मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

'हाईवे' के बहाने प्रेम और यायावरी

सिर दर्द से फटा जा रहा हो तो क्या करना चाहिए?

सिर दर्द से फटा जा रहा हो तो कोई फिल्म देख आना चाहिए। फिर दो ही संभावनाएं बचेंगी - या तो दर्द इस हद तक बढ़ जाएगा कि अस्पताल जाना पड़ जाए, या फिर कुछ देर के लिए सही, दर्द से बढ़कर कोई और दर्द जी रहे होंगे हम।

ये बेतुका ख़्याल साइनस का इलाज करते हुए स्टीमर में चेहरा घुसाए अचानक से कौंधा था, बिजली की तरह। फिर कब ख़्याल फितूर बन गया, और कब बिजली की रफ़्तार से तैयार होकर मैं घर से बाहर निकल गई, मालूम ही न चला। होश तब आया जब मेरे पीछे ऑटो-लॉक दरवाज़ा बंद हो चुका था, और घर की चाभी भीतर रह गई थी।

अब मेरे पास 'पिच्चर' देखकर वक्त काटने के अलावा कोई चारा नहीं था।

लेकिन अपनी जल्दबाज़ी के फल मिलने बाकी थे अभी।

गाड़ी में बैठकर कुछ दूर आ गई तो होश आया कि पर्स तो घर पर ही छूट गया। पर्स माने छोटा वाला बटुआ। हम दो पर्स लेकर चलते हैं - एक झोलानुमा पर्स और एक पर्सनुमा बटुआ।

तो पैसों वाला बटुआ रह गया उस घर में, जिसकी चाभी मेरे पास नहीं थी और झोलानुमा पर्स झाड़-झुड़ कर लेने के बाद उससे निकल आए ठीक दो सौ तीस रुपए - जिससे फिल्म देखने का इंतज़ाम पूरा हो गया। दो सौ रुपए की टिकट, और तीस रुपए की पार्किंग। पिच्चर तो हम देखकर ही रहेंगे आज, चाहे पॉपकॉर्न से समझौता क्यों न करना पड़े।

तो दोपहर के शो के लिए नाक सुड़काते, छींक मारते, अपने बढ़े हुए साइनस को कोसते हुए हम पहुंच गए स्पाईस मॉल। पूरा टिकट काउंटर खचाखच भरा हुआ। 'हाईवे' देखने के लिए अंकल-आंटी, मम्मी-पापा-बेबी सब पहुंचे हुए थे। टिकट ले चुके थे तो मालूम पड़ा किसी की बर्थडे ट्रीट है। ये लो! जिस अकेलेपन का मज़ा उठाने के लिए हम अकेले पिच्चर देखने आए थे, उस अकेलेपन के मुंह पर तो लोगों ने बटर स्कॉच केक थोप दिया!

हम भी ज़िद्दी! बर्थडे पार्टी से दस कतार छोड़कर आगे जा बैठे। शोर-शराबे से जितना दूर रहेंगे, सिर दर्द का इलाज उतना जल्दी हो सकेगा। हाईवे में साउंड डिज़ाईन रेसुल पुकुट्टी का है, इसलिए साउंड के सेन्सिबल बने रहने की उम्मीद तो की ही जा सकती है।

फिल्म शुरू होती है तो लगता है कि जैसे एडिटर टाईमलाईन पर भारत दर्शन के शॉट्स डालकर एडिट करना भूल गई हो। जाने क्यों मुझे खटका लगता है। कुछ है जो कहीं से टूटने वाला है, कुछ लंबी-बड़ी उम्मीदें।

