गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

किस कमबख्त को कविता कहनी है?

मुझे मीटर की पहचान नहीं, तुकबंदी-बेतुक कुछ नहीं समझती। अलंकार, प्रतीक और बिंब सब अबूझ। एक अज़ीज़ दोस्त के मुताबिक तो मुझे कविता लिखनी भी नहीं आती। लेकिन सोचे हुए से मजबूर हूं। कौन कमबख़्त यहां कवयित्री बन जाने के लिए लिखता है? किस कमबख़्त को भरा हुआ ऑडिटोरिम और तालियों की गड़गड़ाहट चाहिए? यहां तो दिमाग में चली आ रही पंक्तियों से निजात पाना है, कविता हुई तो ठीक, ना हुई तो मेरी बला से।

बच्चों, मम्मा का ब्लॉग पढ़ोगे पांच साल बाद तो जीभर के हंस लेना। अभी मेरे कहने की बारी है।

मौजों से लड़ने का दम नहीं
फिर भी
जुबां पर बेवजह उम्मीद की रट है
जो साहिल दूर है तो क्या, 
कुछ ऐसा कर मेरे ख़ुदा
दो-चार दिन की ख़ातिर
मुझे पतवार दे, मुझको 
सफ़र में नाख़ुदा बना

उसका सांस पर हक़ है
कहे तो
रूह में लिपटी बदन की आग भी दे दूं
जो इश्क नाम है इसका
कुछ ऐसा कर मेरे ख़ुदा
वस्ल में हिज्र दे ऐसा 
उसे बांधे रखूं फिर भी
मुझे उससे जुदा बना

मेरी इस बाग़ी आवाज़ में
क्या दम
ये शोर और चीखनेवालों की बस्ती है 
अगर यही यहां होता 
कुछ ऐसा कर मेरे ख़ुदा
मुझे ख़ामोश कर दे
और मेरी चुप्पी को
नर्म ख्यालों की सदा बना

मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

हैप्पी बर्थडे मम्मी

सुबह चार बजे उठती थीं मम्मी। हमें पढ़ने के लिए बिठा देतीं और वहीं घरभर के कपड़े आयरन करने में लग जातीं, ताकि नींद उन्हें भी ना आए और हमारी रखवाली भी होती रहे। उस चार बजे उठने का कोई ख़ास फ़ायदा तो मुझे नज़र आता नहीं, सिवाय इसके कि हम तीनों भाई-बहन देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में पढ़ने लायक बने - लेडी श्रीराम, आईआईटी और आईआईएम को काम भर 'लायक' मान लिया जाए तो। हां, मम्मी को उनके सारे कपड़े हर रोज़ सलीके से इस्त्री करते देखने का बड़ा नुकसान ये हुआ कि मुझे आजतक आयरन करने से सख़्त नफ़रत है।

मम्मी सुबह पांच बजे चौके में लग जातीं। अपने कमरे से झांककर देखतीं कि बाबा मॉर्निंग वॉक के लिए निकले हैं या नहीं। फिर पूरा दिन एक टांग पर खड़े होकर चौके में चूल्हा झोंकने में बीतता। पूरे परिवार के लिए तरह-तरह का खाना-नाश्ता बनता और दोपहर बारह बजे नहाने-धोने-पूजा-पाठ करने के बाद मम्मी की प्लेट में पड़नेवाले खाने में कभी सब्ज़ी गायब होती कभी दाल। पूरे दिन रसोई में जूझने, दाल और सब्ज़ी में नमक-मिर्च की आलोचना सुनने के बाद बचा-खुचा खाने की उनकी इस आदत को देखते-देखते मैंने तय किया खाना बनाना और खिलाना दुनिया का सबसे 'अनप्रोडक्टिव' और 'थैंकलेस' काम होता है। ये बात और है कि सबसे ज़्यादा मां के हाथ का खाना खाने की तलब होती है। बाकी, पेट तो कैसे भी भर ही जाता है।

मम्मी त्याग की प्रतिमूर्ति हैं। उनसे कोई भी चीज़ कभी भी मांगकर देखो, मना नहीं करेंगी। ना भी नहीं बोलतीं। इसका फ़ायदा घर-परिवार तो दूर, अड़ोसी-पड़ोसियों ने भी जमकर उठाया। नतीजतन, उनकी शॉल कई पार्टियों में अलग-अलग लोगों ने ओढ़ी (उन्हें पार्टी में जाने की इजाज़त नहीं थी), साड़ियों पर कभी मिठाई का रस, कभी मटर-पनीर की हल्दी गिरी, कानों के बूंदे उतरे, गले की चेन उतरी। मैं ख़ुदगर्ज़ तो नहीं, लेकिन दरियादिल भी नहीं। ना बोलने में खुद को ट्रेन करने लगी हूं बस।

