शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

सिरफिरों की मंडली, ख़्वाबमंदों की टोली



लोदी गार्डन में पिछले इतवार की दुपहर एक बजे का वक़्त मुक़र्रर था मंडली के लिए। सच कहूं तो इतवार की दोपहर कितने लोग आएंगे, इसका ठीक-ठीक अंदाज़ा मुझे भी नहीं था। ख़ासकर तब, जब आने वालों में कईयों को अपने घर के काम समेटने होंगे शायद, अपने बच्चों को सॉकर, म्यूज़िक या बैडमिंटन क्लास के लिए लेकर जाना होगा, या फिर जाड़े की एक नर्म दुपहर अपनी नींद ही पूरी करनी हो शायद... लेकिन मेरी आशंका के ठीक विपरीत लोगों ने एक बजे से पहले ही मुझे फोन करना शुरू कर दिया। डेढ़ बजते-बजते पूरी मंडली इकट्ठा हो चुकी थी, और कुल बारह-पंद्रह लोग एक घेरे में बैठे थे। इनमें से कम-से-कम दस अपनी कहानियां लेकर आए थे सुनाने के लिए, और कई इस उम्मीद में आए थे यहां से लिख सकने की प्रेरणा मिल सके।

शाम के गिरते-गिरते तक, ठंड के बढ़ते रहने तक, अंधेरा और गहरा होते जाने तक हम वैसे ही बैठे रहे थे - एक-दूसरे की कहानियां सुनने और उसपर अपनी प्रतिक्रियाएं देने के लिए। वक़्त तेज़ी से भागने की अपनी लत से मजबूर न होता तो हम कई और घंटे वैसे ही बैठे रहने को तैयार थे।

अब 'मंडली' के बारे में कुछ बताती चलूं। बाकी और लोगों की तरह मैंने भी मंडली के बारे में पहली बार फ़ेसबुक पर ही पढ़ा था और कुछ तस्वीरें देखीं थी वहीं। वो तब का दौर था जब बच्चों को प्ले-स्कूल भेज देने के बाद अपने मन का गुबार निकालने के लिए मैंने इसी ब्लॉग का सहारा ले लिया था। कई और लिखने वालों की तरह मैं भी सात या आठ साल की उम्र से लिखती रही हूं, और दस साल की उम्र से लिखते हुए मैंने अपनी जेबखर्च का इंतज़ाम भी शुरू कर दिया था। तब साठ रुपए बहुत होते थे और एआईआर, रांची या दूरदर्शन रांची में बच्चों के कार्यक्रम में कविताएं पढ़ने वाले बहुत सारे बच्चे थे नहीं। लेकिन लिखना एक शगल भर था - एक फ़ितूर - जिसपर आईआईएमसी जाकर फुल स्टॉप लग गया। उसके बाद का लिखना सिर्फ और सिर्फ रनडाउन भरने और एंकर लिंक्स लिखने तक ही सीमित रह गया। नौकरी छोड़ी तो लिखना शुरु किया - बड़ी बेतरतीबी से।

मैं ये बात इसलिए बता रही हूं क्योंकि मंडली के लिए जमा हुए अमूमन सभी लोगों की कहानी कुछ ऐसी ही थी - कम से कम लड़कियों और महिलाओं की तो थी ही। इनमें से कुछ ने डायरी के पन्ने भरे और उन पन्नों को या तो फाड़कर फेंक दिया या फिर तकियों के नीचे छुपाए रखा। कुछ नौकरी-गृहस्थी में इतने मशगूल हो गए कि लिखना बेमानी लगने लगा और फिर धीरे-धीरे कुछ कहने, बांटने की ज़रूरत भी मरने लगी। कुछ थे जो बेचैन रहे मेरी तरह। इसलिए फ़ेसबुक स्टेटस अपडेट्स में कविताएं लिखते हुए ख़ुद को जिलाए रखने का काम करते रहे। जो भी था, लिखना सब चाहते थे। चाहते हैं, उतनी ही शिद्दत से जितनी शिद्दत से मैं चाहती रही हूं, लेकिन कई सवाल रास्ता रोके रहते हैं।

मसलन, इस लिखने का हासिल क्या हो? ये दीवानगी, लिखने का ये जुनून कौन-सी दुनिया बदल देगा कमबख़्त? कितने लोग कालजयी लिख पाते हैं? कितने लोगों की पहचान बन पाती है लिखकर? लिखकर क्या करेंगे?

मैंने भी ये सवाल कई बार पूछे हैं ख़ुद से, और इसी ब्लॉग को कई बार उन सवालों के आड़े-तिरछे, बेमानी जवाबों से भर भी दिया है।
किसी ने लिखकर दुनिया न बदली है, न बदल पाएगा कोई। लेकिन लिखना ख़ुद को ज़रूर बदल देता है भीतर से। इसे एक क्लेनज़िंग प्रोसेस भी मान लिया जाए तो इस सफाई की ज़रूरत हर रूह को किसी न किसी रूप में होती ही है। वैसे लिखना इतना ही ग़ैर-ज़रूरी काम होता तो वाल्मिकी ने क्यों रची थी रामायण? स्वयं सिद्धिविनायक को क्यों बैठना पड़ा था एक महाकाव्य लिखने के लिए? एक पल को इन एपिक्स के बारे में भूल भी जाएं तो हम क्यों बेचैन होकर लिखते हैं चिट्ठियां? लव लेटर्स ही प्यार के इज़हार का ज़रिया क्यों बनते हैं? बहरहाल, ये विमर्श का एक अलग मुद्दा है और मैं तो कोई एक्सपर्ट भी नहीं।

अपने अनुभव से इतना ज़रूर जानती हूं कि लिखने की ख़्वाहिश रखने वाले हर इंसान को संबल ज़रूर दिया जाना चाहिए, उसे पढ़ा बेशक न जाया जाए, एक बार सुना ज़रूर जाना चाहिए। कोई कितना भी ख़राब क्यों न लिखता हो, हम सबके भीतर बैठे किस्सागो को थोड़ी-सी इज़्जत बख़्शने का मतलब दूसरे इंसान की कद्र करना होता है और हर इंसान उस थोड़ी-सी इज़्जत का हक़दार है - लिखनेवाले के तौर पर न सही, इंसान के तौर पर सही और मेरे लिए लिखना-पढ़ना इंसानियत बचाए रखने का एक्सटेंशन है।

सच कहूं तो शुरू में मुझे लगता था कि क़ाबिल लेखकों की एक मंडली एक स्मार्ट बिज़नेस मूव है (और यहां पब्लिक स्पेस में ये स्वीकार करते हुए मुझे बेहद हिचकिचाहट हो रही है) और कमर्शियल राइटिंग स्पेस में इससे बेहतर कोई बिज़नेस आईडिया शायद ही हो (सॉरी नीलेश! मैं पहले ऐसा सोचती थी। अब नहीं सोचती।)

लेकिन मैं जैसे-जैसे ख़ुद मंडली से गहराई और ईमानदारी से जुड़ती गई, वैसे-वैसे समझ में आने लगा कि ये एक पागलपन है - एक किस्म का सिरफिरापन, जिसका कोई रिटर्न, कम-से-कम वक़्त और ऊर्जा के अनुपात में आने वाला फाइनैन्शियल रिटर्न बहुत कम है। इस तरह का पागलपन उसी किस्म का कोई इंसान कर सकता है जिसने अपने लिखने और सीखने के क्रम में कई सारी गलतियां की हों, और बड़ी गहराई से ये महसूस किया हो कि इन गलतियों से हासिल सबक को इकट्ठा करके उन्हें अपने जैसे कई और सिरफिरे लोगों के साथ बांटा जाना चाहिए।

लिखनेवालों की एक टोली जुटाने की हिम्मत वैसा ही कोई शख़्स कर सकता है जिसने अपना ईगो, अपना दंभ एक हद तक क़ाबू में कर लिया हो। वरना ये आसान नहीं होता कि आप बड़ी ईमानदारी से ये स्वीकार कर सकें कि जो लोग आपसे सीखने आए हैं, वो दरअसल आपसे कहीं बेहतर हैं। ये भी आसान नहीं कि अपना लिखना छोड़कर आप बाकी लोगों को लिखने के लिए प्रेरित करते रहें, उनके लिए अवसर ढूंढते रहें।

