रविवार, 17 अगस्त 2014

चले हैं दूर हम दीवाने... और मैं घुमन्तू!

सुबह-सुबह उठकर मुझे योगा करना चाहिए। टहलना चाहिए। अपने मोटापे को कम करने के तरीके ढूंढने चाहिए।

लेकिन सुबह-सुबह उठकर मैं कर क्या रही हूँ? गूगल पर पहाड़ों और पहाड़ी शहरों के नाम-पते ढूंढ रही हूं, कि जहाँ जाकर फ़ितूरी मन का चैन ढूंढा जा सके। आईआरसीटीसी पर टिकटें हैं, और छोटे-छोटे होमस्टे की कीमतें इतनी ही हैं कि अपने और अपने बच्चों के लिए ज़िन्दगी की थोड़ी-सी कामचलाऊ सहूलियतें और बहुत-सारी तस्वीरें, अल्फ़ाज़ी तस्वीरें, बिंब, प्रतीक, उपमाएं और ज़िन्दगी के ख़ूबसूरत होने का यकीन खरीद सकूं।


ये मेरी सबसे बड़ी फैंटेसी थी कि किसी दिन गाड़ी में बैठकर पूरा देश धांग मारूंगी। ये मेरा सबसे बड़ा ख़्वाब था - अब भी है - कि डायरी में नई जगहों, नए लोगों के नाम-पते होंगे। मैं हर सुबह किसी नए गांव, किसी नए शहर में उठूंगी और हर शाम शफ़क़ पर गिरते रंगों पर लिखी जानेवाली कविताओं और अफ़सानों की चिंदियाँ उसी गांव, उसी शहर में उड़ा आऊंगी।

मुझे घुमंतू पहाड़ों ने बनाया। दरअसल ईमानदारी से कहूं तो मैं घुमन्तू तो हूँ भी नहीं। गुमां पाल रखा है बस, घुमंतू होने का। याद नहीं कि सड़कों से, और रास्तों से कब प्यार हो गया था। जब से मुझे याद है, मुझे बेमतलब घूमना अच्छा लगता था। हम छोटे थे तो हमारे रास्ते भी बहुत छोटे हुए करते थे। बहुत हुआ तो रांची से ओरमांझी, गुमला, खूंटी, तोरपा, चांडिल, घाटशिला। थोड़े और खुश हुए तो रांची से पटना, सिवान। थोड़े और खुश हो गए तो जमशेदपुर, कोलकाता, पुरी, भुवनेश्वर। 


खुशियों का दायरा इतना सा ही था, लेकिन हर बार खाली सड़क पर, खुले आसमान के नीचे, दरख़्तों की छांव के बीच से, उगती-कटती फ़सलों से होकर अजान गांवों, कस्बों, शहरों की जो तस्वीरें चलती हुई गाड़ी से फास्ट-फॉरवर्ड मोशन में गुज़रतीं, उन्हीं से ज़ेहन में कल्पनाओं के रंग भरे जाते। सड़कों पर होना, रास्तों पर होना मेरे लिए अपने निज के सबसे करीब होने की तरह होता था, एक किस्म के मेडिटेशन की तरह। बचपन से।

फौज में रहे मेरे नानाजी अक्सर कहा करते थे, “यात्रा का मतलब ही है कष्टों की शुरुआत।“ मुझे उन कष्टों से मोहब्बत थी। सहूलियतें और आसानियां, ठहराव और स्टेटस को मुझे बहुत दुखी और परेशान करती हैं। मेरा फ़लसफ़ा ही है कि जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह-ओ-शाम...

नानी जी की बात समझ में आती है क्योंकि वे जिस पीढ़ी के थे, उस पीढ़ी के लिए गांव की सरहदें पार करना दुश्वार हुआ करता था। शहर के लिए सुबह चार बजे की इकलौती ट्रेन दस-बारह किलोमीटर दूर दरौंदा स्टेशन से जाया करती, जिसको पकड़ लेना वर्जिश से कम नहीं था। फुटबोर्ड पर अख़बार बिछाकर बैठने में कोई शर्म नहीं थी। दूसरे दर्जे में रिज़र्वेशन लेकर चढ़ना संपन्नता का प्रतीक माना जाता था।

फिर उनके बाद की पीढ़ी नौकरी और बेहतर ज़िन्दगी की तलाश में शहर आकर बसने लगी। यात्रा का मतलब हर साल शहर से गांव लौटना होता था। गर्मी छुट्टियों में घूमना 'घर जाना' होता था। हम भी कई सालों तक 'घर' गए - रांची से सिवान होते हुए अपने गांव मोरवन, और अपनी ननिहाल मुबारकपुर।

दुनिया इतनी-सी ही थी। घूमना इतना-सा ही था। बाबा थोड़े घुमक्कड़ थे, इसलिए पिकनिक के नाम पर पुरी तक जा आए थे हमलोग। पापा बहुत बड़े घुमक्कड़ थे, लेकिन पूरी ज़िन्दगी जंगलों और गांवों में अकेले घूमते रहे। कुछ पेशे की मजबूरी थी, और कुछ फ़ितरत की। और कुछ ये भी डर रहा होगा कि सुकुमार बच्चे मलेरिया के मच्छर झेल पाएंगे या नहीं।

मैं जिस पीढ़ी की हूं, उसका अपना कोई गांव, कोई शहर नहीं है। गांव और शहर - घर - के नाम पर जो भी बचा-खुचा रह गया है, वो नोस्टालजिया में जाकर बस गया है। मैं जिस पीढ़ी की हूं, वो जड़ों से उखड़ी हुई पीढ़ी है। उसे किसी गांव, किसी शहर से कोई ख़ास लगाव नहीं। हमारे लिए घर वहां बसता जहां मां-बाप की पोस्टिंग होती। घर और पते, शहर और गांव अक्सर बदलते रहे।

इसलिए पूरी दुनिया हमारा घर थी, और कहीं किसी मोड़ पर चार कदम से थोड़ी सी ही और दूर साथ चल लेने वाला हमराही हमारे लिए हमारे परिवार का सदस्य बन जाता था। हमने घर महानगरों में बनाया, कटवारिया सराय की किसी बरसाती में, मुंबई के चार बंगला में किसी वन-रूम फ्लैट की पीजी में। हमारे लिए दुख-सुख में साथ रहनेवाले हमारे रूममेट्स, हमारे दोस्त थे। हमारे लिए परिवार का मतलब भी वही थी, और उन्हीं दोस्तों से हमारे बच्चे अब मामा-मौसी-बुआ-चाचा का रिश्ता निभा रहे हैं।

मुझे ठीक-ठीक याद है कि मैंने अकेले घूमना कब शुरु कर दिया था। वो ज़िन्दगी की उदासियों और नाकामियों से बचने के लिए ढूंढे जानेवाले रास्तों के दिन थे। घुमक्कड़ी के मेरे शौक (और मेरी मजबूरी) को कम उम्र में हाथ आ जाने वाली ढेर सारी सैलरी ने हवा दे दी। पांच दिन हम जम कर मेहनत किया करते और बाकी के दो दिन आस-पास के पहाड़ों की खाक छानने में गुज़ारते।

मैं कभी अकेले घूमती, कभी अपने जैसी पागल दोस्तों के साथ घूमती। उस अजनबी ग्रुप के साथ घूमती जिसे ट्रेकिंग का शौक था, और जिससे दोस्ती हो जाने की कई वजहें हुआ करती थी। पता नहीं कब ऐसा हो गया कि अपने वजूद में मौजूद घर से लगाव को नई-नई जगहों को देखने के रोमांच ने रिप्लेस कर दिया।
वो घुमक्कड़ी अलग किस्म की थी। ट्रेन के स्लीपर क्लास में बैठकर नए शहरों की तलाश, शहर में कैंपनुमा ठिकानों की खोज और पैदल या रिक्शे या तांगे पर बैठकर नई गलियों की खोज। सफ़र करने का मतलब दस-बारह किलोमीटर ट्रेक करके किसी दुरूह पहाड़ी की बर्फीली चोटी देख आना होता था, सफ़र करने का मतलब अंधेरे जंगलों में ट्रेकिंग और रियल ट्रेज़र-हंट, रॉक-क्लाइम्बिंग, रैपलिंग, कयाकिंग, बोटिंग जैसी फिज़िकल और बेहद थका देनेवाली एक्टिविटिज़ होतीं। 


सफ़र करने का मतलब कम बजट में मिलनेवाला ढेर सारा थ्रिल होता। सफ़र करने का मतलब अजमेर शरीफ़ की दरगाह पर अकेले बैठकर कव्वाली सुनना होता, श्रीनगर के लाल चौक पर खड़े होकर जली हुई इमारतों से झांकती खिड़कियों के पीछे की ज़िन्दगियों की कल्पना करना होता। 