लेकिन जो बिल्कुल नहीं टूटता, एक किस्म का अंतर्ध्यान है जो हाईवे के साथ-साथ चलता रहता है। फिल्म का इंटरवल कब आता है, मालूम भी नहीं चलता। बल्कि इंटरवल आता है तो लगता है कि इस पहले हिस्से की तो फिल्म में ज़रूरत ही नहीं थी। Prelude के नाम पर फिल्मकार ने बहुत लंबा वक्त ले लिया हमारा। लेकिन कहानी भी इंटरवल के पहले हिस्से में ही है। फिल्म का दूसरा हिस्सा एक सफ़र है, एक अंतहीन सफ़र। एक ऐसा अंतहीन सफ़र जिसपर मैं और आप होने की कामना करते हैं, लेकिन उसे जीता शायद इम्तियाज़ अली जैसा ही सनकी, पागल, eccentric फिल्मकार है।

'हाईवे' सिर्फ एक रईस बाप की इकलौती बेटी वीरा के उठा लिए जाने की कहानी नहीं है।

'हाईवे' एक अक्खड़ गुज्जर महादेव भाटी की ज़िद, उसके अमीरों के प्रति नफरत से उपजनेवाले नतीजों की कहानी भी नहीं है।

हाईवे प्रेम कहानी भी नहीं है।

हाईवे स्टॉकहोम सिंड्रोम तो बिल्कुल नहीं है।

हाईवे इन सबसे बढ़कर कुछ है।

जिस साउंड डिज़ाईन से बहुत उम्मीदें थी, वही साउंड डिज़ाईन फिल्म से बांधे रखती है हमको। दूर निकलती ट्रेन, घुप्प अंधेरे में आती झींगुरों की आवाज़, गाड़ियों के पहिए, गलती से कहीं किसी बर्तन के गिरने की आवाज़ और इन थोड़ी सी आवाज़ों के बीच ढेर सारा सन्नाटा। इस साउंड डिज़ाईन में ए.आर. रहमान का बैकग्राउंड स्कोर क्या कर रहा है, कहीं समझ में नहीं आता। बल्कि 'माही वे' और 'पटाका कुड़ी' अलग से न सुना होता, तो शायद फिल्म में ए.आर.रहमान की भूमिका को लेकर बहुत देर तक पिच्चर हॉल में बैेठे-बैठे सिर खुजा सकती थी।

कहने को तो सिनेमैटोग्राफी पर भी कुछ कहा जा सकता है, लेकिन वो मेरी विशेषज्ञता का दायरा नहीं है। हालांकि फिर भी इस बात पर हैरानी होती है कि जो फिल्म पूरी तरह आउटडोर है, जहां लोकेशन्स अपना काम खुद कर रहे हैं वहां भी कुछ ऐसे शॉट्स क्यों नहीं लिए जा सके जो याद में ठहर जाने के काबिल हों?

लेकिन 'हाईवे' सिनेमैटोग्राफर की फिल्म भी नहीं है। बल्कि हाईवे किसी टेक्नीशियन की फिल्म तो है ही नहीं। हाईवे पूरी तरह इम्तियाज़ अली की फिल्म है, या फिर आलिया भट्ट और रणदीप हुड्डा की।

वैसे मैंने ये पोस्ट फिल्म की आलोचना या रिव्यू के लिए लिखना शुरू नहीं किया था। मैं तो फिल्म देखने के बाद पैदा हुई बेचैनी को कम करने के लिए ये पोस्ट लिखना चाहती थी।

तकनीकी तौर पर फिल्म कैसी भी रही हो, मेरे लिए 'हाईवे' बचपन के ज़ख्मों से समझौता करके जीने, उन्हें भूलने और भूलने के लिए कुछ ऊटपटांग करने की हिम्मत रखने की कहानी है।

हम सब अपने सीने पर अपने गुज़रे दिनों के भारी पत्थर लिए चलते हैं। उन पत्थरों को पिघलाने का रास्ता किसी ऐसे ही हाईवे से होकर जाता है शायद, जिसपर हम कभी चले नहीं। जिसे कभी देखा नहीं। जिसे देखने की, जीने की हिम्मत नहीं रखते हम। हम तो प्लानिंग में जीते हैं। कम्पार्टमेंट्स में। इतने पैसे हो जाएंगे, तो इतने दर्शनीय स्थल, इतने टूरिस्ट प्लेस देख लेंगे हम। बच्चे इतने बड़े हो जाएंगे तो ये-ये देख लेंगे।