लेखक या आर्टिस्ट या किसी किस्म का कलाकार अपने एकाकीपन में ही सबसे बेहतर रच पाता है - अपनी उदासियों में। उसकी उलझनें ही दूसरों को बांधती हैं। ये वो सूक्ष्म तंतु होते हैं जिनसे लेखक जितना कस कर  ख़ुद को घेरे रखता है, उतनी ही ज़ोर से पढ़नेवालों को, सुननेवालों को बांध पाता है। आर्टिस्ट का सिरफिरापन, उसका अवसाद, उसके दुख उसकी सबसे बड़ी ताक़त होते हैं - उसके हथियार होते हैं। वो दुनिया को जितनी शिद्दत से नकारता है, उतना ही अच्छा और नया लिख पाता है।

और हम मंडली में क्या कर रहे हैं? लिखनेवालों (या खुद को लेखक समझनेवालों) की फ़ितरत के ठीक विपरीत हम भीड़ जुटा रहे हैं। हम कह रहे हैं कि लिखो, और कुछ सकारात्मक लिखो। हम कह रहे हैं कि तुम्हारे पास जो ताक़त है न लिखने की, उसमें दुनिया को तो नहीं, लेकिन कुछ लोगों की सोच को बदलने का माद्दा ज़रूर है। इसलिए अच्छा लिखो। बदलो तो कुछ बदलो बेहतरी के लिए। बांटों तो उम्मीदें। लफ़्ज़ गिरें तो हौसलों के हों। अपनी टूटन का फ़साना बयां भी हो तो किसी और के टूटे हुए दिल को जोड़ पाने के लिए।

धत्त तेरे की!!! एक और सिरफ़िरी बात।

लेकिन ये मंडली है ही इसी के लिए। सिरफ़िरों की टोली है, जो अभी और बड़ी होगी। मुंबई और दिल्ली से देश के कई और शहरों में जाएगी। अगले कई सालों तक कई सारे लोगों को लिख पाने का भरोसा देगी।

अपने प्यार का इज़हार कर पाने के लिए जो चिट्ठी किसी ने कभी न लिखी, उसे वो चिट्ठी लिख पाने का हौसला देने के लिए।

अपने बॉस को assertive होकर जो ई-मेल कभी हम लिख न पाए, वो polite assertiveness बाहर लेकर आने के लिए।

अपनी मां की सालगिरह पर एक कविता लिख पाने के लिए। अपने भाई को राखी पर एक गीत सुना पाने के लिए।

अपने दोस्तों के बीच बैठकर कहानियां रच पाने के लिए।

अपने बच्चों को सुलाते हुए नई-नई कहानियां बुन पाने के लिए।

मंडली इसी के लिए तो है। रेडियो, टीवी या फिर किताबों-पत्र-पत्रिकाओं में अपना लिखा हुआ देख पाना तो सेकेंडरी है। कम-से-कम मंडली के लिए। दो क़दम आगे और एक क़दम पीछे चलते हुए हम अपना नया रास्ता तय कर ही लेंगे। मंडली के बारे में और बताऊंगी लौटकर। अभी के लिए इतना बता दूं कि दिल्ली में हुई चार मंडली बैठकों से होकर पांच नए (और बेहतरीन) writers निकले हैं, जिनकी कहानियां आप आनेवाले हफ्तों में बिग एफएम पर सुन सकेंगे। इनके अलावा एक मां (जो नानी भी हैं) ने बीस-पच्चीस साल पहले बंद की गई कविताओं और कहानियों की डायरी एक बार फिर निकाल ली है। अंबुज खरे नाम के साथी ने पंद्रह साल के बाद कलम उठाने का वायदा किया है। कॉरपोरेट नौकरियों और ज़िन्दगी की आपाधापी के बीच चार लेखिकाओं ने (जो मां भी हैं, और कामकाजी भी) अपनी कहानियां बांटी हैं।

अब और क्या कहूं कि ये मंडली  आख़िर है क्या?

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

दिलासों को छूके, उम्मीदों से मिलके

एक छोटी सी बच्ची ट्रेन की पटरियों के ठीक बीचों-बीच बेफ़िक्री से चलती है। उसके दाएं हाथ में लाल फूलों का गुच्छा है। लाल नहीं, गहरे गुलाबी-नारंगी फूलों का। बुगेनवेलिया के फूलों का गुच्छा लिए वो लड़की इस तरह अकेली कहां जा रही होगी, मैं घबराकर सोचती हूं। तभी देखती हूं कि लड़की सुबक रही है - गहरी उदासियों वाली सिसकियों के साथ। मैं उस लड़की को गले लगाना चाहती हूं। Big hug - मन में सोचती हूं, सामने बढ़कर दे नहीं पाती।

किसी अनजान शहर में मुसलसल बर्फ गिरती रहती है। कई साल पहले बिछड़ गई एक सहेली को बर्फ़ में ठिठुरते देखती हूं बंद गाड़ी की खिड़की के पीछे से आते-जाते। हर बार सोचती हूं, उतरकर गले लगाऊंगी और हाथ थामकर गाड़ी में बिठा लूंगी। गाड़ी रुकती नहीं, बर्फ थमती नहीं, सहेली का ठिठुरना बंद नहीं होता। Big hug देने का ख़्याल धरा का धरा रह जाता है। मैं फिर एक पत्थर-सा भारी अफ़सोस लिए उठती हूं सुबह-सुबह।

उसके ठंडे बेजान पैरों पर एक बार फिर गहरा आलता लगाए देती हूं। उसकी सूजी हुई उंगलियों में शादी की अंगूठी नहीं है, एक दाग़ रह गया है बस। सफ़ेद कपड़े के पीछे से रंग-बिरंगे पत्थरों वाले ताबीज़ झांकते हैं। उसे इस हाल में देखकर पत्थरों पर से भी यकीन उठ गया है, ईश्वर पर से भी। ग़लती से मेरा हाथ आलते की शीशी पर लग जाता है और पूरा रंग उसके पैरों के पास बिखर जाता है। मैं डर कर रोने लगती हूं। यहां भी कोई नहीं आता, Big hug लिए। भीतर कुछ है जो फिर एक बार डूब जाता है। गले में रुलाई अटकी रहती है नींद में भी।

शुक्र है सुबहों का वजूद रातों से आज़ाद होता है।

आड़े-तिरछे बेतरतीब बेमानी सपनों में ही नहीं... मेट्रो में आते-जाते हुए, मेट्रो कंस्ट्रक्शन की वजह से दिल्ली की और तंग हो गई सड़कों पर गाड़ी चलाते हुए, किसी प्लश से दफ़्तर में किसी का इंतज़ार करते हुए, बिना इंटरनेट के नए फ़ोन में सिर घुसाए मसरूफ़ दिखने का झूठा दिखावा करते हुए, बस स्टॉप पर बच्चों का इंतज़ार करते हुए, मॉर्निंग वॉक से लौटते हुए... एक ही ख़्याल तारी रहता है आजकल - किसी को गले लगाने का बेतुका ख़्याल, और गले लगकर जीभर कर रो लेना का बेतुका ख़्याल।

फिर मम्मी के पास होना चाहती हूं मैं अचानक। पूछना चाहती हूं कि ऐसी बेचैनियां कितनी पीढ़ियों को शाप में मिलती हैं? किस महर्षि का ध्यान भंग किया था किस जन्म में हमने कि पूरी ज़िन्दगी की तपस्या सज़ा के तौर में मिली? तीसरी पीढ़ी तक तो चैन नहीं है। आद्या को क्या सौंपूंगी? उसे शाप से बचाए जाने का कोई तो प्रायश्चित होगा मम्मी...

सुबह फिर रात की पूंछ थामे आई है। मुझे जाड़ों की सुबहें ज़रा भी नहीं भाती। धूप की नरमी न हो तो सुबह का मतलब ही क्या? रात गुज़र जाए और नींद न आए तो उससे बड़ी सज़ा क्या? डरावने सपनों को ख़्वाबों से रिप्लेस न किया तो फिर जिएं कैसे? विरह न हो तो प्रेम की परिभाषा कैसे समझ में आए? टूटन सताए न तो समेटने का ख़्याल कहां से लाएं?

