह जला देनेवाले सच सुनो जिनसे एक-ना-एक दिन तुम्हारा पाला पड़ना ही था। मैं कबतक, आख़िर कबतक तुमको अपने पंखों में छुपाए सोचती रहूंगी कि आज नहीं, कल कहूंगी कि वो सामने दिखाई देनेवाले अंधेरे डरावाने जंगल में ही तुम्हें उड़ान भरनी होगी, वहीं अपने हिस्से का आसमान भी तलाश करना होगा। मैं कबतक नहीं बताऊंगी कि पीड़िता कौन और अंतिम संस्कार क्या?

आदित, पहले तुम सुनो बेटा।

हनी सिंह के गानों को हर एफएम, हर पार्टी में सुनोगे तुम। फिल्मी गाने तुम्हें सिखाएंगे कि लड़कियां चमेली और जलेबी होती हैं। कार्टून चैनलों पर दिखाई देनेवाले पॉपिन्स के विज्ञापन में तुमसे ज़रा-सा ही बड़ा बच्चा 'लेने' और बच्ची घूमकर 'देने' की बात करेगी। फिर और बड़े होगे तो तुम्हारे साथ के दोस्त लड़कियों के जोक्स बनाएंगे। मुमकिन है कि हर गांव, हर शहर, हर कस्बे की दीवारों पर तुम्हें मर्दानगी की चमत्कारी दवाओं के विज्ञापन नज़र आएं। मर्दानगी की जो परिभाषा मीडिया या बाहर की दुनिया तुम्हारे सामने परोसेगी, उसका बिल्कुल यकीन मत करना। तुम देखोगे कि हर समाज में अपनी शक्ति और पौरुष के प्रदर्शन का रास्ता औरत के जिस्म से होकर जाता है।  

आओ एक वो बात बताती हूं तुमको जो तुम्हें बाद में तुम्हारी प्रेयसी या बीवी भी बताएगी शायद। लड़की या औरत के जिस्म को रौंदकर, ज़ख़्मी कर मर्दानगी कभी साबित नहीं होती, हैवानियत सिद्ध होती है। जिस्म को ज़ख्मी कर भले किसी शरीर पर काबिज हुआ जा सकता है, लेकिन रूह सिर्फ एक भाषा समझती है - प्यार की। मैं तुम्हें यही प्यार और सम्मान की भाषा सिखाना चाहती हूं, आदित। इंसानियत के पक्ष में खड़ा होना सिखाना चाहती हूं। हाथ जोड़कर अपनी परवरिश का वास्ता देते हुए कहना चाहती हूं कि कभी किसी ज़ख़्मी इंसान को सड़क पर पड़े हुए देखो तो अपनी गाड़ी से उतरने की ज़ेहमत उठाओ। मैं चाहती हूं कि तुम ख़ुद से ये वायदा करो कि लड़की को भोग की चीज़ नहीं समझोगे। उसे वही इज़्जत दोगे, जिस इज्ज़त की तुम्हें अपेक्षा होगी। उससे वैसे ही पेश आओगे जिस बर्ताव की तुम उम्मीद रखते हो।आदित, तुम अपने आस-पास की पांच लड़कियों और औरतों को मान दोगे तो अपने आस-पास जीने लायक माहौल तैयार कर सकोगे।

रही बात पीड़िता की, तो सुनो - एक लड़की थी जो अपने दोस्त के साथ फिल्म देखकर निकली थी, वैसे ही जैसे तुम्हारी मम्मा कई सालों से करती रही है। फिर उसने एक बस स्टैंड से अपने घर तक जाने के लिए बस ली, अपने उसी दोस्त के साथ, वैसे ही जैसे तुम्हारी मम्मा, तुम्हारी मौसी अपने दोस्तों के साथ कई सालों से करती रही हैं। उस बस में सवार कुछ लोगों ने लड़की के जिस्म को इस तरह छलनी किया कि शायद काग़ज़ की लुगदी को भी पिटते हुए थोड़ी-सी रहम दिखाई जाती होगी। मैं और कोई डिटेल नहीं दे सकती आदित, मुझमें हिम्मत नहीं है सोचने की। लेकिन ये बात ज़रूर बताना चाहती हूं तुमको कि जितने बड़े अपराधी और हैवान लड़की का बलात्कार करने वाले थे, उससे कम बड़े अपराधी वो लोग नहीं जो उस सड़क से गुज़रे होंगे लेकिन सड़क पर ज़ख़मी पड़े दो लोगों को देखकर रुकने की ज़रूरत नहीं समझी होगी।

आदित, हिम्मत सलमान खान और अक्षय कुमार की तरह एक्शन और स्टंट सीन्स करने में नहीं होती। हिम्मत अपने आस-पास हर रोज़, हर लम्हे लिए जाने वाले 'एक्शन' में होती है, जिसमें दूसरों की मदद करना, दूसरों का सम्मान करना और सही-गलत की पहचान करना होता है।

