(मॉर्निंग पेज ३९)
हम कई साल एक ही घर में रहे - पूरे बचपन। परिवार के आकार के हिसाब से घर बनता गया, फैलता गया। लेकिन ज़मीन-जगह वही रही। आस-पड़ोस वही रहा। ख़ुशबुएं, बदबू वही रहीं।
फिर दिल्ली आई और हर तीन-छह महीने में ठिकाना बदलता गया। पहले मामाजी का घर, फिर किसी दोस्त का घर, फिर पीजी, फिर हॉस्टल, फिर हॉस्टल के इस कमरे से उस कमरे में भटकना, फिर पीजी, फिर हॉस्टल... कई साल ये सिलसिला चलता रहा। सामान था नहीं मेरे पास। एक गद्दा, एक रजाई, एक तकिया, दो सूटकेस,दो एयरबैग, एक बाल्टी, एक मग और तीन कार्टूनों में गृहस्थी सिमट जाया करती थी। फिर जहां-जहां से होकर गुज़रते, वहां-वहां अपने हिस्से का थोड़ा-सा कुछ वहीं छोड़ देते।
कई साल बाद एक किस्म की स्थिरता एकअदद-सी नौकरी और अपनी सबसे पुरानी सहेली के फ्लैटमेट बन जाने पर आई। मयूर विहार वो ठिकाना था जो ढाई-तीन साल तक बना रहा। फिर से वही घर, वही आस-पड़ोस, वही ख़ुशबुएं...
शादी हुई तो कुल दस साल में ये चौथी बार है कि हम ठिकाना बदल रहे हैं, इस उम्मीद में कि ये आख़िरी बार है कि सामान बंध रहा है, यादें सिमट रही हैं और घर-दिमाग़ से कचरा बाहर किया जा रहा है।
घर क्या था, और क्या हो गया है, ये भी सोचने की बात है। नींद में अपने बच्चों से पूछा मैंने, घर कहां है तुम्हारा? आधी नींद में ही जवाब आया उनका, २७६, नोएडा। यानी जिस घर में अभी तक हम गए भी नहीं वो उनका नया घर, नया पता बन गया। बाकी के जिन दो घरों में उन्होंने अपना बचपन निकाला वो भी मायने नहीं रखता। ये भी मायने नहीं रखता कि उनके पिता के लिए घर पूर्णियां है, और उनकी मां को तो ख़ैर मालूम ही नहीं कि घर कहां था और कहां खो गया। घर कहां बनेगा और कहां घूमता रहेगा साथ-साथ।
सही कह रहे थे बच्चे। घर वही है जहां हम सामान खोलकर बसेरा डाल देते हैं। जहां प्यार रसोई के डिब्बों में बंद होकर खानों में सजा दिया जाता है, जहां उम्मीदें तस्वीरों में ढालकर दीवारों पर टांग दी जाती हैं, जहां सलीका बिस्तर पर बेडकवर बन जाता है, जहां खलबलियां और बेचैनियां इधर-उधर, यहां-वहां चोरी-छुपे कोनों में पड़ी रहती हैं।
घर कई चीज़ों का कुल जमा योग होता है। थोड़ी यादें, थोड़ी पहचान, थोड़े ख्वाब, थोड़े शिकवे, थोड़ी नाराज़गियां.... घर में थोड़ा-थोड़ा सब होता है। और घर में होता है कि यादों का जमावड़ा। जहां सबसे ज़्यादा यादें बना डालीं, वो घर सबसे ज़्यादा हसीन था।
मैं घर के फिज़िकल स्पेस को लेकर निर्मम हूं। जो छोड़ देती हूं, बस छोड़ देती हूं। लौटकर नहीं जाती वहां। आठ साल जिस घर में गुज़रे, और जहां मेरे बच्चों ने चलना-दौड़ना, हंसना-बोलना सिखा, उस घर को छोड़ा तो दुबारा उस गली से गुज़री तो भी मुड़कर उस घर को नहीं देखा। मोह नहीं बसता दिल में। यादें बसती हैं, वो भी अत्यंत निर्विकार भाव से। इतना ही कि उन यादों की मुस्कुराहटें और तकलीफ़ें दोनों अब विह्वल नहीं करतीं।
हम बक्सों में फिर से एक बार सामान बंद करने लगे हैं। फिर से घर से ढेर सारा कचरा निकलने लगा है। मैं हैरान हूं कि जिन खिड़की, दीवारों को अपनी पसंद के पर्दों, तस्वीरों से सजाया उनसे कितनी आसानी से मोह टूट गया। हम जहां होंगे, फिर वहां घर बनेगा।
इसलिए शायद मेरे लिए घर कई जगहों पर है, और घर कहीं नहीं है। जितनी देर जहां होते हैं, उतनी देर ईमानदारी से लगाव बना रहे, बस इतना बहुत है।
वरना तो स्थायी घर ये दुनिया भी नहीं। हम सब सफर में हैं। हम सबको अभी कई घर बनाने हैं, कई डेरों में उखड़ना-बसना है।उन घरों में कुछ काम पूरे करने हैं, कुछ सेवाएं देनी हैं, कुछ ख्वाब जीने हैं। मेरे होने के सबब बस इतना सा है।
मैं इतनी निर्विकार क्यों होती जा रही हूं? या फिर निर्मोही?
मंगलवार, 31 मार्च 2015
सोमवार, 30 मार्च 2015
जवाब जिनके नहीं, वो सवाल होते हैं
(मॉर्निंग पेज ३८)
उसने अपने बाल पीठ पर बिखेर रखे थे। पीठ सिसकियों की वजह से हिचकोले लेती थी। जितनी बार पीठ में कंपन होती, कैंची टेढ़ी पड़ जाती। मैं पीठ को झकझोर के कहना चाहती थी कि खुलकर रो ले। जैसे बाल बिखेरे हैं, वैसे दुख को बिखर जाने दे।
शुक्र है कि ख़्वाब था कोई।
पूरी शाम ऑपरेशन ब्लू स्टार के बारे में पढ़ते हुए निकाल दी थी, और जानती थी कि सपने में दिखाई देने वाला ये लंबे बालों वाला पुरुष उसी सोचे हुए का नतीजा है, जो मेरे अवचेतन में ठहर गया था कहीं।
मैं स्वर्ण मंदिर कभी नहीं गई। पहले जाती तो दीवारों पर इतिहास के निशान नहीं ढूंढती। लेकिन अब जाऊंगी तो न भी ढूंढू तो इतिहास की रूहें भटकती हुई नज़र आएंगी।
ये अजीब बात है कि इस दुनिया में सत्ता और सत्ता की राजनीति इतनी ही बलवान होती है कि एक-दूसरे की जड़ें उखाड़ फेंकने के लिए, और कुर्सी के ज़रिए दौलत और रसूख जिए जाने के लिए कोई किसी भी हद तक, किसी भी किस्म की साज़िशें कर सकता है। अब ये भी समझ में आने लगा है कि धर्म और जाति के झगड़े भी दरअसल सत्ता के झगड़ों की उपज हैं। सत्ता के ये झगड़े उतने ही प्राचीन हैं, जितना पुरातन मानव इतिहास है।
सत्ता की बिसात पर चालें बदल जाती हैं, और है अगर ये खेल ही तो फिर शह और मात के इस खेल में वजीर और बादशाह बाद में जाते हैं, उनसे पहले सैकड़ों मासूमों की जान चली जाती है। ये दुनिया के हर कॉन्फ्लिक्ट का सत्य है।
मैं कई सारे सवालों से उलझी हुई जगी हूं। वो कौन सा वैज्ञानिक या गणितीय समीकरण है जिसके आधार पर यूनिवर्स चलता है? हमारी किस्मतें कौन तय करता है? ये कौन तय करता है कि हम पैदा कहां होंगे, और मरेंगे कैसे? मौत इतने इतने तरीकों की क्यों होती है? हमारी किस्मतें साझा कैसे होती हैं? हम जिस वक्त जहां होते हैं, वहां क्यों है? एक इंदिरा गांधी की मौत से साढ़े तीन हजार लोगों की मौत कैसे जुड़ गई? क्या ये साझा किस्मतें नहीं थीं?
अगर ये कायनात क्रिया और प्रतिक्रिया के सरल से समीकरण पर चलती हैं तो फिर क्या कुछ ऐसे कर्म नहीं किए जा सकते जिससे साझा किस्मतें बदलें? इस कायनात की किस्मत बदले? क्या इंसानों के गुनाहों का बोझ इतना भारी है कि उसकी चोट रह-रहकर पहुंचती रहती है? जब गुनहगारों की भीड़ पैदा होती जा रही है तो मसीहा कहां गए?
न्यूटन ने प्रकृति के तीन नियम दे दिया तो फिर वही साइंसदानउसे दुरुस्त बनाए रखना क्यों नहीं सिखा पाया? हम धर्म के पाठ तोतों की तरह रटते हैं,अपने कर्मों को और उसके असर को समझने के पाठ क्यों नहीं पढ़ते?
हमारा वक्त एक-दूसरे की जड़ें खोदने, एक-दूसरे की शिकायतें करने, दुखों का अंबार बढ़ाए रखने में क्यों जाता है?