ऐसी ही है तो ऐसा ही हो। मुझे डॉ कुमार से मिलने की सख़्त ज़रूरत है।

मैं जानती हूं डॉ कुमार क्या कहेंगी। उनकी समझदारी और डॉक्टरी पर, उनके हीलिंग पावर पर मेरी सोचने-समझने की शक्ति कई बार भारी पड़ती है। ठीक उसी तरह, जिस तरह उनके दिए हुए संबल पर मेरा परिताप भी भारी पड़ता है कई बार। बहुत सूक्ष्म हैं ये परिताप। बांधते भी नहीं, लेकिन इनसे ख़ुद को आज़ाद करना भी मुश्किल लगता है। इन सूक्ष्म तंतुओं को तोड़ने की ज़िद में कहीं कुछ बड़ा नष्ट न हो जाए, इस डर से मैं डॉ कुमार से भी अपना एक हिस्सा बचाए रखती हूं। कुछ ज़ख़्म हरे रहें तो ही ठीक।

लेकिन ज़िन्दगी में ऐसे विरोधाभास कई बार नितांत आवश्यक होते हैं। डर आता है तो हिम्मत ढूंढने का सबब मिलता है। प्यार होता है तो परिताप भी, क्लेश भी। देवताओं के माथे गुनाहों का कलंक सबसे गहरा होता है।  जो सबसे ज़्यादा प्यार बांटता है, वही सबसे ज़्यादा खाली होता है भीतर से। शब्द अधूरे होते हैं तभी उच्चारण मांगते हैं। चाराग़र अपनी ही जानलेवा बीमारी का इलाज नहीं कर पाता।

कुछ डर, कोई आशंका, कोई तिश्नगी, कोई उद्विगनता, किसी के प्रति अबूझ स्नेह, कहीं अटकी हुई बेजां श्रद्धा और कहीं पीछे रह गया किसी किस्म का एक अफ़सोस - ज़िन्दगी ऐसे ही बनती है शायद। उम्मीदें और दिलासे, प्यार और big hug इसी विरोधाभास को बचाए रखते हैं।

ये सब सोचते हुए उठती हूं एक कठिन रतजगे के बाद बिस्तर आख़िर छोड़ ही देती हूं और बच्चों को आवाज़ लगाती हूं। 6.45 के बाद उठने का मतलब है बस के छूट जाने की पूरी गुंजाईश बन जाना।

बच्चे नींद में भी शायद मां की बेकली पहचानते होंगे। मैंने मांगा नहीं - बिग हग - बड़ी सी झप्पी, और बेटा अपने आप बिस्तर से सरकते-सरकते मेरी गर्दन के आस-पास कहीं जगह बनाते हुए अपना बासी मुंह मेरी गर्दन के भीतर घुसेड़ देता है। बेटी भाई की देखा-देखी पीठ से लटक जाती है।

मेरे इर्द-गिर्द दो सुरक्षा चक्र हैं, और कई तरह के विरोधाभास। बच्चों का प्यार न चाहते हुए भी खलिश भर ही देता है कई बार।

मैं गुलज़ार और पंचम को आवाज़ देती हूं अपने लैपटॉप पर फिर एक बार, और ख़ुद को एक बार और याद दिलाती हूं कि खुशी उस तितली का नाम है जिसे पंखों से पकड़ना होता है और इंसान उस बच्चे का नाम जिसे खुशी नाम की तितली को पंखों से पकड़कर जेब में घुसेड़ लेना का हुनर आ ही जाता है अपने आप - ज़िन्दगी के तमाम विरोधाभासों के बीच भी।

बाकी, दिलासों को छूते हुए, उम्मीदों से मिलते हुए ज़िन्दगी ठीक उसी तरह कट जाती है जैसे आज का दिन कट जाएगा।

***

कभी पास बैठो,
किसी फूल के पास
सुनो जब महकता है
बहुत कुछ ये कहता है

कभी गुनगुना के
कभी मुस्कुरा के
कभी चुपके चुपके
कभी खिलखिला के

जहां पे सवेरा हो, बसेरा वहीं है

कभी छोटे-छोटे
शबनम के कतरे
देखे तो होंगे
सुबह-ओ-सवेरे
ये नन्हीं-सी आंखें
जागी हैं शबभर
बहुत कुछ है दिल में
बस इतना है लब पर

जहां पे सवेरा है, बसेरा वहीं है

न मिट्टी न गारा
न सोना सजाना
जहां प्यार देखो
वहीं घर बनाना
ये दिल की इमारत
बनती है दिल से
दिलासों को छूके,
उम्मीदों से मिलके

जहां पे बसेरा हो, सवेरा वहीं है




शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

बच्चे नहीं, हम बिगड़े हुए हैं


कौटिल्य पंडित को टीवी पर देखकर दिमाग में जो पहली बात आई थी, उसके बारे में सोचकर मझे कई बार अफ़सोस हो चुका है। मैंने सोचा, कौटिल्य नाम का ये जीनियस मेरे बच्चों से तो सिर्फ एक साल छोटा है!” जितनी तेज़ी से ये ख़्याल मेरे मन में आया, उतनी ही संजीदगी से ये बात भी ज़ेहन में आई कि ख़ुद को जागरुक और संवेदनशील बताने वाले हम मां-बाप भी आख़िर किस हद तक ढोंगी हो सकते हैं! हम सब तमगे चाहते हैं, ट्रॉफी किड्स चाहते हैं – उस तरह के बच्चे जिनका घर, बाहर, समाज और यहां तक कि सोशल मीडिया पर दिखावा करने का मौका मिल सके।

बच्चों को लेकर हमारी प्रतिस्पर्धा उनके पैदा होते ही शुरू हो जाती है। बच्चे किस अस्पताल में पैदा हुए, और कितने बड़े पेडियाट्रिशियन के पास से हमने टीके लगवाए - यहां से शुरू हुई ये स्पर्धा उनके बैठने, बोलने, चलने और कब कितना क्या-क्या कहा के हिसाब के तौर पर स्क्रैप-बुक्स, एलबम्स और लाइव स्टेटस अपडेट्स में जमा होने लगी है। मैं मानती हूं कि अपने बच्चों को बड़ा करना एक किस्म का सेलीब्रेशन होना चाहिए - एक किस्म का जश्न-ए-बचपन - क्योंकि बच्चों को बड़ा करने के साथ-साथ हम भी न सिर्फ अपना बचपन जी रहे होते हैं, बल्कि उनके साथ-साथ ख़ुद भी बड़े हो रहे होते हैं। बच्चे हमें सब्र का पाठ पढ़ाते हैं। बच्चे हमें प्यार करना सीखाते हैं। बच्चे हमें जीने का सलीका बताते हैं। लेकिन इसका मतलब बच्चों के साथ हमेशा परफेक्ट होने की ज़्यादती करना कतई नहीं हो सकता।

लेकिन बदकिस्मती से हमने एक ऐसा समाज बना लिया है जो बच्चों की मासूमियत और उनका बचपन छीनने का काम बख़ूबी और सीना ठोक कर करता है। ये वो समाज है जहां हमारे बच्चों की आंखों पर पट्टियां लगाकर उन्हें ज़िन्दगी की रेस में तभी छोड़ दिया जाता है जब उनकी उम्र अपनी सीधे खड़े होने की भी नहीं हुई होती। इसके पीछे बड़ा कारण एक ही है – हमें पेरेन्ट्स या अभिभावक के तौर पर खुद को अव्वल साबित करना है। इसलिए बच्चों की परवरिश हमारे लिए वो प्रोजेक्ट हो जाती है जिसमें ए-प्लस हासिल करना ज़िन्दगी का सबसे बड़ा लक्ष्य बन जाता है। 

हमारे बच्चे किस स्कूल में पढ़ते हैं, स्कूल से आने के बाद कितनी तरह की हॉबी क्लासेस में जाते हैं, क्लासिकल संगीत के साथ-साथ टेनिस क्लासेस के लिए जाते हैं या नहीं, स्कूल में ग्रेड्स कैसे लेकर आते हैं, उनका बर्ताव कैसा है, उनकी शख़्सियत कैसी है – इन सारी बातों पर हमारी लम्हा-लम्हा नज़र होती है। हम अपने काम में चाहे कितने ही फिसड्डी क्यों न हों, जाड़े की सुबह दफ़्तर जाने के लिए रजाई को छोड़ने से पहले बॉस को कितनी ही गालियां क्यों न दे दें, ख़ुद दूसरों से किस तरह पेश आते हैं उसके बारे में भले कभी न सोचा है, लेकिन बच्चे हमें परफेक्ट चाहिए। अपनी अपेक्षाओं का भार अपने बच्चों को कोमल कंधों पर रखते हुए हमें ज़रा भी हिचक नहीं होती। क्यों भला?