ऐसे खूब घुमक्कड़ी की मैंने। खूब दोस्त बनाए। वेलेंक्कनी चर्च के बाहर मिल गई स्टीफेन आंटी को सालों तक ख़त लिखे, मुक्तेश्वर के पास के एक गांव में प्रकाश के घर खाए राजमा-चावल का स्वाद महीनों तक याद रखा। बुरूस के सूखे फूलों और गोआ की रेत को छोट-छोटे बक्सों में बचाए रखा। 


ऐसा नहीं कि सिर्फ मधुर स्मृतियों ही मिलीं, लेकिन रास्ते में मिलनेवाली चुनौतियों और लोगों की हैरानी भरी नज़रों को अनदेखा करना कम उम्र में ही सीख लिया। मेरी घुमक्कड़ी ने मुझे आज़ाद बनाया और वो हिम्मत दी जो एक मध्यवर्गीय परिवार की छोटे शहर की लड़की को आमतौर पर संस्कारों में नहीं दिया जाता।

फिर शादी और जीवन साथी ने घुमक्कड़ी थोड़ी सोफिस्टिकेटेड कर दी। बिना किसी प्लानिंग के दो कदम न चलने वाले पति घूमने भी जाते तो पूरी तैयारी के साथ। अच्छे रिसॉर्ट में रहना, अच्छा खाना और ढंग की गाड़ी। मेरी किसी आउटडोर एक्टिविटी और नई-नई जगहों को देख लेने के शौक में उनकी दिलचस्पी नहीं थी। हममें एक ही चीज़ कॉमन थी, हम खूब पैदल चलते थे, हालांकि हमारी चाल, रास्ते और मंज़िल तीनों अलग-अलग होते।धीरे-धीरे हमने एक-दूसरे की घुमक्कड़ी के तरीकों के साथ समझौता करना सीख लिया, और अलग-अलग घूमने की वजहें और मौके तलाशने लगे - बिना किसी दुविधा या शिकायत के, बहुत सारी आपसी समझ और हामियों के साथ।

बच्चों ने मेरी घुमक्कड़ी को एक नया आयाम दिया है। छोटे बच्चों को लेकर भी मैं ख़ूब घूमी हूं। साथ में बारह-चौदह बोतलें, एक छोटा स्टेरेलाइज़र, सेरेलैक और दूध का डिब्बा, गर्म पानी की थर्मस, डायपर्स, बेबी वाइप्स और पुराने अख़बार होते। और साथ में कोई एक सहयात्री, जो पति से लेकर बच्चों के नाना-नानी, दादी-दादी और उनकी आया तक में से कोई भी हो सकता था।

बच्चे बड़े हो गए हैं और घुमक्कड़ी और बढ़ गई है। पहले थ्रिल मकसद था, अब बच्चों को देश-दुनिया दिखाना है। लोग दो बच्चों के साथ सफ़र पर निकली एक मां को देखकर अभी भी हैरान होते हैं। लेकिन उनकी इस हैरानी को मैं अपनी उपलब्धि ही मानती हूं। मैं और बच्चे सफ़र पर अपने मनमुताबिक साथी भी खोज लेते हैं – कोई हमउम्र दोस्त, कोई हमउम्र मां, कोई भलमानस ऑटोवाला, कोई अच्छा रिसॉर्ट मैनेजर...


मुझे इस बात का पक्का यकीन है कि हम सफ़र पर ही अपने असली रूप में होते हैं, बिना किसी दिखावे और मिलावट के। हमारा सब्र, हमारा असली स्वभाव और हमारी अनुकूलनशीलता का पता दरअसल सफ़र पर ही चलता है। जब हम घूम रहे होते हैं तो हम आंखें खुली रखते हैं और सफ़र ज़िन्दगी को लेकर हमारे कई मुगालते दूर करता है, हमें बेहतर इंसान बनाता है।
 

सफ़र करना हमें अपने इन्सटिन्क्ट पर, हमारे सिक्स्थ सेंस पर हमें भरोसा करना सिखाता है। सफ़र हमें दूसरों पर, यूनिवर्स की अदृश्य ताकतों पर भी यकीन करना सिखाता है। मैं नहीं जानती कि बड़े होने पर बच्चों के लिए घर लौटने का मतलब क्या होगा। मैं ये ज़रूर जानती हूं कि उनके लिए घुमक्ड़ी और सफ़र का मतलब ढेर सारी हैरत, हिम्मत, धैर्य और बाहर की दुनिया को खुद में आत्मसात करने की ताक़त होगा।

कुछ भी कर सकने का मेरा ये जज्बा मेरी घुमक्कड़ी की देन है, और अगर कोई दो चीज़ें हों जो मैं अपने बच्चों को दे सकूं तो वो घुमक्कड़ी का शौक और ये जज्बा है। 


In other news, घुमंतू मां की प्लानिंग पूरी हो गई है। हम अगस्त का एक वीकेंड हिमाचल के एक छोटे से पहाड़ पर, सितंबर का एक वीकेंड उत्तरांचल के एक छोटे से पहाड़ पर, अक्टूबर का एक वीकेंड पूर्णिया और दूसरा वीकेंड सिवान में, नवंबर का एक वीकेंड रामेश्वरम और पॉन्डिचेरी में और दिसंबर की छुट्टियां बंगाल और उड़ीसा में काटने की ख़्वाहिश रखते हैं।

डियर यूनिवर्स, हमारी इन ख़्वाहिशों को आपकी डायरी में दर्ज किया जाए!

वैसे एक और फैंटेसी भी है - ज़मीर फ़िल्म में अमिताभ बच्चन के स्टाईल में गिटार लेकर घूमते हुए गाना - 


चले हैं दूर हम दीवाने 
कोई रसीला सा, बांका सजीला सा यार मिले तो रुक जाएं 

ध्यान से सुनिए तो साहिर लुधियानवी के बोलों के मानी घुमक्कड़ी के सबसे दिलचस्प फ़लसफ़े के कम नहीं। 

गुरुवार, 14 अगस्त 2014

बराबरी के जश्न का त्यौहार बने रक्षा-बंधन

रक्षा बंधन से जुड़ी कई यादें हैं। उनमें से सबसे ख़ास है माँ के हाथ की दाल भरकर बनाई हुई पूड़ियाँ और खीर जो राखी बांधने के कार्यक्रम के बाद खाने को मिलती थी। इसके अलावा हथेली पर धर दिए जाने वाले वे पैसे भी ख़ास होते थे जो राखी के नाम पर हम बहनों को मिला करते थे। पूड़ियों और खीर पर कभी झगड़ा नहीं होता था, पैसों पर ज़रूर होता था। मेरे दोनों छोटे भाई कई सालों तक इस बात पर मुँह फुलाते रहे कि एक धागा बाँधने के नाम पर पैसे सिर्फ़ दीदी को मिलते हैं। अगर ऐसा ही है तो हम भी दीदी को राखी क्यों नहीं बाँध देते? बचपन की वो नासमझी अब बड़े होने पर तार्किक लगती है। बात पैसों की नहीं थी, बात उस बंधन की - उस वायदे की थी जो रक्षा बंधन के हवाले से भाई-बहन एक-दूसरे को करते हैं। बहन अगर भाई को दुआओं में याद रखने की कसम खाती है तो भाई बहन की हर हाल में रक्षा करने का वायदा करता है। राखी अगर रक्षा का वो बंधन, वो वायदा है जो एक भाई की कलाई पर बाँधते हुए बहन उससे लेती है, तो यही काम तो अब बहनें भी करने लगी हैं भाईयों की ख़ातिर। इसलिए पिछले दो सालों से हमारे घर में राखी बाँधने की परंपरा बदल गई, और इसकी शुरुआत की मेरे भाई ने। अब सिर्फ़ बहनें ही भाईयों को राखी नहीं बाँधतीं, बल्कि भाई भी बहनों की कलाई पर राखी बाँधते हैं, और बहनें भी एक-दूसरे को राखी-सूत्र बाँधती हैं। सुनकर अजीब लगता है, लेकिन इस बदली हुई परंपरा के पीछे कई वजहें, ज़िन्दगी के दिए हुए कई तजुर्बे हैं।   