लेकिन एक ज़िन्दगी वैसी भी होती है जिसमें कोई प्लानिंग नहीं होती। जो अपने-आप चलती रहती है। जेब के बचे-खुचे दो सौ तीस रुपए ख़त्म भी हो जाएं तो क्या रुकता है? लेकिन एडवेंचर हमारे लिए पैकेज टूअर के साथ मिलने वाला पैम्फलेट है जिसपर टिक मार्क लगाकर हम खुद को बहुत एडवेंचरस, बहुत बड़े घुमक्कड़ मान लेते हैं।

मेरे लिए 'हाईवे' अपने घुमंतूपन से बेइंतहा प्यार करने, अपने भीतर का यायावर बचाए रखने का यकीन दिलाने वाली फिल्म है, जो प्लानिंग नहीं करता, जो इम्पलसिव है, एक छोटे बच्चे की तरह ज़िद्दी भी।

यूं भी जो इंसान किसी मंज़िल का नहीं होता, वो इंसान सबका होता है - उसी शुद्धता, उसी ईमानदारी के साथ, जिस ईमानदारी के साथ वो रास्ते का होता है।

मंज़िलें हमें सीमाओं में जकड़ती हैं। रास्ते हमें स्वच्छंद छोड़ते हैं। मंज़िलें अनुरक्ति का ज़रिया हैं, अटैचमेंट हैं। रास्ते हमें अनासक्त रखते हैं। रास्ते हमें विरक्त रखते हैं, बिल्कुल डिटैच्ड। बौद्ध भिक्षुएं के यायावर होने के पीछे का राज़ अब समझ में आया है। रास्ते हमें ईश्वर के क़रीब रखते हैं। रास्ते हमारे भीतर का प्रेम बचाए रखते हैं।

मेरे लिए 'हाईवे' उस एक लम्हे को समझने की राह खोलने वाली फिल्म है जिसमें  प्रेम अपने शुद्ध रूप में होता है - अपेक्षाओं के परे, उम्मीदों से दूर। वीरा से महावीर पूछता है कि तुम आख़िर चाहती क्या हो? मेरे साथ शादी करोगी? बच्चे पालोगी? वीरा बहुत मासूमियत से कहती है, ऐसा कोई प्लान तो नहीं है।

ये वो प्रेम है जो उदार है, सिर्फ समर्पण जानता है। ये प्रेम बांधता नहीं है। सामने वाले से कोई उम्मीद नहीं करता, सिवाय इसके कि जितना हासिल हो, वो सांस-सांस जी लिया जाए। इस प्रेम में भी कहीं कोई प्लानिंग नहीं है। लेकिन हममें से कितने लोग कर पाते हैं इस तरह अपने घर-परिवार-बच्चों से प्यार? हमारा प्यार कितना अनुरक्त होता है, कितना डरपोक, किस हद तक असुरक्षित!

'हाईवे' मेरे इस यकीन को बचाए रखता है कि हर प्रेम कहानी का अंत सुखांत ही नहीं होना चाहिए। जो अधूरा है, वही सुन्दर है। दैवीय। कभी न ख़त्म होने वाले रास्ते की तरह। उन रास्तों की तरह, जिनपर मैपरीडिंग करते हुए नहीं चला जा सकता। उन रास्तों की तरह, जिनकी अहमियत सिर्फ और सिर्फ आप समझते हैं, या फिर आपकी ये आत्मा। 'हाईवे' पर चलना उसी रूहानियत को बचाए रखना है।

एक पहाड़ी नदी की तेज़ धार के ठीक बीच पत्थर पर बैठी हुई वीरा जब पहले हंसती है, और फिर रो पड़ती है तो उसके साथ-साथ उतनी ही ज़ोर-ज़ोर से रोने को जी चाहता है। अपनी ज़िन्दगी की आपाधापी में हम कैसे ख़ुद को खो देते हैं! और ख़ुद से मिलते भी हैं तो कहां! वो तेज़ धारा वीरा को बहाकर ले ही गई होती तो क्या अफ़सोस होता। किसके लिए जीना है, और किस जीवन के लिए इतनी हाय-तौबा!