मैं एक और वाकया सुनाती हूं। गर्मी की छुट्टियां काटने के लिए दोपहर में अपने पांच साल के जुड़वां बच्चों को मैंने ड्राईंग कॉपी और वॉटर कलर के डिब्बे पकड़ा दिए थे। बच्चों को भी बड़ा ज़ा आ रहा था। जब तक बच्चे मेरे अपेक्षा के मुताबिक ब्रश को कलर में डुबो के आराम से पेंटिंग करते रहे, मैं उनकी तस्वीरें खींचती रही, वीडियो लेती रही। इन सभ्य और कलाकार बच्चों पर नाज़ करती रही। बच्चे तो बच्चे ठहरे। थोड़ी देर में उनका मन ड्राईंग बुक से ऊब गया और उन्हें रंगों के साथ खेलने में इतना मज़ा आने लगा कि उनके शरीर, चेहरे और हथेलियां पर देखते ही देखते मॉडर्न आर्ट के कई डिज़ाईन उतर गए। पूरा रंग कमरे में और फर्श पर बिखर चुका था। खेल-खेल में सूरत ऐसी बिगड़ी कि मुझे तेज़ गुस्सा आ गया। अभी दस मिनट पहले मैं जिन सभ्य और परिष्कृत बच्चों पर फ़ख्र कर रही थी, वही बच्चे अब मेरी नाराज़गी की चपेट में आ चुके थे।

किसने तय किया कि बच्चे कैसे पेंटिंग करेंगे? उनके हमेशा बच्चों के तरीके से काम करने की अपेक्षा क्यों की जाती है? हम इतनी सारी बंदिशों में क्यों रखते हैं उनको? उन्हें उनके तरीके से जीने देने में हमें इतनी तकलीफ़ क्यों होती है? सच तो ये है कि उन्हें उनके तरीके से हम तभी जीने देते हैं जब हमारी सहूलियत की बात आती है। हमारे पास वक़्त नहीं है तो उन्हें टीवी देखने दिया। हम शाम को वक्त पर घर नहीं लौट पाए तो उनके लिए खिलौने ले आए। हमारे पास उनके दोस्तों से मिलने और उन्हें जानने का वक्त नहीं है तो उन्हें मॉल ले गए। हमारे पास उनकी पसंद का खाना बनाने की फ़ुर्सत नहीं है तो उन्हें पिज़्जा और बर्गर खिला दिया। अपनी सहूलियत के हिसाब से सब ठीक, लेकिन जब बच्चों ने इनमें से कुछ भी अपनी मर्ज़ी से मांगा तो हमने बड़ी आसानी से कह दिया, आजकल के बच्चे ही बिगड़े हुए हैं।

बच्चे बिगड़े हुए नहीं हैं। हम बिगड़ चुके हैं। हमारे बच्चे हमारा ही प्रतिबिंब होते हैं। उनकी सोच, उनके रहन-सहन, उनके तौर-तरीकों में हमारी शख़्सियत ही झलकती है और ये बात वैज्ञानिक रूप से साबित भी हो चुकी है। एक बेहतर समाज बन सके, इसके लिए बहुत ज़रूरी है कि हम बच्चों के लिए एक अच्छा माहौल बनाएं। इस गलाकाट और बेरहम दुनिया में बच्चों का तो क्या, हमारा भी गुज़ारा मुश्किल से हो रहा है। बच्चों की ज़रूरतें सुविधाएं, विलासिता, आईपैड और मोबाइल फोन नहीं, हमारा वक्त और हमारा प्यार है। अपने बच्चों का प्यार से पालन-पोषण करना अपने भीतर प्यार और इंसानियत बचाए रखने का सबसे कारगर तरीका है और बच्चों को उनके हिस्से का प्यार और सम्मान मिले, इसके लिए हर बच्चे का कौटिल्य पंडित होना भी कतई ज़रूरी नहीं।          

('खुशबू' में प्रकाशित कवर स्टोरी - लिंक है http://dailynewsnetwork.epapr.in/184374/khushboo/13-11-2013#page/1/1)

बुधवार, 13 नवंबर 2013

... कि सब ठीक ही है आज कल

मुझसे मत पूछना कि कहां गुम ही इन दिनों।

जब कहने के लिए कई बातें होती हैं, तो सबसे ज़्यादा सन्नाटा यहीं इसी जगह पर, यहीं मेरे ब्लॉग पर होता है।

बस इतना यकीन दिला सकती हूं आपको कि टुकड़ों-टुकड़ों में बिखरे वजूद को समेटने की कोशिश में लगी हुई हूं ताकि एक भरपूर और मुकम्मल शक्ल में आप सबके सामने आ सकूं।

तब तक दुआएं भेजिए क्योंकि कुछ और काम नहीं आता। सिर्फ़ दुआएं और सकारात्मक ऊर्जा, पॉज़िटिव एनर्जी, ही कुछ बदल पाने का माद्दा रखती हैं।

इन पन्नों पर फिर से लौट आने को बेचैन,

आपकी ही
अनु

शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

'सच' बनाम 'मज़ा' यानी लव ऑफ़ कॉमन पीपुल

मुझे ठीक-ठीक याद नहीं वो वाकया। लेकिन भाई की ज़ुबानी कई बार सुन चुकी हूं ये किस्सा, इसलिए यहां दुहरा सकती हूं। हम सातवीं-आठवीं में थे तो हमें ब्रिटिश लाइब्रेरी की मेंबरशिप दिलाई गई। पापा हमें वो अंग्रेज़ी पढ़ाक बनाना चाहते थे जो वो ख़ुद चाहकर भी नहीं बन सके होंगे। इसलिए, हमें उस उम्र में हार्डी बॉयज़, फ़ेमस फाइव और  सीक्रेट सेवेन की दुनिया में उलझा दिया गया और रांची की अपनी बेहद मिडल क्लास, बेहद साधारण ज़िन्दगी से परे हमने धीरे-धीरे एक और दुनिया बना ली। (राज़ की बात है कि अंग्रेज़ी किताबों में छुपाकर मैं शिवानी के उपन्यास पढ़ती थी और भाई अपनी टेबल के नीचे पिस्का मोड़ से एक रुपए देकर किराए पर लाई हुई नागराज की चार कॉमिक्स रखता था।) भाई का तो नहीं मालूम, लेकिन मैंने मजबूरी में ही सही, अपनी पीढ़ी के बाकी लोगों की तरह जितना एनिड ब्लाइटन पढ़ा, उतना किसी और को पढ़ा होगा, मुझे नहीं लगता। ख़ैर, मुद्दा ये नहीं कि हमने ब्रिटिश लाइब्रेरी के समंदर में से कितने मोती चुने और कितनी रेत जेबों में भरी। मुद्दा ये है कि उस समंदर के किनारे बैठने की क़ीमत कितनी बड़ी हुआ करती थी।