रक्षा बंधन का त्यौहार दुनिया भर की बहनों की तरह मेरे लिए भी बहुत ख़ास है। इसलिए भी क्योंकि इस एक दिन हम उस एक रिश्ते का जश्न मनाते हैं जो परिवार की धुरी होता है। भाई और बहन (या बहन और बहन) का रिश्ता सिर्फ़ एक नहीं, कई परिवारों को जोड़ता है। सबसे पहले तो उस परिवार को, जिसमें दोनों पैदा हुए हैं। फिर उन परिवारों को, जो वे बसाते हैं। भाई और बहन के रिश्ते की नींव मज़बूत हो तो धीरे-धीरे उनके इर्द-गिर्द बनते और रिश्तों की दीवारें अपने-आप मज़बूत होने लगती हैं और रिश्तों को मज़बूत करने का काम सिर्फ़ रक्षा बंधन के बहाने नहीं होता। रिश्तों को मज़बूत करने की ज़िम्मेदारी जितनी बहन की होती है, उतनी ही भाई की भी होती है। 

दरअसल अब भाई और बहन के रिश्ते में - बल्कि परिवार में भी - ज़िम्मेदारियों की परिभाषाएँ बदलने लगी हैं। आज से कुछ साल पहले तक बेटे से उम्मीद की जाती थी कि वो परिवार की तमाम ज़िम्मेदारियाँ संभाले। बेटियों को पराया धन मानते हुए उन्हें ब्याह दिया जाना परिवार का इकलौता मकसद होता था। ससुराल से मायके आई बेटी को अतिथि समझा जाता था और बेटी के पति पाहुन होते थे - मेहमान। लेकिन पिछले कुछ सालों में हिंदुस्तानी समाज की ये धारणा कुछ ज़रूरत, और कुछ बदलते हुए सामाजिक परिवेश की वजह से बहुत बदली है। बेटियाँ न सिर्फ़ अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं बल्कि परिवार चलाने में, अपने बुज़ुर्ग माँ-बाप की सेवा करने में, अपने छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई-लिखाई और परिवार की तमाम ज़रूरतों को पूरी करने में वैसे ही मशगूल हैं जैसे उनके भाई होते हैं। जब परिवार में बेटियों की जगह और ज़िम्मेदारी बदली है तो रक्षा बंधन जैसे त्यौहार के मौके पर उस बदली हुई जगह और ज़िम्मेदारी को पूरा सम्मान क्यों न दिया जाए?

मेरी निजी राय ये भी है कि रक्षा बंधन को मनाने का तरीका बदलेगा तो बेटियों को इज्ज़त देने का तरीका भी बदलेगा। बहन की बेचारगी से जुड़ी जो दंतकथाएं सुनते हुए हम बड़े हुए, उन्हें बदलकर नई कहानियाँ लिखे जाने की अब सख़्त ज़रूरत है। इन कहानियों की नायिकाएं नरेन्द्र कोहली की जिज्जी जैसे किरदार हों तो कितना अच्छा हो! इन कहानियों में अपने भाई के हक़ के लिए लड़ती बहनों के किरदार हों तो कितना अच्छा हो! इन कहानियों में वैसी बेटियाँ हों तो कितना अच्छा हो कि जिन्हें पिता के प्यार के साथ-साथ उनकी संपत्ति में भी बराबर की हिस्सेदारी मिली। इन कहानियों में अपनी बहनों को स्कूल या कॉलेज भेजने के लिए लड़ते भाई और बहन हों तो कितना अच्छा हो! मेरी नज़र में रक्षा बंधन को नए तरीके से मनाए जाने की ज़रूरत इसलिए भी है क्योंकि समाज में बेटियों को बराबरी का अधिकार तबतक नहीं मिल सकता जबतक हमारी परंपराओं और संस्कारों में उन्हें वो अधिकार न दिया जाए। रक्षा बंधन के मौके पर भाई के हाथ पर राखी बाँधती आज की बहन कमज़ोर और निरीह बिल्कुल नहीं है। उस बहन को रक्षा के झूठे दिखावे की नहीं, बराबर के प्यार और अधिकार की सच्चे वायदे की ज़रूरत है। 

राखी हम अभी भी मनाते हैं और उतने ही प्यार से। लेकिन मुझे ये कहने में बिल्कुल हिचक नहीं कि मेरे भाई मुझसे बेहतर पूड़ियाँ और खीर बनाते हैं और मैं उनसे हथेली पर महंगे तोहफ़े रखने की उम्मीद बिल्कुल नहीं करती। परिवार और रिश्ते वो साझा ज़िम्मेदारी है जो हम सब आपसी समझ से आपस से बड़े प्यार से बाँटते और निभाते हैं। फिर हम सबने एक-दूसरे के हाथों पर राखी के धागे बाँधकर उस रिश्ते और ज़िम्मेदारी को और पुख़्ता बनाने की ओर एक क़दम ही तो बढ़ा लिया है। इसके अलावा, अगर मैं ये कोशिश करती हूँ कि मेरे बेटे और बेटी की परवरिश में मैं कोई अंतर नहीं करूँगी तो उनके दिए गए संस्कारों में, उनके साथ मनाए जा रहे त्यौहारों में ये बात परिलक्षित होनी चाहिए। अबकी साल राखी में जितना संजीदा और ईमानदारी वायदा मैं अपने भाई, अपने बेटे से अपने और अपनी बेटी के लिए लूँगी उतना ही ईमानदार वायदा उनकी ज़रूरतों में, उनके मुश्किल दिनों में, उनकी ज़िम्मेदारियों में उनके साथ खड़े होने का मैं भी करूँगी। अगर अधिकार बराबरी का होगा तो ज़िम्मेदारियाँ भी बराबरी की होंगी। आपकी क्या राय है इस बारे में?  

(१० अगस्त २०१४ को 'प्रभात ख़बर' की पत्रिका 'फ़ैमिली' में प्रकाशित। http://epaper.prabhatkhabar.com/318383/Faimly/Family#dual/2/1)

बुधवार, 13 अगस्त 2014

स्मार्ट फ़ोन के बग़ैर ज़िन्दगी के जलवे

ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं... 

मेरी हथेलियों पर मेरा नोकिया लुमिया सूरजमुखी-सा खिला हुआ था उस दिन। इतवार की सुबह थी, रक्षा बंधन की, और मैं व्हॉट्सऐप्प पर कहीं दूर से आई अपनी तारीफ़ पढ़कर मुस्कुरा रही थी।

फिर पता नहीं क्या हो गया!

तारीफ़ें शायद इस क़दर फ़रेबी और झूठी थीं कि फ़ोन उस गुनाह को झेल न पाया और बेहोश हो बैठा। मैं अक्सर मज़ाक में कहती थी कि मेरा स्मार्टफ़ोन मेरे हाथ में आकर सिर्फ़ सेन्सिटिव रह गया है, स्मार्टनेस का तो अता-पता नहीं है।

कौन जानता था कि मेरा अपना मज़ाक मुझी पर भारी पड़ेगा!

फिर पूरा अट्टा छान मारा। राखियाँ बाँधने-बँधवाने के लिए जाना था फ़रीदाबाद, और वक़्त हाथ से निकलता जा रहा था। लेकिन संडे की उस बेरहम सुबह किसी भलमानस ने मेरे फ़ोन को रिवाईव करने का बीड़ा न उठाया। ज़ाहिर है, कोमा में पड़े मेरे बिचारे फ़ोन ने उस सुबह उम्र से पहले दम तोड़ दिया।    

ये वो सदमा था जिसे बर्दाश्त करना मेरे बस के बाहर की बात हो सकती थी।

अपने फ़ोन को लेकर ओसीडी है मुझे। मैं रास्ते पर चलते-चलते, सब्ज़ियाँ खरीदते-खरीदते, गाड़ी चलाते-चलाते, आधी नींद में सोते-जागते, अस्पताल के बाहर इंतज़ार करते, मेट्रो में शहर के दूसरे छोर जाते, बर्तन और कपड़े धोते-धोते भी फ़ोन चेक करती रहती हूँ। मैं बातचीत का कोई सिरा ज़ाया नहीं होने देती। हर मुमकिन कोशिश करती हूँ कि जवाब दूँ। चाहे उसमें मेरी ऊर्जा का क्षय ही क्यों न हो रहा हो।

जो फ़ोन लाइफ़लाइन था, उस फ़ोन के बिना जी लगता कैसे? फ़ोन का गुज़र जाना किसी प्यार के हमेशा के लिए छूट जाने से कम तकलीफ़देह नहीं था। उस दिन तो बहकी-बहकी परेशान से घूमती रही मैं। लगा कि जैसे कुछ लुट गया है, कुछ छिन गया है।

राखी की तस्वीरें नहीं खींची गईं।

यहाँ से फ़रीदाबाद जाते हुए सड़क के ट्रैफ़िक के हाल पर कोई फ़ेसबुक पोस्ट नहीं लिखा गया।

कोई आड़ी-तिरछी कविता नोट्स में सेव नहीं हुई।

किसी दोस्त से झूठ कहा नहीं व्हॉट्सऐप्प पर कि ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं...

