Monday, March 30, 2015

जवाब जिनके नहीं, वो सवाल होते हैं

(मॉर्निंग पेज ३८)

उसने अपने बाल पीठ पर बिखेर रखे थे। पीठ सिसकियों की वजह से हिचकोले लेती थी। जितनी बार पीठ में कंपन होती, कैंची टेढ़ी पड़ जाती। मैं पीठ को झकझोर के कहना चाहती थी कि खुलकर रो ले। जैसे बाल बिखेरे हैं, वैसे दुख को बिखर जाने दे।

शुक्र है कि ख़्वाब था कोई।

पूरी शाम ऑपरेशन ब्लू स्टार के बारे में पढ़ते हुए निकाल दी थी, और जानती थी कि सपने में दिखाई देने वाला ये लंबे बालों वाला पुरुष उसी सोचे हुए का नतीजा है, जो मेरे अवचेतन में ठहर गया था कहीं।

मैं स्वर्ण मंदिर कभी नहीं गई। पहले जाती तो दीवारों पर इतिहास के निशान नहीं ढूंढती। लेकिन अब जाऊंगी तो न भी ढूंढू तो इतिहास की रूहें भटकती हुई नज़र आएंगी।

ये अजीब बात है कि इस दुनिया में सत्ता और सत्ता की राजनीति इतनी ही बलवान होती है कि एक-दूसरे की जड़ें उखाड़ फेंकने के लिए, और कुर्सी के ज़रिए दौलत और रसूख जिए जाने के लिए कोई किसी भी हद तक, किसी भी किस्म की साज़िशें कर सकता है। अब ये भी समझ में आने लगा है कि धर्म और जाति के झगड़े भी दरअसल सत्ता के झगड़ों की उपज हैं। सत्ता के ये झगड़े उतने ही प्राचीन हैं, जितना पुरातन मानव इतिहास है।

सत्ता की बिसात पर चालें बदल जाती हैं, और है अगर ये खेल ही तो फिर शह और मात के इस खेल में वजीर और बादशाह बाद में जाते हैं, उनसे पहले सैकड़ों मासूमों की जान चली जाती है। ये दुनिया के हर कॉन्फ्लिक्ट का सत्य है।

मैं कई सारे सवालों से उलझी हुई जगी हूं। वो कौन सा वैज्ञानिक या गणितीय समीकरण है जिसके आधार पर यूनिवर्स चलता है? हमारी किस्मतें कौन तय करता है? ये कौन तय करता है कि हम पैदा कहां होंगे, और मरेंगे कैसे? मौत इतने इतने तरीकों की क्यों होती है? हमारी किस्मतें साझा कैसे होती हैं? हम जिस वक्त जहां होते हैं, वहां क्यों है? एक इंदिरा गांधी की मौत से साढ़े तीन हजार लोगों की मौत कैसे जुड़ गई? क्या ये साझा किस्मतें नहीं थीं?

अगर ये कायनात क्रिया और प्रतिक्रिया के सरल से समीकरण पर चलती हैं तो फिर क्या कुछ ऐसे कर्म नहीं किए जा सकते जिससे साझा किस्मतें बदलें? इस कायनात की किस्मत बदले?  क्या इंसानों के गुनाहों का बोझ इतना भारी है कि उसकी चोट रह-रहकर पहुंचती रहती है? जब गुनहगारों की भीड़ पैदा होती जा रही है तो मसीहा कहां गए?

न्यूटन ने प्रकृति के तीन नियम दे दिया तो फिर वही साइंसदानउसे दुरुस्त बनाए रखना क्यों नहीं सिखा पाया? हम धर्म के पाठ तोतों की तरह रटते हैं,अपने कर्मों को और उसके असर को समझने के पाठ क्यों नहीं पढ़ते?
हमारा वक्त एक-दूसरे की जड़ें खोदने, एक-दूसरे की शिकायतें करने, दुखों का अंबार बढ़ाए रखने में क्यों जाता है? 

जिस सुकून की तलाश में भटकती रहती हूं, उस सुकून को तबाह करने के लिए सवाल बहुत हैं।











4 comments:

dj said...

सोचने पर मजबूर कर देने वाले सवाल.....

shikha varshney said...

म धर्म के पाठ तोतों की तरह रटते हैं,अपने कर्मों को और उसके असर को समझने के पाठ क्यों नहीं पढ़ते?
यही समझ में आ जाये तो दुनिया की ज्यादातर समस्याएं हल हो जाएँ.

Manisha Parashar said...

इन सवालो के जवाब हैं मगर सबके अपने अपने है। इन सवालो का जन्म भी इस इस दुनिया में मतलब के लिए हुआ और उनके जवाब भी यह मतलबपरस्त दुनिया अपने हिसाब से निकाल लेती हैं ।

Manisha Parashar said...

इन सवालो के जवाब हैं मगर सबके अपने अपने है। इन सवालो का जन्म भी इस इस दुनिया में मतलब के लिए हुआ और उनके जवाब भी यह मतलबपरस्त दुनिया अपने हिसाब से निकाल लेती हैं ।