पैंतीस साल में यूट्रस कैंसर हुआ, मौत से जूझकर निकलीं और फिर एक हज़ार बीमारियों का घर बनाकर चलती हैं खुद को। अब इस उम्र में आदत क्या बदले, लेकिन परफेक्शनिस्ट हैं और सफाई का मेनिया है। इस बात से मैंने इतना सीखा है कि हर दो महीने पर अपने शरीर से पूछो, तबीयत और मिज़ाज दुरुस्त तो है, कहीं ओवरहॉलिंग की ज़रूरत तो नहीं? वरना फैमिली हिस्ट्री देख लें तो कई बीमारियां तो रगों में दौड़ती होंगी। दूसरा, आंख मूंदना सीख लिया है। आप दुनिया को अपने हिसाब से नहीं चला सकते और ख़ून इतना भी सस्ता नहीं कि गंदे तवे और बेलन के लिए जलाया जाए।

मम्मी बेहद धार्मिक हैं और बिना नहाए और पूजा किए एक दाना भी मुंह में नहीं डालती। मैं नास्तिक नहीं लेकिन कर्मकांडों में यकीन नहीं करती। मम्मी साल में कम-से-कम 150 दिन व्रत करती हैं, कोई एकादशी प्रदोष नहीं छोड़तीं। मुझसे दो घंटे भी भूख बर्दाश्त नहीं होती। मम्मी तीर्थ और मंदिर दर्शन को अपने जीवन का इकलौता उद्देश्य मानती हैं, मैं तीर्थस्थानों पर भी पर्यटन स्थल ढूंढती हूं। मम्मी त्याग और बलिदान की भाषा बोलती हैं, मैं हक़ का झगड़ा करती हूं। मम्मी टूट-टूटकर संयुक्त परिवार बचाए रखने में यकीन करती हैं, मैं खुद को बचाए रखने की सलाह देती हूं।

ये भी सच है कि ज़िन्दगी के तकरीबन सभी पाठ उनकी ज़िन्दगी को देखकर ही सीखे, और ये भी सच है कि एक रत्ती भी उनके जैसी बन गई तो उम्दा इंसान कहलाई जाऊंगी। आज आपके जन्मदिन पर उन सभी बहस और झगड़ों के लिए क्षमा याचना करती हूं जो हमारे धुर विरोधी विचारों की वजह से हुए। दुआ है कि आपको सेहत भरी और लंबी उम्र मिले। बाकी, दुनिया में मुट्ठी भर लोग भी आपकी तरह हो जाएं तो जन्नत यहीं नसीब हो जाए। क्या मैं अब आपकी तरह बन सकती हूं?

(मम्मी और मेरी ये तस्वीर गांव में छठ की शाम की है)

रविवार, 11 दिसंबर 2011

तक़दीर और तदबीर बदलनेवाली दिल्ली

दिल्ली आने के लिए हमने मूरी-अमृतसर जैसी महाघटिया ट्रेन ली थी, वो भी बड़काकाना से। 1996 की बात है। मैं दिल्ली कॉलेज में दाख़िला लेने आ रही थी, करीब-करीब बगा़वत करके। मेरी बेतुकी ज़िद में मेरी मां साथ दे रही थी मेरा, और मुझे लेकर वो भी सालों बाद दिल्ली आ रहीं थीं। जब अपने कॉलेज के दिनों में आया करती होंगी तब उनके बाबा सांसद थे, लुट्यन्स दिल्ली के अतुल ग्रोव लेन में रहते थे। अब आ रही थीं तो एक भाई का सहारा था, जो पश्चिम विहार के किसी एलआईजी फ्लैट में रहते थे। मामाजी मेरे पार्टनर इन क्राइम थे। उधर रांची में मैंने बग़ावत का झंडा उठाया था, इधर दिल्ली के चार नामी वूमेन्स कॉलेज में उन्होंने मेरे नाम के एडमिशन फॉर्म्स भर दिए थे। दिल्ली स्टेशन पर हम रात के साढ़े बारह बजे पहुंचे थे। ना कुली मिला कोई, ना टैक्सी ही। दरअसल टैक्सी फ़िज़ूलखर्ची लगती थी मामाजी को। (तब भी लगती थी, अब भी लगती है।) सो, हमने पश्चिम विहार तक के लिए कोई डीटीसी बस ली थी, लेकिन सैय्यद नांगलोई तक का तकरीबन दो किलोमीटर तक का रास्ता पैदल तय किया था। मामाजी सूटकेस उठाए दिल्ली में होने के फ़ायदे गिनाते रहे थे। उन्हें पूरा भरोसा था कि ये शहर मेरी तक़दीर और तदबीर दोनों पूरी तरह बदल देगा।