याद ही नहीं कि उस एक इतवार जाने कैसे शब ढली, जाने कैसे दिन ढला... मुद्दतों बाद ऐसा हुआ था कि मैं जहाँ थी, वहीं थी - कहीं और नहीं। मुद्दतों बाद ऐसा हुआ था कि मेरी फ़ितरती गुमख़्याली को कहीं कोई वर्चुअल दुनिया नहीं मिली थी।

भीतर से कोई और आवाज़ देता रहा, झूठ था... सरासर झूठ था वो सब जो दुनिया से जुड़े रहने के ख़्याल से जोड़ रखा था तुमने।

फ़ोन सबकुछ नहीं ज़िन्दगी के लिए!

मुझे लगता था कि दुनिया में कुछ चीज़ें (और कुछ लोग) ऐसी हैं जिनके बिना मेरा वजूद बेमानी है, और जीना नामुमकिन। इंटरनेट और स्मार्टफ़ोन उन्हीं दो हासिल चीज़ों में से था। फ़ोन मेरे लिए चलता-फ़िरता दफ़्तर था - आप सबकी तरह। अपनी तमाम तन्हाईयों और सुख-दुख के बीच फ़ोन मेरे लिए रियल और वर्चुअल दुनिया से जुड़े रहने का इकलौता ज़रिया था। जो जी में आए, तब के तब बोल देना... उसे पोस्ट कर देना... किसी दोस्त को व्हॉटसऐप्प कर देना... रात-दिन, सुबह-शाम बातचीत के उन सिरों को थामे रहने की कोशिश करना जो कभी अंजाम तक नहीं पहुँचतीं... मेरी ज़िन्दगी ऐसी ही होने लगी थी पिछले दो-ढाई सालों से। ज़िन्दगी जिस रस्ते को अख़्तियार कर चुकी थी वहाँ बेमतलब की वर्चुअल स्माइली, दिल, टूटा हुआ दिल, फूल के गुच्छे, तोहफ़ों के बक्से और बिना सोचे-समझे किसी की ओर भी उछाल दिए जानेवाले बोसे थे।

और अचानक एक फ़ोन के न होने से वो सब ख़त्म हो गया!

वो सारे वर्चुअल रिश्ते ख़त्म हो गए!

वो सारे संपर्क और नंबर (कुल सत्रह सौ) ख़त्म हो गए जो मैंने इन दो-चार सालों में अर्जित किए होंगे!

हाथ में आया एक बेसिक फ़ोन, और ठहर जाने का गुमां।

कुल साढ़े चौदह फ़ोन नंबर मुझे मुँहज़ुबानी याद थे। मम्मी-पापा, पतिदेव, सासू माँ, ससुराल का लैंड-लाईन नंबर, भाई-भौजाई के, और कुल मिलाकर साढ़े पाँच दोस्तों के, जो पिछले सालों की सबसे बड़ी कमाई हैं... जिन्हें बचाए रखने में दस साल से ज़्यादा लंबी उम्र लगी है।

स्मार्टफ़ोन के न होने ने मेरी ज़िन्दगी में सबकी अहमियत और जगह भी मुक़र्रर हो गई थी। ये तय हो गया था कि ये वही साढ़े चौदह लोग हैं जो आपको आपकी तमाम ख़ामियों और ख़ूबियों के साथ स्वीकार करेंगे। जो एक आवाज़ पर आपके साथ होंगे, और जिन्हें आपने अच्छे-बुरे दिनों में मुलससल आवाज़ें दी हैं इसलिए इनके नंबर आपको मुँहज़ुबानी याद हैं।

(एक और एपिफ़ैनी - आत्मबोध - ये भी है कि किसी और की ओर से आनेवाला भरोसा हमारे भीतर के भरोसे का रिफ्लेक्शन, उसी का अक्स होता है। हम वही हासिल करते हैं जो हम बाँट रहे होते हैं।)

दिल जज़्बाती है, मजबूर नहीं है

अपने आस-पास क्या होना चाहिए, और किस रिश्ते पर कितना भरोसा किया जाना चाहिए - ये आत्मबोध अपने आप में मोक्ष का दरवाज़ा है। हम कई भ्रांतियों और ग़लतफ़हमियों के साथ जीते हैं। सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी  इस भंगुर दुनिया में अपनी जगह को लेकर पालते हैं हम। हमें कितने लोग जानते हैं... कितने लोगों को हम पहचानते हैं... हमारा वजूद इससे मुक़र्रर होता है, यही बताया जाता है हमें। बड़े होकर ख़ूब नाम और पैसे कमाओ - यही आशीर्वाद मिलता है न हमें बचपन से? अपने बच्चों को 'बडे होना' सिखाते हुए सही मायने में बड़े होने की परिभाषा क्या होती है, ये बताना भूल जाते हैं हम।

जिसे नापा जा सकता है, जो टैंजिबल है - परिणाम के तौर पर देखा जा सकता है, उसे ही हासिल समझ लिया जाता है। इन्टैंजिबल माइलस्टोन्स - अपने स्वभाव और शख़्सियत में जीते गए बदलावों की क़ीमत नहीं समझी जाती।

अभी हाल ही में एक फ़िल्म आई थी - फॉल्ट इन आवर स्टार्स। दो टीनएजर्स की कहानी है - कैंसर के आगे इनकी उम्र की रेखाओं ने हार मार लिया है, लेकिन इनकी जिजीविषा ने नहीं। मौत का इंतज़ार करते हुए जीने की उत्कट इच्छा रखने वाली सत्रह साल की हेज़ल ग्रेस अठारह साल के अपने कैंसरपीड़ित बॉयफ्रेंड से कहती है - ऑब्लिवियन इज़ इनएविटेबल - गुमनामी लाज़िमी है।

जब गुमनामी लाज़िमी है तो फिर इतनी हाय-हाय क्यों?

गुमनामियों के इन ख़तरों के बीच हेज़ल ग्रेस को एक और टीनेजर एन्न फ्रैंक की याद में बने म्यूज़ियम में गुमनामी के बीच की शोहरत सेलीब्रेट करने से ज़्यादा ज़रूरी मौत के मुहाने पर खड़े अपने बॉयफ्रेंड को पहली बार किस करना लगा।

हेज़ल के लिए वो लम्हा गुमनामियों के अंधेरों में इकलौती रौशनी रहा होगा। वो लम्हा उसके भीतर के किसी डर पर हासिल की गई जीत का लम्हा था।

मुझे फिल्म देखते हुए वो बात इतनी स्पष्टता से समझ में नहीं आई थी जितनी अब आई है - अपरिहार्य गुमनामी के बीच जो शोहरत का इकलौता शाश्वत कारण होता है, वो किसी इंसान का जज्बा होता है। वही जज्बा डर पर जीत हासिल करने की हिम्मत देता है।

एन्न फ्रैंक का जज्बा था कि चौदह साल की उम्र में गुज़र गई लड़की को पचासी साल बाद भी दुनिया भूल नहीं पाई है।

हेज़ल ग्रेस का जज्बा था कि मरते-मरते भी उसने किसी एक ज़िन्दगी को इस बेरहम, बेवफ़ा, मतलबी दुनिया में वापस आने की वजह दे दी... अपनी बची हुई ज़िन्दगी की सारी तकलीफ़ों और छूटती हुई साँसों के बीच तारों से भरी एक रौशन रात के शामियाने तले गीली आँखों से मुस्कुराना सीख लिया।        

ये जज्बा भीड़ पैदा नहीं करती। ये जज्बा हम अकेले अंधेरे कमरे में ख़ुद से जूझते हुए, अपनी हार और नाकामियों के बीच अपने हालातों को अपने हिसाब से ढालते हुए पैदा करते हैं। इस जज्बे का इससे कोई वास्ता नहीं होता कि हम दुनिया से कितने जुड़े हुए हैं और हमारी बातों पर कितनी वाहवाहियाँ मिल रही हैं। इस जज्बे को फोन-बुक में मौजूद हज़ारों नंबरों से भी कोई वास्ता नहीं होता।

हम हर रिश्ते को अपनी वजह से ढोते हैं, झेलते हैं या उन्हें पालते-पोसते हैं। उनकी ज़रूरत हमें होती है क्योंकि हमारे जज्बात उन रिश्तों पर फ़ीड कर रहे होते हैं। उन रिश्तों से हासिल हमदर्दी (और कई बार तरसते हुए बोलों के जवाब भी, जो हम सुनना चाहते हैं), उन रिश्तों से हासिल भरोसा (कभी झूठा, कभी सच्चा) और उन रिश्तों से हासिल ऊर्जा हमें ज़िन्दगी की नीरस और अरुचिकर जद्दोजेहद को झेलने का माद्दा देती है।

हम उस ग़लतगुमानी में ख़ुश रहते हैं कि हमारी ज़रूरत है - हमारे घर-परिवार में, हमारे वर्क प्लेस पर, हमारे सहकर्मियों को, हमारे बॉस को, हमारे जान-पहचान वालों को, हमारे क्लायंट्स को... हम इस बदगुमानी में होते हैं कि जो जब भी, जिस भी तरह आवाज़ लगाए, हमें उसका जवाब देना ही चाहिए क्योंकि अपनी ज़रूरत बचाए रखने का ये इकलौता रास्ता है।

बेताबियों में खुशी ढूंढने वाले बेताबियां भी ढूंढ-ढूंढकर लाते हैं। ये बेताबियां रिश्तों की शक्लों में होती हैं जो हर रोज़ किसी न किसी से बना रहे होते हैं हम। अक्सर क्षणभंगुर। अक्सर छोटी मियाद वाले। अक्सर ज़रूरतपरस्ती।

कितना बड़ा फ़रेब है ये!