आद्या, तुम्हारे लिए ज़िन्दगी तो बहुत मुश्किल होगी बेटा।

लड़की होकर पैदा होना किसी दुनिया में, किसी देशकाल में, किसी तरह के वातावरण में आसान नहीं रहा। लेकिन अगर देश और समाज बदलाव की किसी गहरी और तेज़ प्रक्रिया से होकर गुज़र रहा होता है तो उसका सबसे बड़ा ख़ामियाज़ा लड़कियों को ही भुगतना पड़ता है। तुम जितनी तेज़ रफ़्तार से अपनी आज़ादी की ओर बढ़ोगी, अपने हक़ में आवाज़ उठाओगी उतनी ही तेज़ी से तुम्हें अपमानित किए जाने के रास्ते ईजाद किए जाएंगे। इनमें से सबसे आसान तरीका तुम्हारे जिस्म पर, तुम्हारी अस्मिता पर हमला करना होता है। कुछ ऐसा कर दो कि तुम्हारे आस-पास भी कोई तुम्हारी तरह हो पाने की हिम्मत ना कर सके।

फिर भी आद्या, अपना भरोसा बचाए रखना। हिम्मत रखना क्योंकि तुम्हारे घर में बैठ जाने से, बस में नहीं बैठने से कोई समस्या हल नहीं होगी। हमला होना ही होगा तो घर में भी तुम, मेरी बेटी, महफ़ूज़ हो, कहना मुश्किल है।

आद्या, फिर भी झूठा ही सही, यकीन रखना कि तुम्हारी गहरी सांसों की जुंबिश समझनेवाला कोई होगा कि दुनिया में हर दस दरिंदे पर एक इंसान है, मैं भी ऐसी ही किसी बात पर पुख़्ता यकीन करना चाहती हूं। यकीन रखना कि तुम्हें गले लगाने की ख़्वाहिश रखनेवाला हर वक्त नज़र से तुम्हारे शरीर को तौल रहा हो, ये ज़रूरी नहीं। यकीन रखना क्योंकि मेरे भीतर भी ये यकीन किसी ना किसी तरह फिर भी बाकी है, मेरी बेटी। दुनिया जो टिकी हुई है, उसकी कोई ना कोई वजह तो होगी ही, नहीं?

इसके साथ ही, आद्या, नज़र से जिस्म को तौलनेवालों की आंखें निकाल लेने का हुनर तुम्हें सिखा पाऊंगी, अभी इसका भरोसा नहीं है। लेकिन उनकी आंखों में वापस आंखें डालकर घूर देने का तरीका तो तुम्हें हम लोग सीखा ही देंगे।

वो 'पीड़िता' मर गई आद्या, इसलिए अंतिम संस्कार की ख़बर पढ़ रहे थे तुम दोनों। और अंतिम संस्कार का मतलब संस्कारों का वो अंतिम जनाज़ा है जिनपर हम ताज़िन्दगी अमल तो कर नहीं पाते, मरने के बाद मरनेवालों के लिए अंतिम संस्कार के नाम पर कुछ ढकोसले ज़रूर करते हैं। इस मामले में, बेटा, ये ढकोसला राजनीतिक और सार्वजनिक तौर पर हुआ है जिससे परिवारवालों का कोई वास्ता नहीं रहा।


आद्या और आदित, तुम्हारे लिए एक महफ़ूज़ दुनिया का दुआ मांगूंगी, लेकिन फिर भी इस दुनिया के सच को याद रखना कि वो महफ़ूज़ दुनिया भी एक छलावा ही होगी। ऐसी एक दुनिया में तुम जी सको और बिना रोज़-रोज़ तबाह हुए बच सको, इसके लिए वही तीन चीज़ें मांगूगी तुम्हारे लिए, जो अक्सर अपने लिए मांगा करती हूं - साहस (courage), समझदारी (wisdom) और संवेदना (compassion)। अगर कोई ईश्वर है कहीं तो वो तुम्हारी हिफ़ाज़त करे!
 

गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

कश्मीर डायरिज़ पार्ट 1

19 दिसंबर 2012

दुछत्ती तो होती नहीं हमारे घरों में इन दिनों। लॉफ्ट्स हुआ करते हैं, जिनकी सफ़ाई का मुहूर्त दो-एक साल में एक बार निकल आया करता है। ऐसे ही एक शुभ मुहूर्त में सफाई करने के क्रम में वो सूटकेस उतारा गया जिसे लेकर मैं पहली बार दिल्ली आई थी। एरिस्टोक्रैट का ये सूटकेस मेरा वो पक्का यार है जिसे भूल भी जाओ तो शिकायत नहीं करता, जिसे जितनी बार खटखटाओ उतनी बार मीठी-मीठी यादों की बेसुरी तान छेड़ता है। इस बेसुरी तान से अपिरष्कृत, बेरपवाह, बेसलीका लेकिन ईमानदार होने की खुशबू आती है। अपनी ही वो खुशूबू आती है जो डायरी में बंद सूखे फूलों की हो गई। इस बार सूटकेस से याद के कई रंग-बिरंगे टुकड़ों के साथ 2004 की डायरी निकली।

साल 2004 मेरी ज़िन्दगी का सबसे हसीन साल था। उस साल मैंने जीभर कर जिया, टूटकर प्यार किया और प्यार लुटाया, खूब घुमक्कड़ी की और रिश्तों के सबसे उम्दा रूप देखे। 2004 वो साल था कि जिस साल ज़िन्दगी पर मेरा यकीन पुख़्ता हो गया था। उसी साल मैं मनीष से मिली थी। उसी साल मैंने ख़ूब प्यार से एनडीटीवी की नौकरी की, पैसे कमाए, बचाए और उड़ाए। खुद से प्यार किया और अपने आस-पास हर शख्स से प्यार किया। उस साल की डायरी में अपना अक्स देखकर खुद पर गुमान हो आया है कि जितना मिला है, वाकई खूब है।