ब्रिटिश लाइब्रेरी घर से कुछ दसेक किलोमीटर दूर था। सालाना मेंबरशिप दो सौ रुपए की और हर चार हफ्ते पर किताबें लौटाने जाने का खर्च रिक्शे के भाड़े के तौर पर। हम या तो रिक्शा करते या फिर ऑटो लेते। हम यानी मैं और मेरा छोटा भाई। हम तीनों में सबसे छोटा अभी चौथी या पांचवीं में था, लेकिन सबसे स्मार्ट था। उसने किताबों के प्रति अपनी उदासीनता बहुत पहले ही साफ़ कर दी थी, इसलिए उससे अख़बार पढ़ने (और फिर अंग्रेज़ी और हिंदी में ख़बर पर टिप्पणी लिखने) को भी नहीं कहा जाता था।  हंस लीजिए हमपर, लेकिन हमने ये कसरत हर इकतीस दिसंबर को कई सालों तक की, पापा के डर से। भाई ने स्मार्टली, और मैंने बेवकूफ़-ली।

ख़ैर, हमें कुल मिलाकर तीस रुपए मिला करते - पंद्रह आने के, पंद्रह जाने के। ऑटोरिक्शा से जाना सस्ता पड़ता था, लेकिन हम रिक्शा लेना इसलिए पसंद करते थे क्योंकि रिक्शा हमारी निजी सवारी टाईप का फ़ील देता था। फिर रिक्शे पर गप मारने का बहुत सारा टाईम भी मिलता था। वैसे ऑटो से जाने का मतलब होता, सीधे दस रुपए की बचत। तो ऐसे ही दस-पांच रुपए बचाते हुए हमने बीस रुपए इकट्ठा किए। मैं बड़ी थी, इसलिए ज़ाहिर है पैसा मेरे हाथ में होता। पैसे बचे तो हमने एक दिन जोश-जोश में कावेरी जाने का फ़ैसला किया।

कावेरी तब रांची के महंगे रेस्टुरेन्ट्स में से एक था। वहां तब भी लंबी कतार लगती थी, अब भी शायद लगती है। हम जैसे बारह-तेरह साल के पिद्दियों के लिए कावेरी जाना मूनवॉक कर आने के बराबर था। ख़ैर, हम कावेरी में घुस गए और मेन्यू कार्ड देखा तो समझ गए पिद्दी को पिद्दी का शोरबा ही मिल सकता है। जितने पैसे हमारे पास थे, उसमें एक ही मसाला डोसा और एक ही नींबू पानी ऑर्डर किया जा सकता है, वेटर को टिप देने का तो ख़ैर कोई सवाल ही नहीं है (जो हमारी शान के ख़िलाफ़ था)। बकौल भाई, डोसे के लिए आतुर (और भुक्खड़) भाई की प्लेट से निवाला बांट लेने का मन बहन का हुआ नहीं और नींबू पानी में से भी मैंने उसका हिस्सा निकाल दिया (ये मैं नहीं, भाई बताता है सबको। मैं तो सिर्फ़ उसे कोट कर रही हूं)।

हम 'गरीब' नहीं थे, सत्तर और अस्सी का स्टाईल स्टेटमेंट बन गई 'गरीबी' के हिसाब से तो बिल्कुल नहीं। लेकिन फिर भी ज़िन्दगी क़तरा-क़तरा नसीब होती थी, कई सारी कटौतियों के बाद। एक बड़े परिवार को चलाने का दारोमदार एक कंधे पर। गांव और शहर के बीच का संतुलन बनाए रखने का भार एक कंधे पर - बाबा के कंधे पर। इसलिए हम तीसरी पीढ़ी तक जो आता, बहुत सारी राशनिंग के साथ आता। बस ख़्वाब प्रचुर मिले विरासत में। बड़े-बड़े ख़्वाब। अपनी क्षमता की सीमाओं को तोड़ते हुए नई सीमाएं सुनिश्चित  करने का ख़्वाब। पैरों में पहिए डालकर अथक चलते रहने का ख़्वाब। नए शहर, नए गांव देखने का ख़्वाब। एक गाड़ी खरीदने का ख़्वाब। एक घर खरीदने का ख़्वाब। एक पहचान बना लेने का ख़्वाब। बाबा का दिया ख़्वाब। पापा का दिया ख़्वाब। मम्मी का दिया ख़्वाब। आईआईटी का ख़्वाब। लाल बत्ती का ख़्वाब। दौलत-शोहरत का ख़्वाब। और किसी कावेरी में कभी वेटर को टिप न दे पाने के गिल्ट से हमेशा के लिए निजात पा सकने लायक हैसियत रखने का ख़्वाब। जो ज़िन्दगी पापा न जी सके, वो उन्हें दे सकने का ख़्वाब। जो मम्मी को न मिला, वो छीनकर हासिल करने का ख़्वाब।  

पैसे नहीं होते थे, लेकिन उन ख़्वाबों के बारे में रात-रात पर बात करते रहने का जुनून था। छत पर सर्दी की धूप सेंकते हुए, गर्मी की छुट्टी में गांव के लिए बस में सफ़र करते हुए, कावेरी में खाने के लिए कई हफ्तों तक पैसे बचाते हुए, और एक मसाला डोसा के टुकड़े बांटकर खाते हुए हम सिर्फ ख़्वाब में जीते। वो ख़्वाब अजीब-से थे। सफलता का मतलब ठीक-ठीक मालूम नहीं था, लेकिन बस सफल होना था - सक्सेसफुल, एक्सिट्रिमली सक्सेसफुल एंड रिच। ख़्वाब को 'सच' में बदलने और उस सच का 'मज़ा' ले पाने का जोश था।

मैं जिस कॉलेज में थी, वो रईसों का कॉलेज था। 'मज़ा' वहां भी था लेकिन 'सच' कुछ और निकला। कॉलेज के बैंक से सौ रुपए निकालने के लिए दस बार सोचना पड़ता और फिर हिम्मत बांधकर लंबी लाइन लगानी पड़ती। उस उम्र में वैसे तो एक-दूसरे को बहुत सारा प्यार करने के लिए किसी ख़ास सरनेम की ज़रूरत नहीं पड़ती क्योंकि तितली बाद में जैसी भी बनकर निकले, कैटरपिलर से प्यूपा बनने के स्टेज पर तो सभी रंगों की तितलियां एक-सी ही होती हैं। लेकिन फिर भी घर से चिट्ठी के साथ, सोच-समझकर खर्च करने की ताक़ीद के साथ आनेवाले ड्राफ्ट का बेसब्री से इंतज़ार रहता और अपना जेबखर्च निकालने के लिए कई बार जी-जान लगाकर इंटर-कॉलेज प्रतियोगिताएं भी जीतनी पड़ीं। अब का पता नहीं, लेकिन तब कॉलेज फेस्टिवल्स में विजेता टीम को २००० रुपए तक, और सर्वश्रेष्ठ वक्ता को १००० रुपए तक का नकद पुरस्कार मिलता था। २००० रुपए लाजपत-सरोजिनी में भटकने, पीवीआर साकेत जाकर सात रुपए की टिकट लेकर फिल्में देखने और मैकडॉनल्ड्स से सात रुपए का कोन खाने के लिए बहुत होते थे। यानी तब भी तंगी के कैक्टस पर ख़्वाबों के फूल खिलते रहे और 'सच' पर 'मज़ा' हावी रहा, और ज़िन्दगी कड़वे-तीखे सच के बावजूद मज़ेदार रही। लेकिन 'सच' अक्सर चुभता था। मैं तंगहाली नहीं चाहती थी। (और ये स्वीकार करते हुए मुझे इतनी ही  झिझक हुई कि ये लाईन तीन बार टाईप की और दो बार डिलीट।) 

फिर अपने मोमेन्ट ऑफ एपिफ़नी के बारे में बताती हूं। कॉलेज थर्ड ईयर में थी। दिसंबर के एक सर्द और उदास वीकेंड पर मैंने अपनी दोस्त राशि का म्यूज़िक सिस्टम उधार मांगा था और रांची से रिकॉर्ड कराकर लाए अंग्रेज़ी गानों का एक कैसेट सुन रही थी। पॉल यंग को पहले भी सुना था, लेकिन उस दिन कुछ हो गया था मुझे 'लव ऑफ कॉमन पीपल' सुनते हुए। 

Living on a dream ain't easy
but the closer the knit, the tighter the fit
and the chills stay away.
Just to take 'em in stride for family pride.
You know that faith is in your foundation
and with a whole lot of love and a warm conversation
but don't forget to pray.
Making it strong where you belong

and we're living in the love of the common people,
smile's from the heart of a family man.
Daddy's gonna buy you a dream to cling to,
Mama's gonna love you just as much as she can
and she can.

