Monday, March 23, 2015

रॉबिन्सन क्रूसो, फिर चलने का वक्त आ गया है!

(मॉर्निंग पेज ३१)

ऐसा भी होता है कि इत्ते बड़े शहर में आप किसी चिड़िया की आवाज़ से उठें?

पहले लगा कि फ़ोन पर का अलार्म है जो बच्चों ने बदल दिया होगा। फिर खिड़की के पास गई, इस यकीन के लिए कि आवाज़ वाकई बाहर से ही आ रही थी या नहीं। चैत का ये महीना ख़ास होता है। मेरे जैसे सांप-बिच्छू-मेंढक, जिन्हें ठंड बहुत लगती है और जो पूरे जाड़े खिसियाए हुए ज़मीन के नीचे सुस्त पड़े रहते हैं,  उनके बाहर निकलने का वक़्त होता है ये। अगले छह-आठ महीने सुबह उठने में तकलीफ़ नहीं होगी। अगले छह-आठ महीने दिन लंबे होंगे और कोई भी काम करने का मन करेगा।

सुबह इसलिए भी अच्छी लग रही है क्योंकि किसी डेडलाईन के दबाव में नहीं उठी। मॉर्निंग पेज लगातार लिखते रहने का कम से कम ये फ़ायदा तो हुआ है कि जितने ज़्यादा डर नहीं होते, उनसे कहीं ज़्यादा डर से निपटने के रास्ते सूझने लगे हैं।

डर और तन्हाई में एक अलग किस्म का रोमांस होता है वैसे। इश्क़ में टूटा हुआ दिल सबसे शायराना होता है। हम अपनी रंज़िशें, अपने ग़म, अपनी तकलीफ़ें बचाए रखते हैं क्योंकि उससे ख़ुराक हासिल है। मुझसे किसी क़िस्सागो ने कहा था कभी कि जब भीतर-भीतर बिखरा रहता हूं तो बाहर-बाहर निकलनेवाले शब्द बहुत सहेजे हुए निकलते हैं। मेरे भीतर के शब्द ख़त्म ने हो जाएं, इसलिए मैं हमेशा बिखरा-बिखरा रहना चाहता हूँ। मुझे आज तक उस क़िस्सागो की समझ पर तरह आता है। अपनी कहानियों और अपनी कविताओं, अपनी रंगों और अपने किरदारों के लिए हम ख़ुद को किस क़दर तकलीफ़ज़दा बनाए रखते हैं! एक म्यूज़ हमेशा होता है भीतर, जिससे लड़ते रहते हैं और फिर रूठ जाते हैं उससे तो लिखना आसान हो जाता है।

कविताएं सुकून में नहीं लिखी जातीं। कहानियां लिखने हुए कोई शांतमना कैसे हो सकता है? जब कोई कॉन्फ़्लिक्ट ही नहीं है भीतर, तो कोई किस तरह से लिखे और क्या लिखे।

मैंने अपने भीतर के अपने उस म्यूज़ से समझौता कर लिया है। मुझे उसके साथ की दोस्ती रास आने लगी है।

लेकिन 'मम्मा की डायरी' को पूरा करते हुए ये क़दम उठाना ज़रूरी था। मैं अपने सबसे बेशक़ीमती रिश्तों के बारे में कैज़ुअली नहीं लिख सकती थी। भीतर के उस म्यूज़ से लगातार संवाद करना था, उससे सही और ग़लत के विषय में बातें करती रहनी थी, इसलिए मैं बिखरने का ख़तरा नहीं उठा सकती थी। जब अपने घरों और अपने परिवारों, अपने रिश्तों और अपनी मोहब्बतों को सही मायने में निभाने का वक्त आता है तब हम गिरहों को खोलने के रास्ते ढूंढते रहते हैं।