उस एलआईजी फ्लैट में कटनेवाली ज़िन्दगी के अनुभव बयां करने बैठूं तो एक हफ्ता लग जाएगा। लेकिन ये बता सकती हूं कि छोटे शहर से नाक पर गुरूर और ज़िन्दगी को लेकर हसीन ख़्याल लेकर आई लड़की की कई धारणाएं उस एक जगह ने बदल डालीं। 12-14 कमरों का घर, हसीन गुलाबी पर्दे, ढेर सारा स्पेस, अपना बाथरूम, टीवी और म्युज़िक सिस्टम, शॉफर ड्रिवेन एयरकंडीशन्ड एस्टीम, रांची क्लब की हसीन शामें और लॉन में खिलनेवाले पेट्यूनिया, जिनिया, गुलाब और ग्लैड्युला के फूल पीछे छूट गए थे। यहां रोज़-रोज़ की जद्दोजेहद थी। दो कमरों में समाए पढ़ने के लिए दिल्ली आए कई बच्चे और अनगिनत मेहमान थे, दो घंटों के लिए आनेवाला पानी और मदर डेयरी का बेस्वाद दूध था और ढेर सारी उमस और मच्छरों से भरी शामें थीं। रही-सही कसर रेड, ब्लू और ग्रीन लाइन बसों ने पूरी कर दी थी। ऐसा लगता था जैसे किसी राजकुमारी के पैरों के नीचे से मखमली कालीन और सिर पर से भव्य और सुंदर कंगूरों वाली छत खींचकर उसे जून की धूप में पंजाबी बाग के चौराहे पर आज़ादपुर से आनेवाली बस का इंतज़ार करने के लिया खड़ा कर दिया गया हो।

बस भी मिली, मैं कॉलेज भी जाने लगी। लेडी श्रीराम जैसे फैन्सी कॉलेज में अपना टूटा-फूटा गुरूर बचाने के लिए कई मुखौटे ओढ़े, कई रंग बदले। नए शहर में नए लोगों के बीच जीना आसान ना था तो नामुमकिन भी ना था। ये शहर लाखों लोगों को हर दिन आशियाना देता है, मेरे पंखों को परवाज़ क्यों ना देता? हॉस्टल ना मिला तो पेइंग गेस्ट बनकर साउथ दिल्ली में रहने का अनुभव भी हुआ, फिर पचपन खंभों और लाल दीवारों वाला कॉलेज भी एक दिन घर बन ही गया। धीरे-धीरे इस शहर से नाता भी बदलने लगा। लेकिन ये एक लंबी और थका देनेवाली प्रक्रिया थी। ये शहर मुझे बांहें फैलाए बुलाता, मैं अड़ियल और ज़िद्दी महबूबा की तरह मुंह फेर कर नए मुकाम तलाशती। 

याद है कि पहली छुट्टियों के बाद लौटते हुए ट्रेन में वॉकमैन पर लूप मोड में बैट्री डाउन हो जाने की हद तक 'छोड़ आए हम वो गलियां' सुनती रही थी और बाथरूम में जाकर नाक सुड़कती रही थी। ये भी याद है कि दिल्ली की परिधि में ट्रेन के दाख़िल होते ही कंटीले बबूल और गंदी यमुना को देखकर दिल डूबने लगता था, मन होता था कि यार्ड तक जाकर इसी ट्रेन में बैठी रहूं और वापस घर चली जाऊं। ये भी याद है कि दिल्ली को बेहतर समझने-जानने की कोशिश में मैंने बक़ायदा दिल्ली पर वर्कशॉप किए, खुशवंत सिंह की निगाहों से वेश्यारूपी दिल्ली को समझना चाहा, तमाम वो कोशिशें कीं कि इस शहर से मुझे मोहब्बत ना हो तो नफ़रत भी ना हो। लेकिन हर तीन महीने पर घर लौट जाने की बेचैनी होती, कैरियर के हर पड़ाव पर रांची जा बस जाने के बहाने ढूंढती। लेकिन ऐसी किस्मत कि लौटकर यही आती, कभी पढ़ाई पूरी करने, कभी नौकरी की तलाश में। दिल्ली को ठुकराने की तमाम कोशिशें नाकाम रहीं और मैं यहीं की होकर रह गई हूं।