जिस सुकून की तलाश में भटकती रहती हूं, उस सुकून को तबाह करने के लिए सवाल बहुत हैं।
उसने अपने बाल पीठ पर बिखेर रखे थे। पीठ सिसकियों की वजह से हिचकोले लेती थी। जितनी बार पीठ में कंपन होती, कैंची टेढ़ी पड़ जाती। मैं पीठ को झकझोर के कहना चाहती थी कि खुलकर रो ले। जैसे बाल बिखेरे हैं, वैसे दुख को बिखर जाने दे।
शुक्र है कि ख़्वाब था कोई।
पूरी शाम ऑपरेशन ब्लू स्टार के बारे में पढ़ते हुए निकाल दी थी, और जानती थी कि सपने में दिखाई देने वाला ये लंबे बालों वाला पुरुष उसी सोचे हुए का नतीजा है, जो मेरे अवचेतन में ठहर गया था कहीं।
मैं स्वर्ण मंदिर कभी नहीं गई। पहले जाती तो दीवारों पर इतिहास के निशान नहीं ढूंढती। लेकिन अब जाऊंगी तो न भी ढूंढू तो इतिहास की रूहें भटकती हुई नज़र आएंगी।
ये अजीब बात है कि इस दुनिया में सत्ता और सत्ता की राजनीति इतनी ही बलवान होती है कि एक-दूसरे की जड़ें उखाड़ फेंकने के लिए, और कुर्सी के ज़रिए दौलत और रसूख जिए जाने के लिए कोई किसी भी हद तक, किसी भी किस्म की साज़िशें कर सकता है। अब ये भी समझ में आने लगा है कि धर्म और जाति के झगड़े भी दरअसल सत्ता के झगड़ों की उपज हैं। सत्ता के ये झगड़े उतने ही प्राचीन हैं, जितना पुरातन मानव इतिहास है।
सत्ता की बिसात पर चालें बदल जाती हैं, और है अगर ये खेल ही तो फिर शह और मात के इस खेल में वजीर और बादशाह बाद में जाते हैं, उनसे पहले सैकड़ों मासूमों की जान चली जाती है। ये दुनिया के हर कॉन्फ्लिक्ट का सत्य है।
मैं कई सारे सवालों से उलझी हुई जगी हूं। वो कौन सा वैज्ञानिक या गणितीय समीकरण है जिसके आधार पर यूनिवर्स चलता है? हमारी किस्मतें कौन तय करता है? ये कौन तय करता है कि हम पैदा कहां होंगे, और मरेंगे कैसे? मौत इतने इतने तरीकों की क्यों होती है? हमारी किस्मतें साझा कैसे होती हैं? हम जिस वक्त जहां होते हैं, वहां क्यों है? एक इंदिरा गांधी की मौत से साढ़े तीन हजार लोगों की मौत कैसे जुड़ गई? क्या ये साझा किस्मतें नहीं थीं?
अगर ये कायनात क्रिया और प्रतिक्रिया के सरल से समीकरण पर चलती हैं तो फिर क्या कुछ ऐसे कर्म नहीं किए जा सकते जिससे साझा किस्मतें बदलें? इस कायनात की किस्मत बदले? क्या इंसानों के गुनाहों का बोझ इतना भारी है कि उसकी चोट रह-रहकर पहुंचती रहती है? जब गुनहगारों की भीड़ पैदा होती जा रही है तो मसीहा कहां गए?
न्यूटन ने प्रकृति के तीन नियम दे दिया तो फिर वही साइंसदानउसे दुरुस्त बनाए रखना क्यों नहीं सिखा पाया? हम धर्म के पाठ तोतों की तरह रटते हैं,अपने कर्मों को और उसके असर को समझने के पाठ क्यों नहीं पढ़ते?
हमारा वक्त एक-दूसरे की जड़ें खोदने, एक-दूसरे की शिकायतें करने, दुखों का अंबार बढ़ाए रखने में क्यों जाता है?
जिस सुकून की तलाश में भटकती रहती हूं, उस सुकून को तबाह करने के लिए सवाल बहुत हैं।
रविवार, 29 मार्च 2015
करो बस इतना कि करम धुल जाए
(मॉर्निंग पेज ३७)
लोग शायद सुबह-सुबह उठकर अपने अपने ईश को पुकारते होंगे।
लोग शायद सुबह-सुबह उठकर योग, ध्यान, कसरत, सैर करते होंगे।
ये भी मुमकिन है कि लोग सुबह-सुबह उठकर फोन देखते हों, फेसबुक खोलते हों या फिर मेल पढ़ते हैं।
मैं सुबह उठते ही सबसे पहली बात ये सोचती हूं कि सुजाता नहीं आई अब तक, और अगर उसने आज छुट्टी ले ली तो मेरा क्या होगा!
सुजाता मेरे घर में कई सालों से काम करती है। बहुत कम बोलती है, और जितना हो सके, उतनी ख़ामोशी से काम निपटाकर चली जाती है। एक घंटे में मेरी वो दुनिया संभाल जाती है वो जिसको वापस बिखेरने में मेरे बच्चों को एक मिनट भी नहीं लगता। घर के कामों में मेरा बिल्कुल मन नहीं लगता। खाना बनाना दुनिया की सबसे बड़ी सज़ा - बल्कि सबसे अनप्रोडक्टिव काम लगता है। अगर सफाई करने की मजबूरी आ जाए तो ये सोचकर कुढ़ती रहती हूँ कि इतनी देर में कोई और काम किया होता। बच्चों के साथ वक्त बिताती। कहीं घूम आती। कोई किताब पढ़ लेती। कोई और काम ही कर लेती। और कुछ नहीं तो सो ही जाती।
घर के कामों के पीछे मेरी घोर घृणा का कारण इतिहास के पन्नों में छुपा है। मेरी मां घर में रहती थी और सुबह चार बजे से घर के काम में लग जाती थी। उन्हें तवे और कढ़ाही की किनारियों पर चिपकी कालिख से ऐसी ही नफरत थी जितनी मुझे उस कालिख को साफ करने की मजबूरी से है। मैंने मां को जितना रसोई में उलझते हुए देखा, उतनी ही रसोई से दूर होती गई। संयुक्त परिवार के इतने काम होते थे कि मां हमेशा थकी हुई रहती थी।
मैं उस थकन से बचना चाहती थी। मैं उन कामों से भी बचना चाहती थी जिनका कोई पारिश्रमिक नहीं मिलता, कोई क्रेडिट भी नहीं मिलता। ये और बात है कि बाद में ऐसे काम करती रही, करती रही, करती रही...
इसलिए क्योंकि कर्म से बचकर कोई कहां जाएगा? जिस घर में आप रह रहे हों उसे यूं ही नहीं छोड़ा जा सकता। जिन बच्चों को आप इस दुनिया में लेकर आए, और उनकी परवरिश की ज़िम्मेदारी उठाई, उनकी खातिर घर को वक्त देना होता है। जो घर में बिखरा-बिखरा हैरान-परेशान और उलझा हुआ है, वो समाज क्या बनाएगा?
बस, अपनी तमाम नफरतों को परे रखकर घर को घर बनाने की कवायद हर रोज़ चलती रहती है।
और जब ये कवायद करनी ही है तो फिर कुढ़ना-चिढ़ना क्या?
मैं कल ईशा फाउंडेशन की वेबसाईट पर पढ़ रही थी कि जिस काम को आप सबसे ज़्यादा नापसंद करते हैं, वही काम अपना मन और ध्यान लगाकर करना चाहिए। कर्म (जिसे कर्मा कहा जाता है आजकल) के रास्ते की अड़चनों को दूर करने का ये सबसे अच्छा तरीका है। जो काम मुझे पसंद है, वो तो मैं हर हाल में करूंगी ही। मुझे पढ़ना पसंद है तो मैं रात में देर तक पढ़ने के बहाने ढूंढ ही लूंगी। मुझे लोगों से मिलना-जुलना पसंद है तो उसके लिए वक्त भी निकल आएगा और शरीर भी साथ देगा। मुझे लिखना पसंद है तो वो मैं पीठ के दर्द और टेढ़ी गर्दन के साथ भी कर लूंगी। मुझे सफर करना पसंद है तो शहर से बाहर जाने के तमाम बहानों के आगे ब्लड प्रेशर और हाइपरटेन्शन तेल लेने चला जाएगा।
लेकिन मुझे घर के कामों में उलझन होती है (और बिना सुजाता मेरा काम नहीं चलता) तो एक दिन काम करना पड़ेगा तो मैं थक जाऊंगी, बीमार पड़ जाऊंगी, नाराज़ रहूंगी।
अपनी ज़िन्दगी की स्लेट पर बार-बार लिखी जा रही किसी भी अनर्गल चुनौती को तोड़ना है, और उसके बीच से रास्ता निकालना है, तो वो करना होगा जो मुझे सख्त नापसंद है। घर के कोने-कोने की सफाई नहीं है ये, अपने मन के कोनों में पड़ी धूल-मिट्टी को साफ करने की प्रक्रिया है। कपड़े नहीं धुल रहे, करम के मैले कपड़ों की सफाई हो रही है। रसोई और फ्रिज नहीं साफ हो रहा, बीमारियां साफ हो रही हैं ताकि अच्छी सेहत के लिए जगह बनाई जा सके। अलमारियां कहां ठीक हो रही हैं, ठीक तो अपनी हथेली पर बिखरी हुई टेढी-मेढ़ी लकीरें हो रही हैं।
जिस काम को जितने प्यार से किया जाएगा, उस काम में मन उतना ही लगेगा। मन जहां लगेगा, वहां खुश रहेगा। मन खुश रहेगा तो घर खुश रहेगा।
और अनु सिंह, तुमने ये सोच लिया कि घर के काम अनप्रो़क्टिव होते हैं?
लोग शायद सुबह-सुबह उठकर अपने अपने ईश को पुकारते होंगे।
लोग शायद सुबह-सुबह उठकर योग, ध्यान, कसरत, सैर करते होंगे।
ये भी मुमकिन है कि लोग सुबह-सुबह उठकर फोन देखते हों, फेसबुक खोलते हों या फिर मेल पढ़ते हैं।
मैं सुबह उठते ही सबसे पहली बात ये सोचती हूं कि सुजाता नहीं आई अब तक, और अगर उसने आज छुट्टी ले ली तो मेरा क्या होगा!