पहाड़ पर का घर एक वीरा का ही सपना नहीं, हममें से जाने कितनों का सपना है वो। लेकिन सपने सपने ही रहे तो अच्छा। सच होते ही उनका रोमांस भी खत्म हो जाता है, रोमांच भी।

मैं इम्तियाज़ अली की बड़ी फैन नहीं हूं। बड़ी तो क्या, छोटी-मोटी भी नहीं हूं। लेकिन जाने क्यों भीतर से ये इच्छा होती रही कि 'हाईवे' इम्तियाज़ की पहली फिल्म होनी चाहिए थी, या फिर आख़िरी। इसके पहले, या इसके बाद का सफ़र कुदरत से दूर करने की हरसंभव कोशिश करता हो शायद। लेकिन हाईवे कुदरती तौर पर imperfect है, और यही imperfection इस फिल्म की ख़ूबी है।

फिल्म खत्म होने के बाद मैं बहुत देर तक बैठी सोचती रही हूं कि जो जिया उसमें सबसे ख़ूबसूरत यायावरी थी - अजमेर से पुष्कर तक अकेले एक बस में किया गया सफ़र, मुक्तेश्वर के एक कैंप से दिखाई देने वाला खुला आसमान, सातताल के पास के किसी अनाम गांव में किसी अनजान घर में परोसा गया राजमा-चावल, अलवर के एक गांव से दूसरे गांव की धूल खाती जीपयात्रा, नगापट्टिनम के प्लेटफॉर्म पर किया गया इडली-चटनी का नाश्ता, आणंद की किसी सड़क पर गिरती हुई दोपहर का सुकून, गोड्डा के किसी पहाड़ी गांव में गुज़री कोई रात, कॉर्बेट के किसी गांव में मनाई गई भांग में डूबी कोई एक अलमस्त होली...

ये हाईवे है। कीकर, पीपल, साल, बांस, टेसू, अमलतास, गेहूं, मक्का, सरसों, गोभी, बाजरा, चीड़, देवदार और जाने कौन से नामी-बेनामी खेतों, जंगलों, रास्तों के बगल से होकर गुज़रने वाला हाईवे। फिल्म देखिए न देखिए, अपने आप को बचाए रखने के लिए साल में दो-चार बार हाईवे पर ज़रूर उतरते रहिए। बिना मैप, बिना प्लान के। ख़ुद से मिलने का इससे बेहतर और कोई रास्ता नहीं होगा।

अपनी ज़िन्दगी में जिए गए हाईवे के बारे में सोच-सोचकर अब सिर तो क्या, ऊपर की छत भी घूम रही है। इसलिए कई विरोधाभासों की उंगलियां थामे मैं अपनी मंज़िल की ओर रूख कर चुकी हूं।

7 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

यायावरी में सारी पीड़ा चली जाती है, सब मुक्त, कारण भी और प्रभाव भी।

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…


ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन देश-सेवा ही ईश्वर-सेवा है - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Rangnath Singh ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.
Rangnath Singh ने कहा…

लगता है कि फ़िल्म देखनी ही पड़ेगी.

Pratibha Katiyar ने कहा…

Sundar

मुकेश कुमार सिन्हा ने कहा…

आपके शब्दो मे हाइवे और बेहतरीन हो गई :)

Harihar (विकेश कुमार बडोला) ने कहा…

राजमार्ग पर की गई यात्राएं ही हमारी अन्‍तरतम मार्ग के चक्षुओं को खोलती हैं। आणन्‍द में गिरती दोपहर को आपकी दृष्टि ने पकड़ा......यह कितनी संवेदनशीलता का परिचायक है।