फ़ोन नहीं है तो समझ में आया कि इस फ़रेब को जीना मजबूरी नहीं है। हमारे जज़्बातों का सबब भी हम ही, मरहम भी हम ही। हमारी ज़रूरत अगर किसी को सबसे ज़्यादा है, तो वो हम हैं।

मेरे फ़साने पे न जा... 

डिस्क्लेमर ये भी है कि ये मेरे अपने तजुर्बे हैं। ये मेरी अपनी राय है। तजुर्बों के आधार पर राय भी बनती-बिगड़ती-बदलती रहती है। मेरा मकसद फ़ोन के बहाने बाहर की दुनिया से जुड़ाव को लेकर अपने हालात और अनुभवों का लेखा-जोखा करना है। मेरा मकसद अपने लिए कुछ फ़ैसले लेना है। ख़ुद को याद दिलाना है कि वेलॉसिटी यदि डिस्प्लेसमेंट और टाईम टेकेन का अनुपात है कि डिस्प्लेसमेंट की वैल्यू को कम करके वेलॉसिटी यानी गति पर काबू पाया जा सकता है।

सारे फ़ैसले अपने हैं - दिल-ओ-दिमाग पर हर लम्हा लगती खरोंचों की तरह। वजह भी मैं ही, मरहम भी मैं ही।

नोकिया लूमिया उर्फ़ डियर सूरजमुखी, तेरा प्यार अनोखा है!

बुधवार, 6 अगस्त 2014

मत लिखो। मत लिखो। मत लिखो!!!

यूँ लगा कि जैसे अगर ठीक इसी वक़्त इस पन्ने पर अनाप-शनाप लिखा नहीं तो सुबह से आगे बढ़ने की गुज़ारिश करना नामुमकिन हो जाएगा। कई बार गिरहों को खोलकर बंदिशों के बग़ैर अपने भीतर का गर्द-ओ-गुबार निकलने देने की ज़रूरत ज़िन्दगी की तमाम ज़रूरतों से बड़ी बन जाती है।

मैं उसी मुकाम पर आ पहुँची हूँ जहाँ खुलकर बेमकसद लिख पाना किसी और ज़रूरत से ज़्यादा बड़ी ज़रूरत बन गया है।

मैं लिखने का काम करती हूँ। महीने (या तीन महीने) के आख़िर में आने वाले पैसे उसी लिखाई (या लिखने से जुड़े और कामों) से आते हैं। दिन के आठ-दस घंटे अलग-अलग फॉर्मैट्स में लिखना, अनुवाद करना या  एडिट करना ही मेरा काम है, और मैंने ऐसी ही किसी ज़िन्दगी की ख़्वाहिश की होगी क्योंकि मेरी ख़्वाहिशें पूरी करने के मामले में ख़ुदा उस्ताद है। मेरी कोई दुआ अनसुनी नहीं छोड़ता। इसलिए ये दुआ कि दिन भर लिखती रहूँ, बड़े प्यार से क़ुबूल हो गई।

ये और बात है कि मैं अब उकताने लगी हूँ। फ़ितरत ही कहिए कि उकता जाना सबसे आसान लगता है।

लिखती तो हूँ, लेकिन क्या... ये मालूम नहीं। इस लिखे हुए का हासिल भी क्या, ये मालूम नहीं।

लोग कहते थे कि पोर्टफोलियो बड़ा करने के लिए लिखो। तो किया।

फिर लगा कि लिखना ही काम है, और काम मन लगाकर करना चाहिए। इसलिए भी किया।

फिर लगा कि काम करने से ही गुज़ारा चलता है, इसलिए लिखती रही।

लेकिन अब ऊब होने लगी है।

इसी ब्लॉग पर बेख़्याली में भरे गए पन्ने - अपना ही लिखा हुआ - देखती हूँ तो यकीन नहीं होता। उन दिनों मैं क्या खा-पी रही थी? उन दिनों के कैसे दुख थे कि इतना लिखा, और बिना किसी हासिल की उम्मीद के लिखा? मुझे तब किसी असाइनमेंट की उम्मीद नहीं थी। मैं मशहूर होने के लिए भी नहीं लिख रही थी। तब लिखने का मक़सद किसी को इम्प्रेस करना भी नहीं था। मेरे लिखे हुए के बारे में दुनिया क्या सोचती है, लोग मुझे किस निगाह से देखते हैं, लिखकर मैं कितने दोस्त बनाऊँगी और कितने दुश्मन - ये भी नहीं सोच रही थी तब। लिखने का मकसद अपना गुज़ारा चलाना भी नहीं था। लिखने का मकसद कहीं छपना, किसी दिन किताब या फिल्म लिख देना - कुछ भी नहीं था।

जब कोई मकसद ही नहीं था तो मैं क्यों लिख रही थी तब?

चार्ल्स बुकोस्की की कविता का वरुण ग्रोवर का किया अनुवाद याद आ रहा है -

अगर फूट के ना निकले
बिना किसी वजह के
मत लिखो।
अगर बिना पूछे-बताये ना बरस पड़े,
तुम्हारे दिल और दिमाग़
और जुबां और पेट से
मत लिखो।

वो दिन कुछ ऐसे ही थे कि लिखना ही ख़ुद को बचाए रखने का इकलौता रास्ता था। इसलिए लिखना ज़रूरी था, और जब लिखना शुरु किया तो अंदर का सोता ऐसे खुला था कि जैसे सबकुछ बहा ले जाने पर आमादा हो।

अब ऐसा लगने लगा है कि बहुत बह चुकी हूँ, और बहते-बहते ठहर गई हूँ। कहाँ गई वो भीतर की पहाड़ी नदी जो पत्थरों को चूमती हुई निकलती थी तो भी ज़ोर-ज़ोर से गीत गाती थी? कहाँ गया वो भीतर का रेगिस्तान जिसके धोरों पर अपनी ही बारिशें गिरा करती थीं मुसलसल? कहाँ गए वो लोग जो एक बाएं हाथ की उंगलियों पर गिने जा सकते थे, लेकिन जिनकी चिट्ठियों से अपने ही बेचैन शब्दों की ख़ुशबूएँ आया करती थीं?

सुनो कि कोई बात है नहीं कहने को, इसलिए मत लिखो।

अपनी ही ग़ुमख़्याली की वजहें मालूम नहीं, न उनके इलाज का सबब है कोई। इसलिए, मत लिखो।

यहाँ से उठते ही तुम्हारा ध्यान टू-डू लिस्ट की लिखाई और उसकी ज़रूरतों पर जाएगा, इसलिए जाने दो। मत लिखो।

तुम्हारे ब्लॉग पर आने वालों की ट्रैफ़िक तुम्हारे बारे में अब एक मुक़म्मल राय बना चुकी है, इसलिए मत लिखो।

तुम्हारी एक किताब आ चुकी है, इसलिए अब आगे बिल्कुल मत लिखो।

तुम एक सेल्फ-प्रोक्लेम्ड राईटर हो चुकी है, इसलिए अब तो बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल मत लिखो।

मत लिखो अनु सिंह। अब बिल्कुल मत लिखो।

****

इस सुबह के मुहाने से निकलकर दिन के समंदर में मिलने के लिए बना जो रास्ता मुझे दिखाई दे रहा है वो यहाँ से बहुत ठहरा हुआ दिखता है। 