सुजाता मेरे घर में कई सालों से काम करती है। बहुत कम बोलती है, और जितना हो सके, उतनी ख़ामोशी से काम निपटाकर चली जाती है। एक घंटे में मेरी वो दुनिया संभाल जाती है वो जिसको वापस बिखेरने में मेरे बच्चों को एक मिनट भी नहीं लगता। घर के कामों में मेरा बिल्कुल मन नहीं लगता। खाना बनाना दुनिया की सबसे बड़ी सज़ा - बल्कि सबसे अनप्रोडक्टिव काम लगता है। अगर सफाई करने की मजबूरी आ जाए तो ये सोचकर कुढ़ती रहती हूँ कि इतनी देर में कोई और काम किया होता। बच्चों के साथ वक्त बिताती। कहीं घूम आती। कोई किताब पढ़ लेती। कोई और काम ही कर लेती। और कुछ नहीं तो सो ही जाती।
घर के कामों के पीछे मेरी घोर घृणा का कारण इतिहास के पन्नों में छुपा है। मेरी मां घर में रहती थी और सुबह चार बजे से घर के काम में लग जाती थी। उन्हें तवे और कढ़ाही की किनारियों पर चिपकी कालिख से ऐसी ही नफरत थी जितनी मुझे उस कालिख को साफ करने की मजबूरी से है। मैंने मां को जितना रसोई में उलझते हुए देखा, उतनी ही रसोई से दूर होती गई। संयुक्त परिवार के इतने काम होते थे कि मां हमेशा थकी हुई रहती थी।
मैं उस थकन से बचना चाहती थी। मैं उन कामों से भी बचना चाहती थी जिनका कोई पारिश्रमिक नहीं मिलता, कोई क्रेडिट भी नहीं मिलता। ये और बात है कि बाद में ऐसे काम करती रही, करती रही, करती रही...
इसलिए क्योंकि कर्म से बचकर कोई कहां जाएगा? जिस घर में आप रह रहे हों उसे यूं ही नहीं छोड़ा जा सकता। जिन बच्चों को आप इस दुनिया में लेकर आए, और उनकी परवरिश की ज़िम्मेदारी उठाई, उनकी खातिर घर को वक्त देना होता है। जो घर में बिखरा-बिखरा हैरान-परेशान और उलझा हुआ है, वो समाज क्या बनाएगा?
बस, अपनी तमाम नफरतों को परे रखकर घर को घर बनाने की कवायद हर रोज़ चलती रहती है।
और जब ये कवायद करनी ही है तो फिर कुढ़ना-चिढ़ना क्या?
मैं कल ईशा फाउंडेशन की वेबसाईट पर पढ़ रही थी कि जिस काम को आप सबसे ज़्यादा नापसंद करते हैं, वही काम अपना मन और ध्यान लगाकर करना चाहिए। कर्म (जिसे कर्मा कहा जाता है आजकल) के रास्ते की अड़चनों को दूर करने का ये सबसे अच्छा तरीका है। जो काम मुझे पसंद है, वो तो मैं हर हाल में करूंगी ही। मुझे पढ़ना पसंद है तो मैं रात में देर तक पढ़ने के बहाने ढूंढ ही लूंगी। मुझे लोगों से मिलना-जुलना पसंद है तो उसके लिए वक्त भी निकल आएगा और शरीर भी साथ देगा। मुझे लिखना पसंद है तो वो मैं पीठ के दर्द और टेढ़ी गर्दन के साथ भी कर लूंगी। मुझे सफर करना पसंद है तो शहर से बाहर जाने के तमाम बहानों के आगे ब्लड प्रेशर और हाइपरटेन्शन तेल लेने चला जाएगा।
लेकिन मुझे घर के कामों में उलझन होती है (और बिना सुजाता मेरा काम नहीं चलता) तो एक दिन काम करना पड़ेगा तो मैं थक जाऊंगी, बीमार पड़ जाऊंगी, नाराज़ रहूंगी।
अपनी ज़िन्दगी की स्लेट पर बार-बार लिखी जा रही किसी भी अनर्गल चुनौती को तोड़ना है, और उसके बीच से रास्ता निकालना है, तो वो करना होगा जो मुझे सख्त नापसंद है। घर के कोने-कोने की सफाई नहीं है ये, अपने मन के कोनों में पड़ी धूल-मिट्टी को साफ करने की प्रक्रिया है। कपड़े नहीं धुल रहे, करम के मैले कपड़ों की सफाई हो रही है। रसोई और फ्रिज नहीं साफ हो रहा, बीमारियां साफ हो रही हैं ताकि अच्छी सेहत के लिए जगह बनाई जा सके। अलमारियां कहां ठीक हो रही हैं, ठीक तो अपनी हथेली पर बिखरी हुई टेढी-मेढ़ी लकीरें हो रही हैं।
जिस काम को जितने प्यार से किया जाएगा, उस काम में मन उतना ही लगेगा। मन जहां लगेगा, वहां खुश रहेगा। मन खुश रहेगा तो घर खुश रहेगा।
और अनु सिंह, तुमने ये सोच लिया कि घर के काम अनप्रो़क्टिव होते हैं?
सोमवार, 23 मार्च 2015
रॉबिन्सन क्रूसो, फिर चलने का वक्त आ गया है!
(मॉर्निंग पेज ३१)
ऐसा भी होता है कि इत्ते बड़े शहर में आप किसी चिड़िया की आवाज़ से उठें?
पहले लगा कि फ़ोन पर का अलार्म है जो बच्चों ने बदल दिया होगा। फिर खिड़की के पास गई, इस यकीन के लिए कि आवाज़ वाकई बाहर से ही आ रही थी या नहीं। चैत का ये महीना ख़ास होता है। मेरे जैसे सांप-बिच्छू-मेंढक, जिन्हें ठंड बहुत लगती है और जो पूरे जाड़े खिसियाए हुए ज़मीन के नीचे सुस्त पड़े रहते हैं, उनके बाहर निकलने का वक़्त होता है ये। अगले छह-आठ महीने सुबह उठने में तकलीफ़ नहीं होगी। अगले छह-आठ महीने दिन लंबे होंगे और कोई भी काम करने का मन करेगा।
सुबह इसलिए भी अच्छी लग रही है क्योंकि किसी डेडलाईन के दबाव में नहीं उठी। मॉर्निंग पेज लगातार लिखते रहने का कम से कम ये फ़ायदा तो हुआ है कि जितने ज़्यादा डर नहीं होते, उनसे कहीं ज़्यादा डर से निपटने के रास्ते सूझने लगे हैं।
डर और तन्हाई में एक अलग किस्म का रोमांस होता है वैसे। इश्क़ में टूटा हुआ दिल सबसे शायराना होता है। हम अपनी रंज़िशें, अपने ग़म, अपनी तकलीफ़ें बचाए रखते हैं क्योंकि उससे ख़ुराक हासिल है। मुझसे किसी क़िस्सागो ने कहा था कभी कि जब भीतर-भीतर बिखरा रहता हूं तो बाहर-बाहर निकलनेवाले शब्द बहुत सहेजे हुए निकलते हैं। मेरे भीतर के शब्द ख़त्म ने हो जाएं, इसलिए मैं हमेशा बिखरा-बिखरा रहना चाहता हूँ। मुझे आज तक उस क़िस्सागो की समझ पर तरह आता है। अपनी कहानियों और अपनी कविताओं, अपनी रंगों और अपने किरदारों के लिए हम ख़ुद को किस क़दर तकलीफ़ज़दा बनाए रखते हैं! एक म्यूज़ हमेशा होता है भीतर, जिससे लड़ते रहते हैं और फिर रूठ जाते हैं उससे तो लिखना आसान हो जाता है।
कविताएं सुकून में नहीं लिखी जातीं। कहानियां लिखने हुए कोई शांतमना कैसे हो सकता है? जब कोई कॉन्फ़्लिक्ट ही नहीं है भीतर, तो कोई किस तरह से लिखे और क्या लिखे।
मैंने अपने भीतर के अपने उस म्यूज़ से समझौता कर लिया है। मुझे उसके साथ की दोस्ती रास आने लगी है।
लेकिन 'मम्मा की डायरी' को पूरा करते हुए ये क़दम उठाना ज़रूरी था। मैं अपने सबसे बेशक़ीमती रिश्तों के बारे में कैज़ुअली नहीं लिख सकती थी। भीतर के उस म्यूज़ से लगातार संवाद करना था, उससे सही और ग़लत के विषय में बातें करती रहनी थी, इसलिए मैं बिखरने का ख़तरा नहीं उठा सकती थी। जब अपने घरों और अपने परिवारों, अपने रिश्तों और अपनी मोहब्बतों को सही मायने में निभाने का वक्त आता है तब हम गिरहों को खोलने के रास्ते ढूंढते रहते हैं।
बच्चों को एक उलझी-उलझी मां नहीं चाहिए। पति जब एक सुलझी हुई, समझदार पत्नी के पास लौटता है तो घर की सुख-शांति उसे चैन से जीने की वजहें देती है। पिछले तीन महीने में अगर मैंने अपने भीतर के म्यूज़ को कुछ भी याद दिलाया है, तो यही दो बातें हैं। इसलिए म्यूज़ ख़ामोश रहा भीतर। मुझसे उसने वफ़ादारी निभाई।
क्रिएट करने की प्रक्रिया भी कितनी अजीब होती है! हम पता नहीं कब और कैसे वो होने लगते हैं जो अपने शब्दों के ज़रिए कहना चाहते हैं।
'नीला स्कार्फ़' की रचना के दौरान मैं भीतर से बग़ावती हो गई थी। और पूरी तरह ख़ामोश। मुझे रिश्तों में कमियां दिखती थीं क्योंकि मैं वही देखना चाहती थी। मेरे पास सारी कहानियाँ ख़ामोशी की थीं, ख़ामोश क्रांतियों की थीं। अब 'नीला स्कार्फ़' के किरदारों के बारे में सोचती हूँ तो लगता है कि हर किरदार कितना जटिल था, कितना उलझा हुआ, और कितना बेचैन!