पंद्रह सालों में इस शहर ने वो सभी सुख और पहचान दिए, जो एक शहर से आप हासिल कर सकते हैं - क़रीबी दोस्त, नौकरी और नौकरी छोड़ने का भरोसा, फोनबुक में मौजूद सैंकड़ों नंबर, बिना किसी प्लानिंग के कहीं चलते हुए जाने-पहचाने चेहरे मिल जाने का सुख, आज़ादी, अपनी मर्ज़ी का जीवन, ऑटोवालों से उलझने का आत्मविश्वास और हर तरह के मौसम की मार झेलकर भी बचे रह जाने का साहस। इसी शहर ने अनुभवों का टोकरा बगल में ऐसा रखा कि आजतक चुन-चुनकर फूल और कांटे निकाल रही हूं उनसे। सात रुपए में पीवीआर में सामनेवाली रो में बैठकर 'मेन इन ब्लैक' देखी तो पांच सौ रुपये देकर लक्ज़री क्लास में 'द डर्टी पिक्चर' देखने की कुव्वत भी आई। 442 और 724 से सीढ़ियों पर लटकर तीखी धूप में रिंग रोड के पिघलते अलकतरे को देखा तो अपनी गाड़ी रोककर अपने माज़ी को लिफ्ट भी दिया है इसी शहर में रहते हुए। पांच रुपये में रिक्शेवालों के साथ बैठकर छोले-कुलचे का लंच मूलचंद फ्लाईओवर के नीचे किया तो कई वीकेंड्स पर सुबह छह बजे कॉफी पीने के लिए वसंत कॉन्टिनेन्टल और ताज भी गई।    

हम कई सारे कच्चे, नासमझ ख्वाब लेकर आए थे यहां। आज पैरों के नीचे ज़मीन है और एक भरोसा भी कि नामुमकिन कुछ भी नहीं होता।  दावे के साथ नहीं कह सकती कि इस शहर को पूरी तरह जान-समझ लिया है। ये ज़रूर कह सकती हूं कि इस शहर ने हम जैसे चुन-चुनकर निकाले हैं और मेरी मुकम्मल पहचान इसी शहर की देन है। मैं इस शहर में अपना बुढ़ापा नहीं गुज़ारना चाहती, ना बच्चों को यहीं बसते देखने की ख्वाहिश है। लेकिन तमाम ऐसी दूरियों के बावजूद इस शहर से करीबी रिश्ता बन गया है अब। यहां ट्रैफिक बढ़ता नहीं, ना महिलाएं सुरक्षित हैं इस शहर में। यहां सड़कों पर सांस लेना मुश्किल है, सड़क की पटरियों पर बिना टकराए चलना नामुमकिन। यहां ओवरटेकिंग के झगड़े में गोलियां चल जाती हैं, टोल पर छ्ट्टे मांगो तो मौत मिलती है। लेकिन फिर भी ये शहर दरियादिल है, जीना अपने तरीके से सिखाता है और सबको खुद में कुछ इस तरह समाता है कि अपने-पराए का भेद मुश्किल।

दिल्ली कल राज के सौ साल पूरे कर लेगी। मुझे और तो कुछ सूझता नहीं सिवाय इसके कि एक बार के लिए ये मान ही लूं कि ये शहर ना होता तो वो रास्ते भी ना होते जो इतने सालों में तय किए, ना मंज़िलें होतीं ना उन्हें पार कर लेने का हौसला होता। बाकी, हमें जो मिला, उसकी शिकायतें करना तो हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। उन्हें बेशक तड़प लेने दो जिनके लिए दिल्ली दूर है। दिल्ली की बात चली हो और ग़ालिब को याद ना किया तो क्या किया... 

'सताइशगर है ज़ाहिद इस क़दर जिस बाग़े-रिज्वां का/वो इक गुलिस्ता है हम बेख़ुदों के ताक़े-निसियां का।'

[ज़ाहिद जन्नत के जिस बाग़ की इस क़दर तारीफ़ करता है वो (दिल्ली) तो हम बेखुदों के ताक़ पर रखा एक गुलदस्ता भर है] 