अच्छा है कि सफ़ीनों की मंज़िलें दरिया हुआ करती है, एक ठहरी हुई उदास नदी नहीं।

रविवार, 13 जुलाई 2014

अदना-सी मेरी कविताएं

1

जितनी बार हम जी रहे होते हैं 
दुःख 
क्षोभ, व्यथा, हानि
बिछोह, संताप, प्रताड़ना, ग्लानि
पीड़ा की ये आरी 
काट रही होती है 
कई पूर्वजनमों के जंजाल। 

जितनी बार 
हम होते हैं 
किसी के प्रेम में
उतनी ही बार
कस रहे होते हैं
अपनी गर्दन के चारों ओर
नारियल की रस्सियां
और तैयार कर रहे होते हैं
फिर से एक दुर्गम जाल।

प्रेम के जाल
और पीड़ा की आरी के बीच
बचा रह जाता है
पल-पल झरता शरीर
जिसके मोम के न होने का
रहता है अफ़सोस
लगातार।

जब हम काट रहे होते हैं
अपने हिस्से के करम
और बुन रहे होते हैं
कई नए कष्टसाध्य जाल
अगली ज़िन्दगी के लिए
दर्ज करा रहे होते हैं
एक ही दरख्वास्त -

प्रेम। 


2
जो कहता नहीं है
अपनी जुबां से
उसकी आँखों में
सबसे गहरी होती है बेचैनी

जो नहीं जानता हाथ मिलाना
खींचकर गले लगाओ तो
सबसे ऊँची आवाज़ में
रोया भी वही करता है अक्सर

जिसके होठों पर
कम होती हैं शिकायतें
चखो तो सबसे उदास
बोसे उसी के होते हैं

जिसके कंधे लगते हैं
सबसे मज़बूत और मुकम्मल
उसके सीने से कभी नहीं उतरता
इस बेगैरत दुनिया का बोझ

दरअसल जो दिखता है
वो होता नहीं है
जो नहीं दिखता
वही हुआ करता है
सबसे ईमानदार सच।


3

ख्वाहिशों की तितलियों को
आम के मंजर,
सेमल के फूल,
अरहर के सिट्टे,
बेल की लदी डालियां,
नशे में झूमता महुआ पेड़,
जंगली गुलाब रास नहीं आते। 


ख्वाहिशों की इन तितलियों को
बेसबब बेकरारियों के अंगारों पर
मंडराने का नया चस्का लगा है। 


ख्वाहिशों की तितलियों के
इस सुसाईड अटेम्पट की
वे ख़ुद ज़िम्मेदार करार दी जाएँ!


4

मत पूछ कि 
इस पागल शहर में 
रहती कहाँ हूँ मैं 

कॉफ़ी के झूठे प्यालों में हूँ 
व्हाट्सएप्प पर कुछ सवालों में हूँ 
तुम्हारे गुसल की बेसिन पर
उस रात छोड़ी थी जो अपनी
मैगनोलिया क्रीम, वहाँ हूँ मैं। 

कंघी के टूटे बालों में हूँ
अलमारी की दराजों में हूँ
छोटी सी इक रसोई के कोने
सिल बट्टे की जगह ले गयी जो
मिक्सी, वहाँ हूँ मैं।

अस्पतालों के नंबर में हूँ
कोम्बिफ्लाम के पत्ते में हूँ
तपते हुए माथों पर जो
लगती, बदलती, गीली हुयी है
पट्टी, वहाँ हूँ मैं।

गमले में हूँ कि बाड़ों में हूँ
एसी के नकली जाड़ों में हूँ
गुल्लक में हूँ कि लॉकर में हूँ
सच में हूँ, फसानों में हूँ
एफ़म पर चलते गानों में हूँ
गाडी में भी हूँ, रिक्शे पे भी हूँ
घर को बनाए दफ्तर में भी हूँ

बिखरी हुयी हूँ, बहकी हुयी हूँ
फिर क्या बताऊँ,
रहती कहाँ हूँ मै


5

कैसे करें शुक्रगुजारी ऐ खुदा
दिया तो इतना दिया 
कि बक्सों, सन्दूकों, 
काग़ज़ के गत्तों के डब्बे 
भी कम पड़ते हैं। 

सुनो, कि कभी लेना ही वापस मुझसे 
तो सबसे पहले
लम्हों, लोगों, दर-ओ-दीवारों से 
डूबकर इश्क करने की 
ये बेजां फितरत ले लेना।

तुम भी बख्श दिए जाओगे
और मेरी भी इस छोटी सी दुनिया को
मिल जाएगा आराम!


6

झरती डाल 
फुदकती चिड़िया 

कड़वे नीम
पर आये फूल 

दरकती ज़मीन 
फूटा अंकुर 

दहकता माथा 
शबनमी बोसा

कराहती पीठ
गोद में बच्चा

जलती आँखें
बरसते बादल

सुलगता चूल्हा
ठंडी शिकंजी

छूटती सांसें
थामती उम्मीद।


7

नाज़ुक था
डाल से बिछड़ गया 
कचनार था

था अलहदा 
भीड़ से अलग हुआ 
काला मेमना 

सख्त था 
चोरी के गुल्लक पर 
मम्मी का थप्पड़ था

था उलझा हुआ
कुर्सी बुनता
नया-सा कारीगर कोई

गर्म था, सर्द था
खिला था, ज़र्द था
नहीं था ख्वाब वो
कई रातों का सिरदर्द था

वो क्या था, कहती
सब कह देती
मगर तुम्हारी मौजूदगी में
हमेशा
और अदना हो जाती हैं
मेरी सारी कवितायें!


8

मरती रहती हूँ 
फिर भी रह जाते हैं काम
मैं कब, कहाँ
किस मौन में 
पुकारूं तुम्हारा नाम।


9

अगर खींच सकती 
तो ले आती तस्वीरें 
कानों और इअर प्लग्स के बीच 
तिरकिट मचाती हवाओं की 

नाईट शिफ्ट के बाद 
अपने झुरमुट में सोने चली गयी 
रात की रानी की 

बैसाख को ठेंगा दिखाकर 
फलते फूलते लैवेंडर की

दहकते इश्क का चोगा पहनते
गुल्मोहर, अमलतास, कचनार की

ॐ, प्राणायाम में ग़म ग़लत करती
नाराज़, हैरान, दयनीय दुनिया की

लेकिन जान, मैं फोटोग्राफर नहीं
और तुम फुर्सतज़दा नहीं
इसलिए आज भी टहलकर
लौट गयी हूँ पार्क से।

शुक्रवार, 11 जुलाई 2014

दोनों जहां से खोए, गए हम... दास्तान-ए-इंदिरा नूयी

इंदिरा नूयी का इंटरव्यू पढ़कर मैं बहुत देर तक ज़ोर-ज़ोर से हंसती रही थी। हंसी उस विडंबना पर आ रही थी जो सर्वव्यापी है, यूनिवर्सल। लेकिन है अकाट्य सत्य ही - आप चाहे दुनिया की सबसे बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी की सीईओ हों, या फिर दिन भर पत्थर तोड़कर शाम को घर लौट जाने वाली मजदूर, दुनिया के हर कोने में आपकी ज़िन्दगी की कहानी एक-सी ही सुनाई देगी बिल्कुल। 

अब मैं अपनी ही बात करते हुए इस लम्हे, बिल्कुल इस लम्हे का हाल बयां करूं तो सीन कुछ ऐसा है। मैं डायनिंग टेबल के एक कोने में बैठी ये लेख लिखने की कोशिश कर रही हूं और मेरे दोनों बच्चे मेज़ की दूसरी तरफ़ खाना खाते हुए लगातार मुझे टोकते जा रहे हैं। मम्मा, ऊंट अपनी नाक क्यों बंद कर सकता है? मम्मा, आद्या ने मेरे पैरे को छुआ। मम्मा, आदित ने अपना होमवर्क नहीं किया... मैं एक तरफ़ लिखने की नाकाम कोशिश कर रही हूं और दूसरी तरफ ध्यान झगड़ा सुलझाने में भी है। इसके अलावा फ़िक्र कल सुबह के नाश्ते की, बच्चों के यूनिफॉर्म साफ़ करवाने की, उनका होमवर्क कराने की, राशन के सामान की, घर की छत से लटकते जाले साफ़ कराने की भी है और ये सारे ख़्याल एक साथ ज़ेहन में चल रहे हैं। हफ़्ते के ख़त्म हो जाने का अफ़सोस भी है। सोमवार की सुबह तक डेडलाईन फिर से हावी होगी। 


अचानक मुझे ये ख़्याल बहुत सुकून देता है कि किसी इंदरा नूयी की, किसी शेरिल सैंडबर्ग या किसी टाइगर मॉम एमी चुआ की हालत रोज़-दर-रोज़ मुझसे अलग नहीं होती है। 