'मम्मा की डायरी' में बेचैनियाँ हैं, लेकिन ठहरी हुई। 'मम्मा की डायरी' में सिर्फ़ मैं और मैं हूँ हर जगह। किसी और की कहानी सुनाते हुए भी। मैं शुरू से जानती थी कि इस किताब के रास्ते मुझे क्या हासिल करना है। मुझे मालूम था कि इस किताब के ज़रिए मुझे अपनी ज़िन्दगी के रिश्ते टटोलने हैं और उनसे साथ शांति वार्ता शुरू करनी है। मुझे सीज़ फ़ायर चाहिए था, पीस। वो हासिल हो गई है। और तो नहीं मालूम कि क्या हुआ है, लेकिन किताब के ख़त्म होते ही मैं ख़ुद को पूरी तरह healed महसूस कर रही हूँ।
आज से किताब का ऑनलाइन प्रोमोशन शुरू हो जाएगा। मैं अपना ही लिखा हुआ पब्लिक स्पेस में डालती रहूँगी और बार-बार डालती रहूँगी। आज से अपने लिखे हुए से डिटैच हो जाना बहुत ज़रूरी है। वरना जिन ज़ख्मों को भरने के लिए इतने महीने पता नहीं कितनी बार एक-एक चैप्टर के ड्राफ्ट लिखती रही, उन्हें सोते-जागते-हँसते-रोते-खाते-पीते जीती रही, उन्हीं ज़ख्मों के वापस कुरेदे जाने की संभावना बहुत बड़ी है।
अगर लिखना आपको सुकून देता है तो छपना आपको वल्नरेबल बनाता है। (इसलिए कई बार डायरी और मॉर्निंग पेज अलमारियों में बंद रखे जाने चाहिए।) यहां से वो सिलसिला शुरू होता है जहाँ लगातार आपको जज किया जाएगा, आपकी सोच और आपके लेखन पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं आएंगी। छपते ही लिखा हुआ आपका नहीं, दुनिया का हो जाता है।
अब जब आपने शब्दों की गठरी बांधकर उन्हें एक किताब के तौर पर वक़्त के समंदर में फेंक देने की हिम्मत दिखा ही दी है तो फिर उससे ख़ुद को जुदा कर लेने में ही अपना और अपने म्यूज़, दोनों का हित है।
समंदर अंतहीन है। गहरा है। सुनो रॉबिनस क्रूसो, जो गठरी फेंककर तुम हल्के हो गए उसके डूबने-उतराने की फ़िक्र से आज़ाद होकर अब जहाज़ को किसी नए रास्ते ले चलने की तैयारी करो। मौसम खुल गया है। म्यूज़ को उठाकर उससे और नई-नई बातें करने का वक्त आ गया है।
ऐसा भी होता है कि इत्ते बड़े शहर में आप किसी चिड़िया की आवाज़ से उठें?
पहले लगा कि फ़ोन पर का अलार्म है जो बच्चों ने बदल दिया होगा। फिर खिड़की के पास गई, इस यकीन के लिए कि आवाज़ वाकई बाहर से ही आ रही थी या नहीं। चैत का ये महीना ख़ास होता है। मेरे जैसे सांप-बिच्छू-मेंढक, जिन्हें ठंड बहुत लगती है और जो पूरे जाड़े खिसियाए हुए ज़मीन के नीचे सुस्त पड़े रहते हैं, उनके बाहर निकलने का वक़्त होता है ये। अगले छह-आठ महीने सुबह उठने में तकलीफ़ नहीं होगी। अगले छह-आठ महीने दिन लंबे होंगे और कोई भी काम करने का मन करेगा।
सुबह इसलिए भी अच्छी लग रही है क्योंकि किसी डेडलाईन के दबाव में नहीं उठी। मॉर्निंग पेज लगातार लिखते रहने का कम से कम ये फ़ायदा तो हुआ है कि जितने ज़्यादा डर नहीं होते, उनसे कहीं ज़्यादा डर से निपटने के रास्ते सूझने लगे हैं।
डर और तन्हाई में एक अलग किस्म का रोमांस होता है वैसे। इश्क़ में टूटा हुआ दिल सबसे शायराना होता है। हम अपनी रंज़िशें, अपने ग़म, अपनी तकलीफ़ें बचाए रखते हैं क्योंकि उससे ख़ुराक हासिल है। मुझसे किसी क़िस्सागो ने कहा था कभी कि जब भीतर-भीतर बिखरा रहता हूं तो बाहर-बाहर निकलनेवाले शब्द बहुत सहेजे हुए निकलते हैं। मेरे भीतर के शब्द ख़त्म ने हो जाएं, इसलिए मैं हमेशा बिखरा-बिखरा रहना चाहता हूँ। मुझे आज तक उस क़िस्सागो की समझ पर तरह आता है। अपनी कहानियों और अपनी कविताओं, अपनी रंगों और अपने किरदारों के लिए हम ख़ुद को किस क़दर तकलीफ़ज़दा बनाए रखते हैं! एक म्यूज़ हमेशा होता है भीतर, जिससे लड़ते रहते हैं और फिर रूठ जाते हैं उससे तो लिखना आसान हो जाता है।
कविताएं सुकून में नहीं लिखी जातीं। कहानियां लिखने हुए कोई शांतमना कैसे हो सकता है? जब कोई कॉन्फ़्लिक्ट ही नहीं है भीतर, तो कोई किस तरह से लिखे और क्या लिखे।
मैंने अपने भीतर के अपने उस म्यूज़ से समझौता कर लिया है। मुझे उसके साथ की दोस्ती रास आने लगी है।
लेकिन 'मम्मा की डायरी' को पूरा करते हुए ये क़दम उठाना ज़रूरी था। मैं अपने सबसे बेशक़ीमती रिश्तों के बारे में कैज़ुअली नहीं लिख सकती थी। भीतर के उस म्यूज़ से लगातार संवाद करना था, उससे सही और ग़लत के विषय में बातें करती रहनी थी, इसलिए मैं बिखरने का ख़तरा नहीं उठा सकती थी। जब अपने घरों और अपने परिवारों, अपने रिश्तों और अपनी मोहब्बतों को सही मायने में निभाने का वक्त आता है तब हम गिरहों को खोलने के रास्ते ढूंढते रहते हैं।
बच्चों को एक उलझी-उलझी मां नहीं चाहिए। पति जब एक सुलझी हुई, समझदार पत्नी के पास लौटता है तो घर की सुख-शांति उसे चैन से जीने की वजहें देती है। पिछले तीन महीने में अगर मैंने अपने भीतर के म्यूज़ को कुछ भी याद दिलाया है, तो यही दो बातें हैं। इसलिए म्यूज़ ख़ामोश रहा भीतर। मुझसे उसने वफ़ादारी निभाई।
क्रिएट करने की प्रक्रिया भी कितनी अजीब होती है! हम पता नहीं कब और कैसे वो होने लगते हैं जो अपने शब्दों के ज़रिए कहना चाहते हैं।
'नीला स्कार्फ़' की रचना के दौरान मैं भीतर से बग़ावती हो गई थी। और पूरी तरह ख़ामोश। मुझे रिश्तों में कमियां दिखती थीं क्योंकि मैं वही देखना चाहती थी। मेरे पास सारी कहानियाँ ख़ामोशी की थीं, ख़ामोश क्रांतियों की थीं। अब 'नीला स्कार्फ़' के किरदारों के बारे में सोचती हूँ तो लगता है कि हर किरदार कितना जटिल था, कितना उलझा हुआ, और कितना बेचैन!
'मम्मा की डायरी' में बेचैनियाँ हैं, लेकिन ठहरी हुई। 'मम्मा की डायरी' में सिर्फ़ मैं और मैं हूँ हर जगह। किसी और की कहानी सुनाते हुए भी। मैं शुरू से जानती थी कि इस किताब के रास्ते मुझे क्या हासिल करना है। मुझे मालूम था कि इस किताब के ज़रिए मुझे अपनी ज़िन्दगी के रिश्ते टटोलने हैं और उनसे साथ शांति वार्ता शुरू करनी है। मुझे सीज़ फ़ायर चाहिए था, पीस। वो हासिल हो गई है। और तो नहीं मालूम कि क्या हुआ है, लेकिन किताब के ख़त्म होते ही मैं ख़ुद को पूरी तरह healed महसूस कर रही हूँ।
आज से किताब का ऑनलाइन प्रोमोशन शुरू हो जाएगा। मैं अपना ही लिखा हुआ पब्लिक स्पेस में डालती रहूँगी और बार-बार डालती रहूँगी। आज से अपने लिखे हुए से डिटैच हो जाना बहुत ज़रूरी है। वरना जिन ज़ख्मों को भरने के लिए इतने महीने पता नहीं कितनी बार एक-एक चैप्टर के ड्राफ्ट लिखती रही, उन्हें सोते-जागते-हँसते-रोते-खाते-पीते जीती रही, उन्हीं ज़ख्मों के वापस कुरेदे जाने की संभावना बहुत बड़ी है।
अगर लिखना आपको सुकून देता है तो छपना आपको वल्नरेबल बनाता है। (इसलिए कई बार डायरी और मॉर्निंग पेज अलमारियों में बंद रखे जाने चाहिए।) यहां से वो सिलसिला शुरू होता है जहाँ लगातार आपको जज किया जाएगा, आपकी सोच और आपके लेखन पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं आएंगी। छपते ही लिखा हुआ आपका नहीं, दुनिया का हो जाता है।
अब जब आपने शब्दों की गठरी बांधकर उन्हें एक किताब के तौर पर वक़्त के समंदर में फेंक देने की हिम्मत दिखा ही दी है तो फिर उससे ख़ुद को जुदा कर लेने में ही अपना और अपने म्यूज़, दोनों का हित है।
समंदर अंतहीन है। गहरा है। सुनो रॉबिनस क्रूसो, जो गठरी फेंककर तुम हल्के हो गए उसके डूबने-उतराने की फ़िक्र से आज़ाद होकर अब जहाज़ को किसी नए रास्ते ले चलने की तैयारी करो। मौसम खुल गया है। म्यूज़ को उठाकर उससे और नई-नई बातें करने का वक्त आ गया है।
बुधवार, 11 मार्च 2015
मॉर्निंग पेज २१: बददुआ
जो बात कहना नहीं चाहते, उससे बचने के लिए हम दुनिया भर के वाहियात काम करते फिरते हैं।
मैं भी कर रही हूं। सुबह से इधर-उधर, यहां-वहां। मॉर्निंग पेज से बचती हूं कि चोरी पकड़ ली जाएगी। ईमानदारी का वायदा है तो बच नहीं पाऊंगी कहने से। इसलिए चुप रहना ही बेहतर...