मैं रिवाइंड कर-करके गाने का ये हिस्सा सुनती रही थी। उस समय अंग्रेज़ी गाने ठीक से समझ आते नहीं थे और गूगल था नहीं कि मदद मिलती। लेकिन कम-से-कम सत्तर बार मैंने ये अंतरा सुना और कॉपी में एक-एक शब्द लिखती रही। मुझे नहीं मालूम किसी और के साथ कभी हुआ होगा या नहीं, लेकिन मेरे साथ हुआ और इस एक शाम सुने हुए इस एक गाने ने मुझे ज़िन्दगी का सार सीखा दिया। मैं अकेले कमरे में बैठकर यूं रोई कि जैसे आंसुओं ने रूह का कोई हिस्सा पोंछ-पाछ कर साफ़ कर दिया है। उस दिन समझ में आया कि ड्राफ्ट से ज़्यादा ज़रूरी वो चिट्ठियां हैं जो मम्मी लिखा करती हैं। समझ में आया कि ईनाम में मिले पैसों से ज़्यादा बड़ी बात ये है कि मैं ईनाम जीत पाने के क़ाबिल थी। समझ में आया कि बंगला-गाड़ी-शोहरत से घर नहीं बनता। घर उस प्यार से बनता है जो प्यार हर सुबह बाबा फोन करके जताते हैं, तीन सौ लड़कियों के बीच के perpetually engaged इकलौते लैंडलाईन पर आधे-आधे घंटे तक फोन मिलाने की जद्दोज़ेहद और खीझ के बावजूद। समझ में आया कि ख़्वाबों का क्या है? हसरतों के पंखों पर सवार होकर ये आपको कहीं भी लेकर जा सकते हैं। लेकिन faith, भरोसा, यकीन, विश्वास आपको ख़ुद से जोड़े रखता है और ये भरोसा उनसे आता है, जो आपको प्यार करते हैं। ये भरोसा ख़ुद से आता है। हसरतों के पंखों को आपका अपना हौसला ही हवा दे सकता है और फिर ज़मीन पर गिरने या उतरने के लिए एक मुकम्मल पैड faith देता है।

इस एक गाने ने भी 'सच' और 'मज़ा' - इन दो दुश्मनों में समझौता कराने का तरीका सिखा दिया।   

आख़िर सच क्या है?

सच ईएमआई और फ़ीस चुकाने की चिंता है। सच शाम को आनेवाली सब्ज़ियों के न्यूट्रिएंटरहित होने की नाराज़गी है। सच एक किलो प्याज़ के डॉलर से महंगे हो जाने का गुस्सा है। सच धीरे-धीरे गिरता बैंक बैलेंस है। सच भविष्य का ख़ौफ़ है। सच वो डर है कि अगर कल को हमारे पास कुछ न बचा तो क्या होगा? सच अपने सपनों का दारोमदार अपने बच्चों के नाज़ुक कंधों पर डालते हुए उनके लिए बड़े-बड़े नामुमकिन ख़्वाब देखने की ढीठई है। सच कई-कई सालों तक कई-कई पीढ़ियों से वास्ता रखते हुए भी एक दिन भुला दिए जाने, रिडन्टेंट, अनावश्यक, बेकार हो जाने का शाश्वत सत्य है। सच गुल्लक में बचाए जाते रहने वाला यही डर है। सच मोदी है। सच आसाराम है। सच परमाणु हथियारों पर होने वाली लड़ाई के डर के ख़िलाफ़ लिखे जा रहे शांति प्रस्ताव हैं।

और मज़ा?

मज़ा जेब को रफू किए जाने की हाजत को जीभ चिढ़ा पाने का हौसला है। मज़ा मूलचंद फ्लाईओवर के नीचे आलू के परांठे दस रुपए में खा लेने और पचा लेने की शक्ति है। मज़ा बारिश के पानी से बनाई गई चाय की चुस्की है। मज़ा वो बेफ़िक्री, वो तटस्थता है जो जेब की गर्मी नहीं तय कर पाती। मज़ा मर जाने से पहले बहुत सारे लोगों को बहुत सारा प्यार दे पाने की शक्ति है। मज़ा दो मीठे बोल हैं, किसी को अपना समझकर गले लगा लेने से मिली उष्णता है, किसी के कंधे पर सिर टिकाकर रोने का सुख है। मज़ा अपनी हथेली पर किसी दोस्त की उंगलियों की नरमी की याद है। मज़ा सांस में अपने बच्चों के पसीने की खुशबू होने का सुख है। मज़ा उन्हीं बच्चों को बाद में उड़ने देने का विश्वास है। मज़ा इस बात पर यकीन है कि ज़िन्दगी में हसरतें बची रहें तो आस्था भी बची रहती है। मज़ा एक गाने में डिफ़ाईनिंग मोमेन्ट ढूंढ लेने का दीवानापन है। मज़ा कॉमन पीपुल के बीच का एक होते हुए भी एक्स्ट्राऑर्डिनरी हौसला रखना है। मज़ा इस नश्वर दुनिया में होते हुए भी ख़ुशी का वो एक लम्हा जी लेना है जो उस लम्हे का इकलौता शाश्वत सत्य है।

अब कहिए कि सच चाहिए या मज़ा? :-)

पोस्टस्क्रिप्ट: और अगर मेरी डायरी पढ़ते हुए भी इमोशनल नहीं हुए तो पॉल यंग का ये गाना सुनिए। (कवितानुमा गीत के बोल http://www.metrolyrics.com/love-of-the-common-people-lyrics-young-paul.html पर पढ़े जा सकते हैं)





शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

इस कहानी को कौन रोकेगा?

दो हफ्ते भी नहीं हुए इस बात को। आपको सुनाती हूं ये वाकया। मैं अलवर में थी, दो दिनों के एक फील्ड विज़िट के लिए। मैं फील्ड विज़िट के दौरान गांवों में किसी महिला के घर में, किसी महिला छात्रावास में या किसी महिला सहयोगी के घर पर रहना ज़्यादा पसंद करती हूं। वजहें कई हैं। शहर से आने-जाने में वक़्त बचता है और आप अपने काम और प्रोजेक्ट को बेहतर तरीके से समझ पाते हैं - ये एक बात है। दूसरी बड़ी बात है कि आप किसी महिला के घर में और जगहों की अपेक्षा ख़ुद को ज़्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं। मेरी उम्र चौतीस साल है और मैं दो बच्चों की मां हूं। बाहर से निडर हूं और कहीं जाने में नहीं डरती। डरती हूं, लेकिन फिर भी निकलती हूं। रात में कई बार अकेले स्टूडियो लौटी हूं। देर रात की ट्रेनें, बसें या फ्लाइट्स ली हैं। कई बार मेरे पास कोई विकल्प नहीं होता, कई बार ख़ुद को याद दिलाना पड़ा है कि डर कर कैसे जीएंगे।

लेकिन यकीन मानिए, अंदर का डर वही है जो छह साल की एक बच्ची के भीतर होता होगा।

ख़ैर, इस बार अलवर में मेरे लिए एक होटल में रुकने का इंतज़ाम किया गया। मैं दिल्ली से अकेली गई थी, एक टैक्सी में। (यूं तो मैं पब्लिक ट्रांसपोर्ट लेने में यकीन करती हूं, लेकिन यहां पब्लिक ट्रांसपोर्ट में भी 'safety' है?) दिन का काम खत्म करने के बाद बेमन से होटल में चेक-इन किया। मुझे अकेले होटलों में रहने से सख़्त नफ़रत है। फैंसी होटल था - सुना कि अलवर के सबसे बड़े होटलों में से एक। कार्ड लेकर कमरे में गई। पीछे से एक हेल्पर ने आकर मेरा सामान रखा। मैंने दरवाज़ा खोला और दरवाज़े पर ही खड़ी रही, तब तक जब तक वो हेल्पर मेरा सामान और टिप लेकर बाहर नहीं चला गया (मैं कमरे में अंदर किसी अनजान इंसान के साथ खड़ी होने का ख़तरा भी नहीं मोल लेती)। तब तक सहायक कार्ड लेकर उसे जैक में डालकर कमरे की बत्तियां जला चुका था।