घर की दहलीज़ के भीतर एक औरत से जिस संजीदगी के साथ मां, बहू, बेटी, पत्नी और इस तरह की तमाम ज़िम्मेदारियों के निर्वहन की अपेक्षा की जाती है वो अपेक्षा एक पुरुष से नहीं रखी जाती। इंदिरा से उनकी मां ने कहा था कि वो अपने सीईओ होने का ताज या तो गैरेज में छोड़कर आए या फिर दफ़्तर में। घर में उसकी ज़िम्मेदारी दूध लाने की है, और अपना घर चलाने की। घर के पुरुष से ऐसी कोई अपेक्षा नहीं की जाती। दफ़्तर से लौटकर आने के बाद भी वो एक पुरुष ही होता है।
ऐसे में महिलाओं के लिए, ख़ासकर कामकाजी महिलाओं के लिए, दोनों जहां की ख़ुशियां मिल जाने का ख़्वाब किस कमबख़्त ने देखा था? दोनों जहां में परफेक्ट होने की कोशिश वो गफ़लत है जिससे जितनी जल्दी बाहर आया जाए, उतना अच्छा।

अगर यही सच है तो फिर क्या अपना सिर पीटा जाए या कई किस्मों के, कई वजहों के अपराध बोध से मर जाने का जुगाड़ कर लिया जाए? या फिर इस पुरुषप्रधान समाज के नाम को पचहत्तर बार कोसा जाए?
यकीन मानिए, जो औरत हर रोज़ की जंग लड़ रही होती है, हर रोज़ वक़्त का सही इस्तेमाल करते हुए हर लम्हा उपयोगी बनाने की कोशिश में जुटी होती है, उसके पास शिकायत करने का सबसे कम समय होता है। हम अपने हालातों के सबसे अच्छे पारखी और निर्णायक होते हैं। इंदिरा नूयी ने अपनी ज़िन्दगी के लिए निजी फ़ैसले लिए और ये बिल्कुल ज़रूरी नहीं कि वो मेरे हालात पर कारगर हों। हमारे फ़ैसले कई बातों पर निर्भर होते हैं - हमारे चुनाव, हमारी पृष्ठभूमि, हमारी ज़रूरतें, और सबसे अहम - हमारी फ़ितरत। अपनी फ़ितरत और अपने हालात के आधार पर दोनों जहां में कितना और कब-कब बने रहना है, इसकी समझ विकसित कर ली जाए तो किसी और को कोई फ़र्क पड़े न पड़े, आप ज़रूर सुकून में रहेंगी।


ये सुकून, ये मानसिक शांति ही दरअसल असल वर्क-लाइफ बैलेंस होती है। वर्क-लाइफ बैलेंस का कोई फॉर्मूला नहीं होता। ये फॉर्मूले अपने लिए हम ख़ुद तय करते हैं और वक़्त के साथ-साथ इनपर काम लगातार चलता रहता है। तीन साल पहले बच्चों के साथ पार्क में खेलना मेरी प्राथमिकता में सबसे ऊपर था। अब नहीं है। मैं उन्हें दिन भर में दो घंटे का वक़्त देकर भी ख़ुश रहती हूं। लेकिन ये फ़ैसले मेरे अपने हैं, और इनके लिए ज़िम्मेदार भी मैं ही हूं। ऐसे कई फ़ैसले हर रोज़, हर बात पर लेने होते हैं और इंदिया भी ठीक यही कहती हैं। मुझे नहीं लगता कि इंदिरा के लहज़े में, बड़ी बेबाकी से किए हुए उनके बयान-ए-हकीकत में इस बात से कोई शिकायत है।

अपने बारे में बात करते हुए वे खुलकर हंस सकती हैं, और ये हंसी उनकी सबसे बड़ी सफलता है मेरे हिसाब से। वैसे इंदिरा की एक बात से मैं बिल्कुल सहमत नहीं हूं। मुझे इस बात का पक्का यकीन है कि उनकी बेटियों से कोई पूछे तो वे यही कहेंगी कि उन्हें अपनी मां पर बेइंतहा फ़ख्र है और एक दिन वे भी अपनी मां की तरह ही बनना चाहेंगी। और इस बात का उनकी मां के कामकाजी होने, या बेहद सफल होने से कोई रिश्ता नहीं है। इस बात का सीधे तौर पर रिश्ता इस बात से है कि वे दोनों बड़ी होकर कैसे महिलाएं, और किस तरह की मां बनना चाहेंगी। मुझे उम्मीद है कि जल्द ही हमें बेटियों की राय भी सुनने को मिलेगी। दोनों जहां के होने न होने की बहस को अंजाम तभी दिया जा सकेगा।

वैसे घर और काम - दोनों जहां में होने न होने की ये बहस हमारे बच्चों की पीढ़ियों तक आते-आते जेंडर की बहस से बाहर निकल सके तब जाकर कह सकेंगे कि मुमकिन है दोनों जहां हासिल करना। 

मंगलवार, 8 जुलाई 2014

कई फ़ितूर और 'नीला स्कार्फ'

मैं भुवनेश्वर से पुरी के रास्ते में थी जब नताशा का मेसेज आया था – व्हॉट्सऐप्प पर। कुछ तस्वीरें थीं – उस अनारकली की, जो मैं बनवाना चाहती थी। एक के बाद एक कई मेसेज आए – उसके आईफोन से ली हुई तस्वीरों के। एक तस्वीर मेरे ज़ेहन में अटक ही गई बस, उस तस्वीर में मैनेक्वीन की गर्दन में बेतरतीबी से पड़े दोरंगी नीले दुपट्टे की तरह।

मैंने नताशा को वापस जवाब भेजा, "ये अनारकली चाहिए और ये तस्वीर भी। अपनी पहली किताब की कवर पेज के लिए।"

बात मार्च की है, और मेरे दिमाग में कहानी-संग्रह को पूरा करने का ख़्याल खलबली मचाए थे। मैं जहाँ-जहाँ जाती थी, वो ख़्याल साथ जाया करता था। एक किस्म के फ़ितूर की तरह। बेशक काम नहीं किया करती थी इस ख़्याल पर, लेकिन फ़ितूर तो था।

उम्र के पैंतीस गर्मी-जाड़ा, सूखा-बाढ़ और सूनामी देख लेने के बाद मैं एक बात पूरे यकीन के साथ कह सकती हूँ – एक फ़ितूर न होता तो दुनिया में क्रांतियां न आया करतीं। वक़्त फ़िसलता रहता किसी चिकने से रास्ते पर घूमते पहिए की तरह, और हमारे पास जानने-सुनने को किसी किस्म का इतिहास न होता।

ये कमबख़्त फ़ितूर कई चीज़ें करा लेता है इंसानों से।

मुझसे कहानियाँ लिखवा लीं इसी फ़ितूर ने। इसी फ़ितूर ने मेरी अच्छी-खासी आर्टिस्ट-राईटर दोस्त को ऑन्ट्रप्रॉन्योर और बिज़नेसवूमैन बना दिया। इसी फ़ितूर ने व्हॉट्सऐप्प पर आई उस तस्वीर को किताब के कवर पेज तक पहुंचा दिया जो दरअसल मेरे ही एक कुर्ते, मेरे ही एक दुपट्टे की तस्वीर है। 'नीला स्कार्फ' भी तो उस तस्वीर, उन कपड़ों की तरह आख़िर मेरे ही वजूद के जिए हुए अनुभवों का कई टुकड़ा है। 

'नीला स्कार्फ' कई मायने में ख़ास है। ख़ास इसलिए कि इसे बनाते हुए हमने अनजाने में कई अनकन्वेंशनल रास्ते अख़्तियार किए। 'नीला स्कार्फ' का इस मुकाम तक पहुंचना एक लिहाज़ से आउट ऑफ द बॉक्स सोचकर ख़तरे उठाने वाले चार अजूबा फ़ितूरियों की सच्ची कहानियां भी है।

मिलिए अजूबा नंबर एक से। अनु सिंह। लिखने का शऊर नहीं था, गलतफ़हमियां थी कईं। लिखना ज़रूरत से ज़्यादा मजबूरी बनता गया एक वक़्त के बाद, और फिर जेबखर्च का ज़रिया भी। लिखने के फ़ितूर ने ब्लॉग दिया, ब्लॉग ने दोस्त दिए, दोस्तों ने काम के ज़रिए दिए, काम के ज़रिए मिले तो ठीक-ठीक समझ में आया कि कैसे, कब और कहां, किन लोगों के साथ काम करना चाहती हूं। लोग मिले तो भरोसा आया। भरोसा आया तो रास्ते पता नहीं किस-किस मोड़ से होते हुए निकलते चले गए। अनु सिंह इस लिहाज़ से अनकन्वेंशनल है क्योंकि वो कहीं भी किसी एक रूप में मुकम्मल नहीं। अनु सिंह का लिखना भी मुकम्मल नहीं। टुकड़ों-टुकड़ों में कई वजूदों के बीच कई कामों के साथ बिखरी-बिखरी ज़िन्दगी समेटना, और उस बीच लिखते रहना, हर रोज़ का रोज़गार है। रोज़गार भी यही है, और ज़िन्दगी से भिड़ने का हथियार भी यही।