मैं पढ़ने में हमेशा ठीक-ठाक थी, औसत से बेहतर। लेकिन ग्यारहवीं औऱ बारहवीं में पूरी तरह चौपट निकली। पढ़ने में उन दो साल बिल्कुल मन नहीं लगा। आस-पास के सारे बच्चे इंजीनियरिंग और मेडिकल जैसे भारी-भरकम इम्तिहानों की तैयारी करते थे। मैं भी इंजिनियरिंग की तैयारी कर रही थी, कम से कम ढोंग तो कर ही रही थी। बिलिएंट ट्यूटोरियल्स के क्लास करने जाती। स्कूल से आकर कभी काँके, कभी डोरंडा ट्यूशन पढ़ने जाती। शहर को कोई कोना नहीं छोड़ा था मैंने। बस अपने भीतर का कौना देखने की हिम्मत नहीं मिली। किसी ने सिखाया ही नहीं। किसी ने बताया ही नहीं। भेड़चाल थी। सब चलते थे भीड़ में। मैं भी चलती थी। भीड़ से जुदा क्या वजूद होता है? उस उम्र में किसी का क्या वजूद होता है?
लेकिन फिर भी एक बेचैनी थी। ट्यूशनों और क्लासों में मन नहीं लगता। छूटने के लिए बेचैन रहती। दूर ट्यूशन पढ़ने इसलिए जाती थी क्योंकि रास्ते भर लोग दिखते थे, वक्त कटता था। शहर में घूमना-भटकना उसी उम्र में शुरु हुआ। मैं खूब भटकती थी। कभी अकेली, कभी किसी दोस्त के साथ। रांची का कोई कोना नहीं छोड़ा - कोई बाज़ार नहीं, कोई मोहल्ला नहीं, कोई डैम, किसी डैम का किनारा नहीं।
सिर्फ़ दो ही सब्जेक्टस में मन लगता था - हिंदी और अंग्रेज़ी, जब मैं वाकई क्लास में होना चाहती थी। अंग्रेज़ी के कई टीचर आते और जाते। लेकिन क्लास के भीतर टीचर वही रहते - केकी दारुवाला, टैगोर, ईलियट, शेक्सपियर, वर्ड्सवर्थ, एमिली ब्रॉन्ट, जेन ऑस्टिन। क्लास के बाहर ऐगथा क्रिस्टी, शिडनी शेल्डन, जेफ्री आर्चर, मिल्स एंड बून्स, आयन रैंड, टू किल अ मॉकिंग बर्ड। अंग्रेज़ी के उपन्यास मुझे उस दुनिया में ले जाते जहाँ मैं कभी हो नहीं सकती थी। कभी मैडिसन काउंटी, कभी फ्रांस का कोई गांव तो कभी बर्फ़ीली झील का कोई किनारा। कभी कॉन्सनट्रेशन कैंप तो कभी पांच सौ यूएस मिलियन डॉलर की कंपनी का कोई बोर्ड रूम! हर दुनिया अद्भुत थी - अनदेखी, अनजानी। हर किरदार मज़ेदार था - सनकी, पागल, कन्फ़्यूज़ड, बेवकूफ़, शातिर, ख़तरनाक, जटिल... हिंदी की कहानियाँ और उपन्यासों की ख़ुशबू जानी-पहचानी होती। दुनिया देखी-देखी सी लगती। एक भाषा का मोह था जो जोड़े रखता, पकड़े रखता।
मैं नहीं जानती मैं ऑर्गैनिक केमिस्ट्री पढ़ कैसे रही थी। मुझे पीरियॉडिक टेबल कभी याद नहीं हुआ। फ़िज़िक्स ठीक उसी तरह माथे के ऊपर से गुज़रता जैसे किसी वृत्त के ऊपर से टैन्जेन्ट गुज़रता है कोई। वेक्टर किस बला का नाम है, और क्यों है, मुझे आजतक समझ में नहीं आया।
उन दो सालों का और कुछ भी याद नहीं, सिर्फ और सिर्फ़ भटकना याद है। और पढ़ना याद है। वो अजीब किस्म का जुनून था, इश्क-सा जुनून। इश्क में मैं अगर कोई शहर हुई हूँ कभी, तो वो रांची हुई हूँ। इश्क़ में और कोई शहर बन ही नहीं पाऊँगी उस तरह। इश्क़ में कहीं सबसे ज़्यादा गई हूँ तो वो है रांची क्लब के पीछे की ब्रिटिश लाइब्रेरी जो अब इंटरनेशनल लाइब्रेरी कही जाती है। इश्क़ या तो सड़कों पर बहुत बहुत बहुत भटकाता था या किताबों की गंध में डूबकर ठहर जाता था।
दो साल की उस भटकन और बेचैनी का नतीजा था बारहवीं का रिज़ल्ट।
जिस दिन रिज़ल्ट निकला उस दिन मैं सदमे में रही। मैं हो गई थी, हिंदी और अंग्रेज़ी में आए अंकों की मेहरबानी से बाइज्ज़त पास हो गई थी। लेकिन मैं टॉपर नहीं रही। मैं वो नहीं रही जो मुझे होना चाहिए था, जो मुझे बन जाना चाहिए था। अब मैं इंजीनियर तो किसी क़ीमत पर नहीं बन सकती थी।
उस रोज़ मैंने कुछ नींद की गोलियाँ बाबा की दराज़ से निकाली और कुछ अपनी परदादी के कमरे से, जिन्हें हाई बीपी की वजह से सोने की दवाई दी जा रही थी। कुल मिलाकर पच्चीस गोलियां रही होंगी। मैंने वो सारी गोलियां फांक लीं।
बस फांक ली। बिना सोचे-समझे। किसी ने कुछ कहा नहीं था, लेकिन किसी से कुछ सुनने की हिम्मत नहीं थी मुझमें। न कोई शिकायत, न कोई ताना। ऐसा भी नहीं था कि मेरे एक्ज़ाम के रिज़ल्ट को लेकर लोग बहुत शॉक में हों। मेरे परिवार के बच्चे जैसा रिज़ल्ट लेकर आते हैं, उससे बेहतर ही था जो भी था। किसी के मन में मेरे लिए बड़ी ख़्वाहिशें रही हों, ऐसा भी नहीं था। किसी को कुछ कहने की ज़रूरत नहीं थी।
ये अंधेरे मेरे चुने हुए थे। इन अंधेरों से बाहर निकलने का रास्ता मेरा देखा हुआ था। ये फ़ितूर मेरे पाले हुए थे। इनसे निजात भी मुझे ही पाना था। सोलह साल की उम्र में वैसे भी अपनी रची दुनिया में सिर्फ़ हम होते हैं। सिर्फ़ हम। अकेले। भटके हुए। परेशान।
नींद की गोलियां खा लेने से आसान मरने का कोई और तरीका नहीं था। घर में इतने सारे लोग थे कि कोई कमरा और कोई पंखा दस मिनट के लिए भी खाली मिले, सवाल ही नहीं था। बाथरूम में घुसकर अपने दुपट्टे से अपना ही गला घोंटने की कोशिश की। दो मिनट के बाद हिम्मत जवाब दे गई। बाथरूम में इतनी जगह भी नहीं थी कि ठीक से गिर सकूं। फ़िनायल की दुर्गंध मुझसे बर्दाश्त होती नहीं थी, इसलिए कोने में रखे फ़िनायल को उठाकर पी लेने का कोई मतलब नहीं था। चूहे मारने की दवा चूहों को मुक्ति दिलाने के काम आ गई थी। तीन मंज़िला छत से कूदती भी तो चौधरी नर्सिंग होम पहुंचती। नर्सिंग होम के बगीचे से हमारी दीवार लगी थी। बस नींद की गोलियां थी, वो भी ०.२५ एमजी की। वो भी इतनी ही जितनी एक हफ्ते में किसी को ज़रूरत पड़ती हो। लेकिन घर में तीन जगह थीं।
पच्चीस गोलियां। कुल मिलाकर पच्चीस गोलियां। ०.२५ एमजी की २५ गोलियां। बस इतना ही। मेरे भीतर उतनी ही स्ट्रेंथ में हिम्मत थी, जितनी गोलियां की मेडिकली स्ट्रेंथ थी। कुछ पेट में गईं गोलियाँ और कुछ उल्टियों में निकल गई।
मर जाने के लिए इतने से क्या होता? लेकिन बेहोशी के लिए उतनी गोलियां काफी थीं। मैं अगले कई घंटे बेसुध सोती रही। पूरा दिन। पूरी शाम। पूरी रात।
अगली सुबह पापा उठाकर ले गए थे अपने कमरे में। पापा कभी प्यार जताते नहीं हैं, सिर पर हाथ रखकर या गले लगाकर तो बिल्कुल नहीं। लेकिन उस दिन पापा ने दोनों किया। कहा कि अच्छा हुआ तुम्हारे रिज़ल्ट अच्छे नहीं आए। तुम्हें अपनी ताक़त और कमज़ोरी, दोनों का अंदाज़ा लग गया।
पापा बिल्कुल नॉर्मल थे। उन्होंने मुझसे गोलियों के बारे में पूछा नहीं तो मैंने बताया नहीं। किसी ने नहीं पूछा। मैंने किसी से नहीं बताया।
ऐसा नहीं कि उस दिन के बाद ज़िन्दगी नई हो गई। लेकिन उस दिन के बाद मर जाने जैसा बेवकूफ़ी भरा ख़्याल उतनी तीव्रता से कभी नहीं आया।
मैं ज़िंदा बच गई थी और बाद में अपने हिस्से का बहुत सारा अपमान भी झेलना पड़ा। गोलियाँ खाने का कोई अफ़सोस भी नहीं रहा। सिर्फ़ साइड इफेक्ट कई महीनों तक रहे - चेहरे पर निकल आए बहुत सारे मुँहासों के रूप में। टीनेज का वो धब्बा न अब मेरे चेहरे पर है न रूह पर। टीनेज कितना ख़तरनाक और बेहूदा, सिरफ़िरा और बेतुका हो सकता है - इसकी याद ज़रूर बाकी रह गई है।