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

लाइफ़ इज़ अ डर्टी पिक्चर, माई फ्रेंड

हम चांदिवल्ली स्टूडियो में शूट कर रहे थे। वहां दो-चार सीरियलों की भी शूटिंग चल रही थी जिनमें एक बालाजी का सीरियल था। सीरियल के लीडिंग रोल में जो लड़की थी, उसे मैं कम पहचानती थी। मां की भूमिका निभानेवाली इस एक्ट्रेस को ज़रूर देखा था कई फिल्मों और सीरियलों में। प्रोडक्शन में होने का एक फायदा था, लंचब्रेक में हमें खाना आख़िर में ही सही, गर्म रोटियों के साथ मिलता था और कई बार इन रोटियों जैसी ही सींकी हुई, गर्म गॉसिप का पूरा डोज़ भी खाने का ज़ायका चटपटा बना देने के लिए आ जाया करता था।

मां के रोल में करीब-करीब मशहूर एक्ट्रेस के बारे में सबसे ज़्यादा कहानियां सुनने को मिलतीं। मैं हैरान। कैमरे के सामने जाते ही कैसे इनकी शक्लें बदल जाया करती हैं! ऐसे ही लोगों से प्रभावित होकर हमारी मांएं सीरियल देखते हुए न्याय-अन्याय की दुहाई देंगी!

एक दिन स्माइल एक्सचेंज करने का नतीजा हुआ कि अगली सुबह वो मुझसे मेरे हाथ में मौजूद किताब के बारे में पूछने आ गईं। मैं उनकी शक्ल के पीछे का चेहरा देखने की कोशिश करती रही, बेटी महमूदी की 'नॉट विदाउट माई डॉटर' पर दिया गया जवाब बहुत संतोषप्रद नहीं था। शाम को हम फिर ग्रीन रूम के बाहर टकरा गए, और हमने बातचीत शुरू कर दी। बाईस साल से फिल्मों में काम कर रही थीं वो।

'रिग्रेट्स?'

'नन।'

'परिवार?'

'दो बार तलाक के बाद तीसरी बार घर बसाने की कोशिश नहीं की।'

'लोनलिनेस?'

'यू हैव द बिगेस्ट वेपन। ऐज़ लॉन्ग ऐज़ इट वर्क्स, यू विल नेवर बी लोनली।'

मैं कान खुजा रही थी, क्या सही सुना था?

'हाउ ओल्ड आर यू?'

'ट्वेंटी टू।'

'आई विल टेल यू समथिंग अबाउट मेन। दे वॉन्ट टू गो टू एक्ज़ैक्ट्ली वेयर दे कम फ्रॉम। ऑल ऑफ देम।'

'द डर्टी पिक्चर' देखते हुए मुझे ग्रीन रूम के बाहर हुई वो टूटी-फूटी बातचीत याद आती रही, जो मेरे लिए फीमेल सेक्सुएलिटी पर सबसे बड़ा और क्रूड सबक था। रेशमा या सिल्क ही उस 'बिगेस्ट वेपन' का इस्तेमाल करना नहीं जानती, अलग-अलग रूपों और तरीकों से वॉर और पीस के हालातों में सेक्सुएलिटी का इस्तेमाल किया जाता रहा है - कभी अपनी रियासतें, कभी रिश्ते, कभी रंजिशें बचाए रखने के लिए। फिर भी शराफत आमतौर पर जिन लोगों की जागीर है, वे खुलेआम शरीर की बात नहीं करते, भले सबसे ज़्यादा शरीर के बारे में ही सोचते हों।

औरतों को तो शिक्षा ही शरीर को मंदिर बनाए रखने की दी जाती है। लज्जा (modesty) और शुचिता (chastity) जैसे सबक औरतों को ही सिखाए जाते रहे। ये बात और है कि पर्दे के पीछे, घरों की चहारदीवारियों में, बंद कमरों में, इच्छा-अनिच्छा से सबसे ज़्यादा यही शरीर और सबक रौंदे जाते हैं। जो छुपकर हुआ तो सही। जो खुलेआम किया तो अश्लील, चरित्रहीन और निर्लज्ज कहलाई जाओगी। इसके बारे में बात करना तो सबसे बड़ी वर्जना। लिख दिया तो गुनाह कर दिया।

कट टू डिबेट कॉम्पिटिशन, जिसकी जज थी मैं आज। विषय - वूमेन एम्पावरमेंट - ए मिथ। ये भी कोई बहस का विषय है? जाने क्यों वेपन वाली बात फिर याद आई है। बच्चों के सामने कैसे कहूं? एम्पावर्ड और वल्नरेबल, दोनों महसूस करने का ये कैसा तरीका है?