बच्चों को एक उलझी-उलझी मां नहीं चाहिए। पति जब एक सुलझी हुई, समझदार पत्नी के पास लौटता है तो घर की सुख-शांति उसे चैन से जीने की वजहें देती है। पिछले तीन महीने में अगर मैंने अपने भीतर के म्यूज़ को कुछ भी याद दिलाया है, तो यही दो बातें हैं। इसलिए म्यूज़ ख़ामोश रहा भीतर। मुझसे उसने वफ़ादारी निभाई।

क्रिएट करने की प्रक्रिया भी कितनी अजीब होती है! हम पता नहीं कब और कैसे वो होने लगते हैं जो अपने शब्दों के ज़रिए कहना चाहते हैं।

'नीला स्कार्फ़' की रचना के दौरान मैं भीतर से बग़ावती हो गई थी। और पूरी तरह ख़ामोश। मुझे रिश्तों में कमियां दिखती थीं क्योंकि मैं वही देखना चाहती थी। मेरे पास सारी कहानियाँ ख़ामोशी की थीं, ख़ामोश क्रांतियों की थीं। अब 'नीला स्कार्फ़' के किरदारों के बारे में सोचती हूँ तो लगता है कि हर किरदार कितना जटिल था, कितना उलझा हुआ, और कितना बेचैन!

'मम्मा की डायरी' में बेचैनियाँ हैं, लेकिन ठहरी हुई। 'मम्मा की डायरी' में सिर्फ़ मैं और मैं हूँ हर जगह। किसी और की कहानी सुनाते हुए भी। मैं शुरू से जानती थी कि इस किताब के रास्ते मुझे क्या हासिल करना है। मुझे मालूम था कि इस किताब के ज़रिए मुझे अपनी ज़िन्दगी के रिश्ते टटोलने हैं और उनसे साथ शांति वार्ता शुरू करनी है। मुझे सीज़ फ़ायर चाहिए था, पीस। वो हासिल हो गई है। और तो नहीं मालूम कि क्या हुआ है, लेकिन किताब के ख़त्म होते ही मैं ख़ुद को पूरी तरह healed महसूस कर रही हूँ।

आज से किताब का ऑनलाइन प्रोमोशन शुरू हो जाएगा। मैं अपना ही लिखा हुआ पब्लिक स्पेस में डालती रहूँगी और बार-बार डालती रहूँगी। आज से अपने लिखे हुए से डिटैच हो जाना बहुत ज़रूरी है। वरना जिन ज़ख्मों को भरने के लिए इतने महीने पता नहीं कितनी बार एक-एक चैप्टर के ड्राफ्ट लिखती रही, उन्हें सोते-जागते-हँसते-रोते-खाते-पीते जीती रही, उन्हीं ज़ख्‍मों के वापस कुरेदे जाने की संभावना बहुत बड़ी है।

अगर लिखना आपको सुकून देता है तो छपना आपको वल्नरेबल बनाता है। (इसलिए कई बार डायरी और मॉर्निंग पेज अलमारियों में बंद रखे जाने चाहिए।) यहां से वो सिलसिला शुरू होता है जहाँ लगातार आपको जज किया जाएगा, आपकी सोच और आपके लेखन पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं आएंगी। छपते ही लिखा हुआ आपका नहीं, दुनिया का हो जाता है।

अब जब आपने शब्दों की गठरी बांधकर उन्हें एक किताब के तौर पर वक़्त के समंदर में फेंक देने की हिम्मत दिखा ही दी है तो फिर उससे ख़ुद को जुदा कर लेने में ही अपना और अपने म्यूज़, दोनों का हित है।

समंदर अंतहीन है। गहरा है। सुनो रॉबिनस क्रूसो, जो गठरी फेंककर तुम हल्के हो गए उसके डूबने-उतराने की फ़िक्र से आज़ाद होकर अब जहाज़ को किसी नए रास्ते ले चलने की तैयारी करो। मौसम खुल गया है। म्यूज़ को उठाकर उससे और नई-नई बातें करने का वक्त आ गया है।








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