परसों सुबह हमारे एक पारिवारिक दोस्त की बेटी ने छत से कूदकर खुदकुशी कर ली। उसकी उम्र ठीक वही रही होगी जिस उम्र में मैंने नींद की गोलियाँ फाँक ली थी। उसने न इम्तिहान देने का इंतज़ार किया, न रिज़ल्ट देखने का। उसके लिए टॉपर न बने रहने का डर इतना बड़ा था कि उस बदतमीज़ लड़की ने छत से कूद जाने में चैन समझा। उसके माँ-बाप ने उससे कभी कुछ नहीं कहा था। सारे अंधेरे उसके चुने हुए थे। सारा फ़ितूर उसका पाला हुआ था। टीनेज उससे न संभला।
दो दिन से ठीक से सोई नहीं हूँ और बार-बार उसके माँ-बाप का चेहरा आँखों के आगे घूमता है। घरों की दीवार पर लगी उसकी तस्वीरें, उसकी स्टडी टेबल पर रखा एडमिट कार्ड और लंच का डिब्बा जो उसकी माँ ने सुबह तैयार किया होगा, बहुत सारे स्टिक ऑन्स पर बहुत ख़ूबसूरत हैंडराईटिंग में लिखे गए फॉर्मूले, दीवारों से ऊँचा बुक रैक, बुक रैक से भारी उम्मीदों का बोझ... सब छोड़कर कूद गई लड़की छत से। एक मिनट भी न लगाया। उसको अंदाज़ा भी था कि वो लौटकर आ नहीं पाएगी? या खेल लगा कोई? कूदे-फांदे-रोए-धोए-लौट आए?
मैं दो दिन से सोच रही हूं कि टीनेज की कौन सी तकलीफ़ इतनी बड़ी और असह्य होती है कि एक मिनट में अपनी ही जान लेने पर उतारू हो जाए इंसान। इसमें मां-बाप का कसूर कहां होता है? इसमें किसका कसूर होता है आख़िर? ये किस तरह का पागलपन है जिससे मैं-आप सब गुज़रते हैं, फिर भी एक-दूसरे को ठीक से बचा नहीं पाते। समझ नहीं पाते। कह नहीं पाते। सुन नहीं पाते।
वो लड़की और कुछ डिज़र्व नहीं करती, सिवाय इसके कि कहीं किसी आसमान पर कोई फ़रिश्ता उसे मिले और उसके चेहरे पर खींचकर दो थप्पड़ मारे। फिर वापस उसे इसी दुनिया में मरने-जीने के लिए भेज दे और तब तक उसे बार-बार इस ज़मीन पर भेजता रहे जब तक उसे ज़िन्दगी की अहमियत का अंदाज़ा न लग जाए, जब तक उसे ये समझ न आ जाए कि एक सिपाही के मैदान से भाग जाने पर न सिपाही को जंग से आज़ादी मिलती है और न जंग ख़त्म होती है।
तुम बार-बार पैदा होती रहो इसी दुनिया में लड़की, तुम्हें मैं यही बददुआ देती हूँ।
मैं भी कर रही हूं। सुबह से इधर-उधर, यहां-वहां। मॉर्निंग पेज से बचती हूं कि चोरी पकड़ ली जाएगी। ईमानदारी का वायदा है तो बच नहीं पाऊंगी कहने से। इसलिए चुप रहना ही बेहतर...
मैं पढ़ने में हमेशा ठीक-ठाक थी, औसत से बेहतर। लेकिन ग्यारहवीं औऱ बारहवीं में पूरी तरह चौपट निकली। पढ़ने में उन दो साल बिल्कुल मन नहीं लगा। आस-पास के सारे बच्चे इंजीनियरिंग और मेडिकल जैसे भारी-भरकम इम्तिहानों की तैयारी करते थे। मैं भी इंजिनियरिंग की तैयारी कर रही थी, कम से कम ढोंग तो कर ही रही थी। बिलिएंट ट्यूटोरियल्स के क्लास करने जाती। स्कूल से आकर कभी काँके, कभी डोरंडा ट्यूशन पढ़ने जाती। शहर को कोई कोना नहीं छोड़ा था मैंने। बस अपने भीतर का कौना देखने की हिम्मत नहीं मिली। किसी ने सिखाया ही नहीं। किसी ने बताया ही नहीं। भेड़चाल थी। सब चलते थे भीड़ में। मैं भी चलती थी। भीड़ से जुदा क्या वजूद होता है? उस उम्र में किसी का क्या वजूद होता है?
लेकिन फिर भी एक बेचैनी थी। ट्यूशनों और क्लासों में मन नहीं लगता। छूटने के लिए बेचैन रहती। दूर ट्यूशन पढ़ने इसलिए जाती थी क्योंकि रास्ते भर लोग दिखते थे, वक्त कटता था। शहर में घूमना-भटकना उसी उम्र में शुरु हुआ। मैं खूब भटकती थी। कभी अकेली, कभी किसी दोस्त के साथ। रांची का कोई कोना नहीं छोड़ा - कोई बाज़ार नहीं, कोई मोहल्ला नहीं, कोई डैम, किसी डैम का किनारा नहीं।
सिर्फ़ दो ही सब्जेक्टस में मन लगता था - हिंदी और अंग्रेज़ी, जब मैं वाकई क्लास में होना चाहती थी। अंग्रेज़ी के कई टीचर आते और जाते। लेकिन क्लास के भीतर टीचर वही रहते - केकी दारुवाला, टैगोर, ईलियट, शेक्सपियर, वर्ड्सवर्थ, एमिली ब्रॉन्ट, जेन ऑस्टिन। क्लास के बाहर ऐगथा क्रिस्टी, शिडनी शेल्डन, जेफ्री आर्चर, मिल्स एंड बून्स, आयन रैंड, टू किल अ मॉकिंग बर्ड। अंग्रेज़ी के उपन्यास मुझे उस दुनिया में ले जाते जहाँ मैं कभी हो नहीं सकती थी। कभी मैडिसन काउंटी, कभी फ्रांस का कोई गांव तो कभी बर्फ़ीली झील का कोई किनारा। कभी कॉन्सनट्रेशन कैंप तो कभी पांच सौ यूएस मिलियन डॉलर की कंपनी का कोई बोर्ड रूम! हर दुनिया अद्भुत थी - अनदेखी, अनजानी। हर किरदार मज़ेदार था - सनकी, पागल, कन्फ़्यूज़ड, बेवकूफ़, शातिर, ख़तरनाक, जटिल... हिंदी की कहानियाँ और उपन्यासों की ख़ुशबू जानी-पहचानी होती। दुनिया देखी-देखी सी लगती। एक भाषा का मोह था जो जोड़े रखता, पकड़े रखता।
मैं नहीं जानती मैं ऑर्गैनिक केमिस्ट्री पढ़ कैसे रही थी। मुझे पीरियॉडिक टेबल कभी याद नहीं हुआ। फ़िज़िक्स ठीक उसी तरह माथे के ऊपर से गुज़रता जैसे किसी वृत्त के ऊपर से टैन्जेन्ट गुज़रता है कोई। वेक्टर किस बला का नाम है, और क्यों है, मुझे आजतक समझ में नहीं आया।
उन दो सालों का और कुछ भी याद नहीं, सिर्फ और सिर्फ़ भटकना याद है। और पढ़ना याद है। वो अजीब किस्म का जुनून था, इश्क-सा जुनून। इश्क में मैं अगर कोई शहर हुई हूँ कभी, तो वो रांची हुई हूँ। इश्क़ में और कोई शहर बन ही नहीं पाऊँगी उस तरह। इश्क़ में कहीं सबसे ज़्यादा गई हूँ तो वो है रांची क्लब के पीछे की ब्रिटिश लाइब्रेरी जो अब इंटरनेशनल लाइब्रेरी कही जाती है। इश्क़ या तो सड़कों पर बहुत बहुत बहुत भटकाता था या किताबों की गंध में डूबकर ठहर जाता था।
दो साल की उस भटकन और बेचैनी का नतीजा था बारहवीं का रिज़ल्ट।
जिस दिन रिज़ल्ट निकला उस दिन मैं सदमे में रही। मैं हो गई थी, हिंदी और अंग्रेज़ी में आए अंकों की मेहरबानी से बाइज्ज़त पास हो गई थी। लेकिन मैं टॉपर नहीं रही। मैं वो नहीं रही जो मुझे होना चाहिए था, जो मुझे बन जाना चाहिए था। अब मैं इंजीनियर तो किसी क़ीमत पर नहीं बन सकती थी।
उस रोज़ मैंने कुछ नींद की गोलियाँ बाबा की दराज़ से निकाली और कुछ अपनी परदादी के कमरे से, जिन्हें हाई बीपी की वजह से सोने की दवाई दी जा रही थी। कुल मिलाकर पच्चीस गोलियां रही होंगी। मैंने वो सारी गोलियां फांक लीं।
बस फांक ली। बिना सोचे-समझे। किसी ने कुछ कहा नहीं था, लेकिन किसी से कुछ सुनने की हिम्मत नहीं थी मुझमें। न कोई शिकायत, न कोई ताना। ऐसा भी नहीं था कि मेरे एक्ज़ाम के रिज़ल्ट को लेकर लोग बहुत शॉक में हों। मेरे परिवार के बच्चे जैसा रिज़ल्ट लेकर आते हैं, उससे बेहतर ही था जो भी था। किसी के मन में मेरे लिए बड़ी ख़्वाहिशें रही हों, ऐसा भी नहीं था। किसी को कुछ कहने की ज़रूरत नहीं थी।
ये अंधेरे मेरे चुने हुए थे। इन अंधेरों से बाहर निकलने का रास्ता मेरा देखा हुआ था। ये फ़ितूर मेरे पाले हुए थे। इनसे निजात भी मुझे ही पाना था। सोलह साल की उम्र में वैसे भी अपनी रची दुनिया में सिर्फ़ हम होते हैं। सिर्फ़ हम। अकेले। भटके हुए। परेशान।
नींद की गोलियां खा लेने से आसान मरने का कोई और तरीका नहीं था। घर में इतने सारे लोग थे कि कोई कमरा और कोई पंखा दस मिनट के लिए भी खाली मिले, सवाल ही नहीं था। बाथरूम में घुसकर अपने दुपट्टे से अपना ही गला घोंटने की कोशिश की। दो मिनट के बाद हिम्मत जवाब दे गई। बाथरूम में इतनी जगह भी नहीं थी कि ठीक से गिर सकूं। फ़िनायल की दुर्गंध मुझसे बर्दाश्त होती नहीं थी, इसलिए कोने में रखे फ़िनायल को उठाकर पी लेने का कोई मतलब नहीं था। चूहे मारने की दवा चूहों को मुक्ति दिलाने के काम आ गई थी। तीन मंज़िला छत से कूदती भी तो चौधरी नर्सिंग होम पहुंचती। नर्सिंग होम के बगीचे से हमारी दीवार लगी थी। बस नींद की गोलियां थी, वो भी ०.२५ एमजी की। वो भी इतनी ही जितनी एक हफ्ते में किसी को ज़रूरत पड़ती हो। लेकिन घर में तीन जगह थीं।