यहां उसी साल अगस्त में की गई कश्मीर यात्रा के पन्ने बांट रही हूं। मेरी रूममेट, बल्कि फ्लैटमेट मेरी जिगरी दोस्त सबा थी, जो कश्मीर से है। उसी के साथ मैं पहली बार उसके घर गई थी - कश्मीर, और कई यकीन टूटे थे, कई और मज़बूत हुए थे। यहां डायरी का अनएडिटेड वर्ज़न है, और ये भी मुमकिन है कि पिछले आठ सालों में मेरी कई धारणाएं उम्र और सोच के लिहाज़ से बदल गई हों। फिर भी एक सच नहीं बदला - फ़िरदौस हमीन अस्तो।
     
15 अगस्त 2004

सुबह के चार बजे सोने जा रही हूं। उठूंगी कब और एयरपोर्ट पहुंचूंगी कब! देखो सबा को! कैसे चैन से सो रही हैं, जैसे जन्नत पहुंच गई हैं। मैडम घर जा रही हैं। अपनी जान हथेली पर लिए दोज़ख़ (हाय, ये क्या सोच रही हूं!!!) तो मैं जा रही हूं।

तो ये कश्मीर है!

16 अगस्त 2004

 It is a different world altogether!!! ऐसा लग रहा है कि जैसे किसी दूसरे जहां में हूं। कल की भाग-दौड़, परेशानी, दफ़्तर, काम, थकान के चक्कर में ये फीलिंग सिंक इन ही नहीं कर पाई थी कि मैं वाकई कश्मीर जा रही हूं। आज एयरपोर्ट तक, बैग्स को चार बार आईडेन्टिफाई करने तक, प्लेन में बैठने तक, 'श्रीनगर में आपका स्वागत है' लिखा देखने तक अहसास नहीं हुआ कि एक सपना सच हो रहा है।

श्रीनगर की सड़कों पर ऐसा कुछ नहीं दिखा जो इतने सालों में टीवी पर देखती आ रही हूं। लाल चौक पर हुए धमाकों के वीओवीटी काटते वक्त दिखने वाले विज़ुअल्स जैसा कुछ भी नहीं। लेकिन सतह के नीचे कोई डिसॉर्डर ज़रूर है जो गलियों, सड़कों पर थोड़ी देर खड़े रहने से नज़र आने लगता है। किसी आम हिंदुस्तानी शहर के बनिस्बत सैनिक  ज़्यादा हैं, हर कुछ मीटर की दूरी पर सीआरपीएफ के जवानों के झुंड, बीएसएफ की इक्का-दुक्का गाड़ियां, टूटे-फूटे बंकर, कैंप्स... फिर भी श्रीनगर सामान्य दिखता है। दिखना चाहता है।

घर बहुत ख़ूबसूरत हैं यहां के। दोनों ओर टीन की गिरती छतें, आयताकार खिड़कियां और खिड़कियों से आती मद्धिम रौशनी और थोड़ी-सी गर्माहट जो हर घर में फर्श पर बिछे कालीनों से टकराकर आती हुई बाहर तक छलक आती है। सबा का घर जिस कॉलोनी में है, वो शायद यहां की कोई पॉश कॉलोनी होगी।

सबा का घर। श्रीनगर में मेरा घर। :-)
यहां सभी घर एक से दिखते हैं। बस घरों के रंग अलग-अलग हैं, लेकिन रंग और बनावट एक ही। वैसे घरों की खिड़की से झांकती दीवारों के रंग भी घर में रहनेवालों के बारे में काफी कुछ कह देते हैं। फिर भी, ऐसे घर मैंने नहीं देखे नहीं कभी। सबा के घर का बड़ा सा गेट एक ग़ज़ब के सुंदर लॉन में खुलता है। वेल-मेनिक्योर्ड लॉन का ख़ातिरदार लॉनमोअर एक कोने में खड़ा है। करीने से रखे गए गमलों में रंग-बिरंगे फूल हैं। नर्गिस भी शर्माती हुई दिखी है दूर से। मुझे फूलों के नाम तो नहीं मालूम, लेकिन जिनको पहचान सकी हूं उसमें गुलदाउदी, पैंजी, गुलाब और सूरजमुखीनुमा कोई फूल है।
लॉन में खिले हुए रंग


अंदर की ओर घुसते ही चप्पलों को रखने के लिए सीढ़ियों के नीचे शू रैक बनाया गया है। अंदर का दरवाज़ा सामने रसोई की ओर खुलता है, जिसके ठीक बगल में एक बेहद परिष्कृत ड्राईंग रूम है। पिस्ते रंग की कालीन पर चमकती हुई बादामी रंग की मेज़ अखरोट की लकड़ी की बनी है। कहीं कुछ भी आउट ऑफ प्लेस नहीं है - कोई रंग, कोई सामान, कोई फर्नीचर, कोई तस्वीर नहीं... सब तरतीब में, ऐसे जैसे हर चीज़ एक-दूसरे के लिए बने हों। ये और बात है कि ऐसी तरतीबी में मेरा दम घुटता है।