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

ऐसी भी बातें होती हैं

वो एक ऐसी ही सुबह थी - धुंध से भरी, ठंडी और तीखी हवाओं वाली। सुबह-सुबह तुम्हारे फोन ने जगाया था, दस मिनट में गेट पर मिलने की बात मैंने सुन भी ली और उन कीमती दस मिनटों को नींद के हवाले भी कर दिया था। याद नहीं कि तुम दस मिनट में पहुंचे थे या एक घंटे में, लेकिन मुझे फिर फोन की घंटी ने ही उठाया था। 'नीचे आओ, हम घर ढूंढेंगे और चाय पिएंगे।' मैं अभी भी मंगेतर थी, तुम्हारी म्यूज़, इसलिए तुम्हें इंतज़ार करवाती तो भी तुम्हें नाराज़ होने का हक़ नहीं था।

ट्रैक्स और सफेद जॉगिंग शूज़ में मैं नीचे थी, दिसंबर की सर्दी और छुट्टी के दिन रजाई छोड़ देने की मजबूरी को जीभर कर कोसते हुए। हम गली के किसी मोड़ पर चायवाले के सामने रुककर चाय पीते, और मुझे भी मना करने का हक़ ना होता। तब भी जब मैं चाय पीती नहीं थी, खाली पेट तो बिल्कुल नहीं और पैन में काली पत्तियों के साथ खौलती काली चाय को देखकर मुझे आमतौर पर उबकाई ही आती थी। लेकिन चाय के कड़वे स्वाद की कल्पना करते हुए मैंने ग्लास अपने हाथ में ले लिया था, कुछ ठंडी हथेलियों पर रहम करने के लिए, कुछ तुम्हें निराश ना करने के डर से। फिर धूप चढ़ जाने तक हम घर की लोकेशन ढूंढते रहे थे - बहुमंज़िली इमारतों और तंग गलियों से होकर गुज़रते हुए एक घर बनाने की ख्वाहिश में हमने एक और छुट्टी निकाल दी थी। हमारी शादी में अब डेढ़ महीने बाकी थे।

घर अब छह साल पुराना हो गया है, शादी की साढ़े साती भी जल्द ही उतर जाएगी। इस घर की दीवारों पर हमारे बच्चों ने अपनी इतनी निशानियां रख छोड़ी हैं कि दीवारों पर नए रंग करवाने का जी नहीं चाहता। चाय मैं अब भी नहीं पीती, खाली पेट तो बिल्कुल नहीं और तुम अभी भी किसी नई तलाश में हो।

फेसबुक पर आधी रात को अचानक तुम्हारे नाम का मेसेज आता है। 'कैसी हो?' मैं हैरान होकर अपनी स्क्रिन देखती हूं। तुमने तो अपनी तस्वीर भी नहीं लगाई।

'पतिदेव, इज़ दैट रियली यू?'

मेरे सवाल के जवाब में तुमने लिखा है, 'पहली बार और शायद आखिरी बार। फेसबुक चैट पर इस तरह। इतनी रात गए क्या कर रही हो?'

'डिप्रेशन पर पढ़ रही हूं और लिखने जा रही हूं, इस उम्मीद में कि इससे बेहतर महसूस कर सकूंगी।'

'डिप्रेशन स्टेट ऑफ माइंड है। हम सब इससे गुज़रते हैं। And the strong woman that you are, the word will not stay with you for long.'

स्ट्रॉन्ग वूमैन - ये तमगा जाने कब हासिल कर लिया। इस वक्त मैं तुम्हें बताना चाहती हूं कि मैं बिल्कुल स्ट्रॉन्ग नहीं। किसी के कंधे पर रो लेने का एक कमज़ोर लम्हा सबसे बड़ा तोहफा होगा मेरे लिए। मैं बिल्कुल स्ट्रॉन्ग नहीं। रात को अंधेरे में मेरी भी सांसें उखड़ती हैं, अकेले कमरे से बाहर निकलने में डर लगता है और बच्चों के सो जाने के बाद हिचकियां ले-लेकर रो लेने के बाद पानी पीने की इच्छा भी होती है तो किचन तक जाने के लिए आदित को गोद में उठाकर बाहर निकलती हूं।

तुम्हें निराश ना करने का डर अब भी कायम है। तब काली चाय की शिकायत नहीं करती थी, अब अकेले होने की नहीं करती।