पच्चीस गोलियां। कुल मिलाकर पच्चीस गोलियां। ०.२५ एमजी की २५ गोलियां। बस इतना ही। मेरे भीतर उतनी ही स्ट्रेंथ में हिम्मत थी, जितनी गोलियां की मेडिकली स्ट्रेंथ थी। कुछ पेट में गईं गोलियाँ और कुछ उल्टियों में निकल गई।
मर जाने के लिए इतने से क्या होता? लेकिन बेहोशी के लिए उतनी गोलियां काफी थीं। मैं अगले कई घंटे बेसुध सोती रही। पूरा दिन। पूरी शाम। पूरी रात।
अगली सुबह पापा उठाकर ले गए थे अपने कमरे में। पापा कभी प्यार जताते नहीं हैं, सिर पर हाथ रखकर या गले लगाकर तो बिल्कुल नहीं। लेकिन उस दिन पापा ने दोनों किया। कहा कि अच्छा हुआ तुम्हारे रिज़ल्ट अच्छे नहीं आए। तुम्हें अपनी ताक़त और कमज़ोरी, दोनों का अंदाज़ा लग गया।
पापा बिल्कुल नॉर्मल थे। उन्होंने मुझसे गोलियों के बारे में पूछा नहीं तो मैंने बताया नहीं। किसी ने नहीं पूछा। मैंने किसी से नहीं बताया।
ऐसा नहीं कि उस दिन के बाद ज़िन्दगी नई हो गई। लेकिन उस दिन के बाद मर जाने जैसा बेवकूफ़ी भरा ख़्याल उतनी तीव्रता से कभी नहीं आया।
मैं ज़िंदा बच गई थी और बाद में अपने हिस्से का बहुत सारा अपमान भी झेलना पड़ा। गोलियाँ खाने का कोई अफ़सोस भी नहीं रहा। सिर्फ़ साइड इफेक्ट कई महीनों तक रहे - चेहरे पर निकल आए बहुत सारे मुँहासों के रूप में। टीनेज का वो धब्बा न अब मेरे चेहरे पर है न रूह पर। टीनेज कितना ख़तरनाक और बेहूदा, सिरफ़िरा और बेतुका हो सकता है - इसकी याद ज़रूर बाकी रह गई है।
परसों सुबह हमारे एक पारिवारिक दोस्त की बेटी ने छत से कूदकर खुदकुशी कर ली। उसकी उम्र ठीक वही रही होगी जिस उम्र में मैंने नींद की गोलियाँ फाँक ली थी। उसने न इम्तिहान देने का इंतज़ार किया, न रिज़ल्ट देखने का। उसके लिए टॉपर न बने रहने का डर इतना बड़ा था कि उस बदतमीज़ लड़की ने छत से कूद जाने में चैन समझा। उसके माँ-बाप ने उससे कभी कुछ नहीं कहा था। सारे अंधेरे उसके चुने हुए थे। सारा फ़ितूर उसका पाला हुआ था। टीनेज उससे न संभला।
दो दिन से ठीक से सोई नहीं हूँ और बार-बार उसके माँ-बाप का चेहरा आँखों के आगे घूमता है। घरों की दीवार पर लगी उसकी तस्वीरें, उसकी स्टडी टेबल पर रखा एडमिट कार्ड और लंच का डिब्बा जो उसकी माँ ने सुबह तैयार किया होगा, बहुत सारे स्टिक ऑन्स पर बहुत ख़ूबसूरत हैंडराईटिंग में लिखे गए फॉर्मूले, दीवारों से ऊँचा बुक रैक, बुक रैक से भारी उम्मीदों का बोझ... सब छोड़कर कूद गई लड़की छत से। एक मिनट भी न लगाया। उसको अंदाज़ा भी था कि वो लौटकर आ नहीं पाएगी? या खेल लगा कोई? कूदे-फांदे-रोए-धोए-लौट आए?
मैं दो दिन से सोच रही हूं कि टीनेज की कौन सी तकलीफ़ इतनी बड़ी और असह्य होती है कि एक मिनट में अपनी ही जान लेने पर उतारू हो जाए इंसान। इसमें मां-बाप का कसूर कहां होता है? इसमें किसका कसूर होता है आख़िर? ये किस तरह का पागलपन है जिससे मैं-आप सब गुज़रते हैं, फिर भी एक-दूसरे को ठीक से बचा नहीं पाते। समझ नहीं पाते। कह नहीं पाते। सुन नहीं पाते।
वो लड़की और कुछ डिज़र्व नहीं करती, सिवाय इसके कि कहीं किसी आसमान पर कोई फ़रिश्ता उसे मिले और उसके चेहरे पर खींचकर दो थप्पड़ मारे। फिर वापस उसे इसी दुनिया में मरने-जीने के लिए भेज दे और तब तक उसे बार-बार इस ज़मीन पर भेजता रहे जब तक उसे ज़िन्दगी की अहमियत का अंदाज़ा न लग जाए, जब तक उसे ये समझ न आ जाए कि एक सिपाही के मैदान से भाग जाने पर न सिपाही को जंग से आज़ादी मिलती है और न जंग ख़त्म होती है।
तुम बार-बार पैदा होती रहो इसी दुनिया में लड़की, तुम्हें मैं यही बददुआ देती हूँ।
सोमवार, 9 मार्च 2015
मॉर्निंग पेज २० और लौटना इलाहाबाद से
सुबह-सुबह इस पेज पर लौटने की ख़ुशी अद्भुत है। चार दिन लिख नहीं सकी, और चार दिन सबसे ज़्यादा अपनी डायरी को मिस करती रही।
हम इलाहाबाद में थे। हाई कोर्ट के पास, ओल्ड कैंट एरिया में। होली की हुड़दंग के बीच हमें जो इलाहाबाद दिखाई दिया उसमें एक पुराने शहर की ख़ूबसूरती और चार्म है। जब तक आप एक बार इलाहाबाद से होकर न गुज़रें, तब तक ये वाकई समझना मुश्किल है कि कैसे एक शहर किसी का म्यूज़ बन सकता है। ये इलाहाबाद चंदर और सुधा का शहर है। यही वो शहर है जहाँ प्यार दोनों की रूहों में पिघले हुए लोहे की तरह बचा रह गया था। यही वो शहर है जिसके वर्णन से खुलता है गुनाहों का देवता... इस शहर में ही हो सकती है रोम-रोम चुभती मोहब्बत। धर्मवीर भारती का म्यूज़ इलाहाबाद। महादेवी वर्मा का शहर इलाहाबाद। बच्चन का ये शहर - इलाहाबाद।
और चाहे जो हो, मगर इधर क्वार, कार्तिक तथा उधर वसन्त के बाद और होली के बीच के मौसम से इलाहाबाद का वातावरण नैस्टर्शियम और पैंजी के फूलों से भी ज्यादा खूबसूरत और आम के बौरों की खुशबू से भी ज्यादा महकदार होता है। सिविल लाइन्स हो या अल्फ्रेड पार्क, गंगातट हो या खुसरूबाग, लगता है कि हवा एक नटखट दोशीजा की तरह कलियों के आँचल और लहरों के मिजाज से छेडख़ानी करती चलती है। और अगर आप सर्दी से बहुत नहीं डरते तो आप जरा एक ओवरकोट डालकर सुबह-सुबह घूमने निकल जाएँ तो इन खुली हुई जगहों की फिजाँ इठलाकर आपको अपने जादू में बाँध लेगी। खासतौर से पौ फटने के पहले तो आपको एक बिल्कुल नयी अनुभूति होगी। वसन्त के नये-नये मौसमी फूलों के रंग से मुकाबला करने वाली हल्की सुनहली, बाल-सूर्य की अँगुलियाँ सुबह की राजकुमारी के गुलाबी वक्ष पर बिखरे हुए भौंराले गेसुओं को धीरे-धीरे हटाती जाती हैं और क्षितिज पर सुनहली तरुणाई बिखर पड़ती है।
'गुनाहों का देवता' की शुरुआत ही इलाहाबाद के कुछ इस तरह के वर्णन से होती है। इतने सालों बाद भी इलाहाबाद कम, बहुत कम बदला है। वो तो भला हो आद्या का, कि होली पर लहंगा खरीदने की ज़िद की उसने। वरना मुझे शहर उस तरह नज़र ही न आता जैसा होली के एक दिन पहले दिखाई दे गया था। सिविल लाइन्स बाज़ार एक महानगर और किसी छोटे शहर का मिक्स्ड ब्रीड है। कटरा की गलियों में घुसकर थोक दुकानों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराना मेरे जैसे नोस्टालजिस्ट लोगों का परम धर्म है।
लोग होली की दोपहरी रंग खेलकर आराम फ़रमा रहे थे। हम पतिदेव के भांग के नशे का इलाज कराने मिलिट्री अस्पताल की ओर दौड़ रहे थे। वक़्त ने इजाज़त दी तो उस एक दोपहर को मैं फिर से जीना चाहूँगी। इसलिए क्योंकि जितना प्यार भाँग के नशे में बड़बड़ाते पति पर आता है, उतना ही होली के नशे में डूबे इलाहाबाद पर आया।
लोग अगले दिन फिर से होली खेल रहे थे और हम शहर धाँग रहे थे। बाहर से छू-छूकर देख रहे थे वो इतिहास जो इस शहर ने जिया है। यूनिवर्सिटी, साइंस फैकल्टी, आर्ट्स फैकल्टी, हिंदू छात्रावास, हाई कोर्ट, एल्फ्रेड पार्क, इलाहाबाद फोर्ट, त्रिवेणी, स्वराज भवन, खुसरो पार्क, कैथेड्रल...