रसोई की दूसरी तरफ़ हमाम है, वो कमरा जो असली बैठक है। कश्मीर की ठंड में हमाम के बिना घरों में गुज़ारा नहीं हो सकता। सबा बताती है, इस कमरे में नीचे एक खोखली जगह है जहां लकड़ियां जलाकर रखी जाती हैं। उसी गर्मी से ये कमरा बर्फीले दिनों में भी गर्म रहता है। कश्मीर में बिजली ना के बराबर होती है, और ऐसे में रूम हीटरों का ख़्याल भी बेमानी है। हमाम से लगी हुई टंकी है - ख़ज़ान - गर्म पानी इसी तांबे की टंकी में जमा होता है। ये कमरा मेरे मन लायक है। फर्श पर बिछी ऊनी कालीन, कालीन पर इधर-उधर रखे हुए रंग-बिरंगे मसनद और यहां-वहां बिखरे ग्रेटर कश्मीर, कश्मीर टाईम्स और एक उर्दू अख़बार के पन्ने।


हमारे कमरे ऊपर की ओर हैं। ज़ीने पर आते ही फिर तरतीबी। सीढ़ियों पर रखे अखरोट की लड़की के छोटे-छोटे शोपीस, चिनार के पत्तों और कलम-गुलाब के डिज़ाईन वाले पेपरमैशे आईटम्स, दीवारों पर लगी कश्मीर की ब्लैक एंड व्हाईट तस्वीरें... सब परफेक्ट। सबसे पहला कमरा गेस्ट रूम है। मेरा सामान यहां रख दिया गया है। कमरे में दो सिंगल फुतॉन हैं और फ्रेंच विंडो पर पड़ी चिनार की पत्तियों की कढ़ाईवाले पर्दे हटाने के बाद सामने लॉन की ओर खुलती हैं। पीछे की खिड़की से दूर-दूर तक पसरे धान के खेत नज़र आते हैं, और उनसे थोड़ी दूर हटकर कुछ पहाड़ियां।
मेरे कमरे की खिड़की का नज़ारा


गेस्ट रूम मेज़नाईन फ्लोर पर है और वहां से निकलकर ऊपर की ओर तीन और कमरे हैं - पहला मास्टर बेडरूम और दो और कमरे - सबा और हफ्सा, दोनों बहनों के। सब सलीके से रखा हुआ है। कहीं कुछ अतिरिक्त नहीं, कुछ एक्स्ट्रा नहीं। अपनी रूममेट के क्लेलीनेस मेनियैक होने का राज़ अब समझ में आया है। शाम को मम्मी से फोन पर बात करते हुए मैंने हंसकर कहा है उनसे, "इस घर में इतनी सफाई है कि फर्श से अंगूर उठाकर खा सकते हैं आप!" मम्मी को शायद थोड़ी तसल्ली हुई है, लेकिन फिर भी खाना तो मुझे चीनी मिट्टी की उन्हीं प्लेटों में मिलेगा जिनमें नॉन-वेज सर्व होता है। मम्मी की इस बात का मैं कोई जवाब नहीं देना चाहती। मम्मी के लिए अंडा छू गया बर्तन तक 'करवाईन' होता है - अशुद्ध, निरामिष।

वैसे अब्बास, यहां का ख़ानसामा हैरान है कि मैं सिर्फ और सिर्फ वेजिटेरियन खाना खाऊंगी। "ऐसे कैसे? मेहमान को हम बिना गोश्त के खाना कैसे परोसेंगे? राजमा और हाक साग?"

"तो पनीर बना दीजिए ना अब्बास।" एक शाकाहारी के लिए उत्कृष्ट भोजन की यही पराकाष्ठा है।

खाना खाने के बाद हम श्रीनगर घूमने निकल गए हैं - तीन लड़कियां, एक लाल बत्ती, एक ड्राईवर और एक बॉडीगार्ड, और पीछे एक एस्कॉर्ट गाड़ी। हमीद बहनों की भुनभुनाहट जारी है... हम खुद भी तो अपनी गाड़ी लेकर जा सकते थे। ताम-झाम मतलब एटेन्शन। लेकिन उनकी चलती नहीं और सफेद गाड़ी निकल चलती है। हमें बीएसएनएल नंबर भी थमा दिया गया है। कश्मीर में निजी ऑपरेटरों की सर्विस नहीं है।

सड़क-गलियां-लाल चौक-बुलेवर्ड-डल का किनारा-चश्मे शाही-चश्मे-साहिबा और फिर परी महल। यहां-वहां दिखाई देने वाले बंकरों के बीच हम तीन लड़कियां हैं परी महल में, कभी इस सीढ़ी कभी उस सीढ़ी फुदकती हुई। फिर एक ऊंची जगह पर खड़ी होकर दोनों कश्मीरी लड़कियां मुझे डल, गोल्फ कोर्स, गर्वनर का घर वगैरह वगैरह दिखा रही हैं।

परी महल और परियों के मन के इर्द-गिर्द कंटीले तार
हम चश्मे-शाही पर भी रुके हैं थोड़ी देर। चश्मे-शाही का पानी इतना ही मीठा है कि यहां से नेहरू-गांधी परिवार के लिए पानी ख़ास तौर पर दिल्ली भिजवाया जाता था, हर रोज़। अभी-अभी बड़े-बड़े साहबों के अर्दली चश्मों में भरकर ले जाते हैं पानी यहां से। मैंने भी झुककर अंजुरी में पानी भर लिया है। लेकिन प्यास हो तब तो पानी की मिठास की भी कद्र हो। हम तो पहले से ही तृप्त लोग हैं!
निशात बाग़ और डल झील