मिलिए अजूबा नंबर टू से। शैलेश भारतवासी। अव्वल दर्ज़े के फ़ितूरी। एक फ्लिपकार्ट, एक इंफीबीम के सहारे एक टाइटल की पाँच सौ प्रतियाँ छापकर हिंदी के बेस्टसेलर लेखक तैयार करने चले हैं। ढूंढ-ढूंढकर लेखक निकालते हैं। रेगिस्तान-नखलिस्तान, समंदर-मैदान, पहाड़-पठार, महागनर-देहात – कुछ भी नहीं बख़्शा इन्होंने। जहाँ किसी के लेखक होने का एक आना भरोसा भी हुआ नहीं कि जी-जान लगा बैठे। महाराज, ऐसे पब्लिशर का बेड़ा गर्क होगा, ये चित्रगुप्त महाराज ने अपनी कलम को अपने ही ख़ून में डुबो-डुबोकर बड़े-बड़े अक्षरों में लिख दिया है। सातवें आसमां पर जब इनके कर्मों का लेखा-जोखा प्रस्तुत होगा तो नर्क की सज़ा सुनाई जाएगी इनको। हिंदी पठन-पाठन की अलौकिक शांति में व्यवधान डालने का अक्षम्य अपराध जो किया है इन्होंने।

मिलिए अजूबा नंबर थ्री से। नताशा बधवार। इस औरत से बड़ा फ़ितूरी मैंने अपनी पूरी लाईफ़ में नहीं देखा, बाई गॉड। मैं टीवी चैनल में जब एक टुच्ची-सी रिपोर्टर/प्रोड्युसर थी तो मैडम कुछ तो टॉप टाईप पोस्ट पर थीं। इक्कीस साल की थी तब मैं, और नताशा बधवार के बारे में सुनते-सुनते उसके टाईप बन जाने का वो जुनून था कि जो आज तक कमबख़्त ख़त्म नहीं हुआ है। वैसे इतने सालों में ये भी नताशा से ही सीखा है कि कोई किसी की तरह होता नहीं है, और फिर भी हम सब अपने आस-पास के अजीज़ लोगों के आईने हुआ करते हैं। बहरहाल, फ़ितूरी नंबर थ्री ने ज़िन्दगी में कई फ़ितूर पाले और उन्हें अंजाम तक पहुंचाया। (हाथ कंगन को आरसी क्या, मुझपर यकीन हो न हो गूगल पर तो है)। नताशा का सबसे बड़ा और ख़तरनाक फ़ितूर आजकल 'ऑकर स्काई' नाम के ब्रांड के रूप में फेसबुक पर दिखाई दे रहा है। कसम से कह रही हूं, इस फ़ितूर की पहली ख़बर मिली थी तो मैंने अपना सिर पीट लिया था। अब मैं ही इस फ़ितूर की सबसे बड़ी कायल (और ख़रीददार) हूं। नताशा के फ़ितूर ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि हर फ़ितूर के साथ हम ख़ुद को बेहतर पहचान रहे होते हैं, और ये अपने किस्म की अलग साधना है – एक अलग किस्म का मे़डिेटेशन। ये अपने-अपने आसमान के टुकड़ों को ढूंढ लाने की कोशिश है, जो ताउम्र चलती रहे तो अच्छा।

और आख़िर में, मिलिए अजूबा नंबर फ़ोर से। रोहित भाटिया। मैं डिज़ाईनर-विज़ाईनर, आर्टी टाईप लोगों से ज़रा दूर ही रहती हूं और नताशा के घर रोहित से दो-चार बार मिली तो उसे भी दूर से सलाम किया था। मतलब वो कितना पागल शख़्स होगा जो बच्चों के साथ कमरे की दीवारें पेंट करते हुए पूरा वीकेंड गुज़ार सकता है? जिसे चांदनी चौक टाईप की जगहों पर सुकून मिलता है? जो चाय बनाकर पिलाता है तो दूसरों की जूठी चाय की प्यालियां धोने से भी नहीं हिचकता? जिसका कारोबार वेडिंग ट्रूज़ो पर चलता है? जिसका बस चले तो कुशन कवर्स और पर्दों पर भी ब्रॉकेड की पट्टियां और सलमा-सितारा लगा दे। आई मीन, वियर्ड, रियली। और इसी रियली वियर्ड टाईप के डिज़ाईनर के भीतर के कई रंगों से वाकिफ़ हुई तो चार बार कान खींचे ख़ुद के। हम कितनी आसानी से लोगों को जज कर लेते हैं। स्टीरोटाईपिंग दुनिया का सबसे आसान और ख़तरनाक काम है। इस फ़ितूरी के डिजाईन किए हुए कपड़े मेरा नया फ़ितूर है आजकल - एक किस्म के ऑबसेसिव कम्पलसिव डिसॉर्डर की तरह। जिस डिज़ाईनर की बनाई सलमा-सितारा, कढ़ाई वाली साड़ियों को देखकर दिल घबराता था, उसी का तैयार किया हुआ डिज़ाईन मेरी सबसे अहम कहानी की सबसे अहम किरदार का आईना बन गया! उसकी पहचान बन गयाअपनी पहली किताब के कवर पर उसे जगह देकर ज़िन्दगी भर के लिए उस डिज़ाईन को न भूलने लायक बना दूंगी, ये मैंने अपने वियर्डेस्ट ख़्याल में भी नहीं सोचा था।

चार फ़ितूरियों के इस साझा नतीजे – 'नीला स्कार्फ' ने कई चीज़ें साबित की हैं। पहला, दिल अपनी शक्ल के दिल खोज लेता है। 

दूसरा, दिल अपने फ़ितूर को पूरा करने के रास्ते भी खोज लेता है। 

तीसरा, ज़िन्दगी में कभी भी ‘I will never do it (or I will never be able to do it)’ नहीं बोलना चाहिए। कुछ भी हो सकता है। कुछ भी!!!
         
और चौथा, एक फ़ितूर ही है जो आपको भी आपके अंजाम तक पहुंचाएगा। इसलिए अपने भीतर के फ़ितूर शिद्दत से पालिए दोस्तों।

(पोस्टस्क्रिप्ट - मेरे बाबा चीन से मेरे लिए सिल्क का स्कार्फ लेकर आए थे - नीले रंग का स्कार्फ, मेरी सोलहवीं सालगिरह पर। वो स्कार्फ इतना ख़ूबसूरत था कि उसे गले में लटकना दुश्वार हो जाया करता। एकदम अजनबी लोग मुझे रोक कर उस स्कार्फ के बारे में पूछा करते। वो स्कार्फ गुम हो गया कहीं। मैं इस सदमे से कई महीनों तक उबर नहीं पाई। आज भी उस स्कार्फ की बड़ी शिद्दत से याद आती है। गुम हो गए उस नीले स्कार्फ का ग़म मेरे लिए किसी बेहद अजीज़ दोस्त के गुम हो जाने जैसा है। वैसे सच तो ये है कि हम नीले स्कार्फ की तरह कई रिश्ते भी अपनी गर्दन में टांगे फिरते हैं, जिनकी कोई अहमियत नहीं होती - जो एक महंगी एक्सेसरी से ज़्यादा कुछ भी नहीं। जो न शरीर ढंकने का काम करता है, न गर्मी-सर्दी से बचाने का। लेकिन फिर भी गर्दन में शो-पीस की तरह लटकता रहता है, सिर्फ एक मकसद से - हमारे सौंदर्य और दिखावे में इज़ाफ़े के लिए। नीला स्कार्फ कहानी ऐसे ही एक रिश्ते की पड़ताल करती है। 

एक और बात - ऑकर मटमैला भूरा रंग होता है। नीले आसमान पर चढ़े गहरे मटमैले बादलों के नीचे गर्दन में नीला स्कार्फ लटकाए बेवजह भटकती किसी लड़की को देखिएगा तो हम फ़ितूरियों के बारे में सोचिएगा ज़रूर।)    

नीला स्कार्फ ऑर्डर करने के लिंक ये रहे - 

http://bit.ly/nsflipkart

http://bit.ly/nshomeshop18

http://bit.ly/nsinfibeam