अंदर आई। सबसे पहले दरवाज़ा देखा। दरवाज़े में भीतर कोई कुंडी, कोई चिटकनी नहीं थी। लोहे की एक ज़ंजीर थी बस, जिसके ज़रिए आप दरवाज़े को हल्का-सा खोलकर बाहर देख सकते थे। सेफ्टी के नाम पर बस इतना ही। वो ज़ंजीर भी बाहर से खोली जा सकती थी। वैसा दरवाज़ा बाहर से किसी भी डुप्लीकेट कार्ड से खोला जा सकता था।

मैंने रिसेप्शन पर फोन किया। पूछा, "भीतर से दरवाज़ा बंद कैसे होता है?" एक आदमी आया और कमरे में घुसते ही उसने सबसे पहले कार्ड निकाल लिया, "इसी कार्ड से बंद होगा कमरा", उसने कहा और कार्ड निकालकर मोबाइल की रौशनी में दरवाज़ा बंद करने का तरीका बताने लगा। कमरे में घुप्प अंधेरा, मोबाइल की हल्की रौशनी के अलावा। मैं इतनी ज़ोर से डर गई थी कि मुझे पक्का यकीन है, उस आदमी को मेरे मुंह में आ गई जान और मेरी धड़कनें साफ़ सुनाई दे गई होंगी। (विडंबना ये कि मैं अभी-अभी गांव में लड़कियों के स्कूल में सेल्फ-डिफेंस की ज़रूरत पर बक-बक करके आई थी)

मैंने ज़ोर से चिल्लाकर कहा, "लाइट जलाइए आप पहले।"

उसने मुझे घूमकर देखा और कहा, "मैडम मैं तो..."

"मैं समझ गई हूं कि दरवाज़ा कैसे बंद होता है। पुट द डैम थिंग बैक एंड स्विच ऑन द लाईट्स", मैंने चिल्लाकर कहा, उस आदमी को कमरे के बाहर भेजा, रिसेप्शन पर फोन करके उन्हें कमरे में चिटकनियों की ज़रूरत पर भाषण दिया (जो महिला रिसेप्शनिस्ट को समझ में आया हो, इसपर मुझे शक़ है) और फिर दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया। उसके बाद मैंने जो किया वो हर उस कमरे और नई जगह पर करती हूं जहां सोने में मुझे घबड़ाहट होती है। मैंने कमरे के स्टडी टेबल को खींचकर दरवाज़े के पीछे लगाया। फिर उसके ऊपर भारी-भरकम बेडसाईड टेबल रखा। फिर उसके ऊपर अपना सूटकेस रखा।

नहीं, उस रात मुझे नींद नहीं आई थी और वो रात कई उन रातों में से थी जिस रात मुझे अकेले (या अपने बच्चों के साथ अकेले) सफ़र करते हुए नींद नहीं आती। क्यों? मैंने ट्रेन में अपनी बर्थ पर सो रही एक अकेली लड़की के साथ रात में बदतमीज़ी होते देखा है। वो लड़की डर के मारे नहीं चिल्लाई थी। मैं चिल्लाई थी। हर हिंदुस्तानी लड़की की तरह मैंने अपने बचपन में एक भरे-पूरे घर में छोटी बच्चियों तो क्या, बड़ी लड़कियों और छोटे लड़कों के साथ होती गंदी हरकतें देखी हैं जिसे सेक्सुअल अस़ल्ट कहा जाता है। देखा है कि उन्हें कहां-कहां और कैसे छुआ जाता है। ये भी बताती हूं आपको कि इनमें से कई बातें मुझे आजतक किसी को भी बताने की हिम्मत नहीं हुई, मां को भी नहीं और मुझे पक्का यकीन है कि उन लड़कियों ने भी किसी से कहा नहीं होगा। चुप रह गई होंगी। क्यों, वो एक अलग बहस और विमर्श का मुद्दा है। उस दिन भी मैंने गांव के स्कूल की बच्चियों की ज़ुबान में उनके अनुभव सुने थे। आप सुनेंगे तो आपको शर्म आ जाएगी।

उस दिन मेरा हौसला पूरी तरह पस्त हो गया जिस दिन मेरी साढ़े छह साल की बेटी ने स्कूल ड्रेस पहनते हुए कहा, "मम्मा, स्कर्ट के नीचे साइकलिंग शॉर्ट्स पहना दो।" "क्यों", मैंने उसे तैयार करते हुए एक किस्म की बेफ़िक्री के साथ पूछा, "आज हॉर्स-राइडिंग है?" "नहीं मम्मा। कुछ भी नहीं है। स्कूल में लड़के नीचे से देखते हैं। सीढ़ी चढ़ते हुए, चेयर पर बैठते हुए। मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता।"

मैं शब्दों में अपना शॉक बयां नहीं कर सकती। मैंने उसे मैम और मम्मा को बताने की दो-चार बेतुकी हिदायतों के बाद साइकलिंग शॉर्ट्स पहना दिया और पूरे दिन परेशान होकर सोचती रही। छह साल की बच्ची को अच्छी और बुरी नज़र का अंदाज़ा लग गया। हम अपनी बेटियों की कैसे समाज में परवरिश कर रहे  हैं! उसे विरासत में क्या सौंप रहे हैं? डर?

आद्या अभी भी पार्क में साइकलिंग शॉर्ट्स में जाती है, या फिर वैसे कपड़ों में जिससे उसकी टांगें ढंकी रहें। यकीन मानिए, मैंने उसे कभी नहीं बताया कि उसे क्या पहनना चाहिए। इस एक घटना ने मुझपर एक बेटे की मां होने के नाते भी ज़िम्मेदारी कई गुणा बढ़ा दी है। मैं रिवर्स जेंडर डिस्क्रिमिनेशन करने लगती हूं कभी-कभी, न चाहते हुए भी। बेटे को संवेदनशील बनाने की ज़िम्मेदारी बहुत बड़ी है। बेटा पालना ज़्यादा मुश्किल है, ज़्यादा बड़ी ज़िम्मेदारी है।

फिर भी 'रेप' या यौन हिंसा को रोकने के लिए ये काफ़ी नहीं है। जब तक छोटे से छोटे यौन अपराधों (ईवटीज़िंग, छेड़छाड़) को लेकर कानून को अमल करने के स्तर पर ज़ीरो टॉलेरेन्स यानी पूर्ण असहिष्णुता का रास्ता अख़्तियार नहीं किया जाएगा, महिलाओं, लड़कियों, बच्चियों के ख़िलाफ़ हिंसा को लेकर बड़े बदलाव की उम्मीद बेकार है। दरअसल, इतना भी काफ़ी नहीं। जब तक ज़्यादा से ज़्यादा लड़कियां और औरतें पब्लिक स्पेस में नहीं आएंगी, डिस्क्रिमिनेशन कम नहीं होगा। समस्या ये है कि एक समाज के तौर पर हम अभी भी लड़कियों और औरतों से घरों में रहने की अपेक्षा करते हैं। सार्वजनिक जगहों पर उनकी संख्या को लेकर हम कितने पूर्वाग्रह लिए चलते हैं, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मेट्रो में, लोकल ट्रेनों में महिलाओं के नाम के एक ही कोच होते हैं। बाकी जनरल कोचों में गिनी-चुनी महिलाएं। अपने दफ्तरों, बाज़ारों, दुकानों, सड़कों, गलियों में देख लीजिए। क्या अनुपात होता है पुरुष और महिला का? को-एड स्कूलों में? कॉलेजों में? डीटीसी की बसों में महिलाओं के लिए कितनी सीटें आरक्षित होती हैं? शहर की सड़कों पर कितनी महिलाओं को गाड़ी चलाते देखा है आपने? ६६ सालों में सोलह राष्ट्रीय आम चुनाव, लेकिन देश की ४८ फ़ीसदी आबादी के प्रतिनिधित्व के लिए ३३ फ़ीसदी सीटों के आरक्षण को लेकर बहस ख़त्म ही नहीं होती। जो पुरुष औरतों को बराबरी का हक़दार मानते ही नहीं, वे उसे अपमानित, शोषित और पीड़ित करने का कोई मौका नहीं छोड़ेंगे। फिर हमारे यहां तो यूं भी पुरुषों के इस बर्ताव को मर्दानगी समझा जाता है। जब तक मर्दानगी की परिभाषा बदलेगी नहीं, मर्द नहीं बदलेंगे, बराबरी की बात फ़िज़ूल है। हम हर बलात्कार का मातम ही मना सकते हैं बस।   