निशात बाग़ में कभी इस फव्वारे, कभी उस फव्वारे, कभी इस फूल और कभी उस फूल के सामने खड़े होकर कैमरे के लिए पोज़ करते-करते हम तीनों ने शिद्दत से शम्मी कपूर को याद किया है। मुसाफ़िर बदले, ज़रूरतें बदलीं, सदी बदली, लोग बदले, माहौल बदला लेकिन कुदरत ने अपना रूप नहीं बदला।
गोल्फ कोर्स और डल


उस सावन की एक शाम
अब थकने लगी हूं। बाकी बातें कल। हाथ भी दुखने लगा है। वो मशीन कब आएगी जो दिमाग में चल रहे ख़्यालों को उसी तेज़ी से लफ़्ज़ों में रिकॉर्ड करके पन्नों पर उतार दे? अच्छा अब तख़लिया, मेरी डायरी। 





मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

दिल की थोड़ी-सी सुन लूं!

"ना जाने मेरे दिल को क्या हो गया..."

एक गा रहा है, दूसरा बजा रहा है,,, सामने रखी मेज़।

"ये दिल क्या होता है मम्मा?"

"दिल मतलब हार्ट बुद्धू। दिल यहां होता है, धक-धक करता है।"

"मम्मा, इसको बोलो मैं इससे नहीं पूछ रहा। मुंह बंद रखे अपना।"

"मम्मा इसको बोलो मेरा दिल कर रहा है कि मैं बोलूं... तो मैं बोलूंगी।"

"और मेरा दिल कर रहा है मैं इसके बाल खींच लूं।"

दो दिलों की इस जंग में धराशायी मम्मा हुई है। दिल और दिमाग जैसे जुड़वां बच्चों की तरह आद्या और आदित का झगड़ा भी नहीं सुलझता, लेकिन इस बहाने हमने भूले हुए दिल को लेकर भारी-भरकम चर्चाएं की हैं।

"मम्मा, दिल बोल सकता है?"

"बोलता है लेकिन हम सुनते नहीं," मैंने भारी दिल से ये स्वीकार किया है। मैं ही कहां सुन पाती हूं अपने दिल की? अक्ल आड़े आ जाती है। दिल तो बर्गलाता है। लीक से हटकर चलने को उकसाता है। ठोकर खाने के रास्तों पर ले जाता है। मेरी मानो तो ये दिल रात को बिस्तर के नीचे से चुपके से निकलकर थोड़ी देर के लिए जगमगाने वाला एक बेचारा जुगनू ही ठीक, जिसकी दिन की दुनियादारी में ज़रूरत नहीं पड़ती। यूं भी इन दिनों मैं अपने अक्ल के पंजों में हूं।

"मम्मा, शाह रुख़ खान के दिल को क्या हो गया था? हमारे भीतर रहनेवाला दिल खो कैसे जाता है?"

ब्रिलिएंट क्वेश्चन! बच्चों के पेचीदा सवालों के टेढ़े-मेढ़े जवाबों में उलझी हुई मैं अपनी अक्ल का दरवाज़ा खटखटाती हूं। अक्ल ने जवाब दे दिया है। कहती है, दिल का मामला है। दिल से ही पूछ लो! दिल की थोड़ी-सी सुनने के लिए बड़ी मेहनत करनी होती है इन दिनों, फिर भी दिल से पूछती हूं, बच्चों को क्या बताऊं कि दिल खो कैसे जाता है।

मैं तो बात-बात पर दिल को भुला दिया करती हूं! भूले हुए दिल की गुहार लगाने में शर्म आती है अब। मगर बच्चों ने भूले हुए दिल के बारे में पूछ कर उसकी ओर देखने को मजबूर किया है। पूछती हूं दिल से, दिल की करने देना और दिल की सुनना सिखाना तो आसान है, दिल को ये कैसे पता चले कि सही क्या है और गलत क्या?

बच्चों को ज़िन्दगी के ये अहम लाइफ़-स्किल्स सिखाने के बारे में सोचती हूं तो घबरा जाती हूं। यूं लगता है हम तीनों को किसी ऐसे कमरे में बंद कर दिया गया है जहां से बाहर निकलने का राज़ सिर्फ़ मुझे मालूम है और बाहर के रास्तों पर नीम अंधेरा पसरा हुआ है। मैं खुद को टटोलती हूं, अपने दिल से पूछती हूं कि ठीक तो है। शुक्र है कि इस सिहरती ठंड में भी हथेलियों में गर्माहट बाकी है अभी। चलो, दिल का ये मसला साथ मिलकर सुलझाते हैं।

