Tuesday, March 31, 2015

घर छोड़कर चल देना एक दिन

(मॉर्निंग पेज ३९)

हम कई साल एक ही घर में रहे - पूरे बचपन। परिवार के आकार के हिसाब से घर बनता गया, फैलता गया। लेकिन ज़मीन-जगह वही रही। आस-पड़ोस वही रहा। ख़ुशबुएं, बदबू वही रहीं।

फिर दिल्ली आई और हर तीन-छह महीने में ठिकाना बदलता गया। पहले मामाजी का घर, फिर किसी दोस्त का घर, फिर पीजी, फिर हॉस्टल, फिर हॉस्टल के इस कमरे से उस कमरे में भटकना, फिर पीजी, फिर हॉस्टल... कई साल ये सिलसिला चलता रहा। सामान था नहीं मेरे पास। एक गद्दा, एक रजाई, एक तकिया, दो सूटकेस,दो एयरबैग, एक बाल्टी, एक मग और तीन कार्टूनों में गृहस्थी सिमट जाया करती थी। फिर जहां-जहां से होकर गुज़रते, वहां-वहां अपने हिस्से का थोड़ा-सा कुछ वहीं छोड़ देते।

कई साल बाद एक किस्म की स्थिरता एकअदद-सी नौकरी और अपनी सबसे पुरानी सहेली के फ्लैटमेट बन जाने पर आई। मयूर विहार वो ठिकाना था जो ढाई-तीन साल तक बना रहा। फिर से वही घर, वही आस-पड़ोस, वही ख़ुशबुएं...

शादी हुई तो कुल दस साल में ये चौथी बार है कि हम ठिकाना बदल रहे हैं, इस उम्मीद में कि ये आख़िरी बार है कि सामान बंध रहा है, यादें सिमट रही हैं और घर-दिमाग़ से कचरा बाहर किया जा रहा है।

घर क्या था, और क्या हो गया है, ये भी सोचने की बात है। नींद में अपने बच्चों से पूछा मैंने, घर कहां है तुम्हारा? आधी नींद में ही जवाब आया उनका, २७६, नोएडा। यानी जिस घर में अभी तक हम गए भी नहीं वो उनका नया घर, नया पता बन गया। बाकी के जिन दो घरों में उन्होंने अपना बचपन निकाला वो भी मायने नहीं रखता। ये भी मायने नहीं रखता कि उनके पिता के लिए घर पूर्णियां है, और उनकी मां को तो ख़ैर मालूम ही नहीं कि घर कहां था और कहां खो गया। घर कहां बनेगा और कहां घूमता रहेगा साथ-साथ।

सही कह रहे थे बच्चे। घर वही है जहां हम सामान खोलकर बसेरा डाल देते हैं। जहां प्यार रसोई के डिब्बों में बंद होकर खानों में सजा दिया जाता है, जहां उम्मीदें तस्वीरों में ढालकर दीवारों पर टांग दी जाती हैं, जहां सलीका बिस्तर पर बेडकवर बन जाता है, जहां खलबलियां और बेचैनियां इधर-उधर, यहां-वहां चोरी-छुपे कोनों में पड़ी रहती हैं।

घर कई चीज़ों का कुल जमा योग होता है। थोड़ी यादें, थोड़ी पहचान, थोड़े ख्वाब, थोड़े शिकवे, थोड़ी नाराज़गियां.... घर में थोड़ा-थोड़ा सब होता है। और घर में होता है कि यादों का जमावड़ा। जहां सबसे ज़्यादा यादें बना डालीं, वो घर सबसे ज़्यादा हसीन था।

मैं घर के फिज़िकल स्पेस को लेकर निर्मम हूं। जो छोड़ देती हूं, बस छोड़ देती हूं। लौटकर नहीं जाती वहां। आठ साल जिस घर में गुज़रे, और जहां मेरे बच्चों ने चलना-दौड़ना, हंसना-बोलना सिखा, उस घर को छोड़ा तो दुबारा उस गली से गुज़री तो भी मुड़कर उस घर को नहीं देखा। मोह नहीं बसता दिल में। यादें बसती हैं, वो भी अत्यंत निर्विकार भाव से। इतना ही कि उन यादों की मुस्कुराहटें और तकलीफ़ें दोनों अब विह्वल नहीं करतीं।

हम बक्सों में फिर से एक बार सामान बंद करने लगे हैं। फिर से घर से ढेर सारा कचरा निकलने लगा है। मैं हैरान हूं कि जिन खिड़की, दीवारों को अपनी पसंद के पर्दों, तस्वीरों से सजाया उनसे कितनी आसानी से मोह टूट गया। हम जहां होंगे, फिर वहां घर बनेगा।