रह गईं औरतें और लड़कियां तो सदमे में होते हुए भी, अपने डर से लड़ते हुए भी बाहर जाने और काम करने का हौसला रखेंगी ये। हमारे पास चारा क्या है? फिर भी मैं अकेले अनजान जगहों पर सफ़र करने की हिम्मत रखूंगी, चाहे इसके एवज़ में मुझे कमरे को भीतर से कई सारे फर्नीचर लगाकर ही क्यों न बंद करना पड़े। फिर भी मैं मर्दों पर, लड़कों पर भरोसा करती रहूंगी। पूरी ईमानदारी से इस भरोसे को बचाए रखने की कोशिश करूंगी और इसके ख़िलाफ़ उठने वाले हर शक़ का इलाज ढूंढने की कोशिश करूंगी।  मैं फिर भी अपने बच्चों को एहतियात बरतने के साथ-साथ भरोसा करना ही सिखाऊंगी। बेटी नज़र और 'टच' पहचानने ही लगी है। बेटा भी शायद धीरे-धीरे अपनी बहन की ख़ातिर और उसके जैसी कई लड़कियों की ख़ातिर ख़ुद को बदलना सीख जाए, मर्दानगी की परिभाषा बदलना सीख जाए। आमीन! 

रविवार, 11 अगस्त 2013

हज़ार दुश्वारियों के बीच

संडे का दिन संडे की तरह ही गुज़ारा जाए तो अच्छा। संडे का मतलब है देर से जागना, देर से नहाना, देर तक बिस्तर पर पड़े रहकर किताब और अख़बार पढ़ना, पूड़ी-भुजिया टाईप का कुछ नाश्ता करना और फिर से देर तक बिस्तर पर पड़े रहकर कोई थ्रिलर पढ़ना। मन हुआ तो बीच में अपनी पसंद के गाने सुनते जाना। ऐसा संडे बहुत दिनों के बाद लौटा है। आज जी लेते हैं कि कल से यूं भी डेडलाई्न्स की चिंता में जान गंवाना है। ज़िन्दगी की दुश्वारियां यूं भी कमबख़्त कहां कम होती हैं?

स्कूल में थी तो नया-नया बीटल्स सुनने का शौक़ चढ़ा था।  वो भी टार्गेट मैग़ज़ीन पढ़कर। जॉन लेनेन, पॉल मैककार्टने, जॉर्ज हैरिसन और रिंगो स्टार हमारे पोस्टर बॉयज़ थे जिनके पोस्टर्स मैगज़ीन से फाड़कर दीवारों पर लगाने की इजाज़त कभी नहीं मिली, लेकिन लव, लव मी डू/यू नो आई लव यू बजता तो लगता, जीवन का शाश्वत सत्य यही है। सत्य के चेहरे क्रश के हिसाब से बदलते रहते, लेकिन भावना उतनी ही शाश्वत रही। तब हमारी उम्र क्या थी, ये मत पूछिएगा। हम अस्सी के दशक में बड़े हो रहे बच्चे थे, लेकिन हमें मैडोना, माइकल जैक्सन और द पुलिस उस तरह पसंद नहीं आए जिस तरह अपने दादा-परदादा के ज़माने के क्लासिक्स भाए। हम पॉप, रॉक, मेटल के ज़माने में भी बीट और ब्लूज़ ढूंढते। या फिर क्लिफ रिचर्ड, नील डायमंड के अटरली होपलेसली रोमांटिक गाने। हां, बॉब डिलैन के गानों के बोलों की वजह से फोक रॉक ज़रूर सुनने लगे। मेटल और हार्ड रॉक से वास्ता बहुत बाद में पड़ा, इसलिए रोलिंग स्टोन्स, एरिक क्लैप्टन और लेड ज़ेपलिन भी अपने दौर के कुछ बीसेक साल बाद मेरी ज़िन्दगी में आएं। डायर स्ट्रेट्स के लिए तो अभी भी कानों को उस तरह तैयार नहीं कर पाई, जैसे घर में बाकी लड़कों को देखती हूं। जब मेरी अंग्रेज़ी की डिक्शनरी में साइकेडेलिक शब्द जुड़ा तब समझ में आया कि पिंक फ्लॉयड को कल्ट क्यों माना जाता है। 

आज एक-एक करके सब सुनती रही। बीटल्स, कार्पेन्टर्स, सीलिन डियॉन, मैरिया कैरे, साइमन एंड गारफंकल, एरिक क्लैप्टन और यहां तक कि मैडोना भी। फेसबुक पर बिना सोचे-समझे डाल दिए गए एक गाने पर मिली प्रतिक्रिया ने साबित कर दिया है कि अभिव्यक्त करने के तरीके, वाक्य-विन्यास बेशक अलग-अलग हों, लेकिन नोस्टालजिया की शब्दावली एक-सी होती है।

इस नोस्टालजिया को लिए-लिए पार्क आ गई हूं।

दूर कोने में एक-दूसरे की ओर पीठ किए खो-खो खेलने के लिए बैठ बच्चे, आस-पास के स्कूलों को लेखा-जोखा लेने निकली मम्मियां,रिसेशन के ज़माने में नाम भर के इन्क्रिमेंट को सिर धुनते पापा लोग, दूर विदेशों में अपने-अपने बेटे-बहुओं, बेटी-दामादों का बखान करती दादियां और करप्शन का रोना रोते दादाजी लोग, और फिर पुराने गानों पर शुरू हुई बातचीत में धीरे-धीरे जुड़ते, अपनी पसंद के गाने जोड़ते सभी उम्र के लोग - संडे की शाम पार्क कुछ ऐसे गुलज़ार हुआ है कि पूरे हफ्‍ते का टॉनिक मिल जाने का गुमां हुआ है।

टॉनिक ही टॉनिक है। ठीक सात से ठीक आठ बजे तक चलने वाले रंग-बिरंग फव्वारे से मिलने वाला विज़ुअल टॉनिक। आठ लोगों की ज़िन्दगियों के फ़साने के अठहत्तर रूपों के बारे में सोचते रहने के लिए ज़ेहन को टॉनिक। सोचते रहिए कि उनकी ज़िन्दगी में ये न होता तो क्या होता, यूं हुआ होता तो क्या हुआ होता।

कुल मिलाकर सबकी तकलीफ़ें एक-सी हैं। एक सी महंगाई। एक-सी बेवफाई। एक-से धोखे। एक-सा भ्रष्टाचार। एक-सी बीमारी। मर जाने का एक-सा डर। एक-सा प्यार। एक-सी उम्मीद। एक-सा नोस्टालजिया। नोस्टालजिया के लिए भी एक-सा नोस्टालजिया। सिर्फ बाहर का आवरण अलग है। खरोंचो तो भीतर सब एक-सा। हम फिर भी कितने अलग-अलग हैं!

इन एक-से लोगों की अलग-अलग कहानियां सुनते हुए ज़िन्दगी गुज़ार पाते तो क्या ही अच्छा होता। लेकिन ग़म-ए-रोज़गार भी है, ग़म-ए-इश्क भी। अब यही इकलौता जस्टिफिकेशन है इस बात का कि मैं बोलने बहुत लगी हूं आजकल, बात कम करती हूं। सुनती भी बहुत हूं, लेकिन ध्यान कम देती हूं। लिखती भी ख़ूब हूं आजकल, लेकिन सोचती नहीं। पढ़ती हूं, लेकिन मनन नहीं करती।

जब जीने को बहुत हो और वक्त की कमी हो तो ऐसा ही होता होगा शायद।

संडे ढलने लगा है और कल के डेडलाईन की चिंता सताने लगी है। लेकिन बीटल्स ने शाम को डूबने से बचा लिया है।