पहले यमुना और फिर गंगा और फिर त्रिवेणी पर डोलते नाव पर ही कहीं लौट आने की दुआ भूल आई हूँ।
चिड़िया को खिलाने के लिए रखी नमकीन पर्स में ही लौटा आई हूँ।
अमरनाथ झा चौराहे पर छूट गई हैं प्रेम कहानियाँ।
लौटना होगा फिर से, इलाहाबाद।
हम इलाहाबाद में थे। हाई कोर्ट के पास, ओल्ड कैंट एरिया में। होली की हुड़दंग के बीच हमें जो इलाहाबाद दिखाई दिया उसमें एक पुराने शहर की ख़ूबसूरती और चार्म है। जब तक आप एक बार इलाहाबाद से होकर न गुज़रें, तब तक ये वाकई समझना मुश्किल है कि कैसे एक शहर किसी का म्यूज़ बन सकता है। ये इलाहाबाद चंदर और सुधा का शहर है। यही वो शहर है जहाँ प्यार दोनों की रूहों में पिघले हुए लोहे की तरह बचा रह गया था। यही वो शहर है जिसके वर्णन से खुलता है गुनाहों का देवता... इस शहर में ही हो सकती है रोम-रोम चुभती मोहब्बत। धर्मवीर भारती का म्यूज़ इलाहाबाद। महादेवी वर्मा का शहर इलाहाबाद। बच्चन का ये शहर - इलाहाबाद।
अगर पुराने जमाने की नगर-देवता की और ग्राम-देवता की कल्पनाएँ आज भी मान्य होतीं तो मैं कहता कि इलाहाबाद का नगर-देवता जरूर कोई रोमैण्टिक कलाकार है। ऐसा लगता है कि इस शहर की बनावट, गठन, जिंदगी और रहन-सहन में कोई बँधे-बँधाये नियम नहीं, कहीं कोई कसाव नहीं, हर जगह एक स्वच्छन्द खुलाव, एक बिखरी हुई-सी अनियमितता। बनारस की गलियों से भी पतली गलियाँ और लखनऊ की सडक़ों से चौड़ी सडक़ें। यार्कशायर और ब्राइटन के उपनगरों का मुकाबला करने वाले सिविल लाइन्स और दलदलों की गन्दगी को मात करने वाले मुहल्ले। मौसम में भी कहीं कोई सम नहीं, कोई सन्तुलन नहीं। सुबहें मलयजी, दोपहरें अंगारी, तो शामें रेशमी! धरती ऐसी कि सहारा के रेगिस्तान की तरह बालू भी मिले, मालवा की तरह हरे-भरे खेत भी मिलें और ऊसर और परती की भी कमी नहीं। सचमुच लगता है कि प्रयाग का नगर-देवता स्वर्ग-कुंजों से निर्वासित कोई मनमौजी कलाकार है जिसके सृजन में हर रंग के डोरे हैं।
और चाहे जो हो, मगर इधर क्वार, कार्तिक तथा उधर वसन्त के बाद और होली के बीच के मौसम से इलाहाबाद का वातावरण नैस्टर्शियम और पैंजी के फूलों से भी ज्यादा खूबसूरत और आम के बौरों की खुशबू से भी ज्यादा महकदार होता है। सिविल लाइन्स हो या अल्फ्रेड पार्क, गंगातट हो या खुसरूबाग, लगता है कि हवा एक नटखट दोशीजा की तरह कलियों के आँचल और लहरों के मिजाज से छेडख़ानी करती चलती है। और अगर आप सर्दी से बहुत नहीं डरते तो आप जरा एक ओवरकोट डालकर सुबह-सुबह घूमने निकल जाएँ तो इन खुली हुई जगहों की फिजाँ इठलाकर आपको अपने जादू में बाँध लेगी। खासतौर से पौ फटने के पहले तो आपको एक बिल्कुल नयी अनुभूति होगी। वसन्त के नये-नये मौसमी फूलों के रंग से मुकाबला करने वाली हल्की सुनहली, बाल-सूर्य की अँगुलियाँ सुबह की राजकुमारी के गुलाबी वक्ष पर बिखरे हुए भौंराले गेसुओं को धीरे-धीरे हटाती जाती हैं और क्षितिज पर सुनहली तरुणाई बिखर पड़ती है।
'गुनाहों का देवता' की शुरुआत ही इलाहाबाद के कुछ इस तरह के वर्णन से होती है। इतने सालों बाद भी इलाहाबाद कम, बहुत कम बदला है। वो तो भला हो आद्या का, कि होली पर लहंगा खरीदने की ज़िद की उसने। वरना मुझे शहर उस तरह नज़र ही न आता जैसा होली के एक दिन पहले दिखाई दे गया था। सिविल लाइन्स बाज़ार एक महानगर और किसी छोटे शहर का मिक्स्ड ब्रीड है। कटरा की गलियों में घुसकर थोक दुकानों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराना मेरे जैसे नोस्टालजिस्ट लोगों का परम धर्म है।
लोग होली की दोपहरी रंग खेलकर आराम फ़रमा रहे थे। हम पतिदेव के भांग के नशे का इलाज कराने मिलिट्री अस्पताल की ओर दौड़ रहे थे। वक़्त ने इजाज़त दी तो उस एक दोपहर को मैं फिर से जीना चाहूँगी। इसलिए क्योंकि जितना प्यार भाँग के नशे में बड़बड़ाते पति पर आता है, उतना ही होली के नशे में डूबे इलाहाबाद पर आया।
लोग अगले दिन फिर से होली खेल रहे थे और हम शहर धाँग रहे थे। बाहर से छू-छूकर देख रहे थे वो इतिहास जो इस शहर ने जिया है। यूनिवर्सिटी, साइंस फैकल्टी, आर्ट्स फैकल्टी, हिंदू छात्रावास, हाई कोर्ट, एल्फ्रेड पार्क, इलाहाबाद फोर्ट, त्रिवेणी, स्वराज भवन, खुसरो पार्क, कैथेड्रल...
पहले यमुना और फिर गंगा और फिर त्रिवेणी पर डोलते नाव पर ही कहीं लौट आने की दुआ भूल आई हूँ।
चिड़िया को खिलाने के लिए रखी नमकीन पर्स में ही लौटा आई हूँ।
अमरनाथ झा चौराहे पर छूट गई हैं प्रेम कहानियाँ।
लौटना होगा फिर से, इलाहाबाद।
मंगलवार, 3 मार्च 2015
मॉर्निंग पेज १९ और आनेवाली छुट्टी के दिन
कल से फिर शहर से बाहर। होली के लिए बड़ी ननद के घर इलाहाबाद। लैपटॉप और फ़ोन से पाँच-छह दिनों की छुट्टी। काग़ज़-कलम से अभ्यास शुरु करूंगी। जाने से पहले फिलहाल कई सारे काम निपटाने हैं, इसलिए आज के मॉर्निंग पेज का वक़्त काम की लिखाई के बहाने।
न होता ग़म-ए-इश्क़ तो ग़म-ए-रोज़गार होता...
न होता ग़म-ए-इश्क़ तो ग़म-ए-रोज़गार होता...
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