इसलिए शायद मेरे लिए घर कई जगहों पर है, और घर कहीं नहीं है। जितनी देर जहां होते हैं, उतनी देर ईमानदारी से लगाव बना रहे, बस इतना बहुत है।

वरना तो स्थायी घर ये दुनिया भी नहीं। हम सब सफर में हैं। हम सबको अभी कई घर बनाने हैं, कई डेरों में उखड़ना-बसना है।उन घरों में कुछ काम पूरे करने हैं, कुछ सेवाएं देनी हैं, कुछ ख्वाब जीने हैं। मेरे होने के सबब बस इतना सा है।

मैं इतनी निर्विकार क्यों होती जा रही हूं? या फिर निर्मोही?

9 comments:

dj said...

स्थिर ठिकाना तो धरती पर कहीं भी किसी का है ही नहीं। जाना तो सबको एक दिन एक ही ठिकाने पर है..... फिर इन दीवारों से कैसा मोह?

dj said...

नई जगह जाने और रहने के आनंद की बधाई आपको

Mukund Mayank said...

सारी पंति दिल से लिखी गयी है आँखो मे आँसू आ गए | नया घर मुबारक हो मैंम |

Bal Mukund Pathak said...

बहुत हीं उम्दा लिखा है आपने दीदी . जिन छोटी -छोटी बातों पर कभी ध्यान नही जाता उन छोटी-छोटी बातों को कितनी संजीदगी और मनोरंजक तरीके से पेश करतीं है आप . बच्चो के पिता का घर तो पूर्णिया है और उनकी माॅ को तो खैर मालूम हीं नही की घर कहाॅ था और कहाॅ खो गया . घर कहाॅ बनेगा और कहाॅ घूमता रहेगा साथ साथ , कितनी बड़ी बात यहाॅ पे कह गयी है आप . बैचलर लाईफ से गुजर रहा हूॅ जिससे मैने भी शहर और रहने का जगह बदला है . लेकिन मेरा घर तो वही है गाॅव मे ,पीपल की छाॅव मे ... बाॅकी बचा रहने का जगह तो हमलोगो के लिए डेरा होता है जहाॅ से एक ना एक दिन जाना होता है .

इस संबंध मे आपने जो स्त्री का , किसी के पत्नी होने पर घर-शहर बदलने की जो कथा कही है वो सोचने पर विवश करता है . एक लडकी के लिए पिता का घर , हाॅस्टल , ससुराल , पति के साथ रहते हुए बदलते शहर , बदलते घर इनसे बाहर आना कितना कठिन होता है आज आपको पढ़ते हुए समझ मे आ रहा है .

मेरे हिसाब से घर ,अर्थात अपना घर , गाॅव वाला घर इक बस स्टाॅप की तरह है जहाॅ हमे जगह बदलने के लिए , बसे बदलने के लिए जाना ही होता है . वरना स्थाई जर तो ये दुनिया भी नही , हम सब सफर में है .ना जाने कितने घर आएगे, हमे आश्रय देंगे और फिर हम उसमे कुछ दिन बसकर उसे अपने यादों की स्मृति मे कैद कर आगे बढ जाएगें .

पूरी तरह से दार्शनिक पुट लिए आपका यह पोस्ट मुझे कई मायने मे आपके फिलोसफर होने का बोध करा रहा है , पिछले पोस्ट मे तो इस से भी ज्यादा .

खैर आपको पढ़ते हुए लिखना और दुनिया को समझना सीख रहा हूॅ . आप लिखते रहे हम पढते रहेंगे .

बालमुकुंद .

dj said...

आज आपका मॉर्निंग पेज नहीं ??????दिन की की शुरुआत अधूरी सी लग रही है।

Satyam Kr said...

(निदा फाजली):कहाँ चिराग़ जलायें कहाँ गुलाब रखें
छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता|
दीदी, लगता है कुछ ऐसा ही हाल है हम सब का....घुमंतू जो ठहरे...

tweethindi said...

हम तो ठहरे एक घुमंतू,
ना कोई ठौर,
ना कोई ठिकाना।
आज यहाँ,
कल वहाँ पे
हम तो
बसा लेते हैं -
इक आशियाना।

Tweethindi.wordpress.com

Bharat Bhushan said...

किस्सा-ए-अज़ीज कुछ हम सा था।

Arpit Kumar said...

Wonderful words ...