 दरअसल बच्चों, तुम्हारी निश्छलता अभी दिल की आवाज़ों से दोशीज़ा है। लेकिन धीरे-धीरे समझ में आएगा कि इस पूरे जिस्म में एक दिल ही है जिसके ज़ख़्म दिखाई नहीं देते; जो सबसे ज़्यादा तकलीफ़ें बर्दाश्त करते हुए भी उसी शिद्दत से धड़कता रहता है और अपना काम बख़ूबी करता रहता है जिसे सिन्सियरिटी की उससे अपेक्षा होती है। दिल की ठीक-ठीक सुनो तो उसकी सरहदें भी वो खुद ही बताता है। एक दिल है जो दूसरों की तकलीफ़ों से तकलीफ़ज़दा होता है। एक दिल है जो अपने फ़ायदे बटोरते हुए दूसरे के अधिकारों का हनन करने पर कचोटता है। एक दिल है जिसके लिए 'स्व' के दायरे में 'सब' आते हैं। हमें फिर भी दिल पर यकीन करना नहीं सिखाया जाता क्योंकि दिल कमबख़्त दुनियादारी से अलहदा होता है। 

आद्या-आदित, जो पूरी ज़िन्दगी ना समझ सकी, अब तु्म्हें समझाते हुए समझने लगी हूं। आओ बताती हूं कि सही क्या है और गलत क्या, और दिल किसका साथ दे क्योंकि ज़िन्दगी अक्सर दोराहे-चौराहे-बहुराहे पर खड़ी कर दिया करती है हमें। दिल की आवाज़ सुनने की आदत बनी रही तो फ़ैसले लेने में आसानी होती है। दिल अक्सर नए रास्ते दिखाता है, उन सुनसान रास्तों पर दीया जलाता है जहां से कोई नहीं गुज़रता। दिल एहतियातों के खोल उतारकर नसों में नई रवानियां भरने की हिम्मत देता है। और ये भी याद रखना कि सही वक्त पर दिल को साधा नहीं तो दिल खूंखार भी हो जाता है। इसी दिल की आड़ में जो दिल में आए वो करने वाले दूसरों के लिए नफ़रतें बोते-उगाते-काटते हैं। इसी दिल की आड़ में गुनाहों का बाज़ार पनपता है। दिल को साधने का काम रूह करती है और रूह को साधने के लिए असीम साधना चाहिए।

समाज के बनाए हर क़ायदे-कानून को तुम्हारा दिल गवाही दे, ये भी ज़रूरी नहीं। लेकिन बेक़ायदा होकर हैवान हो जाने की छूट भी दिल के नाम पर नहीं दी जा सकती।

तो बच्चों, पूरी ज़िन्दगी एक टाईट रोपवॉक ही समझ लो। हम पेंडुलम की तरह सही और गलत, ग्राह्य और त्याज्य, मान्य और अमान्य के बीच में झूलते रहते हैं और अपनी-अपनी समझ से खुद का संतुलन भी तलाश लेते हैं। संतुलन का कोण ज़रूर बदलता रहता है लेकिन ज़िन्दगी के मूलभूत सिद्धांतों पर फिर भी कोई समझौता नहीं किया जा सकता। एक इंसान के दिल में दूसरों के लिए प्यार और संवेदना और अपने लिए विवेक और हौसला, बस यही चार चीज़ें बची रहनी चाहिए। बाकी, थोड़ा कम थोड़ा ज़्यादा देर-सबेर दौलत, शोहरत और ऐसी ग़ैर-ज़रूरी चीज़ें सबको एक ना एक दिन मिल ही जाती हैं। दिल भी ताउम्र खोया और पाया के गीत गुनगुनाता हुआ फ़िट रहता है और एक दिन तमाम दुनियादारियों के बीच दिल दरवेश हो जाता है।

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

तुम काबिल हो, काबिल-ए-तारीफ़ हो

बेहद बेतकल्लुफ़ी वाली शाम थी वो... एक हल्की-सी सर्दी वाली शाम कि जब माहौल का तक़ाज़ा होता है उम्र और अनुभव के अंतर को भुलाकर उस बेतक़ल्लुफ़ी, उस अनौपचारिकता की रौ में बहते हुए वो कहना और सुनना, जो कभी कहा नहीं... या जिसपर हम कभी चर्चा करते नहीं। उस बेहद उम्दा लेखक और कवि ने ये बताते हुए कि मुझसे पाला कैसे पड़ा, मेरे ब्लॉग की चर्चा की और कहा, "ब्लॉग पढ़ा तो लगा, लड़की तो काबिल है!"

मुझे खुश होना चाहिए था, इसे कॉम्प्लिमेंट की तरह लेना चाहिए था, और देर तक मन-ही-मन इस बात पर इतराना चाहिए था... लेकिन जाने क्यों मैं बहुत भीतर तक उदास हो गई थी। अगले कई घंटों तक मैं इस बारे में सोचती रही थी, कि मैं इस बात को लेकर इतनी परेशान क्यों हूं, और इतनी उदास क्यों। किसी को काबिल कहना गाली थोड़े ना होती है?