लेकिन सच तो ये है अकेले इस तरह बच्चों को बड़ा नहीं करना चाहती। मेरे पैरों के नीचे की ज़मीन अक्सर धोखे देती नज़र आती है। मैं सोशल गैदरिंग्स में नहीं जाना चाहती क्योंकि तुम साथ नहीं। मैं हमउम्र मांओं और अपने बच्चों के हमउम्र दोस्तों की वो सेटिंग्स खोजती हूं जहां कोई पापा के शाम को ना आने को लेकर हैरानी ना जताता हो। मुझे बैंक जाने से नफरत है, इंटरनेट बैंकिंग तो मुझे बिल्कुल समझ नहीं आती। मैं डॉक्टर के पास अकेले नहीं जाना चाहती, पीटीएम में टीचर ने तुम्हारे बारे में पूछना छोड़ दिया है और दो बच्चों को संभालते हुए मॉल में गाड़ी पार्क करते हुए मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है। मैं तुम्हारी टिकट पर किसी और को सफ़र करते देखते हुए, एयरपोर्ट और स्टेशनों पर अपने सूटकेस और ट्रॉलियां अकेले खींचते हुए भी थक चुकी हूं।

घर तो हम साथ ढूंढने निकले थे ना? फिर इस घर को घर बनाए रखने का दारोमदार मेरे तन्हां कंधों पर कब और कैसे आ गया?

मुझे शिकायत करने का हक़ नहीं। तुममें शिकायत करने लायक कुछ है ही नहीं। तुम सीरियस टाईप हो, सॉलिड। तुम कभी झूठ नहीं बोलते, किसी को खुश करने के लिए भी नहीं। तुम अपने परिवार से बेइंतहा प्यार करते हो और ये तमाम कुर्बानियां उनकी बेहतरी की ख़ातिर ही है। तुम परंपराएं नहीं तोड़ते, झूठे वादे नहीं करते और जो कहते हो, उसपर कायम रहते हो। तुम्हें मुझपर अटूट भरोसा है और तुम्हें निराश करना मेरे लिए अक्षम्य अपराध हो शायद।

लेकिन स्ट्रॉन्ग तो मैं फिर भी नहीं कहलाना चाहती। मेरी कमज़ोरी माफ़ करो और मुझे कमज़ोर ही बने रहने दो क्योंकि तुम्हारी गैरहाज़िरी में तुमसे प्यार करते-करते मैं और कमज़ोर पड़ने लगी हूं।

तुम्हारी पुरानी गाड़ी में 'अनुपमा' का कैसेट बजा करता था। जाने क्यों सुबह से उसी फिल्म का एक गीत लूप में बजा रही हूं।

सोमवार, 5 दिसंबर 2011

खुश हो जाओ कि तुम डिप्रेस्ड हो!

कभी कोई आर्टिकल पढ़ा था चार्ल्स डार्विन के बारे में। अपनी आत्मकथा में डार्विन ने अक्सर ऐसी मानसिक स्थिति में होने की बात स्वीकारी जब तीन दिनों में कम-से-कम एक दिन उनसे कोई काम नहीं होता था, जब डर उन्हें इस कदर घेरे रहता था कि दिमाग नाकाम हो जाए और उनकी रुलाई ना बंद हो। ये मुमकिन है कि इसी दिमागी हालत ने डार्विन को काम करने की प्रेरणा दी, अपनी तन्हाई से बचने के लिए उन्होंने दुनिया से कन्नी काटी और अपने शोध की ओर अपनी पूरी ताकत झोंक दी। अपनी आत्मकथा में वे लिखते हैं, "काम ही इकलौती ऐसी चीज़ है जो मेरे लिए ज़िन्दगी को बर्दाश्त करने लायक बनाती है। काम ही एन्जायमेंट का इकलौता ज़रिया है।" डार्विन के लिए डिप्रेशन एक ऐसी ताकत थी जिसके दम पर उनका दिमाग समस्याओं को सुलझाने के काबिल बनता था।

हम डार्विन की तरह भले ही वर्कोहॉलिक या विलक्षण ना हों, लेकिन उनके जैसी मानसिक स्थिति से अक्सर रूबरू तो होते ही हैं। शामें अक्सर खालीपन लिए आती हैं, आवाज़ें अक्सर डूबती-सी लगती हैं और जीना कई बार बेमानी लगता है। जिस तरह शरीर बीमार पड़कर, थककर आराम मांगता है, वैसे ही दिलोदिमाग को भी आराम की ज़रूरत पड़ती होगी। अवसाद के लम्हे हमें यही बताने आते हैं - अब रुको, थमो। ना भी थमना चाहो तो अपनी शक्ति कहीं और लगाओ।

