गुरुवार, 22 सितंबर 2011

एक चिड़िया

नीम की शाख पर बैठी
बुनती है जीवन के धागे
बनाती है घोंसला
तिनका-तिनका
क़तरा-क़तरा।

गिरती हैं बूंदें
या चलती हो पुरवाई
पछुआ का झोंका
या धूप की सताई,
घोंसले में ही
बनता है वृत्त कोई।

कभी निःश्वास,
और चुपचाप, थमी हुई
कुछ लम्हों से गुज़रे
ऐसे अचानक
जैसे पंखों में परवाज़,
बोली में गीत,
पैरों में थिरकन
जैसे लताओं-फूलों की
झांझरी में उतरा हो आकाश।

क्या चिड़िया की नियति
है उसकी अपनी लय,
अपना विनाश?

7 टिप्‍पणियां:

के सी ने कहा…

ज़िन्दगी ने जिस किसी में भी साँस की माला बुनी है उसका यही है. चिड़ियों का गीत भी इतने ही रंग लिए होता होगा. कभी कभी ज़िन्दगी की मुश्किलें उसे सुंदर बनाती है, मगर जाने क्यों ...

Rajeysha ने कहा…

नहीं जी चि‍डि‍या तो इतनी नाराज, इतनी उदास कभी नहीं दि‍खी....अपनी लय में वि‍नाश कैसे संभव है ?
जुर्म क्या? ये सजा क्यों है?

vandan gupta ने कहा…

नही ये तो नियति नही हो सकती।

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

चिड़िया भले ही नीम के वृक्ष में रहती हो..उसे पीपल का आशीर्वाद सदैव मिलता रहता है। चिड़िया चहकती भी है, हंसती भी...खुशियों से भर देती है वृ्त्त को।

Arvind Mishra ने कहा…

आज कुछ उद्विग्न मन है ...
चिड़िया तो उत्कट जीवट और जिजीविषा की सन्देश देती है
मानव जीवन को सीख देती फिरती है -
यहाँ तक कि नीड़ का निर्माण फिर फिर ...
फिर चिड़िया को काहें कोसना -
तनिक हरिवंश की की यह कविता पढ़ें और सुने तो जरुर -
http://mishraarvind.blogspot.com/2009/11/blog-post_26.html

Gyan Dutt Pandey ने कहा…

चिड़िया जाने क्या सोचती होगी।

Unknown ने कहा…

चिड़िया को भी आता हैं जीवन जीना और मानव को सिखाना किसे कहते हैं जीवन.. सुन्दर भाव
http://savanxxx.blogspot.in