पिछले कुछ दिनों में अपने बीमार बेटे के सिरहाने बैठे हुए मुझे उस उदासी का सबब समझ में आया है। ये समझ आया है कि काबिलियत अभिशाप क्यों बन जाती है कभी-कभी।

***

सुबह मैं फिर भी अपने लिए थोड़ा-सा वक्त निकालकर पीठ की मरम्मती के लिए अपनी फिज़ियोथेरेपिस्ट और योगा इंस्ट्रक्टर के पास चली आई हूं। वो ट्रैक्शन मुझे दे रही हैं, लेकिन बात बगल वाले बिस्तर पर लेटी शालिनी से कर रही हैं।

शालिनी ग़ज़ब की ख़ूबसूरत है। मुझे हाल ही में पता चला कि वो फै़शन डिज़ाईनर और कोरियोग्राफर रही है। थी, अब नहीं है। अब सिर्फ़ एक बीवी, एक मां है। पति को दफ़्तर भेजने, बाई के आने और बच्चों को स्कूल से लाने के बीच का समय अपने सुनहरे दिनों का मातम मनाते हुए काटती है।

हमारी 67 साल की इंस्ट्रक्टर मेरी पीठ की मालिश करते हुए उसके कुचले हुए आत्मविश्वास पर मरहम लगा रही हैं।

"हम औरतें ग़ज़ब की एडैप्टेबल होती हैं, हर हालत में अपने लिए रास्ता बना लेती हैं। तुम चाहोगी तो अपने लिए रास्ता निकाल ही लोगी कुछ ना कुछ। और फिर शिकायत किससे है? ये सब तुमपर थोपा तो नहीं गया था? या तो समझौते करना सीखो, खुश होकर हर हाल में ज़िन्दगी जियो; या फिर तुम्हारे वजूद पर आ पड़ी है तब अपने हालात बदलो। इन दोनों स्थितियों में शिकायतें फिर भी ऐक्सेपटेबल नहीं है।"

फिर रुककर मिसेज सिंह कहती हैं, "कभी पूछना ख़ुद से ईमानदारी से... तुम एम्बिशस तो नहीं हो रही?"

हो सकता है दर्द स्लिप्ड डिस्क का ही रहा हो, लेकिन उसके चेहरे पर मैं कुछ और पसरते हुए देखती हूं।

***

बालकनी में उल्टियां किए हुई बेडशीट्स को धोकर, निचोड़कर, झाड़कर पसारते हुए सामने वाले अपार्टमेंट की शिखा से नज़रें मिलती हैं। हम एक-दूसरे को देखकर हाथ हिला देते हैं। वो भी ऐसी ठंड में चादर ही धोकर पसार रही है।

शिखा ने मैथ्स में एम.एससी. किया है, और एम.एड. भी। हो सकता है मुझे गलत याद हो, लेकिन शायद उसने यही बताया था कि जीबी पंत यूनिवर्सिटी में टॉप किया था उसने। उसका बेटा मेरे बच्चों से ठीक एक दिन बड़ा है। एक लकवाग्रस्त सास और एक बेहद बूढ़ी ननिया सास की देखभाल करने के बाद जो वक्त मिलता है, शिखा उस वक्त में खाना बनाती है, पांच दिन पति को अलग-अलग किस्म का लंच पैक करके देती है, बच्चे को स्कूल छोड़ने और लाने जाती है, उसे कराटे सिखाने ले जाती है और बीच में सब्ज़ियां, दूध और राशन भी ले आती है। बाकी समय कपड़े धोने और वहीं बालकनी में बैठकर बेटे को होमवर्क कराने में निकलता है।

मैं आठ सालों में कुल तीन बार उसके घर गई हूं, दसियों बार बुलाने के बाद। उसके घर का भारीपन मुझे बेचैन कर देता है।

रात-रातभर जागकर जब उसने इम्तिहानों की तैयारी की होगी तो ऐसी ही किसी ज़िन्दगी का ख़्वाब देखा होगा? वो किसे दोष दे? उसकी काबिलियत का क्या मोल है?

***

रुचि आर्टिस्ट है। थी। है नहीं। उसकी जागरूकता, वाक्पटुता और प्रेज़ेन्स ऑफ माइंड मुझे हैरान करता है। हर मुद्दे पर वो स्पष्ट राय रखती है और किसी बहस में उसकी तर्कशक्ति कई बार हैरान करती है। हर बार सोचती हूं, अपनी बेटियों को पढ़ाते हुए ये औरत खुद कितना पढ़ती होगी!

लेकिन रुचि फिर भी वो आर्टिस्ट थी जो अब नहीं है। उसकी कलात्मकता घर के बजट का टाईटरोप वॉक है। उसने अपनी बेचैनी को बड़ी सलीके से बांध रखा है। उसमें ग़ज़ब का ठहराव है। लेकिन उस ठहरी हुई झील के ऊपर अक्सर कोई-ना-कोई कंकड़ फेंक जाता है, इतनी काबिल हो तो कुछ क्रिएटिव क्यों नहीं करती? जो काबिलियत इस्तेमाल में ना आए, उसका क्या मोल?


***

उर्मिला को मैं सोलह सालों से जानती हूं - कॉलेज में थी तब से। अपने रहन-सहन की बेतरतीबी को वो अपनी सलीकेदार पढाई-लिखाई और काम से ढंकती रही है। गृहस्थी ने उसे आखिरकार घर भी सलीके से रखना सिखा ही दिया। जिस उर्मिला से हमें अव्वल दर्ज़े की पब्लिशर बनने की उम्मीद थी, वो धीरे से मुझसे कहती है, "इट्स अ टफ़ बैटल दैट वी आर फाइटिंग।" है ही। दो नावों पर सवार होना, एक ख़्वाब देखना और एक हकीक़त जीना... दोनों फ़ैसले तेरे ही तो थे। फिर भी, तू काबिल है उर्मिला। कोई ना कोई रास्ता बना ही लेगी। ज़िन्दगी की जंग में रोज़-रोज़ के एम्बुश को कोई याद नहीं रखता, तू भी भूल जाएगी।