कई बार अवसाद हमारे लिए वरदान की तरह आता है। अपने आस-पास की गहरी खाई हमारे होश-ओ-हवास में अक्सर कम ही दिखाई देती है। अवसाद के लम्हों में हम अपने सबसे करीब, अपने सबसे शुद्ध, ईमानदार रूप में होते हैं। वल्नरेबिलीटी (vulnerability) का अपना सुख है। टूटकर बिखरने का शऊर सबको नहीं आता। जिसे आता है, वो वापस उतनी ही तेज़ी से खुद को जोड़ लेता है। टूटना और फिर खुद को समेटना हिम्मत का परिचायक है। जो टूटने से घबराता है, इस कदर चूर-चूर होता है कि नामोनिशां मिलना मुश्किल। मैं कोई एक्सपर्ट नहीं, लेकिन सबके सामने टूटकर अपने असली रूप में आ जाने का डर ही शायद ज़िन्दगी से पूरी तरह मुंह मोड़ लेना का सबब बनता होगा।

अवसाद की काली शामें गहरी रातें लेकर आती हैं और रातें कितनी भी गहरी हों, सुबह तो होती ही होगी। अपनी तकलीफों से परेशान हम खाना बंद कर दें, रतजगों को हथियार बना लें, तकिए को सूखने ना दें या फिर मर जाने की ही ख्वाहिश क्यों ना करें, कोई एक उम्मीद, एक हसीन लम्हा ज़िन्दगी को जिए जाने के काबिल बना ही जाता है।

कई घंटों के सेल्फ-इन्फ्लिक्टेड डिप्रेशन से तंग आकर मैंने डिप्रेशन के बारे में और समझने के लिए गूगल का सहारा लिया है। लंबी-लंबी थ्योरिज़ और एक्सपर्ट ओपिनयन ऊबाऊ हैं। डिप्रेशन के हर लक्षण में अपनी परछाई नज़र आती है। और फिर जॉन हॉपकिन्स में साइकिएट्री के प्रोफेसर के रेडफील्ड जेमिसन की थ्योरी पढ़ती हूं, रचनात्मक लोग तय रूप से डिप्रेशन प्रोन होते हैं। जेमिसन के मुताबिक अवसाद लोगों को बेहतर तरीके से सोचने की ताकत देता है। लेकिन तब, जब आपने अपनी तकलीफों की पहचान कर ली है और आप उनसे जूझने के लिए तैयार है। यही तो सबसे बड़ी विडंबना है: हमारी तकलीफें ही अंततः हमारे काम आती हैं, लेकिन उनसे बचने के लिए हम मारे-मारे फिरते हैं। 

इतना ही नहीं, सफल माने जानेवाले इन्डिविजुअल्स  को आम लोगों से आठ गुना ज्यादा डिप्रेशन होता है। मैंने खुद को 'ऑलमोस्ट डिप्रेस्ड', 'ऑल्मोस्ट क्रिएटिव' और 'ऑलमॉस्ट सक्सेसफुल' की श्रेणी में डाल दिया है। वैसे ऑलमोस्ट बेहतर महसूस करना ऑलमोस्ट डिप्रेस होने से ज्यादा आसान है!

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

दिसंबर से डर लगता है

फिर धुंध उतरा करेगी और अपने दिन रौशन करने के लिए मेरे पास एक हीटर के अलावा कुछ ना होगा। कभी अपनी, कभी बच्चों की सेहत के लिए परेशान होते हुए मैं जीभर कर सर्दियों को कोसा करूंगी। लेकिन मेरी सज़ा की मोहलत फिर भी कम ना होगी।

उदास होने की कोई वजह ना होगी, सिवाय इसके कि मेरे हिस्से की धूप गुम होने लगी है आजकल। मुझे गुलाबी पर्दों, धूपवाले आंगन और खुली छत वाला अपना घर याद आया करेगा, और याद आएगा डैम का वो किनारा जहां घास नहीं, पीले फूल खिलते थे। अमरूद, गन्ने और ओल के अचार का स्वाद फिर ज़ुबान को सताने के लिए याद आ जाया करेगा अक्सर। आंगन में खिलनेवाली गुलदाऊदी, डालिया और पैन्ज़ी के लिए भी रो लूंगी कभी ज़ार-ज़ार।

फिर एक दिन थक जाऊंगी, खिड़कियों पर पर्दे डाल दूंगी, घड़ियों के मुंह पर बांध दूंगी पट्टियां और आंखें मूंदकर नींदों में रंग भरूंगी। सर्दियों में शुतुरमुर्ग हो जाने का अपना सुख है। हम एफडीआई, डर्टी पिक्चर और लोकपाल पर फिर कभी बात कर लेंगे।