***

बच्चों को वक्त पर दवा देते हुए... बिस्तर पर बैठे हुए उनका होमवर्क कराते हुए... मटर-पनीर बनाते हुए... अपना हाथ जलाते हुए... वॉशिंग मशीन चलाते हुए... आलू छीलते-छीलते लफ्ज़ों की तरतबी समझने की कोशिश करते हुए... डस्टिंग करते-करते कई काबिल लड़कियों और औरतों को याद करते हुए मैं सोचती हूं कि काबिलियत भी शायद हालात का शिकार होती है। काबिलियत पर हमारा नेकदिल होना, हमारा दूसरों के बारे में सोचते जाना, घर-संसार सलीके से बचाए रखने के लिए खुद को तोड़ते जाना भारी पड़ जाता है।

इसलिए सोचती हूं, मैं काबिल होऊं या ना होऊं, काबिल-ए-तारीफ़ ज़रूर हूं। मैं काबिल इसलिए नहीं कि चार आड़े-तिरछे शब्दों को सलीके से रखने का हुनर आता है। मैं और रुचि, शिखा और उर्मिला, शालिनी और मिसेज सिंह... सब काबिल इसलिए हैं क्योंकि हमने घर और बाहर का, ख्वाब और हकीक़त का, रंग और खुशबू का, सब्र और हिम्मत का संतुलन साधना सीख लिया है। हम घर भी बचाए हुए हैं, अपने ख्वाबों को भी मरने नहीं दिया है अभी। मुझे अपनी दोस्त वर्षा मिर्ज़ा का कहा याद किया है, "उम्मीद अभी ज़िंदा है क्योंकि संवेदनाओं से भरा ये मन ज़िंदा है अभी।"

ये लिखते हुए कहीं भीतर तक धंसी हुई तवील उदासी छंट गई है और इस भीड़ में देर से ही सही, अपने लौट आने की उम्मीद रौशन हुई है कहीं।   


 पोस्टस्क्रिप्ट: ये पोस्ट लिखते-लिखते मेरे इन्बॉक्स में एक अटैचमेंट आया - दो महीने पुरानी एक तस्वीर, जिसमें मेरी जैसी कुछ और काबिल औरतें हैं और एक वर्कशॉप में हिस्सा लेने आई थीं... बाएं से अनु जैन, जो दो बच्चों की मां है और जब कहानियां सुनाती हैं तो हम तालियां बजा-बजाकर उसका मज़ा लेते हैं; जिमली बोरा जो प्रोफेशनल फोटोग्राफर है और जब बच्चों से फुर्सत में होती है तो रेकी हीलिंग देती हैं, अंग्रेज़ी की बेहद उम्दा कवयित्री हैं; योर्स ट्रूली; अलका शर्मा, जिसकी आवाज़ आपके बच्चे छोटा भीम और डोरेमॉन समेत कई कार्टून कार्यक्रमों में सुनते होंगे; मिसेज़ अनूपा लाल जिन्होंने तकरीबन पच्चीस किताबों का अनुवाद किया है और मशहूर चिल्ड्रेन्स राईटर हैं; और गुल, जो प्रोफेशनल स्टोरीटेलर हैं, कहीं भी पांच-सात बच्चों को बिठाकर कहानियां सुनाना शुरू करना इनका प्रिय शगल है और इनके हाथ का खाना खाकर वाकई उंगलियां चबाने का मन करता है। काबिल औरतें, जिनकी काबिलियत एक-ना-एक दिन अपना मुकाम पाएगी। ढेर सारा मुस्कुराते हुए ये तस्वीर मैं यहां लगा रही हूं। 

शनिवार, 8 दिसंबर 2012

ये रुत इस बरस भी अकारथ जाएगी

सब खोद डालो, जो ख़्वाब रोपे थे
उखाड़ दो बिना जल के सूखती तुलसी
नोच लो गुलदाऊदी की बेआब क्यारी
टहनियों पर भी मत छोड़ो
चमेली कोई एक बिलखती-सी
कि अब के बेनूर रहेगा बाग़ उम्मीदों का
ये रुत इस बरस भी अकारथ जाएगी।

मैं सख़्त ज़मीन पर चलता हूं
उड़ते फिरना नहीं है फ़ितरत में
उम्र ने दी है जो हिस्से में समझ
उसके दम पर ही मैं ये कहता हूं
देखो, हवा का रुख़ देखो
बर्फ में दबकर कहां कुछ बचता है? 
क्यों ज़ाया करोगी अपनी मेहनत
वही मिलता है, जो वो बख़्शता है
मत उलझो अपनी इन लकीरों से
नहीं काम आएगी ये अज़्म-ओ-हिम्मत
चमन को जो लिखी हो बर्बादी
तुम कहां उसे बचा पाओगी? 
  
फिर भी जानता हूं, बड़ी ज़िद्दी हो
अगले साल फिर से चली आओगी
क्यारियां फिर से तुम बनाओगी
बीज भी कहीं से लाओगी
फिर सींचोगी आंसुओं से उनको
फूल तुम ज़रूर लगाओगी
फिर एक दिन शायद ऐसा होगा
पहाड़ पर फ़र्श-ए-गुल तुम बिछाओगी
साल-दर-साल की तुम्हारी दिल्लगी
एक दिन मेरी वाबस्तगी बन जाएगी।